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बुधवार, 16 दिसंबर 2015

प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है : प्रभात रंजन (साक्षात्कार)



प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है : प्रभात रंजन






प्रभात रंजन की कहानियों में बिहार मजबूती के साथ मौजूद है. उनके कहानी संग्रहों 'जानकी पुल' और 'बोलेरो क्लास' की कहानियों में बदलता हुआ बिहार है, युवाओं के सपने हैं, अटाटूट महत्वाकांक्षा है. आजकल 'कोठागोई' से वे विशेष चर्चा में हैं, जिसमें उन्होंने किस्सागोई शैली में चतुर्भुज स्थान की तवायफों के किस्से कहे हैं. वे हिंदी के सबसे चर्चित साहित्यिक ब्लॉग 'जानकीपुल.कॉम के मॉडरेटर भी हैं. पेश है प्रभात रंजन से उनकी रचनाशीलता को लेकर सुशील कुमार भारद्वाज की हुई बातचीत का एक अंश :-


जानकीपुल से कोठागोई तक का सफर कैसा रहा?
मुझे याद है जानकी पुल कहानी जब आई थी तब भी उसके नयेपन को लेकर अच्छी चर्चा हुई थी.2004में.उस समय भाजपा सरकार ने इण्डिया शाइनिंग का नारा दिया था, मैंने अपने गाँव के उस पुल को याद किया था जिसके बनने की घोषणा 20 साल पहले हुई थी. लेखक के रूप में इस सफ़र से मुझे इस बात की ख़ुशी है मेरी उन कहानियों को विद्वानों-पाठकों में स्वीकृति मिली जिनके केंद्र में उत्तर बिहार के धूल भरे गाँव हैं, तिरहुत की संस्कृति है. मुझे इस बात का संतोष है कि मेरी उस भूली बिसरी संस्कृति को सभी लोगों ने भरपूर प्यार दिया है. मैं स्थानीयता का लेखक हूँ. संतोष इस बात का होता है कि उस स्थानीयता को वहां से बाहर स्वीकृति मिली. इस सफ़र की यही बड़ी उपलब्धि मुझे लगती है.
उदय प्रकाश और मनोहर श्याम जोशी जैसे रचनाकारों ने आपको कितना प्रभावित किया?   
उदय प्रकाश मेरे लिए पहले प्यार की तरह रहे हैं. जब मैं लेखक नहीं था तब उनसे काफी मिलता था. वे भी मुझसे मिलने मेरे होस्टल आते थे. उनसे मैंने यह सीखा कि लेखक के लिए विजन कितना जरूरी होता है. किस तरह अपने आस-पास, अपने परिवेश को विराट रूपक में बदला जा सकता है. उन्होंने मुझे बड़ा सोचना सिखाया.
मनोहर श्याम जोशी मेरे गुरु थे. लम्बा साथ रहा उनके साथ. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा. लेकिन सबसे बड़ी सीख उनकी यही रही कि गंभीर से गंभीर लेखन में भी पठनीयता होनी चाहिए और बेहद पठनीय रचनाओं को भी गंभीरता से लिखा जाना चाहिए. वे किसी भी विषय पर लिख सकते थे, बोल सकते थे. उर्दू शायरी से लेकर ज्योतिष तक हर विषय पर वे पूरे अधिकार के साथ चर्चा कर सकते थे. उनका रेंज अक्सर मुझे चमत्कृत कर जाता था. लेकिन उनकी संगत में रहकर मैंने हर विषय को गंभीरता से पढना सीखा. उन्होंने मुझे सिखाया कि अच्छा लेखक बनने के लिए बहुत पढना चाहिए, और कुछ भी पढना चाहिए. वे कहते थे कि 100 किताबों की एक सूची बनाकर उन्हीं पुस्तकों का बार-बार अध्ययन करना चाहिए.
यही नहीं उनसे यह सीखा कि लेखन में मुकाम बनाना है तो लेखन में एक अनुशासन का पालन करना चाहिए और रोज नियम से लिखना चाहिए.
आप अपनी रचनाओं को उत्तर बिहार पर ही विशेष केंद्रित करते हैं. कोई खास वजह?
मुझे गाब्रियल गार्सिया मार्केज याद आ रहे हैं- ‘जिंदगी वह नहीं होती है जिसे हम जीते हैं, जिंदगी वह होती है जिसे हम याद करते हैं और जिस तरह से उसे याद करते हैं. उत्तर बिहार मेरे जीवन की समृद्धि का प्रतीक है. दिल्ली में तो मैं विस्थापित हूँ. जो संस्कृति, जो समाज मुझसे छूट गया उसे अपनी कहानियों में बचाता चलता हूँ. बदलाव इतना चुपचाप और इतना तेज हो रहा है कि जल्दी ही उन स्थानीय तत्वों का लोप हो जायेगा जिनको हम अपना मानकर जिनसे जुड़ते रहे. एक लेखक के तौर पर उनको अपनी कहानियों में तो बचा पाऊं. यह पीड़ा है. मेरे लेखन में विस्थापन का दर्द है. इस सबका केंद्र उत्तर बिहार है.
बदले परिदृश्य में हिंदी साहित्य और इसके बाजार को कहाँ देखते हैं?
देखिये हिंदी की जो बड़ी ग्रंथि थी वह खुल गई है. इसका एक अकादमिक, लेखक संगठन वाला जो माहौल था वह व्यापक हुआ है. हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार हुआ और उसके पसंद का साहित्य भी सामने आ रहा है. पिछले दौर में मुख्यधारा के लेखक हिंदी में विचार बचाने के लिए लिखते थे आज जो नया लेखक वर्ग सामने आया है उसके पास पाठकों की ताकत है, वह हो सकता है वैचारिक रूप से हृष्ट पुष्ट न लगता हो मगर वह समाज के ज्यादा निकट लगने लगा है. आज हिंदी साहित्य की स्वीकृति बढ़ी है. सोशल मीडिया ने हिंदी के बाजार को एक नया आयाम दिया है, लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के लेखकों की पूछ बढ़ी है. जी, हिंदी का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, बदल रहा है, जरूरत उसे समझने की है.
लोकप्रिय साहित्य और गंभीर साहित्य के विभाजन को आप किस तरह देखते हैं?
गंभीरता कोई मूल्य नहीं है. हर भाषा में, हर समाज में दोनों तरह का साहित्य होता है, होना चाहिए. इससे भाषा समृद्ध होती है, रहती है. कहते हैं कि तुर्की भाषा में जासूसी उपन्यासों की समृद्ध परम्परा की ज़मीन पर ही ओरहान पामुक जैसा विलक्षण लेखक पैदा हुआ. हिंदी में भी फणीश्वरनाथ रेणु, मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक हुए हैं जिनको हर तरह के पाठकों का प्यार मिला. मुझे गंभीर और लोकप्रिय साहित्य हमजाद की तरह लगते हैं. आजादी पाठकों के पास रहनी चाहिए चुनने की. जिसे जो पढना है पढ़े.
युवाओं को लक्षित करके लिखे जा रहे साहित्य का क्या प्रभाव पड़ेगा?
युवाओं को लक्षित करके हर दौर में लिखा गया है. आज हिंदी में बड़ी तादाद में युवा पाठक हैं. यही हिंदी का भविष्य निर्धारित कर रहे हैं. साहित्य को भविष्योन्मुख होना ही चाहिए. समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है, उसके मानक, उसके मूल्य बड़ी तेजी से चेंज हो रहे हैं, हिंदी साहित्य को उस समाज को रूपायित करने की चुनौती है जिससे वह बच नहीं सकता.
संपादक के रूप में युवा रचनाकारों में क्या सम्भावना देखते हैं?
सबसे बड़ी बात यह है कि आज जो युवा लिख रहे हैं वे साहित्यिक गुटबंदी से पूरी तरह मुक्त हैं. हम लोगों ने जब लिखना शुरू किया था तब हम हिंदी साहित्य के सत्ता केन्द्रों को प्रभावित करने के लिए लिखते थे. उनकी नजर में आने के लिए. आज का लेखक पाठकों के लिए लिखता है. यह बहुत बड़ा बदलाव है, जो हिंदी को समृद्ध करेगा. इससे सिर्फ युवा लेखक की सम्भावना का ही पता नहीं चलता है सुशील जी बल्कि यह भी पता चलता है कि हिंदी का पाठक वर्ग कितना बड़ा और विस्तृत है. एक महीने में अगर 50 हजार के आसपास पाठक सिर्फ साहित्य पढने के लिए आयें तो यह बहुत बड़ी और उत्साहवर्धक बात है.
कला के लिए कला (आर्ट फॉर आर्ट सेक) पर आपका क्या विचार है?
भाई देखिये कला सबसे पहले कला के मानकों पर कला होनी चाहिए, अगर कविता है तो पहले कविता तो हो, विचार, उसको प्रासंगिकता देते हैं. यही हाल साहित्य की अन्य विधाओं के सन्दर्भ में भी कहे जा सकते हैं. मैं यह नहीं मानता कि बिना सामाजिक सन्दर्भ के, बिना सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के कोई साहित्य या कला विधा कालजयी हो सकती है. जो रचना काल अपने काल को गहराई से पकड़ता है, अंकित कर पाता है वही रचना कालजयी हो सकती है.
जब कुछ लोग आपके लिए मठाधीश शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो कैसा लगता है?
हा हा हा. हिंदी में मठाधीश तो वह होता है जो अकादमिक सत्ता के केंद्र में होता है या उसके पास लेखक संगठनों की सत्ता होती है. हम तो जानकी पुल वाले हैं. इस पुल के माध्यम से यह जरूर किया है कि सत्ता केन्द्रों को लगातार प्रश्नित करने का काम किया है.
इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
इन दिनों प्रेम को लेकर एक उपन्यास लिख रहा हूँ. डिजिटल एज में प्रेम और उसकी तड़प को लेकर. मुझे लगता है कि प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है. सारे नए तकनीकी माध्यमों के सहारे चलने वाले प्रेम में वह उत्कटता, वह तड़प हो सकती है क्या?
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रविवार, 5 जुलाई 2015

कोठागोई: चतुर्भुज स्थान में एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी (सुशील कुमार भारद्वाज)



प्रभात रंजन 
     कोठागोई: चतुर्भुज स्थान में एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी (सुशील कुमार भारद्वाज)
प्रभात रंजन की नयी किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र से मन में बेचैनी थी कि आखिर चतुर्भुज स्थान के बारें में क्या लिखा गया है? मन में एक ही बात समायी थी कि इन्होंने उन बदनाम गलियों में क्या देख लिया कि कलम उठाने को मजबूर हो गये? इसी बीच मालूम हुआ कि अक्सर तिरहुत क्षेत्र को कलमबद्ध करने वाले इस इंसान ने तवायफो की जिंदगी पर कुछ लिखा है| तब मन में बात आयी कि  फिर तो ये अधूरी कहानी ही होगी, क्योंकि तवायफो की जिंदगी सिर्फ चतुर्भुज स्थान तक ही सीमित तो नहीं है| लेकिन जब “कोठागोई” मेरे हाथ लगी तो, दंग रह गया| इस कोठागो ने साहित्य में कोठागोई के बहाने एक नयी विधा से ही परिचय नहीं कराया है, बल्कि बहुत ही साफगोई और अपने कठिन परिश्रम से चतुर्भुज स्थान की एक लंबी परम्परा को हमारे सामने प्रस्तुत भी किया है|
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पहली बार जाना कि लखनऊ, बनारस जैसे संगीतमय वातावरण को छोड़ लोग यहाँ आकर गाने में फक्र महसूस करते थे| पन्नाबाई, भ्रमर, गौहरजान, और चंदाबाई आदि जैसे नगीने किस प्रकार मुजफ्फरपुर के इस बाज़ार में आये, और किस तरह अपनी जिंदगी को आबाद करके, वे यहाँ से चले गये? तवायफ कितने प्रकार की होती हैं? और उनके जिंदगी की क्या ठसक और कसक थी? मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नेपाल तक में इनकी कितनी पैठ थी? कितने ऐसे हुए जो इन तवायफों से ठोकर खाकर अपमान और जलालत की जिंदगी ही नहीं झेली, बल्कि उसी चतुर्भुज मंदिर के पास फटेहाल में भीख मांगने को भी मजबूर हुए? समय के साथ चतुर्भुज स्थान का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य बदलता चला गया| मुजरा के साथ-साथ ठुमरी और दादर जैसे संगीतों का दिन ढलने लगा| आधुनिकता के दौर में गीतों के साथ नाच का जो प्रचालन शुरू हुआ, वह चतुर्भुज स्थान जैसे संगीत और कला के समृद्ध केंद्र को पतन की ओर धकेलने लगा| सिनेमाघरों आदि की शुरुआत ने भी इनकी जिंदगी के मायने ही नहीं बदले जीने और कला -प्रदर्शन के तरीके को भी बदल डाला| बाज़ार में कला कला ना रह कर एक बाजारू वस्तु बन गया| बाद के दिनों में तो शामियाना में गोलियों की बौछार होने लगी| चंदाबाई का नाम सुनते ही टेंट वाले, टेंट का पूरा दाम पहले ही वसूल लेते थे| 1980 के बाद के दिनों में तो, देर रात छापेमारी और होटलों में तवायफों के मरने की भी बातें आम होने लगी| किस्सागो ने लघु प्रेम की बड़ी कहानियों के माध्यम से चतुर्भुज स्थान के उत्थान और पतन के एक लंबे इतिहास को कहानी के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया है वह बेमिशाल है| 
मजे की तो बात ये है कि कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस धरती पर अपने पैर नहीं रखे, बल्कि शरतचंद्र चटोपाध्याय को पारो के रूप में सरस्वती से भी यहीं मुलाकात हुई थी| और यहाँ से लौटने के बाद ही उन्होंने देवदास की रचना की थी| साहित्यकार ने “दुनिया दुनिया जीवन जीवन” वाले अध्याय में यह राज भी खोला है कि इस किताब को कैसे, क्यों और किन लोगों की मदद से लिखा गया है| अंतिम शब्दों में यह भी बताया गया है कि पृथ्वीराज कपूर जानकी वल्लभ शास्त्री के पास अक्सर क्यों आते थे?
हिंदी, मैथिली और वज्जिका में लिपटी भाषा शैली जितनी मनमोहक है, शब्दों का चयन उतना ही सरल और सटीक है| पढ़ने बैठने पर 12 अध्यायों से होते हुए, 200 पन्नों का अर्ध आत्मकथात्मक शैली में लिखा यह किताब धीरे - धीरे कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता|
लेखक ने बहुत ही चालाकी से किताब के प्रारंभ में ही सारी कहानियों को चतुर्भुज स्थान की कसम खाते हुए झूठी करार दी है, जो कि सिर्फ आपको गुदगुदाएगा| आप आसानी से समझ सकते हैं कि इन शब्दों का प्रयोग किन चीजों से बचने के लिए किया गया है? फिर भी यदि कोई किताब पर अंगुली उठाना चाहे तो यही कह सकता है कि भाई तवायफों की कहानी में उसके लिखे जाने की प्रक्रिया तक की बात तो ठीक है लेकिन जानकी वल्लभ शास्त्री और रणबीर कपूर आदि की चर्चा करने की क्या जरुरत थी? क्या लेखक कुछ अधिक बताने के अपने लालच को नियंत्रित नही कर सका? लेकिन सच यह है कि शास्त्री जी का घर भी इसी चतुर्भुज स्थान में था और जब बात रचनात्मकता और कला का हो तो फिर उन्हें कैसे छोड़ा जा सकता था| पूरे संस्कृति कि कहानी यूँ ही तो बयां नही हो जाएगी?
  मुखरों के साथ शुरू होता  हर अध्याय भी इसकी प्रस्तुति की एक और विशेषता ही है| साथ ही साथ प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी की लिखी भूमिका और फ़िल्मकार इम्तियाज अली का सन्दर्भ लेखन भी काफी   प्रभावकारी है| देखा जाय तो किताब प्रशंसनीय ही नही बल्कि संग्रहणीय भी है|