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बुधवार, 26 जुलाई 2023

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित -सुशील कुमार भारद्वाज

 

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित

-सुशील कुमार भारद्वाज

      




बिहार में साहित्य की धरती सदैव उर्वर बनी रही है. अक्सर किसी न किसी आन्दोलन का आगाज होते रहा है. और इसी निरंतरता को बरकरार रखते हुए सदी के अंतिम दशक में अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाले जिन युवा कथाकारों ने बिना किसी शोर–शराबे के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की है, उनमें से संतोष दीक्षित एक महत्वपूर्ण नाम है. संतोष दीक्षित का जन्म बिहार के भागलपुर जिला स्थित लालूचक में 8 दिसम्बर

1958 ई० को हुआ. इनका शिक्षा-दीक्षा भागलपुर, पटना और रांची में हुआ है.

दूसरे शब्दों में कहें तो जब ये होश सँभालने की स्थिति में थे तब देश महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा था जिसे इन्हें करीब से महसूसने का मौका मिला होगा. एक तरफ देश में आपातकाल की स्थिति थी तो दूसरी ओर जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन अपने चरम की ओर थी. और जब ये साहित्य जगत में प्रवेश कर रहे थे उस समय देश-दुनियां की ही आबोहवा बदल रही थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली सोवियत संघ अपने बिखराब को करीब से देख रहा था तो अमेरिका विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक अलग रूप में ढल रहा था. समाजवाद का नारा कमजोर हो रहा था और पूंजीवाद एक नई सुबह के स्वागत में खड़ी हो रही थी. भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता छाई हुई थी. एक तरफ मंडल-कमंडल का नारा गूंज रहा था तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के बहाने जय श्रीराम का नारा लग रहा था. इन सबके अलावे भारत में विनिवेश के द्वार खोले जा रहे थे. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया भूमंडलीकरण के दौर में प्रवेश कर रही थी. जिसका सीधा असर हमारे जीवनशैली पर ही नहीं पड़ा बल्कि भारतीय संस्कृति पर भी पड़ा. परिवार बिखरने लगे, रिश्ते बिखरने लगे और सिसकने को मजबूर हो गई इंसानियत. पूंजीवाद का ऐसा खौफनाक स्वरूप रिश्तों के गर्माहट में दरार डालने लगी कि सबकुछ चरमराने लगा. आदर्श और नैतिकता की बात जीवन में प्रवेश करते विवध स्तर की भ्रष्टाचार के सामने नत-मस्तक होने लगी. तो लेखक की सम्वेदना उबाल खाकर उन्हेँ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी.

मिलान कुंदेरा, सलमान रूश्दी, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविंद्रनाथ त्यागी का कुछ ऐसा प्रभाव इनके उपर पड़ा कि ये व्यंग्य लिखने लगे. हालांकि व्यंग्य की समझ इन्हें अपने पिता से विरासत में ही मिली. लेकिन कुछ समय बाद इन्हें एहसास हुआ कि व्यंग्य महज एक शैली है, अपनी बातों को सही-सही रखने के लिए कहानी ही वह विधा है जहाँ वे संतुष्टि हासिल कर सकते हैं. फिर एक बदलाव आया और कलम कहानी को तरासने लगी. कहानी के पात्र कुछ इस कदर सिर पर सवार होते कि पूरी कहानी उनसे लिखवा कर ही दम लेते.

संतोष दीक्षित जितनी सहजता से लोगों से हँसते-बोलते हुए मिलते हैं उसी सामान्य प्रक्रिया से साहित्य को भी रचते हैं. बिना किसी रणनीति के. बिना किसी दबाब के बेधड़क निरन्तर लिखते रहते हैं. बिल्कुल ही अलमस्त हो ठीक वैसे ही साहित्य कर्म में रमे रहते हैं जैसे कोई मजदूर मालिकों के दबाब में रोजमर्रा के अपने काम निबटाये चलता है. कभी धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुरवा के झोंकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए. तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्फ़ उठाते हुए. रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी जीते हुए, घर-परिवार की दैनिक जिम्मेवारियों का सहजता से निर्वहन करते हुए, पशुपालन विभाग में लगभग तीन दशक तक एक डॉक्टर की नौकरी करते हुए, जितने लोगों से इनका साबका हुआ. उन सबसे अर्जित अनुभव को इन्होंने कहीं-न-कहीं अपने कथा साहित्य में किसी न किसी रूप में पिरोने की कोशिश की है. 

इनकी कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संघर्षशील पात्र बहुतेरे बिखरे मिलेंगें. रिश्तों की कतरन में उलझें पात्र सर्वत्र बिखरे मिलेंगें जो आपको स्वयं से सवाल करने को मजबूर कर देंगें. बुलडोजर और दीमक, आखेट (1997), शहर में लछमिनिया (2001), ललस (2004), ईश्वर का जासूस (2008), एवं धूप में सीधी सड़क (2014), में ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी. मुर्गियाचक में ईद, आखेट, घर का सबसे गन्दा आदमी, शहर में लछमिनिया, ललस, चैत के पत्ते, तस्वीर, ईश्वर का जासूस, काल-कथा इत्यादि कुछ प्रमुख कहानियां न सिर्फ काफी चर्चित हुई बल्कि उर्दू, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में अनुवादित भी हुई है. कहानी के अलावे केलिडोस्कोप, घर-बदर, बगलगीर, एवं बैल की आँख, उपन्यास काफी चर्चित हैं. 

सेवानिवृति के बाद इनका पढना-लिखना ही अधिक हो रहा है. लिखना इनके लिए खुद को क्रियाशील रखने की एक कोशिश है. इसे इससे ही समझा जा सकता है कि इनका पहला उपन्यास “केलिडोस्कोप” वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ जबकि पिछले तीन वर्षों में घर-बदर (2020), बगलगीर (2022) और नवीनतम उपन्यास “बैल की आँख” आ चुकी है. इनके चारों उपन्यास का विषय अलग-अलग है.

केलिडोस्कोप कथा रस में डूबा हुआ बिहार के एक कस्बानुमा गाँव में पले–बढ़े एक सामान्य से नौजवान सन्तु उर्फ़ सत्येन्द्र दूबे का जिंदगीनामा है. जहाँ प्रवासी लोगों के विस्थापन के दर्द को उकेरने की कोशिश की गई है. इसमें न सिर्फ प्रवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं भावनात्मक संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है बल्कि पूंजीवाद के प्रभाव में विलुप्त होते पुराने भारत को बचाए रखने की कशमकश को भी दिखाने की कोशिश की गई है.

जबकि ‘घर-बदर’ एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति कुन्दू, जो कि रेलवे में साधारण-सी एक नौकरी करता है, के एक घर बना लेने के संघर्ष को रेखांकित करता है. एक घर का सपना देखने के लिए उसे क्या कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है? यह आम आदमी के सदैव आम बने रहने की अभिश्प्त्ता है या यों कहें कि उसके बस रह सकने के निरंतर संघर्ष का जीवंत बयान बन जाती है. इस अभिशप्त संघर्ष के कारणों की पड़ताल ही उपन्यास का मुख्य लक्ष्य है.

तो ‘बगलगीर’ के बहाने उपन्यासकार विद्रूप होते समय और समाज के दारुण यथार्थ को रेखांकित करने की कोशिश की है. एक ही जगह प्रेमभाव से मिलजुल कर रहने वाले किकि और अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर घुलते ही सौहार्द की बातों को भूल जाते हैं. लोग अजीब किस्म के तनाव और अविश्वास के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं. मौका पाते ही उपन्यासकार जीवन के विविध रूपों में फैलते भ्रष्टाचार, तानाशाह, और अवसरवादी प्रवृति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चुकते हैं.

जबकि नवीनतम उपन्यास ‘बैल की आँख’ पटना के पास एक गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रची गई है. ग्रामीण सामाजिक संरचना, सामाजिक मनोवृति और उसी में संतुष्ट रहने तथा उससे प्रतिकार की अवस्था को एक साथ कथा में समाहित किया गया है. जातीय व्यस्था में झूठे अभिमान के साथ जीने की वजह से किस प्रकार मानवीय प्रेम एवं सौहार्द की पौध सूख जाती है. निजी हितलाभ और भविष्य की आकांक्षाएं और बदलती परिस्थितियां समय के साथ खंडित करती चलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो उपन्यासकार ने सम्पूर्ण पारिवेशिक बदलाव को एक ग्रामीण पशु चिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश की है.

बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित संतोष दीक्षित अपने कहानी –उपन्यास को जिस किस्सागोई शैली में बेहद इत्मिनान से एक लम्बे कालखंड और लम्बी जीवन-कथा को बड़े ही सरस और रोचक अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है. पात्र एवं परिवेश के अनुकूल जिस भाषा–शैली और शब्दों व कहावतों का उपयुक्त चयन करते हैं वह इनके साहित्य को सहज, रोचक व जीवंत बना देता है.   

रविवार, 19 दिसंबर 2021

रेणु के पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते।


 *रेणु ने साधारण आदमी में विराट का चित्रण किया -अखिलेश ( संपादक, तद्भव पत्रिका)* 




( पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का दूसरा दिन  )

पटना, 19 दिसम्बर।  पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' के दूसरे दिन की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में  बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। 


दूसरे दिन की संगोष्ठी का उद्घाटन रेणु के चित्र पर माल्यार्पण करने के साथ हुआ। इस चौथे सत्र का विषय था ‛हिंदी कहानी : परम्परा, प्रयोग और रेणु’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकर और तद्भव पत्रिका के संपादक श्री अखिलेश ने की। इस सत्र की चर्चा की शुरुआत करते हुए दिल्ली से आये चर्चित कथाकार संजय कुंदन ने कहा “ फणीश्वर नाथ रेणु ऐसे कथाकार थे जिन्होंने प्रेमचन्द के ग्रामीण जीवन के सम्पूर्ण वैभव को कथा के संसार में पुनर्स्थापित किया है। वे प्रेमचंद से भिन्न हैं और भिन्न इस मायने में हैं कि उन्होंने कथा लेखन की प्रेमचंदीय शैली को नहीं अपनाया। वे परिवर्तन के हिमायती कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में साधारण आदमी के भीतर विराट का चित्रण किया है। "

पटना के चर्चित कथाकार संतोष दीक्षित के अनुसार  “ रेणु ने अपनी कथा में एक ऐसे इलाके के गाँवों के जन जीवन को उदभासित किया है जो बेहद पिछड़ा है। इस इलाके के सांस्कृतिक जीवन की संपूर्ण धड़कन को रेणु की कथाओं में सुना जा सकता है।” 

मुज़्ज़फ़रपुर से आये चर्चित कवि डॉ0 राकेश रंजन ने इस सत्र को संबोधित करते हुए कहा “ रेणु के पात्रों में अदम्य जिजीविषा देखा जा सकता है। उनके पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते। " 


अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अखिलेश ने कहा “ रेणु देशज आधुनिकता के भाष्यकार थे। वे भी अपनी रचनाओं में अपने समाज की त्रासदी को चित्रित कर रहे थे। लेकिन अपने समकालीनों से भिन्न तरीके से वे इस त्रासदी को चित्रत कर रहे थे। उनकी आधुनिकता में अपने समकालीनों की टूटन और संत्रास की जगह समरसता की भावना थी। समाज के वंचित तबके के प्रति उनका समर्थन था। वे जीवन के उल्लास का जब चित्रित  करते हैं तो उनका मकसद कभी वंचित समूह की समस्याओं को तिरोहित करना नहीं होता। रेणु प्रेमचंद के यथार्थवादी ढाँचे के विरोधी नहीं थे बल्कि उनकी यथार्थवादी परंपरा को वे दुरुस्त करते हैं। " 


इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया। इस सत्र का संचालन पटना वीमेंस कॉलेज के सहाय प्राध्यापक धनंजय कुमार ने किया और कंचन कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।



संगोष्ठी के पाँचवें सत्र के की अध्यक्षता हिंदी के साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने की। इस सत्र के अंतर्गत विभाजित विषय ‛रेणु : विविध रंग’ की शुरुआत करते हुए चर्चित कथाकर अवधेश प्रीत ने कहा “ रेणु समाज के अत्यंत वंचित समूह की लोक संस्कृतियों को अपने रिपोर्ताज का विषय बनाकर राष्ट्रीय फलक पर उभारते हैं। उनके बाढ़ पर की गयी ‛ऋणजल धनजल’ जैसी रिपोर्टिंग की चर्चा खूब होती है। उनके द्वारा बिहार में चले किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग बहुत दिलचस्प है। रेणु को साहित्यिक विधा के रूप में रिपोर्ताज को प्रतिष्ठित करने का श्रेय है।” 


हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा “ रेणु ने लोक नृत्य के वैभव को अपनी कथाओं में बहुत सफलता से समेटा है जबकि लेखक के लिए यह काम बहुत मुश्किल है। उन्होंने कथा लोक को लोक संगीत की संवेदना से भर दिया है। उनका लिखा रिपोर्ताज बहुत सजीव है। वे मूलतः एक्टिविस्ट लेखक हैं।” 


इस सत्र के विभाजित विषय ‛ रेणु और हिंदी सिनेमा’ में फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा “ रेणु की कहानी ‛तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’ पर बनी फ़िल्म ‛तीसरी कसम’ देखने लायक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में रेणु की समस्त रचनात्मक विशेषताओं को शामिल किया गया है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‛मैला आँचल’ पर धारावाहिक भी बनी है।” 


इस सत्र के अध्यक्षीय भाषण में  रेणु के संस्मरण से अपनी बातों की शुरआत करते हुए अरुण कमल ने कहा “  रेणु ने अपने एक रिपोर्ताज में लिखा है कि अरे आलोक तुम ! ये आलोक कवि आलोकधन्वा हैं। हममें रेणु के सबसे करीबी रहे हैं कवि आलोकधन्वा और रामवचन राय। अरुण कमल ने आगे कहा कि रेणु के कथेतर गद्य अयस्क हैं। उनके पास काफी स्मृतियां थीं। उनकी स्मृतियां काल के अहंकार को ध्वस्त करती हैं। रेणु अकेले आँचलिक कथाकर नहीं हैं। दुनिया के समस्त कथाकर, कलाएँ, साहित्य आँचलिक हैं। रेणु की कहानियां जीवन के गहरे रागों से लैश हैं। ये मनुष्य को कभी मरने नहीं देतीं। रेणु इसलिए बड़े लेखक थे कि उनमें धन और सत्ता के प्रति हिकारत की भावना थी। रेणु की कहानियों पर फिल्में नहीं बनायी जा सकतीं क्योंकि ये कहानियां भाषा के लिए रची गयी थीं, फ़िल्म बनाने के लिए नहीं लिखी गयी थीं।” 


सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न भी किया गया। इस सत्र का संचालन शिप्रा प्रभा ने किया। अंत में वाणिज्य महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ0 चंदन कुमार ने किया।




संगोष्ठी के छठे सत्र का का विषय था ‛सुनो कहानी रेणु की।’ इस सत्र में रेणु की तीन कहानियों का अत्यंत रोचक पाठ किया गया। पटना के सुप्रसिद्ध  रंगकर्मी  एवं टीपीएस कॉलेज में  हिंदी के प्रोफ़ेसर डॉ0 जावेद अख्तर खां ने रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‛एक आदिम रात्रि की महक’, रंगकर्मी मोना झा ने ‛संवदिया’ तथा दिल्ली की प्रसिद्ध कथानटी सुमन केशरी ने ‛रसप्रिया’ कहानी का पाठ किया।  सुमन केशरी ने अद्भुत कहानी पाठ किया। कथानटी के कहानी पाठ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज के तीनों सत्रों में भी श्रोताओं की उत्साहवर्द्धक उपस्थिति रही।  इस सत्र का संचालन पटना विश्वविद्यालय हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 तरुण कुमार ने किया। अंत में प्रो0 कुमार ने वक्ताओं, अतिथियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं को इस सार्थक आयोजन को सफल बनाने में अप्रतिम सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और संगोष्ठी के समापन की घोषणा की।

आज के कार्यक्रम में मौजूद लोगों में प्रमुख थे पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा, डॉ0 कुमारी विभा, सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा, प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ0 विनय कुमार, गजेन्द्र कांत शर्मा, जयप्रकाश, राजकुमार शाही, ग़ालिब, सुनील सिंह, डॉ0 बेबी कुमारी, प्रो0 वीरेंद्र झा,गोपाल शर्मा, डॉ0 दिलीप राम, योगेश प्रताप शेखर, संजीश शर्मा, डॉ0 सुलोचना, डॉ0 चुन्नन कुमारी, उज्ज्वल कान्त, सुशांत कुमार, उचित कुमार यादव आदि।