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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ (पदचाप के साथ-शंकरानंद): राजकिशोर राजन

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ
(पदचाप के साथ-शंकरानंद) : राजकिशोर राजन
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शंकरानंद एक प्रतिभावान युवा कवि हैं।उनकी पहली कवितासंग्रह 'दूसरे दिन के लिए' भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से प्रकाशित हुई।'पदचाप के साथ' उनका दूसरा काव्यसंग्रह है जो बोधि प्रकाशन से आई है।इस संग्रह को कई कई बार पलटा,कई कई बार पढ़ा और यह विश्वास गहरा होता गया की शंकरानंद अंतर्वस्तु और शिल्प के मामले में हमें निरंतर प्रभावित करते हैं और कई बार तो चकित कर देते हैं। शब्दों की मितव्ययिता और गहन भावबोध लिए इनकी कविताएँ ऐसी हैं जिन पर इस कवि के हस्ताक्षर हैं।इधर हिंदी में समकालीन और समकालीनता आदि पर जो बहस छिड़ी हुई है तथा भाषा,कहन,चेतना आदि को खंगाला जा रहा है तब पता चल रहा है कि वर्तमान में लिखना ही समकालीन होना नहीं है।आज मुहावरे और अंतर्वस्तु के मामले में भी कई कवि विगत हैं।शब्द और विषय इतने घिसे पिटे की अधिकांश कविताओं से कवि गायब हैं यानी कविता पर कवि का अपना हस्ताक्षर ही नहीं है।कहने का तात्पर्य यह की कविता में मौलिकता ही गायब है जो किसी कविता को कविता बनाने के लिए प्राथमिक कारक है।गौरतलब है कि वक्त के साथ समाज की भाषा भी बदली है और जनता से जुड़ा कवि उस भाषा से सायास नहीं जुड़ता वह उसी में साँस लेता है।मान बहादुर सिंह ने सही कहा है कि भाषा ,कविता का डी एन ए है और वह भाषा ही है जिससे हम कवि के संसार के बारे में जान सकते हैं।शंकरानंद की काव्यभाषा और काव्यचेतना समकालीन है।समय के साथ होना एक कवि के लिए बुनियादी शर्त है,बाकी शर्तें इसके बाद हैं।इस कवि की भाषा में बलात् और सायास पच्चीकारी नहीं है, देसज शब्दों की बहुलता है न तत्सम शब्दों की,ज्यादा से ज्यादा उसने तद्भव को साधा  है।लड़कियां(पृ.107)शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें--

कहीं तो जरूर है वसंत
जिसके कारण घर चहक रहा है

इसी प्रकार की भाषा को कवि ने अपनी कविताओं में साधा है जिसमें न ज्यादा चाक चिक्य है,न उलझाव और न असहजता।सधी और कसी हुई भाषा जरूर है  पर इतनी भी नहीं जैसे नट टंगी हुई रस्सी पर करतब दिखाता है।इस स्वभाव के कारण ही कविताएँ संप्रेषित होती हैं और अमूर्तन का शिकार होने से अपने को बचा लेती हैं।इन दिनों यह प्रचलन में है कि कई कवि सायास शब्दों का पहाड़ खड़ा करते हैं और आप बारम्बार उस पहाड़ पर चढ़ें और उतरें पर कविता कामिनी के दर्शन न होने हैं।और अंत में वही होता है,आप आगे बढ़ जाते हैं।यहाँ सिर्फ कवि नहीं चुकता ,कविता भी एक मौका खो देती है।शंकरानंद की कविताएँ भाषा में कैद हो कर नहीं रहतीं अपितु वे भाषा का अतिक्रमण करती हैं।संग्रह की एक कविता है'बन रहा है(प,101)यह कविता दरअसल ,हर पल परिवर्तन के परम् सत्य को रेखांकित करती है।हर पल कुछ बन रहा है,कुछ नष्ट हो रहा है परंतु जीवन है कि पुनर्नवा हो रहा है।यानी परिवर्तन के बीच भी एक अनुशासन है,व्यवस्था है जो अपना काम कर रही है-----

कोई आकाश बना रहा है
कोई पंख
कहीं धूप पक रही है
कहीं गल रही है रात
कोई पत्थर को पानी बनाता है
कोई राख को चिंगारी

जीवन की तमाम उलझनों,दुःख दर्द और नाउम्मिदियों के बीच भी
कवि उम्मीद की रेख देख पाता है।यथार्थ को पहचानने और कविता में ढालने के लिए जो समझदारी और हुनर की जरुरत पड़ती है उसे साधने में कवि निरंतर सचेष्ट है।अपने तेवर और कहन में उसकी कविता समकालीन कविता की अभ्यस्त सरंचना के अंतर्गत है।इसके दो परिणाम हुए हैं-प्रथम, की कवि शब्दों को साधने और मितव्ययिता बरतने में काफी हद तक सफल हुआ है।इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में शंकरानंद ने भाषिक प्रयोग के मामले में  जिस संयम और अनुशासन का परिचय दिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए और कवि से हमारी उम्मीदें बढ़ जाती है।एक कविता (फूंकना,प-112)का उदाहरण लिया जा सकता है----

लौ जल रही थी दीये की
उसे बुझाना था

वह फूंक रहा था बार बार
लेकिन लौ जलती रही
दीया अपलक था

इस कविता में लौ को बुझाने के लिए यानी हमारी उम्मीदों,आशाओं को बुझानें के लिए निरंतर कोशिशें होती रहीं परंतु लौ जो मनुष्य की जिजीविषा  का प्रतीक है,जीवन का पर्याय है उसे कोई बुझा न सका, सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ।लौ जलती रही ,दीया अपलक रहा।अगर उम्मीद न रहे तो फिर बचेगा क्या!यह कविता बड़े सलीके से नपे तुले शब्दों में मनुष्य की आदिम कथा कहती है।हर कवि के पास कुछ विलक्षणता होनी चाहिए और जब आप इस कवि की कविताओं की यात्रा करेंगे तो इसे सहज ही रेखांकित कर सकते हैं।पर,यही मितकथन और शिल्प सजगता कई बार किसी कवि की सीमा भी हो जाती है।इस संग्रह में  कुछ कविताएँ उसी शिल्प सजगता के कारण कमजोर और प्रभावहीन भी हो गयी हैं।क्योंकि शिल्प कविता में शिल्पहीनता की हद तक बारीक भी हो सकती हैं और इतना भारी कि कविता उसके  नीचे दब कर रह जाए।

           इन दिनों हिंदी कविता में गांव की उपस्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है और यदा कदा जो गाँव दीखता भी है वह सतही है।गांव के भीतर भी गांव होता है जैसे शहर के भीतर शहर। शंकरानंद की कविताओं में जो गांव है वह वास्तविक गांव है।आमतौर पर गांव के चरित्र को समझे बिना हम गांव की बात करते हैं।आज बड़े शहरों में रहने वाले कवि,लेखक भी गांव जाते हैं पर एक पर्यटक की तरह।उनका गाँव नकली होता है उनका ग्रामीण बोध अवास्तविक होता है।कवि स्वयं बिहार के कोसी क्षेत्र का निवासी है इसीलिए वह गांव के भीतर गांव को देखता है।सिर्फ देखता ही नहीं वह जीता भी है।इस संग्रह में कई कविताओं की पृष्ठभूमि गांव है।'जिद'कविता  अपने टटके बिम्बों के साथ मनुष्य की अदम्य इच्छा,जिजीविषा और अंतत उसके जीने के लिए जिद को  जिस ताकत के साथ उठाती है वह कविता को  अंततः  पुनर्नवा करती है।यहां वही चिरकालिक दुःख और अभाव है जिसने जीवन को ताकत दी है-

जो कांच धूप रोकती थी
उसे एक बच्चे  ने पत्थर मार कर तोड़ दिया

आज इस देश में किसान और किसानी की स्थिति हृदयविदारक है,किसान मर रहे हैं और पूरा देश मर्सिया गा रहा है।पोखर,तालाब,कुएं सभी सूख रहे हैं।ऐसा लगता है कि इस देश को अब इनकी जरुरत नहीं रह गयी है।अमेरिकी आवारा पूंजी  जब एक तरफ सब कुछ तहस नहस करती जा रही है हम जात पात और धर्म की राजनीति में जी रहे हैं।यह कैसी विडम्बना है कि अन्नदाता किसान अब स्वयं अन्न के लिए बड़े बड़े शहरों की तरफ भाग रहा है।आप कभी जनसेवा एक्सप्रेस में बैठ कर देखिये यह देश किधर जा रहा है।शंकरानंद की 'भाव'नामक कविता बड़ी संजीदगी से उस करुण दृश्य को शब्दों के माध्यम से जीवंत करती है------

सबसे सस्ता खेत सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज सबसे सस्ती फसल
और उससे भी बढ़ कर भी सस्ता किसान

और यह भी की-
जिसके मरने से  किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फांसी नहीं होती

शंकरानंद की ऐसी कविताओं में जो बिम्ब उभरता है वह भरोसे को भरोसा देता है।कवि का यह परिवेश उसे जीवन देता है।कविता को जीवन जैसे कवि के जीवन देता है।शंकरानंद की इन कविताओं को पढ़ते त्रिलोचन की याद हो आती है जब वे कहते हैं-
जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है,तप है,नहीं चाय की चुस्की

यह कवि कविता  में कागज की लेखी नहीं लिखता बल्कि आँखिन देखी लिखता है।किसी कवि को समझने के लिए भाषा और बिम्ब महत्वपूर्ण उपकरण हैं।इन दो उपकरणों के आधार पर अगर  कोई इस कवि को समझे तो वह इतना समझ लेगा की यह कवि जमीन से गहराई तक जुड़ा कवि है।उसने अपनी शैली  आप गढ़ी है और उसकी कविताओं में मौलिकता है।उसका अंदाजे बयाँ अलहदा है।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

राजकिशोर राजन की कविताएं


कवि राजकिशोर राजन की कविताओं में एक अलग आकर्षण है. वे कविताओं में यथार्थ की विद्रूपता को व्यंग्य के रूप में रखने से भी नहीं चुकते हैं. चाहे प्रसंग कुछ भी क्यों न हो उसकी प्रासंगिकता जरूर बनी रहती. प्रस्तुत कविताएं कवि, उसके काव्य संसार और उसके व्यक्तिगत जिंदगी की जद्दोजहद पर केंद्रित हैं. पढ़ते हैं राजकिशोर राजन की कविताओं को :-



ख्वाब में मकबूल

मकबूल दर्जी बन सकते थे
पर लाल खाँ को अंगूठा दिखा कर ऐसे भागे
कि कभी लौटे ही नहीं

मकबूल परात में घर भर के लिए आटा गूंथते थे
खाने-पीने के बेहद शौकीन
वे एक हलवाई भी बन सकते थे
पर किसी मामूली दुकान को
वीथिका में बदलने का हुनर उन्हें पता था
फिर कैसे बनते हलवाई

मकबूल को याद नहीं था माँ का चेहरा
पर वे नाप लेना चाहते थे दुनिया का भूगोल
उनकी तसवीरों में लेता था इतिहास रुक कर साँस
फिर कैसे होता उन्हें पृथ्वी से विराग

पोस्टर बनाते चलचित्र के मायानगरी में
वे चाय में शक्कर की तरह घुल सकते थे उसकी माया में
पर आकाश का तसवीर बनाते
उन्हें मालुम था अपनी आँखों में उसे थामने का हुनर
फिर कितने दिन बनाते रहते पोस्टर

गरमी के दिनों में जब कोलतार की सड़कें पिघल रही होतीं
अपने नंगे पैरों को आराम देने के लिए
वे विलम भी सकते थे किसी एकांत में
पर हुसैन को घोड़ा पसंद था
मांडू, उज्जैन पसंद था
ढूँढे नहीं मिलता, उनकी कल्पना का छोर

जैसे तितली देख लेती है एक रंग में सैकड़ों शेड्स
वे अंधेरे में ढूँढ रहे थे अँधेरे को
प्रकाश में प्रकाश को
अपने अस्तित्व के पार

वे कैनवास के सामने सोचते जब आँख
बन जाया करती थी आँख
सोचते कर्णफूल और वह टँग जाता कानों में
जब वे सोचते पैरों पर खिले महावर के बारे में
सलज्ज मुसकान से वह उन्हें आमंत्रित करता स्वयं ही

कई-कई जेबों वाली कमीज पहने
किसी गली या नुक्कड़ पर
वे आज भी मिल सकते हैं नंगे पैर
क्योंकि उनको जानने वाले कहते थे
चकरी थी उनके पैरों में
और जिसके पैरों में होती है चकरी
वह नहीं रह सकता टिक कर कहीं भी ज्यादा दिन

वैसे भी, सिर्फ उनके ख्वाब में ही नहीं थी तसवीर
हर तसवीर के ख्वाब में हैं मकबूल ।




काव्य-संसार

आपने उनकी बात सुनी
तो सुनते रह जाएंगे
आपने अपनी बात कही तो
वे बुरा मान जाएंगे

यहाँ जो जहां है
ठहरना तो दूर
किसी और को देखना भी
मुनासिब नहीं मानता

ऐसे मोहमुक्त, निर्दयी संसार में
मैंने एक प्रेम कविता लिखी
और हाथ में लिए
घूम रहा हूँ, बरसों से
गाँव-गाँव, शहर-शहर
दिल्ली और पटना
इसे कोई पढ़नेवाला नहीं
कोई सुनने वाला नहीं

हद तो यह कि, कविता की नायिका
वह प्रेमिका भी मेरी नहीं रही
जिस दिन सुनाई थी उसे अपनी कविता
मुझ पर लानतें भेजती, पैर पटकते चली गई
यह कहते हुए कि, उसके प्रेम को मैंने
बना दिया किताबी, कर दिया जगजाहिर
मेरे जैसा आदमी क्या खाक करेगा प्रेम

काव्य-संसार के आचार्यगण, चिंतकों
लेखक-कवि, संपादक-गण
कम से कम आप
मेरी कविता तो सुनें ।


एक कवि को सुनते हुए

चीखने से लेकर स्वगत-कथन तक
सुनना चाहता था कवि को
देखना चाहता था शब्दों की धार
कर लेना चाहता था इकट्ठा
उन कविताओं के मर्म
जो थीं हमारे वक्त की सबूत

उसकी बोली, हँसी-मुस्कुराहट, सोच-विचार
किसी नये इलाके में पहुँचाते थे हमेशा
उसका मानना कि गुलाब के फूल
और कवि मन के बीच
पारस्परिक अटूट होता संबंध
कि उखड़ जाए एक पंखुड़ी भी
तो बिखर जाए फूल
इसलिए जीना ही चाहिए
कवि को, कवि का जीवन
कि कलि वृंत पर चटखती रहे

जैसे हुलसता है गुलाब कँटीली डाल पर
कवि मर्त्य में अमर्त्य का फूल बन महकता है
हमेशा से रहे दुःसमय के विरूद्ध
अंततः कवि के जीवन से ही
कविता को मिलती जीवन

इस कवि को सुनते जाना
कैसे सुना जा सकता समय को
सिर्फ कान से नहीं
लाखों-लाख रोम कूप से ।

प्रतिकार

बुरे दिनों में लिखी कविताओं को
अपनी डायरी में देखा
अच्छे दिनों में
तो लगा इस डायरी को
कहीं रख देनी चाहिए
अलमारी या किसी बक्से में तहाकर
नहीं तो देखूँगा इसे जब-जब
सुख की चाय में
घुल जायेगा दुःख का नमक

बहुरे हैं दिन बरसों बाद
जब तरक्कीपसंद दुनिया के साथ
चल रहा हूँ साथ-साथ
पहले मुझे दिखता था पेड़
उसके हरे-पीले पत्ते
अब मैं ढूढ़ता
उनमें सैकड़ो शेड्स

अब लिखूँगा भी तो
हकासल-पियासल कविताएं नहीं लिखूँगा
कला की हर बारीकी
उसके रूप-रंग-आकार
और अक्षर-अक्षर का रखूँगा ख्याल

सपाटबयानी की हद तक लिखी
जवानी के दिनों की जवान कविताओं को
अब देखते हुए भी लाज लगती है

मगर वे कविताएं
प्रतिकार में, पहले से तैयार थीं
डायरी को कहाँ-कहाँ तो न छुपाया
पर उसमें लिखी हर कविता
मुझे शब्दशः याद थी ।


एक संतुलित आदमी के नाम

वे न तो कभी क्रोधित होंगे
न भरेंगे कभी अँकवारी में
न देंगे कभी सीधा-सपाट उत्तर
न स्वीकारेंगे मन-प्राण से

वे जब भी मिलेंगे
चकित कर देंगे, रंग-ढंग से
आपको लगेगा
इस आदमी का साथ है
पिछले जन्मों से

उनका संतुलन
आपको अन्वेषक बना देगा
आपकी उम्र कट जायेगी
यह जानने में
कि वे दोस्त हैं या दुश्मन ।


विषाद

उसने तारीफ की
कलाईयां में जँचती कत्थई चूड़ियों
पाँवों में खिले महावर
दमकती लाल बिंदी
चंपई रंग की साड़ी
और जामुनी नेल पॉलिस की

उसने तारीफ की
नये फैशन के चप्पलों से लेकर
उँगलियों में पहनी सलीकेदार अँगुठियों तक की

कानों में झूलते झुमकों पर तो
वह मुग्ध ही हो गया

मगर यह नहीं कहा

कि तुम सुन्दर लगती हो ।

सोमवार, 26 जून 2017

समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य: राजकिशोर राजन की कविता के सन्दर्भ में - सुशील कुमार

युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है। पढ़ते हैं समीक्षक सुशील कुमार  की टिप्पणी को:-


राजकिशोर राजन



समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य
[राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए]       - सुशील कुमार


राजकिशोर राजन की कविताओं में जीवन के शाश्वत मूल्यों को बचाने के बजाए विघटित होते जीवन को बचाने की अंदरुनी छटपटाहट ज्यादातर दृष्टिगत होती है। आप देखेंगे कि मूल्यों के निरंतर अवगाहन से कविता प्रायः उपदेशपरक और आग्रहशील होने लगती है जो उसे कमजोर बनाती है पर राजकिशोर राजन कविता के इस क्रियाव्यापार से साफ बच निकलते हैं और मूल्यों के अन्वेषण पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, उनका सारा प्रयत्न सीधे जीवन के सत्यान्वेषण पर केंद्रित होता है। यही समकालीन कविताओं की पहचान है जहाँ लोक का आंतरिक यथार्थ और उसकी संचेतना जीवन-मूल्यों के बजाए सीधे परिवेश से ग्रहण करता है जिससे क्षण की तह की सच्चाई कविता में एकदम टटका दिखती है। इसके बावजूद कविकर्म के कार्यसाधना की यह विडम्बना है कि जो उसके जीवन-पर्यन्तछूट जाता है, वही बची हुई अप्रकाशित पांडुलिपियां ही उसके मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं, देखिए राजकिशोर राजन की कविता अप्रकाशित का यह अंश कुछ आलोचक, विचारक, काव्य-प्रेमी मानते हैं/ उस कवि को समझने के लिए/ महत्वपूर्ण है उन्हें पढ़ा जाना /चुकि यही होता आया है अब तक/ प्रकाशित से ज्यादा/ कवि रह जाता है अप्रकाशित । राजन की एक अन्य कविता भगदड़ में छूटी हुई चप्पलेंमें कवि की संवेदना मन को कुरेदती हुई यथार्थ के उस सिरे को जा पकड़ती है जहाँ बहुत कम कवियों का ध्यान जाता है।माता रोएगी पुत्र के लिए/ पुत्र पिता के लिए/प्रमिकाएँ प्रेमी के लिए और पत्नियाँ पतियों के लिए/पर कोई नहीं रोएगा/ गदड़ में छुटी हुई चप्पलों के लिए। - यह पाठक के भीतर जो एब्सट्रेक्ट भाव रचती है वह परिवेशगत यथार्थ के वास्तविक संधान का ही प्रतिफलहै। टूटी हुई चप्पलें कितने बड़े फलक की कविता है,देखने के लायक है! क्योंकि दुर्दिन में महज अपने-अपने सम्बन्धों तक सीमित रहकर हमारी आत्मिक सम्पदा संकुचित रह जाती है, इस अर्थ में यह कविता यहाँ हमारे हृदय को विस्तार देती दिखती है।उपर्युक्त दोनों कविताओं में कवि की चिंता मूल्यगत न होकर परिवेशगत है  है।
     परम्परा, मिथक और इतिहास में जो सुहै उसे समय की घानीपेरकर उससे मूल्य-तत्व को उत्पन्न करता है पर जब मूल्यों को कवि इतना कसकर पकड़ ले कि परिवेश उसकी मुट्ठी से फिसल जाए तो वह लोक के यथार्थ से दूर होने लगता है। उसके आसपास और पूरी दुनिया में जो चिरनवीन क्षण की तह में घटितसत्य है (जिसे हम कविता का खनिज कहते हैं) उसकी पकड़ से बाहर जाने लगता है। परिवेश से दूर जाने की यह पलायन-वृति हम उन कवियों में अधिक देखते हैं जिनमें लोक के सत्य को भोगने का साहसऔर संघर्षनहीं होता। उनकी मनोगत दशाएँ अंतर्मुख होती हैं और उकी काव्य-प्रक्रिया अंदर से बाहर की ओर गमन करती है,(बाहर से अंदर की ओर नहीं)। उनमें कमरे में बंद होकर कृत्रिम वस्तुओं और किताबी मूल्यों का अवगाहन कर बुर्जुआ-सौंदर्य को रचने की आदत-सी पड़ जाती है जहाँ से साहित्य में रूपवाद का जन्म होता है। आप देखेंगे कि छायावादोत्तर काल में पूरा आरम्भिक प्रगतिशील साहित्य ही मूल्यों की आड़ में परिवेश से कहीं न कहीं कटा हुआ है। इसका प्रमाण यह है कि तारसप्तक के अधिकांश कवियों ने 'नई कविता'या प्रयोगधर्मी कविता' के रूप में साहित्य-जगत को लोक से कटी हुई, निहायत ही आत्मबद्ध-व्यक्तिपरक कृतियाँ दी जिसकी विशद् चर्चा करना इस आलेख का वर्ण्य-विषय नहीं। पर भारतीय साहित्य ही नहीं, पूरी दुनिया के चिंतक-लेखक अब यह महसुस करने लगे हैं कि यथार्थ के अंत:सूत्र खोलने में परिवेश का देखा-सुना-भोगा सत्य ही कविता के असल काम की चीज है। मूल्य परिवेश की अभिव्यक्ति का साधन है, वह साध्य नहीं हो सकता। इतिहास और मिथक भी परिवेश के द्वन्द्व से ही रगड़ खाकर कविता में अपनी रूपाभा और चमक पाते हैं। इसका अन्यतम उदाहरण राजकिशोर राजन जी की कविता-पुस्तक कुशीनारा से गुजरतेहै जिससे गुजरना भारतीय मिथक-मूल्यों के एक अंध-पथ से गुजरना नहीं, बल्कि परिवेश के उस विस्तार से गुजरना है जिसमें जीवन और चेतना की मानवीय उपस्थिति दीप्त है। युवा कवि राहुल झा ने राजन के इस संग्रह की कविताओं पर इस बावत एक जगह बड़ी उल्लेखनीय बात कही है कि भारतीय मनीषा के अस्तित्वगत चिंतन की महायात्रा में 'बुद्ध' की पूर्णकालिक उपस्थिति दरअसल जीवन के संबुद्ध एकाँत और विरोधाभासी संसार के भीतरी यथार्थ से सीधा औसहज साक्षात्कार है। राजकिशोर राजन की कविता की धार में पँखुड़ी-सी तैरती दार्शनिकता बुद्ध के जीवन और उनके प्रगल्भ छवि को एक अद्भुत अर्थ देती हुईदिखती है,शायद इसीलिए उनकी कविताएँ जिन जगहों, चीज़ों, पात्रों के बीच से गुज़रती हैं उनके गहरे मर्म भी साथ लेकर चलती हैं और वह तथागत की संबुद्ध महायात्रा की ज़मीन पर बीज की तरह पड़ती हैं और अंततः अपना एक विशिष्ट यथार्थ पाती हैं।...  और बेशकउनकी कविता इतिहास और यथार्थ के बीच का एक स्थगित पुल हैऔर यह पुल इधर या उधर की राह नहीं हैबुद्ध की सम्यक्-संबुद्ध महायात्रा पर उनकी ये सारी कविताएँ दरअसल हलचल के भीतर की स्थिरता को देखने की एक भरपूर कैफ़ियत है। इन कविताओं को कवि राहुल झा का देखने का जो तरीका है उसमें परिवेशगत मूल्यों के प्रति उनकी गहरी अंतर्दृष्टि और आग्रह है जो इस संग्रह की कविताओं की काया में प्रवेशकर उनमें उन लोकगत तत्वों को ढूंढता है जो कवि राजकिशोर राजन को परिवेश के आत्मसंघर्ष से हासिल हुआ है। परिवेश के साथ मूल्यों का यह घर्षण ही इनकी कविताओं में प्राण फूँकता हैवरिष्ठ कवि और लोक-चिंतक विजेंद्र का काव्य-सौंदर्य संबंधी चिंतन भी इन्हीं बातों को लेकर कविता-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है जिसे वे लोकधर्मिता के विस्तृत फलक से जोड़कर काव्य-मूल्यों को उसीमें अंतर्भूत कर देते हैं अर्थात् उनके काव्य-संसार में मूल्य परिवेशगत है, उससे अलग नहीं। कथाकार स्व. कमलेश्वर की किताब नई कहानी की भूमिकासे भी यह बात समझ में आती है कि कथ्य के यथार्थ-अन्वेषण में कहानी और उपन्यास पर भी परिवेश संबंधी उपर्युक्त बातें उतनी ही शिद्दत से लागूहोती हैं।
     हर कवि को परिवेश और मूल्य के बीच के इस अन्तर्संघर्ष को जानना और समझना चाहिए। इसे जाने-गुने बिना कोई कवि सही अर्थों में समकालीन नहीं हो सकता क्योंकि समकालीन यथार्थ को केवल मूल्यगत काव्य-वस्तु से समझना-परखना चीजों को दूर किसी टीले पर बैठकर दूरबीन से देखने जैसा है, उसके पास जाकर नहीं ।
     देखा जाए तो आलोचना और कविता का भारतीय चित्त तुलसी-सूर के काल से ही नहीं, बल्कि हिन्दी के उद्भव-काल से ही शाश्वत मूल्यों और परंपराओं के प्रति आग्रहशील रहा है लेकिन जैसे ही कविता साठ के दशक से आगे आई, वह अपना पुराना चोला तेजी से उतारने लगी, कविता की मुक्ति-प्रक्रिया में उसके रूप और कथ्य में ही नहीं, उसकी भाषा में भी अविश्वसनीय परिवर्तन दृष्टिगत हुए। इससे नई कविता में शाश्वत मूल्यों की आग्रहमूलकता न केवल खंडित होने लगी, बल्कि बहुत हद तक इन मूल्यों के प्रति अस्वीकार-भाव भी आने लगे। निरंतर बदलते परिवेश में आदमी के अस्तित्व-संकट के रूप और संघर्ष की प्रकृति भी पहले से भिन्न हो गई। जीवन-संघर्ष के सामने उन मूल्यों की अमरता को एक प्रकार से धक्का लगने लगा जिसे आदिकाल से प्रगतिशील साहित्य तक महाकवियों और मनीषी-आलोचकों ने रच रखा था, अथवा कहें तो पूरे विश्व में आदर्शवाद को यथार्थवादने समय की चादर से ढँक लिया। इसलिए जीवन-मृत्यु के सिवाय अब और बातें उतनी शाश्वत और टिकाऊ नहीं रही। परिवेश ने पुराने मूल्यों को धीरे-धीरे नए और आधुनिक मूल्यों में बदलना शुरू कर दिया। समकालीन कविता के मूल्यांकन की दृष्टि से कवियों और आलोचकों का यह साझा नया परिवेश जितना विवादास्पद और उत्तेजक है उतना ही महत्वपूर्ण और रचनात्मक, जो समकालीन हिन्दी कविता की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। कवियों के नई पीढ़ी ने एकदम नंगी और बेलौस आवाज और खुरदुरी भाषा में परिवेश के यथार्थऔर अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करना शुरू किया जिन पर अखबारीपन, रिपोर्ताज, गद्यमयता, सरलीकरण, सपाटबयानी, लयहीनता आदि केतरह-तरह के आरोप लगने लगे लेकिन बकौल नामवर सिंह वर्तमान की सही पहचान, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और अप्रतीकी अभिव्यक्तिके कारण वह सार्थक हुई। कहना न होगा कि बिम्ब और प्रतीक ही एक मात्र रचनात्मक माध्यम नहीं है नंगे तथ्यों का नाटकीय उपयोग भी उतना ही रचनात्मक है’’ (कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 206)। लेकिन लोकधर्मी परंपरा के अग्रधावक कवि-चिंतक विजेंद्र (प्र. सं. कृति ओर) ने इसके उलट, लोकधर्मी सौंदर्यशास्त्र के आख्यान में अपना तर्क देते हैं कि कविता के सौंदर्यशास्त्र में यह बात प्रमुख है कि हम किसी भाव को कितना संश्लिष्ट बना पाते हैं। जीवन की कोई भी क्रिया सामान्य होकर भी कविता में संश्लिष्ट रूप ले लेती है। बिंब उसी संश्लिष्ट भाव का मूर्तन है। यही वजह है कि कविता बिना बिंब के सतही और इकहरी बनी रहती है। भाषा के चमत्कार और वाग्मिता से संश्लिष्टता पैदा नहीं होती। वह होती है क्रियाशील जीवन, प्रकृति और समाज को गहराई तक समझने से। फिर भावों की संश्लिष्टता तभी आती है जब हम अपनी सामान्य संवेदना को बुद्धिगत बनाकर उसे पुनर्गठित कर लेते हैं। या कहें जब विचार भावमय हो जाता है। यही काव्य-रस है। कविता के सौंदर्य की सहज प्रक्रिया भी। यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप, शिल्प, लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। पर यह सब कविता में घुलमिल कर ही होता है। बाहर से कुछ टाँका या थोपा नहीं जाता। आदि कवि बाल्मीकी यही कर रहे हैं।‘’(सौंदर्यशास्त्र: भारतीय चित्त और कविता, पृ. सं. 80)। कविता में संश्लिष्ट भावों की मूर्तनता, विचार की भावमयता, काव्य-बिंबों और प्रतीकी अभिव्यक्ति को लेकर दो परस्पर विरोधी स्थापनाओं का यह परिणाम रहा कि जनधर्मी कविता के अंदर दो अलग-अलग प्रवृतियाँ सामने आईं। एक तो सपाटबयानी की ओर मुड़ गई जो रुखड़ीऔर लगभग बिम्बरहित भाषा में परिवेश के आंतरिक यथार्थ को व्यक्त करने लगी और दूसरी, बिंब वाली लोकधर्मी कविता-धारा में। (लेकिन लोकधर्मिता के कवि भी जाने-अनजाने बिम्ब-रहित गद्य-कविताएँ खूब लिख रहे हैं)। हालाकि विजेंद्र जी ने यह स्वीकार किया है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप,शिल्प,लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। लेकिन उनकी पक्षधरता काव्य-बिंब की ओर है। यहाँ यह महसुस किया जा सकता है कि विजेंद्र जी का परिवेशकाव्य-बिंबों से बना वह सक्रिय-सचेतन जन (अभिजन नहीं) का लोक है जो इंद्रियबोध की राह से होकर गुजरता है अर्थात उनकी कविता की दुनिया दृश्य-श्रव्य-स्पर्श-गंध से प्रतिकृत और प्रकृति के धूप-धुल-ताप-जल-रश्मि-वायु आदि उपकरणों से युक्त है जबकि नामवर सिंह सापेक्ष स्वतन्त्रताके साथ कविता की एक स्वायत्त दुनिया रचने की वकालत करते हैं और कोई भी सेंसर लगाने के पक्षधर नहीं हैं। उनके इस खुलेपन और उदारवाद आलोचना-दृष्टि से जहाँ एक ओर जनधर्मी कविताओं के विकास को व्यापक पाट मिला, कविता के नए डाइमेंशन्सका उदय हुआ, कविता की सपाटबयानी शैली में उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन हुआ वहीं दूसरी ओरकविता में रूपवादी झुकाव और बुर्जूआ-सौंदर्य को भी तवज्जो मिली जो स्वभाव से लगभग अभिजनवादी है यानि कविता के अपने प्रतिमान-पाश में ही नामवर जी ने कविता के विष-तत्व भी छिपा रखे हैं। अपने प्रतिमान के द्वितीय संस्करण की भूमिका में इस पर उन्होंने जो स्पष्टीकरण दिए हैं उसे पढ़कर यही लगता है कि रूपवाद को कविता के प्रतिमान में अभिव्यक्ति जानबूझ कर नहीं दी थी। कविता में मूल्य की प्रासंगिकता पर गहरी बात करते हुए आगे कहते हैं कि निसंदेह किसी कविता का सिरजा हुआ संसार ही उसका मूल्य है किन्तु उस मूल्य की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर है कि वह सिरजा हुआ संसार कितना वास्तविक है अथवा वास्तविकता के बारे में हमारी समझ को कितना गहरा और कितना समृद्ध करता है, हमारे आसपास के संसार को अर्थ प्रदान करने में ही किसी कविता के अपने संसार की सार्थकता है। वास्तविकता की इस अर्थ-भूमि पर ही मूल्यों का सच्चा संघर्ष होता है।’(कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 217)। यहाँ सिरजा हुआ संसारका मतलब कवि के परिवेश यानि कविता-लोक से है। स्पष्टतः उनके परिवेश का दृष्टिकोण विशुद्ध यथार्थवादी है और मूल्यका खनिज भी वह वहीं से लेते हैं।  उसमें बिंबों-प्रतीकों कामहत्वपूर्ण स्थान नहीं। कविता में बिंबों को लेकर उनकी चुप्पी से उनकी अप्रतीकी अभिव्यक्तिकी पक्षधरता साफ झलकती है।तबसंतोष की बात यह है कि इन दोनों विपरीत ध्रुवों की स्थापनाओं का लक्ष्य सर्वदा एक ही रहा है: वह है जनधर्मिता।
     अगर इन स्थापनाओं के मध्य नब्बे के दशक से आगे समकालीन कवियों के कविताओं को रखकर बात करें तो यह साफ झलकता है कि उनके काव्य-संसार कापरिवेश न तो केवल काव्य-बिंबों और प्रतीकों से बना है न मात्र सपाट शैली की अप्रतिकी अभिव्यक्तिसे। सच्चाई तो यह है कि कोई भी कवि न पूरा सपाट होताहै, न पूरा बिंबों का धनी। सबमें न्यूनाधिक दोनों बातें पाई जाती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अभी लोकधर्मी प्रतिमान के अंतर्गत ये वर्जनाएँ या सेंसर्स सक्रिय हैं जो जनधर्मी रचनाओं की सही और निष्पक्ष समीक्षा से आलोचकों को रोक रही है। फिर भी इन वर्जनाओं की बिना परवाह किए नब्बे के दशक से अब तक के लोकधर्मी कवियों ने जो कविताएँ रचीं, वे अपने रूप, कथ्य, अभिव्यक्ति के ढंग और उसकी भंगिमा, अंतरलय व बनक, सरोकार की गहराई व व्यापकता, और सबसे बड़ी बात कि जनसंघर्ष की लहक के कारण जनधर्मी कविताओं में शुमार हुई हैं। इनमें एक बेहद महत्वपूर्ण नाम है – राजकिशोर राजन जिनकी कविताएं इस आलेख के केंद्र में है।    
     राजकिशोर राजन की कविता में जब मिथक कवि के परिवेश में अपना स्वरूप ग्रहण करता है तो वहाँ भी यह बात साफ तौर पर घटित होती है,“कुशीनारा से गुजरतेसंग्रह की पहली कविता कला और बुद्धको देखिए, सौंदर्य संधान में किसी प्रतिमान की आवश्यकता नहीं पर मन के बीहड़में प्रवेश करती है – ‘सौंदर्य तो पात-पात में/क्या देखना पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण/ऊपर-नीचे/वह नित परिवर्तित सौंदर्य/ है कण-कण में विद्यमान/वही सत्य का आधार/जिसका, न आर-न-पार/जो कर लेता/अपने हृदय में/उस अप्रतिम सौंदर्य का संधान/कला करती उसी का अभिषेक/करती उसी का सम्मान/जब तक, इसका ज्ञान नहीं/तब तक,सकल मान-अभिमान। -मिथ का सोना कवि के परिवेश की भाँथी में गलकर वर्तमान के द्वंद्व से कितना टकराता है और दमकता है, देखिए बैरकविता का एक अंश - परसों ही, एक पड़ोसी ने मुझे छला था/उसके बाद देर तक/मैं क्या-क्या सोचते गला था...क्यों नहीं लौटा दिया उसे, जिससे लिया/बैर से, स्वयं को भरता रहा। -  यह कविता अपने कथ्य में जितना प्राचीन है, भाव में उतना ही अर्वाचीन अर्थात क्षण का सूक्ष्म निरीक्षण। जगत के बैर- भाव का तथागतीकरण ! मिथक-मूल्य के उपकरण से वर्तमान का अवगाहन कविता में बहुत ही जटिल और श्रमसाध्य कार्यहोता है जिसे कवि राजकिशोरनेबखूबी किया है, यही वस्तु का पुनःसृजन है जो विशिष्टता का सर्वव्यापीकरण (जेनरलाईजेशन)करता है, जब वस्तु बिल्कुल वही नहीं होती जो उसका मूल स्वरूप है बल्कि कवि के परिवेश यानि आभ्यांतर से प्रतिकृत होकर नए संघटन में पुनर्रचित हो जाती हैऔर तब सृजन जन-संप्रेष्य हो जाता है जो उसकी सफलता है।
     अक्षत दुनिया कभी किसी कवि का काव्य-संसार नहीं होती। जब हम काव्य-संसार की बात कर रहे होते हैं तो यह कवि द्वारा आत्मसात किया हुआ उसके परिवेश का वह हिस्सा है जो उसपरिवेश से निष्पन्न होकर भी उससे भिन्न होता है। जैसे सब व्यक्तियों का चेहरा एक सा नहीं होता, उनका स्वभाव एक सा नहीं होता, उसी प्रकार एक जगह, एक भौगोलिक परिवेश में रहते हुए भी कवियों के आपसी रचना-परिवेश में वैयक्तिक भिन्नता होती है। अगर किसी कवि में रचनाशीलता नहीं दिखती है तो इसका मतलब यह है कि कवि ने काव्य-वस्तु को मूल परिवेश से ज्यों का त्यों उठा लिया है, गृहीत परिवेश की अर्थवत्ता के संधान का प्रयास कवि के द्वारा नहीं किया गया अर्थात् वस्तु के पुनस्सृजनमेंचुक हुई है। साहित्य का यथार्थ अखबारी समाचार की तरह नहीं होता बल्कि रचनाकर द्वारा भुक्त यथार्थ की पुनर्रचना होती है, यह परिवेश का नकल मात्र भी नहीं होता। परिवेश की पुनर्रचना कवि की जीवन-दृष्टि, आत्मसातीकरण की क्षमता, इन्द्रियबोध की प्रखरता और जीवनानुभव से बनती है। हमें राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि उनका काव्य-परिवेश लोकजीवन का वह देखा-सुना-भोगा हुआ यथार्थ है जिसमें कविता गरीबों की हुकऔर किरकिराते आँखों में फूँककी तरह महसुस होती है, कहीं वह आँखों का पानीबनकर तो कहीं प्रेम और जादू का रूप बनकरआती है जिसमें कवि की पृथ्वी घूमती है अपनी वृत्त पर। यहाँ कवि के लोक का विद्रुप स्वर भी उतना ही मुखर है -खुरपी और हँसुआ से भी तेज है बोली/पता नहीं, कब, किस बात पर/चल जाए लाठी-गोली/दरिद्रता में भी हठी बेजोड़/एक कट्ठा खेत में डाली जाती/कितनी राजनीति की खाद/कभी जानना हो/तो पधारिए हम्मर गाँव’ -कविता (पधारिए हम्मर गाँवसे)।कहना न होगा कि कवि का परिवेश वह जीती-जागती जगह है जिसमें अस्तित्व के लिए अंतर्द्वंद और जद्दोजहद पूरे स्वरित तेवर में मौजूद हैं। इसमें आदमी के श्रम का औजार हँसुआ और खुरपीही केवल नहीं, बदरंग होते समाज में हिंसा-प्रतिहिंसा की प्रतिध्वनियाँ भी हैं अर्थात् कहीं गोली और लाठीहै तो कहीं जल बिन छूँछऔर बेरौनक होती नदियां। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके काव्य-संसार में कविताएं उसी तरह पक रही है जैसे समय की धौंकनी में खेतों में धान पकती है। इसमें जीवन प्राकृतिक ऊष्मा और पूरी गति के साथ में उपस्थित और दीप्त है (किसी किताबी कवि के कुंठित नैराश्य का प्रतिबिंबन नहीं।) राजकिशोर राजन कविता में मूल्यों के गढ़ने के आदी नहीं, वहाँ कविता का परिवेश ही एक ऐसे दुर्निवार समय का आख्यान रचता है जिसमें मूल्य स्वंय परिवेशगत हो जाता है और जन से लेकर प्रकृति तक लोकजीवन की अविकल अंदरुनी व्यग्रता दीखती है - गोया कि, वहाँ नदियों का समुद्र से मिलने की इच्छा खत्म हो चुकी है, कोयल कूकना बंद कर चुकी है, तितलियों में चपलता नहीं रही, हँसी भी दिल से नहीं, दिमाग से आने लगी है और यह सब देखते-सुनते कवि भी अब बूढ़ा हो रहा है पर जिजीविषा मरी नहीं है, वह उद्दीप्त है स्फुट चिंगारियों की तरह। उनके लेखक का मूल्य लोक से संपृक्त होकर कितना समसामयिक और जीवन की गतिकी से भर उठता है, यह आप इस कविता के सहारे देख सकते हैं:मिट्टी में पड़ा धान- ठीक नहीं लगता, जब दादी चुनती/ मिट्टी से धान का एक-एक दाना/ अकसर दादी से कहता/ क्या! इतने गरीब हैं हम/ कि तुम नाखुनों से उठाती हो धान/ परन्तु दादी बुरा मान जाती/ और हम मिट्टी से चुनने लगते धान/ उन दिनों बैलों को भर दुपहरिया/ गोल-गोल चलना पड़ता धान के पुआल पर/ हम भी चलते गोल-गोल/ जैसे पृथ्वी को नाप लेंगे आज ही/ सन जाते हाथ-पैर, कपड़े, पसीने-मिट्टी से/ होने लगती सांझ/ तब दादी को आता हम पर दुलार/ चूम लेतींहमारा माथा/ और बताती, मिट्टी में पड़ा धान रोता है बेटा/ कि मिट्टी से आये और मिट्टी में मिल गए/ तब बरकत नहीं होती किसान की/ नहीं रही दादी, पर/मिट्टी में पड़ा धान/ आज भी दिखाई देता है रोते।अन्न के बर्बाद न करने का यह पुराना मिथलोक-बिम्ब के जिस ऐन्द्रिक रचाव और पोएटिक विजनके साथ पाठक के अन्तस्तल को छूता है, मिथ का मूल्य जिस तरह परिवेश के तत्व में रूपांतरित होता है कि इसकी अन्विति से पाठक बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाता! यहाँ बिम्बों की बहुलता नहीं, कथ्य बिम्ब को स्वभावतः रचते हैं। देशज भंगिमा और संवेदना की नव्यता राजन के कविता-संसार में अँटा पड़ा है, फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी रसप्रियामें कवि ने उसी भंगिमा का कविता-रूप में नवोन्मेष किया है जहाँ अपरूप प्रेम की प्रतिच्छाया पाठक के मन को हिलोर कर रख देती है, देखिए-
असमाप्त ही रह जाती है रसपिरिया की कथा/ रह-रह फूटती, मिरदंगिया की हूक/कि रसपिरिया नहीं सुनेगा मोहना!/देख न! आ गया कैसा कठकरेज वक्त/ कि पहले रिमझिम वर्षा में लोग गाते थे बारहमासा/ चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर, लगनी/ अब तो भूलने लगी है कूकना कोयल भी/ पंचकौड़ी मिरदंगिया को पता होगा जरूर/ अगर परमात्मा कहीं होगा, तो होगा रस-रूप ही/ तभी तो टेढ़ी उँगली लिए/ बजाता रहा आजीवन मृदंग/ और इस मृदंग के साथ फूटता रहा रमपतिया का करूण-क्रंदन/ कि मिरदंगिया है झूठा! बेईमान! फरेबी!/ऐसे लोगों के साथ हेलमेल ठीक नहीं बेटा/ भौचक है मोहना!/ ठीक मेरी तरह/ इस अपरूप प्रेम की कथा में।अनुभवसिक्त परंपरा मूल सबन्धों के रूप में कवि के यहाँ इस कदर ढलता है कि कवि पूछता भी है : मेरा तो मानना है/ऐसे अनुभव को ले तुम ओढ़ोगे कि बिछाओगे/ खाओगे कि नहाओगे... / दादा की अनुभवी आँखों में कितनी घृणा थी अनुभव से/कि जब कोई बच्चा उन्हें चिढ़ाता मुँह/वे उसे न समझाते, न गुस्साते, चिढ़ाने लगते मुँह। लेकिन पेट की आग से बेफिक्र लोग भी वहाँ हैं जहां कविता गहरी व्यंग्यात्मक अभिव्यंजना के साथ व्यक्त होती है कि जो पेट से बेफिक्र हैं/घूम रहे झक्क-सफेद दिल्ली-पटना/ लगाने को आग। मनुष्य का दिपदिपाता हुआ मुखमंडल तब स्याहहो जाता है। लेकिन फिर भी कवि की प्रतिबद्धता बनी रहती है और रसूखदार आदमी के प्रश्न पर कवि कहता है किगनीमत है/कम से कम /एक कविता तो आप से छुट गई। कवि का यह प्रतिबद्ध संसार उस लोक का हिस्सा है जिसमें पृथ्वी के पेड़ उनके पुरखों की तरह हैं और खेतों की फसलें उनके सपनों की तरह। यह चिंतन कवि को अपनी जगह पर रहते हुएउसे वैश्विक बनाता है जिसमें पूरी पृथ्वी पर जीवन को किसी तरह बचाने की चिंता आत्मगत है। अपनी मिट्टी और भाषा से कवि का राग इतना गहरा और लोक-प्रसूत है कि दुःख के कठिन समय में भी वह उससे अलगना नहीं 'कोड़ते-सोहते, ढ़ेला फोड़ते/धान, सरसों, गन्ना रोपते जिस मिट्टी में/मिल गए दादा भी/इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैं/जहाँ गरीबी और लाचारी/जैसे धरती पर दूब-मिट्टी, देह पर/जैसे सूरज की धूप/ इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैंकविता की दुनियामें कवि-कर्म की यह प्रतिबद्धता और अधिक पारदर्शी हो जाती है- 'और मेरी कविताएं, ठीक मेरी तरह/न उनमें अलंकारिक भाषा, न चमत्कार/न कलात्मकता का वैभव,/न बौद्धिकों के लिए यथेष्ट खुराक/तो मैं क्या करूँ!'- एक बात यह भी यहाँ दीगर है कि कवि के नदी का जल सूख चुका है, नदी के विलाप में पूरी प्रकृति और लोकजीवन का विलाप है। (इधर पूरे देश में पानी का हाहाकार सुनाई दे रहा, किसान आत्महत्या तक कर रहे।) सूक्ष्मता से, संकेत में इस जलाभाव को लक्ष्य करते हुए कवि ने लोकजीवन के सर्वग्रासी त्रास का जो बिम्ब इस कविता में रचा है, वह परिवेश की तात्कालिकता का अर्थगर्भी चित्रण है , देखिए इसका एक अंश- कविता : नदी का विलाप, : चिरई-चुरूँग उड़ना भूल/जैसे ठिठके पडे़ हैं पेड़ों पर..होने को है साँझ/और गाँव के सिवान पर/सन्नाटे में बरस रही है उदासी/रात्रि के प्रथम प्रहर में, करती है नदी रोज/धरती से गुहार/आज भी उसके रूदन से फटेगी धरती/आँसू पोंछते कहेगी वह कितनी असहाय/न कुदाल, न टै्रक्टर, न मजदूर, न किसान/कोई नहीं सुनता उसकी बात/ सभी काट-कोड़ उसे बना रहे खेत/हर दिन सूर्यास्त के साथ/हो रहा उसका अस्तित्व समाप्त... तुम्हें भरोसा है किताबों पर /पर, नदी पर नहीं/उस दिन समझोगे/जब नदी की आँखें, हो जाएगी कोटरलीन।'कवि अब भी अच्छे दिनों की आश में है, उसमें जीवन के वसन्त की अदम्य लालसा है और अनवरत खोज भी, एक चीत्कार भी है, एक पुकार भी –हा! वसंत!/हो! वसंत!/जो वसंत!/तुम कहाँ, किस अरण्य में/गये खो वसंत।
     हमें यह कहने में सकुचाहट नहीं कि युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है।


          संपर्क :  सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,

     एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004 मोबाईल ( 0 90067 40311 और 0 94313 10216)