सोमवार, 22 मई 2017

शहंशाह आलम की तीन कविताएं


समकालीन कवि शहंशाह आलम की सबसे बड़ी खासियत है कि वे न सिर्फ कविताएं लिखते हैं बल्कि अचूक मारक कविताएं लिखते हैं। उनकी पैनी नजर आस-पास की हर गतिविधि पर होती है। यदि वे अपने शहर में फैल रहे अत्याचार और अराजकता पर नजर रखते हैं तो वे नोटबंदी, आधार कार्ड और जीएसटी जैसे निर्णय से होने वाली कठिनाइयों एवं सहुलियतों पर भी ध्यान रखते हैं। ध्यान तो इस बात का भी रखते हैं कि अलबत्ता शातिर शासक किस कदर भोलीभाली जनता को दूसरे मुद्दों में उलझाकर अपना उल्लू सीधा करती है। साथ ही साथ कवि इस ओर भी इंगित करते हैं कि माहौल इतना गंदा और भयाक्रांत है कि विरोध के स्वर फुटें उससे पहले ही दबा देने की पूरी तैयारी है। आइये पढ़ते शहंशाह आलम की तीन बेहतरीन कविताएं जो हमारे वर्त्तमान परिवेश और परिदृश्य को बखूबी रेखांकित करती हैं। -- सुशील कुमार भारद्वाज

तुम्हारे शहर में
     ● शहंशाह आलम

तुम्हारे शहर में चाँद निकलता है
मेरे शहर में क़ातिल निकलते हैं रोज़ रात को
हुकूमत की तरफ़ से फुसलाकर भेजे हुए

तुम्हारे शहर में फूल खिला किए हैं
मेरे शहर में बबूल उगा किए हैं
मेरे थके-हारे पाँवों के नीचे काँटेदार

तुम्हारे शहर में रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
साबुन भी तेल भी कपड़ा भी घैला भी कनस्तर भी

मेरे यहाँ तो नल में पानी तक उनके इशारे पर आता है
जिन्होंने मेरे घोड़े के चारों पाँव क़ैद कर लिए हैं
जिन्होंने मेरी कश्ती के लिए बची नदी चुरा ली है

जानेमन, तुम मेरे किस शहर की बात करते हो
जहाँ चाँद निकलता है क़ातिल नहीं
जहाँ फूल खिलते हैं बबूल नहीं उगा करते
जहाँ रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
जहाँ फ़ाक़ाकशी नहीं है ज़ुल्म नहीं है

तुम्हारे शहर का ज़िलाधिकारी यही एलान कराता रहा है
तुम्हारे शहर का पुलिस कप्तान यही कहता आया है
कि तुम्हारा शहर एक बेहद स्मार्ट शहर है
जहाँ रोटियाँ रख दो तो चींटियाँ नहीं लगतीं
जहाँ रात को सोओ तो मच्छर नहीं काटा करते
जहाँ घूमने निकलो तो उचक्के सामान लेकर नहीं भागते

जानेमन, मेरे शहर का ज़िलाधिकारी
सारा झूठ ही एलान कराता है
मेरे शहर का पुलिस कप्तान
एक बेहद मक्कार पुलिस कप्तान है

क़ब्र खोदने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
पेट्रोल कम देने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
औरतों को जलाकर मारने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
घूस लेकर काम करने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
दवाइयाँ नहीं मिलने वाले हॉस्पिटल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
बिना उस्ताद वाले स्कूल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में

अब बस भी कीजिए हुज़ूर
मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था
मैं आपके शहर को सचमुच
एक अच्छा शहर मानता आया था

चलो, तब हम ऐसा करते हैं
मिलकर एक ऐसा कोई शहर
एक ऐसा कोई नगर तलाशते हैं
जहाँ शहतूत के पेड़ बचे हों
जहाँ शहद के छत्ते बचे हों
जहाँ किसी का ख़ून नहीं किया जाता हो
जहाँ औरतों की इज़्ज़त नहीं ली जाती हो
जहाँ बच्चाचोर बताकर लोग बेगुनाहों का क़त्ल नहीं करते हों
जहाँ मुंसिफ़ बिना डरे सच्चा इंसाफ़ करता हो

जानेमन, इस सदी का सबसे बड़ा जोक आपने सुना दिया
मेरे शहर में बलात्कार नहीं होगा ख़ून नहीं होगा
लोग भूखे मारे नहीं जाएँगे दिक़्क़्त में नहीं होंगे
तो हुकूमत आला ऑफ़िसरों की तरक़्क़ी रोक देगी

तुम्हारे शहर में भी चाँद नहीं क़ातिल निकला किए हैं
तुम्हारे शहर में भी शायर नहीं क़ातिल रहा किए हैं
मैंने मान लिया मैंने समझ लिया मैंने जान लिया।

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तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
                         
 

तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
मैं डरता हूँ नोटबंदी से आधार से जीएसटी से

नोटबंदी से तुम काहे डरते हो
इससे हम पैसे के लिए लाइन में लगे-लगे मारे जाएँगे
राजा लोग के पैसे उन्हें घर बैठे मिल जाया किएँगे

आधार से तुम काहे डरते हो
इससे हमें हमारे मुल्क में शरणार्थी
घोषित किए जाने का ख़दशा है
राजा लोग चूँकि राजा लोग होंगे
उन्हें हमेशा की तरह कोई दिक़्क़्त नहीं होगी

जीएसटी से तुम काहे डरते हो
इससे हमारे खाने की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ जाएँगी
राजा लोग की अय्याशी के सामान की क़ीमतें घट जाएँगी

फिर मुल्क का वित्त मंत्री इन सबको लागू करने के लिए
इतना हड़बड़ाया-घबराया हुआ क्यों है अनजाने मुसाफ़िर

वित्त मंत्री को पता है कि गाय की तीन तलाक़ की
मंदिर की मस्जिद की बेमक़सद बहसों के बीच
नोटबंदी को आधार को जीएसटी को लागू कर लेना ज़रूरी है
इससे पहले कि अवाम वित्त मंत्री की असली मंशा जानकर
सड़कों पर उतर आएँ उनकी सरकार के ख़िलाफ़

तुम और काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
उन ख़तरनाक कवियों से जो बातें तो गांधी की करते हैं
लेकिन अपने ख़्वाब में गोडसे को पुकारा किए हैं

लेकिन यह तो जनम-जनम का क़िस्सा है मेरे अनजाने मुसाफ़िर

हाँ, यह जनम-जनम का क़िस्सा है हमारे बनाव-बिगाड़ का
इसलिए कि अब मुंसिफ़ के हाथ में ख़ंजर है बम-बारूद है
और अब मुल्क में क़ातिल को सज़ा नहीं देने का नया रिवाज है।

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मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
                 


मुझे अच्छी तरह से मालूम है
मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
जिस ठिकाने पर मैं उनके ख़िलाफ़ नज़्में
लिखता हूँ कमरे में आई धूप के साथ मिलकर

मैं उनके ख़िलाफ़ क्यों न लिक्खूँ नज़्में
जोकि मेरी छत पर का चाँद चुरा ले जाते हैं
घर के दरो-दीवार का रंग-रोगन नोच डालते हैं
कनस्तर में रखी चीज़ें बाहर फेंक आते हैं

उनके घोड़े ज़ख़्मी हो चुके हैं
मुझे कुचलने की चाहत में
उनके निगराँ थक चुके हैं
मुझे दबाने की उम्मीद में

मैं जो पहले से सताया जाता रहा हूँ
मैं जो पहले से दबा-कुचला रहा हूँ
मुझे उनकी गालियों का ख़ौफ़ कैसा

उनके हमले तो मेरे पुश्त-दर-पुश्त पर होते चले आए हैं
उनकी बेईमानियों में इज़ाफ़े भी होते रहे हैं मुसलसल

ये उनके ख़ुफ़िया फ़ैसले हैं ख़ुफ़िया एजेंडे भी
कि मैं सैर के लिए निकलूँ और मेरी क़लम उठा ली जाए
कि मैं सोने जाऊँ और मुझे समुंदर में बहा दिया जाए

उन्हें मालूम है अदालतें उन्हीं की हैं
मुंसिफ़ लोग उन्हीं के हैं
हर जल्लाद उनके ख़रीदे हुए ग़ुलाम हैं

उन्हें मालूम है मेरे जैसे आदमी का अग़वा करना
बेहद मुश्किल कामों में एक काम है
वे मेरा क़त्ल भी करवा नहीं सकते इस बदनामी के डर से
कि वे जब भी मारते हैं मरे हुओं को मारते हैं।

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संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

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