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मंगलवार, 27 जून 2017

हिमांशी शेलत की कहानी "चुड़ैल की पीठ"

वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में स्त्री हमेशा से परिस्थितियों की शिकार होती रही है। निर्दोष होकर भी वह अपना बचाव नहीं कर पाती है। नियति और इंतजार के बाद मौत के सिवा बचा ही क्या है उसके पास? खुद को जिंदा रखने की जिद्द और दूसरों के बच्चों के सुख में ही सुखी होने की प्रवृत्ति दूसरों की नजर में खटकती जरूर है। वह डायन, चुड़ैल और पता नहीं क्या -क्या कहलाती है? ऐसी स्त्रियों से लोग अपने बच्चों को दूर रखने में ही भलाई समझते हैं। समाज में गिद्ध की नजर रखने वाले लोग अपनी पैनी निगाह से कपड़े के भीतर जिस्म में सुराख करने से भी बाज नहीं आते हैं। लेकिन जब स्वार्थलोलुप्त अंधविश्वासी समाज में खुली आँखों वाले बिना किसी नशे के ही नशे में हों तो लाल आँखों वाले नशेड़ी से क्या उम्मीद पालना? लेकिन डूबते को तो आखिरी तिनके का भी सहारा नसीब नहीं हो पाता है। आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर टूटती-बिखरती स्त्रियों को न तो ससुराल वालों से राहत मिलती है न मायके वालों से सहयोग। हर स्तर पर विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को जब समाज में सम्मान ही न मिले तो हम खुद को सभ्य -समाज का हिस्सा कैसे मान लें? हिमांशी शेलत की मार्मिक व यथार्थ परक कहानी "चुड़ैल की पीठ" का हिन्दी में अनुवाद डॉ मालिनी गौतम ने किया है। आइये पढ़ते हैं इस कहानी को - सुशील कुमार भारद्वाज

चुड़ैल की पीठ

गुजराती कहानीकार- हिमांशी शेलत 

दरवाज़ा ज्यादा मजबूत नहीं था । बाहर आवाज़ें बढ़ती जा रहीं थीं । पेटी-पिटारा और जो कुछ भी खींचा जा सके वह सब दरवाज़े से सटा कर पसीने में लथपथ, बेबाक भाणकी कमरे के बीचोबीच खड़ी हुई थी। कुछ भी करने की स्थिति नहीं थी अब, सिवाय इसके कि वह झमकू के घर की तरफ खुलने वाली ख़िड़की खोल कर वहाँ से भाग जाये । वहाँ भी इस बात का डर तो था ही कि दिन भर खाँसता रहता भगले का बुढ्ढा कहीं देख न ले। पर बुढ्ढे की नज़र कमज़ोर थी...ज्यादा दिखाई नहीं देता था उसे। अब जो भी हो,....या तो उसे भागना पड़ेगा या फाँसी लगानी पड़ेगी.....
  “ अबे खोल रही है कि तोड़ दें......
तोड़ ही दो...देर किस बात की, अंदर छुपकर बैठी है अपने-आप बाहर आयेगी....साली पूरा गाँव खाने को बैठी है...
ऐय रवला, सामने से तीकम लेकर आ.....
दरवाज़ा थरथरा रहा था । डंडा, लकड़ी, धड़ाधड़ मुट्ठियाँ और अब इन सबसे जोरदार हथियार मँगाया जा रहा था। वहीं एक कोने में रड़की, आकुल-व्याकुल आँखों से बोले जा रही थी।
“.......रोज़ रात को सिकोतरी ( भूतनी) बुलाती थी। मैं कितने ही दिनों से कह रही थी कि भाणकी रात को कुछ करती है, पर किसी ने नहीं माना, लो अब खुद ही देख लो कि क्या हुआ है...
भाणकी की साँस तो जैसे दरवाज़े पर ही लगी हुई थी। कमरे के बीच तो वह मात्र परछाईं बन कर खड़ी थी। ये दरवाज़ा टूटा, ये भीड़ घर में घुसी, सटासट लकड़ियाँ, पीठ पर सोटियाँ, खिंचे हुए कपड़े और बिल्कुल नग्न शरीर, पूरे गाँव में दौड़ती-हाँफती वह अकेली और पीछे पूरा टोला....धधकते दाग, नुकीले पत्थर और खून का रेला.....
यूँ तो पिटारे में रस्सी रखी हुई थी। खोलकर फन्दा तैयार करने में क्या देर लगनी थी ? ये
लटकाया और ये खेल खत्म । पर हाथ जैसे पिटारे तक पहुँचने को तैयार न थे। जीव कहीं फँसा हुआ था...कह नहीं सकते शायद पेमा में ही अटका पड़ा हो ...
गाँव में ऐसी घटना कोई पहली बार तो बनी नहीं थी । न जाने कितनों के बालक चल बसे थे। उन्हीं में से गीगला भी एक था । उस दिन भाणकी के घर के पास खेल रहा था। अकेला भी नहीं था साथ में दाजी और उकड़ के टोपलाभर नंगे-मुंगे थे। टिटिहा-रोह हुआ तो खटिया में पड़े हुए बुढ्ढे-डोकरे और फुर्सत मिलते ही सब के सब उसी दिशा में दौड़े चले आये । लड़के की नसें खिंच गईं थीं और आँखें चढ़ गईं थीं। सवारी तुरंत कैसे मिल जाती...बड़ी मिन्नत-मसाजत करके भीमा कहीं से रिक्शा ले आया था। अस्पताल में बहुत सुईयाँ खोंसीं पर गीगला तो उसकी माँ की आँखों के सामने ही सूखी लकड़ी-सा हो गया।
यह ख़बर जब गाँव में पहुँची तब भाणकी चूल्हे के पास बैठी हुई थी । एक समान आँच पर सिंकती रोटी की काली-बदामी डिज़ाइन को ताकती हुई वह वहाँ से इंच भर भी नहीं हिली। गीगा चल बसा, इसमें उसका कोई दोष नहीं था यह वह जानती थी, फिर भी किसी अनजाने डर की आशंका से उसके पैर काँपते रहते थे। पेमा के शहर जाने के बाद जब कितने ही दिनों तक उसकी कोई ख़बर न आई उस समय किसी को भी अपने घर की तरफ आते देखकर काँपते थे बिल्कुल वैसे ही । पेमा को कितना समझाया था, गाँव छोड़कर जाने को कितना ही मना किया था। पर पेमा तो बड़ा ही झक्की और अड़ियल था। छीबा ने छ्प्पर डलवा लिया...दीवाल भी पक्की करवा ली...शहर में तो मजदूरों की हमेशा ही ज़रूरत रहती है...कुछ ठीक-ठाक मिलेगा तो बचेगा भी....बाकी गाँव में अब क्या रखा है....
यह एक की एक बात घुमा-घुमाकर कहता हुआ पेमा गया सो गया । वह नहीं आया पर उसके बारे में तरह-तरह की बातें आती रहीं—“ दंगा फ़साद में खत्म हो गया,...कहीं हाथ-सफ़ाई करता हुआ पकड़ा गया इसलिए जेल में सड़ रहा है,...बस की चपेट में आ गया है ...तो कोई यह भी कहता कि शहर में तो सबकुछ मिलता है इसलिए सिर्फ औरत के लिए पेमा को गाँव आने की भला क्या ज़रूरत है।
छप्पर अच्छा-खासा गल गया था। मूसलाधार बारिश वाली रात में भाणकी बैठी रहे या सो जाये यह निश्चित नहीं कर पाती और रातभर दीया जलाती और बुझाती रहती ।यही कारण था कि माणेक और रड़की कानाफूसी करने लगीं कि भाणकी रातबिरात कुछ करती है और उसे जरूर भूतनी चिपक गई है। वेलजी ( ओझा) गाँव में यूँ ही चक्कर लगाता रहता था, भूतनी वाली बात सुनने के बाद वह भी गाँव में ही रहने लगा । 
-और उसी समय यह गीगला टप्पदिना से मर गया...
दरवाजा बस अब टूटने ही वाला था। दीवार से चिपक-चिपक कर भाणकी खिडकी तक पहुँची। 
अधिकतर बंद रहने वाली यह खिडकी जकड़बंद हो गयी थी इसलिए धकेलने पर नहीं खुली। दाँत भींचकर उसने पूरा ज़ोर खिड़की पर लगाया। खिडकी ज़रा-सी हिली, पल भर के लिए भाणकी को लगा कि अभी कोई आकर उसे पकड़ लेगा। डर कुछ कम हुआ तो चारो तरफ सुनसान पाया ...सारी चीख-पुकार और धमाधम तो दरवाज़े पर मची हुई थी। बिल्कुल नीची-सी यह खिडकी खुल गयी इसलिए भाणकी भगवान का आभार मानते हुए कूद पड़ी और दौड़ने लगी।
वह दौड़ तो रही थी पर दौड़कर जाना कहाँ था यह उसे नहीं पता था। पैर काँप रहे थे और साँसें 
तेज़ चल रही थी। तभी... भाणकी वो भाग रही है...कैसी भाग रही है....जैसे दहकते शब्द उसके कानों में पड़े। इधर-उधर दौड़कर टोले को उलझाने के सिवाय दूसरी कोई सुध-बुध भाणकी को नही थी। खुद के दौड़ते पैरों की आवाज़ और साँसों की धौंकनी की आवाज़ के सिवाय दूसरी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है यह निश्चित हो जाने पर वह देवालय के पास पीपल के पेड़ की आड़ में ज़रा देर खड़ी रही ।  उसकी बावरी आँखें एक ही दिशा में देख रही थीं। इस तरफ बस्ती कम थी, कुछ तितर-बितर झोंपड़े थे, भीमनाथ के चबूतरे की आसपास ही कहीं दत्तु और बावजी खर्राटे भर रहे होंगे ।
........शायद दोनों पी कर पड़े होंगे…..यह विचार आते ही भाणकी का हाथ तुरंत अपनी पसीने से
लथपथ छाती पर आँचल ढँकने के लिए उठ गया । दत्तु की यही आदत थी। भाणकी चाहे कहीं भी हो...बीच बज़ार में या सुनसान पगडंडी पर, बेशर्मी से बस एक ही जगह ताकता रहता था। 
एक बार जगु की दुकान पर सामान बँधवा कर पैसे निकालने के लिये ज्यों ही ब्लाउज़ में हाथ 
डाला, दत्तु वहीं थोड़ा पीछे खड़ा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता दिखाई दिया। उस दिन से उसने पैसे साड़ी के किनारे बाँधने शुरू कर दिये थे। पर तब भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा था ...दत्तु की नज़र तो जैसे सबकुछ चीरकर आर-पार हो जाती थी। भाणकी को लगता कि उसकी आँखें छाती को छू जाती हैं और वह आकुल-व्याकुल हो उठती। लेकिन आँखें दत्तु की एकदम साफ थीं, पीने के कारण थोड़ी-सी लाल रहती थीं बस । वैसे न तो  वो बोलता-चालता था और न ही कोई छेड़-छाड़ करता था बस चुपचाप देखता रहता था। दिखने में तो बड़ा भला था। उस दिन बड़े अस्पताल से दवा लेकर भाणकी बस पकड़ने के लिये हड़बड़ाती-हड़बड़ाती दौड़ रही थी कि किसी ने बस खड़ी रखवायी। भाणकी को पूरा विश्वास था कि वह दत्तु ही था। बस में दत्तु के सिवाय दूसरा था ही कौन जो भाणकी के लिए बस खड़ी रखवाता। सबेरे-सबेरे भी निठल्ला दत्तु चक्कर लगाता रहता था। भाणकी सबेरे कुछ न कुछ काम निकाल कर चबूतरे पर आती-जाती रहती थी। कारण बस इतना ही था कि सामनेवाले चबूतरे पर रतन अपने हष्ट-पुष्ट जुड़वाँ बच्चों को छाती से चिपकाकर बैठी रहती थी। बच्चे दूध पीकर तृप्त होने पर हाथ-पैर उछाल कर खेलते...भाणकी की प्यास जैसे उन बच्चों में छिपी हुई थी। ऐसे समय पर इधर-उधर भटकता दत्तु उसे भला कैसे दिखाई देता। और इसीलिये बेखबर भाणकी को दत्तु एकटक......
पीपल के नीचे ही पड़ा रहने को मिल जाये तो कितना अच्छा हो....इस कल्पना मात्र से ही भाणकी की आँखें बंद हो गई। किसी के साथ नींद में बात कर रही हो इस तरह उसके होठ थोड़े-थोड़े फड़फड़ा रहे थे.......दत्तु को कह्ती हूँ कि छुपा दे मुझे कहीं....कर दिखा सचमुच...अगर मैं तुझे इतनी ही ज्यादा....बाकी पेमा तो बिल्कुल झूठा है। यूँ कहाँ से मर गया होगा.....ये तो सब भागने के बहाने हैं.....
भाणकी की पलकें भारी हो रहीं थीं तभी हो-हो और धम-धम की आवाज़ें तेज़ी से पीपल की दिशा में आने लगीं और वह फुर्ती से सीधी भीमनाथ के चबूतरे की तरफ़ दौड़ी। हवा में बेफाम पत्थर फेंके जा रहे थे...डांग-कुल्हाड़ियाँ लहरा रही थीं।
वंतरी (भूतनी) को खत्म कर दो आज....छोड़ना मत
कहाँ छुप रही है चुड़ैल, सामने आ...बताते हैं तुझे.....गाँव की जिम्मेदारी हमारी है...समझी..
अईला जोर लगाओ सब....वंतरी भेस बदल कर भाग जायेगी...
भाणकी के बाल जूड़ा खुल जाने से हवा में लहरा रहे थे। लंबी लटें गाल और कपाल पर बिख़र गयीं थीं। आँचल का ठिकाना नहीं था, बल्कि हमेशा ढँका रहने वाला छाती की बाँयी तरफ का बड़ा सा लाखू भी साफ दिखायी दे रहा था। भाणकी को इस रूप में देखकर दत्तु का रहा-सहा नशा भी चला गया। वह कुछ समझ नहीं पाया । हाँफती हुई भाणकी को बस पैर स्थिर करने जितना ही समय मिला। तभी दत्तु पीछे से सुनाई देने वाली चिचियारियों में खिंचने लगा।
अईला दत्तुड़ा...पकड़..साली डाकण को...
दत्तु क्या खाक पकड़ेगा....होश में हो तब न...
दत्तु...मार...
दत्तु भागने मत देना चुड़ैल को...बच्चे-आदमी सबको खा जायेगी कुलटा साली...
भाणकी बहुत कुछ कहना चाहती थी दत्तु से, पर दत्तु मानों घबरा गया हो इस तरह पीछे ख़िसकता चला गया । भाणकी को लगा कि जैसे उसके हाथ कुछ ढूँढ रहे हैं । शायद उसकी डांग,या फिर.....। नज़र के बिल्कुल सामने ढली हुई भाणकी की लगभग उघड़ी हुई छाती दत्तु को दिखना बंद हो गयी थी। वह तिरछी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा।
मार सोंटी खींच के,..देख क्या रहा है...इन आवाज़ों के दबाव में फँसा हुआ दत्तु कुछ करे उसके पहले भाणकी चबूतरा कूद कर हवा में तीर बन गयी। उसके मजबूत पतले पैर ज़मीन पर टिकते न थे।
वंतरी...साली...मर्द भी पीछे रह जायें इतना तेज़ दौड़ रही है...”  
नदी में डूब मरूँगी पर किसी के हाथ नहीं आऊँगी...यह सोचकर भाणकी ने ऊबड़-खाबड़ टेकरियों वाला रास्ता चुना। पैरों में कितना कुछ उलझ रहा था और ऐसी ही किसी चीज़ से ठोकर लगने पर वह नीचे गिर पड़ी। गिरने के साथ ही मानों उसके पैर पूरी तरह टूट गये। वजन उठाने लायक न रहे..टें हो गये और भाणकी लाचार हो गयी। उकड़ू पड़ी हुई वह पसीने में  घुलती गयी।
चिचियारी और धमाधम की आवाज़ें अब बिल्कुल नज़दीक आने लगीं थीं। किसी ने उसे पीछे से खींचा। ज़मीन पर उगी हुयी घास से भाणकी चिपकी रही। कपड़े चीर-चीर हो गये..पीठ खुल्ली हो गयी...और उस पर पड़ने लगे डाँग, पत्थर, लात, गालियाँ ...और फिर सब के सब टूट पड़े पूरी ताकत से।
संपूर्ण होश उसने कब खो दिया यह तो पता नहीं...पर बस होश खोने से पहले मन में विचार आया...
साले भड़वे....कीड़े पड़ें तुमको......दत्तु जैसा सच्चा आदमी इनके बीच में हो ही नहीं सकता...आज पिया हुआ न होता तो बिचारा दत्तु....कैसा सच्चा...मर्द है.....
यूँ तो गाँव वाले सब मानते थे कि चुड़ैल की पीठ में भी आँखें होती हैं । बिल्कुल झूठी बात.....अगर होतीं तो भाणकी को टोले में खड़ा हुआ पहाड़ जैसा दत्तु दिखाई न दिया होता .??

डॉ. मालिनी गौतम


अनुवादक- डॉ. मालिनी गौतम
4/475, मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
जिला- महीसागर्
गुजरात
मो. 09427078711


सोमवार, 12 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की गजलें

मालिनी गौतम के गजल में भाषा की रवानी है तो भावों में संवेदना की अभिव्यक्ति. इनके भाव –संसार में करूणा और चित्कार का समावेश है तो आक्रोश की गूंज भी. शब्दों का संयोजन भी काबिलेगौर है. पढ़ते हैं मालिनी गौतम की कुछ गजलों को:-   

मालिनी गौतम


ग़ज़ल  1




कभी आँखें दिखाते हो कभी ख़जर चलाते हो
गरीबों पर बताओ इस तरह क्यों जुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारखानों में हैं मरते लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी बहाते हो

रखोगे कैद कब तक रौशनी को अपने महलों में
उजालों को भी तुम अपना-पराया क्यों सिखाते हो
दवा-दारू, मिठाई, तेल-घी की छोड़ दो बातें
महब्बत में भी तुम तो ज़हर नफरत का मिलाते हो
पढ़ाते पाठ लोगों को सचाई और नेकी का
स्वयं बाजार में ईमान की बोली लगाते हो
वो चीखें जो उड़ा देतीं तुम्हारी नींद रातों की
उन्हें गूँगा बनाने का हुनर क्यों आजमाते हो




                                                        ग़ज़ल  2



चाय की कुछ चुस्कियों में जिंदगी को पी गये
घिसते-घिसते एड़ियाँ वे उम्र पूरी जी गये
नोट बरसाने लगे नेताजी अपनी जीत पर
लूटने उनको गली के चन्द बच्चे ही गये

रेल औ बस में मिले हमको नये चहरे कई
कुछ हँसे अपना समझकर कुछ लबों को सी गये
खिलखिलाती धूप जैसे जब मिले कुछ पल उन्हें
भूल कर अपनी थकन वे उन पलों को जी गये
हर तरफ से मार मौसम की पड़ी कुछ इस क़दर
चंद लमहे थे खुशी के हाथ से वो भी गये


                                                              ग़ज़ल  3



झूठ है जिनकी नस-नस में
सत्य नहीं उनके बस में
बाहर उजियारा दिखता
घोर अँधेरा अंतस में
चाहे जितना खौफ बढ़े
हो न कमी कुछ साहस में
वे ही गुण अपनाओ तुम
जो गुण होते पारस में

अँधियारों से लड़ने को
तीर न कोई तरकस में



                                                                 ग़ज़ल  4



वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ जुल्म ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को खिलाती है

नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत जिन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
वो बहती इक नदी है तुम उसे पोखर समझना मत
है इतना वेग उसमे राह का पत्थर हटाती है
समुन्दर दे नहीं सकता किसी को बूँदभर पानी
वो मीठी-सी नदी फिर भी समुन्दर में समाती है
उठाकर रेत-मिट्टी की तगारी साधती है लय
पसीने में नहाकर जिंदगी को गुनगुनाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले मार देते तुम
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हे दुनिया मे लाती है

ग़ज़ल  5



कहीं घर-बार जलता है कहीं संसार जलता है
सुलगता दौर है इसमें न कोई ख्वाब पलता है
उठाकर बोझ काँधों पर जो पाते रोटियाँ अपनी
वो जब भी ठान लेते हैं ज़माना ये बदलता है
थके तन औ थके मन को जगाकर तो जरा देखो
अँधेरी रात के पीछे सुनहरा दिन मचलता है
अगर चाहो तो करवा दो मुनादी आज गलियों में
न आये राह में कोई यहाँ दरिया उछलता है
ज़माना देवियाँ कहकर तुम्हें है पूजता अक्सर
मगर तुम जान लो इतना ज़माना तुम को छलता है

मालिनी गौतम
  मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
          गुजरात
मो. 09427078711












शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-

परंपरा ऋतुराज सम्मान 2015 से सम्मानित मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-
:-

घनीभूत संवेदनाओं की प्रवहमान धारा
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एक नदी जामुनी सी-मालिनी गौतम
----------------------------------------------

मालिनी गौतम हिंदी कविता के क्षेत्र में एक परिचित  नाम हैं।इनकी कविताएँ अपनी सहजता और सादगी के कारण सहज ही आकर्षित करती हैं।आलोच्य संग्रह 'एक नदी जामुनी सी'व्यापक सामाजिक सरोकार और प्रेम के विस्तृत संसार की कविताएँ हैं।इस संग्रह के पूर्व'बूँद बूँद एहसास' कवितासंग्रह और'दर्द का कारवां' (ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशित हैं।

इस संग्रह की कविताओं में स्त्री अस्मिता के यक्ष प्रश्नों से मुठभेड़ है ।इस संसार में प्रेम है,ख़ुशी है,दुःख है,अफ़सोस है,पीड़ा है और इन सबके बीच एक स्त्री का अपनी स्वतंत्र पहचान रचने की पटकथा है।पहली ही कविता 'छतरियां' स्त्री के त्याग, बलिदान और जीवन में हासिल का मर्मस्पर्शी कथा कहती है कि किस प्रकार घर परिवार और बच्चों पर छतरी की तरह तनी रहती है पर उसकी किस्मत में छतरियां नहीं है-----

औरतें------------
लाल,पीली,, नीली,सफ़ेद छतरियों सी
हर दम तनी हुई
अपने घर परिवार और बच्चों पर
---------------
पर अफ़सोस
उनके नसीब में नहीं होती
कोई लाल,पीली,नीली,या सफ़ेद छतरी

एक नदी जामुनी सी एक प्रेम कविता है।सीधी-सहज यह कविता ह्रदय के तार को झंकृत कर देती है।'उफनती आदिवासी नदी' एक बेहतर प्रेम कविता है ,इसमें प्रेम के ख़ूबसूरत पलों को सहेज लेने का प्रस्ताव है।'अनंतकाल के लिए'प्रेम को व्यापकता और सम्पूर्णता में देखती है,जहां दैहिक स्तर से  ऊपर उठ कर अस्तित्व के स्वीकार की बात है साथ ही जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश भी बनी रहे।'चाँद के साथ'कविता देर तक साथ रहती है,इसमें कवयित्री ने संसार में सर्वाधिक प्रिय चीजों को गिनाते हुए बताया है कि सबका अपना अपना चाँद होता है।अपनी कहन के कारण यह कविता बहुत प्रभावित करती है।इस संग्रह की प्रेम कविताओं का संसार भी व्यापक है वह मात्र रूमानी कार्य व्यापार  नहीं है।इन कविताओं में प्रेम का उच्चतर स्वरुप  है।इस संग्रह में प्रेमविषयक और स्त्रीविमर्श की जो कविताएँ हैं वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रांत नहीं हैं।प्राकृतिक रूप से वे जड़ों तक पहुंच स्त्री के दुःखों और विडंबनाओं की पहचान करती हैं।स्त्री विमर्श के अभ्यस्त चलन को लाँघ कर कवयित्री ने अपनी बात कही है और हर बात पर और बात बात पर पुरुषों को कटघरे में खड़ा नहीं किया है और सारे दुखों के लिए पुरुषों को जिम्मेदार मान अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर लेतीं।इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता'प्रेम में होना'में उनके विचारों को देखा जा सकता है।यह कविता बताती है कि एज औरत, पुरुष के प्रेम से पल भर उबरना नहीं चाहती,वह पुरुष के प्रेम में इस कदर डूब जाती है  और उस गहराई तक डूब जाती है जहाँ पहुंचकर उसका स्वयं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।जबकि पुरुष स्वयं के अस्तित्व को बचा लेता है और अपनी दुनिया में लौट आता है।कवयित्री की इस स्थापना को गंभीरता से समझने की जरुरत है।इससे भले कुछ लोग असहमत हो सकते हैं,पर इसमें सच्चाई है।इस कविता मैं'नमकीन सा फ़्लर्ट' जैसे प्रयोग भी है जो एक उदाहरण है कि उनके पास पर्याप्त शब्द भंडार हैं और शब्दों का बेहतर प्रयोग उन्हें भली भाँती ज्ञात है साथ ही काव्यतत्व की समझ भी------

पर पुरुष----
जिस तीव्रता से चढ़ता है
प्रेम की सीढियाँ
उतनी ही तेजी से वापस
उतरना भी चाहता है
इस भंवर में गोता लगाकर
अपनी दुनिया में

सर्द रिश्ते,जर्द पत्ते,कमबख्त दूरियां,लकीरें,बरसात,मिलान एक पल का,टूटता तारा,एक और एक ग्यारह,होने से न होने तक,जैसी प्रेम कविताएँ विभिन्न कोणों से प्रेम की अंतर्यात्रा करती हैं।ये कविताएँ जमीन से जुडी हुई कविताएँ हैं।'जर्द पत्ते'  आकार में छोटी पर एक खूबसूरत कविता है, जो पाठक से बार बार पाठ की मांग करती है-----

जरा ध्यान से
झांककर देखो
इन पीली निस्तेज आँखों में
मोहब्बत के सुर्ख पत्ते
अब यहाँ नहीं रहते
यह तो घर है
पीले जर्द पत्तों का
जिन्हें मैंने बरसों से रखा है
सहेजकर!

समाज में स्त्रियों के प्रति अत्याचार,भेदभाव,शोषण का विरोध मालिनी गौतम की कविताओं के मुख्य स्वर हैं।'सजा एक अपराध की' कविता की पहली ही दो पंक्तियाँ ही समाज में स्त्रियों की दुर्दशा को प्रभावपूर्ण तरीके से कहने में समर्थ है-------

लड़कियां कटती हैं
खेत में खड़ी फसलों की तरह
खटती हैं
मशीनों के कलपुर्जों की तरह
कच्चे सूत सी
काती जाती हैं चरखों पर
कच्ची हांड़ी सी
चढ़ाई जाती हैं आंच पर

राजकिशोर राजन


यह कविता लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव को गहराई तक जा बारीक़ चित्रण करती है और प्रकारांतर से प्रश्न पूछती है कि यह कैसा सभ्य समाज है! जहां लड़कियां मालगाड़ी सी दौड़ती हैं और हाथ पोंछे नैपकिन की भांति डस्टबिन में फेंक दी जाती हैं! कवयित्री अपनी कविताओं में कागज की लेखी नहीं, आँखन देखी कहती हैं इसीलिए इनकी कविताएँ जीवंत लगती हैं।इनकी कविताओं का सपना है कि यह संसार उस लायक बने जहां लड़कियों के लिए,स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित कोना हो।इनकी कविताएँ उम्मीद की कविताएँ हैं।तमाम जड़ताओं के बाद भी दुनिया बदल रही है।स्त्रियों की लड़ाई रंग ला रही है,अपनी दुनिया के नवनिर्माण का उनका सपना रंग ला रहा है।कुछ इसी प्रकार की ध्वनि'लड़कियां बदली बदली सी' में सुनाई पड़ती है जहां वे अपनी स्कूलों और कालेजों में स्वतंत्रता का अनुभव तो कर रही हैं पर घर पहुँचते पहुँचते उनके पैरों में बेड़ियां पद जाती हैं ।यह कविता शिल्प की दृष्टि से भी संग्रह की बेहतरीन कविताओं में से एक है।उसी प्रकार 'औरत' कविता है जहां आज भी एक औरत सुबह के इंतजार में है।कविताएँ लयात्मक हैं जिसका मुख्य कारण कवयित्री का गीतकार होना है और कविता भी तो अंततः यही चाहती है कि वह किसी के होठों  पर थिरके ,गीत बन जाये----

आज मैंने फिर ढूंढ उसे
माथे पर लगे सिंदूर में
ऊँन के गोलों में
बिस्तर पर बिछी चादरों में
कर रही थी वह इंतजार
एक और सुबह का

संग्रह की कविताओं की भाषा सहज और तरल है,कहीं भी अमूर्तन या अबूझ पन नहीं है।कहन का सलीका और सादगी इन कविताओं को एक अलग आस्वाद प्रदान करता है और सबसे बड़ी बात की मालिनी गौतम का कवि सब कुछ खोकर भी कविता को बचाना चाहता है----

अपना अब कुछ खोकर भी
मैं बचाना चाहती हूँ
मेरी कविता --मेरी कविताई
                         (मैं और कविता)