दीपक दक्ष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दीपक दक्ष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत.... दीपक दक्ष

 दीपक दक्ष के लेखन में एक अजीब आकर्षण है। इस बार उनकी कलम भोजपुरिया गीत के लिए चली है लोहा सिंह और खदेरन की मदर जैसे कालजयी चरित्र के बहाने ने। आप भी गौर करें।




लोहा सिंह ने खदेरन की मदर से कहा, बजने दो भोजपुरिया गीत....

......................................


लोहा सिंह----

अरे ओ खदेरन की मदर... तू हमरा नाक पोल पर कउवा के माफिक लोल चलाती है... अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही... ज्ञान की गगरी... चलाकी के चिलम... बजने दो भोजपुरिया गीत...


खदेरन की मदर--- 

अरे मार बढ़नी रे... पहिले दिन-  रात काबुल के मोरचा,  काबुल के मोरचा बउआते थे  अउर अब  भोजपुरिया गीत, भोजपुरिया गीत बउआ रहे हैं...सुनना है भोजपुरिया गीत त ईयर फोन लगाके सुनिए...कनखोसवा बटन लगाके...बुझाया... घर का संस्कार मत बिगाड़िये... घुटने में बुद्धि रह गया...? 


लोहा सिंह--- 

खदेरन की मदर मेरे महमण्ड को गरम मत करो...तुमको भोजपुरी मतलब  सिर्फ उहे सब बुझाता है... भोजपुरी मतलब खाली गंदे गीत होता है का....? 


खदेरन की मदर--- 

ना भोजपुरी मतलब रामायण होता है...पूरा रामायण... सीता जी कुटिया से गायब हुई थी....अउर तोहार भोजपुरी गीत सुन लइका सब रात में खटिया से गायब हो रहा है... सीता जी पुष्पक विमान पर देखी गई थी ...अउर  भोजपुरी सुन लइका सब मचान पर दिख रहा है...छि छि...लाजो नहीं लगता है... आजकल का भोजपुरी सुनने लायक है जी ? ठेला- रिक्शावाला का घर समझ लिया है  का... केतना शरम लगता है, जब टेम्पुआ में बजाता है...राम राम...ई सबको मारने वाला कोई नहीं है... भोजपुरिया समाज का मान  माटी में मिला रहा है  सब ...गायक कहलाता है और भोजपुरिया माई को गारी देता है...कानून बनना चाहिए...कोड़ा मारना चाहिए...दिमग्वे ठंडा जाएगा...


लोहा सिंह-----

ऐ फाटक बाबा !  हमको त बुझईबे नहीं करता है कि खदेरन की मदर मेम है कि मेमिन ...आप ही समझाइए... अभिव्यक्ति की आजादी कुछ होता है कि नहीं...


खदेरन की मदर-----

अरे मार बढ़नी रे... अभिव्यक्ति की आजादी  का मतलब अपना माई के गारी देना होता है का... समाज बिगाड़ना होता है का...


लोहा सिंह-----

अरे ओ अकिल की अलमारी... बुद्धि की बटलोही.... कभी दूसरा एंगल से भी सोचो... भोजपुरी वालों ने बमबईया ठसक की हवा निकाल दी है... अब गांव-गांव भोजपुरी बज रहा है... भांगड़ा के बदले भोजपुरी पर लोग झूम रहे हैं... बिआह चाहे रमुआ का हो या रोहन की... दुआरे बरियात समय बजेगा भोजपुरिए गीत...ई पंडित जी का मंत्र हो गया है... ओम नोम स्वाहा ...लॉली पॉप लागे स्वाहा...


खदेरन की मदर---

अरे मार बढ़नी रे...लाजो नहीं लगता है...गंदा गीत का पैरवी करते...?


लोहा सिंह----

अरे ओ चालाकी के चिलम ! अश्लीलता के नाम पर भोजपुरी को किनारे लगाने की कोशिश मत करो.... 


तुमको हिंदी में हम समझाता है ....सुनो


भोजपुरी गीत और भोजपुरी सिनेमा बर्बाद हो गया.... भोजपुरिया हीरो अउर आजकल के नौछटिया गायकों ने भोजपुरी का नाम डुबो दिया... यही कहना चाहती हो ना ... खूब गरिआओ ...मन भर कर गरिआओ... मैं भी तुम्हारे साथ- साथ अश्लीलता का विरोध करता हूं....

सचमुच,  इन्होंने अपने कुछ गानों से और कुछ  कारनामों से भोजपुरिया समाज का सिर झुकाया है... 


लेकिन कलेजे पर हाथ रखकर कहना कि क्या भोजपुरी सिनेमा के साथ कभी न्याय हुआ? क्या हिंदी सिनेमा के आगे हमारे समाज ने भोजपुरी सिनेमा को उस तरह  तवज्जो दिया? क्या किसी फिल्म समीक्षक ने भोजपुरी सिनेमा पर स्याही खत्म किया? हिंदी के अखबारों में भोजपुरी सिनेमा पर समीक्षा लिखी गई?  क्या पटना के सिनेमा हॉल मालिकों ने 12 से 3 भोजपुरी सिनेमा चलाने का साहस दिखाया?  कुणाल साहब भोजपुरी सिनेमा के महानायक हैं, लेकिन क्या हमारे समाज ने उनको अमिताभ वाला सम्मान दिया? 


बगैर गार्जियन का बेटा आवारा होता ही है... इसलिए हमारे भोजपुरी के नायकों में कुछ आवारगी दिखती है... लेकिन इन नायकों ने जो किया है,  वह अपने दम पर किया है... इन्हें तो डूब मरने के लिए दो दशक तक छोड़ दिया था, हमारे समाज ने... लेकिन वर्ष 2000 के बाद  भोजपुरिया युवा तन कर खड़े हो गए... और आज भोजपुरी का डंका बजा रहे...

जानती हो खदेरन की मदर, 

हिंदी फिल्मों के समर्थक  भोजपुरी फिल्मों को अश्लील मानकर ही चलते हैं... भोजपुरी शब्द सुनते ही नाक मुंह सिकुड़ते हैं ... लेकिन राज कपूर को हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा शो मैन कहते नही थकते  हैं... एक ऐसा शो मैन जो मंदाकिनी को राम तेरी गंगा मैली में सिर्फ एक साड़ी में नहाते हुए दिखाते हैं,मंदाकिनी का स्तन दिखता है... सिनेमा हॉल में सीटियां बजती है लेकिन यहां अश्लीलता नहीं दिखती... बॉबी में डिंपल कपाड़िया बिकनी में कहर ढाती हैं... मोहरा में रवीना टंडन मस्त मस्त लगती हैं... लेकिन  हिंदी सिनेमा वाले इन्हें अश्लील नहीं मानते, बोल्ड कह कर कॉलर टाइट करते हैं... भोजपुरी में पल्लू गिरा नहीं कि हीरोइन अश्लील ...फिल्म अश्लील...हीरो रोड छाप... गंवार

 तो भैया हमारे हीरो गंवार ही हैं।  गांव के गंवार .. .एक ऐसे गवार जिन्होंने नायक होने का मतलब बदल दिया है...


जी हां,  हमारा भोजपुरी का नायक सलमान की तरह मुम्बई का नहीं, गांव का है... पान की गुमटी पर पान लगाते हुए प्रेमिका के इंतजार में बैठने वाला प्रेमी है...हमारी नायिका कंगना की तरह कार में घूमने वाली नहीं... बल्कि एक कोको कोला से ही खुश हो जाने वाली है....(ये राजा छूटता पसीना.....) हमारी नायिका  दिल्ली-गुजरात- सऊदी अरबिया में मजदूरी करने वाले अपने पिया को याद करने वाली है... वह गाती है----- रेलिया रे हमरो के ओही देसे ले चल रे, पियवा बसेला जवना देस रे.... साहब !  आज भोजपुरी इंडस्ट्री ने जिस तरीके से गांव के युवकों को रोजगार दिया है... पहचान दिया है ...उसे आप इंकार नहीं कर सकते... आप तो इन्हें गंवार मानकर चल रहे थे...हैं न ? 


खदेरन की मदर---- 

अरे मार बढ़नी रे... कईसन कईसन तर्क गढ़ रहे हैं... ई कलमुहा सब देवर भौजाई के रिश्ता को बदनाम कर दिया.... रिमोट से लहंगा उठवा दिया... और का  का भयंकर भयंकर चीज करवा दिया..


लोहा सिंह-----

अरे ओ ज्ञान की गगरी! हम मानते हैं कि गंदगी फैला दिया, लेकिन अच्छाई भी देखो ...इनकी क्रिएटिविटी भी देखो.... कैसे-कैसे गीत गढ़  रहे हैं--- दिलवा ले  गइले राजा बोतल में भर के... हा हा हा


अरे ओ खदेरन की मदर कभी नजरिया फेर के तो देखो----आज के इसी भोजपुरी में मिसरी चैनल है... पुरबिया तान है... कल्पना पटवारी हैं ...चंदन तिवारी हैं... अलका पहाड़िया हैं... नीतू नवगीत हैं... मनोज भावुक हैं... मनोरंजन ओझा हैं... सत्येंद्र संगीत हैं... 


सबको एक ही लाठी मत हांको खदेरन की मदर... ई महेंदर मिसिर... भिखारी ठाकुर, विंध्यवासिनी देवी के भोजपुरी है... बुझ सूझ के बोला करो.... और बढ़िया गीत सुनल करो ... अठन्नी- चवन्नी,  टूटहा- भांगड़ा, छुरछुरी- पटाखा, हर काल में,  हर समाज में होते हैं... इसलिए उ सब को इग्नोर करो ... सुनबे मत करो... धीरज धरो, कानून बनेगा ... लफुआ सब पर सोटा चलेगा...टेंशन छोड़ बढ़िया गीत सुनो... गांव देहात के लइका सब एक से एक बढ़िया गीत लिख रहे हैं..... एगो दुगो गीत के नाम बता दे रहे हैं, सुन लेना मन हरिअर हो जाएगा.... और समझ में आ जाएगा कि आज बढ़िया गीत भी लिखा रहा है...


# नेहिया के फुलवा...

# पिया जी के मुस्की लागे लाजवाब...

# कहां बाड़ी धनिया हमार....


चलो खदेरन की मदर... इसी बात पर बजने दो भोजपुरिया गीत ...


अरे मार बढ़नी रे...


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

शराबबंदी पर लेख लिखें- दीपक दक्ष

यूं तो दीपक दक्ष पेशे से पत्रकार हैं लेकिन उनके साहित्यानुराग की गवाही उनकी कलम ही देती है। इनकी रपट भी इतनी सहज और आम बोलचाल के भाषा में होती है कि आपको अंदर तक गुदगुदा जाती है। एक बार फिर से जब शराबबंदी पर बिहार में बबाल मचा हुआ है तो दीपक दक्ष ने अपने अंदाज में शब्दों से खेलते हुए देखिए कि शराबबंदी पर कैसा लेख वो लिख गए हैं।




 शराबबंदी पर लेख लिखें...

........................................

               शराबबंदी

........................................

शराबबंदी एक आफत है। एक अप्रैल 2016 से बिहार में आयी है। इस आफत से पियक्कड़ सब हांफत है। हंफनी की बीमारी बढ़ती जा रही है। पियक्कड़ों का कहना कि  ई अजबे निर्णय है...गजबे निर्णय है... निर्णय हंगामा मचवाने वाला है..पटका पटकी करवाने वाला है...


  वास्तव में , शराबबंदी ने समाज के एक वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है । यह समाज बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन प्रभावी है। नशे में हल्ला मचाने के लिए कुख्यात है। इसे पियक्कड़ समाज कहते हैं। जब से शराबबंदी हुई है, तब से यह गम में डूब गया है। इस समाज के लोग पिटाइल प्रेमी की तरह सुथनी जइसा मुंह बना कर घूम रहे हैं। अकेले में बैठ कर अपनी प्रेमिका शराब को याद कर रहे हैं । गीत गा रहे हैं- तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है , ये माना कि महफिल जवां है, हंसी है.... जब से प्रेमिका से दूर हुए हैं , तब से अर्थशास्त्र का ज्ञान जागृत हो गया है। घर, समाज उजाड़ने वाला पुराना डाटा किनारे लगाकर,  नया डाटा पेश कर रहे हैं- 3 लाख से अधिक आदमी सुखले जेल में चल गया... 6000 दुकानें बंद हो गयी... शराब क्षेत्र का रोजगार घट गया... बेरोजगारी बढ़ गयी... सालाना 4000 करोड़ का नुकसान हो रहा है... शराब माफिया मालामाल है... पुलिस दारोगा धन्नालाल हैं....


दरअसल शराबबंदी शुरू होते ही पियक्कड़ समाज को अपनी  इमेज की  चिंता सताने लगी । इस समाज के विद्वतजन कह हैं कि

 हर दिन पियक्कड़ प्रतिभा की बेइज्जती हो रही है... कमर में रस्सा बांध के अउर फोटू खिंचवा के पेपर में छपवाया जा रहा है, ई बढ़िया बात नहीं है...पियक्कड़ प्रतिभा के साथ घोर अन्याय है...शादी विआह में दिक्कत हो रही है भाई...रस्सा बंधल फ़ोटो वायरल हो जा रहा है..  फ़ोटो देख अगुआ बिदक जा रहा है .... गुंजनवा के तिलक  में गजबे हो गया...रस्सा बंधल फ़ोटो तिलकहरु सब में बंट गया...बिआह कट गया.... लड़की के प्रेमी का चाल सफल हो गया यार....वास्तव में,  पियक्कड़ प्रतिभा को पटकने की यह बड़ी साजिश है... एक सोची-समझी चाल है... प्रतिभा कुचलने की चाल... पियक्कड़ जमात को हाशिए पर डालने की चाल...


पियक्कड़  संघ का कहना है कि शराबबंदी के कारण देश कमजोर हो रहा है।  कार्य क्षमता घट रही है। उदाहरण के लिए----- पत्रकार,   खुशवंत सिंह बनने से वंचित हो रहे हैं... इनके पास लिखने के लिए नया आईडिया नहीं आ रहा है... इनके बॉस भी नया आईडिया दे नहीं पा रहे हैं...  दिमाग की बत्ती जलाने के लिए बॉस को रात 11 बजे  का इंतजार करना पड़ रहा है।  फिर  भी पत्रकार वाला भूतवा नहीं जाग रहा है...


शराबबंदी के कारण  पार्टियों की इमेज पलटनिया मार रही है ।  पइसावाली पार्टी को लोग भिखमंगा झूठा पार्टी कह रहे हैं और नेताजी भी जान रहे हैं कि वोट की खरीदारी ठीक से नहीं हो पा रही है। वोटिंग प्रतिशत गिर रहा है।  रंगबाजी फीकी पड़ रही है। अगर यही स्थिति रही तो अगला चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।   काला धन वाला सूटकेसवा धरले रह जायेगा...


दूसरी तरफ साहब संघ का कहना है कि अफसरों की महफिल नहीं जम रही है...इट्स नॉट गुड... साहबी शान नहीं दिखा पा रहे हैं भाई...रात के अंधेरे में दुबक कर पीना पड़ रहा है भाई... नहीं तो हवाई जहाज पकड़कर दिल्ली जाना पड़ रहा है ...।


 कर्मचारी संघ कह रहा है कि जबरदस्ती झारखंड में जाकर काम चलाना पड़ रहा है....संडे वाली छुट्टी  जसीडीह जंक्शन पर बीत जा रही है ... 


डॉक्टर्स क्लब का कहना है कि आमदनी घट गई है। अस्पतालों में उल्टी, अनपच,घटना- दुर्घटना के मरीज कम पहुंच रहे हैं... मेडिकल क्षेत्र अब पहले जैसा नहीं रहा... 


 इंजीनियर- ठेकेदार की जोड़ी कह रही है कि अब पहले जैसी पटरी नहीं बैठ रही है...एक-दूसरे को पटाने में परेशानी हो रही है... हां  बहुते परेशानी हो रही है...एक बोतल शराब की कीमत आप क्या जानोगे रमेश बाबू...


जब से शराबबंदी हुई है कलाकार संघ भी सदमे में है। दिन-रात बस एक ही गीत गा रहा है- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे,  मरने वाला कोई जिंदगी चाहता है जैसे.... आ भी जा आ भी जा....


अंत में कहा जा सकता है कि बिहार ज्ञान की भूमि है। बुद्ध,  महावीर की भूमि है। जेपी की भूमि है। विद्रोह की भूमि है। कुरीतियों के खिलाफ तन कर खड़े होने वालों की भूमि है। शायद इसीलिए शराबबंदी की गई है। 

 लेकिन शराब बंदी के बहाने संस्कारी पियक्कड़ समाज को हतोत्साहित किया जा रहा है। शराबबंदी ने  पियक्कड़ वर्ग को झकझोर कर रख दिया है । पियक्कड़ों पर केंद्रित पार्टियों की पहचान संकट में है। वोटिंग का गणित गड़बड़ा गया है। 


 नवही लइकन को  एंग्री यंग मैन बनने से रोक दिया है।  बरात की शान घट रही है।  नागिन डांस, अजगर डांस में बदल रहा है...गोली-बंदूक की बिक्री घट रही है। सामियाना में छेद नहीं हो रहा है। चखना का व्यापार मंदी की मार झेल रहा है ....


दूसरी तरफ कोई राजा राममोहन राय की तरह आगे बढ़ रहा है .... विरोध की परवाह नहीं कर रहा है ...अर्ध नंगे फकीर के विचारों के साथ चल रहा है... क्योंकि अर्धनंगे फकीर ने भी एक बार कहा था--- अगर मुझे एक दिन के लिए तानाशाह बना दिया जाए तो एक झटके में देश के सभी शराब दुकानों को बंद करा दूंगा.... वहीं पियक्कड़ समाज प्रेमिका शराब की याद में आंसू बहाते हुए गा रहा है---

मुझको ये तेरी याद क्यों आती है/ इतना बता मुझको ये क्यों सताती है....


दीपक दक्ष के फेसबुक वॉल से साभार।