पंखुरी सिन्हा की कविताएँ जितनी सारगर्भित हैं
उतनी ही प्रभावकारी भी. इनकी कविताओं में बिम्बों का प्रयोग बखूबी देखने को मिलता
है. आइये पढ़ते हैं बिम्बों से भरे पंखुरी सिन्हा की कुछ राजनैतिक एवं गैर-राजनैतिक
कविताओं को:-
कोई
क्या
चखेगा
शहद
अब?
कोई
क्या चखेगा शहद अब?
अब
कहाँ लगाती है
मधुमक्खहि
नीम में खोंता
करंज
में छत्ता?
अब
कहाँ आती है
मध
छोरवा की पुकार
जो
आयी इस बार
राजधानी
में
तो
मैंने सोचा
कोई
क्रांति हुई
वह
बाल्टी में बेच रहा था शहद
उस
में दिख रही थी
कुछ
गिर गयी मधु मक्खही
टूटे
हुए छाते के टुकड़े
धूप
में सुनहली खुशबू
की
तरह चमक रहा था मध्
धूप
में चमक रहा था
शहद
का सुनहला रंग
या
उसकी सुनहली परछाई
से
चमक रही थी धूप
कितना सुंदर था यूँ
ले लेना प्रकृति से सीधा सीधी
मिठास नामक स्वाद
मानो तोड़कर फूलों का रस
फूलों
के खिले चेहरे से जैसे
बेतक्कलुफ़
चिड़िया सा
तितली सा
मधु मक्खी सा
उड़ उड़
जाना
भर भर आना
इस सब कुछ से लबालब थी
मध् छोड़वा की बाल्टी
उससे कैसे नहीं
ख़रीदा जाता शहद?
जबकि माँ मचाती रहीं
ठगों और ठगी का कुहराम
पर कैसे कैसे तोला गया शहद
भरा गया किन दालों की
पुरानी खाली शीशियों में
बाज़ारू शहद के पुराने डब्बों में
ढक्कनों के भीतर शहद भरती
मैं वह आतुर लड़की थी
जिसने कभी नहीं खरीदा था
मध् छोड़वा का मध
किन बगीचों की टहल थी उसमे
जाने किन पत्तों की हवा
पतझर की धूप थी
सर्दियों
की दस्तक लिए
जिनके आते ही
जम गया बोतलों
शीशियों में रखा शहद
जैसे उसमे चीनी का उच्छिष्ट हो
और जबकि याद आये थे
गन्ने के लह लह खेत
और हुई थी ख़ुशी
चीनी मिलों को पीछे
बहुत पीछे छोड़ आने की
पर वे छूटे कहाँ थे ?
क्या कभी नहीं छूटता है
चीनी मिलों में पिसा बुरादा
कभी नहीं छूटती है
चीनी मिलों की दुर्गंध?
क्या हम कभी नहीं छूटते
व्यापार और बाज़ार के
दुष्चक्र
से ?
क्यों इतनी तीखी हो जाती है ?
हम तक आते आते, गन्ने
की
मिठास ?
जाने इनमें किन किन किस्मों की मिलावट हो ?
शीरा हो, बुरादा हो ?
ख़राब चीनी का
चिंता में डूबी माँ के कड़वे बोल सुनती
मैं सधा जाती हूँ
ग़लती से खरीदा
बिना जांचा परखा शहद
और तरस जाती हूँ
हुलस जाती हूँ
उस सहज खुलेपन को
जहाँ पेड़ों में मधु मक्खी
लगाती है खोंता
जिसमे भरता है शहद
आहिस्ता -आहिस्ता
अब सब कुछ होता है
व्यापार सा
पाला, पोसा हुआ
खरीदा बेचा हुआ
अब कुछ भी
प्राकृतिक
नहीं
नीम का शहद नहीं
करंज के पेड़ नहीं......................
लाख
करके
भी
बातें,
रक्तिम संधियों की
लाख करके भी बातें
रक्तिम संधियों की
कर नहीं पाती ऐसी
एक भी संधि
मुझसे तो ये भी नहीं हो पाता
कि राष्ट्रपति के उम्मीदवारों का चुनाव होते ही
उसपर अपना मत लिख डालूं
टिप्पणी समेत राजनैतिक पहुँच भी
दिखा डालूं
और न कुछ बने तो निंदा ही कर दूँ
हर पक्ष की
तानाशाहों
की तो निंदा ही होती है
तानाशाहों
की निंदा करने वाले
अगली पंक्ति में बिठाये जाते हैं
और समर्थन वालों की बनी होती है सभा
मुझसे तो ये तक नहीं होता
कि पर्यावरण जैसे अपने
सर्वाधिक
प्रिय विषय पर आये
एक न्यायाधीश के चिंता मय व्यंग्य पर
घंटे भर में
जुमले पे जुमले लिख मारूं
न्यायालय
इस आज़ाद देश का
सर्वाधिक
शक्तिशाली
स्तम्भ है
वह कितना आज़ाद है
यह एक अलग बहस है
या मुमकिन है
साझे की बहस हो
होगी, पर मिनट भर के लिए
इतना तो कहा है
प्रधान मंत्री ने भी
भाषण में अपने
कि जो बचाया न गया
तो होगा ही नहीं पर्यावरण
फिर भी नहीं लिखा
मोर या मोरनी पर
ठीक अगले दिन
जबकि कितने हुआ करते थे मोर
इंद्रप्रस्थ
के पास
दिल्ली रिज में उन दिनों
और आ जाया करते थे
भटकते भटकते
घूमते टहलते
हॉस्टल के आगे या पीछे
दाना पानी चुगते
अभी हाल में
अकादमी के पास के
हरे वीराने में
दिखा था एक मोर
कुछ मोरनियां
दिखी थीं
लेकिन विरल से विरल होता जाता है
मोर का दिखना
उसकी आवाज़ दुर्लभ हुई जाती है
मैंने कभी नहीं देखा मोर को नाचते
हुलसते
बस गीत लिखने वाले ज़रूर लिख रहे हैं
मोर पर
और हम अगर गा नहीं रहे
तो गर्दन थामे बैठ
उसे याद कर रहे हैं
जैसे कि मैंने किया था याद उसे
एक विदेशी क्लासरूम में
होकर लगभग बेहोश उनकी
धमकियों से
थामे अपनी गर्दन
मैं गर्दन थामे रही
भूकंप आते रहे
गानों के मोर
कभी दिल
कभी रात में
बोलते रहे
सच, इतनी कम क्यों है
मोर के जन्मने की दर
और हमारी इतनी ज़्यादा क्यों ?
मैं लगातार सोचते हुए भी
उस दिन इसपर
कुछ न कह सकी
अजन्मे बच्चों का भी ख्याल किया
तमाम भग्न प्रेम कथाओं का
पर न मैं लोगों को मोर
न उनकी लड़ाइयों को
प्राकृतिक
कह सकी
ये कुछ इसलिए भी था
कि अगली चर्चा का विषय
यो तय था
मुझसे यह भी बिल्कुल नहीं होता
कि नेताओं को देख कर
टेलीविज़न
पर
लिख सकूँ कोई टिप्पणी
प्रशंसा अथवा निंदा में
ऐसा कुछ भी करना मुझे
राजनैतिक
जागरूकता
नहीं लगती
जाने यह पश्चिम का संक्रमण है
या मेरी उनसे
जागरूकता
सम्बन्धी
सहमति
जो अधिकारों से जुड़ती है
उसकी लगातार मांगें करती है
बहस करती है
नागरिकता
पर
सहज सुलभ साधनो पर
मैं उनतक की भी दूरियां
नहीं तय कर पाती
जिनसे करीब का नाता है
उनतक पहुँच भी नहीं पाती
जहाँ से बुलावे आते हैं
आप इसे
मेरी राजनैतिक उदासीनता कह सकते हैं
लेकिन, मैं प्रतिवाद करूंगी
मुझे लगता है कि राजनैतिक जागरूकता
केवल और केवल उतनी है
कि लोग अपने अधिकारों की मांग करें
वो क्यों कहते हैं
एक
भी शब्द
किसी राजनेता पर
क्योंकि नहीं लिखते रहते
बोलते रहते एक ही बात
सड़क, बिजली, पानी, किताब
नौकरी, बारिश, सूखे की
और कुछ भी नहीं ?
बाढ़
की
राजनीति
अपने
आप खुल गयी
कसी
हुई मुट्ठी मेरी
फ़ैल
गयी हथेली
और
टपकता रहा
आसमान
से पानी
दिल्ली
में हुई
फिर
से बारिश
आखिरकार,
इस साल
दिल्ली
में बारिश
और
याद आया
इंग्लैंड
का राजा
उसी
ने तो आकर कहा था
पर्दे
पर, टेलीविज़न के
हू
द हेल डिड दिस वेदर?
क्या
विज्ञापन
था वह?
लंदन
की झिर झिर बारिश की शिकायत नहीं थी
जबकि
अभी, इन दिनों
जैसे
आयी है
फलां
फलां जगहों पर बाढ़
भयानक
जासूसी लगती है मौसम की
या
फिर राजनीति
कि
फ्रांस के इतिहास में
जब
चुना गया हो
सबसे
युवा राष्ट्र पति
माँ
की उम्र की प्रेमिका वाला
तो
कनाडा के मोंट्रियल क्षेत्र में
आयी
हो भयानक बाढ़
और
कि जब आपके
रूम
मेट रहे हों युगोस्लाव
तो
सच, युगोस्लाविआ में बाढ़
क्या
उसने कर लिया है
पूरा
पुनर्निर्माण ?
क्या
अब एक हो गए हैं
बंटे
हुए युगोस्लाव टुकड़े
निष्काषित
कर
धर्म
के नाम पर बरसों से
वहां
बसे हुओं को
वो
कहाँ गए
मालूम
नहीं
पर
ये सब तो पहले हो चुका था
लेकिन,
युगोस्लाव
रूम मेट्स का किस्सा
खत्म
नहीं होता
कनाडा
का वीज़ा छोड़ देने के बाद भी
उन्होंने
वहीँ शुरू की थी
बाथरूम
की सफाई की राजनीति
और
साथ में
बार
बार फ्लश की
टॉयलेट
ब्रेक्स की
कौन
नहीं जानता
इन
भीतरी लड़ाइयों का हाल
लेकिन,
एक रोज़ पुलिस बुलानी पड़ी
अपनी
ही दिल्ली में
निरंतर
बजते गाडी के हॉर्न के कारण
पूर्णतः
शांत माहौल में
अचानक
बज उठते
हॉर्न
के कारण
होते
ही दाखिल
बाथरूम
में
मुझे
याद है
उस
दिन केरल में चुनाव थे
मैं
घर में अकेली थी
और
पड़ोस में हॉर्न का शोर
बहुत
बढ़ा हुआ
लेकिन,
राजनीति इससे कहीं ज़्यादा बड़ी है
कुछ
हिंदुस्तानी
दस्ते हैं
अमेरिकी
राष्ट्रपति
के चुनाव में
अब
अमेरिका की फर्स्ट लेडी
यूगोस्लाव
हैं
क्या
फर्क पड़ता है?
सिवाय
इसके कि एक राइट विंग कट्टर पंथी
पता
नहीं उसे हिंदी में दक्षिण पंथी कहेंगे
या
नहीं
लेकिन
नस्लवादी
सत्ता
का निर्माण हो जाने से
हमारी
लगी हुई नौकरियां भी छूट जाती हैं
अब
पूछिए
क्या
फ़र्क़ पड़ता है का सवाल?
और
वो पूछ रहे हैं बदस्तूर
गांव
की गरियाति हुई भाषा में
कि
हम लात ही मार आएं
दुनिया
भर को तो क्या?
भार
में जाएँ विश्व बैंक
इंटर
नेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस
और
तमाम संस्थान, देश
ये
पूछने वाले कलाकार हैं
कला
और संवेदना का पेशा करने वाले
अगर
भोथे शब्दों में बयान कर दिया जाए
कलाकारी
को, तो
और
ये जाने क्या कह रहे हैं
दुनिया
भर के तकनीकी रिश्तों के बारे में
दुनिया
भर के तकनीकी अवसरों के बारे में
बकवास
की आग में
जल
रहा है यह शहर
और
देश के कई शहर जल रहे हैं
बिना
बात की बात में
और
जल रहे हैं लोग
और
जलाई जा रही हैं लड़कियां
और
बस्तियां
धूप
से जल रहे हैं खेत
लेकिन,
राजधानी की बारिश
यहाँ
सबसे खर्चीले बाग हैं
और
महानगरों
में भी
जिनमें
से कोई नहीं झेल सकता
तीन
घंटे की भी तेज़ बारिश
तो
क्या अब धुँआती
सुलगती,
ईटों की रहेगी
सूखी
बरसात?
दो
चार बूंदों की
मेरी
खुली हथेली पर
तपती
दोपहर में
खुशबु
के फव्वारे सी.........................
-------------------------पंखुरी सिन्हा
हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, उमंग, साहित्य उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं, ब्लौग्स व वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित
किताबें ----- 'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
'क़िस्सा-ए-कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
'प्रिजन टॉकीज़', अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013
‘डिअर सुज़ाना’ अंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014
पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह ‘काव्य शाला’ में कवितायेँ सम्मिलित
हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘प्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित
विजेंद्र द्वारा सम्पादित और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘शतदल’ में कवितायेँ शामिल
रवींद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित कविता संग्रह ‘समंदर में सूरज’ में कवितायेँ शामिल
गीता श्री द्वारा सम्पादित कहानी संग्रह ‘कथा रंग पूरबी’ में कहानी शामिल
'रक्तिम सन्धियां', साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कविता संग्रह, 2015
इसी पुस्तक मेले २०१७ में बोधि प्रकाशन से दूसरा कविता संग्रह, ‘बहस पार की लंबी धूप’, प्रकाशित
पुरस्कार---
कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का २०१७ का पहला पुरस्कार
राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013
पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान
------------'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला
-------------'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार,
-------------1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान
अनुवाद----कवितायेँ मराठी में अनूदित,
कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,
उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,
रमणिका गुप्ता की कहानियों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद
सम्प्रति----
पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’,
एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम,
और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,
साथ में, हिंदी और अंग्रेजी में कविता लेखन, सन स्टार एवम दैनिक भास्कर में नियमित स्तम्भ एवम साक्षात्कार
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