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गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर  

 सुशील कुमार भारद्वाज  

प्रगतिशील लेखक संघ,बिहार के तत्वावधान में आयोजित मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह में जब अधिकांश वक्ता मुक्तिबोध के विभिन्न विचारों एवं रचनाओं को उद्धृत करते हुए समकालीन परिदृश्य में दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार पर निशाना साधते हुए भारत में फासिस्टों के आ जाने और उसके प्रभावों के तांडव को रेखांकित कर रहे थे. बाजारवाद और अस्मिता की चर्चा कर रहे थे. तब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए उठे पटना के वयोवृद्ध आलोचक व प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर एक अलग रूप में दिखे. ससमय अध्यक्षीय वक्ता के रूप आमंत्रित होने की सूचना नहीं मिलने की नाराजगी उन्होंने मंच पर ही जाहिर कर दी. और उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं भी मुक्तिबोध की तरह नेहरू के विचारों से पहले सहमत नहीं था. लेकिन जिस तरह अक्सर नेहरू की खबर रखते हुए अंत समय में मुक्तिबोध कहने लगे थे कि “नेहरू के बाद फासिस्ट आ जाएगा. इसलिए नेहरू का होना जरूरी है”. वैसे ही आज मैं भी मानता हूं कि नेहरू अच्छे थे उनके जाने के बाद फासिस्ट का खतरा है. और यह भी सच है कि आज वे सत्ता में आ गए हैं लेकिन अभी तक फासिज्म आया नहीं है. और इसके लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेवार है. जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है. आगे उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को समझना कठिन है. रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें 'अस्मिता की खोज'वाला कवि कहते हैं. इन दोनों ने ही इनका मूल्यांकन गलत किया है. ‘जिस तरह उनकी कविता ‘अंधेरे में’ को पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है. जितना उनके व्यक्तित्व का बखान किया जा रहा है. उतना वे हैं नहीं. सबसे बड़े कवि के रूप में नागार्जुन हैं. और मुक्तिबोध से कई मायने में बेहतर और जनवादी कवि हैं. मुक्तिबोध की कविता का 'अंधेरा'पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है. लोगों को सामंती फासीवाद दिखता है जबकि पूँजीवादी फासीवाद सबसे खतरनाक है.”  आगे उन्होंने कहा कि “मुक्तिबोध ने किताबों पर जो आलोचना प्रस्तुत की है वह उन्हें कुछ हद तक अलग बनाता है.”


खगेन्द्र ठाकुर की बातों का जबाब दूसरे सत्र में आलोक धन्वा ने देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कोई भी कवि छोटा या बड़ा नहीं होता है. जिसने एक भी कविता की वह कवि है. कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे किसी को छोटा और किसी को बड़ा कहा जा सके. मुक्तिबोध ने भी नागार्जुन की तरह जीवन में कई कष्ट देखे. बहुत संघर्ष किए. कोई भी महान कवि यूं ही नहीं बन जाता है. वह अपने परिवेश और पहले से मिले चीजों से भी बहुत कुछ सीखता है. मैंने तो मुक्तिबोध और नागार्जुन  दोनों से ही सीखा है. जिस जमीन को निराला ने तैयार किया उसी को मुक्तिबोध ने आगे बढ़ाया. यदि निराला नहीं होते तो मुक्तिबोध भी नहीं होते.’


दूसरे सत्र 'मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलताको संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा  ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा "एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा 'मुक्तिबोध'. मुक्तिबोध एक लाइट हाउस की तरह से थे." आलोकधन्वा ने आगे कहा "मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे. यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता. जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता. मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया जो उन्हें विजातीय बनाता है. जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता. मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे." 



मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरलीपक्षी और दीमकका जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा "मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है. ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है. मुक्तिबोध साम्राज्यवादपूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे."
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने कहा " मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत को तलाशने की बात की. उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा. भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के 'रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध होने की परिघटना की गहरी समझ से उन्होंने साठ के दशक में ही उस खतरनाक संभावना को पहचान  लिया था जो  समकालीन परिदृश्य में भयावह  ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है. इससे कैसे लड़ा जाएइसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होनेउस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए."

  पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक  तरुण कुमार ने कहा " मुक्तिबोध की पंक्ति 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'. सरकार पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा. कुछ गढ़मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं. हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है. मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता. " तरुण कुमार ने  प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और मुक्तिबोध के बीच के पत्र सन्दर्भ का उदाहरण देते हुए कहा " प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए.  लेखकों पर  प्रहार ज्यादा  हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर  आक्रमण होना चाहिए था. "  
 प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने'मुक्तिबोध जन्मशताब्दी  समारोह  के प्रथम सत्र मेंसमकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध'  को संबोधित करते हुए कहा कि “मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर जनता के संघर्ष में व्यापक रूप से  शामिल हों. मुक्तिबोध वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों में ही सिर्फ लगे रहे. वे संगठनात्मक कामों में भी भाग लिया करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की. 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था.” बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने  समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया " समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा है. जिसका नृशंस स्वरूप  हिटलर की आतताई  सत्ता में दिखती है. उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया  और उसे पराजित किया. आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना  चाहिए. मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं. " जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा " अभावों के बीच बहुसंख्यक  जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे. धारा के प्रतिकूल किस तरह जिया सकता हैएक सार्थकताएक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध. संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं.” चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार  ने परिवारभाषासमाज  से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा " मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था. मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलता. उनका युगबोध इतना व्यापक थाऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है. सरकारी नौकरी से इनकार,  कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी  देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए. अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे." 
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा "मुक्तिबोध जागने और रोने वाले कवि हैं. समय के,यथार्थ से जलने वाले कवि थे. आत्म भर्त्सना के कवि थे. रूढ़िवादी वादी स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है. बेटे को  नौकरी भी लग जाये,पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता. चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध. कविता लिखने के लिए जलना पड़ता हैगलाना पड़ता है." 
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय  के अनुसार "एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ  संघर्ष है.  मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्षकैसे मार्शल ला लग जाता है. मुक्तिबोध  के अंतःकरण का आयतन  बेहद विस्तृत है. प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान गए थे. वे यांत्रिक नहीं थे.”  दूसरे सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा "रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं. सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई."

प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारीडॉ सुनीता कुमारी  गुप्तासंजीवसीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया. संचालन प्रलेस के  प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया. जबकि दूसरे सत्र को परमाणु कुमार,शशांक शेखर ,  रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया. संचालन  कवयित्री  पूनम सिंह ने किया.

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

आलोक धन्वा की लोकप्रिय कविता -भागी हुई लड़कियां


बिहार की धरती मुंगेर में 1948 ई० को जन्म लेने वाले आलोक धन्वा अब अपनी कविताओं की वजह से नहीं बल्कि सभा-समारोह में शिरकत एवं अन्य कारणों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी। उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है। ’जनता का आदमी’, ’गोली दागो पोस्टर’, ’कपड़े के जूते’ और ’ब्रूनों की बेटियाँ’ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं। अंग्रेज़ी और रूसी में कविताओं के अनुवाद हुए हैं। उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया है। आइए पढते हैं उनकी बहुत ही लोकप्रिय कविता - "भागी हुई लड़कियां"

एक 

घर की जंजीरें 
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं 
जब घर से कोई लड़की भागती है 

क्या उस रात की याद आ रही है 
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी 
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी? 

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले! 

क्या तुम यह सोचते थे 
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गए? 
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का 
जो मंच से अटूट उठता हुआ 
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था? 

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं 
कभी वह खत 
जिसे भागने से पहले 
वह अपनी मेज पर रख गई 
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से 
उसका संवाद 
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा 
उसका आबनूस 
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे 
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफी बची हो सकती है 
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में? 

उसकी बची-खुची चीजों को 
जला डालोगे? 
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे? 
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
सन्तूर की तरह 
केश में 

तीन 

उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे 
उसके ही घर की हवा से 
उसे वहां से भी मिटाओगे 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहां से भी 
मैं जानता हूं 
कुलीनता की हिंसा ! 

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जाएगी 
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह 

वह कोई पहली लड़की नहीं है 
जो भागी है 
और न वह अन्तिम लड़की होगी 
अभी और भी लड़के होंगे 
और भी लड़कियां होंगी 
जो भागेंगे मार्च के महीने में 

लड़की भागती है 
जैसे फूलों गुम होती हुई 
तारों में गुम होती हुई 
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई 
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में 

चार 

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है 
कि कोई लड़का भी भागा होगा 

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं 
जिनके साथ वह जा सकती है 
कुछ भी कर सकती है 
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है 

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत 
घर से बाहर 
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं 
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा 
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो 

वह कहीं भी हो सकती है 
गिर सकती है 
बिखर सकती है 
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में 
गलतियां भी खुद ही करेगी 
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक 
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी 
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी 

पांच 

लड़की भागती है 
जैसे सफेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आरपार 
जर्जर दूल्हों से 
कितनी धूल उठती है 

तुम 
जो 
पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से 
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से 
कितना आतंकित होते हो 
जब स्त्री बेखौफ भटकती है 
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रमिकाओं में ! 

अब तो वह कहीं भी हो सकती है 
उन आगामी देशों में 
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा 

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है 

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी? 

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं? 

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया? 
क्या तुम उसे उठा लाए 
अपनी हैसियत अपनी ताकत से? 
तुम उठा लाए एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें 
उसके निधन के बाद की भी रातें ! 

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने 
सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में 
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
और दुनिया जब तक रहेगी 
सिर्फ आज की रात भी रहेगी