बचपन में घर के बड़े लोगों
की ही तरह मुझे भी हिंदुस्तान (अखबार) का बेसब्री से इंतज़ार होता था क्योंकि उसमें
बच्चों के लिए भी एक पन्ना रहता था. जिसमें कविता, कहानी, कार्टून और चुटकुले के
अलावे उपर के कोने में “प्रीत भैया” का बच्चों के नाम सन्देश और सुझाव भरा पत्र होता
था. जिससे प्रेरित हो कुछ–कुछ लिखने की इच्छा होने लगी.
2000 ई० में जब दसवीं की वार्षिक परीक्षा होने के बाद पिताजी
की लायी हुई रामायण–महाभारत आधारित कई किताबों को पढ़ा तो मन में एक रचनात्मक
विस्फोट हुआ और एक बड़ा-सा लेख लिखकर पैदल ही हिंदुस्तान के दफ्तर में पहुँच गया. उन
दिनों हिंदुस्तान में एक पन्ना धर्म–आध्यात्म का आता था. दफ्तर में लोगों ने मुझे
फीचर सेक्शन में भेज दिया. ग्राउंड फ्लोर में प्रिंटिंग प्रेस के दीवार से सटे
हालनुमा बड़े कमरे के दरवाजे पर पहुंचा तो देखा कि सामने की कुर्सी में हाफ शर्ट और
टोपी पहने साँवले रंग का एक दुबला–पतला आदमी अपने काम में लगा था. व्यस्त आदमी से
कुछ पूछने की बजाय मैंने कमरे में बैठे अन्य लोगों के पास जाना ज्यादा मुनासिब
समझा जो गप्प में लगे हुए थे. उन गप्पियों में से एक ने आलेख देखने के बाद दरवाजे
के सामने कुर्सी में बैठे टोपी वाले आदमी की ओर ही इशारा करते हुए कहा कि- “अवधेश
प्रीत” जी के पास चले जाओ वही यह सब देखते हैं.
प्रीत शब्द से मन
में हलचल मच गई कि– ‘कहीं ये बच्चों के पेज वाले प्रीत भैया तो नहीं हैं? फिर लगा
नहीं, वो तो बच्चों के प्रीत भैया थे, ये तो बड़ा आदमी है. उसमें भी इनका नाम अवधेश
प्रीत है’.
यूं ही विचारों में खोया
हुआ मैं अवधेश प्रीत जी के टेबल के पास पहुंचा तो वे मेरा लेख लेकर देखने लगे. फिर
ऊपर से नीचे देखते हुए पूछे –“कहां से लिखे हो?” जबाब में –“जी, मैंने खुद से लिखा
है. कुछ किताबें पढ़ीं हैं जिसमें मुझे कुछ बातें सामाजिक स्थिति से मेल खाती हुई
नहीं दिखी, इसलिए विरोध स्वरूप मैंने अपनी बात कही है.”
-“आपकी उम्र इन गहरी
बातों के लिए काफी छोटी है. इस पर बड़े-बड़े विद्वान लिखते हैं जो चीजों का खूब गहन
अध्ययन करते हैं, तथ्यों को समझते हैं और तब लिखते हैं....... जैसे कि जो आदमी
सिगरेट नहीं पीता है वह कैसे बता सकता है कि सिगरेट पीने में कैसे होंठ जलते हैं
और कैसे अंगुली? बिना अनुभव के चीजों के तह तक नहीं पहुंचा जा सकता है. ठीक है.
जाओ.” – उन्होंने अपनी बात रखी. मैं निराश हो वहाँ से वापस लौट गया.
उसके बाद जब मैं
बोरिग रोड (पटना) कोचिंग पढ़ने जाने लगा तो “अमृतवर्षा” सांध्य दैनिक का कार्यालय
दिखा जहां मैं अपनी कहानियां, आलेख और रपटें देने लगा. जिसमें मेरी पहली कहानी “रिश्ते”
प्रकाशित हुई थी. धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया. फिर जब पटना से “दैनिक जागरण”
का प्रकाशन शुरू हुआ तो वहां भी लिख-लिख कर डालने लगा. इन जगहों पर छपने के बाबजूद
मन नहीं मान रहा था क्योंकि हिंदुस्तान मेरे लिए चुनौती बन चुका था. सो एक बार फिर
हिंदुस्तान की ओर मुड़ा लेकिन इस बार अंदर जाने की बजाय बाहर में रखी पत्र-पेटी में
ही डालकर चला आता था. जो कि सम्पादकीय पेज के निचले हिस्से में छपने वाले आपके
पत्र में छपने लगा. साथ-ही-साथ अंग्रेजी में भी हिंदुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ
इण्डिया के लिए लिखने लगा.
वर्ष 2004-05 में, हिंदुस्तान में साहित्य का पेज एक नये रूप
में शुरू हुआ जिससे शहर के नये रचनाकारों को भी मौका मिला. वे अपनी कविता, कहानी
आदि भेज सकते थे. काफी लोगों ने तो इसी रास्ते पत्रकारिता-जगत में भी अपनी पहचान
बनाई और काफी आगे तक पहुंचे. मैंने भी अपनी कहानी “धर्म” छपने के लिए भेज दी. छपने
के बाद मैं वर्षों बाद अवधेश प्रीत जी को धन्यवाद कहने के लिए दफ्तर के अंदर गया
तो काफी कुछ बदल चुका था. ग्राउंड फ्लोर से हटकर फीचर सेक्शन एक बड़े-से हाल में
पहले तले पर चला आया था. उन दिनों फीचर सेक्शन में दर्जन भर से अधिक लोग हमेशा
प्रीत जी के निर्देशन में काम कर रहे थे. वे अक्सर नये लोगों को कुछ-ना-कुछ नया और
अच्छा करने के लिए प्रेरित करते दिख जाते थे. सबसे अच्छी बात देखने को मिली कि
प्रीत जी न सिर्फ साहित्य के पेज को देख रहे थे बल्कि सोमवार से शुक्रवार तक हर
दिन करियर, महिला, आध्यात्म आदि विषयों पर निकलने फीचर पेज की पूरी जिम्मेवारी भी उन्हीं
पर था जिसे वे सफलतापूर्वक सम्पादित कर रहे थे. उन दिनों प्रीत जी पटना
विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कुछ कक्षाएं भी लेने लगे थे. खैर, मैं उनसे मिला
और पुस्तक–समीक्षा, आलेख देते रहा और छपता रहा लेकिन कभी मैंने पुरानी मुलाकात का
जिक्र नहीं किया. इसी तरह जब एक दिन मेरा एक आलेख पूरे फ्रंट पेज में आ गया तो
मुझे अजीब सी खुशी और संतुष्टि मिली. लगा कि मैंने अपनी चुनौती पूरी कर ली.
उदासीनता के कारण धीरे–धीरे मैं पत्र–पत्रिका से विमुख हो अध्यापन के काम में जुट
गया. धीरे–धीरे कुछ वर्षों के लिए पटना से भी मैं बाहर चला गया.
जब अवधेश जी की
कहानियों को हंस आदि पत्रिकाओं में पढ़ने लगा तो उनका कथाकार वाला रूप सामने आया. कहानियों
में उनके विषय का चयन, शब्दों का प्रयोग और कहने की शैली ने मुझे बहुत प्रभावित
किया. उनकी कहानियां इतनी मार्मिक लगीं कि एक बार मैं लाइब्रेरी में ही रो पड़ा.
मुझे उस कहानी का नाम तो याद नहीं, लेकिन वो कहानी लोक कलाकार के बिखरते दाम्पत्य
जीवन पर आधारित था.
अगली बार मैं
हिंदुस्तान के दफ्तर में 2014
में “पगली का तौलिया” लघुकथा लेकर पहुंचा तो ऑफिस
का नज़ारा बिल्कुल ही बदल चुका था. अवधेश प्रीत जी भी सहायक संपादक बन चुके थे.
फीचर सेक्शन में लगा रहने वाला जमावड़ा कब और कैसे बिखर कर कहां चला गया पता नहीं.
अब इत्मीनान से बैठकर चाय–काफी पीते हुए उनसे काफी कुछ खुलकर बातें होने लगीं. उनको
और करीब से जानने का मौका मिला जैसे कि उन्होंने अपनी पढाई खत्म करने के बाद पटना एक
रिश्तेदार के घर घूमने के लिए आए. और धीरे –धीरे खगौल (दानापुर) में रहते हुए नाटक,
कला और साहित्य से जुड़ गए. पटना में इन्हें रोबिन शॉ पुष्प, विकास कुमार झा, और
सुबोध गुप्ता जैसे साहित्य और कला प्रेमियों का साथ मिला. और जब पत्रकारिता में
हाथ आजमाने की कोशिश की तो शुरुआत भी कला–संस्कृति से ही की. 1985 ई के आसपास ये पाटलिपुत्र टाइम्स से जुड़े और 1986 ई में जब पटना से हिंदुस्तान के प्रकाशन की शुरूआत
हुई तो वे इससे जुड़े और फरवरी 2016 में अपनी 30 वर्षों की नियमित एवं समर्पित सेवा से मुक्त हो
गए. लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आज की तारीक में भी उनसे कार्यालय के लोग दिशा–निर्देश
लेते रहते हैं. उनके मिलनसार और खुशमिजाज रूप को जानने का मौका कथा-समारोह,
लघुकथा-सम्मेलन और दूसरा शनिवार जैसे अन्य कार्यक्रम के बहाने मिला.
लघुकथा सम्मेलन की
वह घटना मुझे अक्सर याद आ जाती है जिसमें अवधेश प्रीत जी का एक विनम्र व्यक्तित्व देखने
को मिला. जब सभी आमंत्रित लघुकथाकारों ने अपने कथाओं का पाठ कर लिया तो उद्घोषक ने
अवधेश प्रीत जी को उन पठित कथाओं पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया. और
ज्योंहि उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि
लघुकथा का उन्हें विशेष ज्ञान नहीं है और वे अपने सीमित और व्यवहारिक ज्ञान के
आधार पर टिप्पणी करेंगें तो कुछ लेखक उग्र भाव से यह बोलते हुए बाहर जाने लगे कि –
“जिस आदमी को लघुकथा का ज्ञान नहीं. समझ नहीं. उस व्यक्ति की बात क्या सुनना? पूरे
आयोजन का कचरा हो गया.” लेकिन ज्योंहि ख्यातिप्राप्त लघुकथाकार सतीशराज पुष्करणा
ने बीच में ही रोकते हुए कहा कि “ये अवधेश जी का बड़प्पन है कि ये खुद को लघुकथा से
अनभिज्ञ बताते हैं. जबकि सच तो ये है कि स्थापित कथाकार होने से पहले इन्होंने
ढ़ेरों लघुकथाएँ लिखीं हैं और जब कभी मौका मिलता है हमलोग अक्सर बैठकर लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर बात करते
हैं. इसलिए आप इनकी बातों को एक बार सुने.” इसके बाद जब प्रीत जी ने लघुकथा के
विभिन्न कला और तकनीकी पक्षों पर बोलना शुरू किया तो पूरे हाल में सन्नाटा छा गया
और अंत में उनके लिए सिर्फ ताली बजने लगी और सभी उनके प्रतिभा को सलाम करने लगे.
सबसे अजीब है कि
प्रीत जी के सेवा-निवृति के बाद से मैं भी अब तक दुबारा हिंदुस्तान नहीं जा सका
जबकि कुछ लघुकथाएं, पुस्तक–समीक्षा और कुछ साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे हैं
जिन्हें मैं अब मेल से ही भेज दिया करता हूं.
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nice article
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