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रविवार, 29 सितंबर 2019

पटना है पानी पानी दुर्गापूजा से पहले ही

दुर्गापूजा का आज हो गया है आगाज। लेकिन एक दिन पहले से ही है #पटना पानी में बेहाल। लक्षण देखकर तो मान लिया था कि इस बार दुर्गा पूजा में घूमना होगा थोड़ा मुश्किल, लेकिन ये ना सोचा था कि लोग शाम में आरती दिखाने के लिए भी जाएंगे तरस? कहाँ ढ़ूढ़ेंगें वे उन आस्था की मूर्तियों को आसपास में? गर जो याद भी आई पत्थर की मूर्तियों से सजे मंदिर की, तो कौन जाएगा इतनी दूर डूब कर छाती भर पानी में? भक्ति दिखाने के लिए मन चंगा तो कठौती में गंगा भी काफी है।








लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर  को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
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सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

बचपन की बाढ़ की याद

बाढ़ की बात जब भी आती है तो मुझे बचपन की याद आती है। जब मैं ठीक से चलना-बोलना भी नहीं सीख पाया था। जब नाना जी हम सभी को अपने गाँव लेकर चले गए थे बाद में। याद है वह दृश्य जब मेरे आँगन में लबालब पानी हिलोरे मार रहे थे और मैं रसोईघर के सामने दुहार (बरामदे) पर जमीन में लेटे सबकुछ देख रहा था। देख रहा था मछलियों की अठखेलियाँ। साँपों का तेजी से पानी में तैरना। घर तो ऊँचा था इसलिए दुहारी पर पानी चौखट पर लाख सिर पटकने के बाबजूद कभी लाँघ न सका। लेकिन आँगन के बाहर सड़क पर तो नाव चल रही थी। क्या-क्या बह रहे थे ठीक से कुछ याद नहीं पर आदमियों को बहते जरूर देखा। शायद वे तैर भी रहे थे। सबसे अजीब लगता था बँसवाड़ी का नजारा। चारों ओर पानी ही पानी। समतल पानी। बाँस के ऊपरी कुछ हिस्से पानी में जमे से लगते थे। और सबसे अजीब लगता था बरगद का पेड़। लगता था जैसे पानी में उगा कोई झाड़ी हो। सिर्फ और सिर्फ कुछ पत्ते नजर आते थे। रसोईघर के दीवार से सटे में मक्के का  एक बोझा भी रखा था। जिसमें से कभी कभार भूँटा तोड़कर आग में पका कर खाते थे। जब आँगन से पानी निकल गया था तो एक दिन एक हेलीकॉप्टर आँगन में एक बोरी गिरा गया। माँ डरकर घर के अंदर चली गई थी और पड़ोसी बोरिया ले गई। माँ बताई थी कि उसमें चना, चूड़ा, शक्कर, और माचिस, मोमबत्ती आदि सामान थे। ..कितना कुछ याद आता है। लेकिन पटना आने के बाद कभी ढ़ँग से गाँव गया नहीं। बाढ़ की त्रासदी तो अक्सर आई, लेकिन हर बार पटना में ही रहा। पानी निकल जाने पर कभी कभार गया लेकिन याद की बाढ़ बचपन की ही बाढ़ रही।
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सुशील कुमार भारद्वाज