पुरानी डायरी के पन्ने लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुरानी डायरी के पन्ने लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 12 जून 2016

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने): सुशील कुमार भारद्वाज

एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने)
सुशील कुमार भारद्वाज

मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।

मंगलवार, 7 जून 2016

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने) सुशील कुमार भारद्वाज

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने)

उस दिन जब हमारी नजरें चार हुई थीं तो दिल में कुछ कुछ ही नहीं बहुत कुछ हुआ था। जैसे मेरी चोर निगाहें उस पर टिकी थी वैसे ही वो नजरें घुमा-फिरा कर मुझे ही देख रही थी। शायद नयनों ने अपनी बातें शुरू कर दी थी, शारीरिक भाषा भी बदल रही थी। वह मुझसे अंजान थी, लेकिन कहीं भी अजनबीपन महसूस नहीं हो रहा था। लगा जैसे वर्षों बाद मिली हो, बहुत सारी बातें करनी हो। शायद वो भी इंतजार में थी कि कमरे से सभी लोग निकल जाएं तो दिल की बातें हों। मुझमें ही कहां थी हिम्मत इतनी कि साफ साफ कुछ कह पाता? वहां मौजूद सगे-संबंधियों की वजह से भी असहजता महसूस हो रहा था। वे लोग कितने जालिम थे जो हमलोगों पर जुल्म ढाए जा रहे थे।दो परिंदे को इतने पास लाकर भी कोई तरसाता है क्या? मन बहुत भारी था जब मैं कमरे से निकल रहा था। उससे बातें तो खूब हुई थी लेकिन दिल की प्यास अभी बुझी नहीं थी। बुझती भी कैसे? उसे भी कोई बात करना कहते हैं? हाल-चाल तो सब पूछते हैं, मुझे तो उसके दिल की बात जाननी थी। मुझे पता करना था कि जीवन यात्रा में वह मेरी सहयात्री बनने को तैयार है कि नहीं? पूछ तो लिया ही था। और वो जबाब भी दे दी थी "मम्मी-पापा की पसंद ही मेरी पसंद है।" लेकिन जबाब बनावटी लगा, तोते के रटंत जैसा। मैं तो दिल की बात पूछ रहा था। मैं स्पष्ट शब्दों में जानना चाह रहा था कि मैं तुम्हें पसंद तो हूं? अपनी खुशी से मेरे साथ जीवन बिताने को तैयार तो हो? यह जानते हुए भी कि अब मुझे किसी से कुछ नहीं पूछना है। मैं तो उससे मिलकर ही काफी खुश हूं। हाल ये है कि मैं उसे छोङने को ही तैयार नहीं।शायद पहली नजर का प्यार ऐसा ही होता है। चलते वक्त भी वह दरवाजे पर खङी थी, भीङ में भी मुझे देख रही थी। लेकिन थी थोडी चालाक जो पर्दे के पीछे से झांक रही थी। लेकिन मैं इतनी भीङ में बेशर्म की तरह कैसे उसे ढूंढने की कोशिश करता? मनमसोस कर रह गया क्योंकि मेरे वहां से चलने से पहले ही बिजली चली गई। मोमबत्ती की रोशनी में उसकी सुंदरता को एक झलक देखने का कसक रह ही गया।सीढियों से नीचे उतर जब गाङी में बैठ गया तब उसे दुबारा देखने की तमन्ना दिल ही में रह गई।
सुशील कुमार भारद्वाज

शनिवार, 27 जून 2015

अब भी जिन्दा हो मेरी यादों में( सुशील कुमार भारद्वाज )

सुशील कुमार भारद्वाज


                                                           पुरानी  डायरी के पन्ने  (सुशील कुमार भारद्वाज)

                                                                                                                  

आज गंगा किनारे अकेले घूम रहा था, तो दिमाग में पुरानी यादें खुद्बुदाने लगी| एक एक बात यूँ मेरे होठों को मुस्कुराने को मजबूर कर रही थीं जैसे लगा कि ये बातें वर्षों पहले की नहीं बल्कि कल की हो| अच्छी तरह से याद है - “छुपा रुस्तम” का उपनाम तुमने मुझे दे रखी थी| क्लास में भी अधिकांश समय मुझ पर नज़र गडाये रखती थी| लेकिन जब तुम्हारी सारी चालें असफल हो गयी, तो तुम मुझे अकरु और घमंडी कहने से भी गुरेज नहीं की| लेकिन उस दिन मैं सहम गया, जिस दिन तुम्हारी आँखें गुस्से से लाल हो गई थी| मुझे तो लगा कि तुम किसी भी पल मौका मिलते ही मुझे एक थप्पर जड़ दोगी| तुम्हारा गुस्सा शायद कहीं से भी गलत नहीं था| मैं तो थोड़ी देर के लिए काफी गर्व भी महसूस करने लगा कि किसी के दिल में मेरे लिए इतना प्रेम भी जग सकता है कि मेरे किसी लड़की से बात मात्र करने से उसकी ऐसी हालत हो जायेगी| तुम्हारी जगह कोई और भी होती, तो शायद उसका भी जलन से यही हाल होता| लेकिन सच तो तुम भी जानती हो कि मैं उन दिनों किसी भी लड़की से न बात करता था न ही इधर – उधर की किसी बात में रहता था| क्योंकि मैं आधुनिक पूंजीवादी प्रेम की बीमारी से डरता था| सोचता था प्रेम जैसी चीजें मेरे वश की बात नहीं है| बार बार धोखा खाने के बाबजूद उसी के चक्कर में जिंदगी बर्बाद करने से बड़ी कोई बेबकूफी का काम ही नहीं है| सिर्फ अपने पढाई पर ध्यान लगाये हुए था| उस दिन जब मैं गंगा कि लहरों को निहार रहा था तो तुम पीछे से आकर मुझ पर निशाना साधी –“ समझ में नहीं आता समय के साथ लोगों को क्या हो जाता है? वे अपना स्वाभाविक जीवन जीने की बजाय गंभीरता का चादर क्यों ओढ़ लेते हैं? लोगों से दो शब्द प्रेम की बात करने में किसी का क्या घट जाता है? अपनों के बीच हो कर भी लगता है जैसे श्मशान घाट में खड़ी हूँ|”  और मेरे मुँह से निकल गया –“जुदाई ही जब सच्चाई है तो नजदीक आने की जरुरत ही क्या है?”


उस घटना के बाद तुम कई दिनों तक कॉलेज नहीं आयी| जानती हो उन दिनों मैं तुम्हें कितना मिस करता था| कभी कभी खुद पर गुस्सा आता था आखिर तुम्हारा दिल तोड़ कर मुझे क्या मिल गया? अपने जिद्दी स्वभाव से क्या सिद्ध करना चाहता हूँ? सोचता था कि तुम्हारी सहेली से पूछ लूँ कि आखिर तुम कॉलेज क्यों नहीं आ रही हो? यदि मेरी वजह से तो वापस आ जाओ मैं तुम्हारा सारा गुस्सा झेलने को तैयार हूँ| लेकिन कभी हिम्मत नही जुटा पाया और चुप्प ही रह गया| महीनों बाद जब तुम आयी तो खुद को रोक नहीं पाया| तुमसे हाल पूछने के लिए तुम्हारी तरफ बढ़ गया| लेकिन तुम्हारे पास पहुँचते ही अंदर से आवाज आयी – “मत छेड़ इसे| घायल शेरनी को छेड़ना महंगा पर सकता है|” और मेरी हिम्मत चूक गयी| चुपचाप तुम्हारे बगल में रखे जग से पानी पी कर वापस लौट गया|

लेकिन सच है कि आज भी मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ| तुमसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला| जीवन जीने कि तुम्हारी शैली ने मुझे काफी प्रभावित किया| लोग पूंजीवाद का असर कहें या अवसरवादी पर सच तो यही है| हमलोग कितने दिन के मेहमान हैं इस पृथ्वी पर, पता नहीं| फिर अपनी सीमाओ को सीमित क्यों रखें? जीवन में उत्तरोतर सफल होते जाना कोई अपराध तो नहीं| लोगों का तो काम ही है न खुद आगे बढ़ना न किसी को आगे बढ़ने देना| आज के वैज्ञानिक युग में भी खुद को रुदिवादी विचारों में जकड कर रखने से क्या होगा? कभी कभी सोचता हूँ तुम कितना सही कहती थी – “मनुष्य को अपने संस्कारों की रक्षा बदले हुए माहौल में बदले रूप में ही करनी चाहिए | गीता में भी कहा गया है – परिवर्तन ही संसार का नियम है|


तुम इस विचार की पक्षधर थी कि प्रेम ऐसा होना चाहिए जहाँ मुक्ति हो न कि अधिकार का बोध| लेकिन आज भी हमारे समाज में किसी से प्रेम का मतलब उसके इच्छा समेत पर अधिकार प्राप्त होने को ही माना जाता है| और शायद यही कलह एवं अलगाव का कारण बनता है| हाल में जब एक किताब देख रहा था, तो तुम्हारी याद आ गयी| उसमे में लिखा था –“क्या आप पूरी जिंदगी सिर्फ एक मोमबती के सहारे बिता सकते हैं? यदि नहीं तो आपको क्यों लगता है कि आप पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही इंसान से प्यार करते रह जाएंगें?” वाकई में इस तथ्य को ठीक से विचारने की जरुरत है| हमलोग रोजमर्रा की जिंदगी में अनेक लोग से मिलते हैं जिनकी ओर चाहे – अनचाहे आकर्षण महसूस करते हैं| लेकिन इसका मतलब हर समय इंसान गलत ही तो नहीं होता है|

आज जब तुम मुझसे काफी दूर हों तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर तुम्हारी याद दिला जाती है| हाँ एक बात बताना चाहूँगा – मैंने भी अब तुम्हारी तरह समस्याओ को हंसकर हल करने आदत डाल ली है| शेष .......