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शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

डर की दूरी : सुशील कुमार भारद्वाज (कविता)

डर की दूरी

सुशील कुमार भारद्वाज 




कभी जो पास था मन के,

अब उस राह पर धुंध उतर आई है।

मैं तुमसे नहीं,

खुद से दूर भाग आई हूँ कहीं।


कहा मैंने —

“आजकल मैं दूरी बना रही हूँ,

डर लगता है, कहीं गलती न हो जाए...”

पर गलती क्या होती है?

एक क्षण की कमजोरी?

या वह चाहत,

जो शब्दों में नहीं समा पाती?


तुमने कुछ नहीं कहा,

बस देखा, जैसे कोई आईना देखता हो—

जिसमें मैं खुद को झूठा साबित नहीं कर पा रही थी।


सच यह है,

कि मैं जानती हूँ —

गलती तुमसे भी हो सकती है,

मुझसे भी।

क्योंकि गलती कभी शरीर से नहीं होती,

वह आत्मा की थकान से होती है।


यह डर, यह दूरी,

एक दीवार नहीं, एक पुकार है—

“रुको... मैं खुद को समझना चाहती हूँ।”


कभी-कभी प्रेम का सबसे सच्चा रूप

वही होता है,

जब हम उसे अधूरा छोड़ देते हैं।


मैं बस यही चाहती हूँ —

तुम मेरे भीतर बने रहो,

पर मेरे बाहर न आओ।

क्योंकि अगर तुम बाहर आ गए,

तो शायद मैं टूट जाऊँगी,

और फिर कुछ भी शेष नहीं रहेगा—

न गलती, न दूरी,

न मैं, न तुम।


बस एक सन्नाटा...

जहाँ प्रेम, डर बनकर साँस लेता रहेगा।


********************************

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

कविता और साम्प्रदायिकता: असगर वजाहत

प्रख्यात साहित्यकार असगर वजाहत साहब अक्सर चिंतनशील वह समसामयिक विषय पर अपनी टिप्पणी लिखकर फेसबुक पर शेयर करते रहते हैं। उन्हीं आलेखों में से एक गौरतलब आलेख यह भी है। पढ़ें।




 कविता और साम्प्रदायिकता


ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक डॉ. इमरै बांगा का ई-मेल मिला कि वे कक्षा में मेरा नाटक "जिस लाहौर नई देख्या......" पढ़ा रहे हैं। छात्रों को नाटक बहुत पसंद आया है और वे नाटक के संबंध में मुझसे कुछ बात करना चाहते हैं । निश्चित समय और तारीख का बातचीत शुरू हुई है। कुछ मौखिक रूप से और कुछ ईमेल के द्वारा छात्रों ने जो सवाल पूछे वे काफी महत्वपूर्ण थे। एक सवाल था कि नाटक में उर्दू के प्रसिद्ध कवि नासिर काज़मी को एक पात्र के रूप में क्यों रखा गया और क्या कविता सांप्रदायिकता समाप्त करने या कम करने की दिशा में है कोई भूमिका निभा सकती है?

भारत विभाजन की त्रासदी और  अव्यावहारिकता को बड़ी शिद्दत से लेखकों / कवियों ने व्यक्त किया है। यह कहा जा सकता है कि भारत विभाजन की त्रासदी पर हिंदी उर्दू में लिखा गया साहित्य बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ साहित्य में गिना जाएगा। इसके माध्यम से न केवल भयानक मानवीय त्रासदी उभर कर सामने आती है बल्कि निरर्थक विभाजन पर भी बहुत गंभीर सवाल उठाए गए हैं। धर्म के आधार पर राजसत्ता पाने की लालसा में किस प्रकार देश - समाज को बांटा गया और लाखों लोगों की जानें चली गई।बदले की भावना ने आदमी को जानवर बना दिया। धर्म का नाम लेने वालों ने सब से अधिक अधर्म किया। 

नाटक में विभाजन पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की गई है बल्कि नासिर काज़मी की कविता के माध्यम से पूरी भयावहता को व्यक्त किया गया है।


सवाल का दूसरा हिस्सा भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्या कविता सांप्रदायिकता को समाप्त करने या कम करने में कोई भूमिका निभा सकती है ?

कवि सांप्रदायिक  दंगा रोकने के लिए न तो सड़क पर निकल सकता है और  न तो कोई हथियार चला सकता है, न किसी का वार रोक सकता है। वह केवल लोगों से दंगा न करने की अपील कर सकता है। लेकिन उस समय उसकी अपील पर कौन ध्यान देगा? बल्कि उसकी दख़ल देने का उल्टा असर हो सकता है। अर्थात अपील करने वाले की ही हत्या की जा सकती है। उदाहरण के लिए कानपुर के दंगों में मुस्लिम सांप्रदायिक गुंडों द्वारा हिंदी के बहुत सम्मानित और वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गयी थी।


कविता का बुनियादी काम लोगों को संवेदनशील बनाना है। यह काम बहुत समय तो लेता है लेकिन बहुत पक्का होता है। यह भी सच्चाई है कि समाज को  संवेदनशील और मानवीय बनाने का और कोई रास्ता नहीं है। मतलब यह कि संविधान और कानून बना कर किसी समाज को संवेदनशील नहीं बनाया जा सकता। राजनीति,सरकार या प्रशासन भी समाज को संवेदनशील नही बना सकते। 

समाज को संवेदनशील बनाने का काम कविता, साहित्य और कलाएं ही करती हैं।

संवेदनशील समाज में हिंसा/ साम्प्रदायिकता  जैसी प्रवित्तियों पर लगाम लगती है।

इन तथ्यों के आलोक में नासिर काज़मी की भूमिका को देखना चाहिए।

अ. व.

गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

रश्मि भारद्वाज की कविता आपके मर्म को छूती हैं। यथार्थ को बयां करने के लिए कवयित्री जिन बिम्बों का प्रयोग करती हैं वो सिर्फ शब्दों एवं अर्थों को ही सिर्फ गहरे तक खोलती नहीं हैं बल्कि आपको भावशून्य कर कुछ सोचने को विवश कर देती हैं। इनकी कविता ही इनकी पहचान भविष्य में होगी, इस बात की आश्वस्ति इन कविताओं से मिलती है।





 -विसर्जन-


त्याग दी गयी वस्तुओं से अंटा हुआ है संसार

वे जो ह्रदय से निर्वासित हैं

 घरों में नहीं शेष है उनका स्थान

व्यर्थ ही कितनी जगह घेरे हैं इस पृथ्वी की

उनकी भला अब किसे आवश्यकता है


वृक्षों तले औंधे पड़े हैं असंख्य ईश्वर

 कभी आह्वान किए गए थे

राह रोक लेती हैं याचक आँखें 

भूख से व्याकुल मवेशियों की 

सुनते हैं जिनके लिए रक्त बहाया जा सकता है,

छोड़ दिए गए रातोंरात चाव से ख़रीदे गए श्वान 

 हर वाहन को देखकर सोचते हैं

स्वामी का दिल पसीझा है,

छोड़ तो वे भी दी गयीं अचानक एक दिन

 बड़े ही ताम झाम के साथ

जिन्हें घरों में ला रखा गया था,

ताल -तलैयों में भी उनके लिए शरण नहीं 

देवालयों के बंद हैं कपाट 

वे देवियाँ

 जो मन से विसर्जित कर दी गयी हैं


इस परिपक्व संसार में 

जहाँ वस्तुएँ ही नहीं

बेतरह धड़कते दिल त्याग दिए जाते हैं

अपनी अनुपयोगिता के कारण, 

मैं त्याग देती हूँ अपना अहंकार

त्यागती हूँ अपनी ईर्ष्या 

लेकिन उसका एक चित्र तक नहीं तज पाती 

जिसे कभी भी जीवन में शामिल किया है


मेरा कमरा ही नहीं, मेरा मन भी 

इस साफ़ सुथरी दुनिया के लिए एक कबाड़ घर होगा

-------

रश्मि भारद्वाज


मैं ऐसे लिख रही हूँ

जैसे मेरे पास एक और जीवन हो

मैं ऐसे प्रेम कर रही हूँ

जैसे मेरे पास कल का दिन नहीं होगा


मैं यह नहीं चाहती 

अंत क्षणों में

अधूरी पंक्तियों के दुःख के साथ

यह कष्ट भी साथ जाए 

मेरे पास देने के लिए कितना कम प्रेम था


#rashmibhardwaj

-इच्छा कपास का फूल है-


वे ही क्षण असाधारण हुए

जो बहुत साधारण बातों से बने थे 


संसार भर का वैभव

भांति भांति के वस्त्र पकवान

भव्य अट्टालिकाएँ

और कितने संतप्त मन

लेकिन रस पाया मैंने उस मोची दम्पत्ति के छप्पर तले

जो दुनिया भर के फटे जूते सिलने के बाद

सुकून से दोपहर की रोटी खा रहे थे


बहुत मामूली चीज़ें मैंने भी जीवन से चाही हैं 

रत्न माणिक 

बहुमूल्य इत्र, परिधान

काम की चौंसठ कलाएँ 

उम्र पार का संग

सुख यहाँ नहीं है

सुख है जब तुम बैठो मेरे सिरहाने

पढो किसी प्रिय कवि की कोई कविता

जो उस क्षण के बाद संसार की 

सबसे सुंदर कविता होगी 


लोग कहते हैं प्रेम से जटिल कुछ नहीं 

यह भी प्रेम में ही सम्भव है

आप इतने सहज हो जाएं

इतने भार हीन

किसी इच्छा से घिरे होकर भी

उतने ही इच्छा मुक्त

जैसे कपास का फूल


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रश्मि भारद्वाज


धिया जनम 


पहली बार कब मरी थी तुम 

आषाढ़ के उस कीच और जल में

जब एक तरफ़ मण्डप सजता था 

दूसरी ओर था उखाड़-पछाड़ पानी

पुरखिन ने गड़वाया था 

जल में काठ का दुल्हा- दुल्हन

टोटका था यह नहीं तो

सब दहा ले जाएगा पानी 

दहा ही ले गया 

सिर्फ़ तुम्हें


पहली बार कब मरी थी तुम

जब परदेस पढ़ के आए दूल्हे ने

कहा था तुम्हें गँवार

बारात लेकर लौट जाना चाहता था

गिटपिट अंग्रेज़ी नहीं बोल सकी तुम तब भी

 ब्रह्मांड- सोसायटी के दो कमरों में सिमटी

 परकटी गौरैया सी छटपटाती रही


पहली बार कब मरी थी तुम 

जब लौटने को बंद थे सब दरवाज़े 

वहीं रहना है हर हाल में

वहीं रहकर 

ढलती गयी किसी और साँचे में इतना

अपनी ही देह में न रही


या पहली बार तब ही मरी थी तुम

जब रोई थी पहली बार 

संसार हुलसा नहीं था 

मृत्यु मुस्कुरा उठी थी


अब जब तुम वाक़ई नहीं हो 

सोचती हूँ

पहली बार कब मरी थी तुम,

स्टोव फटने से मर गयी एक जवान औरत

किसी ने विष चाट लिया

कोई झूलती मिली भरी दुपहरी

किसी की चमकती आत्मा यूँ ही घुन खा गयी,

बीते दिनों सपनों से भरी एक देह 

छत से कूद गयी 

 उस रोज़ तुम कौन-सी बार मरी थी 


(यह कविता नहीं, तुम्हारी आवाज़ नहीं बन सकी, तुमपर कविता कैसे लिख सकूँगी! तुम, मेरी माँ-सी जो मेरी हर किताब पढ़कर कहती थी- कभी मेरी कथा कहना!

मैंने कितनी बार कहा फिर भी अकथ रही तुम्हारी कहानी)


फेसबुक से साभार।

सोमवार, 28 नवंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

 


युवा कवि रश्मि भारद्वाज की कविताएं यथार्थ को जितना बयां करती हैं उतना ही आपके मर्म को सहलाते हुए आगे बढ़ती है। जितनी कविता जिन्दगी में घूमती है उतनी ही आपकी आंखों को खोलते चलती है। आइए पढ़ते हैं रश्मि भारद्वाज की कुछ कविताएं:-



1

******************

कातिक चढ़े पहली बार छिदे थे कान

सुनार ने तांबे की सुई दन्न से आर पार कर दी थी 

 इससे पहले कि चीख निकलती

हाथों में थमा दी थी नानी ने गुड़ की धेली

मीठा मीठा गप्प, सब दर्द छू 

ओस लगा लेना भोर में पत्तों पर पड़ी 

सब घाव भर जाएगा 


बाद में जाना

दुनिया में होना है 

तो कान छिदवाने के दर्द से बार-बार गुज़रना होगा 

बहुत अनावश्यक , बहुत व्यर्थ 

लेकिन कुछ सुंदर की उम्मीद में 

घटती जा रही एक प्रक्रिया

गुड़ की धेली जीभ पर घुलती है

आंखें मींच क़ैद कर दिया जाता है सब पानी 

ओस पर नंगे पाँव चलते हुए

सोचती हूँ 

सब घाव ऐसे ही भरे जा सकते 

तो कितना अच्छा होता 

-----

रश्मि

2.

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अपने पहाड़ से पृथक हो आए सभी पत्थर

देव नहीं बने

वे जीवन में घुले हुए थे

 किसी अश्रव्य राग की तरह 

उन्होंने चुनी मृत्यु की नीरवता

एक भीड़ के गुज़र जाने के बाद भी

हाथ बांधे, नत रहे

वे मूक साक्षी हैं अपने समक्ष घटित 

 भव्यता और क्षुद्रता के 

मनुष्य की दैन्यता, 

ईश्वर की कातरता के


वे गवाह हैं ऐसे ही किसी बेहद मामूली दिन के भी

जब एक स्त्री और एक पुरूष

जिन्हें दुनिया एकांत खोजते प्रेमियों की तरह देख रही थी

अपने वर्तमान की असंख्य निर्रथक ध्वनियों के मध्य 

भविष्य से उतने ही निर्लिप्त

जितना अतीत से

सूदूर प्रदेश की यात्रा कर

अपना मौन सुन सकने चले आए थे


नवम्बर के मंद पड़ते प्रकाश में

मैं ऐसे ही समाधिस्थ पत्थरों का स्वप्न देखती हूँ

जिनकी तप्त छाती पर सिर टिकाए

एक बार मैं उनके ह्रदय के कोलाहल को सुनना चाहूंगी 

----


रश्मि भारद्वाज

3.

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बीती रात, बहुत देर रात

जब उसे अपने नर्म बिछौने में होना चाहिए था

बड़े मीठे कण्ठ से वह गाती जा रही थी

मैंने कल्पना की उसके थपकते पैरों की

एक उष्ण हथेली पकड़े वह झूलती जाती होगी 

उमगती वह

गाती थी रोशनी के किसी देश की बात

शायद चाँद के बारे में

वहाँ से लाए जाने वाले धानी सपनों के बारे में

पिता ही होंगे शायद 

जो घर चलकर सो जाने की हिदायत दे रहे थे


बीती रात, बहुत देर रात

नींद हम दोनों की ही गुम थी 

बस कारण अलग थे

वह जिस झूठ को गुनगुनाती जागती जा रही थी 

मैंने अपना वह सच कहीं खो दिया था 


-----

रश्मि

4.

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सब अबूझ चीज़ें औचक ही मिलती हैं

मृत्यु, प्रेम और जीवन


एक मृत्यु नींद के बाद मिला है जीवन

एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद मिला है प्रेम 

कल कुछ भी शेष नहीं रहा

तब भी

तुम रहोगी 


जीवन संतुलन साधते रहने का व्यापार नहीं है 

कई बार नहीं हो अंगुल भर आधार

फिर भी छोड़ देना होता है स्वयं को 

एक अज्ञात विश्वास के सहारे 

किसी तरह टिके रहना जीना नहीं है

जीने के लिए उतारने होते हैं

भय और संशय के सारे कवच 

मोह और क्षोभ के अधिकांश केंचुल


बार- बार मरती रहोगी इसी एक जीवन में

तो मृत्यु के लिए क्या शेष छोड़ जाओगी


रश्मि!



मंगलवार, 22 नवंबर 2022

प्रोफेसर योगेन्द्र की कुछ कविताएं

प्रोफेसर योगेन्द्र की कविताएं आपको ठहर कर कुछ विचार करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। मानवीय संवेदना और रिश्तों की गर्माहट को विविध रूप में प्रस्तुत करना इनकी एक उपलब्धि है। आइए पढ़ते हैं इनकी कुछ कविताओं को।



छूटते गए


एक


छोटा भाई आया था कल

आज चला गया।

एक इतिहास हम दोनों के पास है

वह कलेजे में दफ्न रह जायेगा।

ढलती उम्र में कहने को बहुत कुछ होता है

कह नहीं पाता।

कहां से शुरू हो, कहां खत्म

इसका पता नहीं होता।

हम तीन थे

दो रह गये हैं।

२०११ की बात है

बड़े भाई आये थे

मैं उन दिनों चुनाव लड़ रहा था

हाथ में बीस हजार रुपए दिए

हथेली दबायी

और चले गए।


दो


चले गए तो चले गए

परेशानियों में घिरते गये

और वहां की राह पकड़ ली

जहां से कोई वापस नहीं आता।

उसके पूर्व दादी, पिता और मां

अब दो भाई और दो बहन बचे हैं।

एक ही कोख का वृक्ष अलग अलग दिशा में

चलते चले गए।

फोन कभी कभी बज उठता है

उधर से आवाज आती है - कैसन छेंय?

' ठीक छिओ '

इसके बाद थम जाता है सिलसिला।


तीन

एक खूंटे में बंधे हम सब

निभाये चले जा रहे रस्म।

सबने विस्तार पा लिया है

अंकुर बड़े हो गए

हम सब छाड़न पर हैं।

विस्तीर्ण आकाश, तारों से भरा

उठती थमती जमती आंधियां

आंखें भर आईं हैं रेत से

नदियों में भी वह जान कहां रही

जिसके कारण नदी नदी होती है? 

हम सब तालाब बन गये हैं

कभी कभार कोई पक्षी उतर आता है।


चार


पिता मुखिया के चुनाव लड़े दो बार।

एक बार एक वोट से हार गये

दूसरी बार नामांकन कर लौट रहे थे ।

ट्रेक्टर पर सभी सवार थे कि 

दुर्घटना हो गई

पिता के सर्वप्रिय मित्र इस दुर्घटना में नहीं बचे।

इसके बाद पिता ने खुद को रोक लिया

हल चलाते,लाठा बराते, दमाही करते

सपने देखते वे चले गए।

हम सब में वे जीवित हैं

मां की अनुगूंज है

दादी कभी निशाभाग रात में

सपनों में आती हैं।


सारे रिश्तों में,हर सांस में

वे ही वे हैं।


पांच


दूर दूर तक सन्नाटा सा लगता है

मैं जहां हूं

बहुत कुछ है वहां

सैकड़ों संतानें हैं

जिनके साथ उम्र गुजार दी

मगर छूटते गए

छूटते गए

वे रिश्ते

जिनमें मैंने आकार लिया।


अंधेरे का गीत 


एक


ठक ठक ठक

कैसी आवाज है सुबह - सुबह? 

कोई है, कौन हो सकता है

कर्कश भरी आवाज है।

क्या आसमान में सूरज उल्टा लटक गया?

या पेड़ों से पक्षी गायब हो गये? 

वसंत तो नहीं है

कोयलें कुछ नहीं कर रही

यह समझ में आता है

लेकिन अन्य पक्षी को क्या हुआ?

क्या मौसम उतर गया है

जो ठक ठक ठक की आवाज आ रही है?

जरूर कोई अवांछित घटना घटी है।

' अबे साले,सोया पड़ा है बीबी के साथ

खोल दरवाजा,देख तेरा बाप खड़ा है!'

अंदर बजने लगा कुछ

बाप तो बहुत पहले मर गए

यह दूसरा बाप कौन है?


दो


' पहचाना नहीं मुझे।

मैं हूं जिसमें मनुष्य कैद रहता है।

मेरे होने से तुम हो।

मैं तुम्हारा वर्तमान हूं

तुम्हारा भविष्य नियंता।

मुझसे ही दुनिया शुरू होती है

मुझ पर ही खत्म।' 

तो मैं क्या हूं? 

केंचुआ हूं

कोई औकात नहीं है मेरी? 

मैं व्यवस्था का एक पूर्जा भी नहीं! 

मुझे कोई चलाता है

और मैं चलता हूं।

मैं क्या कोई सूचना हूं

जो आधार कार्ड में है

या बैंक में

या पैन कार्ड में

या पासपोर्ट में।

मैं इसके अलावे कुछ नहीं हूं? 


तीन


लगता है सीने पर रेल के चक्के हैं।

दुर्वह बोझ के तले दबता जा रहा हूं

देश आजाद हैं,मगर मेरा सीना क्यों कैद है?

दरवाजे पर दविश है

कल नुक्कड़ पर कह आया था

आजाद मुल्क और अपने आजाद जुबां के बारे में

आज ठक ठक की आवाज सुन रहा हूं।

कमरे की दीवारों पर यह कैसा दृश्य उभर रहा है? 

दीवारों के निचले भाग से खून की लकीरें

खींचती जा रही है ऊपर की ओर

बनती जा रही है एक चित्र

अरे,यह तो एक औरत है

दिमाग पर जोर देता हूं

कौन है यह? कहीं देखा है मैंने?

कहां?

पाठ्य पुस्तकों में।

अरे,यह तो भारत माता है।

खून में नहायी क्यों हो मां?


चार


दीवारों से घिरे वे सब 

जिनके हाथों में डंडे, बंदूक और तोपें हैं।।

ऊंची प्राचीरों में भविष्य संवारते हैं

कई शहरों में भव्य भवन हैं

दीवारों में चुने हैं करोड़ों

कोई आये, उन्हें देखे

कितना रुतबा है उनका

उनके रूतबे से प्रभावित हैं जन गण।

तिरंगे पर कब्जा जमा रखा है उन्होंने

संसद में वे दहकते हैं

न्यायालय में महकते हैं

सभी कुर्सियों पर वे जमे हैं।

मेरा घर भी कब्जे में हैं।

ठक ठक ठक ठक

सुन रहे हैं आप।


गांधी मैदान, पटना


एक


तुम्हारे एक चक्कर लगाते हुए हांफ गया।

हजारों लोग हैं

कोई क्रिकेट खेल रहा है

कोई साइकिल चला रहा है।

हाथ पैर झमकार सेहत बनाने वाले भी कम नहीं हैं।

तुम घिर गए हो चारों तरफ

सुंदर लगने के लिए घिरना पड़ता है।

बूढ़े पुराने तो हैं ही

जो युद्ध लड़ रहे हैं

ब्लडप्रेशर, डायबिटीज और अपनों के तिरस्कार से।

किसी कोने में ब्लडप्रेशर की मशीन लिए बैठा है

बीमारी से मुक्त होने वहां बूढ़े भी हैं और औरतें भी।

रेणु के गांव से आने वाले लोग भी हैं

सुबह सुबह मूढ़ी फांक रहे हैं।

तुम्हारे एक कोने में एक तस्वीर लिए बैठे हैं कुछ लोग

एक स्पीकर पर धार्मिक गाने चल रहे हैं

औरतें, पुरुष और बच्चे थपड़ी बजा रहे हैं।

उन्हें भरोसा है कि वे मुक्त हो जायेंगे।


दो


तुम अपनी छाती पर 

गांधी की मूर्ति लिए बैठे हो।

छोटे छोटे पार्क,सेहत बनाने के केंद्र, कराटे स्थल

भीख मांगती बूढ़ी माताएं

हस्तरेखा देखता ज्योतिषी

बेंचों पर सेवानिवृत्त लोग

नौकरी के लिए हांफते युवा

तुम्हारे चारों तरफ गाड़ियों का चिल्ल पों

ऊपर से वायुयान भी गुजर गया अभी।

किनारे किनारे पेड़ पौधे बहुत हैं

पक्षी में सिर्फ कौवे दिखे।

संभव है, अन्य अपने  नन्हों के लिए दाने चुनने गये होंगे।

कभी तुमने सोचा होगा कि

तुम्हारी छाती पर इतने लोग

अपने अपने सपने और उदासी लिए बिखरे पड़े होंगे!

मैं तो वर्षों बाद आया हूं तुम्हारे पास

लौट जाऊंगा संध्या होते होते।

मैं तो चलते चलते अपने दोस्तों को ढूंढ रहा था

जिनमें अब कुछ नहीं हैं धराधाम पर

कुछ शहर छोड़ गए

कुछ हैं भी इसी शहर में

मगर तड़प नहीं रही।


तीन


तुम्हारी छाती पर बहुत से लोग बैठे होंगे

भगतसिंह भी, अशफाक उल्ला भी

गांधी भी, विनोबा भी

सुभाष भी, पटेल भी।

और हां,गदर के सिपाहियों के इंक्लाबी स्वर भी

कहां पीछा छोड़ रहे।

जयप्रकाश की गूंजती वाणी

सनसनाती गोलियों से छिदा कलेजा

गर्म खून से लथपथ सीने।

तुम तो गवाह हो सबके।

यहीं से तो कई कई बार

क्रांति की आवाज बुलंद हुई थी।

तुम्हारे सिर पर गोलघर है

अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा।

तुम्हारे चारों ओर चक्कर मारते थक गया मैं।


( यह अधूरी कविता है)


कुछ बजता है अंदर


एक


ठहर गई जिंदगी जैसे

पूछ लिया अपनों से

जिंदगी कहीं है या अपहृत हो गई है?

सभी चुप थे।

अपने तो और भी

वे मुझे पहचान नहीं पा रहे थे।

कोफ्त हुई।


दो


बहुत अंधेरा नहीं था

लेकिन आंखें काम नहीं कर रही थीं

दिमाग सुन्न था

कुछ था जो अंदर से

रिस- रिस कर बह रहा था

मैंने अंदर झांका

क्या मैं बीमार हूं? 

शायद मन में तकलीफ़ है

कि जब 

मुट्ठियां भींचता हूं तो 

उनके दांत  चमकते हैं


तीन


महीने दो महीने में

अंदर हिस्रं भाव उदित होता है

दांत तोड़ दूं उनके

बेहाया

नाली का कीड़ा

गालियां इससे ज्यादा नहीं आतीं

गुस्से के चरम क्षणों में भी

अंदर कोई रोकता है

पशु जब सुगबुगाता है

तब धिक्कारने को उठ खड़ा होता है


चार


संघर्ष सागर है

लहरें निगलने को आतुर

जिंदगियां विद्रोह करती हैं

कितने आक्टोपस है यहां

दंश कितने तीखे हैं! 

जीते हुओं को 

हार क्यों गिरफ्त में ले रखी है?


- योगेन्द्र

सोमवार, 19 जुलाई 2021

सुमित दहिया की कविताएं

 सुमित दहिया की कविताएं

           
सुमित दहिया
                  


मुल्तवी 

मैंने तुम्हारे पंखों को सम्पूर्ण कायनात की 
गुजारिश के बावजूद मुल्तवी कर दिया है
ताकि वे अगली व्यवस्थित चारागाह तक उड़ान भरकर
अपने बेहूदा जीवन और आज़ादी का अंत कर सके

तुम्हारा आना-जाना, भ्रमाना, शर्माना
विचारो की दरारों से झांककर
मेरी कविता बनना
मणिकर्ण के गर्म पानी के ऊपर पसरे
गंजेडीयो को देखकर थोड़ा डर जाना
उफनती नदी के ऊपर मौजूद ठोस पुल पर 
बरसात में मेरी तस्वीरें खींचना
रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग में हवा का पीछा करते हुए 
अपनी बंजर देह और उपजाऊ जेबो के साथ
मुझ से बिल्कुल चिपककर बैठना
अवास्तविक दुख से झुके अनपढ़ कंधों की कहानियां सुनाना
कही भी पहाड़ी सड़क के किनारे रुककर
मेरे सीने से लिपट जाना
और तुम्हारी कुँवारी जांघो की आरक्षित गंध का
सबसे पहले मेरे द्वारा सूंघे जाना
मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

किसी अहाते के निकट बैठी 
चंद बूढ़ी रंडियों के बीच से उठकर
तुम्हारी याददाश्त पर स्वयं को आरोपित करना
बस यूं ही 
अंजान मुस्लिम दोस्त की शादी में अचानक पहुँच जाना
उस तुम्हारे एकमात्र चमकीले सूट में
मेरा सदैव अटके रहना
सांवले रंग को और सांवला करने वाले काले काजल का
आंख की हद से पार जाने पर
मेरी गीली थूक लगी उंगली से उसे साफ करना
और फिर एक सूखा उत्तेजक निशान
हमेशा के लिए वहाँ छोड़ देना
 मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

हृदय की निरंतर घटती पाश्विकता में
शब्दो की मादक पुकार
और अपने व्यवहार की मजार के बीच
घने अंधेरे में गौर से तुम्हारा यह कथन बार,बार सुनना कि

     "आप तो मेरे जेहन की प्रोसेसिंग हो
      जिसे मै चाहकर भी कभी नही रोक पाऊंगी"

अनेक कहे-अनकहे तथ्य टटोलना
और चंद फुर्सत के लम्हों में
तुम्हारे जिस्म पर मौजूद हमारे प्राथमिक प्रेम के निशान निहारना
और अनगिनत मौसमो की गवाह
उस सफेद बर्फ के गोलों से बुनकर
लगने वाली खुशियों के क्रम को
न जाने कितनी ऋतुओं के लिए 
मैंने केवल इसलिए मुल्तवी कर दिया है
ताकि तुम भयंकर अपराध भाव से भरी हुई
मृत आत्मा और वाष्पित मन के साथ
न चाहते हुए भी अगले बासी बिस्तर पर बिछ सको

इस शहर,देश,काल के नक्शों की हदों के पार गूंजती
हमारी मार्मिक,मजबूर ध्वनि का रोना भिलखना
समंदर के तट पर रेत में धसे हुए
मेरे तलुवों के ऊपर पैर पर पैर रखकर
तुम्हारा चिल्लाकर सार्वजनिक प्रेम स्वीकारना
खुले आसमान और नंम गतिशील हवा के बीचोबीच लिए गए सैंकड़ो चुम्बनों को
बस अकस्मात ही इसलिए मुल्तवी कर दिया है
ताकि तुम्हारी नीच और डरपोक मर्यादा
नग्न रूप से हमारे उन पदचिन्हों के बीच 
ताउम्र भटकती रहे
जो कभी हमने एक साथ बनाये थे

किसी अपरिचित आदमी को तुम्हारे द्वारा कमाऊ पूत कहना 
मुझे नीचा दिखाना और अपमानित करना
कभी न भरने वाला एक निम्न श्रेणी का जख्म देना
यह परिचय है कि तुमने अपनी केंचुल छोड़ दी है
अब मुझे भी तुम्हारे भीतर से अपना प्रेमरूपी हिस्सा वापिस ले लेना चाहिए
इस धरती पर मौजूद करोड़ो स्तनधारियों में दौड़ते 
लहू से अधिक मेरे तरल आंसुओ का गिरना
और मेरी आँखों का बहना
मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

हमारे सभी सपने,आलिंगन, संभोग और भावनाओं की लरजती डोर का
नेशनल हाइवे के नए ठिकाने पर अटक  जाना
और तुम्हारी निर्लज और डरपोक मानसिकता के सरेंडर से पहले ही
मैंने हमारे प्रेम को अगले जन्म के लिए मुल्तवी कर दिया है


     
   आखिरी कमरा 

यह रहस्मयी आरक्षित विचार हर बार नए वेगो से झाँकता है
और अपने बहाव की निर्लज्जता मे
मेरी भावनाएं,महत्वकांक्षा और प्रेम की बलि मांगता है

यह मुझे पहाड़ों से टपकती बर्फ के आंचल के पास स्थित 
उस लगभग जमी हुई चारदीवारी में जल रही
धीमी लौ के नज़दीक अक्सर धकेल देता है
तब भी, जब मैं स्वयं एक ज्वलंत प्रश्न होता हूं
और कभी किसी ख़ुशनुमा रास्ते के बीचोबीच अचानक रोककर
चट्टान पर दो नाम अंकित करवाता है
जिनकी परिभाषा बनती है 
'तुम' और 'मै'

ये तुम और मै
किन्ही परिस्थितियों में
प्रेम वाले कम और अलगाव वाले अधिक हो जाते है
इन तुम और मै के
अपने कुछ चुनिंदा बेलगाम शब्द भी है

                  तुम के क्षणिक शब्द है
मैन्युपुलेटिव,धोखेबाज, गद्दार और दगाबाज आदमी
                  जबकि मै के स्थिर शब्द है
जिम्मेदारी, जिम्मेदारी, जिम्मेदारी और जिम्मेदारी

इस अलगाव की पृष्ठभूमि में लिखे कई संदेश
मेरी चेतना पर गंभीर जख्म है
हालांकि मुझे कमजोर,अपाहिज और खंडित रिश्तों की टूटन ने अखंड किया है

मेरे साथ किए गए प्राथमिकता के अनगिनत वादों के बीच
कब चंद नए अपरिपक्व युवा चेहरे
प्रदूषण वाला शहर
काँपता हुआ विवेक
पड़ोस वाली सेहली
और हाईवे के नए ठिकाने आ गए
स्पष्ट पता तक नही चला

मैंने एक मदहोश रात यूही अराजक घूमते हुए
साफ ह्रदय से यह सत्य बयान किया था
कि ओ हरामजादी
अरे ओ ओ हरामखोर
तूने अपनी कायरता के पीछे 
एक पारंपरिक नीचता को जन्म दिया है
जो योजनाबद्ध तरीके से तुझे किश्तों में नष्ट करती रहेगी
और कभी न कभी तुझे मर्लिन मुनरो के सुसाइड नोट की असल वारिस घोषित कर देगी

मै यह भी कुबूल करना चाहता हूं
कि तुम्हे यह समझाने में असफल रहा
कि "जीवन" अकेले और एकांत कमरों की फुर्सत का नाम है
राजा से लेकर रंक तक
सभी बहते चेहरों के महासागर में निपट अकेले है
और अंततः कब्र भी एक तरह का आखिरी कमरा है

यकीनन हमारे पुराने करार के दस्तावेजों में वर्णित गुप्त गठबंधन
इस ब्रह्मांड मे अनंत काल के लिए कही भटक गया है
लेकिन उन पिंघलती छातियों में
मैंने दुर्भाग्य से कभी प्रेम के बीज बोये थे
उस निष्प्राण प्राणी के अंदर से झांकती मादा मासूमियत के तनाव पर
कभी अपने ताज़ा प्रेम की इबारत लिखी थी
इस सौभाग्य को दुर्भाग्य बनाना
तुम्हारी अपनी अर्जित कला का परिचय है

शहद के छत्ते पर पत्थर लगते ही
जिस भांति मधुमक्खियां तीतर-बितर हो जाती है
मै कुछ यूं चाहता था
तुम्हारे भीतर अपनी उपस्थिति
मेरा विचार आते ही पत्थर की भांति
तुम्हारी बुद्धि और ठोसपन को बिखेर दे
हाँ, मै कुछ यूं चाहता था

मै अपने अंदर से कागज़ी चीथड़ों को बुनकर
तब तक तुम्हारे लिए आरक्षित प्रेम को श्रद्धांजलि देता रहूँगा
जब तक तुम्हारा निर्णायक लौटना आकस्मिक और अंतिम घटना न बन जाए।।


सम्पर्क :-



शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को (कविता): सुशील कुमार भारद्वाज

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को
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-सुशील कुमार भारद्वाज


नहीं मानता तूझे अपना प्रधान,
नहीं मानता मैं तेरा फरमान।
तू कहेगा पूरब जिसे,
पश्चिम कहूँगा मैं उसे।
तू करेगा स्वच्छता की बात,
मैं करूँगा गंदगी की बात।
तू पूजेगा राम को,
मैं पूजूँगा रावण को।
तू कहेगा प्रगति की बात,
मैं करूँगा जड़त्व की बात।
तू कहेगा अनुशासन की बात,
मैं करूँगा अभिव्यक्ति की बात।
तू कहेगा कुऐं में मत कूद,
मैं कहूँगा जल्दी से कूद।
तू पूजता है गोडसे को,
मैं पूजता हूँ गाँधी को।
तू कहेगा अहिंसा ही धर्म है,
मैं कहूँगा देश को जलाना ही कर्म है।
बस इतना समझ ले तू,
आजीवन का मेरा वैर है तू।
जिस दिन तू कहेगा जिंदा रहने को,
उस दिन कहूँगा खुद को जिंदा जलाने को।
तू कहेगा इंसान बनने को,
मैं आह्वान करूँगा हैवान बनने को।
क्योंकि तूने कहा पागल नहीं बनने को,
इसलिए मैंने आह्वान किया था पागल बनने को।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

रविवार, 1 दिसंबर 2019

हत्यारा (कविता) : सुशील कुमार भारद्वाज

                                                   
हत्यारा
★★★★★★★

आँखों के भ्रम को यूँ न दिल से लगाइए कि
दिल और दिमाग काम करना ही कर दे बंद सही में।
आखिर किस बेजा पर एक हत्यारे को सही
और दूसरे को गलत करार देते हो?
हत्यारा तो केवल हत्यारा होता है।
वह जिस्म का हत्यारा है तो
मानवता और इंसानियत कहाँ शेष बची है?
ढ़ूंढ़ रहे हो तुम हत्यारे की जाति-धर्म?
कहाँ ढ़ूढ़ पाओगे तुम संस्कार और रिश्ते?
सभी यहीं पले-बढ़े हैं, हमसब के बीच!
हत्यारे को तो तुम पैदा कर रहे हो हर रोज
अपनी स्वार्थपरता की अँधी दौड़ में।
किसी हत्यारे को पूजते हो घर- मंदिर में,
और किसी हत्यारे को देते हो गाली!
तुम ही तो हत्यारों के लिए आते हो अदालतों में,
और देते हो मानवाधिकार की दलील।
कौन कहता है कि नहीं बैठा है हत्यारा
घर से बाहर तक अपने घात में?
जरा-सी गुस्ताखी तो करो
हत्यारे की विरोध की।

★★★★★★★★★★★★★
सुकुभा

रविवार, 7 अप्रैल 2019

सुकुभा की कविता कवि

एक कवि, दो कवि, तीन कवि।
एक कहे दूजे से- काहे का कवि?
जबाब मिले- तू कवि सो मैं कवि।

एक पूछे -तूने मेरी कविता सुनी?
चेहरा देख- आप तो मेरे प्रिय कवि।
पुलकित हो कवि-अच्छा सुनें! एक नई कविता।
धैर्य से दूजा-जी!जी! आपकी कविताएं तो बस...
वाह कविता! वाह वाह कविता! और आह कविता!
एक नज्म तरन्नुम के साथ आपकी खिदमत में मेरी भी?

कुटिलता में मुँह चमकाते -क्यों नहीं? क्यों नहीं?
बहुत खूब! बहुत खूब! आप भी मेरे प्रिय कवि।

मिलने की एक आस में, विदा होते एक-दूसरे से कवि।
फिर मिलता तीसरा कवि- आपके इंतजार में मैं कवि।
 जबाब मिला- क्या बताऊँ बीच रास्ते मिला एक अकवि!
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

शंकरानंद की कविताएं

शंकरानंद की कविताएं हमारे दिल को छूती हैं. दिमाग को सोचने को विवश करती हैं. और प्रस्तुत करती हैं हमारे सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ के परिदृश्य को. कविताएं नोस्टाल्जिया की गिरफ्त में है जो हमारे बदलाव को रेखांकित करती हैं. कविताएं भविष्य की समस्याओं एवं चीजों से भावनात्मक अलगाव को भी स्पष्ट करती हैं. चिट्ठी की उम्र ही नहीं है बल्कि कैलेंडर से जुड़ा सुख-दुःख और सपना-निराशा भी है. जिंदगी के बहुरंगे–चटक रंग हैं और खुद के लिए बोते कंटीले बीज हैं तो निराशा के दौर में डगमगाता भरोसा है. पढ़ते हैं शंकरानंद की कुछ अच्छी कविताओं को:-


 शंकरानंद



चिट्ठी की उम्र
चिट्ठी की उम्र कितनी होती है
कोई पोस्टकार्ड कोई लिफाफा कोई अन्तर्देशीय पत्र
कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगा
कभी ये भी जानने का मन करता है

मेरे पास पहले की बहुत चिट्ठियां हैं बक्से में
कभी उन्हें खोल कर देखता हूं तो
और ज्यादा पुरानी लगने लगती हैं
और ज्यादा कमजोर और ज्यादा निरीह
सालों बाद इनका क्या होगा पता नहीं

अब नई चिट्ठियां कम ही आती हैं
कम ही आता है डाकिया
किसी के लिखे की राह देखना कम हुआ
ये अब पुरानी बात है

कौन इंतजार करे इनके लिखने और पहुंचने का
जब इतने साधन मौजूद हैं चिट्ठियों के विकल्प के रुप में
तब कौन इतना धैर्य रखेगा

मैं भी इससे परेशान नहीं हूं
बस इतना सोचता हूं कि सालों बाद अगर बच्चे
चिट्ठी के बारे में पूछेंगे चित्र देखकर
तब बिना उदाहरण उन्हें कैसे समझाउंगा।

कैलेंडर
मैं दीवार पर टांगता हूं तो बीते दिन याद आते हैं
वे बीते तीस साल
कैलेंडर देख कर कौंध जाते हैं

कैसा भी हो वह
पर सबमें तारीख तो वैसी ही रहती है
वैसे ही छपा रहता है दिन

उसके चित्र तो अलग रहते हैं
लेकिन उनका असर कम होता है
खूबसूरत होने पर भी तस्वीरें तारीखों के दुःख
कम नहीं कर पाती

मैं हर बार नये कैलेंडर शौक से खरीदता हूं
सोचता हूं कि ये पहले से अलग हों
कम तकलीफदेह
पहले के आंसू पहले की उदासी पहले का दुःख इससे नहीं झांके
नहीं झांके पहले की मृत्यु

लेकिन जैसे ही महीना नया आता है
बीता समय आंखों के सामने घूम जाता है
तारीख देखकर वही वही

इसके बावजूद मैं पुराने कैलेंडर नहीं रखता
बदलता हूं हर बार हर साल
क्योंकि इसमें भविष्य का स्वप्न भी दर्ज होता है
जो बताता है कि घबराओ नहीं दोस्त!
ये समय बदल जाएगा।

रंग के चोर
इतने से डिब्बे में रंग भरा है
जितने डिब्बे उतने रंग उतना मौसम उतने स्वप्न
जरा सा उड़ेल दो तो
सन्नाटा भी फूल बनकर खिल जाएगा

ये डिब्बे लेकिन पता नहीं कहां गुम होने लगे अब
पहले तो रंग बहुत थे जीवन में
फिर धीरे धीरे सिमटने लगा सबकुछ
उदासी बढ़ी दुःख बढ़ा मृत्यु का कारण बढ़ा
फिर तो रंग स्वप्न से भी लापता हो गये

ये रंग जरुर किसी न किसी की अलमारी में कैद होंगे
किसी न किसी की जेब में होंगे ये रंग
तभी तो बाहर नहीं दिखाई पड़ते इन्द्रधनुष की तरह

ये आपका रंग सबने मिलकर चुराया
अगर भरना चाहते हैं खालीपन तो तलाशी लीजिए

जो अपराधी होगा वह पकड़ा जाएगा।

पेड़
ओ किसान!
तुम नहीं रोंपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं

तुम कुछ और सोचो जो तुम्हें जिन्दा रहने का मौका देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक्त की रोटी दे तुम्हें

ये लोकतंत्र है
जिसके सामने रोओगे वही उठ कर चल देगा
जिससे मांगोगे मदद वही सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेगा

तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बनकर खड़ा मिलेगा
वह सबको छांह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा

तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फांसी लगाकर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हजारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे

इसलिए कहता हूं कि मत रांपो बींज।

भरोसा
पहचानी सी आवाज को खोज रहा हूं
नयी जगह में हवा भी अलग है
पानी भी अलग
भाषा अलग है

जिन सड़कों पर चल रहा हूं ये भी पता नहीं कहां ले जाएंगी
हाथ के नक्शे और शहर में महीन फर्क है
पूछने पर अलग जवाब मिलते हैं
ऐसे में सहम जाता हूं छोटे बच्चों की तरह

न पिता की उंगली है यहां न मां के भरोसे के हाथ का आसरा
कोई तरीका नहीं जो बता दे कि ये दिशा सही है
इतना रहस्य है इतना धुआं इतना विश्वासघात
कि हर पता गलत निकलता है

ये देश हमें कहां ले जाएगा
अब कोई नहीं बता सकता।
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परिचय:-
शंकरानंद
जन्म-8 अक्टूबर 1983
;खगड़िया के एक गांव हरिपुर मेंद्ध

शिक्षा-एम0,बी0एड
प्रकाशन-आलोचना,वाक,आजकल,हंस,पाखी,वागर्थ,पक्षधर,उद्भावना,कथन,वसुधा,लमही,तहलका,पुनर्नवा,वर्तमान साहित्य,नया ज्ञानोदय,परिकथा,जनपक्ष,माध्यम,शुक्रवार साहित्य वार्षिकी,स्वाधीनता,साक्षात्कार,सदानीरा,बया,मंतव्य,दस्तावेज,जनसत्ता,समावर्तन,परिचय,आउटलुक,दुनिया इन दिनों साहित्य विशेषांक,समय के साखी,निकट,अनहद,युद्धरत आम आदमी,अक्षर पर्व,हिन्दुस्तान,प्रभात खबर,दैनिक भास्कर,अहा!जिन्दगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।कुछ में कहानी भी।
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी नियमित रूप से कविताएं प्रसारित।
कविताओं का कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

पहला कविता संग्रह दूसरे दिन के लिए‘;2012द्धभारतीय भाषा परिषद,कोलकाता से
प्रथम कृति प्रकाशन मालाके अंतर्गत चयनित एवं प्रकाशित।
दूसरा कविता संग्रहपदचाप के साथ‘;2015द्धराजभाषा विभाग के सहयोग से बोधि प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित।
सम्मान-2016 का विद्यापति पुरस्कार

सम्प्रति-अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगड़िया-851204,मो0-08986933049