हाल ही में भारत के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का जन्मदिन था। नामवर सिंह आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गये हैं कि दोस्त और दुश्मन दोनों ही उनकों याद करते हैं। जिन्हें उनका आशीर्वाद मिला वे तो स्वयं को धन्य मानते हैं लेकिन जिन्हें नहीं मिला वे उनके मरने तक की बात करते हैं। जबकि नामवर सिंह कोई कुर्सी नहीं एक आदमी का नाम है। लोग अपनी क्षमता बढ़ा उनके कद का हो सकता है। संभव है उनसे बेहतर भी हो जाएं। लेकिन दुर्भाग्य है कि लोग ईर्ष्यावश उन्हें गाली देने में ही अपना समय और शक्ति लगाते हैं। खैर आइए पढ़ते हैं पुष्पेंद्र कुमार पाठक का संस्मरण।
श्री मान नामवर महाशय को कई बार सुनने को मिला। बीएचयू मे यदा-कदा सेमिनार का आयोजन और नामवर जी स्टार वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। बीएचयू परंपरागत रूप से भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का प्रवाह स्थल रहा है। ऐसे प्रवाहमान सांस्कृतिक लहर मे तथाकथित प्रगतिशीलता के कंकड़-पत्थर फेंकने की वामपंथी बुद्धि तो कूट कूट कर भरी थी हमारे पूज्य गुरूवर में। उपर से काशी विश्वनाथ की नगरी। अगर वहां जाकर अगर मुहम्मद गोरी, गजनवी, बाबर,औरंगजेब और वो सभी आक्रांता जिन्होंने भारत की अस्मिता को तार तार किया, उनकी तारीफ की जाए, उनमे अच्छाइयों का दर्शन निर्लज्जता पूर्वक किया जाए तो मशहूर होने के चांसेज ज्यादा हैं। गुरूजी को पता नही कहां से मुगलो की खनकती तलवार मे हिन्दुओ की आर्तनाद की जगह लोकधुन सुनाई देता था। सारांश यह कि गुरु नामवर जी को बोलने के लिए कोई भी टाॅपिक दिया जाता उसमे अमेरिका, आरएसएस, ब्राह्मणवाद विलेन बनकर उभर आते। हां भारत की बहुलतावादी संस्कृति उनकी प्राथमिक चिंता थी जिसकी रक्षा बिना मुगलिया संस्कृति को पिरोए संभव ही नही थी। आरएसएस के हिन्दुत्व मे गुरूजी को हिन्दुस्तान की एकता खंड खंड मालूम पड़ती थी जिसे बचाने के लिए आइने अकबरी या बाबरनामा को आत्मसात करना परम आवश्यक था।हा, गुरू जी मुस्लिम आक्रांता मे नायकत्व की छवि ढूंढने को उतावले रहते। कभी-कभार तो ढूंढने मे असफल होने पर नई छवि ही गढ़ डालते। इस इरादे के साथ की पढ़ने वाला भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला होता देख धैर्य खोकर अनाप-शनाप बोले और फिर मिडिया मे इसे उग्र हिन्दुत्व के रूप मे पेश करें। फिर खुद को साहित्य मे बोल्ड एक्सपेरिमेंटल के तौर पर स्थापित करने मे आसानी भी होगी। गुरूजी जी वेद, पुराण, उपनिषद्, मानस आदि ग्रंथो का गहन अध्ययन किया है लेकिन उनकी व्याकुलता उस समय देखते ही बनती जब वो इन सभी ग्रंथो मे मुहम्मद साहब का कोई जिक्र न पाते। लगता ये सभी ग्रंथ ही अपूर्ण है और इसके साथ साथ सारा संसार भी। भारतीय वैचारिक धरातल का टेक्टोनिक शिफ्ट हो जाता अगर कही से भी हनुमान जी या कृष्ण जी हिन्दुत्व की किताब से न होकर किसी अरबी संस्कृति का कोई नाम होता फिर तो सेक्युलरिज्म और गंगा जमुनी तहजीब (पता नही इस का उच्चारण गुरु जी बारंबार क्यो करते थे।) का कुछ अलग ही रंग होता। इसका दर्द उनके चेहरे और वाणी से महसूस किया जा सकता था।लेकिन सेक्युलर तब्के को जीवनज्योति की आभा यही मंद पड़ जाती है। उन्हे हिन्दी आलोचना मे वाचन परम्परा का आग्रही नेता माना जाता है। गुरूजी पर श्री काशी विश्वनाथ की कृपा बनी रहे। वे स्वस्थ एवं दीर्घायु हो। यही हम सब की कामना है।
श्री मान नामवर महाशय को कई बार सुनने को मिला। बीएचयू मे यदा-कदा सेमिनार का आयोजन और नामवर जी स्टार वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। बीएचयू परंपरागत रूप से भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का प्रवाह स्थल रहा है। ऐसे प्रवाहमान सांस्कृतिक लहर मे तथाकथित प्रगतिशीलता के कंकड़-पत्थर फेंकने की वामपंथी बुद्धि तो कूट कूट कर भरी थी हमारे पूज्य गुरूवर में। उपर से काशी विश्वनाथ की नगरी। अगर वहां जाकर अगर मुहम्मद गोरी, गजनवी, बाबर,औरंगजेब और वो सभी आक्रांता जिन्होंने भारत की अस्मिता को तार तार किया, उनकी तारीफ की जाए, उनमे अच्छाइयों का दर्शन निर्लज्जता पूर्वक किया जाए तो मशहूर होने के चांसेज ज्यादा हैं। गुरूजी को पता नही कहां से मुगलो की खनकती तलवार मे हिन्दुओ की आर्तनाद की जगह लोकधुन सुनाई देता था। सारांश यह कि गुरु नामवर जी को बोलने के लिए कोई भी टाॅपिक दिया जाता उसमे अमेरिका, आरएसएस, ब्राह्मणवाद विलेन बनकर उभर आते। हां भारत की बहुलतावादी संस्कृति उनकी प्राथमिक चिंता थी जिसकी रक्षा बिना मुगलिया संस्कृति को पिरोए संभव ही नही थी। आरएसएस के हिन्दुत्व मे गुरूजी को हिन्दुस्तान की एकता खंड खंड मालूम पड़ती थी जिसे बचाने के लिए आइने अकबरी या बाबरनामा को आत्मसात करना परम आवश्यक था।हा, गुरू जी मुस्लिम आक्रांता मे नायकत्व की छवि ढूंढने को उतावले रहते। कभी-कभार तो ढूंढने मे असफल होने पर नई छवि ही गढ़ डालते। इस इरादे के साथ की पढ़ने वाला भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला होता देख धैर्य खोकर अनाप-शनाप बोले और फिर मिडिया मे इसे उग्र हिन्दुत्व के रूप मे पेश करें। फिर खुद को साहित्य मे बोल्ड एक्सपेरिमेंटल के तौर पर स्थापित करने मे आसानी भी होगी। गुरूजी जी वेद, पुराण, उपनिषद्, मानस आदि ग्रंथो का गहन अध्ययन किया है लेकिन उनकी व्याकुलता उस समय देखते ही बनती जब वो इन सभी ग्रंथो मे मुहम्मद साहब का कोई जिक्र न पाते। लगता ये सभी ग्रंथ ही अपूर्ण है और इसके साथ साथ सारा संसार भी। भारतीय वैचारिक धरातल का टेक्टोनिक शिफ्ट हो जाता अगर कही से भी हनुमान जी या कृष्ण जी हिन्दुत्व की किताब से न होकर किसी अरबी संस्कृति का कोई नाम होता फिर तो सेक्युलरिज्म और गंगा जमुनी तहजीब (पता नही इस का उच्चारण गुरु जी बारंबार क्यो करते थे।) का कुछ अलग ही रंग होता। इसका दर्द उनके चेहरे और वाणी से महसूस किया जा सकता था।लेकिन सेक्युलर तब्के को जीवनज्योति की आभा यही मंद पड़ जाती है। उन्हे हिन्दी आलोचना मे वाचन परम्परा का आग्रही नेता माना जाता है। गुरूजी पर श्री काशी विश्वनाथ की कृपा बनी रहे। वे स्वस्थ एवं दीर्घायु हो। यही हम सब की कामना है।

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