पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम है। कहानी, उपन्यास के साथ -साथ वे अन्य विविध क्षेत्रों में भी ससमय दखल देती रहती हैं। पिछले दिनों उनके फेसबुक वॉल पर एक संस्मरण नजर आया जिसमें उन्होंनें भारतीय संस्कृति में जबरदस्त पैठ बनाये पर्दा -प्रथा का जिक्र किया है। आप भी पढ़कर देखें। पसंद आएगी।
१३मई कावह दिन तूफ़ानी था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।
१३मई कावह दिन तूफ़ानी था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।

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