सुभाष रूपेला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुभाष रूपेला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 3 जून 2017

सुभाष रूपेला की कविताएं

सुभाष रूपेला की कविताएं जितनी छोटी और सुंदर होती है उतनी ही अर्थपूर्ण भी। ये कविताओं के विषय का चयन भी जिंदगी की सहज घटनाओं से करते हैं जो आपके मन को अक्सरहां छू जाते हैं और मन को गुदगुदा जाते हैं। आनंद लेते हैं सुभाष रूपेला जी की कुछ कविताओं का।


वो ठंडा हो जाए, तो बात बन जाए

ग़ुस्सा बिन ब्रेक की वो गाड़ी है,
अंधेरी राह पर चाल जिसकी तूफ़ानी है,
वो चल जिधर पड़ी, सो चल पड़ी,
है मज़ाल किसकी, जो बीच में रहे खड़ी?
रौंदती सब कुछ वो मंज़िल की ओर चल पड़ी।

ज़िद से दोस्ती उसकी पुश्तैनी है,
संकल्प से उसकी दुशमनी पुरानी है,
विवेक से नाराज़गी उसकी ख़ानदानी है,
तैश के ऐक्सिलेटर से ऐश उसने ठानी है,
हादिसों की सोहबत उसकी जवानी है,
ठुक पिटकर लाखों गँवाने की उसकी कहानी है।

अनुभव के हथौड़ों से होती है डेंटिंग,
निखरती है सूरत पाकर पछतावे की वेल्डिंग,
संयम का ब्रेक हो, संतुलन का क्लच हो,
साथ शांत मन की मंथर चाल हो,
फिर भला हादेसे का क्यों नसीब हो?
मंज़िल क्यों न सदा इस गाड़ी के क़रीब हो?

क्रोध से नहीं संयम से चलाओ ज़िंदगी की ये गाड़ी,
फिर रहेगी सफलता अगाड़ी और पिछाड़ी।

××××××××××××××××××××

वापसी

लंबा अर्सा पाँच साल का गुज़ार दिया,
मगर माँ का चेहरा न कहीं भी दिखाई दिया।
चेहरे और तस्वीर में फर्क हुआ करता है,
माँ-बेटे का दिल कहाँ जुदा हुआ करता है!

फोन करके भी चित्त को कहां मिल पाता था चैन!
सूरत माँ की देखने को तरस रह जाते थे नैन।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा होगा,
बेटे ने माँ को जब याद न किया होगा।।

आ ही पहुँचा अमेरिका से, माँ से मिलने बेटा,
चरऩ छुए माँ के उसने, ली फिर जादू की जफ्पी।
ख़ुशी के समंदर में, नहाया-सा लगने लगा वो।
बचपन की बातों में, गोते लगाने लगा वो।।

काश ऐसा ही हमदर्द बेटा आप सबको मिलता जाए,
ख़िज़ाँ नहीं, फिर बहार ही बहार छा जाए।।

xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
बेचारे मास्टर की नेता जी के सामने पेशी

नगर में आ पहुँचा एक मदारी,
जमूरे-सी दिखती उसे जनता सारी.
सब मसलों का वो सुराग पा गया,
फैक्ट्री बदलने का खयाल आ गया.
ट्रेनिंग देने सैमिनार आ गया.
सार अखबार में ज़रा, लीक हो गया:--

“मैकाले थे सेर, हम हैं मियां सवा सेर,
अपनी गली में होता है कुत्ता भी शेर,
नज़र आते हो चूहे से मचाते फिरते अंधेर.
तैयार करते जाते हो क्रांतिकारी ढेर,
चूहेदानी से  सीसीटीवी लगाए हैं हमने ढेर,
बेजा हरकत कैद कर तुम्हें करेंगे कैद,
जासूस हमारे फिरते हैं हर कहीं मुस्तैद.

क्रांतिकारी नहीं, दरी बिछाऊ लाल चाहिए,
हुक़ुम बजा लाएं, वो कमाल चाहिए.
फेल हों, तो भी सब पास चाहिए.
अमल करो तुरंत, मत करना और लेट,
कर देते हैं हम वरना, पलक झपकते टरमिनेट.”

हुक़ुम सुन आआक़ा का, मास्टर को आ गया पसीना,
दिसंबर में घिर आया मानो जून का महीना.
याद आ गया उसे घर बैठा नगीना,
संभव नहीं बिलकुल, उसके बिना जीना.

“नेता शरऩम् आदेशम् शरऩम् दलम् शरऩम् गच्छामि,
मत  होना रुष्ट स्वामी, करूंगा मैं सदा गुलामी.”

छोड़कर राष्ट्र-भक्ति, बढ़ेगी जब तक व्यक्ति-भक्ति,
छिना पद जगत गुरु का, हीरे छिनेंगे बिन गिनती.
होता नहीं शिक्षक का आदर जहां,
फेल को भी पास करना पड़ता है जहां,
अँधेरा ही अँधेरा छा जाता है वहां.
××××××××××××××××××××
आशीर्वाद
सुरक्षा-कवच बन जाता है आशीर्वाद।
हर बुरी नज़र से बचाता है आशीर्वाद।
दुआओं की खाद से फलते सभी इरादे।
हिना का रंग खिला जाता है आशीर्वाद।।

बीमा दीर्घायु दे जाता है आशीर्वाद।
राह की अड़चनें भगाता है आशीर्वाद।
असीस के अनमोल रतन तुम संभाल रखना।
मुरादें पूरी करवाता है आशीर्वाद।।

××××××××××××

मंगलवार, 21 जून 2016

माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

सुभाष रूपेला
माँ शब्द जितना पवित्र एवं व्यापक है उतना ही अनमोल भी। एक माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए क्या-क्या नहीं करती? हां, ये अलग बात है कि समय के साथ माँ के रहन-सहन में बदलाव आया है लेकिन इससे माँ के महत्व में कहीं कोई कमी नहीं आ जाती। आज पढते हैं माँ पर केंद्रित सुभाष रूपेला की कुछ कविताएं।

माँ
है होती नसीब माँ से दुनिया,
बिन माँ कोई जग में आया कहां?
पला कहां, जिया कहां?
इंसान तो क्या, भगवान भी,
क्या माँ की गोद में नहीं पला?
कौशल्या देवकी और यशोदा को
राम और कृष्ऩ क्यों भूलें भला?
त्याग नींद अपनी, लाल को वो सुलाती,
दुख की धूप को वो, ममता-छाया से हरती,
हरि तो जग में हैं दिखते किसको?
माँ तो मिलती है हर किसी को.
ऑक्सीजन है जीवन में माँ,
सूरज है अंधेरे में माँ,
जल है प्यास में माँ,
सहारा है संकट में माँ,
बहार है खिजां में मां,
है हँसती हुई हस्ती माँ.
लाल की दौलत-ए-जन्नत है माँ.
सबकी कामना यही है माँ,
कुछ भी बदले इस जहां में,
बदले न कभी प्यारी न्यारी माँ,
मदर डे क्या, हर दिन ही,
बेटा न भूले कभी माँ.

_______________
क्यों रहे माँ बेचैन
करुऩा बन उमड़ पड़ी ममता उस माँ की,
सोते-जागते दिखने लगी, सूरत अपने लाल की.
पूछती फिरती नुस्खे प्रगति के, है कौन-सी गली वो है न भटकी?
रटती थी लाल का नाम यों, जपती हो मानो राम राम,
मन्नत दुआ सब करती, चाहे हो सुबह या हो फिर शाम.
तीर्थ-तीर्थ वो जाती, पीर बाबा सब वो मानती,
झाड़-फूँक सब वो करवाती, बाँवरी-सी सब कहीं फिरती.
फिरकी-सी थी वो फिरती, थकती नहीं, वस रहती सदा चलती.
नंबर वन बना बेटे को रहेगी, उसकी साँस है जब तक चलती.
चिंता के पानी में चीनी-सी थी वो घुलती,
धुन देख उसकी लोग समझते उसे सनकी.
आते-आते रैंक रह गया,
आई. आई. टी. का चांस रह गया,
जाते जाते प्राऩ बच गया,
दिमाग लेकिन गुम हो गया.
जीने का चैन उड़ गया,
मुर्दे-सा जिस्म हो गया.
आज भी दिखती वो माता,
कलेजा मुँह को आ जाता.
खुद की लगन से आता है रैंक, खोलो क्वालिटी टाइम बैंक
झाड़े से है सुधरा कभी, किसी के दिमाग का टैंक?
ऐसी सनक न किसी को चढ़ाए भगवान!
पास हो जाए लाल, बस इतना रहे अरमान.

__________________
माँ का दर्द
माँ तो लुटा देती है सब,
पर बेटा लौटाता है कब?
“इससे तो बेहतर है बैंक, हे नाथ,
लौटाता है मूलधन ब्याज के साथ।“
श्रीमती की आपत्ति
लाखों कमाती हूँ,
गरीब श्रीमान के हाथ थमाती हूं,
उनके रिश्तेदार फिर भी मुझे भार ही समझते हैं –
तभी तो मुझे श्रीमती गरीब चंद नहीं, उनकी भार्या ही कहते हैं।
____
मस्त लापरवाह माँ
गोलगप्पे खाती रही, गप्पें लगाती रही;
सखियों संग मस्त सदा, सुध घर की जाती रही।
किट्टी में जाती रही, क्लबों में छाती रही;
मॉल में डोलती रही, बच्चों ने ये सब सही।
बड़ा बेटा फ़ेल हुआ, रात घर से भाग गया;
चिंता क्या उसकी करे, धब्बा था जो धुल गया।
एक दर्पऩ टूट गया, रोशनी वो लूट गया;
आँखों में था वो लगा, मँझला नाबीना हुआ।
गली में ठग आ गया, छोटे को उठा ले गया;
माँ को थी फुरसत कहां? आज़ादी वो दे गया।
रग रग में ड्रग घुस गई, पुड़िया से गुड़िया गई;
मस्ती का नशा माँ पे, अपने में वो खोती गई।
ध्यान से जो न पालती, औलाद क्यों वो जनती?
लापरवाह माँ होती, बच्चे रुल जाते तभी।
बच्चे तो फूल-से हैं, माली-सी माँ सीँचती;
घर की फुलवारी सदा, रखवाली से खिलती।
बच्चों की कीमन पे, ऐश करना न तुम कभी;
गोदी के तारे हैं ये, हीरे जवाहर सभी।
मोमबत्ती-सी माँ हो, करुऩा को पिघलती हो;
रोशनी को जलती हो, लाल को दुलारती हो!
भगवान मेहर करना, हर घर पे नज़र रखना;
बच्चों में खोई रहे, ममता-सी माँ भेजना!!!
_____________