लौकिक सीता का
मानवीय स्वरूप है आशा प्रभात की मैं जनक नंदिनी
सुशील कुमार भारद्वाज
इन दिनों जिन
किताबों को मैंने पढ़ा, उनमें से एक है – आशा प्रभात की कृति “मैं जनक नंदिनी”. आशा
प्रभात ने इस उपन्यास में सीता के दृष्टिकोण से सीता के जन्म से अंतकाल तक की लगभग
सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को जिस मानवीय एवं लौकिक धरातल पर तर्क के साथ तेंतालीस
अध्यायों में प्रस्तुत करने की सफल कोशिश की है वह काबिलेगौर है.
रामायण के विभिन्न
पात्रों की ही तरह सीता पर केंद्रित अनेक किताबें पहले भी लिखीं गईं हैं लेकिन अधिकांश
में उन्हें राम की अर्धांगिनी के रूप में प्रस्तुत किया गया है या फिर लक्ष्मी के
अवतार के रूप में. दूसरे शब्दों में कहें तो वहां भक्ति और श्रद्धा की भावना प्रबल
थी जिसकी वजह से उनके सुख-दुःख को महज एक लीला मानकर सहजता के साथ स्वीकार कर लिया
गया. सीता के मौन को आज्ञाकारिणी के रूप में प्रस्तुत किया गया. श्रीराम को
मर्यादापुरुषोत्तम करार देने के लिए धर्म के नाम पर किए गए अव्यवहारिक कार्य में
सीता के प्रतिरोधी स्वर को गौण कर दिया गया. और राम के हर निर्णय में अविवेकी रूप से
उनकी सहभागिता और समर्थन मान लिया गया. मर्यादा पुरुषोत्तम राम के निर्णय पर
अंगुली उठाना भी इतना आसान नहीं. लेकिन बहुत कम लोगों ने सीता को एक इंसान के रूप
में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. जिसके अपने दर्द थे. जिसके अंदर भी कोमल
भावनाएँ थीं. जो हर सुख-दुःख में मचलती थी. भटकती थी. और फिर नियंत्रित कर ली जाती
थी. लोक समाज के अनुरूप व्यवहार करती थी. जिसमें उसका स्वाभिमान भी थक कर आहत होता
था. लेकिन वह झुकती नहीं थी. वह याचक बनने की बजाय लव-कुश को अयोध्यनरेश के हवाले
कर न सिर्फ अपने पति का परित्याग करती है बल्कि खुद को भी इस मृत्युलोक से
स्वतंत्र कर लेती है. एक आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू और यथासंभव एक आदर्श
माँ बनकर एक आदर्श स्त्री के प्रतिमान को स्थापित करने की कोशिश करती है.
युगानुरूप स्त्री मुक्ति का द्वार खोलती है.
आशा प्रभात ने अपनी
लेखनी से सीता के आचरण, त्याग, स्वाभिमान, कर्तव्य, पराक्रम और चारित्रिक गुणों को
बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की है. साथ-ही-साथ उन्होंने इस उपन्यास
में कौशल्या, तारा और मंदोदरी आदि के सहारे विभिन्न राजघरानों की तत्कालीन स्त्रियों
के दुःख-दर्द और सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश की है तो जंगल में रह
रहीं वन-वासिनों के सहारे सामान्य जीवन में स्त्रियों की शक्ति और परिस्थिति को
भी.
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| आशा प्रभात |
उपन्यासकार ने
हनुमान के समुद्र पार कर लंका पहुंचने की घटना को जिस व्यावहारिक तर्क के साथ
प्रस्तुत किया है उसी तर्क के साथ वनवास मिलने पर राम के दक्षिण दिशा की ओर रूख
करने और जंगलों में रह रहे ऋषि-मुनियों एवं वनवासियों की समस्याओं को दूर करते हुए
एकछत्र राज्य हेतु साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को भी.
आशा प्रभात ने सीता
को एक सामान्य स्त्री के रूप में विभिन्न मनोभावों के साथ मानवीय गुणों एवं
अवगुणों के आवरण में प्रस्तुत किया है. साथ ही उन्होंने जहां मिथिला के ऐतिहासिक सांस्कृतिक
गौरव को उकेरने की कोशिश की है वहीं रामायण के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से
तत्कालीन देशकाल को भी दिखाने की कोशिश की है. लेकिन इसे पूर्ण रामायण नहीं माना
जा सकता है क्योंकि यह न सिर्फ सीता के दृष्टि से लिखी गई है बल्कि सामान्यतौर पर
रामायण के उन्हीं प्रसंगों को लिया गया है जिसमें सीता की सहभागिता रही है. यहां
तक की सीता के मौत के साथ ही किताब भी समाप्त हो जाती है.
कायाप्रवेश के अंदाज
में सीता को आत्मसात कर उसके सघन एवं सूक्ष्म भावना को जिस सहजता और धैर्य के साथ
प्रस्तुत किया गया है उससे इस कृति के पीछे उपन्यासकार का किया गया श्रम स्पष्ट
परिलक्षित होता है. उपन्यास की घटनाएं जितनी रामायण सम्मत हैं इसकी भाषा उतनी ही
संस्कृतनिष्ठ है. तत्सम शब्दों की अधिकता की वजह से उपन्यास जितना भी स्तरीय या गंभीर
दिखे लेकिन यह पठनीयता में न ही कहीं बाधक है ना ही यह कहीं बोरियत का एहसास कराती
है. लेकिन कहीं-कहीं ऐसा जरूर महसूस होता है कि कुछ घटनाओं को थोड़ी हडबडी के साथ
समेट दिया गया जबकि वहां भी यथोचित उदारता की जरूरत थी. अलौकिक कथा को लौकिक कथा
के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है लेकिन संवाद में कहीं भी क्षेत्रीय
भाषा अर्थात देशकाल के अनुरूप लोकभाषा का प्रयोग दिखाई नहीं देती है जो स्वाभाविकता
की क्षति है.
पुस्तक :- मैं जनक
नंदिनी
रचनाकार :- आशा
प्रभात
प्रकाशक :- राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ :-320
मूल्य :- 299
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