रविवार, 18 जून 2017

लेखक की पहचान का संकट:अमरेंद्र मिश्र

बदलते समय में बहुत सारी चीजें बदलती जा रही हैं। लोग सिमटते जा रहे हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में पड़ोसी तक से मिलने-बात करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यिक गतिविधि तक भी अपने अलग ढंग और तेवर में हो रहे हैं फिर पहचान की संकट क्यों नहीं हो? फिर, जब जमाना सेल्फ प्रमोशन का हो, तब भी यदि आस-पास के लोग आपको नहीं पहचानते हैं। तो  स्थिति सचमुच में भयावह है। फिर भी क्योंकर तो दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कहीं -न-कहीं लेखक स्वयं भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। खैर, आइये पढ़ते हैं साहित्यिक संपादक अमरेंद्र मिश्र के संस्मरण को और जानते हैं उनके अनुभव।



लेखक की पहचान का संकट
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एक लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए है कि उसकी किताब जिन पाठकों तक पहुँच रही है, वे 'नोटिस' नहीं ले रहे हैं, या इसलिए कि वह जहाँ रहता है, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर स्थित जो लोग रह रहे हैं, वे उसे नहीं जानते ! या लेखक ही आज के समय में अकेला हो गया है ? क्या कारण है कि एक लेखक की अपनी पहचान उसके आसपास ही नहीं बन रही ?

हाल ही में मैं हिंदी के एक वरिष्ठ कथाकार से मिला।उनके आवास तक तो मैं पहुँच गया लेकिन फ्लैट का नंबर भूल गया।जो नंबर मोबाइल पर लिया था वह भी कहीं खो गया।लेकिन उनसे मिलना चूँकि पच्चीस वर्षों बाद हो रहा था, इसलिए मुझे पक्का विश्वास था कि उनके फ्लैट को तो मैं पलक झपकते ही पहचान लूँगा।और फिर इतने बड़े लेखक हैं तो कोई भी चायवाला, पानवाला, पटरी लगाने वाला जरूर उनका फ्लैट बता देगा।

उस पार्क की एक बेंच पर बैठा-बैठा अपने सामने के तमाम फ्लैट देखता मैं सोचता रहा-सामने वाले फ्लैट से थोड़ा हटकर हल्के पीले और गाढ़े भूरे रंग का फ्लैट ही विभूति बाबू का हो सकता है।पार्क की बेंच पर बैठे-बैठे इतना इतमीनान कर लेने के बाद मैं उठा और सामने की सड़क पार कर उनके फ्लैट के पास पहुँच गया।कुछ देर तो उनके नाम से ही उन्हें खोजता रहा पर किसी ने भी आदरपूर्वक यह नहीं बताया कि विभूति प्रसाद जी, जो एक मशहूर लेखक हैं, वह पास के किस फ्लैट में रहते हैं ?मैं जिस फ्लैट को पहचानता उनके उस संभावित फ्लैट तक पहुँचना चाहता था, वह तो उनका था ही नहीं।पुरानी स्मृति में बार-बार लौटते मैं हताश हो चुका था और लगभग लौट जाना चाहता था कि इस बीच विभूति प्रसाद जी सामने से आते दिखे।उनके साथ मैं उनके फ्लैट तक पहुँच गया।उसी फ्लैट में जिसका मैंने पार्क में बैठे-बैठे संभावित अनुमान लगाया था।अंतर बस इतना-सा था कि प्रवेश-द्वार का रास्ता बदल गया था।

''आपको परेशानी हुई, यहाँ तक आने में ?''
मैं कुछ कहने को तैयार हो ही रहा था कि वह फिर कह बैठे-''देखिए, अब वह समय तो रहा नहीं कि आप लेखक हैं तो आपको पूरा शहर पहचानता है।टोले-मोहल्ले के लोग आपको सर आंखों पर बिठाये हुए हैं ! समय तेजी से बदल रहा है।एक वक्त था जब मेरा या मेरे जैसे लेखक का पता तो नीचे रहने वाले या आसपास के लोग ही बता देते थे।और तो और,आये हुए आगंतुक को मेरे फ्लैट तक छोड़ भी जाते थे।डाकिया रोज दस-बारह पत्र और तीन-चार पत्रिकायें दे जाता था।कहता था,''-आपका सिर्फ नाम पढ़ता हूँ, फ्लैट का नंबर तो पढ़ने की जरूरत ही नहीं होती।''

मैं सोचता रहा,''जितना कहना चाहते हैं, कह लें, तब मैं अपनी बात उनके समक्ष रखना चाहूँगा।वे फिर शुरू हो गये-''भाई, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।आज से चार साल पहले कोलकाता में जो इलाज करवाया था, वह अबतक याद है।मैं अपने पुत्र रोहित के साथ एक-एक डाक्टर से अपनी परेशानी सुनाता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।इसी बीच एक नौजवान डाक्टर मेरे पास आया, मेरे चरण स्पर्श करते कहा-''सर, आप यहाँ कैसे ?''
''मैं आश्चर्य में पड़ा उसकी ओर देखता कह गया-''क्या आप मुझे पहचानते हैं ?''
''सर, आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी फोटो किताब पर देखी थी।आप विभूति जी हैं।आपकी लगभग सभी किताबें पढ़ गया हूँ।विशेषकर आपका वह उपन्यास 'सागर तीरे'।क्या गजब लिखा है सर आपने।''
मैं लगभग भावुक होता सिर्फ' धन्यवाद' कह पाया।

मेरी चिकित्सा व्यवस्था में बेहतरीन  सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयीं।एक सुखद अनुभूति के साथ घर लौटते मैं सोचता रहा-''ऐसा कभी-कभी ही होता है।ऐसे प्यारे लोग कभी कभार कहीं मिल जाते हैं और मेरा 'लेखक' उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर लेता है।''

अब न तो वह समय रहा, न वे लोग रहे, न पाठक।कुछ भी तो नहीं रहा ! अब तो सौ पृष्ठों का लिखा कथानक उपन्यास बन जाता है और कहानी 'लघुकथा' में सिमट गयी है।जिस तरह हिंदी फ़िल्म के कलाकार अपनी अभिनीत फिल्म का प्रचार स्वयं ही करते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक भी अपनी किताबों का प्रचार ख़ुद ही करता है।उसे तनिक धैर्य नहीं कि उसकी किताब पर उसे पाठकों के विचार जानने चाहिए।इंतजार करना चाहिए।क्या यह पहचान का संकट नहीं ?''

वे कहीं गहरे खो गये और शायद अपने बीते दिनों में लौट आये।

''लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए भी नहीं की उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक...''

''किस किताब की बात कर रहे आप''?वे गुस्सा हो आए।फिर तनिक सहज होते कहा- "लेखक जब खुद ही प्रकाशक का काम करने लग जाये तो फिर कैसे कह सकते हैं कि उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक नहीं पहुँच पाती ?लेखक पहले अपने व्यक्तित्व का निर्माण तो करे, फिर देखिए, यह संकट कुछ कम हो।''

कारण जो भी हो पर इतना तय है कि लेखक की पहचान का संकट इन दिनों जटिल होता जा रहा है।समाज उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहता है, जो उसे प्रिय है।उसकी अपनी पसंद-नापसंद है।उसके परिचय और 'पहचान' की परिधि में अब न तो वह पुराना समय है, न पुराने लोग, न उनकी प्रसिद्धि, न प्रतिष्ठा।

एक एकाकीपन तन गया है हमारे आपसी सरोकारों के बीच।लेखक की पहचान का संकट उतना ही अहम् है जितना परिवार और समाज में व्यक्ति के खुद की पहचान का संकट।यही कारण है कि बदलते समय में आज आदमी अकेला रह गया है।सच यह भी है कि जिस लेखक को आज का समाज पहचान नहीं पा रहा-वह उन्हीं को बेहद आत्मीयता के साथ जाने कब से रोज देखता-पहचानता आ रहा है !
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अमरेंद्र मिश्र
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फेसबुक वॉल से साभार।

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