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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

कविता और साम्प्रदायिकता: असगर वजाहत

प्रख्यात साहित्यकार असगर वजाहत साहब अक्सर चिंतनशील वह समसामयिक विषय पर अपनी टिप्पणी लिखकर फेसबुक पर शेयर करते रहते हैं। उन्हीं आलेखों में से एक गौरतलब आलेख यह भी है। पढ़ें।




 कविता और साम्प्रदायिकता


ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक डॉ. इमरै बांगा का ई-मेल मिला कि वे कक्षा में मेरा नाटक "जिस लाहौर नई देख्या......" पढ़ा रहे हैं। छात्रों को नाटक बहुत पसंद आया है और वे नाटक के संबंध में मुझसे कुछ बात करना चाहते हैं । निश्चित समय और तारीख का बातचीत शुरू हुई है। कुछ मौखिक रूप से और कुछ ईमेल के द्वारा छात्रों ने जो सवाल पूछे वे काफी महत्वपूर्ण थे। एक सवाल था कि नाटक में उर्दू के प्रसिद्ध कवि नासिर काज़मी को एक पात्र के रूप में क्यों रखा गया और क्या कविता सांप्रदायिकता समाप्त करने या कम करने की दिशा में है कोई भूमिका निभा सकती है?

भारत विभाजन की त्रासदी और  अव्यावहारिकता को बड़ी शिद्दत से लेखकों / कवियों ने व्यक्त किया है। यह कहा जा सकता है कि भारत विभाजन की त्रासदी पर हिंदी उर्दू में लिखा गया साहित्य बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ साहित्य में गिना जाएगा। इसके माध्यम से न केवल भयानक मानवीय त्रासदी उभर कर सामने आती है बल्कि निरर्थक विभाजन पर भी बहुत गंभीर सवाल उठाए गए हैं। धर्म के आधार पर राजसत्ता पाने की लालसा में किस प्रकार देश - समाज को बांटा गया और लाखों लोगों की जानें चली गई।बदले की भावना ने आदमी को जानवर बना दिया। धर्म का नाम लेने वालों ने सब से अधिक अधर्म किया। 

नाटक में विभाजन पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की गई है बल्कि नासिर काज़मी की कविता के माध्यम से पूरी भयावहता को व्यक्त किया गया है।


सवाल का दूसरा हिस्सा भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्या कविता सांप्रदायिकता को समाप्त करने या कम करने में कोई भूमिका निभा सकती है ?

कवि सांप्रदायिक  दंगा रोकने के लिए न तो सड़क पर निकल सकता है और  न तो कोई हथियार चला सकता है, न किसी का वार रोक सकता है। वह केवल लोगों से दंगा न करने की अपील कर सकता है। लेकिन उस समय उसकी अपील पर कौन ध्यान देगा? बल्कि उसकी दख़ल देने का उल्टा असर हो सकता है। अर्थात अपील करने वाले की ही हत्या की जा सकती है। उदाहरण के लिए कानपुर के दंगों में मुस्लिम सांप्रदायिक गुंडों द्वारा हिंदी के बहुत सम्मानित और वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गयी थी।


कविता का बुनियादी काम लोगों को संवेदनशील बनाना है। यह काम बहुत समय तो लेता है लेकिन बहुत पक्का होता है। यह भी सच्चाई है कि समाज को  संवेदनशील और मानवीय बनाने का और कोई रास्ता नहीं है। मतलब यह कि संविधान और कानून बना कर किसी समाज को संवेदनशील नहीं बनाया जा सकता। राजनीति,सरकार या प्रशासन भी समाज को संवेदनशील नही बना सकते। 

समाज को संवेदनशील बनाने का काम कविता, साहित्य और कलाएं ही करती हैं।

संवेदनशील समाज में हिंसा/ साम्प्रदायिकता  जैसी प्रवित्तियों पर लगाम लगती है।

इन तथ्यों के आलोक में नासिर काज़मी की भूमिका को देखना चाहिए।

अ. व.

गुरुवार, 15 जून 2017

असगर वजाहत की कहानी दलित के द्वारे

असगर वजाहत उन साहित्यकारों में से एक हैं जो देशकाल पर गहरी निगाह रखते हैं और उन्हें कलात्मक ढ़ंग से शब्दबद्ध कर इतिहास के दस्तावेजों में शामिल करते हैं। प्रस्तुत कहानी "दलित के द्वारे" भी हाल की एक राजनीतिक घटनाक्रम पर लिखी गई है। जिनके कई मायने भी हैं तो कई सवाल भी। आप भी पढ़े।


दलित के द्वारे
कहानी
अ. व.

नेताजी दलित के घर भोजन करने गए। उन्होंने अपनी एक करोड़ की कार को दलित के घर के सामने रोक दिया । और फिर उनकी गाड़ी के पीछे जो पचास - पचास लाख की गाड़ियां थी वे भी रुक गयीं। दलित घर के बाहर खड़ा था। उसके पैर कांप रहे थे। उसका दिल धड़क रहा था।उसकी गर्दन झुकी हुई थी। जनता नेताजी की जय जय कार कर रही थी ।नेताजी ने हाथ जोड़कर दलित को नमस्कार किया है और आगे बढ़कर दलित के गले में फूलों की एक माला डाल दी। इस भारी माला से दलित का सिर और झुक गया।
 दलित नेताजी को लेकर घर के अंदर आया खाना लगा हुआ था ।नेता जी और दलित खाना खाने बैठ गए। दलित ने इतना अच्छा खाना कभी न खाया था। खाना शुरु होते ही पत्रकार और मीडिया के लोग अंदर आ गए । वे भी खाने पर टूट पड़े। दलित को लगा कही खाना कम  न पड़ जाए। पर खाना कम नहीं पड़ा।
कैमरे चालू कर दिए और खाने के बाद पत्रकार नेताजी से कुछ मजेदार सवाल पूछने लगे ।दलित से भी कुछ पूछा गया लेकिन वह जवाब न दे सका क्योंकि उसका पेट गले तक भरा था और आवाज नहीं निकल रही थी। पत्रकार उसे छोड़कर नेताजी के पास आ गए। नेताजी धड़ाधड़ बातें कर रहे थे।
नेता जी के जाने के  बाद दलित पिघलने लगा।वह बर्फ की तरह गलने लगा।धीरे धीरे बहने लगा।फिर वह गायब हो गया।
अब दलित केवल उस फ़ोटो ही में था जो नेता जी के साथ खींची गयी थी।
…...............
असगर वजाहत जी के फेसबुक वॉल से साभार।