'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। प्रस्तुत है युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह "आवाज भी देह है" पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी -
'आवाज़ भी देह है' युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की ऐसी कविताओं का संग्रह है, जिसमें शामिल कविताओं की चमक ऐसी है, जिस चमक से समकालीन हिंदी कविता का चेहरा एक नई रौशनी से जगमग दिखाई देता है। इन कविताओं में कवि का लबो-लहजा ऐसा है जिसमें जाड़े की धूप की मिठास भरी दिखाई देती है। इस संग्रह की पहली कविता का लबो-लहजा आप सब देखिए :
कुछ थोड़े-से लोग हमेशा टापुओं पर रहते हैं
तो मैं रोज़ो-शब खुले समुद्र में रहता हूँ
मुझे हर बार लहरें दूर बहुत दूर
लाकर पटक देती हैं
इतनी दूर कि मेरे देश का नौ क्षेत्र
मुझे दिखाई नहीं देता
एक बड़े झंझावात में इस दुनिया की छत
उड़ रही होती है
और हिमालय और आल्पस जैसे पहाड़
भसकते हुए अपने मलबे के साथ
मेरी ओर लुढ़कते हैं
कुछ थोड़े-से लोग तब पबों में जाम टकराते
हुए मेरी इस बेबसी पर हँसते हैं
मुझे इस मृत्यु की नींद में उनके ठहाके
सुनाई पड़ते हैं
मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ
अपने ऊपर के आसमान से मेरा सिर लगता है
कुछ थोड़े-से लोग अंतरिक्ष से खेलते हैं
और मेरी पृथ्वी रोज़ हिलती है ( 'हिलती है पृथ्वी', पृ. 13)।
'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। दरअसल कवि की महत्ता भी इसी में है कि कवि मनुष्य-जीवन को नए सिरे से पकड़े और मनुष्य-जीवन को हर संकट से आज़ाद कराए। यहाँ आज़ादी दिलाने का मतलब यह है कि कवि मनुष्य को कमज़ोर कर रहे सारे तत्वों से आज़ाद कराए। आज सारा संकट मनुष्यता पर ही तो आ रहा है। बड़ा सवाल यही है कि यह संकट पैदा कौन कर रहा है, तो जवाब यह है कि आज मनुष्यता को संकट में देश की सरकारें ही तो ला रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि इन दिनों सबसे ज़्यादा संकट में कुछ है तो मनुष्यता है। अब की सरकारें 'फूट डालो राज करो' की नीति वाला अपना एजेंडा बख़ूबी लागू कर रही हैं। आदमी-आदमी के बीच भेदभाव बढ़ाकर आज सत्ता हासिल की जा रही है :
याक की तरह सर्दी खुर बजा रही है
जिनके जिस्म ओढ़े नहीं जा सकते
वो मिट्टी ओढ़ रहे हैं
ग्लैशियर-सी रात फ़िसलती हुई बह रही है
हिंसा है इन रातों की नींद हिंसा है
दुःख-आँच देकर जल रहा है दान का अलाव
साँसों से हथेलियाँ गर्मा रही है रूह
पत्तों पर ठोस हवा ठहरी है
सूखी हुई लकड़ियाँ सब हरी हैं
यह रात जैसे हड़ताल में अस्पताल
इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है
देह तानकर ओढ़ रहे हैं लोग
इस ठंडे की आग लगे यह रोग ( 'इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है', पृ. 38 )।
अथवा,
पेड़ों के तने हथेलियों के स्पर्श से सख़्त हो जाते हैं
और जड़ पृथ्वी के अँधेरे में धँसने लगती है
पाँव सड़क पर इतने परिचित हैं कि मेरा आना-जाना
उनमें ऊब पैदा करता है
उससे अधिक रुचिकर तो आसमान में गर्दिश करते सितारे हैं
इतनी लय से विज्ञापन आते हैं कि कहीं भी कुछ चौंकता नहीं
गाड़ियों का शोर ओढ़ता-बिछाता शहर यातायत में डूब जाता है
सब भाग रहे हैं एक परिचित त्वरा में कि
धीमी गति की बैलगाड़ी इतनी भली लगती है
कि भले लोग कहते हैं अच्छा हुआ इसके पहिए में
बॉल बेयरिंग नहीं लगा
अचानक अपने घर के दरवाज़े पर आप तय करते हैं कि
हथेली की दस्तक बदल देंगे
और आप आश्चर्य में हैं कि कोई बिना पूछे
रोज़ की तरह दरवाज़ा खोल देता है ( 'रोज़ की तरह', पृ. 39 )।
'देह भी आवाज़ है' की कविताएँ हमारे आजूबाजू जो कुछ बचा रह गया है, उस बचे रहने की कविताएँ हैं। हालाँकि जो कुछ बचा रह गया है, वह और कितने दिन बचा रह पाएगा, यह संदेह कवि-मन में एक डर की तरह छिपकर बैठा रहता है। कवि का यह डर अनुचित न होकर वाजिब है। आज जिस भीषण पराजय से आदमी जूझ रहा है, पहले ऐसा शायद हुआ हो। संजय कुमार शांडिल्य भी एक आदमी हैं और आदमी होने के नाते किसी आदमी का पराजित होना उन्हें बुरा लगता है। आदमी को हराए जाने की सौदागरी इन दिनों विश्व-स्तर पर जारी है। और आदमी को लेकर किसी भी सत्तापक्ष का यह लेनदेन घातक है। आज सत्तापक्ष होने का तात्पर्य इतना भर रह गया है कि जनता अपने हर मोर्चे पर हारती रहे और सत्तापक्ष अपने हर मोर्चे पर जीत हासिल करता रहे। सत्तापक्ष का कोई विस्फोट कभी असफल नहीं होता। स्थिति यह हो गई है कि हर आदमी दूसरे आदमी को घृणा से देख रहा है। आज के सत्ताधीशों की देन यही है कि हर घृणा को इतनी हवा दी जा रही है कि हर आदमी कन्फ्यूज़ है और हर आदमी को लग रहा है कि एक-दूसरे को मारकर ही ज़िंदा रहा जा सकता है। अब देश को बदलने का मतलब इतना भर बचा रह गया है सत्ताधीशों के पास कि प्रेम से नहीं घृणा से देश को भर दिया जाए। संग्रह की 'अब्दुल मियाँ', 'हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से अधिक जानते हैं', 'हम जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है', 'पेड़ : एक, दो', 'अभी सिर्फ़ एक आँख जगी है', 'इन में', 'मैं हर बार 'अ' से शुरू करता हूँ', 'लड़ना उतना आसान होता नहीं', 'घर में एक तंबू है तो जॉर्डन एक नदी नहीं है', 'मैं इन उदास शामों में रहता हूँ', 'ख़ुश होने के लिए', 'पृथ्वी के छोर', 'बारिश गिर रही है', 'खेल की नीति-कथा', 'इतनी साजिशें हैं मौसम के', 'आश्चर्य', 'हज़ार दरवेश', 'हड़प्पा की स्त्रियाँ', 'वे सड़कें', 'स्वार्थ का वैश्विक गाँव', 'यह समय खच्चरों की उदासियों का है', 'टेक्सस से टिकारी तक', 'मेरी कविताओं में मैं', 'कोई मुझे भी खोदकर निकालेगा', 'मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो', 'कसिया अभी आठ कोस है' आदि कविताएँ दुनिया भर की सरकारों की इसी नीति-कथा का बयान हैं।
संजय कुमार शांडिल्य हमारे समय के ऐसे कवि हैं, जिन्हें दुनिया का, दुनियादारी का और डगमग विचारधारा के बारे में ख़ूब पता है। उनकी कविताओं का आकाश-मंडल इतना बड़ा है, इतना फैला हुआ है, इतना तपा हुआ है कि 'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ पढ़ते हुए पाठक कहीं दूसरी जगह भटक नहीं जाता बल्कि इन कविताओं की आकाशीय आभा से टिका रहता है। इन कविताओं में जब पृथ्वी चौंकती है, तब हम-आप भी चौंकते हैं कि आज की निरंकुश व्यवस्था ने हमारी देह को कहाँ-कहाँ छेदा है। संजय कुमार शांडिल्य कविता के उन लोहारों में हैं, जिनकी कविताएँ बिलकुल ताज़ा आग में तपकर हम-आप तक पहुँचती हैं यानी संजय कुमार शांडिल्य कमाल के कवि हैं, जो एक नए क़िस्म की आवाज़ हमें सौंपते हैं। हमारे दुश्मन हमको दरिया में बहा आते हैं और यह कवि हमको दरिया से बाहर निकाल लाता है पूरी हिफ़ाज़त से। तभी पूरी ताक़त लगाकर कवि कह पाता है, 'तुम हमारी आवाज़ें खा रहे हो / रुई के फ़ाहों-सी / हवाओं के दस्तक-सी / निरपराध आवाज़ें… ( 'आवाज़ भी देह है', पृ. 52 )।'
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आवाज़ भी देह है ( कविता-संग्रह ) / कवि : संजय कुमार शांडिल्य / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नम्बर-11, करतारपुरा इण्डस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 / मोबाइल संपर्क : 09839018087 / 09431453709 / मूल्य : ₹100
समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / 09835417547
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