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मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

हिंदी कथा-आलोचना पर एक जरूरी किताब:- प्रेमकुमार मणि

 हिंदी कथा-आलोचना पर  एक जरूरी किताब 


प्रेमकुमार मणि 


 पिछले तीन रोज मेरे साथ एक किताब बनी रही, जिसे मैं रुक-रुक कर पढता रहा. मेरे शहर पटना में सर्दी बढ़ गई है और ऐसे में  लगातार देर तक सक्रिय रहना मेरे लिए मुश्किल होता है. इसलिए रुक-रुक कर पढ़ना मेरी मजबूरी भी थी. लेकिन इस धीमी रफ़्तार से पढ़ने का एक लाभ भी है. कुछ वैसा ही  जैसा चबा-चबा कर भोजन करने से होता है. 

 

किताब है  ' उपन्यास और देस,' जिसके लेखक हैं वीरेंद्र यादव. अभी पिछले महीने दो रोज हमलोग दिल्ली में एक साहित्यिक जलसे में साथ थे. वहाँ भी उपरांत बैठकी में दुनिया भर की खूब बातें हुई थीं. मौजूदा कामकाजी संसार में बातें करने वाले लोग तेजी से कम हो रहे हैं. दरअसल यह हमारी सभ्यता की समस्या है. इसी अनुपात में हमारा पढ़ना भी कम हो रहा है. लोग इतने लक्ष्यप्रिय होते जा रहे हैं कि लाभ रहित कामों से परहेज करते हैं. शुभ-लाभ की मौजूदा सभ्यता में पुरानी दुनिया की कई अलाभकारी चीजें फालतू मान ली गई हैं. कोई चीज है तो उसका मूल्य होना चाहिए. मुझे एहसास होता है उपन्यास विधा भी इस सोच का शिकार हो गई है. दुनिया भर की जुबानों की बात नहीं कह सकता, लेकिन हिंदी में उपन्यासों की स्थिति उदास करने वाली है. उपन्यासकार भी इस विधा को ठीक से समझ नहीं रहे हैं. उन्नीसवीं सदी में दुनिया भर के आधुनिक जुबानों में उपन्यास एक खास कारण से आए थे. वह साहित्यिक विकासवाद की खास मंजिल तय कर रहे थे. सामंतवाद अवसान पर था. नया सामाजिक ढांचा आकार लेने केलिए आकुल था. संस्थागत धर्म हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थे और लोकतंत्र अभी शैशव-काल में था. काव्य विधा को अभी कविता के कलेवर में आना था. ऐसे में उपन्यास ने सामाजिक संवाद और विमर्श की एक पृष्ठभूमि तैयार की थी. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उपन्यास साहित्य का केंद्र बना रहा. इसके अनेक कारण थे,जिन पर विस्तार से विमर्श होना अभी शेष है. 


यह किताब हमें कायदे से इसी समस्या पर सोचने केलिए उत्साहित करती है. अपने कलेवर में यह आलोचना पुस्तक है, जिस में  हिंदी उपन्यासों पर विमर्श किया गया है. इस विषय पर सोचने और काम करने वालों केलिए यह एक जरूरी किताब बन जाती है. हिंदी भाषी समाज में बहुतेरे लेखकों को भी साहित्य के समकालीन सरोकारों का अभिज्ञान नहीं है. वे आज भी देहाती दुनिया, गोदान या फिर मैला आँचल की प्रतिलिपि तैयार करना चाहते हैं. उपन्यास या साहित्य पूरी दुनिया में नए सरोकारों से जुड़ रहा है और रूप व विषय दोनों स्तरों पर निरंतर नवीन बना रहना चाहता है. इस किताब में ही लेखक रूसी लेखक स्वेतलाना अलेक्सेविच की एक उक्ति उद्धृत करते हैं,जिस में वह कहती हैं  -' यदि मैं उन्नीसवीं सदी में लिख रही होती तो टॉलस्टॉय या चेखब की तरह फिक्शन ही लिखती, लेकिन आज के समय को लिखने केलिए विशुद्ध कथा विधा अपर्याप्त है. लोगों को समझने में कथा विधा विफल रही है,' ( पृष्ठ 191 ) यह प्रसंग अरुंधति राय के उपन्यास पर विमर्श के दौरान आया है. जाहिर है अरुंधति फिक्शन के तय दायरे को तोड़ती भी हैं क्योंकि  यथार्थ के समग्र उद्घाटन के लिए  फिक्शन के पारम्परिक व्याकरण को तोडना  जरूरी था. 


' उपन्यास और देस ' चार अध्यायों में विभक्त कुल जमा बाईस लेखों का संकलन है. पहला अध्याय है 'उपन्यास और देस ' जिसमें रेणु के मैला आँचल, शिवपूजन सहाय के देहाती दुनिया, नागार्जुन के बलचनमा, अखिलेश के निर्वासन, पंकज विष्ट के लेकिन दरवाजा और गिरिराज किशोर के पहला गिरमिटिया जैसे कुल तेरह उपन्यासों पर आलोचकीय विमर्श है. इसमें ' मैला आँचल ' पर केंद्रित लेख मुझे बहुत खास लगा. यह इसलिए भी कि वीरेंद्र मूलतः मार्क्सवादी आलोचक हैं और मार्क्सवादी आलोचकों ने मैला आँचल और उसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु को एक तरह से मार्क्सवादी दुनिया का कुजात लेखक घोषित किया हुआ था. रेणु समाजवादी राजनीति से भी सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे. शीतयुद्ध दौर में स्तालिनवादी मार्क्सवादी प्रवृत्तियों में एक खास तरह का कठमुल्लापन विकसित हुआ था, जिस के शिकार उस दौर के ज्यादातर शीर्ष मार्क्सवादी आलोचक थे. जार्ज लूकाच जैसे विलक्षण आलोचक भी इससे मुक्त नहीं थे. हिंदी मार्क्सवादी आलोचकों का कठमुल्ला न होना ही अस्वाभाविक होता. वह इसके लिए तैयार बैठे थे. यही कारण था  रेणु के साहित्यिक विवेक को समझने में उस दौर की ' प्रगतिशील आलोचना ' विफल रही थी. ऐसे में वीरेंद्र द्वारा उदार नजरिये से 'मैला आँचल ' का पाठ प्रस्तुत करना अपने आप में प्रगतिशील आलोचना की भी समीक्षा बन जाती है. 


अपने इस उदार दृष्टिकोण को वीरेंद्र पूरी किताब में बनाए रहते हैं और यही उनकी विशिष्टता है. किताब में संकलित कुछ लेख निश्चित ही पत्रिकाओं और मित्र लेखकों की मांग ( आग्रह ) पर लिखे प्रतीत होते हैं और इन लेखों को यदि इस संकलन से अलग रखा जाता तो यह अधिक मूल्यवान  होता, बावजूद इसके कोई पाठक इस किताब के महत्वपूर्ण लेखों को अपने पाठकीय विवेक से अलगा सकता है. अरुंधति राय के उपन्यास ' दि मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस ' की गंभीर समीक्षा, ' उपन्यास दृष्टि और उपन्यास ', ' कथा आलोचना और रामविलास शर्मा ' तथा ' प्रेमचंद पर नामवर सिंह ' शीर्षक लेख इस पुस्तक को खास और पठनीय बनाते हैं. मेरी दृष्टि में कोई किताब इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि वह पाठक को नए विमर्श केलिए उत्साहित करती है  और उसमें समझ के नए गवाक्ष विकसित करती है. इस नजरिए से यह किताब पठनीय प्रतीत हुई है. यह हमें आलोचना के एक अनछुए -अनजाने देस में ले जाने की कोशिश करती हैं.


हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा एक ऐसा नाम है,जिन से टकराए बिना आप शायद नहीं रह सकते. उन्होंने यथेष्ट काम भी किया है. निराला और प्रेमचंद पर उनका आलोचना कार्य ऐसा है जिसके कारण हिंदी कविता और  कथा विधा में उन्हें नजरअंदाज कर आप आगे नहीं बढ़ सकते. वीरेंद्र जी ने ' कथा -आलोचना और रामविलास शर्मा ' शीर्षक अपने विस्तृत लेख में विस्तार पूर्वक शर्माजी के अंतर्विरोधों और उनके दृष्टिकोण की पड़ताल की है. रामविलास जी का बांग्ला भाषा पर अधिकार था, निराला की तरह. लेकिन अपने कविगुरु निराला की ही तरह वह बांग्ला साहित्य की चेतना से असम्पृक्त रहने के अभिलाषी थे. बांग्ला नवजागरण की परंपरा से हिंदी साहित्य चेतना को हरसंभव अलग-थलग रखने की कोशिश भी उन्होंने की. इसलिए ही वह रवीन्द्र पर चुप और शरत पर आक्रामक दीखते हैं. शरत के उपन्यासलेखन के चार मुख्य पड़ाव हैं. देवदास, चरित्रहीन, पथेरदाबी और शेषप्रश्न. स्वयं शरत देवदास को चरित्रहीन से और पथेरदाबी को शेषप्रश्न से ख़ारिज करते हैं. रवीन्द्रनाथ का 'गोरा' और शरत का शेषप्रश्न बांग्ला नवजागरण का दर्पण है. लेकिन रामविलास शर्मा को वर्ग-संघर्ष की चिंता है,जिसे शरत-साहित्य से कोई सहयोग नहीं मिलता दिखाई देता. ऐसे में वह उन्हें प्रेमचंद की उस किसान चेतना से ध्वस्त कर देते हैं जिस के बीच से वर्ग-संघर्ष उझकता दिखाई पड़ जाता है. अपने इन्ही औजारों से वह बांग्ला नवजागरण के समान्तर एक हिंदी नवजागरण का भी जैसा-तैसा ठाट तैयार कर देते हैं और सावरकर प्रणीत 1857 के तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम को कुछ आगे बढ़ कर फ़्रांसिसी राज्यक्रांति जैसा दर्जा दे डालते हैं. वीरेंद्र अपने इस लेख में रामविलास जी के अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हुए उनकी सीमा रेखा बताते हैं. इस लेख को कोई पाठक पूरा पढ़ कर ही इसका आनंद ले सकता है. 

लोग जानते हैं कि रामविलास जी ने अज्ञेय और जैनेन्द्र के साथ समाजवादी तबियत के यशपाल, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन , रेणु, मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को ख़ारिज किया है. इसकी लम्बी और दिलचस्प पृष्ठभूमि है. समाजवादी लेखकों की जगह उन्होंने वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे उपन्यासकारों और कविता में मुक्तिबोध की जगह केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों को महत्वपूर्ण माना. आश्चर्य तो यह है कि जिस लोकचेतना को साहित्य में मूर्त करने केलिए वह वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर या फिर कुछ दूसरे कथाकारों की प्रशंसा करते हैं, उसी लोकचेतना को अंगीकार करने केलिए रेणु की आलोचना करते हैं. इन सब तथ्यों को उदाहरण के साथ रख कर वीरेंद्र ने जिस तरह रामविलास जी की कथा-आलोचना को बेनकाब किया है वह निश्चय ही उल्लेखनीय है. विशेषता यह है कि रामविलास जी की मेधा के प्रति उन्होंने हर जगह संभव सम्मान बनाये रखा है. लेकिन वह कोई कुहेलिका भी नहीं गढ़ते. इस लेख के समापन में वह लिखते हैं- ' अमृतलाल नागर और वृन्दावनलाल वर्मा के प्रति रामविलास शर्मा की अतिरिक्त सहृदयता और मैत्री-भाव तथा राहुल, यशपाल, और रांगेय राघव के प्रति शत्रुता की सीमा तक आलोचकीय कठोरता उन्हें राग-द्वेष से मुक्त आलोचकों की पांत में नहीं खड़ा करती. राहुल व राघव के मुकाबले शिवसागर मिश्र व हिमांशु श्रीवास्तव का महिमामंडन उस संकीर्णतावादी दृष्टि का हिंदी कुसंस्करण है, जिसका इस्तेमाल कर स्टालिन काल में रूस के संस्कृति मंत्री ज़्दानोव ने लेखकों की बड़ी जमात को कुजात घोषित कर दण्डित किया था. " (पृष्ठ 291 ) 

कहना न होगा, वीरेंद्र यादव ने मार्क्सवादी अतिवाद को सूक्ष्मता से समझने की कोशिश की है और हिंदी कथा-आलोचना के अवरोधों से हमें परिचित कराया है. हम उम्मीद करेंगे वीरेंद्र जी अपनी आलोचना दृष्टि को इसी तरह निरंतर परिमार्जित करते रहेंगे. प्रकृति और प्रज्ञा के स्तर पर हर चीज निरन्तर परिवर्तित होती रहती है. रूढ़ि अथवा गतिरोध केवल विकार पैदा कर सकता है. मार्क्सवाद के साथ भी यही हुआ. रूढ़िवादी मार्क्सवादियों ने उसे बोल्शेविक दौर में रोक रखने की कोशिश की. नतीजा हुआ वहाँ विकार पैदा हुआ, जिस से पूरी विचारधारा पर ही संकट आ गया. हिंदी आलोचना में इसी रूढ़ि ने प्रगतिशील चेतना को विनष्ट अथवा दिग्भ्रमित किया. दलित और स्त्री-विमर्श प्रगतिशील चेतना के ही विषय थे. इनकी अलग से जरुरत इसलिए महसूस हुई कि कुछ लोग प्रगतिशील चेतना पर कुंडली मार कर बैठ गए और फतवे जारी करने लगे. आज दलित और स्त्री विमर्श को भी नए दृषिकोण से देखने की जरूरत है.  कठमुल्लापन कहीं भी विकसित हो सकता है,यदि सतत परिमार्जन न हुआ तो. 

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उपन्यास और देस 

वीरेन्द्र यादव 

सेतु प्रकाशन ,दिल्ली 

पृष्ठ 327




बुधवार, 26 जुलाई 2023

पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर -सुशील कुमार भारद्वाज

 पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर

-सुशील कुमार भारद्वाज

 

नरेंद्र कुमार का प्रथम एवं सद्यः प्रकाशित कविता संग्रहनीलामघरवर्तमान समय से रूबरू कराती कविताओं का एक संग्रह है. कवि ने परिवेशगत जीवन में व्याप्त पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों को कलमबद्ध करने की कोशिश की है. चाहे बात राजनीतिक सुविधा की हो, चाहे बात सामाजिक और राजनीतिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार की हो, चाहे मानवीय संवेदना की, चाहे प्राकृतिक दृष्टिकोण की, चाहे बात धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा की हो, कवि ने अपनी सीमा का भरपूर प्रयोग करने की कोशिश की है. कवि स्वीकार भी करता है कि वर्त्तमान समय की अराजकता के लिए सिर्फ दूसरे ही लोग दोषी नहीं हैं बल्कि इसमें हम सब की भी सामूहिक सहभागिता है. भ्रष्टाचार का जो विद्रूप चेहरा सामने नज़र आ रहा है उसके लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेवार हैं, जितना काली करतूतों में आकंठ डूबा इन्सान.

संग्रह में प्रस्तुत सभी कविताएं गौरतलब हैं. संग्रह की पहली और शीर्षक कवितानीलामघरही मनुष्य की दम तोड़ती मनुष्यता की एहसास कराती है. यह कविता उस नीलामी प्रथा की याद दिलाती है जहाँ इन्सान एक बाजारू वस्तु की तरह बिक रहा है. एक तरफ क्रिकेट की दुनिया है, जहाँ लोग लाखों-करोड़ों रूपये में शौक से बिक कर किसी का गुलाम बनते हैं, वहीं दूसरी ओर चमड़ी से भी दमड़ी निकाल लेने की कीमत पर भूख से बिलबिलाते लोग बिकने को तैयार हैं. दोनों जगह लोग पेट की क्षुधा मिटाने के लिए ही बिक रहे हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि कोई शौक से बिक रहा है और कोई बिकने के लिए मजबूर किया जा रहा है.




ग्लेडिएटरकविता को भी इस कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मनुष्य अपने युद्धोन्मादी सनक में अपने मनोरंजन के लिए दूसरे मनुष्य को बहुत ही बेबाकी और बेफिक्री से मौत के घाट उतरते देख खुश होता है. उसे हार-जीत की चिंता है लेकिन खत्म होते इंसानियत की नहीं. और आश्चर्य भी कम नहीं कि बदहाली में जी रहे परिवार को संभाल लेने के भ्रम में युवा भी चंद रुपयों की खातिर अपनी जवानी को दांव पर लगाने से नहीं चुकते हैं.

संत्रास के विभिन्न स्वरूपों के बीच भी कवि वैसे युवाओं को अपने परिवेश में ढूढ़ ही लेता है जो जिन्दगी की जिम्मेवारियों और दुश्वारियों के बीच अपने लिए पलायन का रास्ता ढूंढ लेता है. क्षणिक सुख के लिए ही सही लेकिन वेडीजे की धुनपर बेफिक्री में इतना नशाग्रस्त हो जाते हैं कि वे अपनी सारी मूलभूत समस्याओं को भूल जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि वे बेरोजगार हैं. फसल बर्बाद हो गया है. पिता के फटे जूते की कौन कहे? माँ की पैबंद लगी साड़ी की भी सुध उसे नहीं रहती है. सरकार ऐसे ही युवाओं को तो तलाशती रहती है जो अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल कर सिर्फ उनके इशारे पर नाचते रहे. होश में आने के बाद यही युवा तो सवाल पूछेंगें. व्यवस्था पर सवाल उठाएंगें. लेकिन तब तक इतना विलंब हो चुका होगा कि इस अराजक माहौल के लिए खुद को दोषी मानते हुए कहेंगें कि इस परिस्थिति मेंमेरा भी हाथतो है. और फिर शांत हो जाएंगी उनकी आवाजें. उनका आवेग और उनका क्रोध. उनके सोचने की दिशा बदल चुकी होगी. तब वे सिर्फ पूछेंगें कितुम्हारा ईश्वरकैसा है जो भ्रष्टाचारियों को भी खुले हाथ से आशीर्वाद देता है? सत्य की कब्र पर पनपते असत्य को भी खाद-पानी देकर पुष्पित-पल्लवित होने देता है. औरआशंकित मनसे पूछेगा कि आखिर भ्रष्टाचारी कैसी तीर्थयात्रा पर जाते हैं? कैसी नदी में डुबकी लगाते हैं कि हर बार वे आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंस कर ख़ुशी से किल्लोल करते रहते हैं? औरये लोगवही लोग हैं, जिन्हें अपने कुकृत्य का ज्ञान है. उन्हें पता है कि अपराध के लिए सामाजिक और क़ानूनी रूप से दंड विधान तय है और उसी दंड से बचने की खातिर एक अपराध के बाद एक और जघन्य अपराध को अंजाम दे देते हैं.

नरेंद्र कुमार अपने परिवेश में व्याप्त राजनीतिक आबोहवा को भी बखूबी पहचानते हैं. यूँ कह लीजिए कि हर जन्मजात इंसान की तरह उनमें भी राजनीतिक कीड़ा कहीं--कहीं कुलबुलाता है, जो उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तंज कसने को मजबूर करता है. यह सर्वविदित है कि आज लोकतंत्र किस विद्रूपता का शिकार हो गया है? इसके प्रतीकों का प्रयोग आज किस प्रकार स्वार्थसिद्धि के लिए किया जा रहा है? राजनेताओं की कथनी और करनी में कितना बड़ा फासला आ गया है? ‘कुछ हिस्सा’, ‘सच-सच बताना’, ‘स्लोगन’, ‘राजनीतिआदि कविताएं राजनीति के भावार्थ को ही विविध रूप में स्पष्ट करती है. ‘क्रांतिजहां प्रभावकारी मीडिया में छूटते सत्य की व्यथा है तोहमारा प्रजातंत्रवैसे आमजन की व्यथा है जो शासकों को सत्ता सौंपकर खुद को ठगा-सा महसूस करते हैं. ‘कुत्ते-एकऔरकुत्ते-दोमें बिम्ब का प्रयोग करते हुए प्रचलित राजनीतिक हथकंडे पर ही तंज कसने की कोशिश की गई है. कवि मीडिया में क्रूर मजाक बनतेवृक्षारोपणका भी बखूबी चित्रांकन करते हैं जहाँ बेचारे पत्ते झुलस रहे हैं और अखबारों में नेताजी के चेहरे चमक रहे हैं. यूं कह लीजिए प्रकृति की कब्र पर नेताओं के चेहरे चमक रहे हैं. ‘बावनदास की वापसीसमाजवाद और पूंजीवाद के जंग पर एक राजनीतिक टिप्पणी ही है. इतना ही नहींजयंतीश्रद्धा से परे राजनीतिक स्वार्थ में क्रियाकलाप करते लोगों का चित्रांकन है, जो यांत्रिक रुप से उसमें शरीक होते हैं और सुविधा के अनुसार सुविधा की राजनीति के लिए कभी किसी की जयंती मनाते हैं, तो कभी भूल जाते हैं. कभी किसी को आमंत्रित कर लेते हैं, किसी को उपेक्षित कर देते हैं. यूं कह लीजिए कि कवि ने मौजूदा राजनीतिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है. ‘घेरे के भीतरकविता सवाल है उनके दावों पर कि आखिर देश सशक्त हाथों में कैसे हैं जब नेता को अपनों के बीच रहने के लिए ही सुरक्षा की जुगाड़ करनी पड़ती है?

कवि अपनी कविताओं में मानवीय द्वंद्व को भी जगह देता है. ‘मैं चाहता हूं कि’,‘जिंदगी’,‘याद’,‘लुकाछिपीआदि कविता रिश्तों में खोती गर्माहट को एक ताजगी देने की कोशिश करती है. ‘इंतजारवृद्धाश्रम में पड़े उन इंसानों की अंतहीन व्यथा है जिनके बच्चे पढ़-लिख कर विदेशों में रुपए तो खूब कमा रहे हैं, जिंदगी भी शायद अपने मजे से जी रहे हैं. लेकिन वे पूंजीवाद की मायावी दुनियां में अपने रिश्तों को ही भूल गए हैं. अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए हैं और भूल गए हैं अपने माता-पिता को.

भूख और शोक’, ‘रमुआ की थालीदो जून की रोटी की खातिर तरसते वैसे लोगों की व्यथा है जो दूसरों को अपने गम पर भी हँसने का मौका देते हैं. ‘शान्ति का शोकअभिव्यक्ति है बदलते समय की, जो जीवन की एकरसता से त्रस्त होकर मनुष्य शांति से अशांति की ओर और अशांति से शांति की ओर बारबार आवागमन का जद्दोजहद करता है. ‘शब्द और जीवन’, ‘टायर’, ‘कैलेंडर’, ‘भ्रम’, ‘बीहड़’, ‘तर्पणआदि कविताओं में कवि ने बिंब का बखूबी इस्तेमाल किया है. जीवन के विभिन्न दर्द को पकड़ने के लिए जहां कई बार शब्द भी अपना अर्थ खोजने लगते हैं. ‘अबकी मेले में देखा’, ‘उस पार’, ‘एक रात’, ‘सफर मेंकविता पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुकी जिन्दगी की एक सच्चाई है, जहां दिखावे की छटपटाहट है, खुद से भागने की कोशिश है. यांत्रिक जीवनशैली में मनुष्यता, सामाजिकता और रिश्तों की गर्माहट खो चुकी ठंडापन है तोतू-तू, मैं मैंमें अहम प्रदर्शन करता जीवन का सौन्दर्य है. ‘तुम्हारा शहरऔरअपना शहरमें कवि जीवन की समरसता और सामाजिकता को तलाशने की कोशिश करता है. वह असहजता महसूस करता है खुशहाली की कब्र पर पनप रहे खोखली अजनबीयत और यांत्रिकता पर. क्षुधा शांति के लिए शिकार से शिकारी बनने की प्रक्रिया हैभूख’. ‘उन्मुक्तस्वतंत्रता की अभिलाषा और भय का मिश्रित रूप है. ‘सड़ांधसमाज में फैली अराजकता पर प्रहार है, जहां हर मामले को दबाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी सच जानने की कोशिश नहीं की जाती है.

विकास के रास्तेचलकर प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश में विनाश के किनारे पहुंच चुकी है व्यवस्था. ‘सड़क पर : कुछ दृश्यमें कवि कहना चाहते हैं कि सत्ता सम्पन्न लोग ही नियमों को हर जगह तार-तार करते हैं. दुर्बल में इतनी शक्ति कहां जो वह ऐसी हिमाकत कर सके?

प्रतिदानहमारी व्यवस्था पर चोट करती कविता है, जहां श्रेष्ठ को कमतर की सेवा में प्रस्तुत कर उनकी प्रगति को ही बाधित कर दिया जाता है. ‘नई पहचानव्यवस्था पर ही चोट करती है जहां लाशों पर भी राजनीति की जाती है. मरने वाले को भी पता नहीं होता कि उनकी लाशों की गिनती आतंकियों में होगी या आमजनों में? ‘स्कूल: एक दृश्यभी व्यवस्था पर ही एक तंज है जहां आपस में बातचीत के क्रम में परिश्रम के महत्व को बखाना जा रहा है जबकि वे लोग खुद अपने कर्तव्य से विमुख हैं.

अमरत्वपरजीवी जिस तरह पौधों की वृद्धि-गति को रोक देते हैं, वैसे ही निजी हित के लिए परजीवी इंसान भी अपने स्वार्थ में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं. ‘सेंसेक्स और मांशीर्षक काफी कुछ कहती है. एक तरफ बाजार है, धन की आवाजाही है तो दूसरी तरफ मां की भावना है. रिश्ता है, लेकिन बाजार के आगे मानवीय रिश्ता दम तोड़ते नजर आता है. ‘दुख की शुरुआततो अलगाव से ही होती है लेकिन मनुष्य सोचता है कि बंटवारे के बाद सुखी रहेंगे. विकास करेंगे. लेकिन वह भूल जाता है कि विभाजन ही दुख की शुरुआत है. ‘हमारा हिस्साखुद से अलगाव, टूटन से छलकते दर्द को बयां करता है. ‘वह मारा गयाचोट है उस व्यवस्था पर जहां क्रांति का बिगुल फूंकने वाले कई बार असमय शिकारियों के शिकार बन जाते हैं और गढ ली जाती है विभिन्न प्रकार की कहानियां विभिन्न स्तरों पर. लिख दी जाती है यश-अपयश की कथाएँ.  ‘विकास का पहियाटिप्पणी है आधुनिकता के रथ पर सवार पूंजीवाद पर, जहां विकास के पथ पर चलते हुए खेलते हैं प्रकृति के नियमों से और भूल जाते हैं मूल्य उन प्रकृति के अनमोल अमूल्य तत्वों को. और जब सबकुछ समाप्त होने लगता है तो उन्हें अनमोल अमूल्य तत्वों के लिए मुंह मांगी कीमत चुकाने के लिए विवश कर दिया जाता है. ‘सिस्टमअस्पताल की बदहाली पर लिखी गई कविता है, जहां लोग आते तो हैं बहुत ही उम्मीद से. अपनों को फिर से जिन्दगी दिला पाने की उम्मीद में, लेकिन वहां मिलती है केवल निराशा. और आंसुओं के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता यही सबसे बड़ा सरकारी व्यवस्था का सच है.

दाग अच्छे हैंएक टीवी विज्ञापन का पंच लाइन है जो कीचड़, धूल को मनुष्यता और जीवन की वास्तविकता के रूप में रेखांकित करता है लेकिन कवि ने इसे तंज के रूप में इंगित करने की कोशिश की है कि किस तरह भ्रष्टाचार के गर्त में धंसे लोग नैतिकता के सारे पैमाने को तोड़कर जश्न मना रहे हैं. दागदार होना जैसे कलंक नहीं, गर्व का विषय हो. ‘जयकाराधर्म की आड़ में हिंसा को विविध रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस कविता में भी बिंब का बखूबी प्रयोग किया गया है, जैसे सफेद कपोत शांति के लिए, तलवार हिंसा के लिए, काले में असत्य/ भ्रष्टाचार के लिए, सूरज सत्य के लिए और पाक साफ के लिए. संग्रह की अंतिम कविता हैकिसान’. इसमें भी कवि ने प्रकृतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है. प्रकृति को रौंदकर विकास की सड़क बनाई जा रही है. किसान बना इंसान मार्केटिंग का गुर सीख गया है. वह लोगों को सपना दिखा-दिखाकर खेतिहर जमीन को बेचना सीख गया है. पूंजीवाद इस कदर हावी है कि सस्ती चीजों के महंगे हो जाने का डर दिखाकर भी किसी तरह खेत से मुक्ति पाना चाहता है.

नीलामघर कविता संग्रह से गुजरने के बाद युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की बातों पर सहमति बनती है किनरेंद्र कुमार की भाषा तनाव की भाषा है. उनकी कविताओं में व्यक्ति द्वारा भोगी गई परिवेशगत यातनाओं का यथार्थ अनुभव है. एक ऐसा अनुभव जो तनाव को जन्म देता है, जिसमें बेचैनी है, आक्रोश है, कुछ-कुछ रीतिगत शिल्प की टूटन है. आदर्श के नजरिए से देखे जाने पर यहाँ मूल्यों की टूटन भी है. उदार लोकतंत्र में पूंजीवादी शक्तियां बहुत कुछ तोड़ रही हैं. कवि टूटन को सजग ढंग से देख रहा है, समझ रहा है और जिस जमीन पर खड़ा है उस जमीन की धसकन से उपजा यथार्थ तनाव को जन्म दे रहा है.”

 

पुस्तक:- नीलामघर

कवि:- नरेन्द्र कुमार

पृष्ठ:- 80

मूल्य:- 120/-

प्रकाशन:- द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश

सम्पर्क:- 8210229414

Email: - sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

सोमवार, 16 जनवरी 2023

सिर्फ गुलाबी नहीं है सिनीवाली की मछलियां: प्रशांत





हिंदी कथा जगत में महिला कथाकारों के अभिव्यक्ति में ग्रामीण परिवेश में मौजूद कच्च-पक्की सड़क और धूल-मिट्टी से सने समाज का वृतांत, आधुनिकता और  उदारीकरण के बाद के दौर में कमोबेश गायब सा हो गया है। जब आधुनिक भौतिक-संसाधन के साथ तुरंत पैसे कमाने की मानसिकता लोगों के विकासवाद का प्रतीक बन चुका है। वहां सिनीवाली का कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“  आंचलिकता की झलक के साथ, ग्रामीण समाज में बदली हुई चुनौतियों को समेटकर रचनात्मक प्रहार करती है। मौजूदा हिंदी कथा-साहित्य में ग्रामीण समाज के जीवन में हो रहे  बदलाव और उस समाज की महत्वकांक्षा का विस्तार अदृश्य सा हो गया है, वहां सिनीवाली अपने कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“  ग्रामीण समाज में मौजूद संवेदनाओं का पुर्नपाठ करती हुई दिखती है।

कहानी संग्रह में पहली कहानी ”रहौं कंत होशियार“ ग्रामीण समाज में लालच से घिरे समाज में खेती-किसानी से जाता हुआ मोह, अपनी परेशानीयों से मुक्ति पाने की चाह के बाद भी खेती करनी विवशता और ग्रामीण समाज की तमाम संवेदनाओ-समस्याओं को एक सार्थक देने की कोशिश दिखती है। कहानी में जब तेजों कहता है कि धरती के तरह-तरह के सौदागर होते हैं। वो पेट भरती है सबका पर सुलगाती तो अपनी ही देह है।  एक ही संवाद में बहुत कुछ कह देता है। तेजो जब ईट-भट्टी के लिए पैसा लेकर जब अपनी जमीन पट्टे पर ना दे उसे खुद जोतने का फैसला कर अधिकतर गांव वालों के उपहास का पात्र बन जाता है और धूर्त सेठ से ठंगे जाने पर गांव वालों का नेतृत्व भी करता है।

शीर्षक कहानी तो अलग ही नायाब कहानी है एक अपहरण किए गए नौजवान से अपहरण में शामिल परिवार की युवती लौगिया  की मोहक प्रेम कहानी है गुलाब नदी की मछलियां। प्रेमी जोड़े के साथ पाठक मछली के तरह गोते लगाते हुए अंत में हैरान भी हो जाते है कि अरे ये क्या? कहानी में घटित प्रेम एक बेहद विरल क्षण से सृजित रूपक से बना है। अपहरण पर आधारित विषय पर पहले भी कहानियां लिखी गई हैं , लेकिन वे ज्यादातर अपराध के इर्द-गिर्द केन्द्रित रही है, उस महौल में प्रेम को बुनना ही किसी चुनौति से कम नहीं है।

अतिथीकहानी में जरूरी काम से शहर के बाहर गया पति के गैरमौजूदगी में, देर रात घर पर आए अनजान अतिथी को वह (जो दो छोटी बच्चियों की मां भी है), रात गुज़ारने के लिए अपने दो कमरों के घर में जगह दे तो देती है मगर आशंकाओं से चलते रात भर सो नहीं पाती है। अधजली बड़ी ही मार्मिक कहानी है जिसमें किसी प्रकार एक औरत पारिवारिक मजबूरी क शिकार होकर मानसिक कुंठा की शिकार हो जाती है और अपनों की ही दुश्मन बन जाती है। किसी को सब कुछ मिल के भी कुछ नहीं मिलता, भाभी घर में पति के रहते मां नहीं बन पाती और ननद को तो ब्याह के बाद से ही पति लेने नहीं आता।

हमलोगकहानी उन युवाओं की है जो घर बाहर के तानों से परेशान होकर काम की तलाश में गांवों से शहर की ओर पलायन तो कर बैठे हैं, मगर शहरों के दड़बेनुमा कमरों में जीवन बस काट रहे है। नायक हताशा और कुंठा से इस कदर भरा हुआ कि भावनात्मक मगर विवेकहीन फैसलों के तरह बढ़ने लगता है। कहानी इत्रदानसंपन्न घर की बेटी के ब्याह कर गांव के अमीर घर में जाने और फिर किस्मत के चलते गरीब हो जाने के वितांत को बयां करती है।  करतब बायस कहानी गांव-देहात में चुनावी सरगर्मीयों का जायज़ा लेती है कि किस तरह पुलिस की आंखों से बचाकर शराब गांव में पहुंचती और बांटी जाती है, आम जनता पैदा और शराब दोनों तरफ से अपना उल्लू सीधा करती है और स्वयं के उल्लू बन जाने से बेखबर रहती है।

बंटवाराकहानी आधुनिक समाज का कठोर सत्य है जिसमें एक वृद्ध जोड़ा अपने ही बेटों के बीच एक ही घर में बंट जाता है। बालकृण्ण बाबू और सुभाषिणी को उनके बुढ़ापे में अलग होना पड़ता है पर उनका एक-दूसरे से बेहद प्रेम परिस्थितियों के बाद भी लुप्त नहीं हो पाता है। इसीतरह दुल्हा बाबू को व्यग्यात्मक कहानी कह सकते है जिसको सिनी वाली ने स्थानीय भाषा के प्रयोंग के साथ सबसे अधिक जींवत बना दिया है। शादी के उम्र निकल जाने के बाद देर से हो रही शादी में युवक परेशान है कि शादी से पहले गांव बिरादरी की एक बुढ़िया मरणासन्न हालात में है और अगर वो मर गई तो सामाजिकता निभाने के चक्कर में इस साल भी शादी रह जाएगी।

सिनीवाली अपने कहानी संग्रह ”गुलाबी नदी की मछलियां“ के  हर  रचना  में एक अपनेपन का जुड़ाव पाठकों को देती है। हर कहानी की में आंचलिकता की झलक संग्रह की यूएसबी है। जैसे ग्राम संस्कृति आज भी शहरी बनावटीपन से बहुत दूर है वैसे ही गुलाबी नदी की मछलियां कहानी संग्रह के हर कहानी के हर पात्र पर केंद्रित विषयवस्तु  में लोकजीवन की झलक मिलती है। कथ्य और भाषा शैली का वह प्रभाव पैदा करती है कि पाठक बहता ही नहीं बंधता भी चला जाता है। ग्रामीण समाज में आचंलिकता की पगडंडियो को पकड़कर अलग राह पकड़ने का कौशल लेखिका सिनीवाली  को एक अलग कतार में खड़ा करती है और पाठकों के मन में एक अलग पहचान गढ़ती है। सम-विषम परिस्थितियों में सिनीवाली  का कहानी संग्रह पाठकों को ग्रामीण जीवन में बदल रहे समाज से आत्मसाक्षात्कार कराने में सफल होती है, यहीं सिनीवाली जी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

किताब का नाम- 'गुलाबी नदी की मछलियाँ'-


लेखिका- सिनीवाली


प्रकाशन- अन्तिका प्रकाशन


मूल्य- 180/- पेपरबैक


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समीक्षक: प्रशांत


सिनिवाली के फेसबुक वॉल से साभार।




शनिवार, 19 नवंबर 2022

मानवता की कहानी है कमलेश की पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां - सुशील कुमार भारद्वाज

 मानवता की कहानी है पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

- सुशील कुमार भारद्वाज 



“दक्खिन टोला” जैसी कहानी संग्रह के बाद कमलेश ने "पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां" के साथ अपनी महत्वपूर्ण  उपस्थिति साहित्यिक परिदृश्य में सक्रियता से दर्ज की है। कमलेश की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वे कहानियों को गुनने और उसे रोमांचक तरीके से कहने में माहिर हैं। इनकी कहानी आपको आकर्षित नहीं करती है बल्कि कहानी अपने परिवेश में आपको अवशोषित कर लेती है। कहानी की एक ऐसी दुनिया जिसमें कोरी कल्पना या ढकोसला या बनावटीपन नहीं दिखता। दिखता है तो आपका, हमारा या हमारे परिवेश के किसी व्यक्ति का दर्द और संघर्ष। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था का ऐसा ताना-बाना जिसमें इंसान अपने अस्तित्व के लिए जूझता नजर आता है। 

कथाकार के पहले संग्रह का नाम “दक्खिन टोला” है तो इस दूसरे संग्रह को सांकेतिक रूप से उत्तर टोला भी कहा जा सकता है. दरअसल कमलेश के इस दूसरे संग्रह को देखा जाय तो, स्पष्ट रूप में यह दो भाग में विभक्त नज़र आता है। एक तरफ तिवारी जी हैं, जो जिन्दगी के झंझावातों का सामना विभिन्न रूप में विविध जगह पर कर रहे हैं। और दूसरी तरफ आदिवासी लोग हैं जो अपनी जमीन, पेड़, पहाड़ और संस्कृति को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जैसी परम्परा का सहारा ले रहे हैं। चूँकि कथाकार गत वर्षों से रांची में ही पदस्थापित हैं और हाल के वर्षों में इस पत्थलगड़ी प्रकरण की वजह से झारखण्ड काफी चर्चा में भी रहा, जिसे उन्होंने करीब से जाना–समझा और कहानी के माध्यम से लोगों को इसके बारे में जागरूक करने की कोशिश की। दूसरी महत्वपूर्ण बात कि संग्रह की अधिकांश कहानियों का उद्गम स्थल कहें या लोकेल कहें वह बिहार का बक्सर जिला है जिसका चारित्रिक उभार भी कुछ कहानियों में नज़र आता है। 

संग्रह की कहानियों को संक्षिप्त रूप में देखा जाय तो पहली कहानी अघोरी में तिवारीजी का अजीब दर्द उभरता है। एक इंसान जो अपनी नामर्दगी की वजह से कुंठाग्रस्त है। जो जीवन से पलायन करते करते अपना घर-परिवार सबकुछ खो कर लगभग विक्षिप्त-सा व्यवहार करता है। उसे हमारा समाज सिद्ध पुरूष-अघोरी के रूप में विख्यात किये हुये रहता है। तिवारीजी के दुःख-दर्द को समझने-बूझने और इलाज कराने की बजाय अंधविश्वास में डूबे इंसान उसी से अपना इलाज कराने चले आते हैं जो कुंठा में आकंठ डूबा हुआ है। दूसरी कहानी पत्थलगड़ी विगत वर्ष में झारखंड की चर्चित पत्थलगड़ी प्रकरण को विशेष रूप से खोलती नज़र आती है। यह कहानी आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष को बयां करती है। आलसाराम, बिसराम बेदिया और सोगराम जैसे धुनी लोगों के बहाने उस निरीह आदिवासी समाज की पड़ताल करती है यह कहानी, जिनकी जमीन, जंगल और जीवन सरकार एवं पूंजीपतियों के षड्यंत्रकारी हवस की शिकार हो जाती है।

संग्रह की तीसरी कहानी "बाबा साहब की बांह" जातिवाद के जंजाल में फंसे समाज की खबर लेती है। जहां रवि, सुनील, इम्तियाज और राघव जैसे किताबी इम्तिहान में फेल आवारा टाईप के लड़के अपने मानवीय और सामाजिक समरसता के गुण के बदौलत समाज में फैलते दंगा-फसाद को रोकने की एक सफल कोशिश करते हैं। भले ही राजनेता अपनी वोट की राजनीति के लिए आरक्षण और जातिवाद को अपनी सुविधानुसार विभिन्न रंगों में रंगने की कोशिश करते हों।

आदिवासी समाज पर केन्द्रित दूसरी और इस संग्रह की चौथी कहानी है  "खिड़की"। पूंजीवाद का शिकार व्यवस्था किस कदर भोलेभाले आदिवासी को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है?  सच को जानते हुए भी झूठ को सच बना देने की जद्दोजहद से परिचय कराती है यह कहानी। 

"लालकोट" एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई संग्रह की पांचवीं कहानी है। जहां तिवारीजी को लव एट फर्स्ट साइट का भ्रम होता है लेकिन ज्योंही उन्हें एक बेटी का दिल पिता के लिए धड़कता हुआ महसूस होता है उन्हें अपनी बेटी की याद आने लगती है। कह सकते हैं कि पिता-पुत्री के प्रेम पर केंद्रित यह संग्रह की दूसरी कहानी है।

छोटन तिवारी का कला के प्रति अगाध लगाव और स्वयं घर-परिवार, समाज और जाति-धर्म से परे व्यवसाय को शौक के लिए अपनाकर लवण्डा बन जाने की कहानी है "प्रेम अगिन में"।

"बोक्का" कहानी के बहाने कथाकार कमलेश ने कामरेडों के कथनी और करनी के अंतर को निशाने पर लेने की कोशिश की है। कहें कि कम्युनिस्टों की छल-क्षदम को बेनकाब करने की कोशिश की है। सुदर्शन तिवारी जाति-धर्म का नारा लगाते हुए कहते हैं कि गरीबों का जाति-धर्म सिर्फ गरीबी है। सभी मजदूर एक हो जाएं। लेकिन वे अपनी बेटी गीता की शादी उसके प्रेमी कालिका ठाकुर से करवाने की बजाय उसके प्रेमी को ही दुनिया से ही रूखसत करने की कोशिश करते हैं।

"कर्ज़" कहानी भी तिवारीजी से ही शुरू होती है लेकिन कथाकार ने इसमें वैसे लोगों की बदहाली को बयां किया है जो महाजनी प्रथा के शिकार हो तन-मन-धन से सबकुछ खो चुके हैं और सरकारी व्यवस्था भी उन सूदखोर या दलाल का ही साथ देती नज़र आती है। जबकि "परिणाम" कहानी में कथाकार ने परिवार के भावनात्मक पहलू को छूने की कोशिश की है जहां पिता और पुत्र के भावनात्मक रूप से समन्वय नहीं हो पाने की वजह से परिवार बिखर जाता है। शायद बदलते समय की ही यह परिणति है।

संग्रह की अंतिम कहानी "भाई" एक ऐसे मुसहर पोस्टमास्टर की कहानी बयां करती है जो खुद इज्ज़त और स्वाभिमान की खातिर अपने घर की नौकरी से झारखंड के खूंटी जिले के अनिगड़ा में स्थानांतरण करा लेता है। लेकिन उसकी पहचान और उसका बीता हुआ समय उसका पीछा नहीं छोड़ता है। सुभरन मुंडा में उसे अपने भाई की ही छवि नज़र नहीं आती है बल्कि उसका गुण, संघर्ष और विचार भी एकाकार होता नज़र आता है। विषम परिस्थितियों की वजह से राघव सदा चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाता है। लेकिन सुभरन के इनकॉनटर की खबर से वह इस कदर भावावेश हो जाता है कि वह हिम्मत करके पत्थलगड़ी गांव घाघरा की ओर अपनी बाईक बढ़ा ही देता है। 

संग्रह में प्रस्तुत भाषा सामान्य परिवेशगत है तो बोली पात्रानुकूल और कहानी को विश्वनीयता प्रदान करने में सहायक है। कहीं भी क्लिष्ट शब्द या वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है जो कि कहानी की पठनीयता को सहज और सुगम बनाता है। कथाकार कहीं भी हड़बड़ी में नहीं दिखता है बल्कि बहुत ही धैर्य के साथ कहानी को धीमी आंच पर पकाते हुए धीरे धीरे परिणति की ओर बढ़ता है। यूँ कहें की कमलेश एक सामान्य इन्सान की असामान्य जिन्दगी बहुत ही सहजता और पठनीयता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करने की सफल कोशिश करते हैं। पात्रों को धीरे धीरे कहानी के अनुसार प्याज के छिलके की तरह अलग अलग परत में दिखाने की कोशिश करते हैं। व्यक्ति ही नहीं बल्कि स्थान को भी एक चरित्र के रूप में उभारने की कोशिश करते हैं। समग्रता में संग्रह की कहानियां मानवता की कहानी है। 

 

पुस्तक:- पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

कथाकार:- कमलेश 

प्रकाशक:- सेतु प्रकाशन प्रा. लि.

पृष्ठ:- 190

मूल्य:- 250/- 


सुशील कुमार भारद्वाज 



संपर्क:- 

मो- 8210229414

Email- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

अवधेश प्रीत की रूई लपेटी आग की समीक्षा

 

उपन्यास 'रुई लपेटी आग'

परमाणु बमों की होड़ के बरक्स मनुष्यता को बचाने का आह्वान


-   
सुशील कुमार भारद्वाज

 

फिलवक्त जब एक तरफ रूस-यूक्रेन के बीच लम्बे अरसे से युद्ध चल रहा है तो दूसरी तरफ चीन-ताइवान आमने –सामने की स्थिति में हैं और स युद्धोन्माद में सम्पूर्ण विश्व गोलबंद हो रहा है. ऐसी स्थिति में कब तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाए या किसी सनक के पल में कोई सत्ताकांक्षी राष्ट्राध्यक्ष परमाणु शक्ति का प्रयोग कर बैठे, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.इससे पूर्व हम हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु शक्ति के प्रयोग से पैदा हुई भीषण मानवीय तबाही को देख चुके हैं. इस परिप्रेक्ष्य में अवधेश प्रीत का नया उपन्यास “रुई लपेटी आग” परमाणु परीक्षणों की होड़, उनसे उपजी त्रासदी और मनुष्यता के सामने उपस्थित संकट को सम्बोधित करता हुआ कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है और विनाश बनाम सृजन के विमर्श पर ज़ोर देता है.

पोखरण की पृष्ठभूमि में परमाणु परीक्षण के जरिये मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, परमाणु हथियारों की संहारक शक्ति की याद दिलाते हुए उपन्यास पोखरण रेंज के निकटवर्ती गांवों में उत्पन्न मानवीय संकट का जो वीभत्स चित्र प्रस्तुत करता है, वह ऐसे विस्फोटों और कथित उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.  परमाणु-परीक्षण के समय निकले विकिरण की वजह से आसपास के कई गांव गंभीर बीमारियों का शिकार हो गये हैं. इन ग्रामीणों की स्थिति यह है कि दुश्मन तो बाद में मारेगा पहले स्वयं के परीक्षण से मर रहे हैं. पोखरण के आस-पास के इलाके के समर्थ लोग अपने गांवों से पलायन कर चुके हैं .लेकिन निसहाय लोग उसी अभिशप्त भूमि में अपना घर-बार, खेत-खलिहान और बची-खुची सम्पत्ति के साथ रहने को मजबूर हैं, जिनकी आँखों में न तो सुकून की नींद है, सुकून की ज़िन्दगी.

उपन्यास परमाणु परीक्षण की डरावनी फैंटेसी से शुरू होता है और अंत एक खुशनुमा पखावज वादन के कार्यक्रम से होता है. इसी ओर छोर में बुनी उपन्यास की कथा वैज्ञानिक कल्लू उर्फ़ कलीमुद्दीन अंसारी, पखावज की विदुषी अरुंधती उर्फ़ अरु उसकी शोध छात्रा बया और उसके दोस्त दीप के माध्यम से विस्तार पाती है. कलीमुद्दीन अंसारी के नेतृत्व में देश सफल परमाणु परीक्षण को अंज़ाम देता है, लेकिन उसके नेपथ्य में जो मानवीय संकट पैदा होती है, उसे सभी नज़रअंदाज़ करते हैं, यह उपन्यास उसी  संकट को सामने लाता है और परमाणु बमों के औचित्य को कठघरे में खड़ा करता है. इस प्रश्न के इर्द गिर्द वे बुनियादी प्रश्न भी उजागर होते हैं, जो एक गरीब मुल्क, उसकी बुनियादी ज़रूरतों और उसके हासिल -ज़मा का पर सोचने को विवश करता है. यह उपन्यास न्यूक्लियर बमों के औचित्य और उसके बरक्स मनुष्य समाज के विनाश के ख़तरे पर विमर्श के लिए आधार प्रस्तुत करता है. लेकिन यह उपन्यास का अगर केंद्रीय भाव है, तो कल्लू और अरु का मौन प्रेम तथा बया और दीप का अनकहा प्रेम उपन्यास के पात्रों के संबंधों को मज़बूती देता है, उदात्तता प्रदान करता है. बाबा रामरतन पखावजी और अंसारी चा के रिश्तों के माध्यम से लेखक ने उस समाज की बुनावट पर गहन और अंतरंग दृष्टि डाली है, जो ख़ालिस और पुरखुलूस हुआ करते थे. यह भारतीयता के उदार चरित्र का खूबसूरत चित्र है. अरुंधती पखावज की विदुषी है, परमाणु वैज्ञानिक कलीमुद्दीन अंसारी की बचपन की दोस्त है, वह ऐसे विस्फोट के विरुद्ध है. यह खूबसूरत कंट्रास्ट इस उपन्यास को गति देता है. और कथा में अनेक शेड्स रचता है.परमाणु के बरक्स पखावज के महत्व को उपन्यास की कथा में एक किंवदंती के ज़रिये प्रतीकित किया गया है,शिव के तांडव को लयबद्ध करने के लिए ब्रह्मा ने इसकी रचना की थी ताकि सृष्टि को विनाश से रोका जा सके. अरुंधति के शब्दों में कहें तो, “यह एक विचित्र संयोग है कि इसी राजस्थान में नाथद्वारा है, जहाँ पखावजवादन की परम्परा समृद्ध हुई. जहाँ सृजन की जड़ें मजबूत हुई. उसी राजस्थान के इस पोखरण क्षेत्र में विनाश की व्यवस्था की गई है. परमाणु बमों का परीक्षण किया गया. जहाँ से भगवान श्रीनाथजी के मंदिर में वात्सल्य, शांति, और भक्ति की रसधार बही, उसी धरती के इस छोर पर जिन्दा लोगों को जिन्दा-जी मार देने का उपक्रम किया जाना एक भयावह विडम्बना है.” (पृष्ठ -273, अवधेश प्रीत, रुई लपेटी आग)

“रुई लपेटी आग” सामाजिक सरोकारों के बड़े सवालों के साथ-साथ शेरों, कविताओं से अनेक अनकहे को संजीदगी से व्यक्त करता है, तो पूर्वकथा,अंतर्कथा, कथान्तर, परिकथा, उपकथा, अनुकथा, एवं इतिकथा शीर्षकों के अंतर्गत पूरे वितान को खड़ा करता है.उपन्यास बया, अरुंधती, कल्लू, चन्दन, गुनी, दीप, पंडितजी, और अंसारी चा के सहारे ही मुख्य रूप से खुलता है और देश-समाज के विभन्न जनसरोकारों के मुद्दों के साथ-साथ भारतीय जीवन शैली का प्रमाणिकता पक्ष प्रस्तुत करता है.

उपन्यास 1974 के पहले परमाणु परीक्षण की याद दिलाता हुआ 1998 में हुए परमाणु परीक्षण के समानांतर उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सामरिक एवं वैज्ञानिक तर्क-वितर्क के बीच राष्ट्रवादी सरकार की परमाणु नीति का विहंगावलोकन के साथ-साथ परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की सीटीबीटी पर हस्ताक्षर सम्बन्धी नीति की भी  ख़बर लेता है. 

लेखक ने बया और दीप के नाथद्वारा परम्परा पर शोध के बहाने पखावज की उत्पत्ति एवं विकास के विविध आयामों को लौकिक एवं मिथकीय उदाहरणों के साथ, उसके तकनीकी पक्ष को इस तरह गूंथा है कि वह कहीं से बोझिल नहीं हुआ. इसीके पार्श्व में बया और दीप का प्रेम पनपता है, जो कारगिल युद्ध की भेंट चढ़ जाता है. उपन्यास में कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू और अरुंधती उर्फ़ अरु का ख़ामोश प्रेम पाठकों के मन प्राण को बांधता है, हरदेव प्रताप बच्चू और मोनीषा चटर्जी का प्रेम जाति और झूठी सामंती शानो-शौकत को ठुकरा कर अपनी उच्च गरिमा के साथ स्थापित होता है. उपन्यास में जो एक चरित्र अपनी उपस्थिति से पाठकों की स्मृति को आंदोलित करता है वह है गुनी. सामाजिक रूप से उपेक्षित, आर्थिक रूप से कमज़ोर गुनी सामंती शोषण, अत्याचार और उठकर खड़ी हो जानेवाली यह स्त्री भारतीय समाज के वीभत्स चेहरे को उसकी पूरी विद्रुपता के साथ निर्वसन करती है और पूछती है, बम फोड़े से पेट भर जात हौ का

अवधेश प्रीत एक सिद्धहस्त कथाकार है, उनकी भाषा देशकाल के अनुरूप पात्रानुकूल हिंदी, उर्दू,अवधी और अन्य स्थानीय भाषाओं, बोलियों के प्रयोग से समृद्ध होती है.इस उपन्यास में भी हिंदी, उर्दू के अलावा उन्होंने अवधी एवं राजस्थानी आदि का बखूबी इस्तेमाल किया है, जो स्थानीयता और पात्रों की बनावट को विश्वसनीयता प्रदान करती है.  

उपन्यास के कवर पृष्ठ पर जो पंच लाइन है, वह घोषणा करती है,“परमाणु हथियारों की संहार-शक्ति बनाम संगीत की सृजन-शक्ति एक विचारोत्तेजक उपन्यास”. यह पंक्ति इस उपन्यास के केंद्रीय भाव को रेखांकित करती है और यह विमर्श आमंत्रित करती है कि बतौर नागरिक हम किस ओर खड़े हैं?  संगीत के बहाने जीवन की रचनात्मकता के पक्ष में हैं या राष्ट्रवाद के उन्माद में अपने विनाश का चयन करते हैं.

उपन्यास : रुई लपेटी आग

उपन्यासकार: अवधेश प्रीत

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली

पृष्ठ: 280

मूल्य: 299/-