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| सुशील कुमार भारद्वाज |
पुरानी डायरी के पन्ने (सुशील कुमार भारद्वाज)
आज गंगा किनारे अकेले
घूम रहा था, तो दिमाग में पुरानी यादें खुद्बुदाने लगी| एक एक बात यूँ मेरे होठों
को मुस्कुराने को मजबूर कर रही थीं जैसे लगा कि ये बातें वर्षों पहले की नहीं
बल्कि कल की हो| अच्छी तरह से याद है - “छुपा रुस्तम” का उपनाम तुमने मुझे दे रखी
थी| क्लास में भी अधिकांश समय मुझ पर नज़र गडाये रखती थी| लेकिन जब तुम्हारी सारी
चालें असफल हो गयी, तो तुम मुझे अकरु और घमंडी कहने से भी गुरेज नहीं की| लेकिन उस
दिन मैं सहम गया, जिस दिन तुम्हारी आँखें गुस्से से लाल हो गई थी| मुझे तो लगा कि तुम
किसी भी पल मौका मिलते ही मुझे एक थप्पर जड़ दोगी| तुम्हारा गुस्सा शायद कहीं से भी
गलत नहीं था| मैं तो थोड़ी देर के लिए काफी गर्व भी महसूस करने लगा कि किसी के दिल
में मेरे लिए इतना प्रेम भी जग सकता है कि मेरे किसी लड़की से बात मात्र करने से
उसकी ऐसी हालत हो जायेगी| तुम्हारी जगह कोई और भी होती, तो शायद उसका भी जलन से यही
हाल होता| लेकिन सच तो तुम भी जानती हो कि मैं उन दिनों किसी भी लड़की से न बात
करता था न ही इधर – उधर की किसी बात में रहता था| क्योंकि मैं आधुनिक पूंजीवादी
प्रेम की बीमारी से डरता था| सोचता था प्रेम जैसी चीजें मेरे वश की बात नहीं है|
बार बार धोखा खाने के बाबजूद उसी के चक्कर में जिंदगी बर्बाद करने से बड़ी कोई
बेबकूफी का काम ही नहीं है| सिर्फ अपने पढाई पर ध्यान लगाये हुए था| उस दिन जब मैं
गंगा कि लहरों को निहार रहा था तो तुम पीछे से आकर मुझ पर निशाना साधी –“ समझ में
नहीं आता समय के साथ लोगों को क्या हो जाता है? वे अपना स्वाभाविक जीवन जीने की
बजाय गंभीरता का चादर क्यों ओढ़ लेते हैं? लोगों से दो शब्द प्रेम की बात करने में किसी
का क्या घट जाता है? अपनों के बीच हो कर भी लगता है जैसे श्मशान घाट में खड़ी हूँ|”
और मेरे मुँह से निकल गया –“जुदाई ही जब
सच्चाई है तो नजदीक आने की जरुरत ही क्या है?”
उस घटना के बाद तुम
कई दिनों तक कॉलेज नहीं आयी| जानती हो उन दिनों मैं तुम्हें कितना मिस करता था|
कभी कभी खुद पर गुस्सा आता था आखिर तुम्हारा दिल तोड़ कर मुझे क्या मिल गया? अपने जिद्दी
स्वभाव से क्या सिद्ध करना चाहता हूँ? सोचता था कि तुम्हारी सहेली से पूछ लूँ कि आखिर
तुम कॉलेज क्यों नहीं आ रही हो? यदि मेरी वजह से तो वापस आ जाओ मैं तुम्हारा सारा
गुस्सा झेलने को तैयार हूँ| लेकिन कभी हिम्मत नही जुटा पाया और चुप्प ही रह गया|
महीनों बाद जब तुम आयी तो खुद को रोक नहीं पाया| तुमसे हाल पूछने के लिए तुम्हारी
तरफ बढ़ गया| लेकिन तुम्हारे पास पहुँचते ही अंदर से आवाज आयी – “मत छेड़ इसे| घायल
शेरनी को छेड़ना महंगा पर सकता है|” और मेरी हिम्मत चूक गयी| चुपचाप तुम्हारे बगल
में रखे जग से पानी पी कर वापस लौट गया|
लेकिन सच है कि आज भी
मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ| तुमसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला| जीवन जीने कि
तुम्हारी शैली ने मुझे काफी प्रभावित किया| लोग पूंजीवाद का असर कहें या अवसरवादी
पर सच तो यही है| हमलोग कितने दिन के मेहमान हैं इस पृथ्वी पर, पता नहीं| फिर अपनी
सीमाओ को सीमित क्यों रखें? जीवन में उत्तरोतर सफल होते जाना कोई अपराध तो नहीं|
लोगों का तो काम ही है न खुद आगे बढ़ना न किसी को आगे बढ़ने देना| आज के वैज्ञानिक
युग में भी खुद को रुदिवादी विचारों में जकड कर रखने से क्या होगा? कभी कभी सोचता
हूँ तुम कितना सही कहती थी – “मनुष्य को अपने संस्कारों की रक्षा बदले हुए माहौल
में बदले रूप में ही करनी चाहिए | गीता में भी कहा गया है – परिवर्तन ही संसार का
नियम है|
तुम इस विचार की पक्षधर
थी कि प्रेम ऐसा होना चाहिए जहाँ मुक्ति हो न कि अधिकार का बोध| लेकिन आज भी हमारे
समाज में किसी से प्रेम का मतलब उसके इच्छा समेत पर अधिकार प्राप्त होने को ही
माना जाता है| और शायद यही कलह एवं अलगाव का कारण बनता है| हाल में जब एक किताब देख
रहा था, तो तुम्हारी याद आ गयी| उसमे में लिखा था –“क्या आप पूरी जिंदगी सिर्फ एक
मोमबती के सहारे बिता सकते हैं? यदि नहीं तो आपको क्यों लगता है कि आप पूरी जिंदगी
सिर्फ एक ही इंसान से प्यार करते रह जाएंगें?” वाकई में इस तथ्य को ठीक से विचारने
की जरुरत है| हमलोग रोजमर्रा की जिंदगी में अनेक लोग से मिलते हैं जिनकी ओर चाहे –
अनचाहे आकर्षण महसूस करते हैं| लेकिन इसका मतलब हर समय इंसान गलत ही तो नहीं होता
है|
आज जब तुम मुझसे
काफी दूर हों तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर तुम्हारी याद दिला जाती है| हाँ
एक बात बताना चाहूँगा – मैंने भी अब तुम्हारी तरह समस्याओ को हंसकर हल करने आदत
डाल ली है| शेष .......
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