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शुक्रवार, 23 जून 2017

अनिरुद्ध सिंहा की कुछ गजलें

         
    अनिरुद्ध सिंहा की कुछ बेहतरीन गजलें


                 
   अनिरुद्ध सिन्हा

जाँ बदन से जुदा  है रहने दे
ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे

एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ
अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे

छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें
ये  फसाना  सुना  है  रहने दे

अपनी सूरत से मत डरा मुझको
सामने  आईना   है  रहने  दे

छेड़खानी  न  कर  वफ़ाओं से
वो अगर  बेवफ़ा  है  रहने दे

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राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते
जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते

नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू
दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते

कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में
देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर  देखते

बेबसी की  बाजुओं में  जाने  कब से क़ैद है
चंद लम्हों के  लिए  बाहर निकलकर देखते

उम्र भर जलते रहे  जो  रंजिशों की आग में
वो मुहब्बत के चिरागों  में भी जलकर देखते


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लोग  पीछे थे  मेरे  हाथ में पत्थर लेकर
मैं कहाँ  भागता  शीशे का बना घर लेकर

प्यास  सहरा  में  बुझा देंगे ये मेरे  आँसू
मैं तेरे  साथ हूँ  आँखों  में समुंदर  लेकर

ऐसे  हालात  में जज़्बात भी मर जाते  हैं
लोग मिलते  हैं जहाँ  हाथ में खंज़र लेकर

फिर चिरागों को बुझा दे न हवाओं का जनून
घर में  बैठे रहे  सब  रात का ये डर  लेकर

ये मुहब्बत का सफ़र तन्हा सफ़र  रहता  है
कौन चलता है यहाँ साथ  में  लश्कर लेकर


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रगों  में रेत  भरकर  रोज़ घटता जा रहा है
वो दरिया तो किनारों  से लिपटता जा रहा है

मेरा ये दायरा  जब से सिमटता  जा रहा  है
मेरा किरदार भी अब मुझसे कटता जा रहा है

ये दुनिया तो हमेशा  की तरह रंगी  बहुत  है
न जाने  क्यों हमारा  दिल उचटता जा रहा है

नई तहजीब  अपना  क़द बढ़ाती  जा रही  है
पुराना  जो  है  धीरे-धीरे  हटता  जा रहा  है

वो जाहिल था वो जाहिल है वो जाहिल ही रहेगा
किताबों के  वो बस  पन्ने पलटता जा रहा  है


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जो आँसू पीके हँसना जानता है
मुहब्बत को  वही  पहचानता है

पड़े हैं पाँव में  जिसके भी छाले
सफ़र की वो हक़ीक़त जानता है

भरम  कल टूट जाएगा तुम्हारा
फ़रिश्ता कौन किसको मानता है

वो किसकी याद लेकर बस्तियों में
गली की ख़ाक हर दिन छानता है

शहर में फिर रहा हूँ अजनबी सा
कोई मुझको  कहाँ पहचानता  है


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इजहारे-मुहब्बत  की जो हिम्मत नहीं करते
वे  लोग  ज़माने  से  बगावत  नहीं करते

खुशबू से जिन्हें इश्क़ है लुट जाते हैं लेकिन
काँटों से किसी  हाल में  उल्फ़त नहीं करते

हर हाल  में रिश्तों  की  ये सांसें  रहे ज़िंदा
हम जुल्म तो सहते हैं शिकायत  नहीं करते

बेचैन  बहुत  होते  हैं  वो  रातों में अक्सर
जो अपने  उसूलों  की हिफाज़त नहीं  करते

सच-झूठ  का  अंदाज़  लगा लेते हैं हम भी
माना कि  अदालत  में  वकालत नहीं करते

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दिखाई दे न  जो उसका हिसाब क्या रखता
अँधेरी रात में  सूरज का ख़्वाब क्या रखता

हरेक बार  की  फूलों  से  जिसने गुस्ताखी
मैं उसके हाथ में दिल का गुलाब क्या रखता

वो मेरा दोस्त था हमदम था जाँनिसार भी था
मैं उसके सामने कोई  हिजाब  क्या  रखता

किसी चिराग की लौ में न ख़ुद को पहचाना
सियाह रात में रुख पर नकाब  क्या रखता

हरेक  सिम्त  की  मजबूरियों  के  घेरे में
हवा के रुख पे ग़मों की किताब क्या रखता


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उलझनों से  तो कभी प्यार से कट जाती है
ज़िंदगी वक़्त की  रफ्तार से  कट  जाती है

मैं   तो   क्या   हूँ   मेरी   परछाई  भी
रोज़  उठती  हुई दीवार  से  कट  जाती है

यूँ तो मुश्किल है बहुत इसको मिटाना साहब
दुश्मनी प्यार  की  तलवार से कट  जाती है

सारी  बेकार  की  खबरें  ही छपा करती  हैं
काम की बात तो अखबार से कट  जाती है

इतना  आसान नहीं प्यारे मुहब्बत   करना
ये वो गुड़िया है जो बाज़ार से कट जाती है

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परिचय
                          -------------
नाम –अनिरुद्ध सिन्हा
जन्म -2 मई 1957
शिक्षा –स्नातकोत्तर
प्रकाशित कृतियाँ
--------------------
-(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह )(3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह) (4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)(9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण(12)हिन्दी ग़ज़ल परंपरा और विकास (13)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (आलोचना )
सम्पादन-
साहित्यिक पत्रिका “समय  सुरभि” और ”,जनपथ “ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन
“किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है(अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें)तथा बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार का सम्पादन ।
देश के तमाम स्तरीय पत्र/पत्रिकाओं में निरंतर ग़ज़लों और आलेखों का प्रकाशन
सम्मान  
बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा,विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,आचार्य लक्ष्मीकान्त मिश्र स्मृति सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
सदस्य-बिहार फिल्म विकास एवं वित्त निगम
संप्रति –स्वतंत्र लेखन
संपर्क- गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

             

मंगलवार, 20 जून 2017

संजय कुमार कुंदन की कुछ नई गजलें

शहर के चर्चित शायर संजय कुमार कुन्दन की गजलों में भाषा की जो रवानी है वो आपको अपनी ओर खींचती है तो संप्रेषित भाव आपको काफी कुछ सोचनें को विवश करती है। इनकी 'बेचैनियाँ', 'तुम्हें क्या बेकरारी है' और 'एक लड़का मिलने आता है' जैसे तीन गजल संग्रह पहले ही से राजकमल प्रकाशन से छप कर लोगों के बीच पहुँच चुकी है। अब इनकी चौथी गजल संग्रह "भले तुम और भी नाराज हो जाओ" जल्द ही छपकर आने वाली है। संजय कुमार कुंदन का यह संग्रह निरंकुश सत्ता के विरूद्ध बिगूल फूंक रही है। आइए पढ़ते हैं संग्रह की कुछ बेहतरीन गजलों को।



माफ़ करना मेरे आक़ा

आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ

 आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी

ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे

 ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका

 जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
##########
अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
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इक तख़्तनशीं आज भी इतराया  हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके  मुसाहिबों की यहाँ  भीड़  लगी  है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते  सकाफ़त  के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं  मगर कहिए अलग हैं
उसकी  नसीहतों का  नशा  छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो  बाहर  कहीं  से  आया  हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया  बस वही  फ़रमाया  हुआ  है
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मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
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सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको  तुम  पुकार लो
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समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
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एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास  मगर  हसरते-परवाज़  तो है
हो  ये चेहरे पे भले चस्पाँ  मगर  राज़  तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम  दबाते रहे उसको  सरो-सामाँ के  तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र  इतना  ही  नहीं  है  के  पिसे  जाते  हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र  है  नाज़ाँ  के  उसे  साज़  तो  है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो  ख़स्ताहाल  है पर  ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे  कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना  है,  उसकी  इनायत  है  बेहयाओं  पर
चलो ये शुक़्र है  'कुन्दन'  से  वो नाराज़ तो  है।
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हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार  .
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कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
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मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ  , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
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सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी

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सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
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ज़िन्दगी,  तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
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मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
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दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे  दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं  रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं  देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं

मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी

गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

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शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
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संपर्क:-  91-9835660910, 8709042189
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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें

                     
       
ग़ज़ल
                     अनिरुद्ध सिन्हा

पाले हुए  जो ज़ख्म  जुबां  पर उतर गए
रिश्ते तमाम  कट  गए  जज़्बात मर गए

घर की  तलाश और  मुहब्बत की चाह में
निकले  हुए वे लोग  न जाने  किधर गए

ये और  बात है  कि हमें  कुछ नहीं मिला
जब ज़िन्दगी की खोज में हम चाँद पर गए

साये की  तरह रहते थे जो साथ –साथ वो
रस्ते में अब मिले भी तो बचकर गुज़र गए

खुशबू तुम्हारे जिस्म की ये काम कर  गई
काँटों पे  चल रहे  थे अचानक  ठहर गए

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फूल बनकर जो ख़्वाब आता है
बारहा    लाजवाब   आता  है

जब मुहब्बत से लोग मिलते हैं
तब  वहाँ  इन्क़लाब  आता है

फिर भी रौशन जहां नहीं होता
रोज़  ही  आफताब  आता  है

अब कहाँ प्यार के लिफाफे में
कोई  लेकर  गुलाब  आता है

शायरी  में मज़ा  तभी आता
शेर जब  कामयाब  आता है


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कोई किसी की तरफ है कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िन्दगी की तरफ

जरूर  उससे  कोई दिल  का  मामला होगा
हमारी सोच भटकती है क्यों उसी  की तरफ

ग़मों ने  इतनी  मुहब्बत से हमको पाला है
कदम उठे न हमारे  कभी  खुशी की तरफ

वफ़ा  का  साज  उठाए  हुए न जाने क्यों
मैं चल रहा हूँ  अँधेरी तेरी  गली की तरफ

भटक न जाए वो  सहरा में दर बदर होकर
बढ़ाए हाथ  समुंदर  रहा  नदी  की  तरफ


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वो मेरे दिल तलक आता  मगर दाखिल नहीं होता
महज मिलने मिलाने से ही कुछ हासिल नहीं होता

जो हम  फिरकापरस्ती  को मुहब्बत से मिटा देते
कोई बिस्मिल नहीं  होता कोई क़ातिल नहीं  होता

ये कैसी  बेबसी  के दौर  में  अब जी रहे हैं हम
हमारी फिक्र में  शामिल हमारा  दिल नहीं  होता

अगर सीने में जज़्बों की जो लौ मद्ध्म नहीं होती
किसी  को जीत लेना फिर यहाँ मुश्किल नहीं होता

कभी जो  ठान लेता  है बगावत के लिए कुछ भी
तो लेकर हाथ में खंजर  कभी गाफ़िल नहीं  होता

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जब भी उठा  है  दर्द  तेरा  मुस्कुरा लिए
कुछ इस तरह से आँख के मोती बचा लिए

जितने चमन के फूल थे घर में सजा लिए
यारों  ने  खूब  अपने  मुक़द्दर बना  लिए

ज़ख़्मी  हुए हैं  पाँव इन्हें देखना भी क्या
हमने ही  अपनी  राह में काँटे बिछा लिए

इतने  मिले  हैं ज़ख्म  ज़माने  से दोस्तो
रोने  को जी  किया तो ज़रा गुनगुना लिए

पहचान   अपनी  खूब  छुपाई  है आपने
चेहरे  पे अपने  और भी चेहरे लगा लिए

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                                                                                                               गुलज़ार  पोखर,मुंगेर(बिहार)811201
 Email-anirudhsinhamunger@gmail.
 Mobile-09430450098        

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की गजलें

मालिनी गौतम के गजल में भाषा की रवानी है तो भावों में संवेदना की अभिव्यक्ति. इनके भाव –संसार में करूणा और चित्कार का समावेश है तो आक्रोश की गूंज भी. शब्दों का संयोजन भी काबिलेगौर है. पढ़ते हैं मालिनी गौतम की कुछ गजलों को:-   

मालिनी गौतम


ग़ज़ल  1




कभी आँखें दिखाते हो कभी ख़जर चलाते हो
गरीबों पर बताओ इस तरह क्यों जुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारखानों में हैं मरते लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी बहाते हो

रखोगे कैद कब तक रौशनी को अपने महलों में
उजालों को भी तुम अपना-पराया क्यों सिखाते हो
दवा-दारू, मिठाई, तेल-घी की छोड़ दो बातें
महब्बत में भी तुम तो ज़हर नफरत का मिलाते हो
पढ़ाते पाठ लोगों को सचाई और नेकी का
स्वयं बाजार में ईमान की बोली लगाते हो
वो चीखें जो उड़ा देतीं तुम्हारी नींद रातों की
उन्हें गूँगा बनाने का हुनर क्यों आजमाते हो




                                                        ग़ज़ल  2



चाय की कुछ चुस्कियों में जिंदगी को पी गये
घिसते-घिसते एड़ियाँ वे उम्र पूरी जी गये
नोट बरसाने लगे नेताजी अपनी जीत पर
लूटने उनको गली के चन्द बच्चे ही गये

रेल औ बस में मिले हमको नये चहरे कई
कुछ हँसे अपना समझकर कुछ लबों को सी गये
खिलखिलाती धूप जैसे जब मिले कुछ पल उन्हें
भूल कर अपनी थकन वे उन पलों को जी गये
हर तरफ से मार मौसम की पड़ी कुछ इस क़दर
चंद लमहे थे खुशी के हाथ से वो भी गये


                                                              ग़ज़ल  3



झूठ है जिनकी नस-नस में
सत्य नहीं उनके बस में
बाहर उजियारा दिखता
घोर अँधेरा अंतस में
चाहे जितना खौफ बढ़े
हो न कमी कुछ साहस में
वे ही गुण अपनाओ तुम
जो गुण होते पारस में

अँधियारों से लड़ने को
तीर न कोई तरकस में



                                                                 ग़ज़ल  4



वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ जुल्म ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को खिलाती है

नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत जिन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
वो बहती इक नदी है तुम उसे पोखर समझना मत
है इतना वेग उसमे राह का पत्थर हटाती है
समुन्दर दे नहीं सकता किसी को बूँदभर पानी
वो मीठी-सी नदी फिर भी समुन्दर में समाती है
उठाकर रेत-मिट्टी की तगारी साधती है लय
पसीने में नहाकर जिंदगी को गुनगुनाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले मार देते तुम
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हे दुनिया मे लाती है

ग़ज़ल  5



कहीं घर-बार जलता है कहीं संसार जलता है
सुलगता दौर है इसमें न कोई ख्वाब पलता है
उठाकर बोझ काँधों पर जो पाते रोटियाँ अपनी
वो जब भी ठान लेते हैं ज़माना ये बदलता है
थके तन औ थके मन को जगाकर तो जरा देखो
अँधेरी रात के पीछे सुनहरा दिन मचलता है
अगर चाहो तो करवा दो मुनादी आज गलियों में
न आये राह में कोई यहाँ दरिया उछलता है
ज़माना देवियाँ कहकर तुम्हें है पूजता अक्सर
मगर तुम जान लो इतना ज़माना तुम को छलता है

मालिनी गौतम
  मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
          गुजरात
मो. 09427078711












शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें
संजय कुमार कुंदन

22 अक्टूबर 2016 को पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान में महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास हर बार की तरह साहित्यिक गोष्ठि "दूसरा शनिवार" का मुक्ताकाश में शाम के चार बजे कार्यक्रम चल रहा था और ख्यात शायर संजय कुमार कुंदन अपनी बेहतरीन नज़्मों एवं गजलों के साथ थे। ' बेचैनियाँ ' "एक लड़का मिलने आता है" और "तुम्हें क्या बेकरारी है" के गजलकार को नजदीक से बैठकर सुनने का जो मजा है वह कहीं और कहाँ? उनकी गजलों के शब्दों एवं भावों में सुनते सुनते खो जाना श्रोताओं के लिए बडी बात नहीं है। आज प्रस्तुत है आपके लिए उनकी कुछ गजलें, जिसका आस्वादन आप भी करें।

ग़ज़ल

आज  फिर  रस्मो-राह  हो   जाए
दिल  ज़रा-सा  तबाह   हो   जाए

ये तो मुमकिन नहीं के उल्फ़त में
जाँ  न दें  और  निबाह  हो  जाए

दिल को आती है जो ये पगडंडी
चल  दे   तू  शाहराह   हो   जाए

आज बदला हुआ मिज़ाज है कुछ
इक करम   की  निगाह  हो  जाए

कौन  हसरत  थी  जो   हुई   पूरी
कैसे   पूरी   ये    चाह  हो   जाए

दिन भी  कट  जाए तो ग़नीमत है
और  बसर  कैसे  माह  हो  जाए

वैसे  'कुन्दन' ने  ये  बताया  नहीं
चाहता   था    तबाह   हो   जाए

            #######

ग़ज़ल

कुछ  बात है ऐसी  जो  कही ही नहीं जाती
छुप  बैठी  है  आँखों में  नमी ही नहीं जाती

ख़ामोश रह, इज़हार न कर अपने ग़मों का
फ़रियाद  ग़रीबों की  सुनी  ही  नहीं  जाती

आने को  तो आते  हैं ख़यालात बहुत   से
कहने  के बाद  तिश्नालबी  ही  नहीं  जाती

संजीदा ज़माने को  यही  हमसे शिकायत
होंठों पे जो ठहरी  है हँसी  ही  नहीं  जाती

हों दोस्त के दुश्मन हैं सभी बर-सरे- पैकार
और जंग कोई  हमसे  लड़ी  ही नहीं जाती

कुछ तल्ख़ तजरबों से नज़र हो गई धुँधली
माज़ी  की  वो  तहरीर  पढ़ी  ही नहीं जाती

वादा कोई करते हुए  डर जाता है 'कुन्दन'
जो  बात  न  पूरी  हो  कही  ही नहीं जाती

                #########

तिश्नालबी- प्यास,बर-सरे- पैकार-लड़ने को उतारू,तल्ख़- कटु, तजरबों- अनुभवों,माज़ी- अतीत,तहरीर- लेखनी.

ग़ज़ल

ये दुनिया है  आनी-जानी  कब  तक हम को  भरमाए
शायद दरिया पार ही बेकल मन को थोड़ा चैन आए

आने-जानेवाला मौसम उजले-काले तन का रोग
सच्चे  जज़्बों  का  एक  लम्हा बादे-फ़ना भी  जी जाए

हम उजड़े लोगों की  कोई बस्ती- गाँव , न शह्र कोई
हमको सलीक़ा बस जाने का कोई भला क्यूँ समझाए

बेहतर है तुम देख के हमको अपनी नज़र को फेर ही लो
हम इसके क़ायल ही नहीं हैं  सर ये कहीं पे झुक जाए

उस पागल को देख के हम भी बचपन में कुछ हँसते थे
आईना अब  हमपे  हँसकर  अक्स उसी  का दिखलाए

गाड़ी,सोफ़ा, दौलत, बँगला, ओहदा, कुर्सी, ताक़त, नाम,
कितना भी कुछ दे दे लेकिन आँख का पानी
ले जाए

दिल तो  पारा-पारा  बाँटा , अब क्या  जाँ भी बाँटोगे
'कुन्दन जी' क्यूँ ठहरे हुए हो?कौन तुम्हारे पास आए

                   ########

ग़ज़ल

तनहा-तनहा   लफ़्ज़   मिलेगा,  पारा-पारा  तहरीरें
कड़ियाँ जब बिखरेंगी इक दिन, टूटेंगी जब ज़ंजीरें

कौन किसी को पूछनेवाला, कौन किसी का है महरम
तनहाई  की नागन आकर  डंस  जाती  सब तक़दीरें

इक कमरा तो भरा हुआ है,इक कमरा वीरान बहुत
इक में ख़्वाबों का कोलाहल, इक से गुम  हैं ताबीरें

कोई समझाएगा हमको जीवन भर का क्या हासिल
चारों जानिब एक ख़ला है, कहाँ  गईं  सब तदबीरें

बंदिश पे तो नाज़ बहुत था नपा-तुला था हर मिसरा
प्रेम के गीत ने तोड़े बंधन  नाच उठीं कितनी हीरें

तेरा दर्पण एक जज़ीरा  जिसमें बस  तेरा ही राज
दर्पण तोड़ो,  मिल  जाएँगी  तुझको  हज़ारों  जागीरें

" 'कुन्दन जी' कब चुप रहते हैं," सब कहते हैं, जाने कौन
उनकी  है  गुफ़्तार में चुप्पी,  ख़ामोशी में तक़रीरें

                  #########

पारा-पारा  तहरीरें - टुकड़ा टुकड़ा लेखनी,महरम-अंतरंग, ताबीरें - स्वप्नफल,ख़ला-शून्य मिसरा- पंक्ति, जज़ीरा- टापू,
गुफ़्तार- बोली

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

संजय कुमार कुंदन की गजलें

साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। गजल सुनना जितना अच्छा लगता है लिखना उतना ही श्रमसाध्य। साथ ही गजल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह न सिर्फ सुनने वाले को सम्मोहित कर ले बल्कि अपने संवाद को भी उद्देश्यपूर्ण तरीके से लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा सके। तो आज आनंद लेते हैं ख्यात गजलगो संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलों का।
संजय कुमार कुंदन


ग़ज़ल

गरचे  दुनिया में  हैं  हम जैसे  गुनहगार  कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की  दरकार कहाँ

ज़िन्दगी, तेरे  ही तानों से  तो आजिज़ होकर
ख़ुद  को  हम  बेचने आए  हैं, ख़रीदार  कहाँ

शह्र में  अब तलक  गरचे  है वही  रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ

तेज़  था  शौक़  का  व्योपार,  सुना  तो  आए
बढ़  गईं  सारी दुकाँ, गुम  हुआ  बाज़ार  कहाँ

हमने सोचा था  सुकूँ में  कहेंगे  हम  भी  कुछ
एक   लम्हे  के  लिए  भी  मिला   क़रार  कहाँ

शाम  भी  अब  ज़रा  कतरा के गुज़र जाती  है
दिन को भी  शाम का रहता है  इन्तज़ार  कहाँ

साथ   उजड़े   हुए  लोगों  के  रहा  है   कबसे
हाकिमे-शह्र,  वो    तेरा   है   वफ़ादार    कहाँ

किस  अदा  से  वो  कहे  झूठ के दीवाना करे
कर ले तू  शायरी,  उससे  बड़ा फ़नकार कहाँ

तू भी  आलम  पे  भला  छाएगा  कैसे  'कुन्दन'
तू   तो   सादा  है  तेरी  ज़ात   गिरहदार   कहाँ

##############

अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको  क़यास से
हर  शै  को  छू  लिया है  इतना  ही पास  से

शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते  हुए  वो   चेहरे   मिले  हैं   उदास   से

हम उसके  इंतज़ार  में  इस  दरजा  मह्व  थे
हम देख  न  पाए  उसे  गुज़रा  वो  पास  से

इक रात  में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें  बहुत  ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से

महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर   उन्हें   जो   देखा   लगे   मह्वे-यास से

                    ########

क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन

____________


तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना  मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था

तानों में  इलज़ाम   थे  तेरे    मेरी  शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था

टूट  नहीं  पाएगा   रिश्ता  इसपे   यक़ीं  होने  के  बाद
हम दोनों  के बीच  लड़ाई का  थम जाना मुश्किल था

तीरन्दाज़ी  की   यह  तेरी  मश्क़ बहुत  नौख़ेज़  लगी
सख़्त  मेरे  सीने  पे  तेरा  तीर  चलाना  मुश्किल  था

कितना तू बेबस था उस दम  जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन  झूठे  इलज़ाम  पे  मेरा तैश में आना मुश्किल  था

ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं  शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल  था

जिसका दावा था कितनों को  ज़ेरे-अदब ले  आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल  था

                       #########
                   
दिल  की  ही बातें   लिखनी थीं   लेकिन  तूफाँ   उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया

नर्म , मुलायम  उन  जज़्बों  का  एक अजब  ये  हाल हुआ
कारगहे- दुनिया  में   उनमें   पत्थर- सा  कुछ   उतर   गया

अपनी  वो  औक़ात  कहाँ  है  फ़ुरसत  के  कुछ लम्हें  हों
इक लम्हा  ख़ाली  जो गुज़रा  ख़ौफ़ सा कोई  उभर  गया

हम   बेढंगे   लोग  से  उसको   दौलत  ने  यूँ   खेंच  लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो  हम जैसे  थे  लेकिन  कितना निखर गया

उसको   ये   ख़ुशफ़हमी  है   के  वो  आज़ाद  परिन्दा  है
वक़्त  बहुत  हुशियारी से  बस   उसका  पर  है कतर  गया

अब तो  जिधर भी  देखते हैं बस  ज़िल्लत  के  ही  सामाँ हैं
अब तो  इन  हालात  के हाथों  सारा  जादू   बिखर   गया

क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद  कुछ  वक़्त  गुज़ारा,  ख़ामोशी  से  गुज़र  गया
               ########
संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०-  9835660910

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

भावना की गजलें

भावना की गजल में शिल्प की रवानी दिखती है तो कथ्य में जनचेतना से जुडे सवाल। जहां मर्म और चुनौती एक साथ देखने को मिलते हैं। आप खुद भावना की प्रस्तुत गजलों में इसे महसूस करें।
भावना

1
नदियों के गंदे पानी को घर में निथार कर
चूल्हा जला रही है वो पत्ते बुहार कर

फुटपाथ के परिंदों की तकदीर है यही
ताउम्र उनको जीना है दामन पसार कर

उड़ने लगी है कल्पना बिंबों की खोज में
कुछ शब्द चल पड़े हैं स्वयं को निखार कर

जो कामयाब होते हैं हर गाम पर सदा
जो हर लड़ाई लड़ते हैं ग़लती सुधार कर

अब तो लड़ाई है मेरी अन्याय के ख़िलाफ़
हर झूठ का रख देंगे हम चोला उतार कर

2
वो मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है
मगर फिर भी वो चलता जा रहा है

डुबो कर पूरी धरती चैन लेगा
ये जो बादल बरसता जा रहा है

दिखी है आइने में शक्ल जबसे
हर-इक मंजर बदलता जा रहा है

भला क्यूं छीन लेते हो खिलौने ?
वो बच्चा अब हहरता जा रहा है

ख़बर क्या देख ली चैनल पे उसने
बदन तबसे सिहरता जा रहा है

कभी तो आग निकलेगी यहां से
वो पत्थर को रगड़ता जा रहा है

3
ये गुस्सा फूट लावा हाे रहा है
उन्हें लगता दिखावा हो रहा है

प्रलोभन है कि मांगें पूरी होंगी
मगर यह तो भुलावा हाे रहा है

सुना था स्वर्ग जैसा है ये धरती
यहां फिर क्यों दिखावा हो रहा है

वो पानी में दिखाने चांद लाया
बड़ा अच्छा छलावा हो रहा है

हुई सत्ता की ऐसी ताजपोशी
नगर भर को बुलावा हो रहा है

4
एक-सी होती नहीं हर इक कहानी की वजह
कौन कह सकता है दरिया की रवानी की वजह

वक़्त ने धीरे से आकर कह दिया कुछ कान में
आ गई हमको समझ इस मेहरबानी की वजह

जब जिसे चाहो, उसे सत्ता के मद में रौंद दो
क्यूं भला होती नहीं है हुक्मरानी की वजह ?

पेड़-पौधे काटकर औ तोड़ कर चट्टान को
पूछते हैं वो ही यूं बौराये पानी की वजह

है अड़ा घोड़ा बहुत शतरंज की इस चाल में
है यही राजा की अब तक ज़िंदगानी की वजह

5
कुछ तो लब से कहा करे कोई
मेरी ख़ातिर दुआ करे कोई

तोड़ कर पत्थरों के सीने को
बन के दरिया बहा करे कोई

दिल लगाया है चांदनी से अगर,
रात भर फिर जगा करे कोई

प्रेम बूंदों में ढल के जब आये
कितने दिन तक बचा करे कोई

छोड़ कर चल दिया शहर उनका
बेख़बर हो, रहा करे कोई

ख़ार राहों का फिर न चुभ जाये
बाख़बर हो चला करे कोई

उम्र भर हम किया करें सज़्दा
यूं ही खुल कर हंसा करे कोई

6
देर तक माटी के संग सज़्दा हुआ है धूप में
खेतिहर से बीज तब रोपा गया है धूप में

जेठ की इस दोपहर में नींद क्यूं आती नहीं
वो परिंदा दर-ब-दर क्या खोजता है धूप में

हाथ में रस्सी बंधी है और रुखे बाल हैं
एक पागल बैठ कर क्या सोचता है धूप में ?

गंध होती क्या बदन की, शख़्स क्या कह पाएगा
छांव को जो आशियाना टांकता है धूप में

बूंद माथे की टपक कर दास्तां उसकी कहे
जो फलों औ सब्जियों को बेचता है धूप में

7
पलकों से क्या कहता पानी
आंसू में जब ढलता पानी

जिस रंग में घोलोगे उसको
घुल कर वैसा बनता पानी

कीचड़ रख कर मन के भीतर
ख़ूब कमल-सा खिलता पानी

क्या कहता है तट से जाकर
कल-कल छल-छल बहता पानी

सूरज ने नज़रें क्या डालीं
सात रंग में ढलता पानी

बादल तो उसकी छत पर था,
मेरे घर क्यूं बरसा पानी ?

झील में अक्सर ख़ामोशी से
नाम किसी का जपता पानी

8
अपने बचपन की कहानी आज भी
याद मुझको है जुबानी आज भी

दोपहर की धूप में गुड़ियों के संग
खेलती मुनिया सयानी आज भी

छांव में पीपल के, पंचों की यहां
चल रही है हुक्मरानी आज भी

चाय-बिस्कुट से नहीं करते विदा
गांव में है मेजबानी आज भी

झील में ही अक्स अपना देखता
ये गगन है आसमानी आज भी

9
कई जालों में उलझा आदमी का
कहां रहता ठिकाना आदमी का

दिलों की मिल्लतें होती यहां भी
सहज होता है रिश्ता आदमी का

कभी गिरगिट, कभी गिद्धों की भाषा,
तो कैसे हो भरोसा आदमी का

कोई चाहत, कोई अहसास होगा
सड़क पर ईंट ढोता आदमी का

नहीं भाता है मुझको तिल बराबर
समंदर-सा गरजना आदमी का

मुकद्दर साथ हो, सबकुछ मुमकिन,
ज़माना क्या करेगा आदमी का

10
यूं सरे राह क्या माजरा हो गया
दिल अकेला था, अब आपका हो गया

चैन मिलता नहीं है कहीं भी यहां
एक दूजे से क्या वास्ता हो गया

ढूंढ़ते रह गए, बस, तुम्हारा पता
मुझसे मेरा पता लापता हो गया

जिनकी ख़ुशियों से मतलब नहीं था कभी
उनके ग़म से भी अब वास्ता हो गया

है बदल-सा गया सारा मंजर यहां
पल में कैसा अलग वाक़या हो गया

थीं जुदा मंज़िलें, ख़्वाहिशें भी अलग
क्यूं भला एक-ही रास्ता हो गया


संपर्क:-
bhavna.201120@gmail.com




रविवार, 10 जुलाई 2016

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें


      साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है जो न सिर्फ़ अपने शब्दों के रचाव-कसाव से सबको सम्मोहित करने में सफल होता है बल्कि बहुत ही तेजी से लोगों के जुबां पर भी चढ जाता है। आज आनंद लेते हैं गजलगो अनिरूद्ध सिंहा की पांच गजलों का।
अनिरूद्ध सिंहा


1.

रख रही ज़ख़्मों पे अपनी उँगलियाँ पागल हवा
खोल देगी  दर्द की सब  खिड़कियाँ पागल हवा

ले  गई  है बादलों  तक  गर्म रातों की सनक
अब गिराएगी मकां पर बिजलियाँ  पागल हवा

बस जरा उनके दिलों से  दूर क्या हम हो गए
है  बढ़ाने  पर  अमादा  दूरियाँ  पागल  हवा

आंधियों की बात  तुमसे क्या करें हम  दोस्तो
जब  उड़ाकर ले गई सब तितलियाँ पागल हवा

हर दफ़ा तूफान  में  वो बादलों  की  आड़ में
साहिलों से  दूर करती  कश्तियां  पागल  हवा


2.


 अपना किसी भी और से लहजा नहीं मिला
जीने  का  ढंग  और  सलीका  नहीं मिला

जुगनू  तमाम  रात   चमकते   रहे  वहाँ
लेकिन सफ़र में एक भी साया  नहीं मिला

सहरा में अपनी प्यास  को देता रहा  फ़रेब
पानी भरा हो जिसमें  वो दरिया नहीं मिला

पहले तो  मेरी  बात  पे  आई  हया  उन्हें
फिर मुझको बात करने का मौका नहीं मिला

खुश हैं पड़ोसवाले  भी  इस बात पर  बहुत
मुझको मेरे  नसीब से ज्यादा  नहीं   मिला

3.

हवा में  पाँव  होठों पर हँसी है
ये कैसी हुस्न  की दीवानगी है

नए वादों के  फिर जेवर पहनकर
सियासत मुफ़लिसी में ढल रही है

वहाँ कुछ होंठ भी पत्थर के होंगे
जहां कुछ  बेअदब सी ज़िंदगी है

न इतनी तेज़ चल पुरवाइयों  में
अभी मौसम में थोड़ी सी नमी है

भला क्यों  चाँद के पहलू में तेरे
बदन खामोश कुछ-कुछ बेबसी है  

4.

कदमों के जब निशान  इरादों में ढल गए
हम हौसलों के  साथ  हवा में निकल गए

अब भी  है अपने  नूर पे मगरूर वो बहुत
रस्सी तो जल  गई है कहाँ उसके बल गए

प्यासी ज़मीं के जिस्म पे ऐसी बला की धूप
चेहरे थे जिनके  चांद  सफ़र  में बदल गए

फिर मुझको भूलने  की भी रस्में  अदा हुईं
पहले तमाम  ख़त थे जो यादों के जल गए

रक्खे हैं जब से सर पे किसी ने दुआ के हाथ
मुट्ठी  में  बंद  उनके  मुकद्दर  संभल  गए

5.

गरीबी जब कभी  हालात  से रिश्ता निभाती है
मेरे कच्चे  मकानों  से कोई आवाज़  आती  है

खमोशी छाई  रहती है  सवालों  के उठाने  पर
सियासत गुफ़्तगू  से हर दफा  दामन बचाती है

अदब की  तंग चादर  ओढ़  लेते  ही कोई बेटी
लड़कपन गाँव की गलियों में हँसकर छोड़ जाती है

कलेंडर में  शहीदों  की  जो  सूरत  देखता हूँ तो
गुलामी  की  कोई  तारीख  मेरा  दिल  दुखती है

मुहब्बत की  कलाई  को  हवस  के थाम लेते  ही
शराफ़त  चीख़  उठती  है  वफ़ा  आँसू  बहाती  है

संपर्क:-
अनिरूद्ध सिंहा
-गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार)811201  
मोबाइल-09430450098
Email-anirudhsinhamunger@gmail॰com                          
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