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शनिवार, 7 जनवरी 2023

बर्फवारी, हिमपात : डॉ शोभा भारद्वाज

 बर्फवारी, हिमपात

डॉ शोभा भारद्वाज 

शादी के कुछ समय बाद मसूरी स्नोफाल का नजारा देखने के लिए गये इंतजार करते रहे बर्फ तो नहीं गिरी हाँ ठंड बढ़ने लगी होटल वाले ने एक सुबह बताया मसूरी के पास धनौल्टी में रात को स्नोफाल हुआ है हम तुरंत बस में बैठ कर बर्फ का लुत्फ़ उठाने चल दिये धनौल्टी की हरी भरी पहाड़ी के पास उतर गये  वहां के लोगों ने बताया ऊपर बर्फ पड़ी है आनन्द मगन हरियाली का आनन्द लेते फोटोग्राफी करते पहाड़ी पर पहुंचे वहाँ एक मन्दिर था बर्फ पड़ी थी परन्तु उसे बर्फ बारी नहीं कहा जा सकता कई चित्र खींचे जमीन से बर्फ इकठ्ठी कर बाल बना कर इन पर मारने की इच्छा थी हाथ मे पिघलने लगी हाँ हथेलियों में उठा कर मैने चित्र खिचवाये यह मेरा मजाक उड़ा रहे थे | पहाड़ी से हिमालयन रेंज एवं बर्फ से ढकी चोटियाँ नजर आ रही थीं |

 कुछ वर्ष बाद इन्हें ईरान की पोस्टिंग मिली उसी वर्ष अक्टूबर में मेरा वीजा लग गया | तेहरान एयर पोर्ट पर उतरते ठंडी हवा के थपेड़ों ने स्वागत किया |खुर्दिस्तान में प्रवेश करते ही हवा और भी बर्फीली महसूस हुई लेकिन बस गर्म थी | खुर्दिस्तान की राजधानी सननदाज के आखिरी छोर की घाटी के अस्पताल में इनकी पोस्टिंग थी अस्पताल कैम्पस में घर था थोड़े ढलान पर रुद्खाना ( पहाड़ी नदी ) बहती थी घाटी की छटा अनुपम थी छोटे बड़े हर पेड़ों पर पत्ते सुनहरे रंग के थे इस महीने को वहाँ पाईस (पतझड़ ) कहते है था कुछ दिनों में बाद पत्ते झड़ने लगे पेड़ बिलकुल खाली हो गये, वहाँ घर खोखली ईंटों से बनाये जाते हैं दोहरी छत ऊपर से ढलाव दार घर को गर्म करने के लिए भारी लोहे की बुखारियाँ जिनमें मिट्टी का तेल जलता था पाईप से चिमनी के रास्ते धुँआ बाहर निकलता रहता , शोफाश जो फर्निस आयल से गर्मी देते थे |

अब बेसब्री से स्नोफाल का इंतजार था एक शाम मौसम में गर्मी थी बुखारी हल्की कर दी स्वेटर की जरूरत महसूस नहीं हुई |सुबह उठे कांच के दरवाजों से बाहर झांका घर के बाहर बर्फ ही बर्फ कांच के दरवाजे जाम, अस्पताल का चोकीदार बर्फ हटा कर अस्पताल एवं घर से निकलने के लिए पगडंडी बना रहा था शुक्रवार की छुट्टी थी बाहर देखा छत पर 24 इंच बर्फ की परत घबरा कर घर के अंदर आ गयी कुछ देर बाद छत से बर्फ फिसलती छपाक की आवाज आती लगातार छप- छप घर के चारो तरफ बर्फ की दीवार बनती जा रही थी दहशत लगने लगी हाय यह होती है स्नोफाल हिम युग का अहसास हुआ जैसे साईबेरिया में आँखें खोली हों बर्फ में धंसी बड़ी गाड़ी नजर नहीं आ रही थी पेड़ों की टहनियां बर्फ से ढकी थीं कुछ देर बाद फिर बर्फबारी होने लगी लगातार रूई की तरह जम कर गिर रही थी साथ ही अस्पताल , घर की छत से गिरती बर्फ की आवाजें छपाक रसोई में गयी कांच की खिडकियों पर बर्फ जमी थी बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था कुछ देर में बर्फीला तूफ़ान चलने लगा सांय – सांय की आवाजें पहले बर्फ के सीजन की तैयारी के लिए घर की खिडकियों को बंद करते समय रूई लगा दी गयी थी लेकिन कांच के बड़ें दरवाजों की संधों से बारीक बर्फ अंदर आने लगी | दूर- दूर तक केवल बर्फ पहाड़ियां भी आँख से ओझल थीं यहाँ कैसे दिन कटेंगे  ?

 नल में पानी जमा नहीं था समझ में आया चौकीदार ने नल की हल्की दार खुली रखने की हिदायत दी थी |मिट्टी के तेल से चलने वाला गीजर , एवं फ्रिज (बिजली या मिट्टी के तेल से चलता था ) चलता रहे नहीं तो बाहर रखा सामान बर्फ हो जाएगा आलू और प्याज दूध के पैकेट में दूध बर्फ हो जाएगा   गर्म पानी के बिना हाथ गलने लगेंगें हैरानी हो रही थी यहाँ के आम लोगों का जीवन कैसे चलता होगा विदेशी डाक्टर का वहाँ का निजाम ख़ास ख्याल रखता था बर्फबारी रूकी शाम हो गयी बाहर खम्बो में जलने वाली रोशनी भी रोती लग रही थी काली रात और भी डरावनी थी चारो और सन्नाटा | अस्पताल में  मजबूर इक्का दुक्का मरीज आये इन दिनों राजधानी के आसपास के गावँ शहर से कट जाते हैं उस वर्ष बेहद बर्फवारी हुई थी शाम को टीवी में मौसम का हाल सुना हमारे एरिया का टेम्प्रेचर माईन्स 18 डिग्री था आगे और गिरेगा बताया गया कई वर्षों बाद ऐसी बर्फबारी हुई है भूखे भेड़िये शहर में देखे गये हाय यह सब हमारे ही भाग्य में था |

बहुत बड़ा गर्म घर बाहर देखने की हिम्मत नहीं बाहर के कमरे में रस्सी बाँध कर कपड़े सुखाये जा सकते थे धूप निकली सोचा बाहर कपड़े सुखा दूँ बाहर गाउन बर्फ की तरह कड़ा हो गया साँस की भाफ जमने लगी भाग कर अंदर आ गयी सामने चौकीदार की बीबी हंस कर बोली थी खानम खूबी सलामती |

पहाड़ों को कन्दराओं में जमी बर्फ से पूरे वर्ष पीने का पानी राजधानी को मिलता था अस्पताल की टंकी अलग थी | 

मार्च की शुरुआत – घनघोर बारिश बिजली के कड़कने से घाटी थर्रा रही थी बर्फ पिघलने लगी पेड़ों पर नन्हे – नन्हे पत्ते डालियाँ सफेद फूलों से भर गयीं हर फूल फल था |पहाड़ों पर झरने ,झरने लगे जमीन पर लाल रंग के फूलों के बीच में अनेक रंग के फूलों के गलीचे बिछ गये बहार का सीजन था कल- कल की मधुर आवाज से रुद्खाना तेजी से बह रहा था 

बर्फबारी का दिल में डर बैठ गया था इसे देखने हमारे यहाँ के लोग पहाड़ों पर जाते है ,लेकिन अबकी बार आने वाला वर्ष बहुत सुहाना था बर्फ का सीजन आया बर्फ गिरी अच्छी लग रही थी सफेद बादलों से झरते बर्फ के फूल बाद में साफ़ नीला स्वच्छ आकाश एक अलग सा परिंदा जिसे शायद जय पक्षी कहते हैं मीठी आवाज में गाता दिखाई देता प्रकृति का अद्भुत रूप रात को चन्द्रमा  की चांदनी पहाड़ों , पेड़ों पर बने बर्फ के फूलों, जमीने पर बनी बर्फ की छोटी – छोटी पहाड़ियों पर अद्भुत छटा बिखेरती चांदनी राते छत से गिरती बर्फ की आवाज डरावनी नहीं लगती थी बच्चों ने बर्फ का गुड्डा बनाया ,एक दूसरे पर बर्फ के गोले फेके ख़ास बात वहाँ के बच्चों के साथ थोड़ी ऊंची पहाड़ी पर गिरी जमी बर्फ पर बेटी फिसलती हुई खिलखिलाती थी | कई वर्ष तक दिलकश घाटी में हम रहे बर्फ के दिनों में एक पहाड़ी पर चढ़ कर हम दूर तक नजारा देखते उसका नाम वहाँ के लोगों ने थपे डाक्टर रख दिया शायद अब भी यही नाम चलता होगा |


फेसबुक वॉल से साभार।



सोमवार, 29 जुलाई 2019

एक संस्मरण

अचानक पड़ी नजर तो मैं चौंका उस सभागार में। चौंका इसलिए कि वे इन दिनों कम ही शिरकत करती हैं कार्यक्रमों में। कोई चार-पाँच साल बाद नजर आईं थीं तो दिल के भावनात्मक तार उद्वेलित होने लगे। लगा कि पैर छूकर आशीष लें लूँ उनसे और उनके हाल समाचार पूछ लूँ। 70 वर्ष कोई कम उम्र तो होती नहीं! स्वाभाविक ही उम्र का असर उनके हौंसले को पस्त कर रहा होगा। जिम्मेदारी तो कुछ शेष है नहीं फिर भी शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा इस पृथ्वी पर जिन्हें चिंताएं किसी वजह से परेशान न करती हों।
लेकिन सारी भावनाएं कुछ ही देर में शांत पड़ने लगतीं हैं और मैं कार्यक्रम में वक्ताओं के धीर-गंभीर आख्यान को सुनने में मशगूल हो जाता हूँ। ये भी सच है कि उनसे पहली  और आखिरी बार प्रेम से सौहार्दपूर्ण माहौल में सात साल पहले बतियाया था। उस समय एक अजीब रोमांच था दिल में। उनके घर में खाए हुए खिचड़ी को वैसे ही नहीं भूलता जैसे वक्त-बेवक्त उनकी याद तरोताजा हो आती हैं।
कार्यक्रम के बाद भी उनसे बात करता इसकी संभावना न्यूनतम ही थी लेकिन मेरी निगाहों ने पूरे सभागार में ढ़ूढ़ा उन्हें जरूर। मुझ पर उनकी निगाह पड़ी तो होगी जरूर, अलबत्ता बुढ़ापे में पहचान न पाई हों, इसकी भी संभावना ना के ही बराबर है। बाबजूद इसके एक कसक रह गई दिल में दूर से ही सही देख लेने की, हाल-चाल समझ लेने की। रिश्तों का क्या है वे तो समय के साथ बनते और बिगड़ते ही रहते हैं लेकिन भावनाएं शायद किसी न किसी रूप में मौजूद ही रहती है उन चुप्पियों और संवादहीनता के बीच भी। हाँ, कभी कभी दिल पूछता है जरूर कि वर्षों बाद जब आपकी नजर मुझ पर पड़ती है तो दिल के किसी कोने से कोई आवाज भी आती है?
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जिंदगी में रिश्ते तो बनते-बिगड़ते ही रहते हैं पर भावनाएं.....  #सुकुभा

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
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चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब
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आज जब राजेंद्र नगर से लौटते हुए पटना जंक्शन से गुजर रहा था तो थोड़ा अजीब लग रहा था। भीड़ थोड़ी कम लग रही थी। शायद मौसम का असर रहा हो। फिर लगा कि शायद अतिक्रमण हटाया गया हो क्योंकि आज मीठापुर और चिड़ीयांटांड फ्लाईओवर को जोड़नेवाले नए पुल का भी उद्घाटन है। तीसरी बात कि ऑटो वाले को भी वहां से हटाकर बगल वाले मल्टिपार्किंग कम्पलेक्स में शिफ्ट कर दिया गया है।
इन सभी कारणों को सोच ही रहा था कि जंक्शन के ठीक सामने आते ही गोलम्बर में चमकते बुद्ध की मूर्ति पर नजर पड़ी। कभी इस गोलम्बर में एकलौते नेहरूजी की प्रतिमा चमकती नजर आती थी। लेकिन आज उनकी स्थिति देखकर थोड़ा दुख हुआ। बेचारे धूल-गंदगी में नहाए हुए थे जबकि बुद्ध यूँ चमकते हुए मुस्कुरा रहे थे कि लगा उन्हें अभी-अभी ही ग्यान की प्राप्ति हुई हो।खैर, महावीर मंदिर के ठीक सामने पुल पर ही मंच सज कर तैयार था। आगे बढ़ा तो जीपीओ गोलम्बर के पास आते ही लोहिया जी की याद आई। गोलम्बर तो ज्यों का त्यों ही है बस बेचारे लोहिया जी की मूर्ति वहां नहीं थी। कुछ वर्ष पहले ही वहां से हटा दिया गया था। हटाने की वजह क्या थी?- ये बात तो राजनेता ही बेहतर जानें! हम तो बस इतना ही जानते हैं कि एक छोड़ पर नेहरूजी मार्ग दिखा रहे थे तो आर ब्लॉक में चौराहा पर बाबू वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर तलवार लहराते नजर आते थे तो बीच में लोहिया जी ही गरीबों -मजदूरों को पनाह देते थें। वहीं लोग सब्जी, पान, आदि की दुकान सजाए नजर आते थे।
जब आर ब्लॉक पहुंचा तो देखा कि बाबू वीर कुवंर सिंह भी धूल-गर्द में सने हुए थे। फ्लाईओवर बनाने में लगे मजदूर उनकी मूर्ति के चारों ओर इतने गड्ढे बना दिए हैं कि कभी-कभी डर लगने लगता है कि बेचारे का घोड़ा न कहीं लुढ़क जाए।
खैर, पटना बदल रहा है। पटना की आबोहवा बदल रही है। राजनीति बदल रही है फिर नेहरूजी को थोड़ा गंदगी से एलर्जी की बीमारी थोड़े ही न हो जाएगी! रही बात बाबू वीर कुवंर की तो स्वतंत्रता सेनानियों को अब कौन पूछता है? अब तो ये भी नहीं पता चलता साफ-साफ कि उनकी महत्ता किसी दल के लिए मायने भी रखता है?
★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

बचपन की बाढ़ की याद

बाढ़ की बात जब भी आती है तो मुझे बचपन की याद आती है। जब मैं ठीक से चलना-बोलना भी नहीं सीख पाया था। जब नाना जी हम सभी को अपने गाँव लेकर चले गए थे बाद में। याद है वह दृश्य जब मेरे आँगन में लबालब पानी हिलोरे मार रहे थे और मैं रसोईघर के सामने दुहार (बरामदे) पर जमीन में लेटे सबकुछ देख रहा था। देख रहा था मछलियों की अठखेलियाँ। साँपों का तेजी से पानी में तैरना। घर तो ऊँचा था इसलिए दुहारी पर पानी चौखट पर लाख सिर पटकने के बाबजूद कभी लाँघ न सका। लेकिन आँगन के बाहर सड़क पर तो नाव चल रही थी। क्या-क्या बह रहे थे ठीक से कुछ याद नहीं पर आदमियों को बहते जरूर देखा। शायद वे तैर भी रहे थे। सबसे अजीब लगता था बँसवाड़ी का नजारा। चारों ओर पानी ही पानी। समतल पानी। बाँस के ऊपरी कुछ हिस्से पानी में जमे से लगते थे। और सबसे अजीब लगता था बरगद का पेड़। लगता था जैसे पानी में उगा कोई झाड़ी हो। सिर्फ और सिर्फ कुछ पत्ते नजर आते थे। रसोईघर के दीवार से सटे में मक्के का  एक बोझा भी रखा था। जिसमें से कभी कभार भूँटा तोड़कर आग में पका कर खाते थे। जब आँगन से पानी निकल गया था तो एक दिन एक हेलीकॉप्टर आँगन में एक बोरी गिरा गया। माँ डरकर घर के अंदर चली गई थी और पड़ोसी बोरिया ले गई। माँ बताई थी कि उसमें चना, चूड़ा, शक्कर, और माचिस, मोमबत्ती आदि सामान थे। ..कितना कुछ याद आता है। लेकिन पटना आने के बाद कभी ढ़ँग से गाँव गया नहीं। बाढ़ की त्रासदी तो अक्सर आई, लेकिन हर बार पटना में ही रहा। पानी निकल जाने पर कभी कभार गया लेकिन याद की बाढ़ बचपन की ही बाढ़ रही।
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सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 30 जुलाई 2017

नामवरसिंह को याद करते पी के पाठक

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का जन्मदिन था। नामवर सिंह आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गये हैं कि दोस्त और दुश्मन दोनों ही उनकों याद करते हैं। जिन्हें उनका आशीर्वाद मिला वे तो स्वयं को धन्य मानते हैं लेकिन जिन्हें नहीं मिला वे उनके मरने तक की बात करते हैं। जबकि नामवर सिंह कोई कुर्सी नहीं एक आदमी का नाम है। लोग अपनी क्षमता बढ़ा उनके कद का हो सकता है। संभव है उनसे बेहतर भी हो जाएं। लेकिन दुर्भाग्य है कि लोग ईर्ष्यावश उन्हें गाली देने में ही अपना समय और शक्ति लगाते हैं। खैर आइए पढ़ते हैं पुष्पेंद्र कुमार पाठक का संस्मरण।


श्री मान नामवर महाशय को कई बार सुनने को मिला। बीएचयू मे यदा-कदा सेमिनार का आयोजन और नामवर जी स्टार वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। बीएचयू परंपरागत रूप से भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का प्रवाह स्थल रहा है। ऐसे प्रवाहमान सांस्कृतिक लहर मे तथाकथित प्रगतिशीलता के कंकड़-पत्थर फेंकने की वामपंथी बुद्धि तो कूट कूट कर भरी थी हमारे पूज्य गुरूवर में। उपर से काशी विश्वनाथ की नगरी। अगर वहां जाकर अगर मुहम्मद गोरी, गजनवी, बाबर,औरंगजेब और वो सभी आक्रांता जिन्होंने भारत की अस्मिता को तार तार किया, उनकी तारीफ की जाए, उनमे अच्छाइयों का दर्शन निर्लज्जता पूर्वक किया जाए तो मशहूर होने के चांसेज ज्यादा हैं। गुरूजी को पता नही कहां से मुगलो की खनकती तलवार मे हिन्दुओ की आर्तनाद की जगह लोकधुन सुनाई देता था। सारांश यह कि गुरु नामवर जी को बोलने के लिए कोई भी टाॅपिक दिया जाता उसमे अमेरिका, आरएसएस, ब्राह्मणवाद विलेन बनकर उभर आते। हां भारत की बहुलतावादी संस्कृति उनकी प्राथमिक चिंता थी जिसकी रक्षा बिना मुगलिया संस्कृति को पिरोए संभव ही नही थी। आरएसएस के हिन्दुत्व मे गुरूजी को हिन्दुस्तान की एकता खंड खंड मालूम पड़ती थी जिसे बचाने के लिए आइने अकबरी या बाबरनामा को आत्मसात करना परम आवश्यक था।हा, गुरू जी मुस्लिम आक्रांता मे नायकत्व की छवि ढूंढने को उतावले रहते। कभी-कभार तो ढूंढने मे असफल होने पर नई छवि ही गढ़ डालते। इस इरादे के साथ की पढ़ने वाला भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला होता देख धैर्य खोकर अनाप-शनाप बोले और फिर मिडिया मे इसे उग्र हिन्दुत्व के रूप मे पेश करें। फिर खुद को साहित्य मे बोल्ड एक्सपेरिमेंटल के तौर पर स्थापित करने मे आसानी भी होगी। गुरूजी जी वेद, पुराण, उपनिषद्, मानस आदि ग्रंथो का गहन अध्ययन किया है लेकिन उनकी व्याकुलता उस समय देखते ही बनती जब वो इन सभी ग्रंथो मे मुहम्मद साहब का कोई जिक्र न पाते। लगता ये सभी ग्रंथ ही अपूर्ण है और इसके साथ साथ सारा संसार भी। भारतीय वैचारिक धरातल का टेक्टोनिक शिफ्ट हो जाता अगर कही से भी हनुमान जी या कृष्ण जी हिन्दुत्व की किताब से न होकर किसी अरबी संस्कृति का कोई नाम होता फिर तो सेक्युलरिज्म और गंगा जमुनी तहजीब  (पता नही इस का उच्चारण गुरु जी बारंबार क्यो  करते थे।) का कुछ अलग ही रंग होता। इसका दर्द उनके चेहरे और वाणी से महसूस किया जा सकता था।लेकिन सेक्युलर तब्के को जीवनज्योति की आभा यही मंद पड़ जाती है। उन्हे हिन्दी आलोचना मे वाचन परम्परा का आग्रही नेता माना जाता है। गुरूजी पर श्री काशी विश्वनाथ की कृपा बनी रहे। वे स्वस्थ एवं दीर्घायु हो। यही हम सब की कामना है।

रविवार, 18 जून 2017

लेखक की पहचान का संकट:अमरेंद्र मिश्र

बदलते समय में बहुत सारी चीजें बदलती जा रही हैं। लोग सिमटते जा रहे हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में पड़ोसी तक से मिलने-बात करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यिक गतिविधि तक भी अपने अलग ढंग और तेवर में हो रहे हैं फिर पहचान की संकट क्यों नहीं हो? फिर, जब जमाना सेल्फ प्रमोशन का हो, तब भी यदि आस-पास के लोग आपको नहीं पहचानते हैं। तो  स्थिति सचमुच में भयावह है। फिर भी क्योंकर तो दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कहीं -न-कहीं लेखक स्वयं भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। खैर, आइये पढ़ते हैं साहित्यिक संपादक अमरेंद्र मिश्र के संस्मरण को और जानते हैं उनके अनुभव।



लेखक की पहचान का संकट
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एक लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए है कि उसकी किताब जिन पाठकों तक पहुँच रही है, वे 'नोटिस' नहीं ले रहे हैं, या इसलिए कि वह जहाँ रहता है, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर स्थित जो लोग रह रहे हैं, वे उसे नहीं जानते ! या लेखक ही आज के समय में अकेला हो गया है ? क्या कारण है कि एक लेखक की अपनी पहचान उसके आसपास ही नहीं बन रही ?

हाल ही में मैं हिंदी के एक वरिष्ठ कथाकार से मिला।उनके आवास तक तो मैं पहुँच गया लेकिन फ्लैट का नंबर भूल गया।जो नंबर मोबाइल पर लिया था वह भी कहीं खो गया।लेकिन उनसे मिलना चूँकि पच्चीस वर्षों बाद हो रहा था, इसलिए मुझे पक्का विश्वास था कि उनके फ्लैट को तो मैं पलक झपकते ही पहचान लूँगा।और फिर इतने बड़े लेखक हैं तो कोई भी चायवाला, पानवाला, पटरी लगाने वाला जरूर उनका फ्लैट बता देगा।

उस पार्क की एक बेंच पर बैठा-बैठा अपने सामने के तमाम फ्लैट देखता मैं सोचता रहा-सामने वाले फ्लैट से थोड़ा हटकर हल्के पीले और गाढ़े भूरे रंग का फ्लैट ही विभूति बाबू का हो सकता है।पार्क की बेंच पर बैठे-बैठे इतना इतमीनान कर लेने के बाद मैं उठा और सामने की सड़क पार कर उनके फ्लैट के पास पहुँच गया।कुछ देर तो उनके नाम से ही उन्हें खोजता रहा पर किसी ने भी आदरपूर्वक यह नहीं बताया कि विभूति प्रसाद जी, जो एक मशहूर लेखक हैं, वह पास के किस फ्लैट में रहते हैं ?मैं जिस फ्लैट को पहचानता उनके उस संभावित फ्लैट तक पहुँचना चाहता था, वह तो उनका था ही नहीं।पुरानी स्मृति में बार-बार लौटते मैं हताश हो चुका था और लगभग लौट जाना चाहता था कि इस बीच विभूति प्रसाद जी सामने से आते दिखे।उनके साथ मैं उनके फ्लैट तक पहुँच गया।उसी फ्लैट में जिसका मैंने पार्क में बैठे-बैठे संभावित अनुमान लगाया था।अंतर बस इतना-सा था कि प्रवेश-द्वार का रास्ता बदल गया था।

''आपको परेशानी हुई, यहाँ तक आने में ?''
मैं कुछ कहने को तैयार हो ही रहा था कि वह फिर कह बैठे-''देखिए, अब वह समय तो रहा नहीं कि आप लेखक हैं तो आपको पूरा शहर पहचानता है।टोले-मोहल्ले के लोग आपको सर आंखों पर बिठाये हुए हैं ! समय तेजी से बदल रहा है।एक वक्त था जब मेरा या मेरे जैसे लेखक का पता तो नीचे रहने वाले या आसपास के लोग ही बता देते थे।और तो और,आये हुए आगंतुक को मेरे फ्लैट तक छोड़ भी जाते थे।डाकिया रोज दस-बारह पत्र और तीन-चार पत्रिकायें दे जाता था।कहता था,''-आपका सिर्फ नाम पढ़ता हूँ, फ्लैट का नंबर तो पढ़ने की जरूरत ही नहीं होती।''

मैं सोचता रहा,''जितना कहना चाहते हैं, कह लें, तब मैं अपनी बात उनके समक्ष रखना चाहूँगा।वे फिर शुरू हो गये-''भाई, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।आज से चार साल पहले कोलकाता में जो इलाज करवाया था, वह अबतक याद है।मैं अपने पुत्र रोहित के साथ एक-एक डाक्टर से अपनी परेशानी सुनाता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।इसी बीच एक नौजवान डाक्टर मेरे पास आया, मेरे चरण स्पर्श करते कहा-''सर, आप यहाँ कैसे ?''
''मैं आश्चर्य में पड़ा उसकी ओर देखता कह गया-''क्या आप मुझे पहचानते हैं ?''
''सर, आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी फोटो किताब पर देखी थी।आप विभूति जी हैं।आपकी लगभग सभी किताबें पढ़ गया हूँ।विशेषकर आपका वह उपन्यास 'सागर तीरे'।क्या गजब लिखा है सर आपने।''
मैं लगभग भावुक होता सिर्फ' धन्यवाद' कह पाया।

मेरी चिकित्सा व्यवस्था में बेहतरीन  सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयीं।एक सुखद अनुभूति के साथ घर लौटते मैं सोचता रहा-''ऐसा कभी-कभी ही होता है।ऐसे प्यारे लोग कभी कभार कहीं मिल जाते हैं और मेरा 'लेखक' उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर लेता है।''

अब न तो वह समय रहा, न वे लोग रहे, न पाठक।कुछ भी तो नहीं रहा ! अब तो सौ पृष्ठों का लिखा कथानक उपन्यास बन जाता है और कहानी 'लघुकथा' में सिमट गयी है।जिस तरह हिंदी फ़िल्म के कलाकार अपनी अभिनीत फिल्म का प्रचार स्वयं ही करते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक भी अपनी किताबों का प्रचार ख़ुद ही करता है।उसे तनिक धैर्य नहीं कि उसकी किताब पर उसे पाठकों के विचार जानने चाहिए।इंतजार करना चाहिए।क्या यह पहचान का संकट नहीं ?''

वे कहीं गहरे खो गये और शायद अपने बीते दिनों में लौट आये।

''लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए भी नहीं की उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक...''

''किस किताब की बात कर रहे आप''?वे गुस्सा हो आए।फिर तनिक सहज होते कहा- "लेखक जब खुद ही प्रकाशक का काम करने लग जाये तो फिर कैसे कह सकते हैं कि उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक नहीं पहुँच पाती ?लेखक पहले अपने व्यक्तित्व का निर्माण तो करे, फिर देखिए, यह संकट कुछ कम हो।''

कारण जो भी हो पर इतना तय है कि लेखक की पहचान का संकट इन दिनों जटिल होता जा रहा है।समाज उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहता है, जो उसे प्रिय है।उसकी अपनी पसंद-नापसंद है।उसके परिचय और 'पहचान' की परिधि में अब न तो वह पुराना समय है, न पुराने लोग, न उनकी प्रसिद्धि, न प्रतिष्ठा।

एक एकाकीपन तन गया है हमारे आपसी सरोकारों के बीच।लेखक की पहचान का संकट उतना ही अहम् है जितना परिवार और समाज में व्यक्ति के खुद की पहचान का संकट।यही कारण है कि बदलते समय में आज आदमी अकेला रह गया है।सच यह भी है कि जिस लेखक को आज का समाज पहचान नहीं पा रहा-वह उन्हीं को बेहद आत्मीयता के साथ जाने कब से रोज देखता-पहचानता आ रहा है !
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अमरेंद्र मिश्र
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फेसबुक वॉल से साभार।

सोमवार, 22 मई 2017

प्रीत भैया से अवधेश प्रीत तक (संस्मरण): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रीत भैया से अवधेश प्रीत तक (संस्मरण): सुशील कुमार भारद्वाज





बचपन में घर के बड़े लोगों की ही तरह मुझे भी हिंदुस्तान (अखबार) का बेसब्री से इंतज़ार होता था क्योंकि उसमें बच्चों के लिए भी एक पन्ना रहता था. जिसमें कविता, कहानी, कार्टून और चुटकुले के अलावे उपर के कोने में “प्रीत भैया” का बच्चों के नाम सन्देश और सुझाव भरा पत्र होता था. जिससे प्रेरित हो कुछ–कुछ लिखने की इच्छा होने लगी.
2000 ई० में जब दसवीं की वार्षिक परीक्षा होने के बाद पिताजी की लायी हुई रामायण–महाभारत आधारित कई किताबों को पढ़ा तो मन में एक रचनात्मक विस्फोट हुआ और एक बड़ा-सा लेख लिखकर पैदल ही हिंदुस्तान के दफ्तर में पहुँच गया. उन दिनों हिंदुस्तान में एक पन्ना धर्म–आध्यात्म का आता था. दफ्तर में लोगों ने मुझे फीचर सेक्शन में भेज दिया. ग्राउंड फ्लोर में प्रिंटिंग प्रेस के दीवार से सटे हालनुमा बड़े कमरे के दरवाजे पर पहुंचा तो देखा कि सामने की कुर्सी में हाफ शर्ट और टोपी पहने साँवले रंग का एक दुबला–पतला आदमी अपने काम में लगा था. व्यस्त आदमी से कुछ पूछने की बजाय मैंने कमरे में बैठे अन्य लोगों के पास जाना ज्यादा मुनासिब समझा जो गप्प में लगे हुए थे. उन गप्पियों में से एक ने आलेख देखने के बाद दरवाजे के सामने कुर्सी में बैठे टोपी वाले आदमी की ओर ही इशारा करते हुए कहा कि- “अवधेश प्रीत” जी के पास चले जाओ वही यह सब देखते हैं.
प्रीत शब्द से मन में हलचल मच गई कि– ‘कहीं ये बच्चों के पेज वाले प्रीत भैया तो नहीं हैं? फिर लगा नहीं, वो तो बच्चों के प्रीत भैया थे, ये तो बड़ा आदमी है. उसमें भी इनका नाम अवधेश प्रीत है’.
यूं ही विचारों में खोया हुआ मैं अवधेश प्रीत जी के टेबल के पास पहुंचा तो वे मेरा लेख लेकर देखने लगे. फिर ऊपर से नीचे देखते हुए पूछे –“कहां से लिखे हो?” जबाब में –“जी, मैंने खुद से लिखा है. कुछ किताबें पढ़ीं हैं जिसमें मुझे कुछ बातें सामाजिक स्थिति से मेल खाती हुई नहीं दिखी, इसलिए विरोध स्वरूप मैंने अपनी बात कही है.”
-“आपकी उम्र इन गहरी बातों के लिए काफी छोटी है. इस पर बड़े-बड़े विद्वान लिखते हैं जो चीजों का खूब गहन अध्ययन करते हैं, तथ्यों को समझते हैं और तब लिखते हैं....... जैसे कि जो आदमी सिगरेट नहीं पीता है वह कैसे बता सकता है कि सिगरेट पीने में कैसे होंठ जलते हैं और कैसे अंगुली? बिना अनुभव के चीजों के तह तक नहीं पहुंचा जा सकता है. ठीक है. जाओ.” – उन्होंने अपनी बात रखी. मैं निराश हो वहाँ से वापस लौट गया.
उसके बाद जब मैं बोरिग रोड (पटना) कोचिंग पढ़ने जाने लगा तो “अमृतवर्षा” सांध्य दैनिक का कार्यालय दिखा जहां मैं अपनी कहानियां, आलेख और रपटें देने लगा. जिसमें मेरी पहली कहानी “रिश्ते” प्रकाशित हुई थी. धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया. फिर जब पटना से “दैनिक जागरण” का प्रकाशन शुरू हुआ तो वहां भी लिख-लिख कर डालने लगा. इन जगहों पर छपने के बाबजूद मन नहीं मान रहा था क्योंकि हिंदुस्तान मेरे लिए चुनौती बन चुका था. सो एक बार फिर हिंदुस्तान की ओर मुड़ा लेकिन इस बार अंदर जाने की बजाय बाहर में रखी पत्र-पेटी में ही डालकर चला आता था. जो कि सम्पादकीय पेज के निचले हिस्से में छपने वाले आपके पत्र में छपने लगा. साथ-ही-साथ अंग्रेजी में भी हिंदुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ इण्डिया के लिए लिखने लगा.
वर्ष 2004-05 में, हिंदुस्तान में साहित्य का पेज एक नये रूप में शुरू हुआ जिससे शहर के नये रचनाकारों को भी मौका मिला. वे अपनी कविता, कहानी आदि भेज सकते थे. काफी लोगों ने तो इसी रास्ते पत्रकारिता-जगत में भी अपनी पहचान बनाई और काफी आगे तक पहुंचे. मैंने भी अपनी कहानी “धर्म” छपने के लिए भेज दी. छपने के बाद मैं वर्षों बाद अवधेश प्रीत जी को धन्यवाद कहने के लिए दफ्तर के अंदर गया तो काफी कुछ बदल चुका था. ग्राउंड फ्लोर से हटकर फीचर सेक्शन एक बड़े-से हाल में पहले तले पर चला आया था. उन दिनों फीचर सेक्शन में दर्जन भर से अधिक लोग हमेशा प्रीत जी के निर्देशन में काम कर रहे थे. वे अक्सर नये लोगों को कुछ-ना-कुछ नया और अच्छा करने के लिए प्रेरित करते दिख जाते थे. सबसे अच्छी बात देखने को मिली कि प्रीत जी न सिर्फ साहित्य के पेज को देख रहे थे बल्कि सोमवार से शुक्रवार तक हर दिन करियर, महिला, आध्यात्म आदि विषयों पर निकलने फीचर पेज की पूरी जिम्मेवारी भी उन्हीं पर था जिसे वे सफलतापूर्वक सम्पादित कर रहे थे. उन दिनों प्रीत जी पटना विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कुछ कक्षाएं भी लेने लगे थे. खैर, मैं उनसे मिला और पुस्तक–समीक्षा, आलेख देते रहा और छपता रहा लेकिन कभी मैंने पुरानी मुलाकात का जिक्र नहीं किया. इसी तरह जब एक दिन मेरा एक आलेख पूरे फ्रंट पेज में आ गया तो मुझे अजीब सी खुशी और संतुष्टि मिली. लगा कि मैंने अपनी चुनौती पूरी कर ली. उदासीनता के कारण धीरे–धीरे मैं पत्र–पत्रिका से विमुख हो अध्यापन के काम में जुट गया. धीरे–धीरे कुछ वर्षों के लिए पटना से भी मैं बाहर चला गया.
जब अवधेश जी की कहानियों को हंस आदि पत्रिकाओं में पढ़ने लगा तो उनका कथाकार वाला रूप सामने आया. कहानियों में उनके विषय का चयन, शब्दों का प्रयोग और कहने की शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया. उनकी कहानियां इतनी मार्मिक लगीं कि एक बार मैं लाइब्रेरी में ही रो पड़ा. मुझे उस कहानी का नाम तो याद नहीं, लेकिन वो कहानी लोक कलाकार के बिखरते दाम्पत्य जीवन पर आधारित था.
अगली बार मैं हिंदुस्तान के दफ्तर में 2014 में “पगली का तौलिया” लघुकथा लेकर पहुंचा तो ऑफिस का नज़ारा बिल्कुल ही बदल चुका था. अवधेश प्रीत जी भी सहायक संपादक बन चुके थे. फीचर सेक्शन में लगा रहने वाला जमावड़ा कब और कैसे बिखर कर कहां चला गया पता नहीं. अब इत्मीनान से बैठकर चाय–काफी पीते हुए उनसे काफी कुछ खुलकर बातें होने लगीं. उनको और करीब से जानने का मौका मिला जैसे कि उन्होंने अपनी पढाई खत्म करने के बाद पटना एक रिश्तेदार के घर घूमने के लिए आए. और धीरे –धीरे खगौल (दानापुर) में रहते हुए नाटक, कला और साहित्य से जुड़ गए. पटना में इन्हें रोबिन शॉ पुष्प, विकास कुमार झा, और सुबोध गुप्ता जैसे साहित्य और कला प्रेमियों का साथ मिला. और जब पत्रकारिता में हाथ आजमाने की कोशिश की तो शुरुआत भी कला–संस्कृति से ही की. 1985 ई के आसपास ये पाटलिपुत्र टाइम्स से जुड़े और 1986 ई में जब पटना से हिंदुस्तान के प्रकाशन की शुरूआत हुई तो वे इससे जुड़े और फरवरी 2016 में अपनी 30 वर्षों की नियमित एवं समर्पित सेवा से मुक्त हो गए. लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आज की तारीक में भी उनसे कार्यालय के लोग दिशा–निर्देश लेते रहते हैं. उनके मिलनसार और खुशमिजाज रूप को जानने का मौका कथा-समारोह, लघुकथा-सम्मेलन और दूसरा शनिवार जैसे अन्य कार्यक्रम के बहाने मिला.
लघुकथा सम्मेलन की वह घटना मुझे अक्सर याद आ जाती है जिसमें अवधेश प्रीत जी का एक विनम्र व्यक्तित्व देखने को मिला. जब सभी आमंत्रित लघुकथाकारों ने अपने कथाओं का पाठ कर लिया तो उद्घोषक ने अवधेश प्रीत जी को उन पठित कथाओं पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया. और ज्योंहि  उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि लघुकथा का उन्हें विशेष ज्ञान नहीं है और वे अपने सीमित और व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर टिप्पणी करेंगें तो कुछ लेखक उग्र भाव से यह बोलते हुए बाहर जाने लगे कि – “जिस आदमी को लघुकथा का ज्ञान नहीं. समझ नहीं. उस व्यक्ति की बात क्या सुनना? पूरे आयोजन का कचरा हो गया.” लेकिन ज्योंहि ख्यातिप्राप्त लघुकथाकार सतीशराज पुष्करणा ने बीच में ही रोकते हुए कहा कि “ये अवधेश जी का बड़प्पन है कि ये खुद को लघुकथा से अनभिज्ञ बताते हैं. जबकि सच तो ये है कि स्थापित कथाकार होने से पहले इन्होंने ढ़ेरों लघुकथाएँ लिखीं हैं और जब कभी मौका मिलता है हमलोग अक्सर  बैठकर लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर बात करते हैं. इसलिए आप इनकी बातों को एक बार सुने.” इसके बाद जब प्रीत जी ने लघुकथा के विभिन्न कला और तकनीकी पक्षों पर बोलना शुरू किया तो पूरे हाल में सन्नाटा छा गया और अंत में उनके लिए सिर्फ ताली बजने लगी और सभी उनके प्रतिभा को सलाम करने लगे.
सबसे अजीब है कि प्रीत जी के सेवा-निवृति के बाद से मैं भी अब तक दुबारा हिंदुस्तान नहीं जा सका जबकि कुछ लघुकथाएं, पुस्तक–समीक्षा और कुछ साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे हैं जिन्हें मैं अब मेल से ही भेज दिया करता हूं.

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बुधवार, 17 मई 2017

उषाकिरण खान का संस्मरण

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम है। कहानी, उपन्यास के साथ -साथ वे अन्य विविध क्षेत्रों में भी ससमय दखल देती रहती हैं। पिछले दिनों उनके फेसबुक वॉल पर एक संस्मरण नजर आया जिसमें उन्होंनें भारतीय संस्कृति में जबरदस्त पैठ बनाये पर्दा -प्रथा का जिक्र किया है। आप भी पढ़कर देखें। पसंद आएगी।


१३मई कावह दिन तूफ़ानी  था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर  बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।

सोमवार, 15 मई 2017

बिहार वाली बस : ( सुशील कुमार भारद्वाज)

बिहार वाली बस
सुशील कुमार भारद्वाज



बस में चढा तो भीड़ बहुत थी लेकिन चढ़ना भी मज़बूरी थी. पूरे एक घंटे के इंतज़ार के बाद बस जो आई थी. मालीपुर जैसे छोटे इलाके के लिहाज से स्थिति कोई बुरी नहीं थी. ट्रक, ऑटो और जीप तो सरपट दौड़ ही रहे थे. फर्क बस इतना था कि गाडियां हसनपुर और रोसड़ा की ओर जा रही थीं और मुझे जाना था बेगूसराय.
अब सुबह-सुबह तो सबकी अपनी मज़बूरी होती है ऐसे में बस को आखिर छोड़े तो कौन? उसमें भी आज ठंढी हवा जाते हुए माघ महीने का एहसास कराने के लिए फिर से धमक चुकी है.
बस में तिल रखने भर की भी जगह न सूझती थी, पर कंडक्टर था कि न तो बार-बार गाड़ी रुकवाने से बाज आता था न ही भूसे की तरह आदमी को ठूंसने से. संयोग से बीस मिनट की धक्का –मुक्की के बाद मुझे एक सीट मिल ही गया. ओह! खुशी के क्या कहने? लगा जैसे जग जीत लिया. सारे कष्ट दूर. सच भी था कि बेगूसराय तक तो शायद ही कोई मुझे उठाने की हिमाकत करता. ठाठ से बैठने के बाद खिड़की की ओर मुंह करके हरे भरे बगीचे और खेत को देखने लगा तो देखते ही रह गया. आंखों के साथ-साथ मन को भी अजीब सुकून मिला. खेत से लगे ही आम, जामुन, लीची, बेल, कटहल, चौह, शीशम, पीपल, बरगद, ताड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. पटना में ये नज़ारे अब कहां नसीब होते हैं? जो कुछ पेड़–पौधे सड़क किनारे या यहां–वहां थे, वे भी सड़क चौड़ीकरण, पुल–निर्माण आदि के नाम पर गायब हो गए. एक कसक उठी. क्या इस हरियाली की परिकल्पना अब कंक्रीट के जंगल बने शहरों में की जा सकती है? यहां भी जो हरियाली बची हुई है वह भी कब तक बची रह पाएगी? वर्षों पहले घने बगीचे नज़र आते थे लेकिन अब यहां भी सड़क किनारे खेत तेजी से बाजार बनते जा रहे हैं. जमीन के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं. कभी ये पेड़ –पौधे घरों की शोभा हुआ करते थे. अब गाँवों में भी स्थिति बुरी होती जा रही है. अभाव के दौर में लकड़ी भी इतने महंगे होते जा रहे हैं कि गाँव के लोग भी खिड़की –कवाड़ी के लिए लोहा, स्टील या प्लाई का इस्तेमाल करने लगे हैं. अब तो गरीबों के घर में भी लकड़ी के फर्नीचर दुर्लभ-वस्तु बनते जा रहे हैं. समझ में नहीं आता कि आने वाली पीढ़ी साल, शीशम बरगद और पीपल के पेड़ सचमुच में देख भी पाएगी या फिर शहरीकरण के अंधी दौर में वह सिर्फ तस्वीरों से संतोष करके रह जाएगी? कितना दुर्भाग्यपूर्ण वह दिन होगा जब बच्चे ये पूछने को मजबूर हो जाएगें कि फल-फूल पेड़–पौधों से आते हैं कि फैक्टरी से? हंसी भी आती है खुद की बातों पर. लेकिन डर भी लगता है भविष्य की बातों से.
“मर साला मर” की तेज आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी. सिर घुमाकर देखा तो सामने सांवले रंग के एक युवक अपने तेवर में दिखा. सिर पर काली टोपी, और गले में माला और चैन गडमड थे. तैश में वह साथ की महिला पर चिल्ला रहा था– “ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा.”
एक चुप्पी के बाद, “ये साला बिहार देश नहीं सुधरेगा! देखो, दिल्ली, पंजाब और कलकत्ता में. कैसे लोग कायदे से रहते हैं? दिल्ली की बसों में इतनी भीड़ रहती है क्या? वहां दस–दस मिनट पर गाड़ी हैं, मेट्रो है. और यहां साला दो घंटे में एक मरियल–सी बस चें-पों करते हुए आवेगी और भूसे की तरह आदमी पर आदमी लाद कर ले जावेगी .... साला यहां का आदमी भी मुर्दा है. कभी कुछ नहीं बोलेगा... सिर्फ राजनीति करेगा.... इसको –उसको सबको प्रधानमंत्री बनावेगा बकिर बस सुविधा के लिए कोई नहीं बोलेगा. ट्रेन के लिए कोई नहीं बोलेगा?”
“चुप भी करिये. बस में क्यों तमाशा करते हैं?” – साथ की महिला उसे चुप कराने की गरज से कही. बच्चा बस में चढ़ गया था. आगे वाली सीट के पास ही खड़ा था. कंडक्टर से ही काहे नहीं पूछ लेते हैं कि लड़का वहां है कि नहीं?”
“साली, मैं कंडक्टर से पूछूँगा? तू खुद क्यूँ नहीं आगे जाकर देख आती है?”
“कितने जिद्दी आदमी हैं? मैं महिला होकर, इतने लोगों की कश्मकस भीड़ में अब आगे जाकर देखूं लेकिन मर्द होकर आप नहीं जावेंगें?” – चेहरे का भाव बदलते हुए गुस्से में महिला बोली.
“जादे फटर–फटर मत कर साली! तूझे अपने बेटे की नहीं पड़ी है तो मैं क्यूँ इस भीड़ में मरने जाऊँ?... तेरा बेटा है ..तू जान ...”
“क्यों इतना शोर मचा रहे हो भाई? आपका बच्चा यहीं पर खड़ा है.” कंडक्टर की आवाज आई.
“मरने दे हरामखोर को. इतनी आवाज दे रहा हूं. साला एक जबाब तक नहीं देता है.”
“अब चुप करों भाई. पूरे बस को सिर पर उठा रखा है.” – कंडक्टर ने शांत कराने के गरज से उसे डपटा.
गुस्से से तमतमाकर युवक “साला मैं अपना बच्चा खोज रहा हूं और ये बस वाला कहता है– पूरे बस को सिर पर उठा रखा हूं. हद हो गई. कहां का न्याय है? मेरा बेटा भूला जाएगा तो ये बस वाला मुझे बेटा लाके देगा क्या? ..... अपनी औकात ही भूल जाता है?.... एक मरियल बस का कंडक्टर क्या बन गया, पता नहीं खुद को क्या समझने लगा है.... यही बात दिल्ली में बोलता तो इतनी मार पड़ती कि होश ठिकाने लग जाते.......”
“बस रोको बस” – कंडक्टर अचानक तैश में आते हुए बीच में ही बस रूकवाते हुए बोला – “उतरो जी ... उतरो... दिल्लीवाली बस से ही जाना ... बिहारवाली बस तुम जैसों के लिए नहीं है.”
और एक झटके के साथ बस सड़क पर खड़ी हो गई. अच्छा खासा तमाशा बन गया. गाली-गलौज सब हो गया. सिर्फ हाथ उठना बच गया. कंडक्टर हाथ भी चला बैठता यदि जो लोगों ने बचाव नहीं किया होता. कुछ लोग उसको नीचे उतरवाने पर तुले थे तो कुछ ने मानवता दिखलाते हुए कहा –“अरे भाई, माफ कर दो, कहां बीच जंगल में छोड़ोगे? बीबी –बच्चे साथ में हैं. बेगूसराय पहुंचा दो .... अभी नया नया शहर का हवा लगा है... समय के साथ अपने ठीक हो जाएगा.”
काफी मानमनौवल के बाद बस खुली. दो लोगों ने अपनी सीट भी छोड़ दी जिसमें वह युवक अपने बीबी–बच्चे के साथ बैठ गया. उसके बाद बस में सिर्फ हल्की कानाफूसी होती रही. बस चलती –रूकती बेगूसराय पहुँच गई और बस-स्टैंड में लोग सारी बातों को भूल अपने –अपने रास्ते चले गए.


रविवार, 12 जून 2016

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने): सुशील कुमार भारद्वाज

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने)
सुशील कुमार भारद्वाज

मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।

मंगलवार, 7 जून 2016

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने) सुशील कुमार भारद्वाज

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने)

उस दिन जब हमारी नजरें चार हुई थीं तो दिल में कुछ कुछ ही नहीं बहुत कुछ हुआ था। जैसे मेरी चोर निगाहें उस पर टिकी थी वैसे ही वो नजरें घुमा-फिरा कर मुझे ही देख रही थी। शायद नयनों ने अपनी बातें शुरू कर दी थी, शारीरिक भाषा भी बदल रही थी। वह मुझसे अंजान थी, लेकिन कहीं भी अजनबीपन महसूस नहीं हो रहा था। लगा जैसे वर्षों बाद मिली हो, बहुत सारी बातें करनी हो। शायद वो भी इंतजार में थी कि कमरे से सभी लोग निकल जाएं तो दिल की बातें हों। मुझमें ही कहां थी हिम्मत इतनी कि साफ साफ कुछ कह पाता? वहां मौजूद सगे-संबंधियों की वजह से भी असहजता महसूस हो रहा था। वे लोग कितने जालिम थे जो हमलोगों पर जुल्म ढाए जा रहे थे।दो परिंदे को इतने पास लाकर भी कोई तरसाता है क्या? मन बहुत भारी था जब मैं कमरे से निकल रहा था। उससे बातें तो खूब हुई थी लेकिन दिल की प्यास अभी बुझी नहीं थी। बुझती भी कैसे? उसे भी कोई बात करना कहते हैं? हाल-चाल तो सब पूछते हैं, मुझे तो उसके दिल की बात जाननी थी। मुझे पता करना था कि जीवन यात्रा में वह मेरी सहयात्री बनने को तैयार है कि नहीं? पूछ तो लिया ही था। और वो जबाब भी दे दी थी "मम्मी-पापा की पसंद ही मेरी पसंद है।" लेकिन जबाब बनावटी लगा, तोते के रटंत जैसा। मैं तो दिल की बात पूछ रहा था। मैं स्पष्ट शब्दों में जानना चाह रहा था कि मैं तुम्हें पसंद तो हूं? अपनी खुशी से मेरे साथ जीवन बिताने को तैयार तो हो? यह जानते हुए भी कि अब मुझे किसी से कुछ नहीं पूछना है। मैं तो उससे मिलकर ही काफी खुश हूं। हाल ये है कि मैं उसे छोङने को ही तैयार नहीं।शायद पहली नजर का प्यार ऐसा ही होता है। चलते वक्त भी वह दरवाजे पर खङी थी, भीङ में भी मुझे देख रही थी। लेकिन थी थोडी चालाक जो पर्दे के पीछे से झांक रही थी। लेकिन मैं इतनी भीङ में बेशर्म की तरह कैसे उसे ढूंढने की कोशिश करता? मनमसोस कर रह गया क्योंकि मेरे वहां से चलने से पहले ही बिजली चली गई। मोमबत्ती की रोशनी में उसकी सुंदरता को एक झलक देखने का कसक रह ही गया।सीढियों से नीचे उतर जब गाङी में बैठ गया तब उसे दुबारा देखने की तमन्ना दिल ही में रह गई।
सुशील कुमार भारद्वाज

शनिवार, 27 जून 2015

अब भी जिन्दा हो मेरी यादों में( सुशील कुमार भारद्वाज )

सुशील कुमार भारद्वाज


                                                           पुरानी  डायरी के पन्ने  (सुशील कुमार भारद्वाज)

                                                                                                                  

आज गंगा किनारे अकेले घूम रहा था, तो दिमाग में पुरानी यादें खुद्बुदाने लगी| एक एक बात यूँ मेरे होठों को मुस्कुराने को मजबूर कर रही थीं जैसे लगा कि ये बातें वर्षों पहले की नहीं बल्कि कल की हो| अच्छी तरह से याद है - “छुपा रुस्तम” का उपनाम तुमने मुझे दे रखी थी| क्लास में भी अधिकांश समय मुझ पर नज़र गडाये रखती थी| लेकिन जब तुम्हारी सारी चालें असफल हो गयी, तो तुम मुझे अकरु और घमंडी कहने से भी गुरेज नहीं की| लेकिन उस दिन मैं सहम गया, जिस दिन तुम्हारी आँखें गुस्से से लाल हो गई थी| मुझे तो लगा कि तुम किसी भी पल मौका मिलते ही मुझे एक थप्पर जड़ दोगी| तुम्हारा गुस्सा शायद कहीं से भी गलत नहीं था| मैं तो थोड़ी देर के लिए काफी गर्व भी महसूस करने लगा कि किसी के दिल में मेरे लिए इतना प्रेम भी जग सकता है कि मेरे किसी लड़की से बात मात्र करने से उसकी ऐसी हालत हो जायेगी| तुम्हारी जगह कोई और भी होती, तो शायद उसका भी जलन से यही हाल होता| लेकिन सच तो तुम भी जानती हो कि मैं उन दिनों किसी भी लड़की से न बात करता था न ही इधर – उधर की किसी बात में रहता था| क्योंकि मैं आधुनिक पूंजीवादी प्रेम की बीमारी से डरता था| सोचता था प्रेम जैसी चीजें मेरे वश की बात नहीं है| बार बार धोखा खाने के बाबजूद उसी के चक्कर में जिंदगी बर्बाद करने से बड़ी कोई बेबकूफी का काम ही नहीं है| सिर्फ अपने पढाई पर ध्यान लगाये हुए था| उस दिन जब मैं गंगा कि लहरों को निहार रहा था तो तुम पीछे से आकर मुझ पर निशाना साधी –“ समझ में नहीं आता समय के साथ लोगों को क्या हो जाता है? वे अपना स्वाभाविक जीवन जीने की बजाय गंभीरता का चादर क्यों ओढ़ लेते हैं? लोगों से दो शब्द प्रेम की बात करने में किसी का क्या घट जाता है? अपनों के बीच हो कर भी लगता है जैसे श्मशान घाट में खड़ी हूँ|”  और मेरे मुँह से निकल गया –“जुदाई ही जब सच्चाई है तो नजदीक आने की जरुरत ही क्या है?”


उस घटना के बाद तुम कई दिनों तक कॉलेज नहीं आयी| जानती हो उन दिनों मैं तुम्हें कितना मिस करता था| कभी कभी खुद पर गुस्सा आता था आखिर तुम्हारा दिल तोड़ कर मुझे क्या मिल गया? अपने जिद्दी स्वभाव से क्या सिद्ध करना चाहता हूँ? सोचता था कि तुम्हारी सहेली से पूछ लूँ कि आखिर तुम कॉलेज क्यों नहीं आ रही हो? यदि मेरी वजह से तो वापस आ जाओ मैं तुम्हारा सारा गुस्सा झेलने को तैयार हूँ| लेकिन कभी हिम्मत नही जुटा पाया और चुप्प ही रह गया| महीनों बाद जब तुम आयी तो खुद को रोक नहीं पाया| तुमसे हाल पूछने के लिए तुम्हारी तरफ बढ़ गया| लेकिन तुम्हारे पास पहुँचते ही अंदर से आवाज आयी – “मत छेड़ इसे| घायल शेरनी को छेड़ना महंगा पर सकता है|” और मेरी हिम्मत चूक गयी| चुपचाप तुम्हारे बगल में रखे जग से पानी पी कर वापस लौट गया|

लेकिन सच है कि आज भी मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ| तुमसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला| जीवन जीने कि तुम्हारी शैली ने मुझे काफी प्रभावित किया| लोग पूंजीवाद का असर कहें या अवसरवादी पर सच तो यही है| हमलोग कितने दिन के मेहमान हैं इस पृथ्वी पर, पता नहीं| फिर अपनी सीमाओ को सीमित क्यों रखें? जीवन में उत्तरोतर सफल होते जाना कोई अपराध तो नहीं| लोगों का तो काम ही है न खुद आगे बढ़ना न किसी को आगे बढ़ने देना| आज के वैज्ञानिक युग में भी खुद को रुदिवादी विचारों में जकड कर रखने से क्या होगा? कभी कभी सोचता हूँ तुम कितना सही कहती थी – “मनुष्य को अपने संस्कारों की रक्षा बदले हुए माहौल में बदले रूप में ही करनी चाहिए | गीता में भी कहा गया है – परिवर्तन ही संसार का नियम है|


तुम इस विचार की पक्षधर थी कि प्रेम ऐसा होना चाहिए जहाँ मुक्ति हो न कि अधिकार का बोध| लेकिन आज भी हमारे समाज में किसी से प्रेम का मतलब उसके इच्छा समेत पर अधिकार प्राप्त होने को ही माना जाता है| और शायद यही कलह एवं अलगाव का कारण बनता है| हाल में जब एक किताब देख रहा था, तो तुम्हारी याद आ गयी| उसमे में लिखा था –“क्या आप पूरी जिंदगी सिर्फ एक मोमबती के सहारे बिता सकते हैं? यदि नहीं तो आपको क्यों लगता है कि आप पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही इंसान से प्यार करते रह जाएंगें?” वाकई में इस तथ्य को ठीक से विचारने की जरुरत है| हमलोग रोजमर्रा की जिंदगी में अनेक लोग से मिलते हैं जिनकी ओर चाहे – अनचाहे आकर्षण महसूस करते हैं| लेकिन इसका मतलब हर समय इंसान गलत ही तो नहीं होता है|

आज जब तुम मुझसे काफी दूर हों तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर तुम्हारी याद दिला जाती है| हाँ एक बात बताना चाहूँगा – मैंने भी अब तुम्हारी तरह समस्याओ को हंसकर हल करने आदत डाल ली है| शेष .......