सुशील कुमार भारद्वाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुशील कुमार भारद्वाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

डर की दूरी : सुशील कुमार भारद्वाज (कविता)

डर की दूरी

सुशील कुमार भारद्वाज 




कभी जो पास था मन के,

अब उस राह पर धुंध उतर आई है।

मैं तुमसे नहीं,

खुद से दूर भाग आई हूँ कहीं।


कहा मैंने —

“आजकल मैं दूरी बना रही हूँ,

डर लगता है, कहीं गलती न हो जाए...”

पर गलती क्या होती है?

एक क्षण की कमजोरी?

या वह चाहत,

जो शब्दों में नहीं समा पाती?


तुमने कुछ नहीं कहा,

बस देखा, जैसे कोई आईना देखता हो—

जिसमें मैं खुद को झूठा साबित नहीं कर पा रही थी।


सच यह है,

कि मैं जानती हूँ —

गलती तुमसे भी हो सकती है,

मुझसे भी।

क्योंकि गलती कभी शरीर से नहीं होती,

वह आत्मा की थकान से होती है।


यह डर, यह दूरी,

एक दीवार नहीं, एक पुकार है—

“रुको... मैं खुद को समझना चाहती हूँ।”


कभी-कभी प्रेम का सबसे सच्चा रूप

वही होता है,

जब हम उसे अधूरा छोड़ देते हैं।


मैं बस यही चाहती हूँ —

तुम मेरे भीतर बने रहो,

पर मेरे बाहर न आओ।

क्योंकि अगर तुम बाहर आ गए,

तो शायद मैं टूट जाऊँगी,

और फिर कुछ भी शेष नहीं रहेगा—

न गलती, न दूरी,

न मैं, न तुम।


बस एक सन्नाटा...

जहाँ प्रेम, डर बनकर साँस लेता रहेगा।


********************************

बुधवार, 26 जुलाई 2023

पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर -सुशील कुमार भारद्वाज

 पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर

-सुशील कुमार भारद्वाज

 

नरेंद्र कुमार का प्रथम एवं सद्यः प्रकाशित कविता संग्रहनीलामघरवर्तमान समय से रूबरू कराती कविताओं का एक संग्रह है. कवि ने परिवेशगत जीवन में व्याप्त पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों को कलमबद्ध करने की कोशिश की है. चाहे बात राजनीतिक सुविधा की हो, चाहे बात सामाजिक और राजनीतिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार की हो, चाहे मानवीय संवेदना की, चाहे प्राकृतिक दृष्टिकोण की, चाहे बात धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा की हो, कवि ने अपनी सीमा का भरपूर प्रयोग करने की कोशिश की है. कवि स्वीकार भी करता है कि वर्त्तमान समय की अराजकता के लिए सिर्फ दूसरे ही लोग दोषी नहीं हैं बल्कि इसमें हम सब की भी सामूहिक सहभागिता है. भ्रष्टाचार का जो विद्रूप चेहरा सामने नज़र आ रहा है उसके लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेवार हैं, जितना काली करतूतों में आकंठ डूबा इन्सान.

संग्रह में प्रस्तुत सभी कविताएं गौरतलब हैं. संग्रह की पहली और शीर्षक कवितानीलामघरही मनुष्य की दम तोड़ती मनुष्यता की एहसास कराती है. यह कविता उस नीलामी प्रथा की याद दिलाती है जहाँ इन्सान एक बाजारू वस्तु की तरह बिक रहा है. एक तरफ क्रिकेट की दुनिया है, जहाँ लोग लाखों-करोड़ों रूपये में शौक से बिक कर किसी का गुलाम बनते हैं, वहीं दूसरी ओर चमड़ी से भी दमड़ी निकाल लेने की कीमत पर भूख से बिलबिलाते लोग बिकने को तैयार हैं. दोनों जगह लोग पेट की क्षुधा मिटाने के लिए ही बिक रहे हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि कोई शौक से बिक रहा है और कोई बिकने के लिए मजबूर किया जा रहा है.




ग्लेडिएटरकविता को भी इस कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मनुष्य अपने युद्धोन्मादी सनक में अपने मनोरंजन के लिए दूसरे मनुष्य को बहुत ही बेबाकी और बेफिक्री से मौत के घाट उतरते देख खुश होता है. उसे हार-जीत की चिंता है लेकिन खत्म होते इंसानियत की नहीं. और आश्चर्य भी कम नहीं कि बदहाली में जी रहे परिवार को संभाल लेने के भ्रम में युवा भी चंद रुपयों की खातिर अपनी जवानी को दांव पर लगाने से नहीं चुकते हैं.

संत्रास के विभिन्न स्वरूपों के बीच भी कवि वैसे युवाओं को अपने परिवेश में ढूढ़ ही लेता है जो जिन्दगी की जिम्मेवारियों और दुश्वारियों के बीच अपने लिए पलायन का रास्ता ढूंढ लेता है. क्षणिक सुख के लिए ही सही लेकिन वेडीजे की धुनपर बेफिक्री में इतना नशाग्रस्त हो जाते हैं कि वे अपनी सारी मूलभूत समस्याओं को भूल जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि वे बेरोजगार हैं. फसल बर्बाद हो गया है. पिता के फटे जूते की कौन कहे? माँ की पैबंद लगी साड़ी की भी सुध उसे नहीं रहती है. सरकार ऐसे ही युवाओं को तो तलाशती रहती है जो अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल कर सिर्फ उनके इशारे पर नाचते रहे. होश में आने के बाद यही युवा तो सवाल पूछेंगें. व्यवस्था पर सवाल उठाएंगें. लेकिन तब तक इतना विलंब हो चुका होगा कि इस अराजक माहौल के लिए खुद को दोषी मानते हुए कहेंगें कि इस परिस्थिति मेंमेरा भी हाथतो है. और फिर शांत हो जाएंगी उनकी आवाजें. उनका आवेग और उनका क्रोध. उनके सोचने की दिशा बदल चुकी होगी. तब वे सिर्फ पूछेंगें कितुम्हारा ईश्वरकैसा है जो भ्रष्टाचारियों को भी खुले हाथ से आशीर्वाद देता है? सत्य की कब्र पर पनपते असत्य को भी खाद-पानी देकर पुष्पित-पल्लवित होने देता है. औरआशंकित मनसे पूछेगा कि आखिर भ्रष्टाचारी कैसी तीर्थयात्रा पर जाते हैं? कैसी नदी में डुबकी लगाते हैं कि हर बार वे आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंस कर ख़ुशी से किल्लोल करते रहते हैं? औरये लोगवही लोग हैं, जिन्हें अपने कुकृत्य का ज्ञान है. उन्हें पता है कि अपराध के लिए सामाजिक और क़ानूनी रूप से दंड विधान तय है और उसी दंड से बचने की खातिर एक अपराध के बाद एक और जघन्य अपराध को अंजाम दे देते हैं.

नरेंद्र कुमार अपने परिवेश में व्याप्त राजनीतिक आबोहवा को भी बखूबी पहचानते हैं. यूँ कह लीजिए कि हर जन्मजात इंसान की तरह उनमें भी राजनीतिक कीड़ा कहीं--कहीं कुलबुलाता है, जो उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तंज कसने को मजबूर करता है. यह सर्वविदित है कि आज लोकतंत्र किस विद्रूपता का शिकार हो गया है? इसके प्रतीकों का प्रयोग आज किस प्रकार स्वार्थसिद्धि के लिए किया जा रहा है? राजनेताओं की कथनी और करनी में कितना बड़ा फासला आ गया है? ‘कुछ हिस्सा’, ‘सच-सच बताना’, ‘स्लोगन’, ‘राजनीतिआदि कविताएं राजनीति के भावार्थ को ही विविध रूप में स्पष्ट करती है. ‘क्रांतिजहां प्रभावकारी मीडिया में छूटते सत्य की व्यथा है तोहमारा प्रजातंत्रवैसे आमजन की व्यथा है जो शासकों को सत्ता सौंपकर खुद को ठगा-सा महसूस करते हैं. ‘कुत्ते-एकऔरकुत्ते-दोमें बिम्ब का प्रयोग करते हुए प्रचलित राजनीतिक हथकंडे पर ही तंज कसने की कोशिश की गई है. कवि मीडिया में क्रूर मजाक बनतेवृक्षारोपणका भी बखूबी चित्रांकन करते हैं जहाँ बेचारे पत्ते झुलस रहे हैं और अखबारों में नेताजी के चेहरे चमक रहे हैं. यूं कह लीजिए प्रकृति की कब्र पर नेताओं के चेहरे चमक रहे हैं. ‘बावनदास की वापसीसमाजवाद और पूंजीवाद के जंग पर एक राजनीतिक टिप्पणी ही है. इतना ही नहींजयंतीश्रद्धा से परे राजनीतिक स्वार्थ में क्रियाकलाप करते लोगों का चित्रांकन है, जो यांत्रिक रुप से उसमें शरीक होते हैं और सुविधा के अनुसार सुविधा की राजनीति के लिए कभी किसी की जयंती मनाते हैं, तो कभी भूल जाते हैं. कभी किसी को आमंत्रित कर लेते हैं, किसी को उपेक्षित कर देते हैं. यूं कह लीजिए कि कवि ने मौजूदा राजनीतिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है. ‘घेरे के भीतरकविता सवाल है उनके दावों पर कि आखिर देश सशक्त हाथों में कैसे हैं जब नेता को अपनों के बीच रहने के लिए ही सुरक्षा की जुगाड़ करनी पड़ती है?

कवि अपनी कविताओं में मानवीय द्वंद्व को भी जगह देता है. ‘मैं चाहता हूं कि’,‘जिंदगी’,‘याद’,‘लुकाछिपीआदि कविता रिश्तों में खोती गर्माहट को एक ताजगी देने की कोशिश करती है. ‘इंतजारवृद्धाश्रम में पड़े उन इंसानों की अंतहीन व्यथा है जिनके बच्चे पढ़-लिख कर विदेशों में रुपए तो खूब कमा रहे हैं, जिंदगी भी शायद अपने मजे से जी रहे हैं. लेकिन वे पूंजीवाद की मायावी दुनियां में अपने रिश्तों को ही भूल गए हैं. अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए हैं और भूल गए हैं अपने माता-पिता को.

भूख और शोक’, ‘रमुआ की थालीदो जून की रोटी की खातिर तरसते वैसे लोगों की व्यथा है जो दूसरों को अपने गम पर भी हँसने का मौका देते हैं. ‘शान्ति का शोकअभिव्यक्ति है बदलते समय की, जो जीवन की एकरसता से त्रस्त होकर मनुष्य शांति से अशांति की ओर और अशांति से शांति की ओर बारबार आवागमन का जद्दोजहद करता है. ‘शब्द और जीवन’, ‘टायर’, ‘कैलेंडर’, ‘भ्रम’, ‘बीहड़’, ‘तर्पणआदि कविताओं में कवि ने बिंब का बखूबी इस्तेमाल किया है. जीवन के विभिन्न दर्द को पकड़ने के लिए जहां कई बार शब्द भी अपना अर्थ खोजने लगते हैं. ‘अबकी मेले में देखा’, ‘उस पार’, ‘एक रात’, ‘सफर मेंकविता पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुकी जिन्दगी की एक सच्चाई है, जहां दिखावे की छटपटाहट है, खुद से भागने की कोशिश है. यांत्रिक जीवनशैली में मनुष्यता, सामाजिकता और रिश्तों की गर्माहट खो चुकी ठंडापन है तोतू-तू, मैं मैंमें अहम प्रदर्शन करता जीवन का सौन्दर्य है. ‘तुम्हारा शहरऔरअपना शहरमें कवि जीवन की समरसता और सामाजिकता को तलाशने की कोशिश करता है. वह असहजता महसूस करता है खुशहाली की कब्र पर पनप रहे खोखली अजनबीयत और यांत्रिकता पर. क्षुधा शांति के लिए शिकार से शिकारी बनने की प्रक्रिया हैभूख’. ‘उन्मुक्तस्वतंत्रता की अभिलाषा और भय का मिश्रित रूप है. ‘सड़ांधसमाज में फैली अराजकता पर प्रहार है, जहां हर मामले को दबाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी सच जानने की कोशिश नहीं की जाती है.

विकास के रास्तेचलकर प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश में विनाश के किनारे पहुंच चुकी है व्यवस्था. ‘सड़क पर : कुछ दृश्यमें कवि कहना चाहते हैं कि सत्ता सम्पन्न लोग ही नियमों को हर जगह तार-तार करते हैं. दुर्बल में इतनी शक्ति कहां जो वह ऐसी हिमाकत कर सके?

प्रतिदानहमारी व्यवस्था पर चोट करती कविता है, जहां श्रेष्ठ को कमतर की सेवा में प्रस्तुत कर उनकी प्रगति को ही बाधित कर दिया जाता है. ‘नई पहचानव्यवस्था पर ही चोट करती है जहां लाशों पर भी राजनीति की जाती है. मरने वाले को भी पता नहीं होता कि उनकी लाशों की गिनती आतंकियों में होगी या आमजनों में? ‘स्कूल: एक दृश्यभी व्यवस्था पर ही एक तंज है जहां आपस में बातचीत के क्रम में परिश्रम के महत्व को बखाना जा रहा है जबकि वे लोग खुद अपने कर्तव्य से विमुख हैं.

अमरत्वपरजीवी जिस तरह पौधों की वृद्धि-गति को रोक देते हैं, वैसे ही निजी हित के लिए परजीवी इंसान भी अपने स्वार्थ में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं. ‘सेंसेक्स और मांशीर्षक काफी कुछ कहती है. एक तरफ बाजार है, धन की आवाजाही है तो दूसरी तरफ मां की भावना है. रिश्ता है, लेकिन बाजार के आगे मानवीय रिश्ता दम तोड़ते नजर आता है. ‘दुख की शुरुआततो अलगाव से ही होती है लेकिन मनुष्य सोचता है कि बंटवारे के बाद सुखी रहेंगे. विकास करेंगे. लेकिन वह भूल जाता है कि विभाजन ही दुख की शुरुआत है. ‘हमारा हिस्साखुद से अलगाव, टूटन से छलकते दर्द को बयां करता है. ‘वह मारा गयाचोट है उस व्यवस्था पर जहां क्रांति का बिगुल फूंकने वाले कई बार असमय शिकारियों के शिकार बन जाते हैं और गढ ली जाती है विभिन्न प्रकार की कहानियां विभिन्न स्तरों पर. लिख दी जाती है यश-अपयश की कथाएँ.  ‘विकास का पहियाटिप्पणी है आधुनिकता के रथ पर सवार पूंजीवाद पर, जहां विकास के पथ पर चलते हुए खेलते हैं प्रकृति के नियमों से और भूल जाते हैं मूल्य उन प्रकृति के अनमोल अमूल्य तत्वों को. और जब सबकुछ समाप्त होने लगता है तो उन्हें अनमोल अमूल्य तत्वों के लिए मुंह मांगी कीमत चुकाने के लिए विवश कर दिया जाता है. ‘सिस्टमअस्पताल की बदहाली पर लिखी गई कविता है, जहां लोग आते तो हैं बहुत ही उम्मीद से. अपनों को फिर से जिन्दगी दिला पाने की उम्मीद में, लेकिन वहां मिलती है केवल निराशा. और आंसुओं के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता यही सबसे बड़ा सरकारी व्यवस्था का सच है.

दाग अच्छे हैंएक टीवी विज्ञापन का पंच लाइन है जो कीचड़, धूल को मनुष्यता और जीवन की वास्तविकता के रूप में रेखांकित करता है लेकिन कवि ने इसे तंज के रूप में इंगित करने की कोशिश की है कि किस तरह भ्रष्टाचार के गर्त में धंसे लोग नैतिकता के सारे पैमाने को तोड़कर जश्न मना रहे हैं. दागदार होना जैसे कलंक नहीं, गर्व का विषय हो. ‘जयकाराधर्म की आड़ में हिंसा को विविध रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस कविता में भी बिंब का बखूबी प्रयोग किया गया है, जैसे सफेद कपोत शांति के लिए, तलवार हिंसा के लिए, काले में असत्य/ भ्रष्टाचार के लिए, सूरज सत्य के लिए और पाक साफ के लिए. संग्रह की अंतिम कविता हैकिसान’. इसमें भी कवि ने प्रकृतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है. प्रकृति को रौंदकर विकास की सड़क बनाई जा रही है. किसान बना इंसान मार्केटिंग का गुर सीख गया है. वह लोगों को सपना दिखा-दिखाकर खेतिहर जमीन को बेचना सीख गया है. पूंजीवाद इस कदर हावी है कि सस्ती चीजों के महंगे हो जाने का डर दिखाकर भी किसी तरह खेत से मुक्ति पाना चाहता है.

नीलामघर कविता संग्रह से गुजरने के बाद युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की बातों पर सहमति बनती है किनरेंद्र कुमार की भाषा तनाव की भाषा है. उनकी कविताओं में व्यक्ति द्वारा भोगी गई परिवेशगत यातनाओं का यथार्थ अनुभव है. एक ऐसा अनुभव जो तनाव को जन्म देता है, जिसमें बेचैनी है, आक्रोश है, कुछ-कुछ रीतिगत शिल्प की टूटन है. आदर्श के नजरिए से देखे जाने पर यहाँ मूल्यों की टूटन भी है. उदार लोकतंत्र में पूंजीवादी शक्तियां बहुत कुछ तोड़ रही हैं. कवि टूटन को सजग ढंग से देख रहा है, समझ रहा है और जिस जमीन पर खड़ा है उस जमीन की धसकन से उपजा यथार्थ तनाव को जन्म दे रहा है.”

 

पुस्तक:- नीलामघर

कवि:- नरेन्द्र कुमार

पृष्ठ:- 80

मूल्य:- 120/-

प्रकाशन:- द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश

सम्पर्क:- 8210229414

Email: - sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित -सुशील कुमार भारद्वाज

 

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित

-सुशील कुमार भारद्वाज

      




बिहार में साहित्य की धरती सदैव उर्वर बनी रही है. अक्सर किसी न किसी आन्दोलन का आगाज होते रहा है. और इसी निरंतरता को बरकरार रखते हुए सदी के अंतिम दशक में अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाले जिन युवा कथाकारों ने बिना किसी शोर–शराबे के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की है, उनमें से संतोष दीक्षित एक महत्वपूर्ण नाम है. संतोष दीक्षित का जन्म बिहार के भागलपुर जिला स्थित लालूचक में 8 दिसम्बर

1958 ई० को हुआ. इनका शिक्षा-दीक्षा भागलपुर, पटना और रांची में हुआ है.

दूसरे शब्दों में कहें तो जब ये होश सँभालने की स्थिति में थे तब देश महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा था जिसे इन्हें करीब से महसूसने का मौका मिला होगा. एक तरफ देश में आपातकाल की स्थिति थी तो दूसरी ओर जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन अपने चरम की ओर थी. और जब ये साहित्य जगत में प्रवेश कर रहे थे उस समय देश-दुनियां की ही आबोहवा बदल रही थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली सोवियत संघ अपने बिखराब को करीब से देख रहा था तो अमेरिका विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक अलग रूप में ढल रहा था. समाजवाद का नारा कमजोर हो रहा था और पूंजीवाद एक नई सुबह के स्वागत में खड़ी हो रही थी. भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता छाई हुई थी. एक तरफ मंडल-कमंडल का नारा गूंज रहा था तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के बहाने जय श्रीराम का नारा लग रहा था. इन सबके अलावे भारत में विनिवेश के द्वार खोले जा रहे थे. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया भूमंडलीकरण के दौर में प्रवेश कर रही थी. जिसका सीधा असर हमारे जीवनशैली पर ही नहीं पड़ा बल्कि भारतीय संस्कृति पर भी पड़ा. परिवार बिखरने लगे, रिश्ते बिखरने लगे और सिसकने को मजबूर हो गई इंसानियत. पूंजीवाद का ऐसा खौफनाक स्वरूप रिश्तों के गर्माहट में दरार डालने लगी कि सबकुछ चरमराने लगा. आदर्श और नैतिकता की बात जीवन में प्रवेश करते विवध स्तर की भ्रष्टाचार के सामने नत-मस्तक होने लगी. तो लेखक की सम्वेदना उबाल खाकर उन्हेँ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी.

मिलान कुंदेरा, सलमान रूश्दी, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविंद्रनाथ त्यागी का कुछ ऐसा प्रभाव इनके उपर पड़ा कि ये व्यंग्य लिखने लगे. हालांकि व्यंग्य की समझ इन्हें अपने पिता से विरासत में ही मिली. लेकिन कुछ समय बाद इन्हें एहसास हुआ कि व्यंग्य महज एक शैली है, अपनी बातों को सही-सही रखने के लिए कहानी ही वह विधा है जहाँ वे संतुष्टि हासिल कर सकते हैं. फिर एक बदलाव आया और कलम कहानी को तरासने लगी. कहानी के पात्र कुछ इस कदर सिर पर सवार होते कि पूरी कहानी उनसे लिखवा कर ही दम लेते.

संतोष दीक्षित जितनी सहजता से लोगों से हँसते-बोलते हुए मिलते हैं उसी सामान्य प्रक्रिया से साहित्य को भी रचते हैं. बिना किसी रणनीति के. बिना किसी दबाब के बेधड़क निरन्तर लिखते रहते हैं. बिल्कुल ही अलमस्त हो ठीक वैसे ही साहित्य कर्म में रमे रहते हैं जैसे कोई मजदूर मालिकों के दबाब में रोजमर्रा के अपने काम निबटाये चलता है. कभी धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुरवा के झोंकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए. तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्फ़ उठाते हुए. रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी जीते हुए, घर-परिवार की दैनिक जिम्मेवारियों का सहजता से निर्वहन करते हुए, पशुपालन विभाग में लगभग तीन दशक तक एक डॉक्टर की नौकरी करते हुए, जितने लोगों से इनका साबका हुआ. उन सबसे अर्जित अनुभव को इन्होंने कहीं-न-कहीं अपने कथा साहित्य में किसी न किसी रूप में पिरोने की कोशिश की है. 

इनकी कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संघर्षशील पात्र बहुतेरे बिखरे मिलेंगें. रिश्तों की कतरन में उलझें पात्र सर्वत्र बिखरे मिलेंगें जो आपको स्वयं से सवाल करने को मजबूर कर देंगें. बुलडोजर और दीमक, आखेट (1997), शहर में लछमिनिया (2001), ललस (2004), ईश्वर का जासूस (2008), एवं धूप में सीधी सड़क (2014), में ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी. मुर्गियाचक में ईद, आखेट, घर का सबसे गन्दा आदमी, शहर में लछमिनिया, ललस, चैत के पत्ते, तस्वीर, ईश्वर का जासूस, काल-कथा इत्यादि कुछ प्रमुख कहानियां न सिर्फ काफी चर्चित हुई बल्कि उर्दू, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में अनुवादित भी हुई है. कहानी के अलावे केलिडोस्कोप, घर-बदर, बगलगीर, एवं बैल की आँख, उपन्यास काफी चर्चित हैं. 

सेवानिवृति के बाद इनका पढना-लिखना ही अधिक हो रहा है. लिखना इनके लिए खुद को क्रियाशील रखने की एक कोशिश है. इसे इससे ही समझा जा सकता है कि इनका पहला उपन्यास “केलिडोस्कोप” वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ जबकि पिछले तीन वर्षों में घर-बदर (2020), बगलगीर (2022) और नवीनतम उपन्यास “बैल की आँख” आ चुकी है. इनके चारों उपन्यास का विषय अलग-अलग है.

केलिडोस्कोप कथा रस में डूबा हुआ बिहार के एक कस्बानुमा गाँव में पले–बढ़े एक सामान्य से नौजवान सन्तु उर्फ़ सत्येन्द्र दूबे का जिंदगीनामा है. जहाँ प्रवासी लोगों के विस्थापन के दर्द को उकेरने की कोशिश की गई है. इसमें न सिर्फ प्रवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं भावनात्मक संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है बल्कि पूंजीवाद के प्रभाव में विलुप्त होते पुराने भारत को बचाए रखने की कशमकश को भी दिखाने की कोशिश की गई है.

जबकि ‘घर-बदर’ एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति कुन्दू, जो कि रेलवे में साधारण-सी एक नौकरी करता है, के एक घर बना लेने के संघर्ष को रेखांकित करता है. एक घर का सपना देखने के लिए उसे क्या कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है? यह आम आदमी के सदैव आम बने रहने की अभिश्प्त्ता है या यों कहें कि उसके बस रह सकने के निरंतर संघर्ष का जीवंत बयान बन जाती है. इस अभिशप्त संघर्ष के कारणों की पड़ताल ही उपन्यास का मुख्य लक्ष्य है.

तो ‘बगलगीर’ के बहाने उपन्यासकार विद्रूप होते समय और समाज के दारुण यथार्थ को रेखांकित करने की कोशिश की है. एक ही जगह प्रेमभाव से मिलजुल कर रहने वाले किकि और अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर घुलते ही सौहार्द की बातों को भूल जाते हैं. लोग अजीब किस्म के तनाव और अविश्वास के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं. मौका पाते ही उपन्यासकार जीवन के विविध रूपों में फैलते भ्रष्टाचार, तानाशाह, और अवसरवादी प्रवृति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चुकते हैं.

जबकि नवीनतम उपन्यास ‘बैल की आँख’ पटना के पास एक गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रची गई है. ग्रामीण सामाजिक संरचना, सामाजिक मनोवृति और उसी में संतुष्ट रहने तथा उससे प्रतिकार की अवस्था को एक साथ कथा में समाहित किया गया है. जातीय व्यस्था में झूठे अभिमान के साथ जीने की वजह से किस प्रकार मानवीय प्रेम एवं सौहार्द की पौध सूख जाती है. निजी हितलाभ और भविष्य की आकांक्षाएं और बदलती परिस्थितियां समय के साथ खंडित करती चलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो उपन्यासकार ने सम्पूर्ण पारिवेशिक बदलाव को एक ग्रामीण पशु चिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश की है.

बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित संतोष दीक्षित अपने कहानी –उपन्यास को जिस किस्सागोई शैली में बेहद इत्मिनान से एक लम्बे कालखंड और लम्बी जीवन-कथा को बड़े ही सरस और रोचक अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है. पात्र एवं परिवेश के अनुकूल जिस भाषा–शैली और शब्दों व कहावतों का उपयुक्त चयन करते हैं वह इनके साहित्य को सहज, रोचक व जीवंत बना देता है.   

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा

 




नीतीश कुमार खुश हैं कि सलमान खुर्शीद ने उनकी वकालत कांग्रेस में करने की बात कही है। यदि किस्मत में लिखा होगा तो वे अगले प्रधानमंत्री भारत के बन भी सकते हैं। लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने इस महत्वकांक्षा की पूर्ति के जदयू का राजद में विलय का रास्ता क्यों चुना? वे सीधे -सीधे कांग्रेस में भी तो मर्ज कर सकते हैं पार्टी को! क्या सिर्फ कुर्सी की निरंतरता बनाए रखने के लिए यह रास्ता चुना? कांग्रेस ने एक बार पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और दो बार मनमोहन सिंह को। लेकिन तब गांधी परिवार की स्थिति कुछ और थी। परंतु अब जब राहुल गांधी मिशन की तरह "भारत जोड़ो यात्रा" को पूर्ण कर चुके हैं। एक अलग पहचान बनाने में सफलता हासिल की  है तब यहां से पीछे मुड़ने की उम्मीद है? यदि यह मौका चुक गये तो गांधी परिवार भविष्य में राहुल या प्रियंका के लिए कुछ सोच पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। इस दृष्टिकोण से तो यह सहज नहीं लगता है कि कांग्रेस खुर्शीद की बात मानेगी।  और नीतीश कुमार का व्यक्तित्व लालूजी जैसा तो कम से कम है नहीं जो केंद्र की सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हों। और इस बात की उम्मीद कम ही है कि नीतीश कुमार महज एक मंत्रालय के लिए केंद्र की राजनीति में जाएं। हां, संभव है कि उप-प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल जाय। या आगामी सत्र में उप-राष्ट्रपति या राष्ट्रपति की कुर्सी मिल जाय। या राज्यपाल की कुर्सी चाहें तो कभी भी मिल सकती है।


वैसे आने वाला वक्त बताएगा कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा का अंत किस पद पर जाकर होगा और कब होगा एवं इसके लिए उन्हें कौन कौन सी कुर्बानी देनी होगी?


#बिहार_की_राजनीति #बिहार

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

जबरन की शराबबंदी सफलता का मानक नहीं

 कुछ वर्ष पहले भी खाने -पीने के मसले पर विवाद हुआ था। उस समय कहा गया था कि खाना-पीना व्यक्तिगत मसला है इस पर किसी तरह का पाबंदी उचित नहीं। फिर शराबबंदी पर ये हंगामा क्यों? जब सम्पूर्ण बिहार में हर चौक-चौराहे पर शराब बिक रहा था तब भी वे ही लोग उन दूकानों पर लाइन लगते थे जो पीते थे। आज जब शराबबंदी लागू है तब भी वे ही लोग पी रहे हैं जो इसके आदि हैं। समझ से परे है कि श्रीमान इसे किस जिद्द में लिये बैठे हैं। खबर पढ़ने को मिली कि मुख्यमंत्री महोदय पिछले दिनों भी अपने विधायकों से बात की कि शराबबंदी लागू रखा जाय या हटा दिया जाय? अब सोचने वाली बात है कि किस पियाक विधायक में इतनी हिम्मत होगी कि अपने मुख्यमंत्री के संकल्प के विरोध में जाय? लेकिन गाहे -बगाहे अनेक मौकों पर अनेक विधायक / नेता शराबबंदी को समाप्त करने की सलाह मौखिक रूप से विभिन्न माध्यम से दें चुके हैं। 




आज उड़ती खबर मिल रही है कि सदन में मुख्यमंत्री ने कहा है कि शराब पीकर मरने वालों को एक रूपया भी नहीं दिया जाएगा। जबकि पिछले दिनों का बयान था कि जो पीयेगा वो मरेगा ही।

ऐसी परिस्थिति में उचित यही जान पड़ता है कि मुख्यमंत्री महोदय को किसी मध्यमार्ग पर जरूर विचार करना चाहिए। क्योंकि बालू और दारू ही बिहार के लिए एक नासूर बनता जा रहा है। और कोई तो वजह होगी कि वर्षों से शराबबंदी कानून लागू होने के बाबजूद लोग पी रहे हैं और मर रहे हैं। सरकार को यह भी अध्ययन करवाना चाहिए कि अन्य राज्यों की क्या स्थिति है? वहां शराबबंदी का कौन -सा माडल कार्य कर रहा है जो वहां से शराबबंदी की वजह से मौत की खबरें सुनाई नहीं पड़ती है?

नशा या सामाजिक बुराईयों से दूर रहने की सलाह/ जीवनशैली अच्छी बात है लेकिन महज एक नशा की वजह से अकाल मृत्यु को प्राप्त होना भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। फिर खाने-पीने का मसला लोगों की निजी जिंदगी का हिस्सा है उसमें किसी तरह का दखल उचित नहीं। और सच पूछा जाय तो जबरन की शराब बंदी सफलता का कोई मानक नहीं हो सकता। सफलता तब मानी जाएगी जब शराब चुनिंदा जगहों पर उपलब्ध हो, बाबजूद इसके युवा/जनता उस पेय से नफ़रत करे। उपलब्धता के बाबजूद पीने वालों की संख्या/ प्रतिशत दिन-प्रतिदिन कम होता जाय।

******************************

गौरतलब है कि व्यक्तिगत रूप से न तो मैं किसी भी प्रकार के नशा का आदि हूं न ही समर्थक हूं। हां, चाय पीने का आदि हूं लेकिन आशा करता हूं कि चाय पीने पर सरकार कोई पाबंदी नहीं लगाएगी।

-सुशील कुमार भारद्वाज


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति

 रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति: सुशील कुमार भारद्वाज 



मेरी बात कुछ लोगों को बुरी लग सकती है लेकिन सच्चाई से आप भाग नहीं सकते। जब से #रवीशकुमार ने #एनडीटीवी छोड़ी, तब से उनके पक्ष में लिखने-बोलने वाले बढ़-चढ़ कर पोस्ट पर पोस्ट किये जा रहे हैं। लेकिन मेरी समझ से मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति हैं। जब तक एनडीटीवी के मालिक राय दम्पत्ति रहे तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता का राग अलापते रहे और उनके इस्तीफा के अगले दिन कुमार साहब ने इस्तीफा दे दिया। आखिर क्यों? क्या यह मान लिया जाय कि आपके तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारिता का रहस्य राय दम्पत्ति ही थे? आप उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे?

राय दम्पत्ति को भी चैनल की जिम्मेदारी की पेशकश की गई थी लेकिन संभव है कि चैनल को जिस प्रक्रिया के तहत बेचा गया उसमें उनसे कोई राय नहीं ली गई थी इसलिए वे आहत हों, और चैनल से उन्होंने खुद को अलग कर लिया।

अब बात आती है रवीश बाबू की। वे चैनल के मालिक नहीं बल्कि महज एक कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे। उनकी रोजी रोटी का सवाल वहां से जुड़ा हुआ था। उन्हें नये मालिक ने न तो पद छोड़ने को कहा न ही उनके कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाया, फिर क्यों भयाक्रांत होकर समय से पहले ही निकल लिये? ये तो हो गया कि पानी में डूब जाने के डर से तैरने की कोशिश ही नहीं करना। आप चैनल में बने रहते जब तक की चैनल आपको हटने को नहीं कहता या फिर जब तक की आपकी रपट या बहस पर रोक नहीं लगाई जाती। यदि नया चैनल मालिक आर्थिक, मानसिक या किसी भी रूप में आपके समक्ष व्यवधान उत्पन्न करता, आप आवाज उठाते तो जनता आपके साथ खड़ी नजर आती। आपकी समस्या लोगों को समझ में आती। लेकिन आप तो निहायत ही कमजोर और डरपोक, पलायनवादी नायक साबित हुए। आप सरकार के फ़ैसलों पर सवाल उठाकर नायक बन सकते हैं जैसे कि विपक्ष का एक मात्र चेहरा आप ही हों, लेकिन चैनल मालिक से आप एक सवाल पूछने की भी हिम्मत नहीं रखते हैं? सारी क्रांति समाप्त? अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त? नहीं रवीश बाबू नहीं। कम से कम आपसे ऐसे पलायनवादी कदम की उम्मीद तो कतई नहीं थी। आपसे पहले भी दर्जनों पत्रकारों ने चैनल और अखबार छोड़ें। स्वतंत्र पत्रकारिता की। दूसरे जगह नौकरी की। अपना स्वतंत्र चैनल, अखबार या यूट्यूब चैनल शुरू किया। लेकिन सबकुछ बहुत ही शांति से। लेकिन आपने तो ढ़ोल पीट-पीट कर सबकुछ किया। भले ही आपके भक्त आपको इतिहास में दर्ज करने की बात कर रहे हों लेकिन आप एक पलायनवादी के रूप में ही याद किये जाएंगे जिसने भविष्य के डर से ही सबकुछ छोड़ दिया।

#रवीश #रवीश_कुमार #NDTV #RavishKumar

शनिवार, 19 नवंबर 2022

मानवता की कहानी है कमलेश की पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां - सुशील कुमार भारद्वाज

 मानवता की कहानी है पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

- सुशील कुमार भारद्वाज 



“दक्खिन टोला” जैसी कहानी संग्रह के बाद कमलेश ने "पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां" के साथ अपनी महत्वपूर्ण  उपस्थिति साहित्यिक परिदृश्य में सक्रियता से दर्ज की है। कमलेश की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वे कहानियों को गुनने और उसे रोमांचक तरीके से कहने में माहिर हैं। इनकी कहानी आपको आकर्षित नहीं करती है बल्कि कहानी अपने परिवेश में आपको अवशोषित कर लेती है। कहानी की एक ऐसी दुनिया जिसमें कोरी कल्पना या ढकोसला या बनावटीपन नहीं दिखता। दिखता है तो आपका, हमारा या हमारे परिवेश के किसी व्यक्ति का दर्द और संघर्ष। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था का ऐसा ताना-बाना जिसमें इंसान अपने अस्तित्व के लिए जूझता नजर आता है। 

कथाकार के पहले संग्रह का नाम “दक्खिन टोला” है तो इस दूसरे संग्रह को सांकेतिक रूप से उत्तर टोला भी कहा जा सकता है. दरअसल कमलेश के इस दूसरे संग्रह को देखा जाय तो, स्पष्ट रूप में यह दो भाग में विभक्त नज़र आता है। एक तरफ तिवारी जी हैं, जो जिन्दगी के झंझावातों का सामना विभिन्न रूप में विविध जगह पर कर रहे हैं। और दूसरी तरफ आदिवासी लोग हैं जो अपनी जमीन, पेड़, पहाड़ और संस्कृति को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जैसी परम्परा का सहारा ले रहे हैं। चूँकि कथाकार गत वर्षों से रांची में ही पदस्थापित हैं और हाल के वर्षों में इस पत्थलगड़ी प्रकरण की वजह से झारखण्ड काफी चर्चा में भी रहा, जिसे उन्होंने करीब से जाना–समझा और कहानी के माध्यम से लोगों को इसके बारे में जागरूक करने की कोशिश की। दूसरी महत्वपूर्ण बात कि संग्रह की अधिकांश कहानियों का उद्गम स्थल कहें या लोकेल कहें वह बिहार का बक्सर जिला है जिसका चारित्रिक उभार भी कुछ कहानियों में नज़र आता है। 

संग्रह की कहानियों को संक्षिप्त रूप में देखा जाय तो पहली कहानी अघोरी में तिवारीजी का अजीब दर्द उभरता है। एक इंसान जो अपनी नामर्दगी की वजह से कुंठाग्रस्त है। जो जीवन से पलायन करते करते अपना घर-परिवार सबकुछ खो कर लगभग विक्षिप्त-सा व्यवहार करता है। उसे हमारा समाज सिद्ध पुरूष-अघोरी के रूप में विख्यात किये हुये रहता है। तिवारीजी के दुःख-दर्द को समझने-बूझने और इलाज कराने की बजाय अंधविश्वास में डूबे इंसान उसी से अपना इलाज कराने चले आते हैं जो कुंठा में आकंठ डूबा हुआ है। दूसरी कहानी पत्थलगड़ी विगत वर्ष में झारखंड की चर्चित पत्थलगड़ी प्रकरण को विशेष रूप से खोलती नज़र आती है। यह कहानी आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष को बयां करती है। आलसाराम, बिसराम बेदिया और सोगराम जैसे धुनी लोगों के बहाने उस निरीह आदिवासी समाज की पड़ताल करती है यह कहानी, जिनकी जमीन, जंगल और जीवन सरकार एवं पूंजीपतियों के षड्यंत्रकारी हवस की शिकार हो जाती है।

संग्रह की तीसरी कहानी "बाबा साहब की बांह" जातिवाद के जंजाल में फंसे समाज की खबर लेती है। जहां रवि, सुनील, इम्तियाज और राघव जैसे किताबी इम्तिहान में फेल आवारा टाईप के लड़के अपने मानवीय और सामाजिक समरसता के गुण के बदौलत समाज में फैलते दंगा-फसाद को रोकने की एक सफल कोशिश करते हैं। भले ही राजनेता अपनी वोट की राजनीति के लिए आरक्षण और जातिवाद को अपनी सुविधानुसार विभिन्न रंगों में रंगने की कोशिश करते हों।

आदिवासी समाज पर केन्द्रित दूसरी और इस संग्रह की चौथी कहानी है  "खिड़की"। पूंजीवाद का शिकार व्यवस्था किस कदर भोलेभाले आदिवासी को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है?  सच को जानते हुए भी झूठ को सच बना देने की जद्दोजहद से परिचय कराती है यह कहानी। 

"लालकोट" एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई संग्रह की पांचवीं कहानी है। जहां तिवारीजी को लव एट फर्स्ट साइट का भ्रम होता है लेकिन ज्योंही उन्हें एक बेटी का दिल पिता के लिए धड़कता हुआ महसूस होता है उन्हें अपनी बेटी की याद आने लगती है। कह सकते हैं कि पिता-पुत्री के प्रेम पर केंद्रित यह संग्रह की दूसरी कहानी है।

छोटन तिवारी का कला के प्रति अगाध लगाव और स्वयं घर-परिवार, समाज और जाति-धर्म से परे व्यवसाय को शौक के लिए अपनाकर लवण्डा बन जाने की कहानी है "प्रेम अगिन में"।

"बोक्का" कहानी के बहाने कथाकार कमलेश ने कामरेडों के कथनी और करनी के अंतर को निशाने पर लेने की कोशिश की है। कहें कि कम्युनिस्टों की छल-क्षदम को बेनकाब करने की कोशिश की है। सुदर्शन तिवारी जाति-धर्म का नारा लगाते हुए कहते हैं कि गरीबों का जाति-धर्म सिर्फ गरीबी है। सभी मजदूर एक हो जाएं। लेकिन वे अपनी बेटी गीता की शादी उसके प्रेमी कालिका ठाकुर से करवाने की बजाय उसके प्रेमी को ही दुनिया से ही रूखसत करने की कोशिश करते हैं।

"कर्ज़" कहानी भी तिवारीजी से ही शुरू होती है लेकिन कथाकार ने इसमें वैसे लोगों की बदहाली को बयां किया है जो महाजनी प्रथा के शिकार हो तन-मन-धन से सबकुछ खो चुके हैं और सरकारी व्यवस्था भी उन सूदखोर या दलाल का ही साथ देती नज़र आती है। जबकि "परिणाम" कहानी में कथाकार ने परिवार के भावनात्मक पहलू को छूने की कोशिश की है जहां पिता और पुत्र के भावनात्मक रूप से समन्वय नहीं हो पाने की वजह से परिवार बिखर जाता है। शायद बदलते समय की ही यह परिणति है।

संग्रह की अंतिम कहानी "भाई" एक ऐसे मुसहर पोस्टमास्टर की कहानी बयां करती है जो खुद इज्ज़त और स्वाभिमान की खातिर अपने घर की नौकरी से झारखंड के खूंटी जिले के अनिगड़ा में स्थानांतरण करा लेता है। लेकिन उसकी पहचान और उसका बीता हुआ समय उसका पीछा नहीं छोड़ता है। सुभरन मुंडा में उसे अपने भाई की ही छवि नज़र नहीं आती है बल्कि उसका गुण, संघर्ष और विचार भी एकाकार होता नज़र आता है। विषम परिस्थितियों की वजह से राघव सदा चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाता है। लेकिन सुभरन के इनकॉनटर की खबर से वह इस कदर भावावेश हो जाता है कि वह हिम्मत करके पत्थलगड़ी गांव घाघरा की ओर अपनी बाईक बढ़ा ही देता है। 

संग्रह में प्रस्तुत भाषा सामान्य परिवेशगत है तो बोली पात्रानुकूल और कहानी को विश्वनीयता प्रदान करने में सहायक है। कहीं भी क्लिष्ट शब्द या वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है जो कि कहानी की पठनीयता को सहज और सुगम बनाता है। कथाकार कहीं भी हड़बड़ी में नहीं दिखता है बल्कि बहुत ही धैर्य के साथ कहानी को धीमी आंच पर पकाते हुए धीरे धीरे परिणति की ओर बढ़ता है। यूँ कहें की कमलेश एक सामान्य इन्सान की असामान्य जिन्दगी बहुत ही सहजता और पठनीयता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करने की सफल कोशिश करते हैं। पात्रों को धीरे धीरे कहानी के अनुसार प्याज के छिलके की तरह अलग अलग परत में दिखाने की कोशिश करते हैं। व्यक्ति ही नहीं बल्कि स्थान को भी एक चरित्र के रूप में उभारने की कोशिश करते हैं। समग्रता में संग्रह की कहानियां मानवता की कहानी है। 

 

पुस्तक:- पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

कथाकार:- कमलेश 

प्रकाशक:- सेतु प्रकाशन प्रा. लि.

पृष्ठ:- 190

मूल्य:- 250/- 


सुशील कुमार भारद्वाज 



संपर्क:- 

मो- 8210229414

Email- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

अवधेश प्रीत की रूई लपेटी आग की समीक्षा

 

उपन्यास 'रुई लपेटी आग'

परमाणु बमों की होड़ के बरक्स मनुष्यता को बचाने का आह्वान


-   
सुशील कुमार भारद्वाज

 

फिलवक्त जब एक तरफ रूस-यूक्रेन के बीच लम्बे अरसे से युद्ध चल रहा है तो दूसरी तरफ चीन-ताइवान आमने –सामने की स्थिति में हैं और स युद्धोन्माद में सम्पूर्ण विश्व गोलबंद हो रहा है. ऐसी स्थिति में कब तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाए या किसी सनक के पल में कोई सत्ताकांक्षी राष्ट्राध्यक्ष परमाणु शक्ति का प्रयोग कर बैठे, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.इससे पूर्व हम हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु शक्ति के प्रयोग से पैदा हुई भीषण मानवीय तबाही को देख चुके हैं. इस परिप्रेक्ष्य में अवधेश प्रीत का नया उपन्यास “रुई लपेटी आग” परमाणु परीक्षणों की होड़, उनसे उपजी त्रासदी और मनुष्यता के सामने उपस्थित संकट को सम्बोधित करता हुआ कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है और विनाश बनाम सृजन के विमर्श पर ज़ोर देता है.

पोखरण की पृष्ठभूमि में परमाणु परीक्षण के जरिये मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, परमाणु हथियारों की संहारक शक्ति की याद दिलाते हुए उपन्यास पोखरण रेंज के निकटवर्ती गांवों में उत्पन्न मानवीय संकट का जो वीभत्स चित्र प्रस्तुत करता है, वह ऐसे विस्फोटों और कथित उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.  परमाणु-परीक्षण के समय निकले विकिरण की वजह से आसपास के कई गांव गंभीर बीमारियों का शिकार हो गये हैं. इन ग्रामीणों की स्थिति यह है कि दुश्मन तो बाद में मारेगा पहले स्वयं के परीक्षण से मर रहे हैं. पोखरण के आस-पास के इलाके के समर्थ लोग अपने गांवों से पलायन कर चुके हैं .लेकिन निसहाय लोग उसी अभिशप्त भूमि में अपना घर-बार, खेत-खलिहान और बची-खुची सम्पत्ति के साथ रहने को मजबूर हैं, जिनकी आँखों में न तो सुकून की नींद है, सुकून की ज़िन्दगी.

उपन्यास परमाणु परीक्षण की डरावनी फैंटेसी से शुरू होता है और अंत एक खुशनुमा पखावज वादन के कार्यक्रम से होता है. इसी ओर छोर में बुनी उपन्यास की कथा वैज्ञानिक कल्लू उर्फ़ कलीमुद्दीन अंसारी, पखावज की विदुषी अरुंधती उर्फ़ अरु उसकी शोध छात्रा बया और उसके दोस्त दीप के माध्यम से विस्तार पाती है. कलीमुद्दीन अंसारी के नेतृत्व में देश सफल परमाणु परीक्षण को अंज़ाम देता है, लेकिन उसके नेपथ्य में जो मानवीय संकट पैदा होती है, उसे सभी नज़रअंदाज़ करते हैं, यह उपन्यास उसी  संकट को सामने लाता है और परमाणु बमों के औचित्य को कठघरे में खड़ा करता है. इस प्रश्न के इर्द गिर्द वे बुनियादी प्रश्न भी उजागर होते हैं, जो एक गरीब मुल्क, उसकी बुनियादी ज़रूरतों और उसके हासिल -ज़मा का पर सोचने को विवश करता है. यह उपन्यास न्यूक्लियर बमों के औचित्य और उसके बरक्स मनुष्य समाज के विनाश के ख़तरे पर विमर्श के लिए आधार प्रस्तुत करता है. लेकिन यह उपन्यास का अगर केंद्रीय भाव है, तो कल्लू और अरु का मौन प्रेम तथा बया और दीप का अनकहा प्रेम उपन्यास के पात्रों के संबंधों को मज़बूती देता है, उदात्तता प्रदान करता है. बाबा रामरतन पखावजी और अंसारी चा के रिश्तों के माध्यम से लेखक ने उस समाज की बुनावट पर गहन और अंतरंग दृष्टि डाली है, जो ख़ालिस और पुरखुलूस हुआ करते थे. यह भारतीयता के उदार चरित्र का खूबसूरत चित्र है. अरुंधती पखावज की विदुषी है, परमाणु वैज्ञानिक कलीमुद्दीन अंसारी की बचपन की दोस्त है, वह ऐसे विस्फोट के विरुद्ध है. यह खूबसूरत कंट्रास्ट इस उपन्यास को गति देता है. और कथा में अनेक शेड्स रचता है.परमाणु के बरक्स पखावज के महत्व को उपन्यास की कथा में एक किंवदंती के ज़रिये प्रतीकित किया गया है,शिव के तांडव को लयबद्ध करने के लिए ब्रह्मा ने इसकी रचना की थी ताकि सृष्टि को विनाश से रोका जा सके. अरुंधति के शब्दों में कहें तो, “यह एक विचित्र संयोग है कि इसी राजस्थान में नाथद्वारा है, जहाँ पखावजवादन की परम्परा समृद्ध हुई. जहाँ सृजन की जड़ें मजबूत हुई. उसी राजस्थान के इस पोखरण क्षेत्र में विनाश की व्यवस्था की गई है. परमाणु बमों का परीक्षण किया गया. जहाँ से भगवान श्रीनाथजी के मंदिर में वात्सल्य, शांति, और भक्ति की रसधार बही, उसी धरती के इस छोर पर जिन्दा लोगों को जिन्दा-जी मार देने का उपक्रम किया जाना एक भयावह विडम्बना है.” (पृष्ठ -273, अवधेश प्रीत, रुई लपेटी आग)

“रुई लपेटी आग” सामाजिक सरोकारों के बड़े सवालों के साथ-साथ शेरों, कविताओं से अनेक अनकहे को संजीदगी से व्यक्त करता है, तो पूर्वकथा,अंतर्कथा, कथान्तर, परिकथा, उपकथा, अनुकथा, एवं इतिकथा शीर्षकों के अंतर्गत पूरे वितान को खड़ा करता है.उपन्यास बया, अरुंधती, कल्लू, चन्दन, गुनी, दीप, पंडितजी, और अंसारी चा के सहारे ही मुख्य रूप से खुलता है और देश-समाज के विभन्न जनसरोकारों के मुद्दों के साथ-साथ भारतीय जीवन शैली का प्रमाणिकता पक्ष प्रस्तुत करता है.

उपन्यास 1974 के पहले परमाणु परीक्षण की याद दिलाता हुआ 1998 में हुए परमाणु परीक्षण के समानांतर उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सामरिक एवं वैज्ञानिक तर्क-वितर्क के बीच राष्ट्रवादी सरकार की परमाणु नीति का विहंगावलोकन के साथ-साथ परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की सीटीबीटी पर हस्ताक्षर सम्बन्धी नीति की भी  ख़बर लेता है. 

लेखक ने बया और दीप के नाथद्वारा परम्परा पर शोध के बहाने पखावज की उत्पत्ति एवं विकास के विविध आयामों को लौकिक एवं मिथकीय उदाहरणों के साथ, उसके तकनीकी पक्ष को इस तरह गूंथा है कि वह कहीं से बोझिल नहीं हुआ. इसीके पार्श्व में बया और दीप का प्रेम पनपता है, जो कारगिल युद्ध की भेंट चढ़ जाता है. उपन्यास में कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू और अरुंधती उर्फ़ अरु का ख़ामोश प्रेम पाठकों के मन प्राण को बांधता है, हरदेव प्रताप बच्चू और मोनीषा चटर्जी का प्रेम जाति और झूठी सामंती शानो-शौकत को ठुकरा कर अपनी उच्च गरिमा के साथ स्थापित होता है. उपन्यास में जो एक चरित्र अपनी उपस्थिति से पाठकों की स्मृति को आंदोलित करता है वह है गुनी. सामाजिक रूप से उपेक्षित, आर्थिक रूप से कमज़ोर गुनी सामंती शोषण, अत्याचार और उठकर खड़ी हो जानेवाली यह स्त्री भारतीय समाज के वीभत्स चेहरे को उसकी पूरी विद्रुपता के साथ निर्वसन करती है और पूछती है, बम फोड़े से पेट भर जात हौ का

अवधेश प्रीत एक सिद्धहस्त कथाकार है, उनकी भाषा देशकाल के अनुरूप पात्रानुकूल हिंदी, उर्दू,अवधी और अन्य स्थानीय भाषाओं, बोलियों के प्रयोग से समृद्ध होती है.इस उपन्यास में भी हिंदी, उर्दू के अलावा उन्होंने अवधी एवं राजस्थानी आदि का बखूबी इस्तेमाल किया है, जो स्थानीयता और पात्रों की बनावट को विश्वसनीयता प्रदान करती है.  

उपन्यास के कवर पृष्ठ पर जो पंच लाइन है, वह घोषणा करती है,“परमाणु हथियारों की संहार-शक्ति बनाम संगीत की सृजन-शक्ति एक विचारोत्तेजक उपन्यास”. यह पंक्ति इस उपन्यास के केंद्रीय भाव को रेखांकित करती है और यह विमर्श आमंत्रित करती है कि बतौर नागरिक हम किस ओर खड़े हैं?  संगीत के बहाने जीवन की रचनात्मकता के पक्ष में हैं या राष्ट्रवाद के उन्माद में अपने विनाश का चयन करते हैं.

उपन्यास : रुई लपेटी आग

उपन्यासकार: अवधेश प्रीत

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली

पृष्ठ: 280

मूल्य: 299/-