शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

डर की दूरी : सुशील कुमार भारद्वाज (कविता)

डर की दूरी

सुशील कुमार भारद्वाज 




कभी जो पास था मन के,

अब उस राह पर धुंध उतर आई है।

मैं तुमसे नहीं,

खुद से दूर भाग आई हूँ कहीं।


कहा मैंने —

“आजकल मैं दूरी बना रही हूँ,

डर लगता है, कहीं गलती न हो जाए...”

पर गलती क्या होती है?

एक क्षण की कमजोरी?

या वह चाहत,

जो शब्दों में नहीं समा पाती?


तुमने कुछ नहीं कहा,

बस देखा, जैसे कोई आईना देखता हो—

जिसमें मैं खुद को झूठा साबित नहीं कर पा रही थी।


सच यह है,

कि मैं जानती हूँ —

गलती तुमसे भी हो सकती है,

मुझसे भी।

क्योंकि गलती कभी शरीर से नहीं होती,

वह आत्मा की थकान से होती है।


यह डर, यह दूरी,

एक दीवार नहीं, एक पुकार है—

“रुको... मैं खुद को समझना चाहती हूँ।”


कभी-कभी प्रेम का सबसे सच्चा रूप

वही होता है,

जब हम उसे अधूरा छोड़ देते हैं।


मैं बस यही चाहती हूँ —

तुम मेरे भीतर बने रहो,

पर मेरे बाहर न आओ।

क्योंकि अगर तुम बाहर आ गए,

तो शायद मैं टूट जाऊँगी,

और फिर कुछ भी शेष नहीं रहेगा—

न गलती, न दूरी,

न मैं, न तुम।


बस एक सन्नाटा...

जहाँ प्रेम, डर बनकर साँस लेता रहेगा।


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