सोमवार, 29 जुलाई 2019

एक संस्मरण

अचानक पड़ी नजर तो मैं चौंका उस सभागार में। चौंका इसलिए कि वे इन दिनों कम ही शिरकत करती हैं कार्यक्रमों में। कोई चार-पाँच साल बाद नजर आईं थीं तो दिल के भावनात्मक तार उद्वेलित होने लगे। लगा कि पैर छूकर आशीष लें लूँ उनसे और उनके हाल समाचार पूछ लूँ। 70 वर्ष कोई कम उम्र तो होती नहीं! स्वाभाविक ही उम्र का असर उनके हौंसले को पस्त कर रहा होगा। जिम्मेदारी तो कुछ शेष है नहीं फिर भी शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा इस पृथ्वी पर जिन्हें चिंताएं किसी वजह से परेशान न करती हों।
लेकिन सारी भावनाएं कुछ ही देर में शांत पड़ने लगतीं हैं और मैं कार्यक्रम में वक्ताओं के धीर-गंभीर आख्यान को सुनने में मशगूल हो जाता हूँ। ये भी सच है कि उनसे पहली  और आखिरी बार प्रेम से सौहार्दपूर्ण माहौल में सात साल पहले बतियाया था। उस समय एक अजीब रोमांच था दिल में। उनके घर में खाए हुए खिचड़ी को वैसे ही नहीं भूलता जैसे वक्त-बेवक्त उनकी याद तरोताजा हो आती हैं।
कार्यक्रम के बाद भी उनसे बात करता इसकी संभावना न्यूनतम ही थी लेकिन मेरी निगाहों ने पूरे सभागार में ढ़ूढ़ा उन्हें जरूर। मुझ पर उनकी निगाह पड़ी तो होगी जरूर, अलबत्ता बुढ़ापे में पहचान न पाई हों, इसकी भी संभावना ना के ही बराबर है। बाबजूद इसके एक कसक रह गई दिल में दूर से ही सही देख लेने की, हाल-चाल समझ लेने की। रिश्तों का क्या है वे तो समय के साथ बनते और बिगड़ते ही रहते हैं लेकिन भावनाएं शायद किसी न किसी रूप में मौजूद ही रहती है उन चुप्पियों और संवादहीनता के बीच भी। हाँ, कभी कभी दिल पूछता है जरूर कि वर्षों बाद जब आपकी नजर मुझ पर पड़ती है तो दिल के किसी कोने से कोई आवाज भी आती है?
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जिंदगी में रिश्ते तो बनते-बिगड़ते ही रहते हैं पर भावनाएं.....  #सुकुभा

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