बाढ़ की बात जब भी आती है तो मुझे बचपन की याद आती है। जब मैं ठीक से चलना-बोलना भी नहीं सीख पाया था। जब नाना जी हम सभी को अपने गाँव लेकर चले गए थे बाद में। याद है वह दृश्य जब मेरे आँगन में लबालब पानी हिलोरे मार रहे थे और मैं रसोईघर के सामने दुहार (बरामदे) पर जमीन में लेटे सबकुछ देख रहा था। देख रहा था मछलियों की अठखेलियाँ। साँपों का तेजी से पानी में तैरना। घर तो ऊँचा था इसलिए दुहारी पर पानी चौखट पर लाख सिर पटकने के बाबजूद कभी लाँघ न सका। लेकिन आँगन के बाहर सड़क पर तो नाव चल रही थी। क्या-क्या बह रहे थे ठीक से कुछ याद नहीं पर आदमियों को बहते जरूर देखा। शायद वे तैर भी रहे थे। सबसे अजीब लगता था बँसवाड़ी का नजारा। चारों ओर पानी ही पानी। समतल पानी। बाँस के ऊपरी कुछ हिस्से पानी में जमे से लगते थे। और सबसे अजीब लगता था बरगद का पेड़। लगता था जैसे पानी में उगा कोई झाड़ी हो। सिर्फ और सिर्फ कुछ पत्ते नजर आते थे। रसोईघर के दीवार से सटे में मक्के का एक बोझा भी रखा था। जिसमें से कभी कभार भूँटा तोड़कर आग में पका कर खाते थे। जब आँगन से पानी निकल गया था तो एक दिन एक हेलीकॉप्टर आँगन में एक बोरी गिरा गया। माँ डरकर घर के अंदर चली गई थी और पड़ोसी बोरिया ले गई। माँ बताई थी कि उसमें चना, चूड़ा, शक्कर, और माचिस, मोमबत्ती आदि सामान थे। ..कितना कुछ याद आता है। लेकिन पटना आने के बाद कभी ढ़ँग से गाँव गया नहीं। बाढ़ की त्रासदी तो अक्सर आई, लेकिन हर बार पटना में ही रहा। पानी निकल जाने पर कभी कभार गया लेकिन याद की बाढ़ बचपन की ही बाढ़ रही।
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सुशील कुमार भारद्वाज
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सुशील कुमार भारद्वाज
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