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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ (पदचाप के साथ-शंकरानंद): राजकिशोर राजन

अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ
(पदचाप के साथ-शंकरानंद) : राजकिशोर राजन
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शंकरानंद एक प्रतिभावान युवा कवि हैं।उनकी पहली कवितासंग्रह 'दूसरे दिन के लिए' भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से प्रकाशित हुई।'पदचाप के साथ' उनका दूसरा काव्यसंग्रह है जो बोधि प्रकाशन से आई है।इस संग्रह को कई कई बार पलटा,कई कई बार पढ़ा और यह विश्वास गहरा होता गया की शंकरानंद अंतर्वस्तु और शिल्प के मामले में हमें निरंतर प्रभावित करते हैं और कई बार तो चकित कर देते हैं। शब्दों की मितव्ययिता और गहन भावबोध लिए इनकी कविताएँ ऐसी हैं जिन पर इस कवि के हस्ताक्षर हैं।इधर हिंदी में समकालीन और समकालीनता आदि पर जो बहस छिड़ी हुई है तथा भाषा,कहन,चेतना आदि को खंगाला जा रहा है तब पता चल रहा है कि वर्तमान में लिखना ही समकालीन होना नहीं है।आज मुहावरे और अंतर्वस्तु के मामले में भी कई कवि विगत हैं।शब्द और विषय इतने घिसे पिटे की अधिकांश कविताओं से कवि गायब हैं यानी कविता पर कवि का अपना हस्ताक्षर ही नहीं है।कहने का तात्पर्य यह की कविता में मौलिकता ही गायब है जो किसी कविता को कविता बनाने के लिए प्राथमिक कारक है।गौरतलब है कि वक्त के साथ समाज की भाषा भी बदली है और जनता से जुड़ा कवि उस भाषा से सायास नहीं जुड़ता वह उसी में साँस लेता है।मान बहादुर सिंह ने सही कहा है कि भाषा ,कविता का डी एन ए है और वह भाषा ही है जिससे हम कवि के संसार के बारे में जान सकते हैं।शंकरानंद की काव्यभाषा और काव्यचेतना समकालीन है।समय के साथ होना एक कवि के लिए बुनियादी शर्त है,बाकी शर्तें इसके बाद हैं।इस कवि की भाषा में बलात् और सायास पच्चीकारी नहीं है, देसज शब्दों की बहुलता है न तत्सम शब्दों की,ज्यादा से ज्यादा उसने तद्भव को साधा  है।लड़कियां(पृ.107)शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें--

कहीं तो जरूर है वसंत
जिसके कारण घर चहक रहा है

इसी प्रकार की भाषा को कवि ने अपनी कविताओं में साधा है जिसमें न ज्यादा चाक चिक्य है,न उलझाव और न असहजता।सधी और कसी हुई भाषा जरूर है  पर इतनी भी नहीं जैसे नट टंगी हुई रस्सी पर करतब दिखाता है।इस स्वभाव के कारण ही कविताएँ संप्रेषित होती हैं और अमूर्तन का शिकार होने से अपने को बचा लेती हैं।इन दिनों यह प्रचलन में है कि कई कवि सायास शब्दों का पहाड़ खड़ा करते हैं और आप बारम्बार उस पहाड़ पर चढ़ें और उतरें पर कविता कामिनी के दर्शन न होने हैं।और अंत में वही होता है,आप आगे बढ़ जाते हैं।यहाँ सिर्फ कवि नहीं चुकता ,कविता भी एक मौका खो देती है।शंकरानंद की कविताएँ भाषा में कैद हो कर नहीं रहतीं अपितु वे भाषा का अतिक्रमण करती हैं।संग्रह की एक कविता है'बन रहा है(प,101)यह कविता दरअसल ,हर पल परिवर्तन के परम् सत्य को रेखांकित करती है।हर पल कुछ बन रहा है,कुछ नष्ट हो रहा है परंतु जीवन है कि पुनर्नवा हो रहा है।यानी परिवर्तन के बीच भी एक अनुशासन है,व्यवस्था है जो अपना काम कर रही है-----

कोई आकाश बना रहा है
कोई पंख
कहीं धूप पक रही है
कहीं गल रही है रात
कोई पत्थर को पानी बनाता है
कोई राख को चिंगारी

जीवन की तमाम उलझनों,दुःख दर्द और नाउम्मिदियों के बीच भी
कवि उम्मीद की रेख देख पाता है।यथार्थ को पहचानने और कविता में ढालने के लिए जो समझदारी और हुनर की जरुरत पड़ती है उसे साधने में कवि निरंतर सचेष्ट है।अपने तेवर और कहन में उसकी कविता समकालीन कविता की अभ्यस्त सरंचना के अंतर्गत है।इसके दो परिणाम हुए हैं-प्रथम, की कवि शब्दों को साधने और मितव्ययिता बरतने में काफी हद तक सफल हुआ है।इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में शंकरानंद ने भाषिक प्रयोग के मामले में  जिस संयम और अनुशासन का परिचय दिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए और कवि से हमारी उम्मीदें बढ़ जाती है।एक कविता (फूंकना,प-112)का उदाहरण लिया जा सकता है----

लौ जल रही थी दीये की
उसे बुझाना था

वह फूंक रहा था बार बार
लेकिन लौ जलती रही
दीया अपलक था

इस कविता में लौ को बुझाने के लिए यानी हमारी उम्मीदों,आशाओं को बुझानें के लिए निरंतर कोशिशें होती रहीं परंतु लौ जो मनुष्य की जिजीविषा  का प्रतीक है,जीवन का पर्याय है उसे कोई बुझा न सका, सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ।लौ जलती रही ,दीया अपलक रहा।अगर उम्मीद न रहे तो फिर बचेगा क्या!यह कविता बड़े सलीके से नपे तुले शब्दों में मनुष्य की आदिम कथा कहती है।हर कवि के पास कुछ विलक्षणता होनी चाहिए और जब आप इस कवि की कविताओं की यात्रा करेंगे तो इसे सहज ही रेखांकित कर सकते हैं।पर,यही मितकथन और शिल्प सजगता कई बार किसी कवि की सीमा भी हो जाती है।इस संग्रह में  कुछ कविताएँ उसी शिल्प सजगता के कारण कमजोर और प्रभावहीन भी हो गयी हैं।क्योंकि शिल्प कविता में शिल्पहीनता की हद तक बारीक भी हो सकती हैं और इतना भारी कि कविता उसके  नीचे दब कर रह जाए।

           इन दिनों हिंदी कविता में गांव की उपस्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है और यदा कदा जो गाँव दीखता भी है वह सतही है।गांव के भीतर भी गांव होता है जैसे शहर के भीतर शहर। शंकरानंद की कविताओं में जो गांव है वह वास्तविक गांव है।आमतौर पर गांव के चरित्र को समझे बिना हम गांव की बात करते हैं।आज बड़े शहरों में रहने वाले कवि,लेखक भी गांव जाते हैं पर एक पर्यटक की तरह।उनका गाँव नकली होता है उनका ग्रामीण बोध अवास्तविक होता है।कवि स्वयं बिहार के कोसी क्षेत्र का निवासी है इसीलिए वह गांव के भीतर गांव को देखता है।सिर्फ देखता ही नहीं वह जीता भी है।इस संग्रह में कई कविताओं की पृष्ठभूमि गांव है।'जिद'कविता  अपने टटके बिम्बों के साथ मनुष्य की अदम्य इच्छा,जिजीविषा और अंतत उसके जीने के लिए जिद को  जिस ताकत के साथ उठाती है वह कविता को  अंततः  पुनर्नवा करती है।यहां वही चिरकालिक दुःख और अभाव है जिसने जीवन को ताकत दी है-

जो कांच धूप रोकती थी
उसे एक बच्चे  ने पत्थर मार कर तोड़ दिया

आज इस देश में किसान और किसानी की स्थिति हृदयविदारक है,किसान मर रहे हैं और पूरा देश मर्सिया गा रहा है।पोखर,तालाब,कुएं सभी सूख रहे हैं।ऐसा लगता है कि इस देश को अब इनकी जरुरत नहीं रह गयी है।अमेरिकी आवारा पूंजी  जब एक तरफ सब कुछ तहस नहस करती जा रही है हम जात पात और धर्म की राजनीति में जी रहे हैं।यह कैसी विडम्बना है कि अन्नदाता किसान अब स्वयं अन्न के लिए बड़े बड़े शहरों की तरफ भाग रहा है।आप कभी जनसेवा एक्सप्रेस में बैठ कर देखिये यह देश किधर जा रहा है।शंकरानंद की 'भाव'नामक कविता बड़ी संजीदगी से उस करुण दृश्य को शब्दों के माध्यम से जीवंत करती है------

सबसे सस्ता खेत सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज सबसे सस्ती फसल
और उससे भी बढ़ कर भी सस्ता किसान

और यह भी की-
जिसके मरने से  किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फांसी नहीं होती

शंकरानंद की ऐसी कविताओं में जो बिम्ब उभरता है वह भरोसे को भरोसा देता है।कवि का यह परिवेश उसे जीवन देता है।कविता को जीवन जैसे कवि के जीवन देता है।शंकरानंद की इन कविताओं को पढ़ते त्रिलोचन की याद हो आती है जब वे कहते हैं-
जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है,तप है,नहीं चाय की चुस्की

यह कवि कविता  में कागज की लेखी नहीं लिखता बल्कि आँखिन देखी लिखता है।किसी कवि को समझने के लिए भाषा और बिम्ब महत्वपूर्ण उपकरण हैं।इन दो उपकरणों के आधार पर अगर  कोई इस कवि को समझे तो वह इतना समझ लेगा की यह कवि जमीन से गहराई तक जुड़ा कवि है।उसने अपनी शैली  आप गढ़ी है और उसकी कविताओं में मौलिकता है।उसका अंदाजे बयाँ अलहदा है।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

शंकरानंद की कविताएं

शंकरानंद की कविताएं हमारे दिल को छूती हैं. दिमाग को सोचने को विवश करती हैं. और प्रस्तुत करती हैं हमारे सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ के परिदृश्य को. कविताएं नोस्टाल्जिया की गिरफ्त में है जो हमारे बदलाव को रेखांकित करती हैं. कविताएं भविष्य की समस्याओं एवं चीजों से भावनात्मक अलगाव को भी स्पष्ट करती हैं. चिट्ठी की उम्र ही नहीं है बल्कि कैलेंडर से जुड़ा सुख-दुःख और सपना-निराशा भी है. जिंदगी के बहुरंगे–चटक रंग हैं और खुद के लिए बोते कंटीले बीज हैं तो निराशा के दौर में डगमगाता भरोसा है. पढ़ते हैं शंकरानंद की कुछ अच्छी कविताओं को:-


 शंकरानंद



चिट्ठी की उम्र
चिट्ठी की उम्र कितनी होती है
कोई पोस्टकार्ड कोई लिफाफा कोई अन्तर्देशीय पत्र
कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगा
कभी ये भी जानने का मन करता है

मेरे पास पहले की बहुत चिट्ठियां हैं बक्से में
कभी उन्हें खोल कर देखता हूं तो
और ज्यादा पुरानी लगने लगती हैं
और ज्यादा कमजोर और ज्यादा निरीह
सालों बाद इनका क्या होगा पता नहीं

अब नई चिट्ठियां कम ही आती हैं
कम ही आता है डाकिया
किसी के लिखे की राह देखना कम हुआ
ये अब पुरानी बात है

कौन इंतजार करे इनके लिखने और पहुंचने का
जब इतने साधन मौजूद हैं चिट्ठियों के विकल्प के रुप में
तब कौन इतना धैर्य रखेगा

मैं भी इससे परेशान नहीं हूं
बस इतना सोचता हूं कि सालों बाद अगर बच्चे
चिट्ठी के बारे में पूछेंगे चित्र देखकर
तब बिना उदाहरण उन्हें कैसे समझाउंगा।

कैलेंडर
मैं दीवार पर टांगता हूं तो बीते दिन याद आते हैं
वे बीते तीस साल
कैलेंडर देख कर कौंध जाते हैं

कैसा भी हो वह
पर सबमें तारीख तो वैसी ही रहती है
वैसे ही छपा रहता है दिन

उसके चित्र तो अलग रहते हैं
लेकिन उनका असर कम होता है
खूबसूरत होने पर भी तस्वीरें तारीखों के दुःख
कम नहीं कर पाती

मैं हर बार नये कैलेंडर शौक से खरीदता हूं
सोचता हूं कि ये पहले से अलग हों
कम तकलीफदेह
पहले के आंसू पहले की उदासी पहले का दुःख इससे नहीं झांके
नहीं झांके पहले की मृत्यु

लेकिन जैसे ही महीना नया आता है
बीता समय आंखों के सामने घूम जाता है
तारीख देखकर वही वही

इसके बावजूद मैं पुराने कैलेंडर नहीं रखता
बदलता हूं हर बार हर साल
क्योंकि इसमें भविष्य का स्वप्न भी दर्ज होता है
जो बताता है कि घबराओ नहीं दोस्त!
ये समय बदल जाएगा।

रंग के चोर
इतने से डिब्बे में रंग भरा है
जितने डिब्बे उतने रंग उतना मौसम उतने स्वप्न
जरा सा उड़ेल दो तो
सन्नाटा भी फूल बनकर खिल जाएगा

ये डिब्बे लेकिन पता नहीं कहां गुम होने लगे अब
पहले तो रंग बहुत थे जीवन में
फिर धीरे धीरे सिमटने लगा सबकुछ
उदासी बढ़ी दुःख बढ़ा मृत्यु का कारण बढ़ा
फिर तो रंग स्वप्न से भी लापता हो गये

ये रंग जरुर किसी न किसी की अलमारी में कैद होंगे
किसी न किसी की जेब में होंगे ये रंग
तभी तो बाहर नहीं दिखाई पड़ते इन्द्रधनुष की तरह

ये आपका रंग सबने मिलकर चुराया
अगर भरना चाहते हैं खालीपन तो तलाशी लीजिए

जो अपराधी होगा वह पकड़ा जाएगा।

पेड़
ओ किसान!
तुम नहीं रोंपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं

तुम कुछ और सोचो जो तुम्हें जिन्दा रहने का मौका देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक्त की रोटी दे तुम्हें

ये लोकतंत्र है
जिसके सामने रोओगे वही उठ कर चल देगा
जिससे मांगोगे मदद वही सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेगा

तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बनकर खड़ा मिलेगा
वह सबको छांह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा

तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फांसी लगाकर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हजारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे

इसलिए कहता हूं कि मत रांपो बींज।

भरोसा
पहचानी सी आवाज को खोज रहा हूं
नयी जगह में हवा भी अलग है
पानी भी अलग
भाषा अलग है

जिन सड़कों पर चल रहा हूं ये भी पता नहीं कहां ले जाएंगी
हाथ के नक्शे और शहर में महीन फर्क है
पूछने पर अलग जवाब मिलते हैं
ऐसे में सहम जाता हूं छोटे बच्चों की तरह

न पिता की उंगली है यहां न मां के भरोसे के हाथ का आसरा
कोई तरीका नहीं जो बता दे कि ये दिशा सही है
इतना रहस्य है इतना धुआं इतना विश्वासघात
कि हर पता गलत निकलता है

ये देश हमें कहां ले जाएगा
अब कोई नहीं बता सकता।
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परिचय:-
शंकरानंद
जन्म-8 अक्टूबर 1983
;खगड़िया के एक गांव हरिपुर मेंद्ध

शिक्षा-एम0,बी0एड
प्रकाशन-आलोचना,वाक,आजकल,हंस,पाखी,वागर्थ,पक्षधर,उद्भावना,कथन,वसुधा,लमही,तहलका,पुनर्नवा,वर्तमान साहित्य,नया ज्ञानोदय,परिकथा,जनपक्ष,माध्यम,शुक्रवार साहित्य वार्षिकी,स्वाधीनता,साक्षात्कार,सदानीरा,बया,मंतव्य,दस्तावेज,जनसत्ता,समावर्तन,परिचय,आउटलुक,दुनिया इन दिनों साहित्य विशेषांक,समय के साखी,निकट,अनहद,युद्धरत आम आदमी,अक्षर पर्व,हिन्दुस्तान,प्रभात खबर,दैनिक भास्कर,अहा!जिन्दगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।कुछ में कहानी भी।
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी नियमित रूप से कविताएं प्रसारित।
कविताओं का कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

पहला कविता संग्रह दूसरे दिन के लिए‘;2012द्धभारतीय भाषा परिषद,कोलकाता से
प्रथम कृति प्रकाशन मालाके अंतर्गत चयनित एवं प्रकाशित।
दूसरा कविता संग्रहपदचाप के साथ‘;2015द्धराजभाषा विभाग के सहयोग से बोधि प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित।
सम्मान-2016 का विद्यापति पुरस्कार

सम्प्रति-अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगड़िया-851204,मो0-08986933049