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बुधवार, 17 मई 2023

लालूजी और नीतीशजी के राज में फंसीं बिहार की जनता: - सुशील कुमार भारद्वाज

 बिहार की जनता उपलब्धि का भागीदार है या उपहास का? - यह अब पूर्ण रूप से विचारणीय हो गया है। कभी लोग आर्यभट्ट और पतंजलि के बहाने अपना पीठ थपथपाते नजर आते हैं तो कभी गांधीजी और जेपी के बहाने क्रांति के जनक के रूप में गौरवान्वित होते रहते हैं। कभी ज्ञान की भूमि बताकर गौतम बुद्ध और महावीर जैन के साथ साथ गुरू गोविन्द सिंह को जपते रहते हैं। बिहार का तो खैर नाम भी बौद्ध विहारों की ही वजह से है।

बुद्ध स्मृति पार्क 


अगर इतिहास इतना ही बुद्धिजीवियों से पटा है तो आधुनिक बिहार को बर्बाद किसने किया? लगभग 33 वर्षों से तो बिहार में लालूजी और नीतीशजी का ही एकछत्र राज रहा है। और दोनों के दोनों जेपी के अनुयायी हैं। छात्र आंदोलन की उपज हैं। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। और सबसे बड़ी बात कि दोनों ही अवर्ण या जातिवाद की राजनीति करने में अव्वल हैं। बाबजूद इसके बिहार पिछड़ा है आखिर क्यों? आखिर बुद्धिजीवियों / विद्वानों की यह भूमि अंधविश्वासियों की भूमि क्यों और कैसे बन गई? कैसे कोई शहर में एक बाहरी आदमी आता है और लाखों लोग उनके आगे शरणागत हो जाते हैं?

यदि बिहार की सम्पूर्ण आबादी को आंकड़ों के नजरिए से देखने की कोशिश की जाय तो लगभग 75% आबादी 33 साल से कम उम्र की है। अर्थात बिहार की 75 प्रतिशत जनता का जन्म लालूजी और नीतीशजी के शासन काल में हुआ है। तब तो सवाल जायज है न कि इन दोनों महान राजनेताओं ने राज्य में कैसी शिक्षा व्यवस्था को लागू किया कि शिक्षित लोग भी अंधविश्वासी हो गए? जबकि जाति आधारित गणना के दौरान भी सरकार ने माना कि अब बिहार में निरक्षरों की संख्या नगण्य है।

पटना म्यूजियम 


इसमें राजनेताओं को दोषी माना जाय या जनता को? जो जातिवाद के नंगा नाच को देख समझ कर भी मजा ले रही है। आजादी के इतने वर्षों के बीत जाने, तकनीक के युग में भी पिछले इतिहास में उलझी हुई है? आखिर कैसे होगा बिहार का कल्याण?

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

जननायक का जन्मदिन: प्रेमकुमार मणि

 जननायक का जन्मदिन 


प्रेमकुमार मणि 



बिहार में 24 जनवरी की तारीख राजनीतिक गलियारों में खूब चहल -पहल वाली होती है। यह दिन बिहार के समाजवादी नेता दिवंगत कर्पूरी ठाकुर ( 1924 - 1988 ) का जन्मदिन है।  वह समाजवादी पार्टी और विचारों  के नेता थे, और जब थे, तब वर्चस्वप्राप्त सामंती सामाजिक समूहों के आँखों की किरकिरी बने होते थे।  किन्तु कुछ तो है कि उनका जन्मदिन एकाध छोड़ लगभग  सभी दलों के नेता किसी न किसी रूप में मनाते हैं।  भारतीय जनता पार्टी तक के लोग भी,  जिनका सामान्यतया उनसे आजीवन विरोध रहा।  1979 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए जनता पार्टी के जनसंघी धड़े (भाजपा का पूर्व रूप ) और कांग्रेस में एकता हो गई थी। लेकिन आज इन दोनों पार्टियों के नेता भी उनका वंदन -अभिनंदन करते हैं। 


कर्पूरी ठाकुर अनेक मामलों में अजूबे थे। उनका जन्म सामाजिक रूप से एक अत्यंत पिछड़े परिवार में हुआ था। पिता गोकुल ठाकुर पारम्परिक जाति- व्यवस्था में नाई थे, जिनका पेशा हजामत बनाना और बड़े लोगों की सेवा करना होता था।  ऐसे ही परिवार में 1920 के दशक में उनका जन्म हुआ।  वह जमाना राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का था।  समाज करवट ले रहा था। शायद करवट का ही असर था कि उन्हें स्कूल जाना नसीब हुआ था।  कहते हैं जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, तब उनके पिता उन्हें साथ ले कर गाँव के  एक सामंत के घर गए। बेटे की सफलता से उल्लसित पिता ने  बतलाया  कि बेटा मैट्रिक पास कर गया है और आगे पढ़ना चाहता है। सामंत अपने दालान पर लकड़ी के कुंदे की तरह लेटा हुआ था। हिला और किशोर कर्पूरी को एक नजर देखा। बोला - ' अच्छा तूने मैट्रिक पास किया है ? आओ मेरे पैर दबाओ।'  यह  बिहार का सामंतवादी समाज था, जो जातिवाद के दलदल में भी बुरी तरह धंसा था।  हजार तरह की रूढ़ियाँ और उतने ही तरह के पाखंड। शोषण का अंतहीन सिलसिला। 


ऐसे ही समाज में कर्पूरी ठाकुर ने आँखें खोली।  वह उस बिहार से थे, जहाँ 1930 के दशक में जयप्रकाश नारायण की पहल पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी थी,  जहाँ  स्वामी सहजानंद ने  किसान आंदोलन को खड़ा किया था। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हो गया था।  त्रिवेणी सभा के नेतृत्व में पिछड़े किसानों, मजदूरों, दस्तकारों ने सामाजिक परिवर्तन की नई मुहिम शुरू की थी।  कर्पूरी ठाकुर चुपचाप समाजवादी आंदोलन और पार्टी से जुड़े और जल्दी ही उनके बीच अपनी पहचान बना ली। 1952 में जब पहला आमचुनाव हुआ, तब वह समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ कर बिहार विधानसभा में पहुंचे। उसके बाद वह लगातार धारासभाओं में बने रहे।  बिहार के एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री बने। जब सरकार से बाहर रहे तब प्रतिपक्ष के पर्याय बने रहे। 


लेकिन क्या यही उनकी विशेषता है, जिनके लिए आज उनकी चर्चा होती है ? शायद नहीं।  सच्चाई यह है कि वह सरकार में बहुत कम समय के लिए रहे।पहली दफा 22  दिसम्बर 1970  से 30  जून 1971  तक और दूसरी दफा 24 जून 1977 से 30 जून 1979 तक।  दोनों बार मिला कर उनका कार्यकाल ढाई साल का होता है।  इसके अलावे 1967_68 में दस महीनों के लिए उपमुख्यमंत्री भी रहे। यही उनके हुकूमत की अवधि थी।  इस अल्पकाल में ही बिहार के सामाजिक -राजनीतिक जीवन को उन्होंने जिस तरह प्रभावित किया उसकी चर्चा आज तक होती है।


बिहार में केवल एक बार शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ और वह कर्पूरी ठाकुर  ने किया।  पढाई में अंग्रेजी की अनिवार्यता को ख़त्म कर के उसे किसान मजदूरों के बच्चों के लिए सुगम बना दिया, जो अंग्रेजी के कारण अटक जाते थे और जिनकी पढाई बाधित  हो जाती थी।  जिंदगी भर नॉन मैट्रिक बने रहने की पीड़ा वह झेलते रहते थे।  अंग्रेजी के बिना भी बहुत अंशों तक पढाई की जा सकती है।  इसे उन्होंने  रेखांकित किया। दलित -पिछड़े तबकों और स्त्रियों  में इससे शिक्षा में आकर्षण बढ़ा। उनका दूसरा काम स्कूलों में टूशन फीस को समाप्त करना था। इससे स्कूलों में बच्चों का ड्रॉपआउट कमजोर हुआ।  शिक्षा सुधार का  यह एक क्रांतिकारी कदम था। 1977 में उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर सरकारी नौकरियों में पिछड़े तबकों के लिए छब्बीस फीसद आरक्षण सुनिश्चित किया। कार्यपालिका के जनतंत्रीकरण का उत्तर भारत में यह पहला प्रयास था। इसके साथ सभी स्तरों पर भूमिसुधार कानूनों को लागू कर बिहारी समाज के सामंतवादी ढाँचे की चूलें हिला दी।  इन सब के लिए बिहार के सामंतों ने कर्पूरी ठाकुर को कभी मुआफ नहीं किया। सामंती ताकतों से तिरस्कार और विरोध का जो तेवर कर्पूरी ठाकुर को झेलना पड़ा, वैसा किसी कम्युनिस्ट नेता को भी नसीब नहीं हुआ।  1980 के आरम्भ में मध्य बिहार के ग्रामीण इलाके  जब नक्सलवाद से प्रभावित हुए तब सामंतों ने पटना जिले के बिक्रम में एक सशस्त्र जुलूस निकाला; जिसमें मुख्य नारा था - ' नक्सलवाद कहाँ से आई, कर्पूरी की माई बिआई .' सामंतों का आकलन बहुत हद तक सही था।  गरीबों को उठ कर अपनी आवाज बुलंद करने का साहस कर्पूरी ठाकुर ने ही दिया था।  वही उनके टारगेट थे।


      बावजूद इन सब के  उन्होंने कभी किसी से बैर भाव नहीं पाला। वह जो कर रहे थे, न्याय के लिए कर रहे थे, नफरत फ़ैलाने के लिए नहीं।  एकबार उनके मुख्यमंत्री रहते सामंतों ने उनके पिता की पिटाई की।  कलक्टर ने पिटाई करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख लिया। कर्पूरी ठाकुर ने कलक्टर को उन्हें यह कहते  हुए छोड़ देने के लिए कहा कि मेरे पिता की तरह बहुत से गरीबों की रोज पिटाई हो रही है।  जब सब की पिटाई बंद हो जाएगी मेरे पिता की भी  पिटाई नहीं होगी।  समस्या के व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक निदान में उनका विश्वास था। इसलिए कि वह सच्चे समाजवादी थे। उनमें जिम्मेदारी का बोध और संवेदनशीलता अद्भुत थी। उनके मुख्यमंत्री रहते पुलिस थाने में एक सफाई मजदूर ठकैता डोम की पिटाई से मौत हो गई। कर्पूरी ठाकुर ने खुद पूरे मामले की तहकीकात की। ठकैता डोम को उन्होंने अपना बेटा कहा। उसे स्वयं मुखाग्नि दी। ऐसा ही उन्होंने भोजपुर के पियनिया में किया, जब एक गरीब की दो बेटियों रामवती और कुमुद के साथ बड़े लोगों ने बलात्कार किया। घटनास्थल पर जाकर बलात्कार का शिकार हुई लड़कियों को उन्होंने बेटी कहा और उनकी देखभाल की व्यवस्था की। ऐसे मामलों में कभी-कभार पुलिस बाद में जाती थी, कर्पूरी जी पहले जाते थे।  गरीबों से उन्होंने खुद को आत्मसात कर लिया था।सादगी और ईमानदारी का जो आदर्श उन्होंने रखा, वह किंवदंती बन चुकी है। 


जिस मात्रा में उन्हें बड़े लोगों का तिरस्कार मिला, उसी मात्रा में उन्हें दलित -पिछड़े समाज का प्यार भी मिला। गरीब -गुरबे अच्छी तरह समझते थे कि कर्पूरीठाकुर को इतनी जिल्लत आखिर किसके लिए झेलनी पड़ रही हैं। उनका अपने लिए कोई स्वार्थ नहीं था। पूरे जीवन विधायक -सांसद, मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बने रह कर भी उन्होंने कहीं अपना ठिकाना नहीं बनाया।  तमिलनाडु के नेता कामराज जब मरे थे, तब उनके संदूक से दो जोड़ी कपडे और सौ रूपए मिले थे। लगभग यही स्थिति कर्पूरी जी की थी। जैसे आए थे, वैसे ही गए।  यही कारण है कि जैसे -जैसे समय बीत रहा है और लोग तरह -तरह के राजनेताओं को देख रहे हैं, कर्पूरी ठाकुर एक बड़े हीरो की तरह उभर रहे हैं। वंचित तबकों को राजनीतिक धारा से जोड़ने के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया था।  इसी तबके ने उन्हें जननायक कहा। वह सच्चे मायने में जननायक थे।

शनिवार, 14 जनवरी 2023

विचारधारा की वाहियात पोटली: सुशील कुमार भारद्वाज

 सुख जो चाहिए मुझे, वही सुख चाहिए आपको और सबको। सच पूछिए तो सुख किसे नहीं भाता है? भले चाहें आप इस पार हों चाहें उस पार? परंतु समय की यह अजीब कहानी है कि हम सच को सच और झूठ को झूठ नहीं कह पाते हैं। ऐसा नहीं है कि सच और झूठ का फर्क नहीं मालूम है। मालूम सबकुछ है लेकिन हम अजीब अदृश्य राजनीतिक डोर से बंधे हैं। हम एक सामान्य इंसान (आम जनता) होने की बजाय स्वयंसेवी राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए हैं। हम सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष की ओर सुविधानुसार चले जाते हैं और उसके हर निर्णय पर कुछ यूं टिप्पणी करने लगते हैं, सक्रियता से उसके पक्ष में बल्लेबाजी करने लगते हैं गोया मेरे पक्ष-विपक्ष में तर्क रखने से उनकी सरकार सुरक्षित रह जाएगी या चली जाएगी। देखने लायक मुंह तो तब बनता है जब वह पार्टी ही देर -सबेर अपने बयान से मुकर जाती है अथवा माफ़ी मांग लेती है।

क्या हमलोग शुरू से ऐसे ही थे? या राजनीतिक जागरूकता का यह साईड इफेक्ट है? या तकनीकी जीवन शैली ने हमें उग्र बना दिया है? आखिर हम क्यों एक दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं? विचारधारा की पोटली तो मुझे सबसे वाहियात चीज मालूम पड़ती है। जीवन जीने से भी बड़ी कोई विचारधारा है क्या? भाईचारा और मेलमिलाप से भी बड़ा कोई विचारधारा है क्या? लेकिन हमलोग इस्तेमाल हो रहे हैं दूसरों के हित के लिए, जिसका हमसे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई नाता -रिश्ता नहीं है। जितना पाप नहीं हो रहा है दुनिया में, उससे अधिक पापी होते जा रहे हैं हम सब।




-सुशील कुमार भारद्वाज 

रविवार, 8 जनवरी 2023

जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें : प्रेमकुमार मणि

 जाति आधारित जनगणना की मुसीबतें 


प्रेमकुमार मणि 


बिहार में जातिवार जनगणना की प्रक्रिया आज से आरम्भ हो गई है और जिस तरह से इसका प्रचार किया जा रहा है, उससे मैं बेहद क्षुब्ध हूँ। राजद और जदयू इसे इस तरह रख रहा है, मानो यह कोई उपलब्धि हो। इस विषय पर मैं पहले से कहता रहा हूँ कि जाति आधारित वर्ग के आधार पर चूकि कई तरह के आरक्षण और सुविधाएं मुहैय्या की जा रही हैं, इसलिए सरकार को इसकी जानकारी रखनी चाहिए। इस आधार पर जनगणना को मैं आवश्यक भी मानता हूँ। लेकिन यह भी मानता हूँ कि यह अत्यंत गोपनीय स्तर पर हो। डाक्टर बीमार व्यक्ति का परीक्षण करवाता है,लेकिन उसकी रिपोर्ट को गोपनीय मानता है। वह डाक्टर के समझने केलिए है, न कि प्रचार केलिए। लेकिन बिहार सरकार उसका प्रचार कर रही है, मानो यह उसकी कोई कार्य- योजना और उपलब्धि  हो। 


जाति को लेकर समाज और राजनीति में लम्बे समय से अध्ययन चल रहा है। दुनिया भर में हर देश - समाज की कुछ खास तौर की बुनावट होती है। उसका अध्ययन अपेक्षित होता  है। भारत में जाति और इसकी प्रथा-परिपाटी को लेकर लम्बे समय से अध्ययन- चिंतन चल रहा है। एक दौर था, जब गांधी जैसे व्यक्ति की इस विषय पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भिड़ंत हुई और गांधी ने इसे विश्व संस्कृति को भारत की अनुपम भेंट के रूप में चिह्नित किया। रवीन्द्रनाथ का कहना था कि इसी जातिप्रथा के कारण भारत गुलाम हुआ है और आधुनिक समाज में इसका वजूद नहीं होना चाहिए। जब आम्बेडकर ने इसे लेकर नया विमर्श खड़ा किया और अपने ' अनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट ' शीर्षक वृहद् आलेख में इसकी धज्जियाँ उड़ाईं, तब गांधी इस विषय पर सतर्क हुए। जाति का जोर जन्म पर होता है और एक खास अवस्था में आकर यह वर्ण  पर टिक जाता है। वर्ण अर्थात् रंग। जब जोर रंग अथवा नस्ल पर होता है तब वह वर्ण बनने लगता है। जाति बुनियादी चीज है,जो पेशेगत समूह के रूप में एक जड़ वर्ग का रूप ले लेता है। वर्ण एक व्यवस्था है, जो समाज विकास के एक खास चरण में कुछ लोगों द्वारा गढ़ा गया और जिसे सामाजिक स्मृतिकारों में से एक मनु ने संहिताबद्ध किया। मनु की खासियत या कमजोरी यह थी कि उसने पेशा चुनने का अधिकार व्यक्ति की जगह समाज को दिया और अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न कथित वर्णसंकर समूहों को इस आधार पर विभाजित किया कि पुरुष और ब्राह्मण वर्चस्व को बल मिले। इससे भारतीय समाज में एक रूढ़ि  विकसित हुई, गतिहीननता आई। स्वाभाविक सामाजिक गतिशीलता के लिए आवश्यक होता है कि जाति और वर्ण की कड़ियाँ कमजोर हों। व्यक्ति जब पेशा बदलना चाहे तब उस पर सामाजिक दबाव नहीं हो। एक ही पेशे में जमे रहने से ऊब और गतिहीनता की संभावना अधिक हो जाती है। मनु ने उसे अधिक स्थिर करने की कोशिश की और पाबंदी लगाईं। हालांकि यह केवल मनु की परिकल्पना नहीं रही होगी। समाज पर प्रभावशाली रहे लोगों की समवेत चाहना रही होगी। मनु ने तो इसे संहिताबद्ध किया था। इससे भारतीय समाज में कुछ  जातियों का वर्चस्व मजबूत हुआ और एक सामाजिक साम्राज्यवाद की स्थिति विकसित हुई। इसे ही ब्राह्मणवाद कहा जाता है; क्योंकि मनु की संहिता से ब्राह्मणों की स्थिति समाज में मजबूत हुई थी। आज से पचास साल पहले मैंने ' मनुस्मृति : एक प्रतिक्रिया ' पुस्तक लिखते हुए इस पाखण्ड को समझने की कोशिश की थी। 


ब्रिटिश काल में जनगणना जातिआधारित होती थी। और इसके मूल में सांप्रदायिक जनगणना थी। इससे समाज अध्ययन के क्षेत्र में कुछ आंकड़े मिले, लेकिन कुछ मुश्किलें भी आईं। आख़िरी जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई। आज़ाद भारत में राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य से इसे स्थगित किया गया। मोटे तौर पर अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को तीन अलग -अलग समूहों में रखा गया और उन्हें वर्ग रूप में अभिहित किया गया। अनुसूचित जातियों का एक वर्ग है। पिछड़ी जातियों का एक वर्ग है -- अन्य पिछड़ा वर्ग। कोशिश यह थी कि सदियों से चले आ रहे जाति आधारित सामाजिक वर्चस्व को ध्वस्त करते हुए एक आधुनिक समाज की रचना हो। एक व्यक्ति एक वोट के अधिकार के फलस्वरूप विधायिका  में तो सभी तबकों की भागीदारी धीरे -धीरे दिखने लगी, किन्तु कार्यपालिका और न्यायपालिका में खास तबकों का वर्चस्व बना रहा। अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी अफसोसजनक रही थी। इसके लिए ही विशेष अवसर के सिद्धांत के तहत एक समय सीमा तक केलिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था उद्देश्य पूरा होने तक चलनी ही चाहिए।


लेकिन हमारी मंजिल एक ऐसा जातिविहीन समाज ही है, जिसमें व्यक्ति की गरिमा हो, उसके समूह या जाति की नहीं। यह जाति प्रथा हमारे आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज की भावना के विरुद्ध है,अतएव इसे हमें हर हाल में यथाशीघ्र ध्वस्त करना है। उत्पादन के नए संसाधन और पूंजीवादी मान्यताएं जातिप्रथा को ध्वस्त करती हैं ,क्योंकि पारम्परिक पेशों को किसी जाति तक सीमित करने से ये इंकार करती हैं।  पूंजीवादी समाज के  समाजवादी रुझान लेने के पूर्व ही जातिप्रथा निर्मूल हो जाता है। हमारे समाज का सम्यक विकास नहीं हुआ। कायदे से पूंजीवादी समाज भी नहीं बना। लेकिन अधकचरे विकास ने भी जातिप्रथा की जड़ें हिला दी हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बहुत हद तक जाति के आधार कमजोर हुए हैं। जातियों के अंतर्गत उपजातियों की व्यवस्था लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। आज से बस सौ साल पहले के समाज को देखें तो हर जाति के भीतर एक आंतरिक वर्णविभाजन था। उदाहरण केलिए  कायस्थ एक जाति है तो श्रीवास्तव कायस्थों का ब्राह्मण था और कर्ण शूद्र। कूर्मियों के बीच अवधिया ब्राह्मण था, तो धानुक शूद्र। हर जाति में ऐसी व्यवस्था थी। आज नहीं है। उसी तरह आज की दिख रही जातिप्रथा भी अन्ततः ध्वस्त होगी।  शिक्षा का विस्तार, रोजगार के नए संसाधन और औरतों की आज़ादी जैसे -जैसे बढ़ेगी जातिप्रथा कमजोर होती जाएगी। उत्पादन के पुराने तरीके बदल रहे हैं, गाँवों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लड़कियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। ये सब जातिप्रथा को ध्वस्त करने के कारक होंगे। समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया का एक लेख है ' जाति और योनि के दो कठघरे '। इसे तो उन समाजवादियों को पढ़ लेना था,जो समाजवाद की अधिक दुहाई दे रहे हैं । लेकिन वैज्ञानिक समाजवाद की जगह जातिवादी -समाजवाद स्थापित करने की इस मुहीम पर अफ़सोस ही व्यक्त किया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। दिमाग से खाली लोग जब हुक्मरान बनते हैं ,तब ऐसा ही होता है।


जातिप्रथा कमजोर हो रही है। इसे जांचने का एक तरीका बताता हूँ। साल भर तक आए विवाह के आमंत्रण पत्रों को इकठ्ठा कीजिए। फिर उनमें चिह्नित कीजिए कि कितने जातिमुक्त विवाह हैं।पांच वर्षों तक यह कीजिए। आप को पता चलेगा कि किस रफ़्तार से  जातिमुक्त विवाह हो रहे हैं। गांव कस्बों तक प्रचलन तेजी पर है। सामान्य जातियों के लोग, जो  स्वयं को ऊँची जाति मानते आए हैं आपस में घुलमिल कर, धीरे -धीरे अब अपर कास्ट बन रहे हैं। दलितों का अलग समूह बन रहा है। अन्य पिछड़े वर्गों का अलग। एक ऐसा दिन भी आएगा जब ये बड़े ढूहे भी ध्वस्त होंगे। विवाहों में अनेक व्यवधान समाप्त हो रहे हैं।उनके तरीके बदल रहे हैं। यदि हमने समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य और रोजगार की पुख्ता व्यवस्था की ,तो एक ऐसा  समय आएगा जब जातिव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। 


लेकिन सरकार जो यह नाटक कर रही है, वह न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि शरारतपूर्ण भी है। आजकल समाज में एक नया जाति -व्याकुल समाज उभरा है। वह हर जाति का सबसे निकृष्ट तबका है। राजनीति से लेकर समाज के विभिन्न स्तरों पर ये जातिप्रथा को जीवित रखना चाहते हैं। क्योंकि इसी के आधार पर उनकी पूछ संभव है। ऐसे लोग जातिवार जनगणना से अतिरिक्त रूप से उत्साहित हैं। कुछ अधिक संख्या वाली जातियों के शातिर नेताओं को भरोसा है कि जब जाति जनगणना की रिपोर्ट आ जाएगी तब इसे बैनर बना कर कम संख्या वाली जातियों पर रौब जमाएंगे कि हमारी राजनीतिक गुलामी अथवा अधीनता स्वीकार करो। यही कारण है कि वे इसका बिगुल बजा रहे हैं।  

 मेरा आग्रह होगा कि प्रबुद्ध जन इस पर विचार करें और इस दकियानूसी राजनीति के मर्म को समझें। समान शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार गारंटी के मांग को अपनी राजनीति का केन्द्रक बनावें, तभी नया समाज बनेगा। इस जाति आधारित जनगणना से ध्वस्त हो रही जातिप्रथा को केवल बल मिलेगा।



फेसबुक वॉल से साभार।

शनिवार, 7 जनवरी 2023

बर्फवारी, हिमपात : डॉ शोभा भारद्वाज

 बर्फवारी, हिमपात

डॉ शोभा भारद्वाज 

शादी के कुछ समय बाद मसूरी स्नोफाल का नजारा देखने के लिए गये इंतजार करते रहे बर्फ तो नहीं गिरी हाँ ठंड बढ़ने लगी होटल वाले ने एक सुबह बताया मसूरी के पास धनौल्टी में रात को स्नोफाल हुआ है हम तुरंत बस में बैठ कर बर्फ का लुत्फ़ उठाने चल दिये धनौल्टी की हरी भरी पहाड़ी के पास उतर गये  वहां के लोगों ने बताया ऊपर बर्फ पड़ी है आनन्द मगन हरियाली का आनन्द लेते फोटोग्राफी करते पहाड़ी पर पहुंचे वहाँ एक मन्दिर था बर्फ पड़ी थी परन्तु उसे बर्फ बारी नहीं कहा जा सकता कई चित्र खींचे जमीन से बर्फ इकठ्ठी कर बाल बना कर इन पर मारने की इच्छा थी हाथ मे पिघलने लगी हाँ हथेलियों में उठा कर मैने चित्र खिचवाये यह मेरा मजाक उड़ा रहे थे | पहाड़ी से हिमालयन रेंज एवं बर्फ से ढकी चोटियाँ नजर आ रही थीं |

 कुछ वर्ष बाद इन्हें ईरान की पोस्टिंग मिली उसी वर्ष अक्टूबर में मेरा वीजा लग गया | तेहरान एयर पोर्ट पर उतरते ठंडी हवा के थपेड़ों ने स्वागत किया |खुर्दिस्तान में प्रवेश करते ही हवा और भी बर्फीली महसूस हुई लेकिन बस गर्म थी | खुर्दिस्तान की राजधानी सननदाज के आखिरी छोर की घाटी के अस्पताल में इनकी पोस्टिंग थी अस्पताल कैम्पस में घर था थोड़े ढलान पर रुद्खाना ( पहाड़ी नदी ) बहती थी घाटी की छटा अनुपम थी छोटे बड़े हर पेड़ों पर पत्ते सुनहरे रंग के थे इस महीने को वहाँ पाईस (पतझड़ ) कहते है था कुछ दिनों में बाद पत्ते झड़ने लगे पेड़ बिलकुल खाली हो गये, वहाँ घर खोखली ईंटों से बनाये जाते हैं दोहरी छत ऊपर से ढलाव दार घर को गर्म करने के लिए भारी लोहे की बुखारियाँ जिनमें मिट्टी का तेल जलता था पाईप से चिमनी के रास्ते धुँआ बाहर निकलता रहता , शोफाश जो फर्निस आयल से गर्मी देते थे |

अब बेसब्री से स्नोफाल का इंतजार था एक शाम मौसम में गर्मी थी बुखारी हल्की कर दी स्वेटर की जरूरत महसूस नहीं हुई |सुबह उठे कांच के दरवाजों से बाहर झांका घर के बाहर बर्फ ही बर्फ कांच के दरवाजे जाम, अस्पताल का चोकीदार बर्फ हटा कर अस्पताल एवं घर से निकलने के लिए पगडंडी बना रहा था शुक्रवार की छुट्टी थी बाहर देखा छत पर 24 इंच बर्फ की परत घबरा कर घर के अंदर आ गयी कुछ देर बाद छत से बर्फ फिसलती छपाक की आवाज आती लगातार छप- छप घर के चारो तरफ बर्फ की दीवार बनती जा रही थी दहशत लगने लगी हाय यह होती है स्नोफाल हिम युग का अहसास हुआ जैसे साईबेरिया में आँखें खोली हों बर्फ में धंसी बड़ी गाड़ी नजर नहीं आ रही थी पेड़ों की टहनियां बर्फ से ढकी थीं कुछ देर बाद फिर बर्फबारी होने लगी लगातार रूई की तरह जम कर गिर रही थी साथ ही अस्पताल , घर की छत से गिरती बर्फ की आवाजें छपाक रसोई में गयी कांच की खिडकियों पर बर्फ जमी थी बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था कुछ देर में बर्फीला तूफ़ान चलने लगा सांय – सांय की आवाजें पहले बर्फ के सीजन की तैयारी के लिए घर की खिडकियों को बंद करते समय रूई लगा दी गयी थी लेकिन कांच के बड़ें दरवाजों की संधों से बारीक बर्फ अंदर आने लगी | दूर- दूर तक केवल बर्फ पहाड़ियां भी आँख से ओझल थीं यहाँ कैसे दिन कटेंगे  ?

 नल में पानी जमा नहीं था समझ में आया चौकीदार ने नल की हल्की दार खुली रखने की हिदायत दी थी |मिट्टी के तेल से चलने वाला गीजर , एवं फ्रिज (बिजली या मिट्टी के तेल से चलता था ) चलता रहे नहीं तो बाहर रखा सामान बर्फ हो जाएगा आलू और प्याज दूध के पैकेट में दूध बर्फ हो जाएगा   गर्म पानी के बिना हाथ गलने लगेंगें हैरानी हो रही थी यहाँ के आम लोगों का जीवन कैसे चलता होगा विदेशी डाक्टर का वहाँ का निजाम ख़ास ख्याल रखता था बर्फबारी रूकी शाम हो गयी बाहर खम्बो में जलने वाली रोशनी भी रोती लग रही थी काली रात और भी डरावनी थी चारो और सन्नाटा | अस्पताल में  मजबूर इक्का दुक्का मरीज आये इन दिनों राजधानी के आसपास के गावँ शहर से कट जाते हैं उस वर्ष बेहद बर्फवारी हुई थी शाम को टीवी में मौसम का हाल सुना हमारे एरिया का टेम्प्रेचर माईन्स 18 डिग्री था आगे और गिरेगा बताया गया कई वर्षों बाद ऐसी बर्फबारी हुई है भूखे भेड़िये शहर में देखे गये हाय यह सब हमारे ही भाग्य में था |

बहुत बड़ा गर्म घर बाहर देखने की हिम्मत नहीं बाहर के कमरे में रस्सी बाँध कर कपड़े सुखाये जा सकते थे धूप निकली सोचा बाहर कपड़े सुखा दूँ बाहर गाउन बर्फ की तरह कड़ा हो गया साँस की भाफ जमने लगी भाग कर अंदर आ गयी सामने चौकीदार की बीबी हंस कर बोली थी खानम खूबी सलामती |

पहाड़ों को कन्दराओं में जमी बर्फ से पूरे वर्ष पीने का पानी राजधानी को मिलता था अस्पताल की टंकी अलग थी | 

मार्च की शुरुआत – घनघोर बारिश बिजली के कड़कने से घाटी थर्रा रही थी बर्फ पिघलने लगी पेड़ों पर नन्हे – नन्हे पत्ते डालियाँ सफेद फूलों से भर गयीं हर फूल फल था |पहाड़ों पर झरने ,झरने लगे जमीन पर लाल रंग के फूलों के बीच में अनेक रंग के फूलों के गलीचे बिछ गये बहार का सीजन था कल- कल की मधुर आवाज से रुद्खाना तेजी से बह रहा था 

बर्फबारी का दिल में डर बैठ गया था इसे देखने हमारे यहाँ के लोग पहाड़ों पर जाते है ,लेकिन अबकी बार आने वाला वर्ष बहुत सुहाना था बर्फ का सीजन आया बर्फ गिरी अच्छी लग रही थी सफेद बादलों से झरते बर्फ के फूल बाद में साफ़ नीला स्वच्छ आकाश एक अलग सा परिंदा जिसे शायद जय पक्षी कहते हैं मीठी आवाज में गाता दिखाई देता प्रकृति का अद्भुत रूप रात को चन्द्रमा  की चांदनी पहाड़ों , पेड़ों पर बने बर्फ के फूलों, जमीने पर बनी बर्फ की छोटी – छोटी पहाड़ियों पर अद्भुत छटा बिखेरती चांदनी राते छत से गिरती बर्फ की आवाज डरावनी नहीं लगती थी बच्चों ने बर्फ का गुड्डा बनाया ,एक दूसरे पर बर्फ के गोले फेके ख़ास बात वहाँ के बच्चों के साथ थोड़ी ऊंची पहाड़ी पर गिरी जमी बर्फ पर बेटी फिसलती हुई खिलखिलाती थी | कई वर्ष तक दिलकश घाटी में हम रहे बर्फ के दिनों में एक पहाड़ी पर चढ़ कर हम दूर तक नजारा देखते उसका नाम वहाँ के लोगों ने थपे डाक्टर रख दिया शायद अब भी यही नाम चलता होगा |


फेसबुक वॉल से साभार।



बुधवार, 4 जनवरी 2023

राहुल और मोदी के बहस में उलझी भारतीय राजनीति

 सर्द मौसम में जब सब घर में दुबके रहने की जुगत में हैं तो राजनीति कुछ हद तक उबाल खाकर गर्माहट पैदा कर रही है। बिहार में तो यूं भी खरमास यानि कि मकरसंक्रांति के बाद उलट-पुलट की परंपरा रही है। अब इस वर्ष परंपरा बरकरार रहेगी या कुछ नया होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है। फिलवक्त बिहार में जातिय जनगणना की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन इस बार दिल्ली में भी सर्दी के मौसम में राहुल गांधी अपने व्यवहार से गर्माहट पैदा किये हुए हैं। यूं तो टेलीविजन चैनलों पर कपड़ों के प्रचार में ही "सर्दी में भी गर्मी" श्लोगन को प्रचारित -प्रसारित किया जा रहा है बाबजूद इसके राहुल गांधी के टी-शर्ट पर छिड़ी बहस अंत होने का नाम ही नहीं ले रही है।

क्या यह भारतीय राजनीति के लिए भी विचारणीय नहीं है कि हमलोग राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय मुद्दों/ समस्याओं पर चर्चा करने की बजाय किसी के पहनावे और रहन-सहन में ही उलझकर रह गये हैं? ऐसा नहीं है कि इस तरीके की बहसें पहले नहीं हुई है, लेकिन सच यह है कि वह प्रतीकात्मक कार्य होता था यथा- टोपी या पगड़ी, हरा रंग या केसरिया रंग। कपड़े के ऊपर या नीचे जनेऊ धारण करना, आदि।

अब किसी ने टी-शर्ट पहन ली तो उसकी शक्ति का बखान करना। उसे तपस्वी बताना, उसकी शक्ति का जागरण आदि बेतुकी बातें करना, समय की बर्बादी ही है। यदि बहस ही करनी है तो गौर करनी चाहिए कि लगभग एक दशक की एंटीइन्कम्बेंसी फैक्टर के नाव पर सवार होकर कौन राजनीतिक बैतरणी पार उतरने की कूबत रखता है? राष्ट्रीय पार्टी सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी या क्षेत्रीय पार्टियां नेतृत्व करने को तैयार बैठी है? साठ वर्षीय युवा नेता ही देश का नेतृत्व करने के लिए अंतिम विकल्प हैं कि कुछ तीस-पैंतीस वर्षीय युवा नेता भी अचानक परिदृश्य में नजर आ सकते हैं? जब जिंदगी में तकनीक का इतना दखल बढ़ गया है कि जिंदगी ही डिजिटल हो गई है तो शेष चीजें के प्रति संकुचित नजरिया कितना उचित है? माना कि भारत में लोगों की क्रयशक्ति इतनी बढ़ गई है कि हर महंगाई को मात देने पर आमादा है, लेकिन विचारणीय है कि इतनी कुर्बानी के बाद भी क्या देश सही रास्ते पर चल रही है? एक सामान्य आमजन अपने आप को इस माहौल में सहज सुरक्षित जीवनयापन की स्थिति में पाता है? ढ़ेरों ऐसी समस्याएं हैं जिन पर बहस किया जाना शेष है फिर राहुल या मोदी के बहस में क्या उलझना? इन्हें तो विचार करना चाहिए कि यदि राहुल गांधी में ही विकल्प दिखता है तो उनके राजनीतिक हथियार को तेज करें, उन्हें हर मोर्चे पर मोदी से बीस दिखाने की कोशिश करें न कि कपड़ा और दाढ़ी के ही महिमा मंडन में उलझे रहें। यदि मोदी इस बार भी सत्ता में काबिज होने में सफल रहे तो यकीनन एक इतिहास लिखा जाएगा कि एक से एक दिग्गज नेता भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन किन्हीं में उन्हें रोक पाने की कूबत नहीं।

- सुशील कुमार भारद्वाज 




गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत.... दीपक दक्ष

 दीपक दक्ष के लेखन में एक अजीब आकर्षण है। इस बार उनकी कलम भोजपुरिया गीत के लिए चली है लोहा सिंह और खदेरन की मदर जैसे कालजयी चरित्र के बहाने ने। आप भी गौर करें।




लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत....

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लोहा सिंह----

अरे ओ खदेरन की मदर... तू हमरा नाक पोल पर कउवा के माफिक लोल चलाती है... अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही... ज्ञान की गगरी... चलाकी के चिलम... बजने दो भोजपुरिया गीत...


खदेरन की मदर--- 

अरे मार बढ़नी रे... पहिले दिन-  रात काबुल के मोरचा,  काबुल के मोरचा बउआते थे  अउर अब  भोजपुरिया गीत, भोजपुरिया गीत बउआ रहे हैं...सुनना है भोजपुरिया गीत त ईयर फोन लगाके सुनिए...कनखोसवा बटन लगाके...बुझाया... घर का संस्कार मत बिगाड़िये... घुटने में बुद्धि रह गया...? 


लोहा सिंह--- 

खदेरन की मदर मेरे महमण्ड को गरम मत करो...तुमको भोजपुरी मतलब  सिर्फ उहे सब बुझाता है... भोजपुरी मतलब खाली गंदे गीत होता है का....? 


खदेरन की मदर--- 

ना भोजपुरी मतलब रामायण होता है...पूरा रामायण... सीता जी कुटिया से गायब हुई थी....अउर तोहार भोजपुरी गीत सुन लइका सब रात में खटिया से गायब हो रहा है... सीता जी पुष्पक विमान पर देखी गई थी ...अउर  भोजपुरी सुन लइका सब मचान पर दिख रहा है...छि छि...लाजो नहीं लगता है... आजकल का भोजपुरी सुनने लायक है जी ? ठेला- रिक्शावाला का घर समझ लिया है  का... केतना शरम लगता है, जब टेम्पुआ में बजाता है...राम राम...ई सबको मारने वाला कोई नहीं है... भोजपुरिया समाज का मान  माटी में मिला रहा है  सब ...गायक कहलाता है और भोजपुरिया माई को गारी देता है...कानून बनना चाहिए...कोड़ा मारना चाहिए...दिमग्वे ठंडा जाएगा...


लोहा सिंह-----

ऐ फाटक बाबा !  हमको त बुझईबे नहीं करता है कि खदेरन की मदर मेम है कि मेमिन ...आप ही समझाइए... अभिव्यक्ति की आजादी कुछ होता है कि नहीं...


खदेरन की मदर-----

अरे मार बढ़नी रे... अभिव्यक्ति की आजादी  का मतलब अपना माई के गारी देना होता है का... समाज बिगाड़ना होता है का...


लोहा सिंह-----

अरे ओ अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही.... कभी दूसरा एंगल से भी सोचो... भोजपुरी वालों ने बमबईया ठसक की हवा निकाल दी है... अब गांव-गांव भोजपुरी बज रहा है... भांगड़ा के बदले भोजपुरी पर लोग झूम रहे हैं... बिआह चाहे रमुआ का हो या रोहन की... दुआरे बरियात समय बजेगा भोजपुरिए गीत...ई पंडित जी का मंत्र हो गया है... ओम नोम स्वाहा ...लॉली पॉप लागे स्वाहा...


खदेरन की मदर---

अरे मार बढ़नी रे...लाजो नहीं लगता है...गंदा गीत का पैरवी करते...?


लोहा सिंह----

अरे ओ चालाकी के चिलम ! अश्लीलता के नाम पर भोजपुरी को किनारे लगाने की कोशिश मत करो.... 


तुमको हिंदी में हम समझाता है ....सुनो


भोजपुरी गीत और भोजपुरी सिनेमा बर्बाद हो गया.... भोजपुरिया हीरो अउर आजकल के नौछटिया गायकों ने भोजपुरी का नाम डुबो दिया... यही कहना चाहती हो ना ... खूब गरिआओ ...मन भर कर गरिआओ... मैं भी तुम्हारे साथ- साथ अश्लीलता का विरोध करता हूं....

सचमुच,  इन्होंने अपने कुछ गानों से और कुछ  कारनामों से भोजपुरिया समाज का सिर झुकाया है... 


लेकिन कलेजे पर हाथ रखकर कहना कि क्या भोजपुरी सिनेमा के साथ कभी न्याय हुआ? क्या हिंदी सिनेमा के आगे हमारे समाज ने भोजपुरी सिनेमा को उस तरह  तवज्जो दिया? क्या किसी फिल्म समीक्षक ने भोजपुरी सिनेमा पर स्याही खत्म किया? हिंदी के अखबारों में भोजपुरी सिनेमा पर समीक्षा लिखी गई?  क्या पटना के सिनेमा हॉल मालिकों ने 12 से 3 भोजपुरी सिनेमा चलाने का साहस दिखाया?  कुणाल साहब भोजपुरी सिनेमा के महानायक हैं, लेकिन क्या हमारे समाज ने उनको अमिताभ वाला सम्मान दिया? 


बगैर गार्जियन का बेटा आवारा होता ही है... इसलिए हमारे भोजपुरी के नायकों में कुछ आवारगी दिखती है... लेकिन इन नायकों ने जो किया है,  वह अपने दम पर किया है... इन्हें तो डूब मरने के लिए दो दशक तक छोड़ दिया था, हमारे समाज ने... लेकिन वर्ष 2000 के बाद  भोजपुरिया युवा तन कर खड़े हो गए... और आज भोजपुरी का डंका बजा रहे...

जानती हो खदेरन की मदर, 

हिंदी फिल्मों के समर्थक  भोजपुरी फिल्मों को अश्लील मानकर ही चलते हैं... भोजपुरी शब्द सुनते ही नाक मुंह सिकुड़ते हैं ... लेकिन राज कपूर को हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा शो मैन कहते नही थकते  हैं... एक ऐसा शो मैन जो मंदाकिनी को राम तेरी गंगा मैली में सिर्फ एक साड़ी में नहाते हुए दिखाते हैं,मंदाकिनी का स्तन दिखता है... सिनेमा हॉल में सीटियां बजती है लेकिन यहां अश्लीलता नहीं दिखती... बॉबी में डिंपल कपाड़िया बिकनी में कहर ढाती हैं... मोहरा में रवीना टंडन मस्त मस्त लगती हैं... लेकिन  हिंदी सिनेमा वाले इन्हें अश्लील नहीं मानते, बोल्ड कह कर कॉलर टाइट करते हैं... भोजपुरी में पल्लू गिरा नहीं कि हीरोइन अश्लील ...फिल्म अश्लील...हीरो रोड छाप... गंवार

 तो भैया हमारे हीरो गंवार ही हैं।  गांव के गंवार .. .एक ऐसे गवार जिन्होंने नायक होने का मतलब बदल दिया है...


जी हां,  हमारा भोजपुरी का नायक सलमान की तरह मुम्बई का नहीं, गांव का है... पान की गुमटी पर पान लगाते हुए प्रेमिका के इंतजार में बैठने वाला प्रेमी है...हमारी नायिका कंगना की तरह कार में घूमने वाली नहीं... बल्कि एक कोको कोला से ही खुश हो जाने वाली है....(ये राजा छूटता पसीना.....) हमारी नायिका  दिल्ली-गुजरात- सऊदी अरबिया में मजदूरी करने वाले अपने पिया को याद करने वाली है... वह गाती है----- रेलिया रे हमरो के ओही देसे ले चल रे, पियवा बसेला जवना देस रे.... साहब !  आज भोजपुरी इंडस्ट्री ने जिस तरीके से गांव के युवकों को रोजगार दिया है... पहचान दिया है ...उसे आप इंकार नहीं कर सकते... आप तो इन्हें गंवार मानकर चल रहे थे...हैं न ? 


खदेरन की मदर---- 

अरे मार बढ़नी रे... कईसन कईसन तर्क गढ़ रहे हैं... ई कलमुहा सब देवर भौजाई के रिश्ता को बदनाम कर दिया.... रिमोट से लहंगा उठवा दिया... और का  का भयंकर भयंकर चीज करवा दिया..


लोहा सिंह-----

अरे ओ ज्ञान की गगरी! हम मानते हैं कि गंदगी फैला दिया, लेकिन अच्छाई भी देखो ...इनकी क्रिएटिविटी भी देखो.... कैसे-कैसे गीत गढ़  रहे हैं--- दिलवा ले  गइले राजा बोतल में भर के... हा हा हा


अरे ओ खदेरन की मदर कभी नजरिया फेर के तो देखो----आज के इसी भोजपुरी में मिसरी चैनल है... पुरबिया तान है... कल्पना पटवारी हैं ...चंदन तिवारी हैं... अलका पहाड़िया हैं... नीतू नवगीत हैं... मनोज भावुक हैं... मनोरंजन ओझा हैं... सत्येंद्र संगीत हैं... 


सबको एक ही लाठी मत हांको खदेरन की मदर... ई महेंदर मिसिर... भिखारी ठाकुर, विंध्यवासिनी देवी के भोजपुरी है... बुझ सूझ के बोला करो.... और बढ़िया गीत सुनल करो ... अठन्नी- चवन्नी,  टूटहा- भांगड़ा, छुरछुरी- पटाखा, हर काल में,  हर समाज में होते हैं... इसलिए उ सब को इग्नोर करो ... सुनबे मत करो... धीरज धरो, कानून बनेगा ... लफुआ सब पर सोटा चलेगा...टेंशन छोड़ बढ़िया गीत सुनो... गांव देहात के लइका सब एक से एक बढ़िया गीत लिख रहे हैं..... एगो दुगो गीत के नाम बता दे रहे हैं, सुन लेना मन हरिअर हो जाएगा.... और समझ में आ जाएगा कि आज बढ़िया गीत भी लिखा रहा है...


# नेहिया के फुलवा...

# पिया जी के मुस्की लागे लाजवाब...

# कहां बाड़ी धनिया हमार....


चलो खदेरन की मदर... इसी बात पर बजने दो भोजपुरिया गीत ...


अरे मार बढ़नी रे...


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।

रविवार, 18 दिसंबर 2022

फील्ड मार्शल मानेकशॉ: रश्मि रविजा

साहित्यकार रश्मि रविजा का फील्ड मार्शल मानेकशॉ पर लिखा यह आलेख गौरतलब है। आलेख से न सिर्फ मानेकशॉ की कार्यशैली की जानकारी मिलती है बल्कि भारतीय राजनीति के बारे में बहुत कुछ समझने का मौका मिलता है। 

                            

                           फील्ड मार्शल मानेकशॉ 

                           _______________________


 १९४२ में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया था.पूरे विश्व में तबाही मची हुई थी. हर देश युद्ध से किसी ना किसी प्रकार प्रभावित था. उस वक्त भारत आज़ाद नहीं हुआ था और भारतीय सेना, अंग्रेजों की मदद कर रही थी. बर्मा में भारतीय सेना तैनात थी और जापानियों के दांत खट्टे कर रही थी. बर्मा के एक बहुत ही महत्वपूर्ण चौकी ‘पगोडा हिल’ पर जापानियों ने कब्जा कर लिया था. एक नौजवान कैप्टन ‘सैम मानेकशॉ' अपनी बटालियन ‘राइफल कंपनी’ की अगुवाई करते हुए ‘पगोडा हिल’ की तरफ बढ़ रहे थे. हिल के ऊपर से जापानी अंधाधुंध गोलिया दाग रहे थे . मानेकशा ने अपने सैनिकों को चट्टानों की आड़ लेते हुए ऊपर की तरफ गोलियां चलाते हुए आगे बढने का आदेश दिया.खुद भी वे सबसे आगे बहादुरी से ऊपर की तरफ गोलियाँ दागते और चीते की सी फुर्ती से चट्टानों के पीछे छुप जाते. राइफल कंपनी के कई सैनिक शहीद हो गए थे. बचे हुए कुछ सैनिकों के साथ मानेकशा चोटी पर पहुंच गए और अब दोनों तरफ के सैनिक आमने -सामने थे. सैम मानेकशा, अपनी रायफल से एक जापानी को निशाना बना रहे थे तभी दूसरी तरफ से एक दुसरे जापानी ने आकर उनपर गोलियों की बौछार कर दी. मानेकशा ने पलट कर उसे भी मार गिराया पर खुद भी गिर पड़े, उनके पेट में 9 गोलियां लगी थीं. लेकिन पगोडा हिल पर फतह हासिल कर ली थी. 


ज्यादातर जापानी सैनिक मारे गए थे .जो एकाध बचे थे,वे पीठ दिखा भाग खड़े हुए थे. सैम मानेकशा के शरीर से जगह जगह से खून बह रहा था, गोलियों ने उनके फेफड़े, किडनी, लीवर सबको डैमेज कर दिया था. पर उनके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी .मेजर जनरल ‘डी. टी. कोवान’ जो देहरादून मिलिट्री अकादमी में उनके कंपनी कमांडर भी रह चुके थे ‘पगोडा हिल’ पर कब्जे की खबर सुनते ही दौड़ते हुए, उन्हें बधाई देने आये .पर मानेकशा को इस बुरी तरह जख्मी देखकर चिंतित हो गए. वे मानेकशा की वीरता के लिए उन्हें ‘मिलिट्री क्रॉस’ पदक दिलवाना चाहते थे. पर मानेकशा की हालत देख उन्हें लगा, अब सैम का बचना मुश्किल है . इस पदक के लिए नियम था कि यह पदक सिर्फ जीवित मिलिट्री ऑफिसर को ही मिलता है. ‘डी. टी. कोवान’ ने कुछ सोचा और झट अपना मेडल उतार कर सैम मानेकशा की वर्दी पर लगा कर अपने जूनियर को एक कड़क सैल्यूट दिया. मानेकशा ने भी बेहोशी से मुंदती आँखों को ज़रा सा खोल अपने दाहिने हाथ को माथे से लगा,उनके सैल्यूट का जबाब दिया. 


मानेकशा के अर्दली सिपाही शेर सिंह ने उन्हें अपने कंधे पर उठाया और दौड़ते हुए कैम्प में इलाज के लिए ले गए .वहाँ, डॉक्टर ने उन्हें फर्स्ट एड देकर ‘पेगु’ के अस्पताल में रेफर कर दिया . पहाड़ियों का ऊंचा नीचा, झाड़ियों से भरा दुर्गम रास्ता, जीप हिचकोले खाती आगे बढ़ रही थी. मानेकशा का सर सिपाही शेर सिंह की गोद में था. शेर सिंह उन्हें बीच बीच में पानी पिलाता और जगाने की कोशिश करते हुए कहता, ‘साब आप शेर दा पुत्तर हो, ये गोलियां आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. आँखें खोलो साब. आपको अभी बहुत सारे जंग फतह करने हैं. “ मानेकशा जरा सीआँखें खोल मुस्करा देते अस्पताल तक जाने में ३६ घंटे लग गये. अस्पताल पहुँच कर शेर सिंह ने उन्हें बेड पर लिटाया और  भागते हुए डॉक्टर को बुलाने चले गए. ऑस्ट्रेलियन डॉक्टर ने जब सुना कि उनके पेट में 9 गोलियां लगी हैं और ३६ घंटे बीत चुके हैं तो उन्हें देखने से इनकार कर दिया. कहा, ‘अब टुमारा शाब नई बच शकता उस पर टाईम वेष्ट करने का कोई फायडा नई ,इतने टाईम में मैं दूशरा सोल्जर्स को डेक लेगा “ शेर सिंह उनका रास्ता रोक कर घुटने के बल बैठ गया , “नई डॉक्टर आपको मेरे शाब को देखना ही पडेगा. मेरा शाब बहुत बहादुर है. उसको कुछ नहीं हो सकता.उसको बस थोड़ा इलाज की जरूरत है. “ शेर सिंह की जिद के आगे डॉक्टर को मानेकशा को देखने जाना ही पड़ा. उसी वक्त सैम को ज़रा सा होश आया और डॉक्टर ने उनसे पूछा....” टुमको क्या हुआ यंगमैन?“ ऐसी घायल अवस्था में भी सैम ने मुस्करा कर कहा, “ कुछ नहीं बस एक शैतान गधे ने लात मार दी “ डॉक्टर हैरान रह गए , ऐसी हालत में भी कोई मजाक कर सकता है. उन्होंने हंस कर कहा, ‘टुमारा सेन्स ऑफ ह्यूमर तो कमाल का है, अब तो टुमको बचाना ही पड़ेगा “ डॉक्टर ने गोलियां निकालीं, उनकी छोटी आंत के कुछ हिस्से काट दिए. घावों को स्टिच करके उन्हें ‘रंगून’ के बड़े अस्पताल में भेज दिया.


सैम बिस्तर पर पड़े , खिड़की से कुछ बच्चों को खेलते देख रहे थे .उन्हें अपने बचपन की याद आ गई।  वे भी ऐसे ही अपने दोस्तों के साथ खेला करते थे ..बॉल अक्सर झाड़ियों में चली जाती और जब सारे बच्चे बॉल ढूंढ रहे होते, वे भागकर अपने पिता की क्लिनिक में पहुँच जाते. कानों में आला लगाए, मरीजों दवाइयां देते,उनकी मरहमपट्टी करते पिता, सैम को कोई देवदूत सरीखे लगते. सैम ने सोच लिया, वे भी बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे .पिता ने कहा, ‘वे अच्छे नम्बरों से पास होंगे तो उन्हें मेडिकल पढने लन्दन भेज देंगे.” सैम ने सीनियर कैम्ब्रिज में टॉप किया. पांच विषयों में डिस्टिंक्शन लाया. पर पिता को पन्द्रह वर्ष की उम्र में बेटे को अकेले विदेश भेजना गवारा नहीं हुआ. पिता ने वादा किया कि सैम के अठारह के होते ही उन्हें मेडिकल पढने लंदन भेज देंगे. लेकिन सैम का उत्साह से भरा किशोर मन बुझ गया. उन्हें अंदाजा नहीं था , ईश्वर ने इस से कहीं बड़ा काम उनके लिए सोच रखा है. सिर्फ कुछ मरीजों की जिंदगी बचाना उनकी तकदीर में नहीं था बल्कि देश की तकदीर बदलने में वे सहायक होने वाले थे. डॉक्टर बनकर कुछ ही बच्चों के जन्म का निरिक्षण कर पाते जबकि उनकी देखरेख में एक नया राष्ट्र जन्म लेने वाला था. और नियति ने उनकी नजरों के सामने अखबार के पन्नों पर छपा एक विज्ञापन रख दिया. विज्ञापन में था कि  देहरादून मेंप हली भारतीय सेना अकादमी में एडमिशन के लिए परीक्षा होने वाली है. सैम ने माँ से दिल्ली जाने के लिए पैसे मांगे . माँ उन्हें इस तरह चुप और उदास देखकर परेशान थीं.उन्होंने झट से रूपये निकाल कर दे दिए कि दिल्ली जाकर बच्चे का मन बहल जाएगा. सैम ने प्रवेश परीक्षा पास कर मिलिट्री एकेडमी में एडमिशन ले लिया।


 मिलिट्री एकेडमी से ट्रेनिंग कर वे सेकेण्ड लेफ्टिनेंट बने और फिर कैप्टन के रूप में बर्मा में उनकी पोस्टिंग हुई. जहां  उन्होंने अपनी जान दांव पर लगा, वीरता के झंडे लहर दिए. जब स्वतन्त्रता मिली और भारत का विभाजन हुआ तो सैम मानेकशा के सामने बड़ी दुविधा आ गई . वे पारसी थे और पारसी लोगों के लिए दोनों देशों के द्वार खुले हुए थे. अब तक पूरा देश एक था.. लाहौर से बंबई, कलकत्ता से ढाका हर जगह बेख़ौफ़ आया जाया करते थे. हर शहर में उनके मित्र थे . अब उसी देश को दो टुकड़ों में बंटता देख उनका कलेजा फट रहा था. अब वे एक देश में रहना क़ुबूल करें तो दूसरा देश उनके लिए अजनबी हो जाएगा . सैम मानेकशा गोरखा रेजिमेंट से जुड़े हुए थे.सेना के भी दो भाग हो गए थे और गोरखा रेजिमेंट भी दो भागों में बंट गया था . इस रेजिमेंट में उनके प्राण बसते थे .वे बड़े जोश से कहते थे, “ अगर कोई सिपाही कहता है कि वो मौत से नहीं डरता तो फिर या तो वो झूठ बोल रहा होता है या फिर वो गोरखा है.” वे खुद को पारसी नहीं गोरखा कहते थे. उनका प्रचलित नाम “सैम बहादुर “ भी गोरखा रेजिमेंट की ही देन था. सैम अपने सिपाहियों से दोस्ताना व्यवहार रखते थे. उनकी बीच जाकर बैठ जाते. उनके साथ हंसी मजाक करते . कभी उनकी मेस में चले जाते ,साथ खाना खाते . 


एक बार यूँ ही उन्होंने एक सिपाही से पूछा, “ तुम्हारा क्या नाम है ? “

“तेज बहादुर “

“तुम्हारे चीफ का क्या नाम है ? “

वह सैनिक घबरा गया . हडबडाते हुए उसने कहा, “सैम बहादुर “ 


मानेकशा ठहाका लगाकर हंस पड़े , ‘हाँ एकदम सही कहा .मैं गोरखा ही हूँ .मेरा नाम ‘सैम बहादुर’ ही होना चाहिए.” और तब से सबलोग उन्हें प्यार से ‘सैम बहादुर’ ही कहने लगे.बंटवारे के बाद इस रेजिमेंट के कुछ सैनिकों से उनकी दूरी हो जायेगी ,यह बात उन्हें कचोट रही थी. सैम मानेकशा का बचपन अमृतसर में गुजरा था, पढ़ाई नैनीताल और देहरादून में हुई थी. उनकी पत्नी सीलू भी अमृतसर की थीं. भारत उनके दिल के ज्यादा करीब था और उन्होंने अपने दिल की सुन, भारत में रहने का फैसला किया .वे अपना गम भुलाकर देश की सेवा में जुट गए. उन दिनों हर तरफ मार काटमची हुई थी. दंगे हो रहे थे . दोनों देशों के बीच लकीरें खिंच गईं थीं और लकीरों के पार, अपना सबकुछ छोडकर लुटे-पिटे से लोग चले आ रहे थे. सबके चेहरे से मुस्कान गायब थी, चेहरा ग़मगीन था और आँखों में आंसू भरे हुए थे. लोग अपना घर,जमीन,धन सब छोडकर आये थे. कुछ लोगों के परिवार भी बिछड़ गए थे.


 सेना की जिम्मेवारी बढ़ गई थी. सेना उन्हें फिर से बसाने, शांति बहाल करने में पूरी तरह लगी हुई थी.  मिलिट्री ऑपरेशन के डायरेक्टर के पद पर होने की वजह से सैम मानेकशा खासे व्यस्त हो गए थे. कभी कश्मीर में सर उठाये कबाइलियों का दमन करने के लिए उनकी पुकार होती तो कभी कलकत्ता में नोआखाली में हो रहे दंगो को शांत करने के लिए उन्हें बुलाया जाता. कश्मीर में कबाइलियों का आतंक बढ़ता जा रहा था . वहाँ के राजा हरिसिंह भारत से सहायता तो मांग रहे थे पर भारत में विलय होने के कागज़ पर हस्ताक्षर करने में देर कर रहे थे . पंडित नेहरू सैनिक कार्यवाई को लेकर असमंजस में थे. आखिर सरदार पटेल ने स्थिति सम्भाली, राजा हरिसिंह से भारत में शामिल होने के कागज़ पर दस्तखत कराये , नेहरु को समझाया  और मानेकशा से कश्मीर में  शांति स्थापित करने के लिए प्रयास करने लिए कहा . मानेकशा अभी  कश्मीर में काम कर ही रहे थे कि कलकत्ता में दंगे शुरू हो गए. ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने आकर कहा कि “सरदार पटेल आपको कलकत्ता में बुला रहे हैं. आपको ले जाने के लिए एक प्लेन तैयार खड़ा है.” कलकत्ता मेंबसरदार पटेल के साथ कलकत्ता के मुख्यमंत्री वी.सी. रॉय खड़े थे . उन्होंने मानेकशा से सीधा पूछा, “मुझे कोई बहस नहीं, कोई टालमटोल नहीं सिर्फ सीधा जबाब चाहिए ...अगर मैं सेना को सिचुएशन सौंप दूँ तो आप हमारे कितने बंगालियों को मारेंगे और कितने दिनों में शांति कायम हो जाएगी?” सैम मानेकशा की रगों में जवान खून उबाल मार रहा था .वे नेताओं की तरह घुमा फिरा कर बात करना नहीं जानते थे . वे  साफ़ साफ़ बोलने के लिए बदनाम थे ,उन्हें मुँहफट भी कहा जाता था .मानेकशा बोले, “शायद सौ लोग की जान जा सकती है और एक महीने में शांति लागू हो जायेगी.” सरदार पटेल ने 'वी सी राय' की तरफ मुड़ कर कहा, ‘दंगे में तो हजारों मर रहे हैं, ये सिर्फ सौ की बात कर रहे हैं.  “.फिर मानेकशा से बोले, “ “ठीक है ...आप कार्यवाई शुरू कीजिये.” मानेकशा ने पूरे कलकत्ता के कोने कोने में अपने जवान तैनात किये. खुद दिन रात हर महल्ले का दौरा करते. लोगों से मिलते , उनकी परेशानियां सुनते, उन्हें समझाते. लोगों के घरों में राशन  पहुँचवाते, बच्चों के लिए दूध भिजवाते. बीमार को पूरी सुरक्षा के साथ अस्पताल ले जाते. इस तरह आम लोगों को  उनपर भरोसा हुआ और बिना किसी खून खराबे के कुछ ही दिनों में पूरी तरह शांति बहाल हो गई.. बाद में सरदार पटेल ने मानेकशा को बुला कर गुजराती में कहा, ‘ “तमे साचो नहीं बोलो ? तमे बोल्यो एक सो बंगालीयो ना मारसो पण एक बी नईबमारयो “(तुमने सच नहीं कहा था ? एक सौ बंगालीको मारोगे पर एक को भी नहीं मारा )फिर पास बुलाकर, ‘वेलडन...थैंक्यू’ कहकर उनकी पीठ थपथपाई .


पर फूलों के साथ काँटों का रिश्ता हमेशा से रहा है. अगर कुछ लोग उनकी तारीफों के पुल बाँध रहे थे तो कुछ लोग उन पुलों को धराशायी करने में भी जुटे हुए थे. मानेकशा का इतनी लगन और मेहनत से काम करना और बड़े नेताओं का उनपर अटूट विश्वास कुछ अधिकारियों से देखा नहीं जा रहा था. उन दिलजले लोगों ने मंत्रियों के कान भरने शुरू कर दिए. सैम मानेकशा किसी के भी मुंह पर सीधे शब्दों में अपनी बात रखते जोबअधिकारियों को नागवार गुजरता. वे लोग चमचागिरी के आदी थे. जूनियर्स उनकी झूठी तारीफ करें, हर बात में हाँ में हाँ मिलाये. उनके बोदे चुटकुलों पर छ्तफाड़ ठहाके लगाएं. उनके हर निर्णय कोआँखें मूँद कर सपोर्ट करें. यह सब मानेकशा से नहीं होता और वे मंत्रियों ,उच्च अधिकारियों के बैड बुक्स में आ गए. समय समय पर कही गई उनकी बातों को तोड़-मरोड़ कर उनके विरुद्ध इन्क्वायरी बिठा दी गई. उसमें कोई भी सिरियस चार्ज नहीं था ,कुछ बड़ी हास्यास्पद सी बातें थीं. 


अभी इन्क्वायरी चल ही रही थी कि १९६२ में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया .नेहरु समेत सभी लोग चकित रह गए. भारत युद्ध के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था. ईर्ष्यावश मानेकशा को युद्ध की गतिविधियों से दूर रखा गया. जब कई मोर्चों पर भारत की हार होने लगी तो सैम मानेकशा के विरुद्ध आरोपों को खारिज कर उन्हें युद्ध की कमान सौंपी गई. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. भारत के एक बड़े भू भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया था.चीन की जीत पर पकिस्तान इतराया और उसने भी सोचा, वह भी भारत को मात दे सकता है. पाकिस्तान अपनी अंदरूनी समस्याओं से जूझ रहा था. उसके पास शक्तिशाली नेतृत्व नहीं था. वहाँ के लोगों को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं था . रोजमर्रा की चीजें नहीं मिल रही थीं. लोग भूखे थे, बेरोजगार थे .अपनी सरकार से बेहतर सुविधाओं की  मांग कर रहे थे .और इन सबसे लोगों का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तान ने सोचा, ‘भारत पर आक्रमणकर देगा तो सारी जनता का ध्यान युद्ध की तरफ हो जाएगा. उनमें देशभक्ति का जोश उबाल मारने लगेगा और रोज की असुविधाओं से उनका ध्यान हट जायेगा”


 पर इस बार भारत की सेना सम्भल चुकी थी और अब उनके पास सैम मानेकशा जैसे सैन्य अधिकारी का साथ भी था. उनके और दूसरे जाबांज ऑफिसर्स के प्रयासों से भारत इस युद्ध में विजयी रहा. पाकिस्तान के पास अमरीका से खरीदे आधुनिक पैटन टैंक थे. भारत के पास वही द्वितीय विश्व युद्ध के समय के पुराने टैंक थे. पर मशीन से ज्यादा मशीन चलाने वाले पर कोई भी जीत निर्भर करती है. हमारे पास साहस से भरे तेजदिमाग वाले वीर ऑफिसर थे. जिन्होंने पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेर दिया. पाकिस्तान में उथल पुथल जारी थी. 1970 में आम चुनाव हुए और पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजिबुर्र्रह्मान की ‘आवामी लीग’ ने बहुमत हासिल किया. यह पश्चिमी पाकिस्तान के रहनुमाओं को कैसे बर्दाश्त होता और उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए.पाकिस्तानी सेना ने आम लोगों पर लूट-पाट, बलात्कार, कत्ल शुरू कर दिए. आम लोग जान बचाने के लिए भारत से लगी सीमा वाले गाँवों में भाग कर आने लगे. बहुत दुखद स्थिति थी. रोज हजारों लोग अपना घर बार, सामान सब कुछ छोड़कर सिर्फ जान बचाने के लिए भारत की सीमा में दाखिलहोने लगे. 


बंगाल, त्रिपुरा, असम के मुख्यमंत्री परेशान हो गए. उन्होंने उस समय की प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी. और इस पलायन को रोकने के लिए कुछ करने को कहा. एक ही उपाय था ,भारतीय सेना भेजकर पाकिस्तानी सेना को जुल्म ढाने से रोक दिया जाए. इस सूरत में युद्ध होना निश्चित ही था.अप्रैल 1971 को इंदिरा गांधी ने अपने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और ‘सेना प्रमुख सैम मानेकशा’ को भी बुलाया.मानेकशा से पाकिस्तान पर आक्रमण के लिए कहा पर सैम मानेकशा ने बिलकुल इनकार कर दिया .उन्होंने कहा, “इस वक्त हमारी सेना युद्ध के लिए बिलकुल तैयार नहीं है. कुछ ही दिनों में मॉनसून आने वाला है.बांगला देश की मिटटी दलदल सी बन जाएगी ,उसमें हमारे टैंक धंस जायेंगे .बारिश के समय वहाँ की नदियाँ छोटे मोटे समुद्र का रूप ले लेती हैं. एक छोर से दूसरा  छोर नहीं दिखता .ऐसे में हम सही तरीके से युद्ध नहीं कर पायेंगे . अभी पंजाब के खेतों में फसल लगी हुई है. सारी फसल रौंदी जाएगी और हमारी मूवमेंट पर भी असर पड़ेगा .इस वजह से इन सारी तैयारियों के लिए मेरी सेना को वक्त चाहिए “ रक्षा मंत्री जगजीवन राम जो सैम नहीं कह पाते थे ने भी जोर देकर कहा, ‘” साम मान भी जाओ, युद्ध के लिए तैयार हो जाओ “ पर मानेकशा ने हाथ जोड़ लिए. जब सबलोग मीटिंग से जाने लगे तो इंदिरागांधी ने मानेकशा को रुकने के लिए कहा. मानेकशा ने सबके जाने के बाद कहा, “इस से पहले कि आप कुछ कहें .मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूँ. मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खराब होने का कोई भी बहाना बना दूँगा.पर इस वक्त मैं युद्ध के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ. १९६२ की तरह हमलोग बुरी तरह हार जायेंगे “ इंदिरा गांधी ने कहा, “नहीं आपका इस्तीफा नहीं चाहिए. मुझे ये बताइये कि आपको युद्ध की तैयारी के लिए कितना वक्त चाहिए ?” मानेकशा ने कहा, “देश के कोने कोने से अपने सैनिकों को इकट्ठा करने, युद्ध का प्लान बनाने उन्हें प्लान समझाने, सैनिकों को बौर्डर पर तैनात करने में मुझे चार-पांच महीने लग जायेंगे.और युद्ध की तैयारी के बाद मैं आपको भारत की जीत की पूरी गारंटी देता हूँ. “  इंदिरा गांधीने हामी भरी और मानेकशा युद्ध की तैयारी में लग गए. 


मानेकशा यह भी चाहते थे कि भारत की शांतिप्रिय देश की छवि को कोई ठेस ना पहुंचे . पूर्वी पाकिस्तान की मुक्तिवाहिनी सेना को भारत की मदद मिल ही रही थी. उनकी योजना थी कि इन सबसे त्रस्त होकर पाकिस्तान खुद ही आक्रमण कर दे. मानेकशा ने दिसम्बर में अपनी सेना की पूरी तैयारी की सूचना इंदिरागांधी को दी. मानेकशा खुद लद्दाख से लेकर पूरे बौर्डर पर जाकर सैनिकों से मिलते और कहते, “हमने आपको ट्रेनिंग दी, हथियार दिए अब आप अपने देश को जीत दिला दो “ सारे जवान सबसे बड़े अफसर को अपने पास देखकर जोश से भर जाते. जब इंदिरा गांधी ने पूछा, “अब हम युद्ध के लिए तैयार हैं ? “ मानेकशा नेअपने बेलौस अंदाज में कहा, “येस, वी आर रेडी स्वीटी’ इंदिरा गांधी उनकी बात करने के तरीके से वाकिफ थीं. उन्होंने बिलकुल बुरा नहीं माना और नज़रंदाज़ कर दिया .3 दिसम्बर 1971 को लड़ाई शुरू हुई और सिर्फ 13 दिनों में मानेकशा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने,पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी. मानेकशा को पता था, अब वे लोग सरेंडर कर देंगे . उन्होंने पहले ही समर्पण के कागज़ात तैयार करवा लिए थे. मानेकशा  ने जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा  से कहा, “ इट्स अ बिग डे इन योर लाइफ. टेक योर वाइफ विद यू.” सैम मानेकशा के मन में औरतों के लिए बहुत इज्जत थी. प्रधान मंत्री और सेनाप्रमुख  दोनों का एक दूसरे पर भरोसा बहुत जरूरी है. तभी कोई देश आगे बढ़ता है.  पाकिस्तानी जनरल नियाज़ी के साथ 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया. एक नए देश ‘बांग्ला देश’ का उदय हुआ. 


पर मानेकशॉ को बंदी बनाये गए ,पाक्सितानी सैनिकों की ज्यादा चिंता थी. वे उन्हें लेकर भारत आये.उनके आराम का पूरा ख्याल रखा. भारतीय सैनिक टेंट लगाकर सोते थे. जबकि बंदी बनाये गए पाकिस्तानी सैनिक उनके पक्के बैरक में सोते थे.  मानेकशॉ कैम्प में जाकर सभी से मिलते. पाकिस्तानी सूबेदार से पूछते , ‘बिस्तर में खटमल तो नहीं है. मच्छरदानी है ना. “ फिर उनके किचन में  जाकर खुद खाना खा कर देखते कि खाना ठीक बना है या नहीं. एक बार उन्होंने साफ़ सफाई करने वाले स्टाफ से हाथ मिलाने को हाथ बढाया तो उस सफाईकर्मी ने मना कर दिया. मानेकशा ने कहा, ‘क्यूँ कोई नाराजगी है...हाथ क्यूँ नहीं मिलाओगे ?’ उसने हाथ मिला लिया। जब वे सबसे मिलकर जाने लगे तो पाकिस्तानी सूबेदार ने कहा, ‘गुस्ताखी माफ़ हो हुजुर तो कुछ पूछूँ ? ‘ मानेकशा ने कहा,, ‘आप हमारे मेहमान हैं कुछ भी पूछ सकते हैं. उसने कहा, “अब मुझे पता चल गया कि हिन्दुस्तानी फ़ौज क्यूँ जीती. आप खुद जाकर सिपाहियों से मिल रहे हैं. उनकेआराम का ख्याल  रख रहे हैं. उनका खाना चखकर देख रहे हैं. हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता. सेना के अफसर अपने आपको नवाबजादे समझते हैं.” मानेकशा को ये ख्याल था कि ये पाकिस्तानी अपने गाँव जायेंगे . वहाँ खटिया पर बैठेंगे, हुक्का पियेंगे. अपने गाँव वालों को युद्ध के किस्से सुनायेंगे .तब वो हमारे बारे में कहेंगे कि हिन्दुस्तान के लोग बुरे नहीं हैं ,उन्होंने हमारा ख्याल रखा. उनके मन में हमारे लिए नफरत का जलजला नहीं होगा.जब मानेकशॉ रिटायरमेंट के बाद पाकिस्तान गए तो पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी पगड़ी उतार कर उनके पैरों पर रख दी और उन्हें अपने भाइयों के साथ इतना बढ़िया सुलूक करनेके लिए दिलो जान से शुक्रिया कहा.






 १९७२ में उन्हें पद्मविभूषण दिया गया. १९७३ में उन्हें ;फील्ड मार्शल’ की उपाधि दी गई. वे जीवनपर्यन्त भारत के फील्ड मार्शल रहे. एक सार्थक भरी पूरी जिंदगी जीने के बाद 27 जून 2008 को उन्होंने अपनी आँखें सदा के लिए मूँद लीं.


रश्मि रविजा के फेसबुक वॉल से साभार।

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

बिहार में हाहाकार : प्रेमकुमार मणि

 बिहार में एक बार फिर शराबबंदी चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण सिर्फ जहरीले शराब से लगभग 70 लोगों की मौत ही नहीं है बल्कि माननीय मुख्यमंत्री का बयान भी लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकार और नीतीश कुमार के करीबी रहे प्रेम कुमार मणि का आलेख गौरतलब है।

बिहार में हाहाकार 

प्रेमकुमार मणि 


 बिहार की राजनीति में पिछले सात वर्षों से शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे मुद्दों की जगह शराब केंद्रीय विषय बना हुआ है. शराबबंदी ऐसी योजना है ,जिसपर पूरा सरकारी महकमा लगा हुआ है. कौन इस बात से इंकार करेगा कि शराब ख़राब चीज है. पुराने ज़माने से सभी धर्मों ने इससे बाज़ आने की सलाह दी है. हर धार्मिक नेता ने अपने अनुयायियों को इससे परहेज करने की सौगंध खिलाई है. राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी जी ने इसे राष्ट्रनिर्माण से जोड़ कर देखा. राष्ट्रीय आंदोलन में शराबबंदी केलिए आंदोलन चलाए गए. इसीलिए जब बिहार में शराबबंदी हुई तब इसे सर्वदलीय समर्थन मिला. लेकिन सरकार ने जो शराबबंदी नीति बनाई वह सनक से भरी हुई है.  और तमाम मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं. पिछले सात वर्षों में जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या कितनी होगी किसी ने इस पर गौर किया है ? यह संख्या नरसंहारों में मारे जाने वालों की संख्या से कहीं अधिक हो गई है. और इस विषय पर हम यदि गंभीर नहीं हैं ,तब इसका मतलब है कि हम जनता के प्रति संवेदनशील नहीं हैं. अभी उत्तर बिहार  से मौत की जो भयावह खबरें आ रही हैं.उससे कोई भी परेशान हो सकता है. लगभग साठ लोगों के मरने की खबर है. इसे लेकर विधानसभा में मुख्यमंत्री की जो प्रतिक्रिया आई वह बेहद अफ़सोस जनक है. वह इस पर दुःख व्यक्त करने की जगह संतोष व्यक्त कर रहे हैं कि जो पीएगा ,सो मरेगा. आश्रित परिजनों को मुआबजा देने से भी इंकार करते हुए उन्होंने कहा कि शराब पीने वालों को कोई मुआबजा नहीं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मेरे व्यक्तिगत सम्बन्ध भी रहे हैं . मुझे हैरानी हो रही है कि जिस नीतीश कुमार को मैं जानता रहा वह अब पूरी तरह बदल गए हैं. ऐसे इंसान वह नहीं थे. इतना गुस्सा और और ऐसा अविवेकपूर्ण वक्तव्य उनकी फितरत में शामिल नहीं था. वह अपनी सौम्यता केलिए जाने जाते थे, आज अपनी  रौद्रता केलिए चर्चित हैं. उन्होंने विधानसभा और अपनी मर्यादा का तार -तार किया है. यह सब अत्यंत दुखद है. 

 

लेकिन चाहे जो हों, जैसे हों,मुख्यमंत्री तो वही हैं. इसलिए उन्ही से कुछ कहने केलिए अभिशप्त हूँ. मैं आदरपूर्वक अनुरोध करना चाहूंगा कि इस पूरे मामले पर वह  गंभीरता से विचार करें. 


1 .  मुख्यमंत्री का यह कहना कि शराब पीने वालों को मुआबजा नहीं दूंगा उनके अविवेक को प्रदर्शित करता है. शराब पीने वाले मर गए. मुआबजा उन्हें देना है, जो उनके आश्रित हैं. वे लोग तो आपके शराबबंदी के भरोसे थे. उनके मृत परिजन को आपका सिस्टम जहरीली शराब मुहैय्या करा रहा है इसमें उन मासूम आश्रितों का क्या दोष है? मुख्यमंत्रीजी , आपकी यह उदासीनता क्या केवल इसलिए हैं कि मरने वाले दलित -पिछड़े और गरीब -कमजोर परिवारों से हैं ? 

2 . मुख्यमंत्री को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि पुलिस महकमा और दूसरे आला अफसरों और सत्ताधारी और दूसरे रसूखदार राजनेताओं की मिलीभगत से अवैध शराब का धंधा अबाध गति से चल रहा है. हकीकत हैरान करने वाली है. 

3 . पूर्ण शराबबंदी सुनने में चाहे जितना सुन्दर लगे, इसे जमीन पर उतारना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा. इसलिए इसे व्यावहारिक बनाया जाए ताकि यह आतंक का रूप न ले ले. समय -समय पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए . पूर्ण शराबबंदी लक्ष्य अवश्य रहे. लेकिन उसे एकबारगी लागू करना पागलपन ही होगा. 

4 . शराबबंदी  केलिए जनजागरूकता इस तरह विकसित की जाय जिससे इसके प्रति अनाकर्षण पैदा हो.  भय एक सीमा तक ही कारगर होता है. 

5 . सरकार स्वयं  को शराब- केंद्रित नहीं कर दे. शराबबंदी कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है कि इसका उल्लेख आप अपने भाषणों में करें. एक सभ्य समाज में शराब केलिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसकी ऐसी भी मनाही नहीं हो कि कोई एक घूंट पी ले तो उसे हथकड़ी पहननी पड़े . यह भी सभ्य समाज का लक्षण नहीं है. हमें बुद्ध की इस शिक्षा का ध्यान रखना होगा कि दोनों अतियों से बचो. मुख्यमंत्री हमेशा अतियों पर ही जोर देते हैं. याद कीजिए, शराब दरवाजे तक पहुँचाने वाले भी आप ही थे. 


और आखिर में चीन देश के ख्यात दार्शनिक लाउत्से की एक कथा ,जिसे आप को जानना चाहिए. 

लाउत्से के ज़माने में कुंग -फू -जो चीन के सम्राट का प्रधानमंत्री था, जो विद्वानों -जानकारों से सलाह -मशविरा किया करता था. कुंग एक दफा लाउत्से से मिला और पूछा बेहतर शासन केलिए क्या करना चाहिए. 

लाउत्से का जवाब था -कुछ मत करो. 

कुंग अवाक् थे. 

लाउत्से ने चुप्पी तोड़ी . कहा- शासक को निष्क्रिय दिखना चाहिए. जनता के काम में वह घुल -मिल जाए . राजा के काम जनता न करे और न जनता के काम राजा करे. अच्छे शासक वे होते हैं जिनके बारे में जनता कमसे कम चर्चा करती है. 

और ख़राब शासक ? ' कुंग -फू -जो ने लाउत्से से पूछा .

-- ' बुरे राजा वे होते हैं ,जिनके बारे में जनता रातदिन चर्चा किया करती है. जनता का काम जब राजा की चर्चा करना हो जाए ,तब समझो संकट की घड़ी है. ' 


शासन के बारे में पुरानी कहावत है, जितने अधिक कानून बनते हैं ,अपराधों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ती है. 

मुख्यमंत्रीजी , शराब केंद्रित बिहार की राजनीति को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के वास्तविक मुद्दों से जोड़िए. चमचा युग से बिहार को बाहर कीजिए.



आलेख वह चित्र प्रेम कुमार मणि के फेसबुक वॉल से साभार।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

कविता और साम्प्रदायिकता: असगर वजाहत

प्रख्यात साहित्यकार असगर वजाहत साहब अक्सर चिंतनशील वह समसामयिक विषय पर अपनी टिप्पणी लिखकर फेसबुक पर शेयर करते रहते हैं। उन्हीं आलेखों में से एक गौरतलब आलेख यह भी है। पढ़ें।




 कविता और साम्प्रदायिकता


ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक डॉ. इमरै बांगा का ई-मेल मिला कि वे कक्षा में मेरा नाटक "जिस लाहौर नई देख्या......" पढ़ा रहे हैं। छात्रों को नाटक बहुत पसंद आया है और वे नाटक के संबंध में मुझसे कुछ बात करना चाहते हैं । निश्चित समय और तारीख का बातचीत शुरू हुई है। कुछ मौखिक रूप से और कुछ ईमेल के द्वारा छात्रों ने जो सवाल पूछे वे काफी महत्वपूर्ण थे। एक सवाल था कि नाटक में उर्दू के प्रसिद्ध कवि नासिर काज़मी को एक पात्र के रूप में क्यों रखा गया और क्या कविता सांप्रदायिकता समाप्त करने या कम करने की दिशा में है कोई भूमिका निभा सकती है?

भारत विभाजन की त्रासदी और  अव्यावहारिकता को बड़ी शिद्दत से लेखकों / कवियों ने व्यक्त किया है। यह कहा जा सकता है कि भारत विभाजन की त्रासदी पर हिंदी उर्दू में लिखा गया साहित्य बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ साहित्य में गिना जाएगा। इसके माध्यम से न केवल भयानक मानवीय त्रासदी उभर कर सामने आती है बल्कि निरर्थक विभाजन पर भी बहुत गंभीर सवाल उठाए गए हैं। धर्म के आधार पर राजसत्ता पाने की लालसा में किस प्रकार देश - समाज को बांटा गया और लाखों लोगों की जानें चली गई।बदले की भावना ने आदमी को जानवर बना दिया। धर्म का नाम लेने वालों ने सब से अधिक अधर्म किया। 

नाटक में विभाजन पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की गई है बल्कि नासिर काज़मी की कविता के माध्यम से पूरी भयावहता को व्यक्त किया गया है।


सवाल का दूसरा हिस्सा भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्या कविता सांप्रदायिकता को समाप्त करने या कम करने में कोई भूमिका निभा सकती है ?

कवि सांप्रदायिक  दंगा रोकने के लिए न तो सड़क पर निकल सकता है और  न तो कोई हथियार चला सकता है, न किसी का वार रोक सकता है। वह केवल लोगों से दंगा न करने की अपील कर सकता है। लेकिन उस समय उसकी अपील पर कौन ध्यान देगा? बल्कि उसकी दख़ल देने का उल्टा असर हो सकता है। अर्थात अपील करने वाले की ही हत्या की जा सकती है। उदाहरण के लिए कानपुर के दंगों में मुस्लिम सांप्रदायिक गुंडों द्वारा हिंदी के बहुत सम्मानित और वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गयी थी।


कविता का बुनियादी काम लोगों को संवेदनशील बनाना है। यह काम बहुत समय तो लेता है लेकिन बहुत पक्का होता है। यह भी सच्चाई है कि समाज को  संवेदनशील और मानवीय बनाने का और कोई रास्ता नहीं है। मतलब यह कि संविधान और कानून बना कर किसी समाज को संवेदनशील नहीं बनाया जा सकता। राजनीति,सरकार या प्रशासन भी समाज को संवेदनशील नही बना सकते। 

समाज को संवेदनशील बनाने का काम कविता, साहित्य और कलाएं ही करती हैं।

संवेदनशील समाज में हिंसा/ साम्प्रदायिकता  जैसी प्रवित्तियों पर लगाम लगती है।

इन तथ्यों के आलोक में नासिर काज़मी की भूमिका को देखना चाहिए।

अ. व.

शराबबंदी पर लेख लिखें- दीपक दक्ष

यूं तो दीपक दक्ष पेशे से पत्रकार हैं लेकिन उनके साहित्यानुराग की गवाही उनकी कलम ही देती है। इनकी रपट भी इतनी सहज और आम बोलचाल के भाषा में होती है कि आपको अंदर तक गुदगुदा जाती है। एक बार फिर से जब शराबबंदी पर बिहार में बबाल मचा हुआ है तो दीपक दक्ष ने अपने अंदाज में शब्दों से खेलते हुए देखिए कि शराबबंदी पर कैसा लेख वो लिख गए हैं।




 शराबबंदी पर लेख लिखें...

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               शराबबंदी

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शराबबंदी एक आफत है। एक अप्रैल 2016 से बिहार में आयी है। इस आफत से पियक्कड़ सब हांफत है। हंफनी की बीमारी बढ़ती जा रही है। पियक्कड़ों का कहना कि  ई अजबे निर्णय है...गजबे निर्णय है... निर्णय हंगामा मचवाने वाला है..पटका पटकी करवाने वाला है...


  वास्तव में , शराबबंदी ने समाज के एक वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है । यह समाज बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन प्रभावी है। नशे में हल्ला मचाने के लिए कुख्यात है। इसे पियक्कड़ समाज कहते हैं। जब से शराबबंदी हुई है, तब से यह गम में डूब गया है। इस समाज के लोग पिटाइल प्रेमी की तरह सुथनी जइसा मुंह बना कर घूम रहे हैं। अकेले में बैठ कर अपनी प्रेमिका शराब को याद कर रहे हैं । गीत गा रहे हैं- तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है , ये माना कि महफिल जवां है, हंसी है.... जब से प्रेमिका से दूर हुए हैं , तब से अर्थशास्त्र का ज्ञान जागृत हो गया है। घर, समाज उजाड़ने वाला पुराना डाटा किनारे लगाकर,  नया डाटा पेश कर रहे हैं- 3 लाख से अधिक आदमी सुखले जेल में चल गया... 6000 दुकानें बंद हो गयी... शराब क्षेत्र का रोजगार घट गया... बेरोजगारी बढ़ गयी... सालाना 4000 करोड़ का नुकसान हो रहा है... शराब माफिया मालामाल है... पुलिस दारोगा धन्नालाल हैं....


दरअसल शराबबंदी शुरू होते ही पियक्कड़ समाज को अपनी  इमेज की  चिंता सताने लगी । इस समाज के विद्वतजन कह हैं कि

 हर दिन पियक्कड़ प्रतिभा की बेइज्जती हो रही है... कमर में रस्सा बांध के अउर फोटू खिंचवा के पेपर में छपवाया जा रहा है, ई बढ़िया बात नहीं है...पियक्कड़ प्रतिभा के साथ घोर अन्याय है...शादी विआह में दिक्कत हो रही है भाई...रस्सा बंधल फ़ोटो वायरल हो जा रहा है..  फ़ोटो देख अगुआ बिदक जा रहा है .... गुंजनवा के तिलक  में गजबे हो गया...रस्सा बंधल फ़ोटो तिलकहरु सब में बंट गया...बिआह कट गया.... लड़की के प्रेमी का चाल सफल हो गया यार....वास्तव में,  पियक्कड़ प्रतिभा को पटकने की यह बड़ी साजिश है... एक सोची-समझी चाल है... प्रतिभा कुचलने की चाल... पियक्कड़ जमात को हाशिए पर डालने की चाल...


पियक्कड़  संघ का कहना है कि शराबबंदी के कारण देश कमजोर हो रहा है।  कार्य क्षमता घट रही है। उदाहरण के लिए----- पत्रकार,   खुशवंत सिंह बनने से वंचित हो रहे हैं... इनके पास लिखने के लिए नया आईडिया नहीं आ रहा है... इनके बॉस भी नया आईडिया दे नहीं पा रहे हैं...  दिमाग की बत्ती जलाने के लिए बॉस को रात 11 बजे  का इंतजार करना पड़ रहा है।  फिर  भी पत्रकार वाला भूतवा नहीं जाग रहा है...


शराबबंदी के कारण  पार्टियों की इमेज पलटनिया मार रही है ।  पइसावाली पार्टी को लोग भिखमंगा झूठा पार्टी कह रहे हैं और नेताजी भी जान रहे हैं कि वोट की खरीदारी ठीक से नहीं हो पा रही है। वोटिंग प्रतिशत गिर रहा है।  रंगबाजी फीकी पड़ रही है। अगर यही स्थिति रही तो अगला चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।   काला धन वाला सूटकेसवा धरले रह जायेगा...


दूसरी तरफ साहब संघ का कहना है कि अफसरों की महफिल नहीं जम रही है...इट्स नॉट गुड... साहबी शान नहीं दिखा पा रहे हैं भाई...रात के अंधेरे में दुबक कर पीना पड़ रहा है भाई... नहीं तो हवाई जहाज पकड़कर दिल्ली जाना पड़ रहा है ...।


 कर्मचारी संघ कह रहा है कि जबरदस्ती झारखंड में जाकर काम चलाना पड़ रहा है....संडे वाली छुट्टी  जसीडीह जंक्शन पर बीत जा रही है ... 


डॉक्टर्स क्लब का कहना है कि आमदनी घट गई है। अस्पतालों में उल्टी, अनपच,घटना- दुर्घटना के मरीज कम पहुंच रहे हैं... मेडिकल क्षेत्र अब पहले जैसा नहीं रहा... 


 इंजीनियर- ठेकेदार की जोड़ी कह रही है कि अब पहले जैसी पटरी नहीं बैठ रही है...एक-दूसरे को पटाने में परेशानी हो रही है... हां  बहुते परेशानी हो रही है...एक बोतल शराब की कीमत आप क्या जानोगे रमेश बाबू...


जब से शराबबंदी हुई है कलाकार संघ भी सदमे में है। दिन-रात बस एक ही गीत गा रहा है- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे,  मरने वाला कोई जिंदगी चाहता है जैसे.... आ भी जा आ भी जा....


अंत में कहा जा सकता है कि बिहार ज्ञान की भूमि है। बुद्ध,  महावीर की भूमि है। जेपी की भूमि है। विद्रोह की भूमि है। कुरीतियों के खिलाफ तन कर खड़े होने वालों की भूमि है। शायद इसीलिए शराबबंदी की गई है। 

 लेकिन शराब बंदी के बहाने संस्कारी पियक्कड़ समाज को हतोत्साहित किया जा रहा है। शराबबंदी ने  पियक्कड़ वर्ग को झकझोर कर रख दिया है । पियक्कड़ों पर केंद्रित पार्टियों की पहचान संकट में है। वोटिंग का गणित गड़बड़ा गया है। 


 नवही लइकन को  एंग्री यंग मैन बनने से रोक दिया है।  बरात की शान घट रही है।  नागिन डांस, अजगर डांस में बदल रहा है...गोली-बंदूक की बिक्री घट रही है। सामियाना में छेद नहीं हो रहा है। चखना का व्यापार मंदी की मार झेल रहा है ....


दूसरी तरफ कोई राजा राममोहन राय की तरह आगे बढ़ रहा है .... विरोध की परवाह नहीं कर रहा है ...अर्ध नंगे फकीर के विचारों के साथ चल रहा है... क्योंकि अर्धनंगे फकीर ने भी एक बार कहा था--- अगर मुझे एक दिन के लिए तानाशाह बना दिया जाए तो एक झटके में देश के सभी शराब दुकानों को बंद करा दूंगा.... वहीं पियक्कड़ समाज प्रेमिका शराब की याद में आंसू बहाते हुए गा रहा है---

मुझको ये तेरी याद क्यों आती है/ इतना बता मुझको ये क्यों सताती है....


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।

जबरन की शराबबंदी सफलता का मानक नहीं

 कुछ वर्ष पहले भी खाने -पीने के मसले पर विवाद हुआ था। उस समय कहा गया था कि खाना-पीना व्यक्तिगत मसला है इस पर किसी तरह का पाबंदी उचित नहीं। फिर शराबबंदी पर ये हंगामा क्यों? जब सम्पूर्ण बिहार में हर चौक-चौराहे पर शराब बिक रहा था तब भी वे ही लोग उन दूकानों पर लाइन लगते थे जो पीते थे। आज जब शराबबंदी लागू है तब भी वे ही लोग पी रहे हैं जो इसके आदि हैं। समझ से परे है कि श्रीमान इसे किस जिद्द में लिये बैठे हैं। खबर पढ़ने को मिली कि मुख्यमंत्री महोदय पिछले दिनों भी अपने विधायकों से बात की कि शराबबंदी लागू रखा जाय या हटा दिया जाय? अब सोचने वाली बात है कि किस पियाक विधायक में इतनी हिम्मत होगी कि अपने मुख्यमंत्री के संकल्प के विरोध में जाय? लेकिन गाहे -बगाहे अनेक मौकों पर अनेक विधायक / नेता शराबबंदी को समाप्त करने की सलाह मौखिक रूप से विभिन्न माध्यम से दें चुके हैं। 




आज उड़ती खबर मिल रही है कि सदन में मुख्यमंत्री ने कहा है कि शराब पीकर मरने वालों को एक रूपया भी नहीं दिया जाएगा। जबकि पिछले दिनों का बयान था कि जो पीयेगा वो मरेगा ही।

ऐसी परिस्थिति में उचित यही जान पड़ता है कि मुख्यमंत्री महोदय को किसी मध्यमार्ग पर जरूर विचार करना चाहिए। क्योंकि बालू और दारू ही बिहार के लिए एक नासूर बनता जा रहा है। और कोई तो वजह होगी कि वर्षों से शराबबंदी कानून लागू होने के बाबजूद लोग पी रहे हैं और मर रहे हैं। सरकार को यह भी अध्ययन करवाना चाहिए कि अन्य राज्यों की क्या स्थिति है? वहां शराबबंदी का कौन -सा माडल कार्य कर रहा है जो वहां से शराबबंदी की वजह से मौत की खबरें सुनाई नहीं पड़ती है?

नशा या सामाजिक बुराईयों से दूर रहने की सलाह/ जीवनशैली अच्छी बात है लेकिन महज एक नशा की वजह से अकाल मृत्यु को प्राप्त होना भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। फिर खाने-पीने का मसला लोगों की निजी जिंदगी का हिस्सा है उसमें किसी तरह का दखल उचित नहीं। और सच पूछा जाय तो जबरन की शराब बंदी सफलता का कोई मानक नहीं हो सकता। सफलता तब मानी जाएगी जब शराब चुनिंदा जगहों पर उपलब्ध हो, बाबजूद इसके युवा/जनता उस पेय से नफ़रत करे। उपलब्धता के बाबजूद पीने वालों की संख्या/ प्रतिशत दिन-प्रतिदिन कम होता जाय।

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गौरतलब है कि व्यक्तिगत रूप से न तो मैं किसी भी प्रकार के नशा का आदि हूं न ही समर्थक हूं। हां, चाय पीने का आदि हूं लेकिन आशा करता हूं कि चाय पीने पर सरकार कोई पाबंदी नहीं लगाएगी।

-सुशील कुमार भारद्वाज


रविवार, 11 दिसंबर 2022

कुछ बातें रवीश के बहाने: अपूर्वा

 रवीश कुमार ने जब से एनडीटीवी से इस्तीफा दिया है तब से पक्ष-विपक्ष में बहुत सी बातें आईं। एक तर्क़ अपूर्वा जी का भी जानते हैं। मीडिया महज पत्रकारिता ही नहीं बल्कि एक व्यवसाय भी है। अतः तर्क के इस आयाम को भी नकारा नहीं जा सकता है।



कुछ बातें रवीश कुमार के बहाने


प्रणव रॉय और राधिका रॉय के स्वामित्व वाले समाचार चैनल एनडीटीवी का प्रबंधन अडानी समूह के हाथों में जाने को लेकर इन दिनों मीडिया, सोशल मीडिया और आमजन के मध्य कोहराम मचा हुआ है। हिंदी भाषियों के लिए खासकर एनडीटीवी हिंदी से जुड़े ख्याति प्राप्त पत्रकार रवीश कुमार का चैनल से इस्तीफा किसी सदमे से कम नहीं है। रवीश कुमार का स्तुतिगान इन दिनों अपने चरम पर है। रवीश के प्रशंसकों को लग रहा है कि यह ‘सौदा’ अडानी समूह ने रवीश कुमार की बुलंद आवाज को खामोश करने की नीयत से किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों से नाइत्तेफाकी रखने वालों का मानना है कि ऐसा उनके ही इशारे पर, उनकी रजामंदी चलते हुआ है। ऐसा लगने के, ऐसा माने जाने के वाजिब कारण भी हैं। रवीश कुमार उन चुनिंदा टीवी पत्रकारों में से एक हैं जो बेहद विपरीत और विषम परिस्थितियों में भी सच्चाई के पक्ष में खड़े रहे हैं। मैं हिंदी पट्टी के कई ऐसे टीवी पत्रकारों का नाम गिना सकता हूं जिन्हें सच के पक्ष में खड़ा रहने के अपने जुनून चलते सत्ता के कोप का शिकार होना पड़ा। ऐसे बहुत सारे हैं जिन्होंने बड़े मीडिया संस्थानों की अपनी नौकरी को इसी जुनून चलते या तो स्वयं लात मार दी या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम, अभिषार शर्मा का नाम ऐसों में शामिल है। अब रवीश कुमार भी इस सूची में दर्ज हो गए हैं। यह सभी सोशल मीडिया के जरिए अपने जुनून को जिंदा रखे हुए हैं। बगैर किसी खौफ से आज भी सच को जिंदा रखने की अपनी मुहिम को चला रहे हैं। सोशल मीडिया में इन प्रशंसकों की तादात से स्पष्ट होता है, तसल्ली भी मिलती है कि अंधभक्ति के काल में सच को सुनने और समझने वालां की कमी इस देश में नहीं है। अब रवीश कुमार भी इन जुनूनियों के बगलगीर हो चुके हैं। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा महज चंद दिनों में ही उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के फॉर्लोवर्स की तादात का लाखों में पहुंच जाने से लगाया जा सकता है। एनडीटीवी को लेकिन केवल और केवल रवीश कुमार के चलते, केवल और केवल रवीश कुमार की आवाज को बंद करने की नीयत चलते अडानी समूह ने नहीं खरीदा है। बहुत संभव है कि रवीश कुमार भी एक कारण हों लेकिन वे मुख्य कारण मेरी समझ से नहीं हो सकते हैं। यदि रवीश ही एकमात्र कारण होते तो उन्हें चैनल से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के पास विकल्प मौजूद था। एनडीटीवी का स्वामित्व अपरोक्ष रूप से रिलायंस समूह के हाथों में लंबे अर्से से था। वर्ष 2009 में एनडीटीवी के संस्थापक रॉय दंपति द्वारा मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह से 403 करोड़ रुपए बतौर कर्ज लिए गए थे। इस कर्ज की शर्तों के अनुसार ही समय पर कर्ज न अदायगी के चलते रिलायंस समूह इस कर्ज के बदले एनडीटीवी के 29 प्रतिशत का मालिक बन गया। रिलायंस समूह ने एनडीटीवी को यह कर्जा अपनी एक कंपनी विश्वप्रधान कर्मिशयल 

प्राइवेट लिमिटेड (वीसीपीएल) के जरिए दिया था। अडानी समूह ने इस कंपनी वीसीपीएल को रिलायंस से इस वर्ष (2022) में खरीद लिया और इस तरह से वह एनडीटीवी की 29 प्रतिशत भागीदार हो गया। रिलायंस समूह ने कर्ज देते समय एनडीटीवी के संस्थापकों संग एक बेहद कड़ा समझौता किया था जिस चलते रॉय दंपति का कर्ज अदायगी न कर पाने के चलते अंततः अपनी कंपनी से मालिकाना हक गंवा देना वक्ती बात थी। ठीक ऐसा ही हुआ भी। इस पूरे ‘खेला’ में एक बड़ा पेंच लेकिन है जिससे इस आशंका को बल मिलता है कि इस पूरे ‘खेला’ में कहीं न कहीं वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका रही है। गौतम अडानी के रिश्ते केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व संग बेहद मधुर हैं। यह ऐसा सच है जो प्रत्यक्ष है, जिसे प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कस्तूरी की गंध बाबत संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है- ‘यदि सन्ति गुणाः पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयं, म्नहि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते।’    


अर्थात कस्तूरी की गंध को सिद्ध नहीं करना पड़ता, वह तो स्वयं फैलकर अपनी सुबंध से वातावरण का सुवालित कर देती है। इसी प्रकार गुणवान और प्रतिभावान मनुष्य के गुण अपने आप फैल जाते हैं, उनका प्रचार नहीं करना पड़ता। यह कलयुग है। इसमें ‘गुणवान’ और ‘प्रतिभावान’ की परिभाषा सत्युग वाली नहीं रही है। आज के दौर में गौतम अडानी ‘गुणवान’ और ‘प्रतिभावान’, दोनों हैं और वर्तमान सत्ता संग उनके रिश्तों को किसी प्रमाण अथवा प्रचार की जरूरत नहीं है। कस्तूरी गंध समान इन रिश्तों को भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस समूह ने एनडीटीवी का मालिकाना हक अपने पास क्यों नहीं रखा? क्यों उसने अपनी कंपनी अडानी समूह को बेच दी? वह भी तब, जब स्वयं रिलायंस समूह बड़ी तेजी से समाचार जगत में अपने पैर पसार रहा है। देश का सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क ‘नेटवर्क-18’ का स्वामित्व रिलायंस समूह के पास ही है। ‘सीएनबीसी’ चैनलस् भी रिलायंस के ही हैं। ‘फोर्ब्स इंडिया’ और ‘ओवर ड्राइव’ पत्रिकाएं भी रिलायंस समूह की ही हैं। ‘फर्स्ट पोस्ट’ (www.firstpost.com) तथा मनी कंट्रोल (www.moneycontrol.com) भी रिलायंस की ही हैं। ऐसे में एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित न्यूज चैनल को अपने कर्ज की एवज में रिलायंस बड़ी आसानी से अपने अधिकार में ले सकता था। वह बड़ी आसानी से रवीश कुमार को चैनल से बाहर किए जाने का निर्देश रॉय दंपत्ति को दे सकता था। अपने चैनल को बचाने के लिए रॉय दंपत्ति रिलायंस के इस निर्देश को मेरी समझ से तत्काल स्वीकार भी लेते। आखिरकार प्रणय रॉय-राधिका रॉय के लिए भी एनडीटीवी मिशनरी सोच वाली पत्रकारिता का माध्यम तो था नहीं। जिन्हें मेरी बात से इत्तेफाक न हो, वे प्रणय-राधिका के अतीत का पोस्टमार्टम करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें स्वयं ही सत्य से परिचय हो जाएगा। भारत में पत्रकारिता का इतिहास देख लीजिए। आजादी बाद से ही बड़ी पत्रिकाएं, समाचार पत्र और बाद में न्यूज चैनल का स्वामित्व ‘पवित्र पत्रकारीय’ मूल्यों की रक्षा करने वालों और प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानने वालों के हाथों कभी नहीं रहा है। फिर चाहे वह अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ समूह हो, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह हो या फिर ‘इंडिया टूडे’ समूह, सभी के मालिकान बड़े औद्योगिक घराने से रहे हैं जिनको प्रेस की ताकत से व्यापारिक लाभ और सत्ता के साथ गठजोड़ का अवसर मिलता रहा है। ईमानदारी से, निष्पक्षता के साथ आकलन यदि करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इन बड़े मीडिया घरानों का सत्ता संग रिश्ता समन्वयवाद और साहचर्य का रहता आया है। यही कारण है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, कोई भी विचारधारा वालों की हो, इन बड़े प्रेस (मीडिया) घरानों ने हमेशा से ही ‘तटस्थता’ की नीति का अनुसरण ही किया है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान एक छद्म संपादकीय स्वतंत्रता का आभाष जरूर महसूस होता था, लेकिन वह था छद्म ही। वर्तमान समय में उस छद्मता को भी पूरी तरह से नकार दिए जाने चलते चौथे स्तंभ की कथित निष्पक्षता को निर्ममतापूर्वक दबाए-कुचले जाने की बात तेजी से उठने लगी है। कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान एकतरफा कथन (नैरेटिव) जरूर नहीं था। सत्ता की धारा के विपरीत जाने वालों को साधने की कांग्रेसी कला अलग थी, वर्तमान सत्ताधीशों की अलग है। यहां यह भी समझा जाना जरूरी है कि ऐसा अकेले हमारे देश में नहीं हो रहा है। जो थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता लोकतांत्रिक देशों में प्रेस (मीडिया) के पास है भी, वामपंथी सत्ता वाले देशों में तो वह भी नहीं है। सत्य को, विपरीत विचारधारा को ऐसे मुल्कों में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपना पूरी तरह से कुचल दिया जाता है। वहां सत्ता बंदूक की नाल के बल पर ऐसा करती है। लोकतांत्रिक मुल्कों में पूंजी के बल पर ऐसा किया जाता है। अमेरिका में 1983 तक पचास कंपनियां देश के नब्बे प्रतिशत मीडिया को संचालित करती थीं। 2011 आते-आते यह स्वामित्व मात्र 6 बड़े औद्योगिक घरानों के हाथों में चला गया है। हमारे यहां भी यही कुछ हो रहा है। रिलायंस समूह की ताकत अपरम्पार है। उससे टकराने या चुनौती देने का काम कोई अकेला अखबार या चैनल कर ही नहीं सकता। रिलायंस जिओ नेटवर्क आम भारतीय के जीवन पर पूरी तरह काबिज हो चुका है जिसके जरिए आमजन को वही परोसा जा रहा है जो यह समूह चाहता है, आज की सत्ता चाहती है। रिलायंस की इस ताकत को सत्ता भी बखूबी समझती है। यही कारण है कि 2014 के बाद मुकेश अंबानी की बरअक्स गौतम अडानी को खड़ा करने का खेला शुरू किया गया। भले ही गौतम अडानी विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बन गए हों, उनका समूह कर्ज के दलदल में गहरे धंसा हुआ है। दूसरी तरफ रिलायंस समूह धीरे-धीरे कर्ज मुक्त होते जा रहा है। ऐसे में उसे कोई आवश्यकता नहीं थी कि वह एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल का स्वामित्व अपने हाथों ले जाने देता। वह भी अपने प्रतिद्वंद्वी के हाथों में।


बहरहाल कारण भले ही कुछ भी क्यों न हों, यह तय है कि काफी हद तक स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का एक और माध्यम पूंजी और सत्ता की शक्ति के हाथों परास्त हो गया है इससे लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया जब तक सरकारी अंकुश से बाहर है, निष्पक्ष, बुलंद और मिशनरी सोच जिंदा रहेगी। यह प्रकृति का नियम है कि सत्य भले ही तात्कालिक तौर पर हारा हुआ प्रतीत हो, अंततः जीत उसी की होती है। ‘सत्यमेव जयते’ पर विश्वास बनाए रखने के सिवा हाल-फिलहाल हमारे पास कोई चारा है भी नहीं। इसलिए इसे अपने विश्वास में जिंदा रखिए और इसके सहारे ‘अच्छे दिन’ आने की उम्मीद जिलाए रखिए।


फेसबुक से साभार।


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति

 रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति: सुशील कुमार भारद्वाज 



मेरी बात कुछ लोगों को बुरी लग सकती है लेकिन सच्चाई से आप भाग नहीं सकते। जब से #रवीशकुमार ने #एनडीटीवी छोड़ी, तब से उनके पक्ष में लिखने-बोलने वाले बढ़-चढ़ कर पोस्ट पर पोस्ट किये जा रहे हैं। लेकिन मेरी समझ से मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार रवीश कुमार एक पलायनवादी व्यक्ति हैं। जब तक एनडीटीवी के मालिक राय दम्पत्ति रहे तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता का राग अलापते रहे और उनके इस्तीफा के अगले दिन कुमार साहब ने इस्तीफा दे दिया। आखिर क्यों? क्या यह मान लिया जाय कि आपके तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारिता का रहस्य राय दम्पत्ति ही थे? आप उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे?

राय दम्पत्ति को भी चैनल की जिम्मेदारी की पेशकश की गई थी लेकिन संभव है कि चैनल को जिस प्रक्रिया के तहत बेचा गया उसमें उनसे कोई राय नहीं ली गई थी इसलिए वे आहत हों, और चैनल से उन्होंने खुद को अलग कर लिया।

अब बात आती है रवीश बाबू की। वे चैनल के मालिक नहीं बल्कि महज एक कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे थे। उनकी रोजी रोटी का सवाल वहां से जुड़ा हुआ था। उन्हें नये मालिक ने न तो पद छोड़ने को कहा न ही उनके कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाया, फिर क्यों भयाक्रांत होकर समय से पहले ही निकल लिये? ये तो हो गया कि पानी में डूब जाने के डर से तैरने की कोशिश ही नहीं करना। आप चैनल में बने रहते जब तक की चैनल आपको हटने को नहीं कहता या फिर जब तक की आपकी रपट या बहस पर रोक नहीं लगाई जाती। यदि नया चैनल मालिक आर्थिक, मानसिक या किसी भी रूप में आपके समक्ष व्यवधान उत्पन्न करता, आप आवाज उठाते तो जनता आपके साथ खड़ी नजर आती। आपकी समस्या लोगों को समझ में आती। लेकिन आप तो निहायत ही कमजोर और डरपोक, पलायनवादी नायक साबित हुए। आप सरकार के फ़ैसलों पर सवाल उठाकर नायक बन सकते हैं जैसे कि विपक्ष का एक मात्र चेहरा आप ही हों, लेकिन चैनल मालिक से आप एक सवाल पूछने की भी हिम्मत नहीं रखते हैं? सारी क्रांति समाप्त? अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त? नहीं रवीश बाबू नहीं। कम से कम आपसे ऐसे पलायनवादी कदम की उम्मीद तो कतई नहीं थी। आपसे पहले भी दर्जनों पत्रकारों ने चैनल और अखबार छोड़ें। स्वतंत्र पत्रकारिता की। दूसरे जगह नौकरी की। अपना स्वतंत्र चैनल, अखबार या यूट्यूब चैनल शुरू किया। लेकिन सबकुछ बहुत ही शांति से। लेकिन आपने तो ढ़ोल पीट-पीट कर सबकुछ किया। भले ही आपके भक्त आपको इतिहास में दर्ज करने की बात कर रहे हों लेकिन आप एक पलायनवादी के रूप में ही याद किये जाएंगे जिसने भविष्य के डर से ही सबकुछ छोड़ दिया।

#रवीश #रवीश_कुमार #NDTV #RavishKumar

सोमवार, 28 नवंबर 2022

ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना - प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना के कथायात्रा पर प्रियदर्शन का यह आलेख गौरतलब है।


 ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना

प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना ने 70 के दशक में लिखना शुरू किया। यह वह समय है जब नई कहानी का आंदोलन अपने शिखर पर पहुंच चुका था और उसके कई नायक आधुनिक हिंदी साहित्य में इतिहास पुरुष जैसे हो चुके थे। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लगभग कुख्यात हो चुकी त्रयी के अलावा निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती की कहानियां अलग-अलग ढंग से इसी आंदोलन की कड़ियों की तरह हमारे सामने थीं। ज्ञानरंजन, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, मार्कंडेय, रवींद्र कालिया और धीरेंद्र अस्थाना इसी परंपरा का हिस्सा रहे। इनके लगभग समानांतर या तत्काल बाद उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे विलक्षण कथाकार हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उभरे।

धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों को इस परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने का एक मकसद और है। नई कहानी का आंदोलन किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था, वह अपने देशकाल, अपनी परिस्थितियों की निहायत उपज था। आज़ादी के बाद का मोहभंग, गांव से कटकर पहली बार शहरों में बस रहे मध्यवर्ग का मुश्किल होता जीवन, युवाओं के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी और हताशा, प्रेम और दांपत्य के नए बनते तनाव- यह सब एक नया यथार्थ बना रहे थे जिसे शायद पुराने शिल्प में देखना और रचना संभव नहीं था। यह एक शुष्क यथार्थ था जिसके हिस्से के पुराने स्वप्न धीरे-धीरे तिरोहित हो रहे थे, जिसके भीतर देश को नए सिरे से गढ़ने और एक बराबरी वाला समाज बनाने की कल्पना लगभग रोज चोट खाती हुई मर रही थी और जिसके भीतर इन सबसे पैदा हुई एक गहरी बेचैनी थी।

अभाव, अनिश्चय, हताशा और बेचैनी के लगभग इसी चौराहे पर हमें धीरेंद्र अस्थाना की कई कहानियां मिलती हैं। लेकिन वे जीवन की छायाप्रति की तरह नहीं मिलतीं। धीरेंद्र अस्थाना इस मायने में अपने समय के कई कथाकारों से भिन्न हैं कि वह किन्ही दी हुई जीवन स्थितियों को, किसी अर्जित अनुभव को जस का तस नहीं रखते, बल्कि उनका लेखकीय हस्तक्षेप उनमें से अपनी कहानी चुनता है। ऐसा लगता है, पूरा जीवन उनके सामने चल रही एक कहानी जैसा है। वे उसमें शामिल भी हैं और उससे विलग भी हैं। ऐसी कहानी लिखना आसान काम नहीं होता। इसमें दो तरह के खतरे बहुत प्रत्यक्ष होते हैं। या तो कहानी बिखर जाती है या फिर वह जीवन की नकली, स्पंदनविहीन प्रति होकर रह जाती है।

लेकिन धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां दोनों खतरों के पार जाती हैं- शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है कि अंततः उन्हें कहना या बताना क्या है। कई तरह की जटिल स्थितियां रचते हुए वे अंततः कहानी अर्जित कर लेते हैं जो उन्हें कहनी होती है। उनकी पहली ही कहानी 'लोग हाशिए पर' एक जटिल कहानी है। कहानी कम से कम तीन स्तरों पर चलती है। पहले स्तर पर एक प्रेस है जिसमें काम कर रहे कई लेखक बहुत कम पैसे पर- लगभग- शोषण की स्थिति में नौकरी करने को मजबूर हैं। दूसरा स्तर आर्थिक तौर पर कमज़ोर इन लेखकों के परिवारों का है जिनकी ज़िम्मेदारियां पूरी करते या उनके दबाव से भागते-बचते ये लोग शराब के ठेकों की शरण लेते हैं और एक-दूसरे को किसी फुरसत में अपनी परेशानियां, कुंठाएं, कहानियां-कविताएं सब सुनाते हैं। एक अन्य स्तर पर यह कहानी उन मज़दूरों की है जो एक दिन हड़ताल करते हैं और अपना हक़ हासिल करने की कोशिश करते हैं। लगभग कामयाब दिखती इस हड़ताल के खात्मे के बाद मालिक साज़िश करते हैं और हड़ताल का नायक एक क़त्ल के जुर्म में सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। 

पहली नज़र में यह कुछ अतिरिक्त नाटकीय कहानी लग सकती है- जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से बुना ही नहीं है, बल्कि अपने स्व को अलग-अलग चरित्रों में बिखेर दिया है। लेकिन कहानी की सफलता इस बात में है कि कथाकार इन तमाम प्रतिकूलताओं के बीच बनने वाले हालात को बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ता है, किसी नक़ली आशावाद की गिरफ़्त में आने की जगह कहानी को उसके यथार्थ तक जाने देता है और उसमें नाटकीयता मिलाते हुए भी उसके पाठ की प्रामाणिकता बनाए रखता है। दरअसल इस काम में धीरेंद्र अस्थाना की मददगार उनकी बहुत जीवंत भाषा भी है- ऐसी भाषा जो बहुत कम शब्दों में स्थितियों और चरित्रों को रच सकने में सक्षम है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसी भाषा किसी कौशल या अभ्यास का नतीजा नहीं होती, उस जीवन से जुड़ाव से पैदा होती है जिसको लेखक अपनी कथा में रचने की कोशिश कर रहा होता है। यह जुड़ाव इस कहानी में बना रहता है और इसलिए कहानी अपने पाठकों से जुड़ पाती है। 

धीरेंद्र अस्थाना दरअसल जीवन के समानांतर अपनी कहानियों में एक और जीवन रच रहे होते हैं। क़ायदे से लगभग हर लेखक यही काम करता है, लेकिन सबकी अपनी प्रविधि होती है। कुछ लोग बस जो घटित होता है, उसमें कुछ कल्पना का रसायन मिलाकर, अपने-आप को अदृश्य रखते हुए ऐसी यथार्थवादी कहानियां लिखते हैं जिन्हें पढ़ते हुए लेखक का- या कहानी पढ़ने का- ध्यान नहीं आता। 

मगर धीरेंद्र अस्थाना की प्रविधि दूसरी है। वे एक साथ अपनी कहानियों में इतनी सारी चीज़ें ले आते हैं कि उन्हें जोड़ने के लिए कोई लेखक चाहिए। वे पाठक को यह भूलने नहीं देते कि वह कहानी ही पढ़ रहा है, लेकिन कहानी के तमाम सूत्र अंततः उस जीवन की ओर ले जाते हैं जिसमें उल्लास हो या उदासी, वह अपने पूरे गाढ़े रंग में प्रगट होती है। 

ऐसी ही एक कहानी है ‘भूत।‘ लेखक का एक वर्तमान है जिसमें एक स्त्री भी है जिससे वह प्रेम करता है। लेकिन उसे लगता रहता है कि उसका भूत उसके वर्तमान को खा रहा है। वह चाहता है कि वह अपनी प्रेमिका से यह सब साझा कर सके, लेकिन कर नहीं पाता। दूसरी तरफ़ प्रेमिका लगातार महसूस करती है कि वह एक अजनबी शख़्स के साथ है। वह बार-बार उसे कुरेदने की कोशिश करती है, लेकिन वह अपने खोल से बाहर नहीं आता। यह स्थिति उसे दफ़्तर में भी अजनबी और अकेला करती जाती है। जब वह पीछे मुड़कर और पलट कर देखता है तो पाठक के सामने एक सिहरा देने वाला यथार्थ सामने आता है। बरसों पहले वह पिता की मौत के बाद अपनी मां की उम्मीद की तरह घर से निकला था- लेकिन कहां और क्यों रास्ते में छूट गया और इस अधूरी रह गई वापसी ने कैसे उसे वर्तमान का प्रेत बना डाला है, इसकी लगभग स्तब्ध कर देने वाली कहानी हमारे सामने आती है। 

ध्यान से देखें तो धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां जीवन के कई आयामों के बीच आवाजाही करती हैं। एक तरफ़ वह समाज और व्यवस्था है जिससे उनके मध्यवर्गीय चरित्र टकराते रहते हैं- कभी हारते और कभी जीतते भी हैं, लेकिन अंततः उनकी कहानी इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था और इसे बदलने की ज़रूरत को कुछ रेखांकित करती हुई किसी अंत तक पहुंचती है। एक आयाम उस परिवार का है जिसमें बेबस पिता हैं, कातर मां हैं, भाई और बहनें हैं। कहीं पिता से टकराता, कहीं उनसे पिटता और कहीं उनको याद करता नायक है, कहीं मां की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की कचोट का मारा कथावाचक हैं, कहीं भाई को तलाश रहा एक स्तब्ध शख़्स है जिसे पता है कि बहुत सारी मजबूरियों को मिलाकर बने यथार्थ ने उसे लगभग पीस डाला है। एक आयाम प्रेम और घर से जुड़ा है जहां रिश्ते दरकते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और फिर एक-दूसरे को नए सिरे से पहचानने की कोशिश करते हैं। 

इन्हीं कहानियों के बीच एक स्तब्ध कर देने वाली कहानी ‘चीख’ है। कथावाचक का मानसिक तौर पर दुर्बल भाई घर से चला गया है, घर उसकी तलाश में जुटा है, पच्चीस दिन बाद अचानक वह लौट आता है। लेकिन वह यह बता पाने में असमर्थ है कि इन पच्चीस दिनों में वह कहां रहा, किनके आसरे रहा। बस एक दिन बता पाता है कि उसे मां की चीख सुनाई पड़ी थी और वह लौट आया था। 

ऐसी ही एक बहुत जटिल कहानी ‘जन्मभूमि’ है। लेखक कहानी के शुरू में ही यह ‘डिस्क्लेमर’ डाल देता है कि यह सुसंगत घटनाक्रमों के बीच बनी कहानी नहीं है- इसे वह ‘ऐंटी स्टोरी’- प्रति कहानी- कहता है। यह कहानी भी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होती है- लेखक का इसरार है कि पाठक किसी मंच की कल्पना करें जिसमें एक दृश्य घटित हो रहा है। इस दृश्य में अरसे बाद बेटे के सामने आया पिता उसे गद्दार कहता है। आने वाले दिनों में पार्टी के कॉमरेड उसे डरपोक कहते हैं क्योंकि वह कहता है कि वह राजनीतिक मोर्चे से ज़्यादा साहित्यिक मोर्चे पर उपयुक्त है। वह शराब के ठेके पर अपने दोस्त के साथ बैठता है, वहां से पिट कर दोस्त के साथ ही किसी अनजान लड़की के घर पहुंचता है। उसे अपनी पत्नी याद आती है और उसका दुख याद आता है कि वह उसे समझने की कोशिश नहीं करता। 

दरअसल यह कई दृश्यों को मिलाकर बुनी गई कहानी है। किसी फिल्म की तरह ये सारे दृश्य साथ चल रहे होते हैं। एक दृश्य पत्नी का है, एक दृश्य कथावाचक की रंगकर्मी दोस्त अनुराधा कुलकर्णी का है और एक दृश्य उसके अकेलेपन का भी है। ये सारे दृश्य मिलकर एक बड़ा दृश्य बनाते हैं- अभाव और संकट की मारी दुनिया में एक संवेदनशील-चरित्र के लगातार पिटने, रोने और पलायनोन्मुख होने का। लेकिन यह इस निरे अर्थ में पलायन नहीं है कि इसमें सोचने का तत्व बाक़ी है, प्रतिरोध और गुस्सा बाक़ी है और यह खयाल और सवाल बाक़ी है कि ‘एक अकेला आदमी बावजूद सकारात्मक सोच और तमन्नाओं के अंततः ग़लत क्यों साबित होता है, होता चला जाता है?’

यहीं यह खयाल आता है कि क्या धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां विफल कथानायकों की कहानियां हैं? उनके हिस्से का प्रेम अधूरा रहता है, उनका परिवार उनसे असंतुष्ट रहता है, ज़िंदगी उनसे सधती नहीं, क्रांति उनसे होती नहीं। वे अकेले पड़ जाने को अभिशप्त चरित्र हैं। लेकिन क्या यह विफलता उनके भीतर मौजूद किसी ‘फेटल फ्लॉ’- किसी सांघातिक कमज़ोरी की है- शेक्सपियर के महान चरित्रों की तरह जो एक मोड़ पर जानलेवा साबित होती है? या इसका वास्ता उस दुर्निवार और दुर्विराट होती व्यवस्था से है जिसमें किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए या तो यांत्रिक बन कर जीना संभव है या फिर घुट-घुट कर मरना संभव है? दरअसल यह सवाल धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों का मर्म समझने की एक कुंजी दे सकता है। धीरेंद्र अस्थाना की ये कहानियां अच्छी क्यों लगती हैं? क्योंकि वे अपनी अंतर्वेदना में सिर्फ़ निजी छटपटाहट की कहानियां नहीं हैं, वे एक सार्वजनिक विडंबना की भी कहानियां हैं जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया है। 

‘नींद के बाहर’ वह कहानी है जिसमें धीरेंद्र अस्थाना का कथा-वैभव अपने पूरे निखार के साथ दिखाई पड़ता है। एक बड़े कंपनी के बड़े अधिकारी की नौकरी छूटने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। लेकिन यह नौकरी छूटने के साथ लोगों की नज़र बदल जाने की सपाट कहानी नहीं है। उल्टे उस अधिकारी को लगता है कि वह जब तक नौकरी में था तब तक एक गहरी नींद में था जिसमें दुनिया और उसका सच उसके सामने से ओझल थे। नौकरी छूटने के साथ वह नींद से बाहर आ गया है। बेशक, इसमें बदली हुई निगाहें भी हैं, दोस्तों द्वारा उसका फोन न उठाने की दास्तानें भी हैं, पास-पड़ोस से उसका नया बनता संबंध भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह निजी दुख या पीड़ा की कहानी नहीं है। यह इस नए बनते चमकदार भारत में लगातार असुरक्षित होते जाते लोगों और उनकी ज़िंदगियों में फैलते अंधेरे की भी कहानी है- जो बहुत बारीक़ी से लिखी गई है और जिसके बहुत सारे स्तर हमें बांधे रखते हैं। 

इसी तरह एक और कहानी है- ‘पिता’। यहां पिता और पुत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं और कटे हुए भी- उनमें एक आत्मीय पारस्परिकता है, लेकिन वैसी भावुक निर्भरता नहीं जो पुराने पिताओं-पुत्रों में उनकी संवादहीनता के बावजूद देखी जाती है- एक-दूसरे पर दबाव बनाने या एक दूसरे के दबाव से मुक्त होने की कोशिश तो कतई नहीं। कोई हठी आलोचक पढ़ना चाहे तो इसमें टूटती-बिखरती

पारिवारिकता के सूत्र भी पढ़ सकता है। बेशक, वे सूत्र यहां हैं, लेकिन इन चरित्रों या इस कहानी की वजह से नहीं, बल्कि उस सहज माहौल की वजह से जो वक़्त बदलने के साथ बदल गया है। हां, इस बदले हुए माहौल में, एक निष्ठुर अकेलापन है जो सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मां-पिता कहीं दूर हैं और बेटा अकेले है, बल्कि इस वजह से भी है कि अपनी स्वतंत्रता की कामना की, जीवन को अपने ढंग से जीने की ज़िद की, एक क़ीमत यह अकेलापन भी है। इसी अकेलेपन ने राहुल को भी बनाया है और मनचाही शादी और परिवार के बावजूद अंततः अकेला छोड़ दिया और यही अकेलापन विकास को भी बना रहा है।

कहानी का अंत काफी महत्वपूर्ण है। धीरेंद्र अस्थाना चाहते तो इसे आसानी से पिता की मर्जी की कहानी

बना सकते थे। बेटे की छूटी हुई नौकरी दुबारा लग गई है, वह कलाकार के रूप में स्थापित है, अब एक

घर है जहां से वह जुड़ा रहे तो पिता और परिवार से बंधा रहेगा। लेकिन अपने बेटे की उपलब्धि पर खुश

पिता फिर भी उसे यह आश्रय नहीं देता। राहुल दिल्ली की फ्लाइट वापस पकड़ने के लिए निकलने से पहले विकास से पूछता है, वह रहेगा कहां। विकास के जवाब में एक बेफिक्री है और राहुल उसे अपने हिस्से का आसमान या अपने हिस्से की छत बनाने के लिए (बिना यह कहे) छोड़ जाता है। यह एक जटिल अंत है- एक हूक भी पैदा करता है जो देर तक बनी रहती है। लेकिन शायद यही तार्किक है।

विकास को बांधे रखना होता तो राहुल शुरू से बांधे रखता- इस आख़िरी मोड़ पर वह उसे क्यों बांधे।

इस कहानी की कई ख़ासियतें हैं। यह अपने समय से बंधी- उसकी ताल में निबद्ध- कहानी है। यहां

छूटते हुए घर हैं, छूटती हुई नौकरियां हैं, नौजवान बेफ़िक्री है, बहुत हल्के से दीखता, लेकिन बदलता हुआ हिंदुस्तान है- और खालिस इक्कीसवीं सदी का वह द्वंद्व है जो अपने रिश्तों को लेकर हमारे भीतर

मौजूद है।

धीरेंद्र अस्थाना का लेखन संसार बहुत बड़ा और विपुल है। लेकिन उसकी खासियत यह है कि वह अपने बहुत क़रीब लगता है। शायद इसलिए कि वह बहुत दूर तक निजी प्रसंगों और अनुभवों से बनता है। यही वजह है कि उसमें बहुत गहरी तपिश दिखाई पड़ती है, उससे बहुत ऊष्मा मिलती है। उनके उपन्यास ‘गुज़र क्यों नहीं जाता’ में भी ये आत्मकथात्मक प्रसंग मिलते हैं। यह एक निजी कहानी जैसा है, लेकिन इसमें निहित सार्वजनिकता अदृश्य नहीं रहती और न ही इसके दंश अलक्षित रह जाते हैं।

लेकिन इतना राग-विराग-खटराग-अनुराग धीरेंद्र अस्थाना लाते कहां से हैं? उनका निजी वितान इतना बड़ा कैसे होता जाता है कि उसमें सार्वजनिकता भी समाई मिलती है? इसका जवाब उनकी आत्मकथा ‘ज़िंदगी का क्या किया’ देती है। इस किताब से गुज़रते हुए अनायास यह खयाल आता है कि धीरेंद्र जीवन की ऊष्मा को, उसके ताप को, जिस तीव्रता के साथ महसूस करते हैं, उसे अपने लेखन में लगभग ज्यों का त्यों उतार लेते हैं। धीरेंद्र बहुत बेबाकी और धीरज से अपने बचपन का, उस बचपन के संघर्ष का, अपने रिश्तों का, अपनी मां-अपने पिता. अपने चाचा का उल्लेख करते हैं। इस उल्लेख में संवेदनशीलता भी है, ज़रूरी दूरी भी, तटस्थता भी और कभी-कभी बिल्कुल निष्कवच यथार्थ को दिखा देने वाला साहस और स्वीकार भी। धीरेंद्र के कोख में रहते आत्महत्या की कोशिश में अपाहिज हो गई मां, फक्कड़पने के अलग-अलग ध्रुवांतों को जीते और परिवार के लिए किसी मुसीबत की तरह मिलते पिता, परिवार के आर्थिक अभावों को अनदेखा कर अपनी संपन्न जीवनशैली में खोए रिश्तेदार, और छोटे-बड़े अभावों का जैसे अंतहीन सिलसिला- मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फरनगर और देहरादून के बीच पले-बढ़े इस जीवन की झलक हमें य़ह भी बताती है कि लेखक कैसे बनते हैं या धीरेंद्र अस्थाना नाम का लेखक कैसे बना। 

जिसे ज़िंदगी इस दुर्धर्ष अनुभव की तरह मिली हो, वह या तो बिल्कुल संवेदनहीन होकर उसे मशीन या पशु की तरह काट देता है, या फिर अतिरिक्त संवेदनशील होकर आत्महत्य़ा के रास्ते की ओर बढ़ चलती है और अगर यह भी नहीं तो लेखक बन जाता है। दरअसल यह लिखना है जिसने धीरेंद्र अस्थाना का जीना संभव किया। यही वजह है कि जीवन भी उनके लिए कहानी जैसा है। इस कहानी में अपनी राहतें भी हैं और इससे निकलती राहें भी। यह उनकी सीमा भी है और उनकी शक्ति भी। और इन सबसे निकलता अंतिम सच यह है कि धीरेंद्र अस्थाना हिंदी के एक मूल्यवान लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने पाठकों को समृद्ध किया है और हिंदी कथा की परंपरा में अपने स्तर पर कुछ जोड़ा भी है।

प्रियदर्शन 




आलेख साभार।