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सोमवार, 26 जून 2017

दूसरा शनिवार में शिवदयाल (रपट): नरेंद्र कुमार









दिनांक 24.06.2017 शाम 5 बजे 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में साहित्य सुधीजन प्रिय कवि शिवदयाल को सुनने हेतु उपस्थित थे। गांधी मैदान का वातावरण मानो काव्य-पाठ के लिए ही आमंत्रित कर रहा था। गोष्ठी में अस्मुरारी नंदन मिश्र, राजकिशोर राजन, सुजीत वर्मा, प्रत्युष चंद्र मिश्र, हरेन्द्र सिन्हा, अरुण शाद्वल, मधुरेश नारायण, कुमार पंकजेश, मुकेश प्रत्यूष, अनिल विभाकर, भगवती प्रसाद द्विवेदी, जयेन्द्र सिंह, प्रभात सरसिज, डॉ निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, अशोक जंगबहादुर, राजेश शुक्ल, शिव पुरी, एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कवि ने 'नाव', 'खोज', 'कवि ने लिखी कविता', 'बेवजन', 'अपने को देखना', 'अकिलदाढ़', 'घोंघा', 'ताक पर दुनिया', 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग', 'मीनू मैम का पर्स', 'मीनू मैम की हँसी', 'मीनू मैम की बिंदी', 'खरीददारी', 'आने वाले दिनों में', 'चादर', 'शरणार्थी बच्चा' एवं 'लिफाफा' शीर्षक से कविताएं सुनाई। कविताएं श्रोताओं से सीधे संवाद कर रही थीं।

काव्य-पाठ के बाद हुई चर्चा में सुजीत वर्मा का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं एक तेवर की नहीं हैं तथा उनमें गंभीरता के साथ संवेदनशीलता है। 'नाव' कविता संवेदनशील है, वहीं 'घोंघा' शीर्षक कविता अस्तित्ववादी है। 'खोज' शीर्षक कविता में यांत्रिक युग में मनुष्यता की खोज की बात कवि कहते हैं। विषयवस्तु, भाषा, संरचना एवं शैली के स्तर पर कविताएं लाजवाब हैं तथा उनमें चेतना का गंभीर अंतरप्रवाह स्पष्ट दिखता है। अरुण शाद्वल का कहना था कि शिवदयाल की कहानियों, उपन्यासों एवं कविताओं में आदमी का संघर्ष स्पष्ट दिखता है। इनकी रचनाएं सामान्य चीजों को विशेष बना देती हैं।




शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए डॉ निखिलेश्वर वर्मा का कहना था कि कविता के गुणों के साथ कवि पाठक तक पहुंचते हैं। विषय के हिसाब से शिल्प अपनाते हैं। अशोक जंगबहादुर का कहना था कि कवि की रचनाएं समाज का दर्पण है। आगे कुमार पंकजेश ने कहा कि कवि के लिए विषय ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। उनकी कविताएं समस्या के साथ समाधान की बात करती हैं। मुहल्लों और घर की चीजों से लगाव के कारण कवि 'गर्दनीबाग' एवं 'ओसारा' जैसी कविताएं रचते हैं। अपनी रचनाओं में कवि बिना लाग-लपेट अपनी बात कह जाते हैं।

अनिल विभाकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कवि का ध्यान रोजमर्रे की चीजों पर है। झूठी शानो-शौकत पर कवि कटाक्ष करते हैं। संवेदना के स्तर पर कविताएं बढिया हैं, पर कुछ कविताओं को और खुलना चाहिये था। भगवती द्विवेदी का कहना था कि शिवदयाल मूलतः कवि हैं। सभी कविताएं अनुभूतिपरक लगीं...सीधे संवाद करती हुई। संवेदना को झकझोरती हुई कविता 'गर्दनीबाग' सांस्कृतिक क्षरणशीलता को व्यक्त करती है। प्रत्यूष चंद्र मिश्र ने कहा कि किसी रचनाकार की रचनाओं में स्मृतियों का कोलाज़ नहीं बनता है तो लगता है कि रचना में कुछ कमी रह गयी हैं। 'गर्दनीबाग' कविता में कवि अपनी निजी स्मृतियों को सामूहिक स्मृतियों में तब्दील कर देते हैं।


जयेन्द्र सिंह कविताएं सुनते हुए अभिभूत थे। उन्होंने कहा कि शिवदयाल कुल मिलाकर एक सजग साहित्यकार हैं और वे एक श्रोता। प्रभात सरसिज ने कहा कि कवि की रचनाओं में सम्यक दृष्टि है, करुणा है, बस गुस्सा नहीं है। कविताओं में अवधि-विस्तार दिखता है। राजेश शुक्ल का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं मानस में अंकित रह जाती हैं। वे सही मायने में एक पूर्णकालिक लेखक हैं।

अस्मुरारी नंदन मिश्र ने कहा कि आज बहुत-कुछ छूटता जा रहा है। इस उपेक्षा से संवेदनशील मन में जो पीड़ा उपजती है, वह कवि की रचनाओं में आ गयी हैं। शिवदयाल ईमानदारी के चुकने की बात करते हैं तथा छूटती चीजों के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कविताओं में जो व्यंग्य है, वह महीन है तथा भीतर तक प्रभावित करती हैं। हरेन्द्र सिन्हा का कहना था कि संवेदनहीनता आज सबसे बड़ा संकट है। शिवदयाल के व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म में संवेदना समाहित है। इनकी कविताएं सुनने के पश्चात तनाव खत्म होता है।


मधुरेश नारायण ने कहा कि शिवदयाल की कविताएं पाठकों एवं श्रोताओं से सीधे जुड़ती हैं तथा घर के अंदर-बाहर की छोटी-छोटी चीजों पर बात करती हैं। मुकेश प्रत्युष ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि कवि सीधे अपना पॉलिटिक्स जाहिर करते हैं...कोई छुपाव नहीं। कवि का काम समाज के सत्य को सामने लाना है। समय के सत्य को उजागर करने से बचने की कोशिश में कितने कवि अप्रासंगिक होते चले जाते हैं। 'घोंघा' कविता में इसी अस्तित्व की असुरक्षा की बात कवि करते हैं।

 राजकिशोर राजन ने कहा कि समकालीन कविता दवाब में लिखी जा रही हैं। नये युवा कवि आलोचकों की पसंद पर कविताएं लिख रहे हैं। शिवदयाल की यात्रा कथा से कविता के बीच होती रहती है। उनकी कविताओं की भाषा, शिल्प और विषय अपने समकालीन कवियों से भिन्न है। यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कवि अपने रचनाकर्म को ले कर कितना गंभीर है। बिना लंबे संघर्ष के इस स्तर पर आप अलग से रेखांकित नहीं हो सकते। शिवदयाल जी की कहानियां भी शिल्प और कहन के स्तर पर हिंदी में अपनी अलग पहचान बनाती हैं। वहीं कुछ रचनाओं में वैचारिक दवाब के कारण हृदय पक्ष मौन हो गया है।नरेन्द्र कुमार ने शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए कहा कि कवि विषय-वस्तु की तलाश में दूर नहीं जाते, बल्कि अपने आस-पास ही नजर दौड़ाते हैं। रचनाओं में कोई चमत्कार करने का प्रयास नहीं...भाषा की क्रीड़ाओं में उलझने की कोई इच्छा नहीं। उनकी कुछ लंबी कविताओं में उनकी औपन्यासिक प्रवृति स्पष्ट दिखती है।

शिवदयाल का अपनी कविताओं के संदर्भ में कहना था कि उन्होंने कहानी एवं उपन्यास के वनिस्पत कविताओं पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि चाहिए। आज कविताओं पर हुई चर्चा से मैं अभिभूत हूं। 'दूसरा शनिवार' के सद्प्रयासों के प्रति उन्होंने शुभकामनाएं व्यक्त की। अगली गोष्ठी में मुकेश प्रत्यूष के एकल काव्य-पाठ का निर्णय लिया गया। अंत में प्रत्यूष चंद्र मिश्र द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

रविवार, 21 मई 2017

दूसरा शनिवार पर नरेंद्र कुमार की रपट

दिनांक 20.05.2017 शनिवार, शाम 5 बजे। पटना में सीजन का सबसे गर्म दिन―तापमान 42.2℃ था। ऐसी गर्मियों में जब महा जनकवि बिना वातानुकूलित हॉल के किसी भी गोष्ठी का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते, हमलोग खुले वातावरण में गाँधी मैदान की गाँधी मूर्ति के पास कवि राकेश प्रियदर्शी को सुनने के लिए उपस्थित थे। संजय कुमार कुंदन, भावना शेखर, राजकिशोर राजन, प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, समीर परिमल, डॉ सुजीत वर्मा, रामनाथ शोधार्थी, हेमंत दास 'हिम', कुमार पंकजेश, शशांक, अमरनाथ झा एवं नरेन्द्र कुमार 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में सम्मिलित हुए। भावना शेखर की उपस्थिति गोष्ठी की उपलब्धि रही। कवि राकेश प्रियदर्शी ने 'पिता का चश्मा', 'एक युग का अवसान', 'नदी', 'कागज बिनता बच्चा', 'इतिहास' (मगही एवं हिंदी), 'जहाँ प्रेम तड़प रहा है', 'लोमड़ी', 'पालतू कुत्ता' (मगही एवं हिंदी), 'मुक्तिपथ', 'मछली', 'घास और बकरी', 'साँप', 'हर्ष-विषाद' एवं 'असफ़लता' शीर्षक वाली कविताएं सुनाई।


राकेश प्रियदर्शी को सुनना जीवन को सुनना था। कवि की सरलता एवं सहजता उनकी रचनाओं में पिरोई हुई थी, पर भाव एवं अर्थ में कई गूढ़ बातें उद्घाटित कर रही थीं। कविता-पाठ के उपरांत कुमार पंकजेश का कहना था कि कवि की रचनाएं सरल एवं सुगम हैं। इन्हें सुनने के लिए कोई माथा-पच्ची करने की जरूरत नहीं पड़ती। सुनने के उपरांत श्रोताओं के मन में अपना बिंब छोड़ जाती हैं। कविताओं में आम आदमी की तकलीफ है तथा कई कविताएं व्यंग्य शैली में लिखी गयी हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। हिम दास 'हिम' का मानना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं लोकभाषा में मुखर होती हैं। पालतू कुत्ता शीर्षक वाली कविता व्यंग्यात्मक शैली में बहुत असरदार है। वे रचनाओं में मुहावरों का प्रयोग करते हैं तो कई मुहावरे गढ़ भी लेते हैं। रामनाथ शोधार्थी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सभी कविताएं अच्छी लगीं। शब्दों का चयन एवं संयोजन बेहतरीन है तथा कविताएं अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।



संजय कुमार कुंदन ने दूसरा शनिवार का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राकेश प्रियदर्शी जैसे लो-प्रोफाइल कवि को एकल-पाठ के लिए चुनना सार्थक रहा। कवि जितने सीधे एवं सरल हैं, कविताएं भी वैसी ही दिख रहीं हैं पर असीम गहराई लिए हुए है। बिंबों का अद्भुत प्रयोग उनकी कविताओं में है। समीर परिमल कविता-पाठ से सन्तुष्ट दिख रहे थे। उनका कहना था कि सहज-सुबोध कविताएं प्रभावित कर गयीं। प्रत्यूष चन्द्र मिश्र ने कहा कि इतना सहज-सरल कवि आज के साहित्यिक समाज में हाशिये पर क्यों है जबकि कवि का दो संग्रह आ चुका है। कविताएं प्रचलित फॉर्मेट में रची गयी हैं तथा लयात्मकता इनकी विशेषता है। भावना शेखर ने दूसरा शनिवार में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की तथा कविताओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरल-सुबोध कविताएं समय के माकूल हैं तथा समाज की समस्याओं  को हौले-से छू जाती हैं। इन कविताओं में तपन है। सुजीत वर्मा ने "कविता जीवन की आलोचना होती है" उद्धृत करते हुए कहा कि राकेश जी की कविताएं सीधे मन में उतरती हैं।

नरेन्द्र कुमार ने कहा कि कवि की रचनाओं में दो तरह के भाव आये हैं। एक तरफ वे समय एवं समाज की विद्रूपता को अपने व्यंग्यात्मक लहजे में पुष्ट करते हैं, वहीं प्रेम या अन्य संबंधों पर रची कविताएं उनकी सहज एवं घनीभूत संवेदना को पूर्णता में व्यक्त करती हैं। जहाँ तक आलोचकों का ध्यान न जाने का प्रश्न है तो आज अधिकांश रचनाकारों के अपने आलोचक हैं तो आलोचकों के अपने रचनाकार। इसमें सीधे-साधे एवं इन छद्मों से अलग रचनाकारों को हाशिये पर डाल ही दिया जाता है। आलोचकों को रचनाओं में चमत्कार दिखाना होता है। शशांक ने कहा बांग्ला एवं तमिल साहित्य में रचनाकर पाठकों से सीधे जुड़ते हैं क्योंकि वे स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं। आज की कविताएं सीधे श्रोताओं तक पहुंची हैं। राजकिशोर राजन का कहना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं सहजता की साधना है और इसी कारण साहित्यिक समाज में अलक्षित रह गयी हैं।

चर्चा के उपरांत सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाएं सुनाईं। उसके बात चाय एवं बतकही का एक और दौर बिस्कोमान भवन के पास।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

नरेंद्र कुमार की कुछ कविताएं


युवा कवि नरेंद्र अपनी रचनाओं में मानवता और संवेदना को समेटने की कोशिश करते हैं। दर्द चाहे अपने अतीत का हो या विस्थापन का, वह कहीं- न-कहीं परिलक्षित हो ही जाता है। पढ़ते हैं नरेंद्र कुमार की कुछ कविताओं को।


1. भूख और शोक
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जी बाबू !
यह जय भारत बैंड है

अगर हमारा संगीत
आपको उत्साहित कर देता है
उमंग से भर दे रहा है
तो सुनिए...

यह हम सबका भूख और
शोक है
जो आपको ठुमके लगाने को
बाध्य कर दे रहा है
समझे कि नहीं...

जान लीजिए बाबू
जैसे ही हम
अपने भूख और शोक से
उबर लेंगे
हम विस्मृत हो जायेंगे

पर एक जीवन होगा
हमारे भी पास
थोड़ा-बहुत हम भी थिरक लेंगे
जो आप नहीं देख पाएंगे ... ...

2. लुका–छिपी
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बिटिया ...
घर से निकलती है
घूम-घाम
वापस आ
पिता की आँखों में
ढूंढती है कुछ...

पिता भी लौटे हैं अभी
बिटिया को अपनी ओर
गौर से ताकते देख
चौंकते नहीं
बस, हौले–से मुस्कुरा देते हैं
हाँ..!
शुरू में चौंके थे जरूर

उन्होंने भी
महसूस किया है इधर ...
कि बिटिया की आँखों ने
देखना अधिक,
बोलना कुछ कम कर दिया है

3. सफ़र में
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सफ़र में
गुमसुम बैठी वह
क्या सोच रही है ?
बीतते समय का सच !
या कुछ निज़ी ...

बीच-बीच में
सेलफोन पर
बतियाती...
अपने होने को
बयां कर रही है
विस्तार से... ...

4. अबकी मेले में देखा
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अबकी मेले में देखा
कई औरतें
नंगी हुई जाती थीं
दुनिया के सामने
चेहरे पर बेहयाई पोते..!

परदा गिरते ही पर
भागती थीं आप–से–आप
हांए-हांए बिलखते
नवजातों को चिमटाए
एक झटके में ही छाती खोलतीं
उनकी धुकधुकी को
खुद में समेट
फिर-फिर
बिसूरकर रोती !

अबकी मेले में देखा..!

5. अपना शहर
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मेन रोड पर
दिखती नहीं अब
चाय की दुकानें
दोस्तों के ठहाके
अखबार पढतीं
अलसाई आँखें

मूक और शिष्ट-से
खङे हैं कतारों में
जगमगाते रेस्तरां
मॉल और मल्टीप्लेक्स

कहाँ बचा है जीवन ?
कहाँ गए वे लोग ?
पूछने पर वह भौंचक
आँख फाड़े..!
शायद नया है शहर में
या है कोई अपना-सा
जिसे मैं ढूंढ रहा इस घड़ी
बेचैन..!

बेज़वाब..!
वह तेजी से आती
सिटी बस में लटक लेता है
और मैं भी...
गुम होता जा रहा हूँ
भीड़ में कहीं



 नाम - नरेन्द्र कुमार,
जन्म - 06.06.1980
शिक्षा - एम0ए0 (हिन्दी)
प्रकाशन - विभिन्न पत्रिकाओं एवं दैनिकों में कुछ रचनाएं प्रकाशित।
सम्प्रति - सरकारी सेवा
सम्पर्क :
मो0 - 9334834308
ई-मेल – narendrapatna@gmail.com
   

रविवार, 18 सितंबर 2016

नई साहित्यिक पहल दूसरा शनिवार

बिहार की राजधानी पटना हमेशा से साहित्य के केंद्र में बना रहा है। आयोजित-प्रायोजित अथवा नि:स्वार्थ भाव से कोई न कोई साहित्यिक गतिविधि छोटे अथवा बडे पैमाने पर होते रहे हैं। एक बार फिर जब पटना में "विश्व कविता सम्मेलन" का आयोजन होने जा रहा है तो बहसों का एक लम्बा दौर शुरू हो गया है जहाँ आप सबकुछ निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक होने की बात नहीं सोच सकते हैं तो वहाँ प्रस्तुत होने वाली कविता पर अभी क्या कहा जाय? खैर, इन मामलों से अलग युवा कवि प्रत्युष चंद्र मिश्र के संयोजन में "दूसरा शनिवार" नामक गोष्ठि का सफल आयोजन पिछले कुछ महीनों से नियमित रूप से किया जा रहा है जिसमें समकालीन प्रख्यात साहित्यकार भी ससमय अपना योगदान देते रहे हैं। जहाँ साहित्य पर निष्पक्ष होकर टिप्पणी भी की जाती है। पिछले दिनों आयोजित गोष्ठि की रपट युवा कवि नरेंद्र कुमार की नजर से।
नरेंद्र कुमार
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दिनांक 17.09.2016 संध्या 5 बजे गाँधी मैदान पटना। बादलों की उमड़–घुमड़ के बीच हमारा उत्साह चरम पर था। गाँधी मैदान हमेशा की तरह हमारे स्वागत को तत्पर। मुजफ्फरपुर से आए बिहार के जाने–माने कवि रमेश ऋतंभर हमारे बीच उपस्थित थे। गोष्ठी में प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, राजकिशोर राजन, शहंशाह आलम, बालमुकुन्द, अमरनाथ झा, ललन कुमार सिंह, शिवनारायण, अरविन्द कुमार झा, विकास राज, अक्स समस्तीपुरी, श्याम किशोर प्रसाद, रामनाथ शोधार्थी, कुंदन आनंद, गुंजन श्री, समीर परिमल, अंचित, अनीश अंकुर, सुनीता गुप्ता एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कुछ नए लोग थे। अतः आपस में परिचय प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्यूष चन्द्र मिश्र द्वारा कार्यक्रम की शुरुआत की गई।


हमारे कवि रमेश ऋतंभर ने विकास–कथा, दौड़, कर्जदार, कहाँ से लाऊं लोहे की आत्मा, पसंद का शास्त्र, अपने शहर पर, कस्बे, कहाँ–कहाँ से भागोगे रमेश, अपने हिस्से का सच, अवज्ञा, अधेड़ होती कुँवारी लड़कियाँ, एक उत्तर आधुनिक समाज की कथा, तुम्हारा राष्ट्रवाद एवं सबसे ऊपर है मनुष्य शीर्षक वाली कविताएं सुनाई। उन्होंने अपनी रचना–प्रक्रिया पर भी बातें की। अपनने परिवेश में घटती घटनाओं एवं मनुष्यों में उत्पन्न असंतोष एवं पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने कविता का मार्ग चुना। बाद में उनकी कविताओं पर चर्चा हुई। बालमुकुन्द ने कहा  कविताएं भाव के स्तर पर सपाट एवं पुरानी लगी। विकास राज ने कविताओं को अच्छा बताया। श्याम किशोर प्रसाद ने कविताओं को ठीक बताया पर कुछ कविताएं उन्हें महज नारेबाजी के स्तर पर लगी। नरेन्द्र कुमार के अनुसार कविताएं कवि के परिवेश एवं अनुभव–क्षेत्र को व्यक्त करती हैं परन्तु पाठक को पुनर्पाठ के लिए आमंत्रित नहीं करती हैं। शहंशाह आलम ने बताया कि कविता सीधे पाठक तक पहुँचती है। राजकिशोर राजन ने कहा कि कवि ने अच्छी कविताएं सुनाई। अनगढ एवं सपाट होने के बावजूद कविताएं   सहज प्रयोग एवं समकालीन शिल्प के कारण रूपवाद को धत्ता बताती हैं। रचनाएं नए इलाकों में जाने का माद्दा रखती हैं तथा पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। सुनीता गुप्ता की नजर में कविताएं जीवन के विविध क्षेत्रों को छूती हैं तथा कवि अपनी पूरी इमानदारी से कविता में हैं। अध्यक्षता कर रहे हमारे वरिष्ठ साहित्यकार शिवनारायण की नजर में कविताएं अच्छी लगी तथा एक लंबे अरसे से वे कवि को सुनते आ रहे हैं। कवि समाज के विविध क्षेत्रों, परिस्थितियों एवं घटनाओं को संजीदगी से दर्ज करते हैं। अंत में प्रसिद्ध नाटककार अनीश अंकुर ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आपसब से कवि रमेश ऋतंभर की एक कविता 'पसन्द का शास्त्र' साझा कर रहा हूँ। सभी मित्रों की राय का स्वागत है।

हज़ारों चेहरों के बीच कोई वही एक चेहरा क्यों चुनता है
जो दूसरों की नज़र में न तो ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है, न तो ज्यादा ख़ास।
हज़ारों रंग के बीच कोई वही एक रंग क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुर्ख़ होता है, न तो ज़्यादा प्यारा।
हज़ारों फूल के बीच कोई वही एक फूल क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा दिलकश होता है, न तो ज़्यादा ख़ुशबूदार।
हजारों शहर के बीच में कोई वही शहर क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुविधाजनक होता है, न तो ज्यादा संभावनाओं से भरा।
यह तो किसी पर दिल आ जाने की बात है
यहाँ हमारी दुनिया का कोई गणित नहीं चलता।
                                              - रमेश ऋतंभर

रविवार, 11 सितंबर 2016

नरेंद्र कुमार की कविताएं

ज्यों ज्यों हमारी जिंदगी विकास की सीढियों की ओर अग्रसर होती जा रही है त्यों त्यों समाज दो भागों में बंटता जा रहा है जबकि बातें हक -हुकूक और समानता की होती हैं। यह छलावा कब तक जारी रहेगा यह तो कह पाना मुश्किल है लेकिन पसीने की गंध का अंतर अवश्य ही नजर आने लगा है चाहे हम इस पार हों या उस पार। विरासत तो हमें जीर्ण ही मिलेगी। ऐसी ही कुछ बातों को रेखांकित करती हैं युवा कवि नरेंद्र कुमार की ये कविताएं। तो आईए गौर करते हैं नरेंद्र कुमार की तीन कविताओं पर।

उस पार


भाई..!

हम सड़क के इस ओर हैं

उस पार बाजार है



इस ओर हमारे खेत,

हमारे फावड़े हैं

और हम लाचार हैं

उस पार उनकी गाड़ियां,

उनकी मंडियां हैं

और वे होशियार हैं



इधर सिसकते नहर,

हमारा सूखा है

उधर छलकते तरण-ताल,

उनकी बरसात है



जरा सोचो..!

मंडियां इस पार भला आएंगी ?

नहरें भला खुद ही मुस्कुराएंगी ?

सूखा अब फंदा बन बढता आये

बचे-खुचे सपनों का दम घुटता जाए

इससे पहले कि अपनी बारी आ जाए

चलो अभी,

उस पार को कूच कर जाएं


भूख



उनकी भूख बढ गई है

पंजे और भी तेज हुए हैं

दाँते और नुकीली

आँखों की चमक

गहरी हो गई हैं



हल्के पदचाप

कान खङे

लार टपकाते



हवाओं में

शिकार की

गंध के पीछे

बढते आ रहे हैं वे


विरासत

जानता हूँ

तुम्हारे यहाँ

महफिलें नहीं सज रहीं

बचे हैं बस

टेंट के टूटे खंभे

फटे टाट और

कुछ कनस्तर



पता है

तुम कभी भी

घोषित कर सकते हो

इसे राष्ट्रीय विरासत



पट्टिकाओं पर

तुम होगे

तुम्हारे पुरखे भी

ठहाकों की चर्चा

सब चाव से सुनेंगे

पसीने की गंध

कहीं नहीं होगी

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रविवार, 5 जून 2016

शिवमूर्ति की रचना 'कुच्ची का कानून' और मनु का विधान

शिवमूर्ति उन चंद वरिष्ठ कथाकारों में से एक हैं जिनकी रचनाएं साहित्य की दुनियां में आते ही हलचल मचा देती है, बहसों की एक लंबी श्रृखंला शुरू कर देती है. और यही हुआ इस बार भी जब शिवमूर्ति की नई लम्बी कहानी या लघु –उपन्यास “कुच्ची का कानूनअखिलेश के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “तद्भव” के 32 वें अंक में प्रकाशित हुई. किसी ने इसकी मौलिकता पर सवाल किया तो किसी ने इसकी विश्वसनीयता पर. किसी ने हंगामे को ही साजिश करार दिया तो किसी ने कुछ और. जबकि शिवमूर्ति जी के सच्चाई के प्रति अपनी वफ़ादारी के दावे हैं. बहस की इसी कड़ी में पढ़ते हैं युवा साहित्यकार नरेंद्र कुमार के विचार को जिसने इसे एक अलग नजरिये से देखने की कोशिश की है, जो कि पत्रिका लहक के मई –जून 2016 में प्रकाशित भी है. साभार!
नरेंद्र कुमार


कुच्ची का कानून या मनु का विधान
शुरू में ही स्पष्ट कर दूं कि यह प्रसिद्ध कहानीकार शिवमूर्ति रचित लघु उपन्यास कुच्चीका कानूनकी तो आलोचना है ही समीक्षा।बस इसकी कथावस्तु में समाहित विचार एवं दर्शन को आज की प्रगतिशीलता एवं उत्तर आधुनिकता के मानक पर ठीक‌‌-ठीक रखकर देखना ही प्रमुख उद्देश्य है।मैंने इसके पूर्व शिवमूर्ति की कोई रचना नहीं पढी है, इस कारण उनके संबंध में कोई पूर्वाग्रह या विशेष लगाव नहीं है।
इस रचना का मुख्य उद्देश्य स्त्री की अस्मिता एवं अधिकार पर लगा प्रश्नचिह्न्हटाना है, जिसका पता कहानी के आरम्भ में ही चल जाता है।कहानी कुच्ची के कोख की जानकारी से ही आगे बढती है, जिसकी वैधता उसे साबित करनी है क्योंकि उसका पति बजरंगी दो वर्ष पूर्व ही जहरीली शराब के सेवन से मर चुका है।कुच्ची के सामने चुनौतियों का पहाङ खङा है।जाहिर है पुराणों एवं स्मृतियों द्वारा निर्धारित विवाह एवं अन्य संस्थाओं तथा रुढियों का भार अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में स्त्रियां ही उठाती रहीं हैं।उन्हें वस्तुमात्र बनाकर पुरुषों के भरोसे सारा जीवन गुजार देने का विधान इन्हीं स्मृतियों द्वारा बनाया गया है।प्राचीन काल से चली आ रही रुढियों को ढोने के लिये आज भी उन्हें समाज द्वारा बाध्य किया जाता है।तभी तो कुच्ची संघर्षशील होने के बावजूद कहती है---“मैं अपने कोख का उद्धार करना चाहती थी।बचपन से सुनती आ रही हूं कि कोख का उद्धार तभी होता है जब कोख फले।अपने जन्मेको दूध पीलाकर मैं माँ के दूध से उरिनहोना चाहती थी।
कुच्ची अपनी सुरक्षा एवं सास-ससुर की सेवा के खातिर अपने कोख में पल रहे बच्चे को जन्म देना चाहती है, पर इसमें कुछ कम बाधा नहीं है।पंचायत में बलई बाबा कुच्ची के कोख में पल रहे बच्चे को कानूनी वारिस मानने से इंकार कर देते हैं।वे कहते हैं‌‌--“नाजायज संतान को प्रापर्टी में धेला भी नहीं मिलेगा।इसके लिये वे पुराणों एवं स्मृतियों के कानून का सहारा लेते हैं।वे कहते हैं—“अरे मूरख, कानून रोज-रोज थोङे लिखा जाता है।विरासत का कानून याज्ञवल्क्य मुनि हजारों साल पहले लिख गये हैं।हजार साल पहले तो उसकी टीकायें लिखीं गयींमिताक्षरा, दायभाग, एकाध और।अपने यहाँ विज्ञानेश्वर की लिखी मिताक्षरा चलती है।बिहार में जीमूतवाहन की लिखी दायभाग।खैर, यह तेरी समझ में क्या आयेगा।इस गांव में ही किसी ने याज्ञवल्क्य मुनि का नाम नहीं सुना होगा।तब कोख पर अपने हक के संबंध में कुच्ची कहती है—“जब मेरे हाथ,पैर,आँख,कान पर मेरा हक है, इन पर मेरी मर्जी चलती है तो कोख पर किसका होगा, उस पर किसकी मर्जी चलेगी, इसे जाननेके लिये कौन-सा कानून पढने की जरूरत है।वह पलटकर पंचायत से ही पूछती है, “बात से कायल कर दीजिये या कायल हो जाइये।मेरी कोख पर मेरा हक है कि नहीं?”
यहाँ तक कहानी अपनी सही राह चलती है।इसके बाद खुद रचनाकार कुच्ची के सवाल का जवाब अपनी मौलिकता में खोज नहीं पाते हैं।लगताहै कि पंचायत की चुप्पी उनकी ही चुप्पी है।इस चुप्पी को कुच्ची ही तोङती है।
“----मेरे सवाल का जवाब आप सबके मन में है।आप देना नहीं चाहते।अब मैं दूसरा सवालपेश करती हूं।मेरे इस सवाल के पेट से ही चौधरी बाबा के सवाल का जवाब निकलेगा।मेरा सवाल है कि फसल पर पहला हक किसका है? खेत का कि बीज का? अगर पंच फैसला करते हैं कि फसल पर खेत का हक है तो पंच मुझसे बच्चे के पिता का नाम पूछने का हकदार नहीं बनते।अगर फैसला बीज के हक में होता है तो मैं बच्चे के पिता का नाम पेश कर दूंगी।
कुच्ची का यह सवाल लेखक का मौलिक सवाल नहीं है। इसके लिये वे मनुस्मृति की शरण में चले जाते हैं। अब कुच्ची के सवाल के में निहित मनु के विधानों की संगतता पर नजर डालते हैं जो मनुस्मृति के नवम्अध्याय से उद्धृत हैं।इस अध्याय में स्त्री-पुरूष के संबंधों एवं उत्तराधिकार के नियमों की व्याख्या की गयीं है।मनुस्मृति के नवम्अध्याय के 33वें श्लोक को देखते हैं जहाँ से यह सवाल शुरू होता है---
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान्
क्षेत्रबीजसमायोगात्संभवः सर्वदेहिनाम्।।३३।।
अर्थात्स्त्री खेतरूप और पुरुष बीजरूप होता है।खेत और बीज के संयोग से ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अब सवाल यह उठता है कि रचनाकार स्त्री की संवेदना को दरकिनार कर बीज और खेत का वह सिद्धांत क्यों चुनते हैं जो मनु द्वारा दिया गया है? क्या उनकी प्रगतिशीलता एवं मौलिकता इतनी कमजोर हो चली थी कि उन्हें मनुस्मृति का सहारा लेना पङा।...या फिर वे मनु के विधान को आज के आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज में भी तर्क-वितर्क द्वारा प्रासंगिक ठहराना चाहते हैं।अब कुच्ची के सवालों का जवाब देखिए।
लछिमन चौधरी कहते हैं---“मेरे विचार से तो बीज ही परधान है।खेत किसी का हो, जो बोया जायेगा, वही पैदा होगा।आम के बीज से आम।बबूल के बीज से बबूल।बोया बीज बबूल का, आम कहाँ से होय?”
अब मनुस्मृति के उस अंश को देखते हैं जिसपर लछिमन चौधरी का संवाद आश्रित है---
बीजस्यचैवयोन्याश्चबीजंउत्कृष्टंउच्यते।
सर्वभूतप्रसूतिर्हिबीजलक्षणलक्षिता।।३५।।
यादृशंतूप्यतेबीजंक्षेत्रेकालोपपादिते।
तादृग्रोहतितत्तस्मिन्बीजंस्वैर्व्यञ्जितंगुणैः।।३६।।
अर्थात् बीज और खेत में बीज प्रधान है,क्योंकि सभी जीवों की उत्पत्ति बीजों के लक्षणानुसार ही होती है।जिसप्रकार का बीज उचित समय पर खेत में बोया जाता है, उसके गुण जैसा ही पौधा खेत में उत्पन्न होता है।
इयंभूमिर्हिभूतानांशाश्वतीयोनिरुच्यते।
नचयोनिगुणान्कांश्चिद्बीजंपुष्यतिपुष्टिषु।।३७।।
भूमावप्येककेदारेकालोप्तानिकृषीवलैः।
नानारूपाणिजायन्तेबीजानीहस्वभावतः।।३८।।
अर्थात् यह भूमि सभी प्राणियों का शाश्वत् उत्पत्ति स्थान है, परंतु भूमि के गुण से बीज पुष्ट नहीं होता है|एक समय में एक ही खेत में किसान अनेक बीज बोते हैं, परंतु सभी बीजों से अपने-अपने स्वभावानुसार अनेक प्रकार के पौधे उत्पन्न होते हैं।
व्रीहयःशालयोमुद्गास्तिलामाषास्तथायवाः।
यथाबीजंप्ररोहन्तिलशुनानीक्षवस्तथा।।३९।।
अन्यदुप्तंजातंअन्यदित्येतन्नोपपद्यते।
उप्यतेयद्धियद्बीजंतत्तदेवप्ररोहति।।४०
अर्थात् धान, मूंग, तिल, उङद, यव, लहसुन और ईख---सभी अपने बीज के अनुसार ही उत्पन्न होते हैं।ऐसा कभी नहीं होता कि बोया कुछ हो और उत्पन्न कुछ हो जाये।जो बीज बोया जाता है वही उत्पन्न होता है।
रचनाकार लछिमन चौधरी का जवाब सुघरा से दिवाते हैं जो गाँव की एक विधवा ठकुराईन है।
----सवाल यह नहीं है कि बोने से क्या पैदा होगा।इसे तो पीछे बैठकर हँस रहा वह बग्गङ भी जानता है।फिर सुघरा बोलती है-----सवाल यह है कि फसल पर हक किसका होगा? एक आदमी अपने खेत में गेहूं बो रहा है।उसके बीज के कुछ दाने बगल के जौ के खेत में छिटक कर चले गये।फसल तैयार होने पर साफ पता चल रहा है कि गेहूं के पौधे बगल वाले के बीज से पैदा हुये हैं।तो क्या गेहूं के खेत वाला जौ के खेत में उगे गेहूं के उन पौधों पर अपना हक जता सकता है?
बिल्कुल नहीं।कई आवाजें आती हैं---जिसके खेत में पैदा होता है, वही काटता है।
अब सुघरा के संवाद की संगतता मनुस्मृति के साथ देखते हैं---
येऽक्षेत्रिणोबीजवन्तःपरक्षेत्रप्रवापिणः
तेवैसस्यस्यजातस्यनलभन्तेफलंक्वचित्।।४९।।
अर्थात् जिसके पास अपना खेत नहीं है, यदि वह दूसरों के खेत में बीज बोता है तो वे उस खेत में उत्पन्न हुए अनाज के हकदार नहीं होते हैं।
यदन्यगोषुवृषभोवत्सानांजनयेच्छतम्।
गोमिनांएवतेवत्सामोघंस्कन्दितंआर्षभम्।।५०।।
तथैवाक्षेत्रिणोबीजंपरक्षेत्रप्रवापिणः।
कुर्वन्तिक्षेत्रिणांअर्थंनबीजीलभतेफलम् ।।५१।।
अर्थात् यदि दूसरों की गायों से सांङ सौ बछङे भी पैदा करे तो भी वे बछङे गाय वालों के होते हैं।सांङ का यह वीर्यसंचन निष्फल होता है।उसी प्रकार बिना खेत वाले का बीज दूसरे के खेत में बोने पर निष्फल जाता है।बीज वाला फल नहीं पाता।
फलंत्वनभिसंधायक्षेत्रिणांबीजिनांतथा
प्रत्यक्षंक्षेत्रिणांअर्थोबीजाद्योनिर्गलीयसी।।५२।।
अर्थात् जहाँ पर खेत के मालिक और बीज बोने वालों में कोई बात निश्चित नहीं हुई हो तो फल खेत के मालिक का होता है क्योंकि बीज से श्रेष्ठ खेत है।
क्रियाभ्युपगमात्त्वेतद्बीजार्थंयत्प्रदीयते।
तस्येहभागिनौदृष्टौबीजीक्षेत्रिकएवच।५३।।
ओघवाताहृतंबीजंयस्यक्षेत्रेप्ररोहति।
क्षेत्रिकस्यैवतद्बीजंनवप्तालभतेफलम्।।५४।।
अर्थात् जिस व्यक्ति का खेत है, फल भी उसीका है।जिस व्यक्ति ने बीज डाला है, फल उसका नहीं माना जाता।जिस खेत की उपज के विषय में खेत और बीज के मालिक के बीच आपस में तय हो गया है, उस खेत के फल में दोनों लोग भागी होते हैं।जो बीज जल या वायु के प्रवाह में दूसरे खेत में गिर कर उत्पन्न होते हैं, उसके फल का भागी खेत वाला ही होता है कि बीज बोने वाला।
इस तरह हम देखते हैं कि मनु के विधान को जिस तरह प्रगतिशील विचारों में बदलने की जो साजिश की गयी है यह पाठकों के साथ धोखा ही नहीं है वरन रचानाकार के रचनाकर्म पर ही सवालिया निशान लगा देती है।अब मनु का वह विधान देखा जाय जो स्त्रियों को पशु की श्रेणी में रखती है।
एषधर्मोगवाश्वस्यदास्युष्ट्राजाविकस्यच।
विहंगमहिषीणांचविज्ञेयःप्रसवंप्रति।।५५।।
इसमें कहा गया है कि बीज एवं खेत संबंधी यही व्यवस्था गाय, घोङा, दासी, ऊंट, बकरी, भेङ, पक्षी और भैंस की संतति के लिये भी मानना चाहिये।
क्या हम स्त्रियों के लिये यही व्यवस्था चाहेंगे जो उन्हें पशु की श्रेणी में रखे।उनकी संवेदनाओं का क्या कोई मूल्य नहीं?यहाँ हम देखते हैं कि रचना अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गयी है।एक तरफ लेखक स्त्री कि अस्मिता एवं अधिकार के लिये संघर्ष मेंस्मृतियों और पुराणों को मृत मनते हुए स्त्रियों के संघर्ष को तार्किकता एवं आधुनिकता की कसौती पर कसना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ इस हेतु मनुस्मृतिके विधान को सामने लानेजैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।फिर अंत में वे स्मृतियों के विधान को झूठा एवं अप्रासंगिक ठहरानेका दिखावा भी करते हैं जिसका पता निम्न उद्धरण से चलता है---
बाजार से आयी महिलाओं के बीच से एक लङकी खङी होती है-----याज्ञवल्क्य कबके मर मरा गये लेकिन उनका बनाया फंदा अभी भी औरतों के गले में फंसा हुआ है।वक्त आ गया है कि मरे हुओं का कानून मरे हुओं के साथ दफन कर दिया जाये।ऐसा कानून बने जिससे हम भी जिंदा लोगों की तरह जिंदा रह सकें।
सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि नगरों एवं शहरों कि स्त्रियाँ गाँव की स्त्रियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील एवं आधुनिक होती हैं, पर रचनाकार उनके माध्यम से कोई आधुनिक कानून-व्यवस्था की व्याख्या नहीं करवाते हैं जबकि तीन-तीन औरत वकील पंचों की बराबरी में बैठती हैं।क्या उनका चुप रहना लेखक की चुप्पी की ओर ईशारा नहीं करता है? आँगनबाङी कार्यकर्ताओं, ग्राम सेविकाओं, स्वास्थ्य केंद्र की दाईयों, बैंक एवं ब्लॉक की कर्मचारियों और अध्यापकों की संख्या पंचायत में झुंड बनाकर बैठती हैं।परंतु ये सब बैठे-बैठे मोबाईल में फोटो खींचने के अलावा बहस में कोई योगदान नहीं दे पाती हैं।वे आम मध्यमवर्गीयलोगों की तरह मात्र नैतिक समर्थन दे पाती हैं, जबकि उनके साथ एक प्रशासनिक अधिकारी एडीओ पंचायत भी आयी है।आखिर रचनाकार क्या दिखाना चाहतेहैं?यही कि हमारे शहरों की आधुनिक एवं प्रगतिशील स्त्रियाँ केवल सेल्फी खींचने एवं तमाशा देखने के ही काबिल हैं।आजकल नगरों में आईवीएफ क्लिनिक, सरोगेसी, स्पर्म डोनर की चर्चा आम है।ऐसे आधुनिक समय में महिला मोर्चा की सदस्या मनोरमा कुच्ची द्वारा कोख के मुद्दे के सवाल पर कहती है---“दरअसल यह बहुत आगे का मुद्दा है, लेकिन गाँव में रहकर जब तुम्हारे जैसी औरत इसकी जरूरत महसूस कर रही है, इस मुद्दे को उठा रही है तो देरसबेर इसे वक्त की आवाज बनना होगा।जबकि बाजार की ही नर्स कुट्टी के बिना शादी एक बच्चा बनाने की बात लेखक इससे पहले कह चुके हैं जिसे वह गिफ्ट लेना कहती है।इसी तरह के और किस्से वह कुच्ची को बतलाती है।लगता है लेखक अपने ही पूर्वकथनों से तारतम्यता बना नहीं पाये हैं।
आखिर क्या कारण है कि वे आधुनिक शहरी समाज की महिलाओं को पिछङा दिखाते हैं जबकि गाँव की पिछङी महिला को संघर्षशील एवं जागरूक? चूंकि उनके पास कोख के अधिकार संबंधी कोई मौलिक तर्क नहीं है, जो आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज के जीवन-दर्शन के अनुकूल हो। इक्कीसवीं सदी में भी इसका समाधान वे मनुस्मृति में ही पाते हैं।वह मनुस्मृति जो पुरुषों के सामने स्त्रियों की संवेदना को कोई महत्व नहीं देती है बल्कि सारी जिंदगी उन्हें पुरुषों के नियंत्रण में जीने का विधान रचती है।मेरी समझ से कोख पर प्राथमिक क्या...संपूर्ण अधिकार स्त्री का ही है।उसकी संवेदना ही आखिरी तर्क है चाहे वह कोख विवाह नामक संस्था से अलग या बलात्कार का ही परिणाम क्यों न हो।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कुच्ची का कानून’‘मनु के विधानका ही आधुनिक रुपांतरण है क्योंकि इस रचना में मनु के विधान के आधार पर ही कुच्ची को कोख का अधिकार मिल पाता है।कुच्ची की संवेदना को दरकिनार कर याँत्रिक तर्क-वितर्क को लेखक महत्व देते हैं तथा इनके सहारे ही स्वयं को प्रगतिशील एवं नारीवादी दिखाने की कोशिश करते हैं।इस प्रसंग में गोदान की चर्चा न हो तो बात पूरी नहीं होगी।प्रेमचंद ने अपने उपन्यास में धनिया और सिलिया के संघर्ष को अधिक जीवंतता से दिखाया है।वे सीधे-सीधे सामंतवादियों एवं मनुवादियों से टकाराती हैं।सिलिया भी बिना विवाह किये बच्चे को जन्म देती है और धनिया उसे अपने घर में पनाह देती है।वे दोनों कभी भी झुकना पसंद नहीं करती हैं।प्रेमचंद अपनी रचना में पुराणों एवं स्मृतियों के विधानों द्वारा दलितों एवं स्त्रियों को अधिकार दिलाने की चेष्टा नहीं करते हैं।वे अपने तर्क मानवता एवं पात्रों की संवेदना में ढूंढते हैं।परंतु कुच्चीका कानूनमें उनकी परंपरा का पालन नहीं हुआ है।
अब आता हूं अपने इस आलेख की प्रासंगिकता पर...।अक्सर बहुत-से रचनाकारों की ऐसी रचनायें देखने को मिलती हैं जिनमें वे पाठकों की जागरूकता एवं बुद्धिमता को दरकिनार कर चालाकी दिखाने की कोशिश करते हैं।वे पाठकों की पठनीयता को ध्यान में नहीं रखते हैंऔर वे यही मात खा जाते हैं।अगर लेखक इस बात का ध्यान रखते तो कभी ऐसा आत्मघाती प्रयोग नहीं करते और न ही उनके रचनाकर्म पर सवालखङा होता।

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