मंगलवार, 20 जून 2017

लालकृष्ण आडवाणी के साथ जो हो रहा है वैसा ही उन्होंने भाजपा में किया भी

 शत्रुघ्न सिन्हा के शब्दों में कहें तो “भाजपा पहले एक अलग पार्टी थी लेकिन अब यह अलग-अलग की पार्टी हो गई है”. आज जब राष्ट्रपति के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी को दरकिनार करते हुए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को आगे किया गया है तो भाजपा की कार्यशैली फिर से चर्चा में आ गई है. भाजपा और खुद लाल कृष्ण आडवाणी के कार्य पद्धति को शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी “एनिथिंग बट खामोश” से समझा जा सकता है. भारती एस प्रधान की अंग्रेजी में लिखी इस किताब के कुछ पन्नों को हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है. आप भी इसे पढकर देखें. – सुशील कुमार भारद्वाज



“जब आडवाणीजी ने लोकसभा सीट से लड़ने की बात कही, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब मैं राज्यसभा में जाने का अनिच्छुक था तब उन्होंने और पार्टी ने समझाया कि मैं उपरी सदन के लिए बहुमूल्य रहूँगा; हमलोगों को वहां अपनी पार्टी को मजबूती देने की जरूरत है. तब उन्होंने सुविधा का तर्क दिया कि पार्टी नियम के अनुसार दो से अधिक कार्यकाल नहीं दिया जा सकता.” शस ने कुछ गौरतलब अपवाद की ओर ध्यान खींचा. “पार्टी के अनेक नेता जैसे अरुण जेटली, और मेरे दोस्त रवि शंकर प्रसाद एवं वेंकैयानायडू को राज्यसभा में तीसरी बार भी मौका दिया गया.”
शस के चुनाव के समय तक राज्यसभा में रहने के अपने कारण थे.
2009 के चुनाव होने में एक साल का समय शेष था. मुझे दिल्ली का अपना घर छोड़ कहीं और अपनी व्यवस्था करनी थी.” उन्होंने व्यवहारिक रूप से कहा. “इसलिए मैंने सलाह दिया कि मुझे दो साल राज्यसभा में रहने दिया जाए ताकि मैं दिल्ली में चुनाव और उसके बाद भी रह सकूं, मैं सीट को छोड़ लोकसभा जा सकता था.” यह होशियारी की सलाह थी क्योंकि यदि वे लोकसभा में हार भी जाएंगें तो राज्यसभा की सीट बची रहेगी.
यह विकल्प पार्टी के नेताओं को पसंद नहीं आया.
शस बोले, “मैं क्यों कहता हूं कि उस दिन मैंने आडवाणीजी में राजनेता को देखा क्योंकि वे बार बार हाथ धो रहे थे और तब कहा, ‘इस बार राज्यसभा में जाना आसान नहीं होगा और लोकसभा का चुनाव लडूं. यह मेरे छवि के साथ न्याय नहीं होगा’”
कोई उपाय नहीं बचा था सिवाय पार्टी के निर्णय को स्वीकार करने के. “इसके अलावे, आडवाणीजी की इच्छा मेरे लिए निर्देश था. लेकिन मैं चकित था कि जैसे राजेश खन्ना से हारने के बाद निसहाय हो गया था, वैसे ही फिर से खुद पर आ गया,” उन्होंने उदासीनता से चिढ़ कर कहा. “मेरे कहीं ठहरने के लिए न ही कोई मदद में आया न ही किसी ने अपनी कार दी.”
सौभाग्य से, शस खुद एक सफल इंसान थे. “एक साल के लिए किराये पर रहकर खुद को बचाया,” कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए. “तब जसवंत सिंह ने मेरी मदद उस समय की जब उन्होंने आवास समिति को पत्र लिखकर कहा कि जो मेरे साथ हो रहा है वह ठीक नहीं है.”
एक साल तक बीहड़ राजनीति में विचरण करते हुए, उन्होंने महसूस किया कि पार्टी के द्वारा निस्संकोच भाव से एक तरफा नीतियों का पालन किया जा रहा है.
“इसी बीच, राजीव प्रताप रूडी, जो कि उस समय मेरे अच्छे दोस्त थे, को दो साल के लिए राज्यसभा भेजा गया और लोकसभा का चुनाव लड़ने को कहा गया जबकि मैं वहीं था. जो राम के लिए गलत है वह श्याम के लिए सही कैसे हो सकता है?” उन्होंने सवाल किया. “लेकिन उसका कोई मतलब नहीं रहा और मैंने महसूस किया कि बहस थी कि ‘तुम मुझे आदमी बताओ मैं तुम्हें नियम दिखाता हूं.’ दुर्भाग्य से रूडी हार गए और रूडी की राज्यसभा सीट बरकरार रही. मैं वह नहीं कर सका.”
लगता है शस को इससे अधिक चोट लगी कि उन्हें कहा गया था कि उनका तीसरा सत्र रखा हुआ है जिसका मतलब हुआ कि यह उनके हाथ से अंतिम समय में राजनीति के छद्म खेल के कारण निकला.
उन्होंने कहा, “तीसरे सत्र के आने से पहले, मैं जसवंत सिंह के कार्यालय में राजनाथ सिंह से मिला था. उन्होंने मुझसे बाहर आकर बात करने का आग्रह किया और तब उन्होंने मुझसे पूछा कि राज्यसभा की दूसरी सीट जो खाली हो रही है उसके लिए कौन सही होगा. मैंने सीपी ठाकुर की सलाह दी. मैंने कहा, ‘वे अच्छे आदमी हैं लेकिन पहली सीट के बारे में क्या विचार है?’ उन्होंने सुस्पष्ट मुझसे कहा, ‘पहली सीट आपकी है उसपर कोई सवाल ही नहीं है.’ इसका मतलब है कि  आडवाणीजी ने जो मुझसे कहा उसके बाबजूद, तीसरी बार मुझे वह सीट देने का निर्णय लिया गया था. इस प्रकार एक राजनीति मेरे साथ लम्बे समय से खेली जा रही थी. मेरी अच्छी दोस्त सुषमाजी ने टेलिविजन पर कहा था कि शत्रुघ्न सिन्हा राज्यसभा में रहेंगें, वे हमारी पार्टी की संपत्ति हैं. मुझे विश्वास है कि 11:30 बजे सुबह तक उन्हें आश्वस्त किया गया था कि वह सीट मेरी है. लेकिन शाम में दो अलग लोगों को वे सीटें दे दी गईं. पार्टी में मतभेदों ने अपना सिर फिर से उठाया.”


कुछ समय के लिए, वे अस्थायी रूप से नरम हो गए जब, “आडवाणीजी ने मुझसे कहा कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए देश भर में किसी भी सीट को चुनने का हक होगा.”
लेकिन जब 2009 में टिकट बांटे जा रहे थे, तो उनके रास्ते में रोड़ा अटकने लगा. “सामान्यरूप से,” शस ने टिप्पणी दी. “मुझे बताया गया कि पार्टी के प्रख्यात नेता और वकील पटना-साहिब से चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन राज्यसभा में तीसरी बार जाने से जिस बुरी तरीके से रोका गया था कि उसकी वजह से वे इस बार किसी भी दबाब में झुकने को तैयार नहीं थे.”
शस ने सुविदित रूप से मामले को अपने हाथों में लिया और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पटना साहिब को अपनी सीट घोषित कर ली. “पार्टी कोई घोषणा करती उससे पहले ही सम्पतचक में, मैंने अपना प्रसिद्ध बयान दिया, ‘पटना साहिब मेरी पहली पसंद है, पटना साहिब मेरी दूसरी पसंद है और पटना साहिब मेरी आखिरी पसंद है.’”
इसकी वजह से पार्टी के अंदर खूब बबाल हुआ. यह कभी नहीं सुना गया था कि किसी उम्मीदवार ने अपने सीट का चयन और उसकी घोषणा बगैर पार्टी की सहमति और हरी झंडी मिले ही कर दी हो. “कुछ नीति-निर्धारकों को बुरा लगा कि बगैर कुछ कहे सुने ही मैंने अपने सीट की घोषणा कर दी.” उन्होंने ताना मारा.
नतीजा का प्रवाह किए बगैर, उन्होंने तेजी से आए प्रतिक्रियाओं का बखान किया. “उस समय राजनाथ सिंह ने मेरा समर्थन किया लेकिन खुलकर नहीं आए क्योंकि वे मौसमी राजनेता हैं जो कि अपना दांव चलने के लिए कुछ बचा कर रखते हैं. लेकिन सुषमा स्वराज उदारता से उनके समर्थन में आईं. उन्हें मेरे बारे में पता था जब वो टीवी पर कही, ‘हां, पार्टी ने उनसे वादा किया था कि वे अपनी पसंद से कोई भी सीट चुन सकते हैं. और यदि शत्रुघ्न सिन्हा ने पटना साहिब चुना तो पटना साहिब उनका है.’”
शस ने सुषमा स्वराज और उनके पति के प्रति अपने खास लगाव को स्वीकारा. “जब सुषमाजी और मैंने एक साथ फोटो खिंचवाई, हमलोग एक दूसरे को ज्यादे जानते थे और भाजपा को कम,” वे हँसे.
लेकिन संक्षिप्तता अधिक परिपक्व है,” वे किस तरह लगातार कमतर माने गए उसपर निगाह डालने से पहले उन्होंने स्वीकारा. “मुझे पटना साहिब सीट ना मिले इसके लिए काफी हाथ आजमाए गए लेकिन मैं कठोर बना रहा.”
2009 में उन्हें दिल्ली से टिकट देने की व्यवस्था की जा रही थी. “वे मुझे वहां से खड़ा करना चाह रहे थे जहां पार्टी दो लाख से अधिक वोट से हारी थी. आडवाणीजी ने भी मेरी पत्नी प्रोमि से कहा, ‘यदि वह पटना से खड़ा होगा तो हार जाएगा.’”
सच्चाई कुछ और थी.
2009 में भाजपा खुद सत्ता से बाहर हो गई लेकिन पटना साहिब में नहीं.

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