बंद कमरे की रोशनी : बेपर्द करती कहानियां (पुस्तक समीक्षा)
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सुशील
कुमार भारद्वाज
जिंदगी निर्मम स्वार्थ
और झूठे अहम के बीच जिस विद्रूप समाज में जीने को विवश करती है उसी समाज का आईना
प्रस्तुत करता है कथाकार हनीफ मदार का कथा-संग्रह “बंद कमरे की रोशनी”. आशावादी
दृष्टिकोण से रची गई ग्यारह कहानियों को इस संग्रह में प्रस्तुत किया गया है.
हनीफ मदार की इन
कहानियों में क्रांति का एक स्वरूप देखने को मिलता है. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक,
धार्मिक और नैतिक रूढ़िवादी परम्पराओं की प्रताड़नाओं से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ
संघर्ष करती स्त्रियां अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश करती हैं. कहानी की
नायिकाएं पुरुष सत्ता के एहसानों तले दबने की बजाय अपने वस्तुपरक तर्कों से मुखर
होकर अपने अधिकारों की मांग करती हैं. “दूसरा पड़ाव”, “एक और रिहाना नहीं”,
“चरित्रहीन” और “अब खतरे से बाहर हैं” आदि कहानियां इनकी गवाह हैं. जबकि “पदचाप”
और “तुम चुनाव लड़ोगे” जैसी कहानियों में पुरुषों के प्रतिकूल परिस्थिति में
लड़खड़ाते कदमों को मजबूती देती नारियों का स्वरूप नज़र आता है.
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| हनीफ मदार |
संग्रह की पहली
कहानी “पदचाप” पीतपत्रकारिता के साथ-साथ पुलिस प्रशासन की कारगुजारी पर करारी चोट
करती है. कहानी यह भी दिखाती है कि कैसे सामंतवादी सोच के लोग भोले-भाले लोगों का
जमीन हड़पने और उनलोगों को बंधुआ मजदूर बनाये रखने के लिए बालश्रम आदि कानूनों की
आड़ में क्या–क्या साजिश रचते रहते हैं?
“तुम चुनाव लड़ोगे!”
में स्पष्ट दिखता है कि समाज के होशियार प्राणी किस प्रकार निरीह इंसान पर चुनाव
आदि मसलों में अपनी मर्जी जबरन जाति- धर्म के नाम पर लाद देते हैं. साथ देने के
वक्त पीछे हटने लगते हैं और किस प्रकार सत्ता लोभ के दलदल में फंसने पर सिर्फ
असामाजिक तत्व अपनी घुसपैठ कर उनके घर के वातावरण को अपने कर्मों से दूषित करने
लगते हैं?
“दूसरा पड़ाव” मनुष्य
के अवसाद और कुंठा पर करारी चोट करती है| शालिनी जब कला के लिए कदम बढाती है तो
सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष उसके सामने आते हैं. लेकिन नाटक मण्डली का ही साथी और
बाद में जीवन-साथी रवि अपने अंदर दबे रूप को हारे हुए इंसान की तरह बाहर लाते हुए जब
पति होने का एहसास कराता है, तो कला के नाम पर मण्डली में समाये काले भेडिये का एहसास
होता है. अवसाद ग्रस्त रवि जब राजनीति का सहारे लेकर शालिनी को परेशान करता है तब
भी वह बगैर अपना तमाशा बनाये जहर का घूंट पीते हुए अपने मिशन के साथ आगे बढती रहती
है.
“बंद कमरे की रोशनी”
फिजूल के सांप्रदायिकता कट्टरता पर चोट करती है. जहाँ धर्मानुसार विषय का चयन नहीं
करने पर जीवन में बहुत सारी भौतिक सुखों से हाथ धोना पड़ता है वहीं पूर्वाग्रह से
ग्रस्त लोग जिस पुजारी की प्रशंसा करने से नही थकते थे वही नाम मात्र के भेद पर
उबाल खाने लगते हैं.
जबकि “एक और रिहाना
नही” में रिहाना अपने माँ की वैवाहिक-जीवन की दुर्गति और पिता के अमानवीय रूप को
देखकर विवाह जैसी संस्था में अपना विश्वास खो देती है. लेकिन जब सामाजिक दबाब में
अपने जीवन की शुरुआत करती है तो पहले ही पग से ऐसे हालत से रुआबरू होना पड़ता है कि
वह खुद को फिर से इससे अलग होकर रहने का एलान कर देती है कि एक और रिहाना की जरुरत
नहीं है, जो की समाज में नारी दुर्दशा को बहुत ही करीने से उभरता है.
“चरित्रहीन” में एक
आदमी के मानसिक दिवालियापन को बखूबी उकेरा गया है. स्पष्ट किया गया है कि
अवसादग्रस्त व्यक्ति भावनात्मक असुरक्षा में किस प्रकार का कदम उठा लेता है? चरित्रहीन
जैसे शब्दों से आत्मा तक बिंध चुकी सरला आखिर अपने कुंठाग्रस्त प्रेम-प्रस्तावक
रामप्रकाश से पूछ ही लेती है कि क्या उसके प्रेम को ठुकराना ही उसके चरित्रहीन
होने का पैमाना है?
इन सबसे अलग “रोजा” धोखे
के धार्मिक पाखंड को तमाचा है. आखिर उलाहना का वाजिब हक़दार कौन है? – वो जो ईमान
से मानता है कि जीवन के इस जटिलता में रमजान के पावन महीने में रोजा पल-पल खंडित
होता है या वो जो दिखाने के लिए रोजा तो रखे लेकिन उनके टूटने का गम तक उसे ना हो?
“उद्घाटन” जैसी
कहानी मानवीय सम्बन्ध और धर्म के नाम पर होते संघर्ष के बीच पनपे अविश्वसनीय रिश्ते की पोल खोलता है.
जहाँ कथाकार “चिंदी–चिंदी
ख्वाब” में अमानवीय होते रिश्ते को दर्शाने की कोशिश करता है. अपने सारे अरमानो को
तिलांजलि देकर माता–पिता जिस बेटे को डाक्टर बनाते हैं, वही दीपक धन और नाम के मद
में अपने माता-पिता के होने मात्र से हीनभावना से ग्रस्त दिखता है. और ऐसी स्थिति
में असाध्य रोग से लगातार संघर्ष करते माता –पिता बेटे के इस व्यवहार को देखकर दम
तोड़ देते हैं तो अनुचित क्या है? वहीं “अनुप्राणित” में नैतिक, जातीय और सामाजिक
बंदिशों के बीच टूटता इंसान अपने अस्तित्व को प्रेम के सहारे तलाशने की कोशिश जारी
रखता है.
संग्रह के अंतिम
कहानी “अब खतरे से बाहर हैं” में एहसान के चादर तले खान साहब जब इस्लाम की बात कह
स्त्रियों को शिक्षा से दूर रखने की साजिश करते हैं तो परवीन जैसी बहुएं उनकी
सच्चाइयों को बेपर्द करने से नही चुकती हैं. नारी शिक्षा और कठमुल्लों के संघर्ष
को यह कहानी स्पष्ट करती है.
जिंदगी जीने के दो
ही विधि हैं – एक जिंदगी जिस रूप में है उसे उसी रूप में स्वीकार करना और दूसरा
रास्ता है – पलायन का. लेकिन हनीफ मदार की कहानियों के पात्र पलायन नही करते हैं
बल्कि बंद कमरे की रोशनी में अपने अस्तित्व के सच और झूठ से जूझते नज़र आते हैं.
हनीफ मदार की खासियत है कि वे कहानियों को यथार्थ के रुखड़ी जमीन पर रगड़ने के
बाबजूद आशावादी दृष्टिकोणों के साथ एक नए बदलाब के साथ क्रांति के लिए प्रेरित
करते हैं. वे कहानियों में कुंठा, अवसाद, और स्वार्थ जैसी मानवीय प्रवृत्तियों के
सहारे आर्थिक गैरबराबरी , जातीय दंश, धार्मिक उन्माद और रूढ़िवादी परम्पराओं के साथ
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के संघर्ष को दिखाते हैं.
जहाँ लेखन शैली में
पाठकों को बांधे रखने की क्षमता है वहीं ग्रामीण परिपेक्ष्य में रची इन अधिकांश
कहानियों में शब्दों का चयन और क्षेत्रीय बोली(ब्रजभाषा) की मिठास इसे और भी खास बनाती है. कहानियां आपको
अंत में सोचने को विवश करती हैं कि हम कैसे मनुष्य हैं? हमारा मानवता के प्रति
क्या दायित्व है? और यही इस कथा-संग्रह की सफलता भी है.
पुस्तक – बंद कमरे की रोशनी,
लेखक – एम० हनीफ
मदार
प्रकाशक –उद्भावना,
गाजियाबाद,
पृष्ठ – 135, मूल्य
-125/-
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