बौद्धों के प्रभाव को कम करने वाले उदयनाचार्य
सुशील कुमार भारद्वाज
बिहार के समस्तीपुर जिला अंतर्गत शिवाजीनगर प्रखंड के
करियन ग्राम में जन्में उदयनाचार्य अर्थात आचार्य उदयन प्राचीन न्याय वैशेषिक परम्परा
के आखिरी महत्त्वपूर्ण दार्शनिक माने जाते हैं. सच तो ये है कि नव्यन्याय के
संस्थापक उदयनाचार्य ने ‘न्याय वैशेषिक’ के दर्शन को ही नए रूप में ‘नव्यन्याय’
में परिणत कर दिया. दरअसल उदयनाचार्य के लेखन में न्याय और वैशेषिक दर्शन जिस रूप
में मिलता है और प्रणाली विज्ञान के प्रति उनकी जो अति सूक्ष्म निष्ठा पाई जाती
है, वह ‘नव्यन्याय’ की विचार प्रणाली के बहुत ही करीब है.
महामहिषी कुमारिलभट्ट के शिष्य उदयनाचार्य ने बढ़ते
बौद्ध प्रभाव को रोकने के लिए न सिर्फ पुरजोर कोशिश की बल्कि वेद की सत्ता को
स्थापित करने के लिए ईश्वर के अस्तित्त्व को भी स्थापित करने की कोशिश की.
नास्तिकता को नकारते हुए आस्तिकता को मजबूती प्रदान करने की कोशिश की. भविष्य
पुराण में एक उदाहरण पढ़ने को मिलता है कि ‘जब एक बौद्ध पंडित ने राजा को बौद्ध
विचारधारा से जोड़ने के लिए चुनौती दी कि यदि आपके पास वेदों के विद्वान हैं तो
मुझसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजें. तब राजा ने उदयनाचार्य को कुछ पंडितों के
साथ भेजा. जहां बौद्ध पंडित ने अपने मायिक प्रयोग से एक शिलाखंड को पानी बना दिया
और उदयनाचार्य को उस पानी को पुनः शिलाखंड में तब्दील करने की चुनौती दे डाली और
बिना समय गवाए उदयनाचार्य ने सफलतापूर्वक पानी को पुनः शिलाखंड बना दिया.’
इसी घटना से एक किंवदंती भी जुड़ी हुई है कि जब
उदयनाचार्य ने उसी बौद्ध पंडित के सामने यह चुनौती रखी कि ‘वे दोनों दो बड़े तालवृक्ष
पर चढ़कर कूदेंगे और जो जिएगा वो जीतेगा, तो बौद्ध पंडित ने चुनौती स्वीकार कर ली
और ‘वेद अप्रमाण है’ कहकर कूद गया और मर गया जबकि ‘वेद प्रमाण है’ कहकर कूदने वाले
उदयनाचार्य जीवित रहकर जीत गए. और राजा ने वेदशास्त्र का प्रमाण्य नतमस्तक होकर
स्वीकार कर लिया और उन्हें राजगुरू बना दिया. साथ ही राजा ने नास्तिकों के सारे
शास्त्र पानी में फिंकवा दिए और सारे नास्तिकों को सजा देकर सख्ती से आस्तिक बना
दिया.
लेकिन यह भी जगजाहिर है कि श्रीहर्ष ने अपने पिता की
हार का बदला चुकाने के लिए उदयनाचार्य को चुनौती दी और खंडन खंडवाद में उदयन के मत
का खंडन भी किया.
इस तरह के पौराणिक कथा में सत्य और दंतकथा का घालमेल हो
सकता है लेकिन इतना तो तय है कि उदयनाचार्य ने बौद्ध दार्शनिकों से शास्त्रार्थ
करके न्याय दर्शन को प्रतिष्ठापित किया. महान नैयायिक उदयनाचार्य भारत में बौद्ध दर्शन का खंडन
करते हुए उसके वैचारिक प्रभाव को कम करने वाले पंडितों में से एक प्रभावशाली पंडित
थे. उनके ग्रन्थ विशेषकर आत्मतत्व विवेक में बौद्ध दर्शन की बहुत ही तीखी आलोचना
हुई है. उनका बौद्ध दर्शन का खंडन सूक्ष्म बुद्धि और वाद कौशल का एक बेहतरीन नमूना
है.
दसवीं
सदी के चरम पाद या ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्में सनातनी परम्परा के उदयनाचार्य
के सात ग्रंथों में “आत्मतत्व विवेक” और “न्यायाकुसुमांजलि” स्वतंत्र ग्रन्थ हैं
जबकि “लक्षणावली” और “लक्षणमाला” संग्राहक प्रकरण ग्रन्थ हैं और शेष ग्रन्थ अन्य
की टीका. जहां ‘किरणावली’ प्रशस्तपादभाष्य की टीका है वहीं ‘तात्पर्यपरिशुद्धि’
वाचस्पति मिश्र रचित ‘न्यायवार्तिक’ की प्रौढ़ व्याख्या है जिसे ‘न्यायनिबंध’ भी
कहा जाता है. ‘लक्षणावली’ जहां वैशेषिक दर्शन का सार संग्रह है तो ‘बोधसिद्धि’
न्यायसूत्र की वृत्ति है. ‘आत्मतत्व विवेक’ में बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद के
सिद्धांतों का विस्तृत खंडन ईश्वर की सिद्धि नैयायिक पद्धति से की गई है. और विशेष
परिपक्व और तार्किकतापूर्ण यह ग्रन्थ उदयनाचार्य की सर्वश्रेष्ठ कृति भी है. जबकि
न्यायकुसुमांजलि में ईश्वर की सिद्धि विभिन्न तार्किक तथ्यों से की गई है. ऐसा
माना जाता है कि ईश्वरसिद्धि विषयक ग्रंथों में यह संस्कृत के दार्शनिक साहित्य
में एक महत्वपूर्ण दखल रखती है. कुसुमांजलि में
ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के लिये निम्नलिखित नौ 'प्रमाण' दिए गए हैं-
कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः।
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः॥
श्लोक को ऐसे देखा जा सकता है-
1. कार्यात्- यह जगत् कार्य है अतः इसका निमित्त कारण अवश्य होना चाहिए. जगत्
में सामंजस्य एवं समन्वय इसके चेतन कर्ता से आता है. अतः सर्वज्ञ चेतन ईश्वर इस
जगत् के निमित्त कारण एवं प्रायोजक कर्ता है.
2. आयोजनात् - जड़ होने से परमाणुओं में आद्य स्पन्दन नहीं हो सकता और बिना
स्पंदन के परमाणु द्वयणुक आदि नहीं बना सकते. जड़ होने से अदृष्ट भी स्वयं परमाणुओं
में गतिसंचार नहीं कर सकता. अतः परमाणुओं में आद्यस्पन्दन का संचार करने के लिए
तथा उन्हें द्वयणुकादि बनाने के लिए चेतन ईश्वर की आवश्यकता है.
3. धृत्यादेः – जिस प्रकार इस जगत् की सृष्टि के लिए चेतन सृष्टिकर्ता आवश्यक है, उसी प्रकार इस जगत्
को धारण करने के लिए एवं इसका प्रलय में संहार करने के लिए चेतन धर्ता एवं संहर्ता
की आवश्यकता है. और यह कर्ता-धर्ता-संहर्ता ईश्वर है.
4. पदात्- पदों में अपने अर्थों को अभिव्यक्त करने की शक्ति ईश्वर से आती है.
“इस पद से यह अर्थ बोद्धव्य है”, यह ईश्वर-संकेत पद-शक्ति है.
5. प्रत्यतः
6. श्रुतेः
7. वाक्यात्
8. संख्याविशेषात्-
नैयायिकों के अनुसार द्वयणुक का
परिणाम उसके घटक दो अणुओं के परिमाण्डल्य से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि दो अणुओं की
संख्या से उत्पन्न होता है. संख्या का प्रत्यय चेतन द्रष्टा से सम्बद्ध है, सृष्टि के समय
जीवात्मायें जड़ द्रव्य रूप में स्थित हैं एवं अदृष्ट, परमाणु, काल, दिक्, मन आदि सब जड़ हैं.
अतः दो की संख्या के प्रत्यय के लिए चेतन ईश्वर की सत्ता आवश्यक है.
9. अदृष्टात्- अदृष्ट जीवों के शुभाशुभ
कर्मसंस्कारों का आगार है. ये संचित संस्कार फलोन्मुख होकर जीवों को कर्मफल भोग
कराने के प्रयोजन से सृष्टि के हेतु बनते हैं. किन्तु अदृष्ट जड़ है, अतः उसे सर्वज्ञ
ईश्वर के निर्देशन तथा संचालन की आवश्यकता है. अतः अदृष्ट के संचालक के रूप में
सर्वज्ञ ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है.
दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायमत में
जगत् के कर्तव्य से ईश्वर की सिद्धि मानी जाती है और बौद्ध नितांत निरीश्वरवादी
हैं. षड्दर्शनों में भी ईश्वरसिद्धि के विविध प्रकार हैं. उदयनाचार्य ने इन सबका
सम्यक अध्ययन करने के पश्चात ही अपने मत की प्रतिस्थापना की.
उदयनाचार्य के विषय में यह किंवदन्ति भी
प्रसिद्ध है कि जब ये असमय पुरी में जगन्नाथ मंदिर पहुँचे तो दरवाजा बंद मिला. तब
इन्होंने भगवान को ललकार कर कहा था कि ऐश्वर्य के मद में मत्त आप मेरी अवज्ञा कर
रहे हैं, किन्तु (निरीश्वरवादी) बौद्धों के उपस्थित होने पर आपका अस्तित्व मेरे
अधीन हो जाता है. और उदयनाचार्य के ऐसा बोलते ही बंद दरवाजे खुल गए. और
थोड़े दिन के बाद खुद जगन्नाथ ने वहां पुजारियों को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि
मेरी मूर्ति पर जो पीताम्बर है, वह उदयनाचार्य को दीजिए, क्योंकि वह मेरा ही अंश
है. उसने मेरी स्थापना की है. मेरा अस्तित्व सिद्ध किया है जब बौद्ध मेरा तिरस्कार
कर रहा था.
गौरतलब है कि प्रौढ़
नैयायिक उदयनाचार्य ने 'न्यायकुसुमांजलि'
को पूरा करके उपसंहार में लिखा है कि
वे साफ-सच्चे और ईमानदार नास्तिकों के लिए भी वही स्थान चाहते हैं जो सच्चे
आस्तिकों को मिले. उन्होंने अपनी बात इस तरह से कही है-
“इत्येवं श्रुतिनीति
संप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते
येषां नास्पदमादधासि हृदये ते
शैलसाराशया:।
किन्तु प्रस्तुतविप्रतीप
विधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तका:
काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया
नरा:”
‘जातिबाधक’, ‘अनवस्था’ आदि सिद्धांत को विकसित करने
वाले मिथिलावासी उदयनाचार्य पुरी से लौटने के बाद पुनः मिथिला आए और वर्षों तक
शास्त्र का अध्ययन करते रहे. और वृद्धावस्था में काशी में आकर अपने प्राण त्याग
दिए.
----------------------------------------------------------------

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें