लघुकथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लघुकथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

मतलब : सुशील कुमार भारद्वाज

मतलब
★★★★★★★★

"तुम चादर तान के सो क्यों नहीं जाते?" -उसने अपनी बात बेबाकी से कह दी।
तुरंत तपाक से सामने वाला बोला- "सो जाऊँ?... कैसे सो जाऊँ? किसके लिए सो जाऊँ? कब -कब सो जाऊँ? कहाँ-कहाँ सो जाऊँ?"
"तो ठीक है तुम जिंदगी भर जगे ही रहो। जब, जहाँ ,जैसे इच्छा हो जगे रहो। अपनी आँखों को नींद से दूर ही रखना। देखता हूँ तुम जग कर ही इस भ्रष्ट दुनियां में कब , क्या और कितना कुछ बचा पाते हो? .... और जो कुछ  बचाने में भी सफल हो गए तो देखूँगा कि तुम क्या-क्या अपने साथ ऊपर ले जाओगे?"
"तो तुम्हारे कहने का मतलब है कि ईमानदारी..."
"छोड़ो भी यार! मेरे कहने का कुछ भी मतलब नहीं है। जो बुझाय करो। यहाँ तो हर कोई सिर्फ अपने ही स्वार्थ में डूबा है। यहाँ तो दुनियां का हर इंसान भ्रष्ट है सिवाय खुद को छोड़ के।"
"मेरे कहने का मतलब..."
"अब बस करो। बहुत सुन लिए तुम्हारा मतलब। मतलबी दुनियां में हर किसी का मतलब भी मतलब के अनुसार बदलते और परिभाषित होते रहता है।"
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन  
सुशील कुमार भारद्वाज
लघुकथा पाठ सत्र में मंचासीन ख्याति प्राप्त साहित्यकार


भागदौड़ भरी जिन्दगीं में जब लोगों के पास अपने निजी काम के लिए समय का अभाव होता जा रहा है तब लंबी –लंबी कहानियों एवं उपन्यास रूपी प्रचलित साहित्यों से उनका दूर होते चला जाना लाजिमी ही लगता है. लेकिन लघुकथा एक ऐसी विधा है जो राह चलते और फेसबुक एवं व्हाट्सअप्प के माध्यम से भी सामान्य जनों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल है. लघुकथा ऐसी विधा है जिनमें शक्ति है कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक एवं हास्य –व्यंग्य के साथ धीर –गंभीर बातों को भी  कह गुजरने की. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस फटाफट जिंदगी में आसानी से लोगों के बीच पैठ बनाती यह लघुकथा अभी भी अपने यथोचित सम्मान से दूर है. जो कहीं ना कहीं झलक ही जाता है.
जी हां, 17 अप्रैल 2016 को जब पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर के एमपीसीसी सभागार में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के तत्वावधान में आयोजित 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन के दूसरे सत्र (आलेख पाठ सत्र) में लघुकथा के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी, तब न सिर्फ इस पर चर्चा हुई कि लघुकथा क्या है? इसके आवश्यक तत्व क्या हैं? वर्तमान में इसकी स्थिति क्या है? और इसके लिए भविष्य में क्या संभावनाएं हैं? बल्कि इस पर भी चर्च हुई कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए क्या किया जाय? और जब विभिन्न कलाओं के लिए सम्मान सरकारों द्वारा ससमय दिया जा रहा है तो लघुकथा ही उपेक्षित क्यों रहें?


जबकि उद्घाटन सत्र में बिहार के कला संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम ने अपनी बातों को रखते हुए कहा कि जब शहर में जब नाटक, नृत्य के केंद्र बने हैं तो साहित्य के केंद्र क्यों नहीं बनेगें? जबकि मंच पर ही आसीन विधान पार्षद श्री नवल किशोर यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि मंत्रीजी साहित्य भवन बनाने की बात करते हैं और राजधानी में पहले से बने हिन्दी भवन पर दूसरे लोगों का कब्ज़ा ऐसा है कि साहित्यकार वहां घुस भी नहीं सकते.
इन राजनीतिक बयानों से इतर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के अध्यक्ष सतीशराज पुष्करणा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जल्द ही दिशा प्रकाशन की ओर से लघुकथा कोश प्रकाशित होने जा रहा है. साथ ही साथ उन्होंने लघुकथा के इतिहास लिखने की योजना की भी जानकारी दी. बंगलुरू से आई व्ही ललिताम्बा ने कहानी के बढ़ते दायरे की बात कहीं, तो मेजर बलबीर सिंह भसीन ने सलाह देते हुए कहा कि लघुकथा में दर्द भी उभरे और अनुशासन भी बना रहे. जबकि रामदेव प्रसाद ने लघुकथा में संवेदनशीलता, संक्षिप्तता और समाज सापेक्ष मूल्यों पर बल देने की बात कही. नागपुर से आए डा मिथिलेश अवस्थी ने भाषा के साथ साथ लघुकथा में शब्द सीमा और अनुशासन पर ध्यान देने की बात कही. जबकि नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने लघुकथा में पुनार्चनावाद की सम्भावना पर अपनी बातों को रखा.



तीसरे सत्र में जहां तकनीकी सत्र में रखी गई बातों पर ही डा शंकर प्रसाद, कांता रॉय, पुष्पा जमुआर समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विविध विचार रखे वहीं चौथे सत्र में जीवन के विविध क्षेत्रों के पृष्ठभूमि में रची गई 34 लघुकथाओं का पाठ किया गया. इन लघुकथाकारों में न सिर्फ सतीशराज पुष्करणा, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, सिद्धेश्वर, ध्रुव कुमार, मिथिलेश अवस्थी, पुष्पा जमुआर, सुशील कुमार भारद्वाज, अनीता राकेश, देवेन्द्र नाथ साह,  कांता रॉय, रेखा रश्मि, पूनम आनंद, मेहता नागेन्द्र, आलोक भारती भगवान सिंह भास्कर आदि शामिल रहे बल्कि किलकारी के प्रियांतरा भारती और प्रवीण कुमार समेत अन्य भी रहे. और इन लघुकथा पाठों पर अपने समीक्षात्मक वक्तव्य दिए प्रतिष्ठित साहित्यकार नागेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश प्रीत, एवं संतोष कुमार ने.
सम्मलेन में जहां फूलों की माला के बदले, फलों की टोकरी देकर अतिथियों का स्वागत किया गया, वहीं देश के विभिन्न राज्यों से आए अथिति लघुकथाकार डा सच्चिदानंद सिंह साथी, डा मिथिलेश अवस्थी, डा शरद नारायण खरे, मिथिलेश कुमारी मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा देवेन्द्र नाथ साह, पुष्पा जमुआर, तथा आलोक भारती को लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया, जबकि राघवेन्द्र कुमार कौशल को लघुकथा सम्भावना सम्मान से सम्मानित किया गया. किलकारी के प्रियांतरा भारती एवं प्रवीण कुमारत को लघुकथा अंकुर सम्मान दिया गया.
सम्मलेन में सन्नाटा बोल उठा (डा मिथिलेश कुमारी मिश्र), आस पास कि बातें (डा पुष्प जमुआर), वृक्ष ने कहा (डा मेहता नागेन्द्र), परदेस का पंछी (बीरेंद्र कुमार भारद्वाज), बंद मुट्ठी में सूरज (आलोक भारती), और साहित्य प्रहरी (लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका –भगवान सिंह भास्कर) का लोकार्पण भी किया गया. और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समारोह का समापन हो गया .

-----------------------------------------------------------------------------------

मंगलवार, 1 मार्च 2016

उस रात (लघुकथा) - सुशील कुमार भारद्वाज

                उस रात (लघुकथा)
- सुशील कुमार भारद्वाज



उस रात दिल और दिमाग दोनों में ही भयंकर हलचल मचा हुआ था| नैतिकता और जिम्मेवारी के सवाल अंदर तक धंसे हुए थे| जीवन की यह पहली और शायद आखिरी घटना थी| अचानक बिजली भी गुल हो गई| लेकिन मैं इस अन्धेरें में भी साफ़ – साफ़ देख रहा था कि वह बाजू वाले बिस्तर पर स्त्री – सुलभ स्वभाव के अनुसार स्वयं को ढक कर लेटी थी| मन को विश्वास न था कि आज की रात हमदोनो नींद से सो पाएँगें| एक दूसरे से अनजान न थे तो कई वर्षों से हमदोनो में कोई बात या मुलाकात भी नहीं हुई थी| यह तो अजीब संयोग है कि दोनों होटल के इस कमरे में रहने को मजबूर हो गए थे |
मैं सोचने लगा – “आज वो मेरे साथ सो सकती थी| इस तरह अलग – अलग बिछावन पर सोने की जरुरत नहीं होती| यूँही चुपी लादे सुबह होने का इंतज़ार करने की बजाय रात हंसी – ठिठोली में गुजर सकती थी| मैंने उससे उसका यह हक छीन लिया| उसकी आँखों में आँसू के जो बूंद आये, उसके लिए मैं भी कहीं न कहीं जिम्मेवार था| क्योंकि मैंने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था| नहीं – नहीं यह पूर्ण सत्य नहीं है| मैं इंकार या स्वीकार तो तब करता जब बात मुझ तक पहुँचती| मुझे तो बाद में किसी ने बताया कि संजना के शादी का प्रस्ताव आया था| घर वालों ने हँसते हुए यह कह कर लौटा दिया था कि दो परिवारों की वर्षों की दोस्ती को दोस्ती ही रहने दिया जाय| उनका तर्क था कि दोस्ती कि वजह से रिश्ते में करवाहट आ सकती है|
इसके बाद तो उसके प्रति मेरी सोच ही बदल गयी| उससे अधिक दूरी बनाने की हर संभव कोशिश करने लगा| जब कभी सामना हुआ तो धीरगंभीर बना रहा या यूँ गुजर गया जैसे उसपर मेरी नज़र ही न पड़ी हो| चोर की तरह नज़रें चुराता फिरता| उसके व्यवहार से कभी –कभी सोच में पड़ जाता था कि वह इतनी परिपक्व हो गई या सबकुछ से अंजान है जो बिना हिचक के सामने आ जाती है| कभी – कभी इच्छा होती थी कि एक नज़र उसे निहार लूँ| पर डर जाता था कि कहीं मन की कोमल भावनाएं न जग जायें| घर वाले क्या कहते या करते ये तो बाद की बात होती अगल – बगल वाले पहले बदनाम कर देते| एक ही बात दिमाग में होती – “जब मैं उससे शादी ही नहीं कर सकता तो उसे बदनाम क्यों करूँ?”
आज जब यहाँ हमदोनो के सिवा कोई नहीं है तो मन की सारी भावनाएँ कमरे के इस अँधेरे में उफान मार रही है| -“आखिर क्यों नहीं मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए? क्या मैं घर वालों को समझा नहीं सकता? क्या मैं इतना कमजोर हूँ?
तभी कमरे में एक मीठी सी आवाज गूंजी जिसने मेरा ध्यान खींचा| संजना की मोबाइल बजी थी | और फिर संजना –“ हाँ माँ! मैं ठीक से पहुँच गयी हूँ| ......ओह क्या बताऊँ? शहर में कोई होटल खाली नहीं मिल रहा था बड़ी मुश्किल से एक डबल बेड का रूम मिल गया है| .....अकेले रहने के कारण थोडा महंगा तो है लेकिन क्या करूँ एक ही रात की तो बात है | .......”
उसकी बात सुनकर मुस्कुराये बगैर रह न सका| वाकई वह कमरे में अकेली है? थोड़ी देर पहले ही की तो बात है| मैंने थक कर इस होटल में सिंगल बेड न मिलने के कारण इस कमरे को बुक करा लिया था| उसी समय यह भी काउंटर पर आ पहुंची थी| निराश होकर लौटने ही वाली थी कि मैंने अपना वाला कमरा उसे दे देने को होटल वाले से कहा| वह बहुत खुश हुई थी लेकिन तुरंत पूछ बैठी –“फिर आप कहाँ जाइयेगा? ... प्लेटफोर्म पर?” मैं हामी में सिर हिलाता उससे पहले ही –“आप पुरानीं सोच को छोडिये| वैसे भी यह कोई पटना नही है जो कोई परिचित मिल जाएँगे? रात भर की ही तो बात है?” और असमंजस की स्थिति में मजबूरन उसके साथ क्योंकर तो चल पड़ा?
फिर मेरा ध्यान भंग हुआ जब वह मुझसे बोली –“जानते हैं आज की रात मेरे लिए खास है?” मैं पूछ बैठा- कैसे? तो बोली –“अभी माँ बतायी कि लड़के वालों ने शादी के लिए हाँ कर दी है| कल के बाद पता नहीं मैं कभी कोई परीक्षा दे भी पाऊँगी कि नहीं?.......”
संजना अपने लय में बोले ही जा रही थी कि बिजली भी आ गयी| उसके चेहरे पर वर्षों बाद इतनी चमक देखी थी| अजीब–सा महसूस हो रहा था| मेरे पास मुस्कुराने और उसे बधाई देने के सिवा कुछ नहीं बचा था| इच्छा हुई कि वो सिर्फ बोलती ही रहें ताकि इस दरम्यान में उसे जी भर देख सकूँ| भूल गया कि मैं भी कुछ कहना चाहता था? बातों में पूरी रात कब निकल गयी पता ही न चला|
 

 --------------------------------------------------------------------------

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

जाति भजाने (लघुकथा) -सुशील कुमार भारद्वाज

जाति भजाने (लघुकथा) -सुशील कुमार भारद्वाज
सुशील कुमार भारद्वाज 
“मंत्रीजी! हम आपही के क्षेत्र से आए हैं. बहुत आस लगाकर आए हैं.” – वह गिरगिरता हुआ मंत्री जी के चरणों में गिर पड़ा– “कुछ रहम कीजिए, घर की सारी जमीन बेचकर आए हैं. इससे अधिक रूपया हमसे संभव नहीं है.”
“देखो भाई, अगर हम अधिक जनकल्याण की बात सोचने लगेंगें तो एक दिन हमें ही भीख मांगने पड़ जाएंगें. सिद्धांत से कोई समझौता नहीं. जो रकम कहा गया उससे एक भी पैसा कम रहा तो, समझो तुम्हारा काम नहीं हो पाएगा.” – मंत्रीजी टका-सा जबाब देकर कुर्सी से उठने लगे.
श्याम बुरी तरह से ऐंठ कर रह गया. समझ नही पा रहा था कि क्या करें? आखिरकार उसने अपने तरकश का अंतिम बाण छोड़ते हुए कहा– “हुजूर, कुछ नहीं तो जाति के ही नाम पर रहम कीजिए. हम आपही की जाति के हैं.”
मंत्री जी आँख फाड़ते हुए बोले – “क्या कहे? आप हमारे ही जाति के हैं?”
श्याम आशा की किरण मिलते ही बोला- “जी जी, हमलोग जातिभाई हैं. बातचीत में कभी बताने का मौका ही नहीं मिला.” – आत्मविश्वास के साथ वह तेज आवाज में बोलता चला गया – “मजाल था जो कोई एक भी वोट इधर से उधर हो जाता? पूरी मुस्तैदी थी हमारी. चुनाव में हमलोग अपनी जाति का मान–सम्मान और गौरव को बचाए रखने के लिए जी जान लगाए हुए थे.”
मंत्रीजी के चेहरे पर सहज ही मुस्कुराहट की रेखाएं खींचती चली गई. कुर्सी पर बैठते हुए वे श्याम को देखते रह गए और धीरे से बोले– “भाई चुनाव में जो आपने जाति के लिए किया उसका ऋण तो शायद कोई भी नहीं चुका पाएगा. और हर इंसान का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी जाति की भलाई के लिए जान कुर्बान कर दे. लेकिन आप ही कहिए चुनाव से आज तक का जो सारा खर्च चल रहा है वह कोई जाति वाला दे जाता है क्या?”

श्याम सिर्फ उनकी बातों को आँखें फैलाए सुनता रहा और मंत्रीजी बोलते रहे– “आप हमारी जाति के हैं तो, हम क्या करें? हमको आपके साथ कोई शादी–विवाह का सम्बन्ध करना है जो ई सब बात हमको बता रहे हैं?”- मंत्रीजी कुर्सी से उठ कमरे में जाते हुए बोले- “अगली बार पैसा हो जाए तो आइएगा जाति भजाने नहीं.”     

शनिवार, 26 सितंबर 2015

निर्लज्ज (सुशील कुमार भारद्वाज)

                       निर्लज्ज ! 

                                        
सुशील कुमार भारद्वाज


वाराणसी – सियालदह एक्सप्रेस ज्योंहि आरा जंक्शन पहुंची, लोग प्लेटफोर्म पर धक्का-मुक्की करने लगे. दरवाजे तक लोग ठसे थे. उस भीड़ को चीरते हुए सलवार शूट में एक लड़की काफी जद्दोजहद के साथ आगे बढ़ी जा रही थी. उसका एक हाथ दरवाजे के रड को थामे था तो एक हाथ एक अधेड महिला को बेतरतीब खींचे जा रहा था. जबकि महिला भीड़ पर झुंझला रही थी – “सबके गेटे पर बैठेल रहता है, अन्दरवा जगहें न है का?”
इतने में उस महिला को सहारा देते हुए एक आदमी सबको धकियाते हुए आगे बढ़ा– “अरे तुमको उससे क्या मतलब है कि कौन क्या कर रहा है? तुम अपना सीट पकडो ना?” महिला भी तुनक कर बोली- “चलिए न रहे हैं जी, भीड़ न दिख रहा है का?”
आगे बढ़ने के बाद वह महिला, बहन जी- भाई जी करते किसी तरह जबरन अपने लिए जगह बना ली. फिर लड़की को इशारा करते हुए बोली- “आओ यहीं तुम भी बैठ जाओ”. लड़की इधर –उधर देखने के बाद सामने वाली सीट में किसी तरह अडजस्ट कर ली. फिर लड़की साथ खड़े आदमी से बोली – “पापा जी आप बैठ जाइये हम खड़ा ही रहेंगे.”
वह आदमी बोला – “तुम माँ- बेटी ठीक से बैठो न हमरा टेंसन काहेला लेती हो? एकाध स्टेशन के बाद हमको भी कहीं न कहीं जगह मिल ही जाएगा.”
गाड़ी खुली तो लड़की इधर – उधर तांक- झांक करने लगी. लगा जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो. अचानक खिडकी से दरवाजे की ओर नज़र पड़ते ही उसका चेहरा खिल उठा. उसकी माँ पूछ बैठी – “का है रे?” वह मुंडी हिलाते हुए बोली – “कुछो ना” और इधर-उधर देखने लगी.
गाड़ी ज्योंहि अगले स्टेशन पर रूकी तो लड़की गेट की ओर चल पड़ी. उसके मम्मी –पापा एक दूसरे को देखने लगे, लगा आँखों –आँखों में वे एक दूसरे से सवाल – जबाब कर रहे हों. गाड़ी खुलते ही वह लड़की आकर अपने सीट पर बैठ गई. इशारे-इशारे में वह औरत उस लड़की को कुछ समझाने लगी, लेकिन वह अनसुना करते हुए सिर्फ मुस्कुराती रही.
वह लड़की बिहटा स्टेशन पर फिर नीचे उतर गई. इस बार पीछे-पीछे उसके पिता भी भीड़ को चीरते हुए नीचे आ गए. नीचे आते ही उनकी आँखें फ़ैल गई. देखा कि लड़की एक लड़के का हाथ पकड़ कर हंस-हंस के बात कर रही थी. उन्होंने सख्त आवाज में कहा– “यहाँ क्या कर रही है? चलो अंदर.” लड़की कुछ पल अपने पिता को देखने के बाद फिर अपने गप्प में भीड़ गई. इतने में वह आदमी गुस्से से तमतमाता उठा और खिडकी के पास आकर चिल्लाया –“ले जाओ अपनी निर्लज्ज बेटी को अंदर…. निर्लज्जता की हद हो गई है” इतना सुनते ही धरफराते हुए वह औरत भीड़ से बाहर आयी और लड़की का हाथ खींचते हुए अंदर ले गई. और इधर उसके पिता उस लड़के से उलझ गए –“शर्म नही आती है आवारागर्दी करते?”
लड़के ने तपाक से जबाब दिया – “प्यार करना आवारागर्दी नही है. और जब आपकी बेटी आपके वश में नहीं है तो मुझे कुछ भी बोलने का आपको क्या हक है?”
गुस्से में वह आदमी बोला –“ढेर बोलता है. चलो पटना सब पता चल जाएगा.”
लड़का – “पटना में का है….. ”
लड़का और कुछ बोलता उससे पहले ही उस अधेड आदमी ने उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ रशीद कर दिया. थप्पड़ की आवाज से आसपास में सन्नाटा छा गया और लोग अवाक् हो उसे ही देखने लगे.
लोग अचानक इस घटना पर सिर्फ एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे और पूछ रहे थे कि आखिर हुआ क्या? इतने में गाड़ी ने सिटी दे दी और लोग चढ़ने के लिए गेट की ओर लपके. गाड़ी चलने लगी तो प्लेटफोर्म पर ही अपना गाल सहलाता उस लड़के ने गाड़ी के दरवाजे पर से ही उस आदमी को नीचे खींच कर पीटना शुरू कर दिया. जब तक झगडे की बात गाड़ी में गूँजती तब तक गाड़ी गति में आ चुकी थी और माँ – बेटी में से कोई नीचे नहीं उतर सकी. नीचे सिर्फ वह आदमी पिटता हुआ नजर आ रहा था.
भीड़ से एक आवाज आयी – “जब बेटा–बेटी हाथ से निकल जाता है तो माँ-बाप का यही हाल होता है.”
दरवाजे पर से आते ही महिला ने बेटी को एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा – “अब मन खुश हुआ न रे हरामजादी… मरयो का हे न गई? ढेर जवानी के जोश चढल है?”
इतने पर तमक पर लड़की बोली – “मार काहे रही हो? हम क्या किये हैं? पापा उससे लड़ने काहे गए?… अपन जवानी के दिन भूल गई जो हमको बोल रही हो?”
महिला – “हम तोरे जैसन छिन्नरपन नहीं करते थे. तुम्हरे जैसे निर्लज्ज नहीं थे. हमारे ज़माने में लोग शांति से अपने माँ–बाप की बात मानते थे. तुम्हरे जैसे कलंकनी नहीं थे. देखो तो इस निर्लज्ज को… कैसे जुबान लड़ाती है?”
लड़की फटते हुए बोली –“तुमको मौका नही मिला तो उसमें मेरी गलती है? उसका कुंठा तुम मुझ पर उतारोगी? बहुत बोल ली. अब चुप रहो वर्ना…..” दांत पिसते हुए लड़की खिडकी की ओर देखने लगी.
इतना सुनते ही सब अवाक् हो उस लड़की के व्यवहार को देखने लगे. सब के सब चुप. इतने में गाड़ी अगले स्टेशन पर रूकी और भीड़ के साथ वह माँ – बेटी भी नीचे उतर गई. फिर गाड़ी आगे की ओर बढ़ी और लोग बदले जमाना की बात करने लगे.




शनिवार, 15 अगस्त 2015

सुशील कुमार भारद्वाज की लघुकथाएं



१. पगली का तौलिया (लघुकथा)

            सुशील कुमार भारद्वाज 

बाघ एक्सप्रेस के समस्तीपुर जंक्शन पहुंचते ही, भीड़ के साथ एक पगली भी उसमें चढ आयी| गर्मी में भी मलिन स्वेटर पहने, गंदे व उलझे बालों में सबके आकर्षण का केंद्र बनी वह सीट-दर–सीट घूमती रही| कभी कोई प्रेम से कहता –“नीचे उतार जाओ|” कभी दूर करने के लिए –“उधर चली जाओ|” और कभी सख्त आवाज कान से टकराती – “भागो|“

और वह सुना – अनसुना करते प्रवेश द्वार के पास पालथी मारकर बैठ गई|

एक आवाज आयी –“पागलों को कोई देखने वाला नही है| जहाँ देखो वहीँ नज़र आ जाएं|”

दूसरी आवाज आयी –“कैसे हैं, इसके नाते – रिश्तेदार|”

तभी पीछे से आवाज आयी – “स्वार्थी दुनिया में नाता –रिश्ता क्या होता है, भाई?”

आवाज अचानक रुक गई| जींस – टॉप पहने एक युवती बर्थ नम्बर १ से उठी और उसने अपने बैग से एक नया तौलिया निकालकर पगली को ओढा दिया| उसमें क्लिप भी लगा दिया, ताकि कहीं गिरे नहीं| उसके बालों को कंघी किया और फिर अपनी जगह पर लौटकर कान में ईयरफोन लगा कर बैठ गई| शांति के माहौल में सभी की निगाहें कभी उस युवती की तरफ जातीं तो कभी पगली की तरफ| लेकिन युवती की इस हरकत ने सबके अंदर हलचल मचा दी थी| इन सबसे बेफिक्र वह युवती कभी अपनी डायरी में कुछ लिखती, तो कभी कोई चित्रकारी करती रही| अंग्रेजी का कोई उपन्यास उसके बैग से झांक रहा था| ट्रेन अपनी गति में थी और वह पगली अपने आप में खोयी कभी आंख मटकाती तो कभी मुस्कुरा रही थी|

अचानक हलचल हुई जब गाड़ी ढोली स्टेशन पर पहुंची और भीड़ उतरने को आतुर हुई| भीड़ से एक आवाज आयी – वाह! पगली का तौलिया तो एकदम नया है|”

और जब भीड़ छंटी तो सबके मुंह खुले के खुले रह गए| पगली का तौलिया गायब हो चुका था और पगली पूर्ववत हालत में बाहर की ओर देख रही थी| 

सुशील कुमार भारद्वाज            




.कामवाली की जाति  
                   सुशील कुमार भारद्वाज            



सारिका बहुत परेशान थीं |घर के सारे काम  खुद ही करने पड़ते थे | अंत में उसने पडोसी के घर काम  करने वाली रागिनी से मदद मांगने की सोचीं |और अगली शाम ज्योंही उनकी नज़र रागिनी पर पड़ी उन्होंने लपक कर खुद को उसके  आगे करते हुए बोली - "अरे रागिनी ! क्या मुझे भी अपने जैसी काम  करने वाली को बुला दोगी ? .... अब क्या बताऊँ ? खुद से सारा काम  हो नहीं पाता है | सुबह से शाम तक में क्या क्या करती रहूँ ? "

मुस्कुराते हुए रागिनी जबाब दी  -" आदमी की भी कोई कमी होती है ? बस अच्छे लोग मिलने चाहिए | मैडम के यहाँ काम  से फुर्सत ही नहीं मिलती वर्ना मैं ही कर देती |"

आशा की किरण मिलते ही बोली - " सच पूछो तो मेरी भी यही इच्छा थी, पर सीधे कैसे कहती ? खैर किसी वैसी को देखना जो घर के साफ़ सफाई के साथ साथ रसोई में भी कभी कभी मदद कर दे |"

"मैडम ये भी कोई कहने की बात है |"

"रागिनी तब तो लगता है की मेरा काम जल्दी ही हो जायेगा | पैसे की कोई बात नहीं है जो उचित होगा दूंगी | बस एक बात का ध्यान रखना की वो किस जाति धर्म की है? तुम सब कुछ समझ  रही हो मैं क्या कहना चाह रही हूँ ?"

गौर से रागिनी सारिका के चेहरे पर देख रही थी और बात खत्म होते ही बोली -" मैडम एक बात पुछूं ?"

"हाँ हाँ पूछो , क्या पूछना चाहती हो ? " - सारिका हुलस कर बोली |

रागिनी सारिका के चेहरे पर नज़र गडाये हुए  ही बोली - "मैडम सिर्फ काम करने वाली की  जाति - धर्म पर ही ध्यान देना चाहिए? या जिसके यहाँ काम करना है उसके जाति - धर्म का भी ध्यान रखना चाहिए ?"

सारिका इस सवाल के  जबाब में सिर्फ रागिनी को फटी आँखों से देखती रह गयी
                       -----------------------------------