हम जासूसी उपन्यास क्यों पढ़ते हैं?
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| प्रियदर्शन |
मारियो पूजो के मशहूर उपन्यास 'गॉडफादर' में एक इंस्पेक्टर मैक्लुस्की गॉडफादर के बेटे माइकल कारलियोन को थप्पड़ मार कर उसका जबड़ा तोड़ देता है। इस इंस्पेक्टर को और उसके पीछे खड़े लोगों को सजा दी जानी है।
माइकल तय करता है कि वह इंस्पेक्टर को गोली मार देगा। उसका बड़ा भाई सोनी कारलियोन उसे यह समझाना चाहता है कि इंस्पेक्टर की उससे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी- इसे वह एक पेशेवर प्रतिद्वंद्विता की तरह ले, निजी हमले की तरह नहीं। कुछ देर बाद यही बात उसका सलाहकार टॉम हेगान उससे कहता है। 'प्रोफेशनल' और 'पर्सनल' के इस फ़र्क को माइकल बड़ी शिद्दत से ख़ारिज करता हुआ कहता है- ‘टॉम, मूर्ख मत बनो। सबकुछ पर्सनल है, कारोबार का एक-एक रेशा। हर आदमी हर रोज़ जो टुकड़ा भकोसता है, वह बस पर्सनल है। वे इसी को कारोबार कहते हैं। लेकिन यह पूरी तरह निजी है। तुम्हें मालूम है, ये मैंने किससे सीखा? डॉन से, गॉडफादर से। अगर उसके किसी दोस्त को बिजली का झटका लग जाए तो वह उसे निजी तौर पर लेता था। मेरा मेरीन में जाना उसके लिए निजी था। यही चीज़ उसको बड़ा बनाती है। वह सबकुछ निजी तौर पर लेता है।‘
यहां पहुंचते-पहुंचते मैं अटक जाता हूं। मैं कोई अपराध कथा पढ़ रहा हूं या जीवन को समझने वाली कोई किताब? मारियो पूजो के इस उपन्यास की ताकत क्या यह है कि उसमें इटली के माफिया गिरोहों की आपसी लड़ाई का बड़ा जीवंत वर्णन है? या उसकी ताकत इस बात में निहित है कि इस अपराध कथा के भीतर भी जीवन के स्पंदन को, रिश्तों के द्वंद्व को अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है?
दूसरों की नहीं जानता, लेकिन मेरी साहित्यिक मनोरचना और अभिरुचि के विकास में जासूसी और अपराध कथाओं का भी अच्छा ख़ासा हाथ रहा है। बचपन से ही जासूसी उपन्यास मेरे साथ रहे। राजन इकबाल सीरीज़ वाले एससी बेदी के बाल पॉकेट बुक्स सबसे प्रिय रहे। मिलने पर रायजादा की राम रहीम सीरीज़ भी पढ़ लेता था। लेकिन जल्द ही इन बाल जासूसी उपन्यासों का साथ छूट गया। कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास चले आए। इनके साथ कुशवाहा कांत, कुमार कश्यप, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास पढ़ता रहा। सच तो यह है कि ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति की मेरी पहली समझ बनाई। इस राजनीति में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे और पाकिस्तान-चीन-अमेरिका और इंग्लैंड के दूसरी तरफ। सीआईए और केजीबी जैसी ख़ौफ़नाक संस्थाओं के नाम पहली बार इन्हीं उपन्यासों में मिले। उगांडा, ईदी अमीन, लीबिया, कर्नल गद्दाफ़ी- इन सबसे पहला परिचय उन्हीं दिनों हुआ। कर्नल विनोद, कैप्टन, हमीद, राजेश, विक्रांत, विशाल, जगन जैसे जासूस तरह-तरह से कातिलों को पकड़ते रहे, देश के दुश्मनों से हमें बचाते रहे, अपनों के बीच छुपे परायों की पहचान करते रहे और उन अपराधी चेहरों को सामने लाते रहे और हमारा मन बहलाते रहे।
तब भी जानता था- अब कुछ और ज़्यादा जानता हूं- ये उपन्यास ज़िंदगी के, जासूसी के, जांच-पड़ताल और खोजबीन के बहुत सतही और उथले संस्करण थे। सेक्स, हिंसा और रहस्य-रोमांच की उस चाशनी को अपने-अपने ब्रांड के हिसाब से मिलाने वाले जो दरअसल पश्चिम के जासूसी उपन्यासों से बनी थी। लेकिन अगर जीवन और अध्ययन की वे प्राथमिक सीढ़ियां नहीं आई होतीं तो कुछ और ऊपर उठकर न गंभीर साहित्य को सहजता से पढ़ पाता और न ही जासूसी उपन्यासों और अपराध कथाओं की उस दुनिया में डूब पाता जो अब भी खींचती है। मैंने बहुत सारे तो नहीं, फिर भी सतही और गंभीर कई तरह की वे कहानियां पढ़ी हैं जिन्हें जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें जेम्स हेडली चेज़ और शिडनी शेल्डन से लेकर अगाथा क्रिस्टी, रॉबिन कुक, जेफ़री आर्चर और कई दूसरे भूले-भटके नामों तक की रचनाएं शामिल हैं।
लेकिन इन अपराध कथाओं में ऐसा क्या है जो हमें खींचता है? अपराध कोई अच्छी चीज़ नहीं, कत्ल, अपहरण या लूटपाट की खबरें हमें अख़बारों में रोज़ मिलती हैं जिनसे हम त्रस्त रहते हैं। या हमारे अवचेतन में अपराध को लेकर एक कौतूहल रहता है जो अचानक किसी कहानी के बीच सक्रिय हो जाता है और हमें एक तरह की तृप्ति देता है? यह बहुत आजमाया हुआ और अब तो सर्वेक्षणों से भी प्रमाणित निष्कर्ष है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा अपराध कथाएं बिकती हैं- चाहे वे साहित्य के रूप में हो या फिल्मों में या फिर टीवी सीरियल में। हो सकता है कि इसका कुछ वास्ता हमारे भीतर की उस आदिम अतृप्ति से हो जिनके बीच कोई अपराध घटित होता है- या फिर यह समझने से कि आखिर वह कौन सा मनोविज्ञान है जिसमें इंसान अपराध करता है।
लेकिन अपराध कथाओं या जासूसी उपन्यासों के हिट होने की सबसे बड़ी वजह उस कौतूहल में है जो इंसानी सभ्यता को आगे ले जाने वाले मूल तत्वों में है। यह कौतूहल न होता तो शायद हम अपने भीतर और बाहर की बहुत सारी छुपी हुई दुनियाओं की तलाश न कर पाते। वैसे तो पूरा साहित्य ही एक तरह से बाहर-भीतर के दृश्य-अदृश्य संसार की तलाश है, और कई बार बहुत शास्त्रीय मानी जाने वाली किताबें अपनी दुरूहता के बावजूद बेहद दिलचस्प अपराध और जासूसी कथाएं साबित हुई हैं। उंबेर्तो इको का उपन्यास 'नेम आॅफ द रोज़' कहीं से जासूसी उपन्यास नहीं है लेकिन लंबे दार्शनिक आख्यानों और संदर्भों से भरी यह पूरी किताब अंततः एक मठ में लगातार हो रही मौतों और उसकी जांच करने आए एक संन्यासी और उसके शिष्य की कहानी के बीच ही आगे बढ़ती है। ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड की शुरुआत भी एक क़त्ल से ही होती है।
बहरहाल, यहां विषयांतर का ख़तरा है। हम एक विधा के रूप में जिन अपराध कथाओं की बात कर रहे हैं, वहां की दुनिया भी उत्सुकता के मूल रेशों से ही बनी है- बस इस फर्क के साथ कि उनमें बड़ी सघन तीव्रता को साधने की कोशिश होती है- उसके अपने फॉर्मूले भी होते हैं। हर अपराध या जासूसी कथा में कुछ कोशिशों को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। मसलन एक शिल्प इस तरह का होता है जिसमें हत्यारा या अपराधी बिल्कुल सामने न आए। बिल्कुल अंत में यह राज खुलता है कि अपराधी कौन है? इसी शैली में यह कोशिश शामिल रहती है कि अपराधी वह निकले जिस पर पूरे उपन्यास में सबसे कम संदेह हो। हत्या करने में उसका हाथ सामने आए जो मृतक के सबसे करीब हो। अगाथा क्रिस्टी के कई उपन्यासों में यह प्रविधि दिखाई पड़ती है। ‘मर्डर इन मेसोपोटामिया’ में एक चौकोर घर के अलग-अलग कमरों में 12 लोग हैं और एक हत्या हुई है। हत्या का संदेह हर किसी पर है- लेकिन अंत में कातिल वह निकलता है जो सबसे पाक-साफ़ मालूम होता है, जिसने मक़तूल की सेवा के लिए एक नर्स और क़त्ल की जांच के लिए एक जासूस को बुलाया है।
दूसरी प्रविधि यह है कि हत्यारा या अपराधी एक के बाद एक जुर्म करता जाता है और जासूस उसके पीछे लगा रहता है। यहां सारी उत्सुकता इस बात को लेकर होती है कि अगला जुर्म कैसे होना है और चूहे-बिल्ली का यह खेल ख़त्म कब होना है।
चूहे बिल्ली के इस खेल की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि इसके अपने नायक हैं- कुछ तो इतने बड़े कि अपने लेखक से आगे निकल कर किंवदंतियों और मुहावरों में बदल गए हैं। आर्थर कानन डायल को कम लोग जानते हैं, उस शर्लक होम्स को सब जानते हैं जो पलक झपकते एक साथ कई चीज़ें विश्लेषित कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर वह बहादुरी भी दिखा सकता है लेकिन उसका नायकत्व दरअसल उस अंतर्दृष्टि में छुपा है जिसके सहारे वह अपराध की जगह देख अपराधी का मन पढ़ लेता है। हिंदी में मेजर बलवंत और कर्नल विनोद जैसे कई जासूस रहे हैं जिनके आने से अचानक पाठक कोई नया राज़ खुलने की उम्मीद पाल लेता है।
बहरहाल, यह सिर्फ ‘कौन’ और ‘कैसे’ का मामला होता तो जासूसी उपन्यास कब की अपनी उम्र खो चुके होते। इसके साथ बहुत सारी और भी चाशनियां हैं जो फेंटी जाती हैं। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की चाशनी इसमें सबसे अहम है। जासूसी कथाओं का संसार वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से भी खूब बनता रहा है। बीसवीं सदी के विश्वयुद्धों को पृष्ठभूमि में रखकर कुछ बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिखे गए हैं। अगाथा क्रिस्टी के ‘सीक्रेट ऐडवर्सरीज’ की शुरुआत ही पहले विश्वयुद्ध में डुबो दिए गए एक जहाज़ से होती है जिसमें एक शख्स एक अनजान लड़की को कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज दे देता है ताकि वह उसे सुरक्षित पहुंचा सके। इसके बाद वह लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास उसकी तलाश के बीच दो बेखबर युवाओं के रोमांच से बनता है। इत्तिफाकन इस उपन्यास में अगाथा क्रिस्टी दो और प्रविधियों का इस्तेमाल करती हैं जो आगे चल कर जासूसी उपन्यासों में कई बार इस्तेमाल किए गए। उसकी गुम किरदार स्मृतिलोप की शिकार होती है जिसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके अलावा इस उपन्यास में दो बेरोज़गार युवा- टॉमी और ट्यूपेंस- जो कहीं से जासूस होने के लिए प्रशिक्षित या तैयार नहीं हैं, और जिन्हें बस अपनी ज़रूरत के लिए एक खतरनाक मिशन में लगना पड़ता है- सबसे बड़े नायक सिद्ध होते हैं। इसके बाद कई ऐसे उपन्यास आए जिनमें ऐसे शौकिया या मामूली लोग बड़ी-बड़ी साज़िशों का पर्दाफाश करते देखे गए।
जेफरी आर्चर के ‘ऑनर अमंग थीव्स’ में सद्दाम हुसैन के लोग अमेरिका का डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस चुरा लेने की योजना बनाते हैं। एक बार लगता है कि उन्होंने उसे चुरा भी लिया। 90 के दशक के बाद खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के तनाव की पृष्ठभूमि में यह एक दिलचस्प उपन्यास है। इसी तरह जेफरी आर्चर का ही एक और उपन्यास ‘फॉल्स इंप्रेशंस’ हालांकि एक पेंटिंग को लेकर है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में 9/11 का हमला भी है। इस कहानी में पुराने रईसों को उधार देने वाले एक बैंक की सलाहकार ऐसी ही एक रईस महिला के घर उसकी संपत्ति का मूल्यांकन करने पहुंचती है। महिला उधार चुकाने में अक्षम है और उसकी जायदाद बेचकर रकम वसूली की बात है। ये सलाहकार देखती है कि उसके विशाल मकान में वॉन गॉ का एक सेल्फ पोर्ट्रेट लगा हुआ है। वह उस महिला को बताती है कि बस यह पोर्ट्रेट बेच कर वह अपना पूरा कर्ज़ ही नहीं अदा कर सकती है, आने वाली ज़िंदगी की ज़रूरतों के लिए भी पैसा जुटा सकती है। यह बात वह न्यूयॉर्क में बैठे अपने बॉस को भी बता देती है जो उस लड़की पर बहुत बुरी तरह नाराज होता है। वह उसे फौरन वापस लौटने का आदेश देता है। उसी रात एजिलाबेथ नाम की उस महिला की हत्या हो जाती है और संदेह वहां से चली इस लड़की पर जाता है जो इन सबसे बेख़बर है। वह सुबह वर्ल्ड ट्रेड टावर की ऊपरी मंज़िलों में कहीं स्थित अपने दफ्तर पहुंचती है और एक-एक दो विमानों को इमारत से टकराता हुआ देखती है। अगले कई पन्नों में इस बात का वर्णन है कि वह कैसे वहां से उतरती है। यह पूरा उपन्यास आने वाले पन्नों में पेंटिंग की दुनिया में मूल और नकली की बहस को रखता है, चित्रकला की परंपरा को रखता है और एक बहुत रोचक पाठ बनाता है।
दरअसल जासूसी उपन्यासों का यह संसार अब तो- खासकर अंग्रेज़ी में- कई हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ शुद्ध अपराध कथाएं हैं जिनमें बहुत वीभत्स तरीके से की जा रही हत्याओं की जांच पड़ताल है, दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव के ताने-बाने से बने जासूसी उपन्यास हैं जिनमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साजिशें करने और उन्हें नाकाम करने का खेल चलता रहता है। तीसरी तरफ़ कुछ ‘लाइट डिटेक्टिव’ उपन्यास हैं जिनमें न वीभत्स हत्याएं हैं और न ब़ड़ी साजिशें, बल्कि छोटे-छोटे तनावों के बीच छोटे-छोटे अपराधों और चूकों से बनने वाला रहस्य रोमांच है। इन सबके बीच ‘मेडिकल थ्रिलर’ भी हैं जिनके लिए रोबिन कुक मशहूर है। चिकित्सकीय गुत्थियों पर केंद्रित उसके उपन्यास अपनी तरह से बेहद रोमांचक हुआ करते हैं। ‘हार्मफुल इंटेंट’ नाम के उपन्यास में एक डॉक्टर एक महिला को एनीस्थीसिया देता है और उसकी जान चली जाती है। डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, उसे जेल की सज़ा होती है। इसके बाद डॉक्टर कैसे अपने-आप को बेगुनाह साबित करता है और कैसे इस कोशिश में नकली इंजेक्शनों दवाओं का एक कार्टल पकड़ा जाता है, इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी मिलती है।
तो मेरे लिए जासूसी उपन्यासों का यह संसार जितना दिलचस्प रहा है उतना ही आंख खोलने वाला भी। मामूली लोगों के विकट साहस, गैरमामूली लगने वाले लोगों की साधारणता, अपराधियों के भीतर दबी इंसानियत, सफ़ेदपोश लोगों के भीतर बसे जुर्म, जीवन के सहज ब्योरों के बीच छुपी रहने वाली कहानियां, एक-दूसरे की वास्तविक शिनाख्त का सवाल- यह सब यह संसार हमारे सामने लाता रहा है।
फिर दुहराना होगा- इन जासूसी उपन्यासों को पढ़ना जीवन या पठन-पाठन की प्राथमिक सीढ़ियों पर ही चढ़ना है। ये लेखक हमारे टॉल्स्टॉय, शेक्सपियर, पामुक या मारख़ेज़ नहीं हैं जो हमारे लिए जीवन की बहुत सारी सूक्ष्मताओं का संधान करते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं जो याद दिलाते हैं कि जीवन बहुत सारी अनिश्चितताओं और संभावनाओं से भरा है। इनसे गुज़र कर हम जब वास्तविक लेखकों तक पहुंचते हैं तो उस लेखन का भी कहीं ज़्यादा आनंद ले पाते हैं। जासूसी उपन्यासों ने मेरे लिए यह काम किया है, कुछ सीढ़ियां आसान बनाई हैं, कुछ चीज़ों को समझने की एक पृष्ठभूमि तैयार की है।
माइकल तय करता है कि वह इंस्पेक्टर को गोली मार देगा। उसका बड़ा भाई सोनी कारलियोन उसे यह समझाना चाहता है कि इंस्पेक्टर की उससे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी- इसे वह एक पेशेवर प्रतिद्वंद्विता की तरह ले, निजी हमले की तरह नहीं। कुछ देर बाद यही बात उसका सलाहकार टॉम हेगान उससे कहता है। 'प्रोफेशनल' और 'पर्सनल' के इस फ़र्क को माइकल बड़ी शिद्दत से ख़ारिज करता हुआ कहता है- ‘टॉम, मूर्ख मत बनो। सबकुछ पर्सनल है, कारोबार का एक-एक रेशा। हर आदमी हर रोज़ जो टुकड़ा भकोसता है, वह बस पर्सनल है। वे इसी को कारोबार कहते हैं। लेकिन यह पूरी तरह निजी है। तुम्हें मालूम है, ये मैंने किससे सीखा? डॉन से, गॉडफादर से। अगर उसके किसी दोस्त को बिजली का झटका लग जाए तो वह उसे निजी तौर पर लेता था। मेरा मेरीन में जाना उसके लिए निजी था। यही चीज़ उसको बड़ा बनाती है। वह सबकुछ निजी तौर पर लेता है।‘
यहां पहुंचते-पहुंचते मैं अटक जाता हूं। मैं कोई अपराध कथा पढ़ रहा हूं या जीवन को समझने वाली कोई किताब? मारियो पूजो के इस उपन्यास की ताकत क्या यह है कि उसमें इटली के माफिया गिरोहों की आपसी लड़ाई का बड़ा जीवंत वर्णन है? या उसकी ताकत इस बात में निहित है कि इस अपराध कथा के भीतर भी जीवन के स्पंदन को, रिश्तों के द्वंद्व को अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है?
दूसरों की नहीं जानता, लेकिन मेरी साहित्यिक मनोरचना और अभिरुचि के विकास में जासूसी और अपराध कथाओं का भी अच्छा ख़ासा हाथ रहा है। बचपन से ही जासूसी उपन्यास मेरे साथ रहे। राजन इकबाल सीरीज़ वाले एससी बेदी के बाल पॉकेट बुक्स सबसे प्रिय रहे। मिलने पर रायजादा की राम रहीम सीरीज़ भी पढ़ लेता था। लेकिन जल्द ही इन बाल जासूसी उपन्यासों का साथ छूट गया। कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास चले आए। इनके साथ कुशवाहा कांत, कुमार कश्यप, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास पढ़ता रहा। सच तो यह है कि ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति की मेरी पहली समझ बनाई। इस राजनीति में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे और पाकिस्तान-चीन-अमेरिका और इंग्लैंड के दूसरी तरफ। सीआईए और केजीबी जैसी ख़ौफ़नाक संस्थाओं के नाम पहली बार इन्हीं उपन्यासों में मिले। उगांडा, ईदी अमीन, लीबिया, कर्नल गद्दाफ़ी- इन सबसे पहला परिचय उन्हीं दिनों हुआ। कर्नल विनोद, कैप्टन, हमीद, राजेश, विक्रांत, विशाल, जगन जैसे जासूस तरह-तरह से कातिलों को पकड़ते रहे, देश के दुश्मनों से हमें बचाते रहे, अपनों के बीच छुपे परायों की पहचान करते रहे और उन अपराधी चेहरों को सामने लाते रहे और हमारा मन बहलाते रहे।
तब भी जानता था- अब कुछ और ज़्यादा जानता हूं- ये उपन्यास ज़िंदगी के, जासूसी के, जांच-पड़ताल और खोजबीन के बहुत सतही और उथले संस्करण थे। सेक्स, हिंसा और रहस्य-रोमांच की उस चाशनी को अपने-अपने ब्रांड के हिसाब से मिलाने वाले जो दरअसल पश्चिम के जासूसी उपन्यासों से बनी थी। लेकिन अगर जीवन और अध्ययन की वे प्राथमिक सीढ़ियां नहीं आई होतीं तो कुछ और ऊपर उठकर न गंभीर साहित्य को सहजता से पढ़ पाता और न ही जासूसी उपन्यासों और अपराध कथाओं की उस दुनिया में डूब पाता जो अब भी खींचती है। मैंने बहुत सारे तो नहीं, फिर भी सतही और गंभीर कई तरह की वे कहानियां पढ़ी हैं जिन्हें जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें जेम्स हेडली चेज़ और शिडनी शेल्डन से लेकर अगाथा क्रिस्टी, रॉबिन कुक, जेफ़री आर्चर और कई दूसरे भूले-भटके नामों तक की रचनाएं शामिल हैं।
लेकिन इन अपराध कथाओं में ऐसा क्या है जो हमें खींचता है? अपराध कोई अच्छी चीज़ नहीं, कत्ल, अपहरण या लूटपाट की खबरें हमें अख़बारों में रोज़ मिलती हैं जिनसे हम त्रस्त रहते हैं। या हमारे अवचेतन में अपराध को लेकर एक कौतूहल रहता है जो अचानक किसी कहानी के बीच सक्रिय हो जाता है और हमें एक तरह की तृप्ति देता है? यह बहुत आजमाया हुआ और अब तो सर्वेक्षणों से भी प्रमाणित निष्कर्ष है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा अपराध कथाएं बिकती हैं- चाहे वे साहित्य के रूप में हो या फिल्मों में या फिर टीवी सीरियल में। हो सकता है कि इसका कुछ वास्ता हमारे भीतर की उस आदिम अतृप्ति से हो जिनके बीच कोई अपराध घटित होता है- या फिर यह समझने से कि आखिर वह कौन सा मनोविज्ञान है जिसमें इंसान अपराध करता है।
लेकिन अपराध कथाओं या जासूसी उपन्यासों के हिट होने की सबसे बड़ी वजह उस कौतूहल में है जो इंसानी सभ्यता को आगे ले जाने वाले मूल तत्वों में है। यह कौतूहल न होता तो शायद हम अपने भीतर और बाहर की बहुत सारी छुपी हुई दुनियाओं की तलाश न कर पाते। वैसे तो पूरा साहित्य ही एक तरह से बाहर-भीतर के दृश्य-अदृश्य संसार की तलाश है, और कई बार बहुत शास्त्रीय मानी जाने वाली किताबें अपनी दुरूहता के बावजूद बेहद दिलचस्प अपराध और जासूसी कथाएं साबित हुई हैं। उंबेर्तो इको का उपन्यास 'नेम आॅफ द रोज़' कहीं से जासूसी उपन्यास नहीं है लेकिन लंबे दार्शनिक आख्यानों और संदर्भों से भरी यह पूरी किताब अंततः एक मठ में लगातार हो रही मौतों और उसकी जांच करने आए एक संन्यासी और उसके शिष्य की कहानी के बीच ही आगे बढ़ती है। ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड की शुरुआत भी एक क़त्ल से ही होती है।
बहरहाल, यहां विषयांतर का ख़तरा है। हम एक विधा के रूप में जिन अपराध कथाओं की बात कर रहे हैं, वहां की दुनिया भी उत्सुकता के मूल रेशों से ही बनी है- बस इस फर्क के साथ कि उनमें बड़ी सघन तीव्रता को साधने की कोशिश होती है- उसके अपने फॉर्मूले भी होते हैं। हर अपराध या जासूसी कथा में कुछ कोशिशों को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। मसलन एक शिल्प इस तरह का होता है जिसमें हत्यारा या अपराधी बिल्कुल सामने न आए। बिल्कुल अंत में यह राज खुलता है कि अपराधी कौन है? इसी शैली में यह कोशिश शामिल रहती है कि अपराधी वह निकले जिस पर पूरे उपन्यास में सबसे कम संदेह हो। हत्या करने में उसका हाथ सामने आए जो मृतक के सबसे करीब हो। अगाथा क्रिस्टी के कई उपन्यासों में यह प्रविधि दिखाई पड़ती है। ‘मर्डर इन मेसोपोटामिया’ में एक चौकोर घर के अलग-अलग कमरों में 12 लोग हैं और एक हत्या हुई है। हत्या का संदेह हर किसी पर है- लेकिन अंत में कातिल वह निकलता है जो सबसे पाक-साफ़ मालूम होता है, जिसने मक़तूल की सेवा के लिए एक नर्स और क़त्ल की जांच के लिए एक जासूस को बुलाया है।
दूसरी प्रविधि यह है कि हत्यारा या अपराधी एक के बाद एक जुर्म करता जाता है और जासूस उसके पीछे लगा रहता है। यहां सारी उत्सुकता इस बात को लेकर होती है कि अगला जुर्म कैसे होना है और चूहे-बिल्ली का यह खेल ख़त्म कब होना है।
चूहे बिल्ली के इस खेल की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि इसके अपने नायक हैं- कुछ तो इतने बड़े कि अपने लेखक से आगे निकल कर किंवदंतियों और मुहावरों में बदल गए हैं। आर्थर कानन डायल को कम लोग जानते हैं, उस शर्लक होम्स को सब जानते हैं जो पलक झपकते एक साथ कई चीज़ें विश्लेषित कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर वह बहादुरी भी दिखा सकता है लेकिन उसका नायकत्व दरअसल उस अंतर्दृष्टि में छुपा है जिसके सहारे वह अपराध की जगह देख अपराधी का मन पढ़ लेता है। हिंदी में मेजर बलवंत और कर्नल विनोद जैसे कई जासूस रहे हैं जिनके आने से अचानक पाठक कोई नया राज़ खुलने की उम्मीद पाल लेता है।
बहरहाल, यह सिर्फ ‘कौन’ और ‘कैसे’ का मामला होता तो जासूसी उपन्यास कब की अपनी उम्र खो चुके होते। इसके साथ बहुत सारी और भी चाशनियां हैं जो फेंटी जाती हैं। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की चाशनी इसमें सबसे अहम है। जासूसी कथाओं का संसार वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से भी खूब बनता रहा है। बीसवीं सदी के विश्वयुद्धों को पृष्ठभूमि में रखकर कुछ बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिखे गए हैं। अगाथा क्रिस्टी के ‘सीक्रेट ऐडवर्सरीज’ की शुरुआत ही पहले विश्वयुद्ध में डुबो दिए गए एक जहाज़ से होती है जिसमें एक शख्स एक अनजान लड़की को कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज दे देता है ताकि वह उसे सुरक्षित पहुंचा सके। इसके बाद वह लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास उसकी तलाश के बीच दो बेखबर युवाओं के रोमांच से बनता है। इत्तिफाकन इस उपन्यास में अगाथा क्रिस्टी दो और प्रविधियों का इस्तेमाल करती हैं जो आगे चल कर जासूसी उपन्यासों में कई बार इस्तेमाल किए गए। उसकी गुम किरदार स्मृतिलोप की शिकार होती है जिसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके अलावा इस उपन्यास में दो बेरोज़गार युवा- टॉमी और ट्यूपेंस- जो कहीं से जासूस होने के लिए प्रशिक्षित या तैयार नहीं हैं, और जिन्हें बस अपनी ज़रूरत के लिए एक खतरनाक मिशन में लगना पड़ता है- सबसे बड़े नायक सिद्ध होते हैं। इसके बाद कई ऐसे उपन्यास आए जिनमें ऐसे शौकिया या मामूली लोग बड़ी-बड़ी साज़िशों का पर्दाफाश करते देखे गए।
जेफरी आर्चर के ‘ऑनर अमंग थीव्स’ में सद्दाम हुसैन के लोग अमेरिका का डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस चुरा लेने की योजना बनाते हैं। एक बार लगता है कि उन्होंने उसे चुरा भी लिया। 90 के दशक के बाद खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के तनाव की पृष्ठभूमि में यह एक दिलचस्प उपन्यास है। इसी तरह जेफरी आर्चर का ही एक और उपन्यास ‘फॉल्स इंप्रेशंस’ हालांकि एक पेंटिंग को लेकर है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में 9/11 का हमला भी है। इस कहानी में पुराने रईसों को उधार देने वाले एक बैंक की सलाहकार ऐसी ही एक रईस महिला के घर उसकी संपत्ति का मूल्यांकन करने पहुंचती है। महिला उधार चुकाने में अक्षम है और उसकी जायदाद बेचकर रकम वसूली की बात है। ये सलाहकार देखती है कि उसके विशाल मकान में वॉन गॉ का एक सेल्फ पोर्ट्रेट लगा हुआ है। वह उस महिला को बताती है कि बस यह पोर्ट्रेट बेच कर वह अपना पूरा कर्ज़ ही नहीं अदा कर सकती है, आने वाली ज़िंदगी की ज़रूरतों के लिए भी पैसा जुटा सकती है। यह बात वह न्यूयॉर्क में बैठे अपने बॉस को भी बता देती है जो उस लड़की पर बहुत बुरी तरह नाराज होता है। वह उसे फौरन वापस लौटने का आदेश देता है। उसी रात एजिलाबेथ नाम की उस महिला की हत्या हो जाती है और संदेह वहां से चली इस लड़की पर जाता है जो इन सबसे बेख़बर है। वह सुबह वर्ल्ड ट्रेड टावर की ऊपरी मंज़िलों में कहीं स्थित अपने दफ्तर पहुंचती है और एक-एक दो विमानों को इमारत से टकराता हुआ देखती है। अगले कई पन्नों में इस बात का वर्णन है कि वह कैसे वहां से उतरती है। यह पूरा उपन्यास आने वाले पन्नों में पेंटिंग की दुनिया में मूल और नकली की बहस को रखता है, चित्रकला की परंपरा को रखता है और एक बहुत रोचक पाठ बनाता है।
दरअसल जासूसी उपन्यासों का यह संसार अब तो- खासकर अंग्रेज़ी में- कई हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ शुद्ध अपराध कथाएं हैं जिनमें बहुत वीभत्स तरीके से की जा रही हत्याओं की जांच पड़ताल है, दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव के ताने-बाने से बने जासूसी उपन्यास हैं जिनमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साजिशें करने और उन्हें नाकाम करने का खेल चलता रहता है। तीसरी तरफ़ कुछ ‘लाइट डिटेक्टिव’ उपन्यास हैं जिनमें न वीभत्स हत्याएं हैं और न ब़ड़ी साजिशें, बल्कि छोटे-छोटे तनावों के बीच छोटे-छोटे अपराधों और चूकों से बनने वाला रहस्य रोमांच है। इन सबके बीच ‘मेडिकल थ्रिलर’ भी हैं जिनके लिए रोबिन कुक मशहूर है। चिकित्सकीय गुत्थियों पर केंद्रित उसके उपन्यास अपनी तरह से बेहद रोमांचक हुआ करते हैं। ‘हार्मफुल इंटेंट’ नाम के उपन्यास में एक डॉक्टर एक महिला को एनीस्थीसिया देता है और उसकी जान चली जाती है। डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, उसे जेल की सज़ा होती है। इसके बाद डॉक्टर कैसे अपने-आप को बेगुनाह साबित करता है और कैसे इस कोशिश में नकली इंजेक्शनों दवाओं का एक कार्टल पकड़ा जाता है, इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी मिलती है।
तो मेरे लिए जासूसी उपन्यासों का यह संसार जितना दिलचस्प रहा है उतना ही आंख खोलने वाला भी। मामूली लोगों के विकट साहस, गैरमामूली लगने वाले लोगों की साधारणता, अपराधियों के भीतर दबी इंसानियत, सफ़ेदपोश लोगों के भीतर बसे जुर्म, जीवन के सहज ब्योरों के बीच छुपी रहने वाली कहानियां, एक-दूसरे की वास्तविक शिनाख्त का सवाल- यह सब यह संसार हमारे सामने लाता रहा है।
फिर दुहराना होगा- इन जासूसी उपन्यासों को पढ़ना जीवन या पठन-पाठन की प्राथमिक सीढ़ियों पर ही चढ़ना है। ये लेखक हमारे टॉल्स्टॉय, शेक्सपियर, पामुक या मारख़ेज़ नहीं हैं जो हमारे लिए जीवन की बहुत सारी सूक्ष्मताओं का संधान करते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं जो याद दिलाते हैं कि जीवन बहुत सारी अनिश्चितताओं और संभावनाओं से भरा है। इनसे गुज़र कर हम जब वास्तविक लेखकों तक पहुंचते हैं तो उस लेखन का भी कहीं ज़्यादा आनंद ले पाते हैं। जासूसी उपन्यासों ने मेरे लिए यह काम किया है, कुछ सीढ़ियां आसान बनाई हैं, कुछ चीज़ों को समझने की एक पृष्ठभूमि तैयार की है।
हंस से साभार।

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