गुरुवार, 21 जून 2018

गीताश्री का उपन्यास हसीनाबाद और शहंशाह आलम की टिप्पणी



स्त्री-जीवन के धुएँ और धुँध को हटाकर उम्मीदों वाले रंग का वैविध्य दिखाता कथा-समय
     संदर्भ : गीताश्री का उपन्यास 'हसीनाबाद'
     ● शहंशाह आलम



एक औरत की ज़िंदगी के जो सपने होते हैं, वे सपने अकसर धोखों से, परेशानियों से, बेचैनियों से भरे होते हैं। इनको सीढ़ियाँ भी अकसर चक्करदार ही मिला करती हैं चढ़ने के लिए। इनकी ज़िंदगी में अकसर जो मर्द आते हैं, वे कोई जादूगर नहीं होते, जो इनको सिर से पाँव तक ख़ुशरंग रोशनियों से नहलाएँ। वे अकसर-अकसर डरावने चेहरे और डरावनी आँखों वाले होते हैं। ज़िंदगी की चक्करदार सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते ये बेचारियाँ भी कहाँ रोशनी बिखेरने वाली रह जाती हैं। इनके होंठों पर हँसी भी आती है तो बस आकर रेंगती हुई-सी गुज़र जाती है। इन औरतों की रूहें बस इसी तरह आती और जाती रहती हैं। रूहें, जो गवाह भर होती हैं इनके धोखों से भरे हुए सपनों की। आज की राजनीति भी औरतों के आजू-बाजू कुछ-कुछ डरावने सपने की तरह आवाजाही करती रहती है। मगर 'हसीनाबाद' की गोलमी जो है, वह बिजली वाली लड़की है। यह लड़की डर पैदा करने वाले चेहरों से, उन चेहरों पर टँगी आँखों की ऊपर-नीचे करतीं पुतलियों से घबराती कहाँ है :
          चौदह साल की गोलमी नाच रही थी, जैसे वह हरदम नाचा करती थी, सुधबुध गँवाई के।
          उसके साथ पूरी पृथ्वी नाच रही थी। नाचते-नाचते वह देवलोक और पृथ्वीलोक की दूरियाँ पाट दिया करती थी। सब हतप्रभ होकर देख रहे थे कि ये हुनर इसने सीखा कहाँ से? न नृत्य की तालीम और न सुरों की पहचान! नाचते-नाचते बेसुध-सी जब दोनों हाथ ऊपर उठाती थी तो मानो आकाश थोड़ा और नीचे झुक जाता था और धरती थोड़ी और ऊपर उठ जाती थी ( पृ. 13 )।

     स्त्री-जीवन का क्रम कितना उलट-पुलट है। हैरत तब होती है, जब उसका जीवन उलट-पुलट रहते हुए भी वे अपने समय को कितना सहेजकर, सजाकर, संभालकर रखती हैं। यह सहेजना, सजाना, संभालना एक स्त्री ही तो कर सकती है। गीताश्री ने भी यह काम बख़ूबी किया है। यह उपन्यास लिखने से पहले गीताश्री ने अपनी किरदार गोलमी के जीवन-चक्र ख़ुद के भीतर आत्मसात किया होगा। तब इसे एक पूर्ण उपन्यास के एक पूर्ण पात्र के रूप में स्थापित कर पाई होंगी। तभी एक उपन्यास की बहती हुई नदी जैसी भाषा का ईजाद कर पाई होंगी। 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इसकी भाषा की रवानी को देखकर आप भी महसूस करेंगे। इसकी भाषा मीठी है और खट्टी भी। जिस तरह गोलमी की पूरी ज़िंदगी मीठी और खट्टी रही है। गोलमी की माँ तक जब गीताश्री पहुँचती हैं गोलमी की ज़िंदगी और दमदार हो जाती है। गोलमी के पाँव में जिस तरह बिजली दौड़ती है और वह नाचते हुए कितनों को हतप्रभ कर जाती है, ख़ुद इसका और इसकी माँ की ज़िंदगी का सारा कुछ किसी नाच की तरह अथवा किसी झूमर गाने की तरह कहाँ था कि ख़ुश होकर दोनों माँ-बेटी ख़ुशी वाली तालियाँ बजा सकें। गोलमी की माँ सुन्दरी का जीवन ठाकुर-परंपरा से उबाऊ हो चला था :
          उस दिन सुन्दरी धम्म से आकाश से गिरी थी ज़मीन पर। लहूलुहान हो गई थी जैसे आत्मा और देह, दोनों। मालती ने आकर बताया कि बस्ती को सड़क-मार्ग से जोड़ा जा रहा था। और हसीनाबाद में स्कूल और डाकघर खुलेंगे। साथ ही चुनाव में वोटर बनेंगे यहाँ के लोग। जनगणना के लिए जल्दी ही लोग आएँगे। मालती ख़ुश थी, बहुत ख़ुश। ऐसा परिवर्तन वह सोच भी नहीं सकती थी। बस्ती थोड़ी बड़ी हो रही थी। बदल रही थी। उसे बदला जा रहा था।
          सुन्दरी को बस्ती के विकास से समस्या नहीं हुई। वह तो चीत्कार कर उठी, जब उसे मालती ने यह भी बताया कि बच्चों के पिता के नाम के आगे ठाकुरों के नहीं, उनके कारिंदों के होंगे ( पृ. 39 )।

     गीताश्री को पढ़ते हुए अकसर सोचता रहा हूँ कि इनके गद्य की पंक्तियाँ ऐसी हैं कि आप इनके लिखे को पढ़ते चले जाते हैं। बिना किसी रुकावट। बहुत सारे कथाकार की तरह इनके यहाँ जड़ शब्द नहीं आते। इनके शब्दों की ताज़गी आपको दूर और देर तक इनके लिक्खे को पढ़ा जाती है। आप गीताश्री को पढ़ते हुए थक नहीं जाते। इनकी कथावस्तु और इनका कथाशिल्प ज़्यादा दाँव-पेच नहीं जानते। 'हसीनाबाद' उपन्यास के पाठ के समय मैंने यही महसूस किया। आप इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं और पढ़ते हुए कहीं ठहरते हैं तो यही सोचकर कि जो पढ़ा है, उस पढ़े हुए का रंग-रोग़न अपने ज़ेहन में बचाकर रख लिया जाए। मन बेचैन हो तो इस रंग-रोग़न से बेचैनी दूर की जा सके। गीताश्री का रंग-रोग़न उम्मीदों से भरा जो है। यही वजह है कि कइयों के मुक़ाबले इनके उपन्यास का कथातत्व मुझे ज़्यादा प्रभावकारी लगा। गीताश्री के कथातत्व से धपाधप की आवाज़ से साबक़ा न पड़कर एक ऐसी महीन आवाज़ से आपका साबक़ा पड़ता है, जो आपकी रूह तक को कई जीवन-चित्र दिखाती है और यह महीन आवाज़ आपके भीतर पैबस्त हो जाती है ताकि गीताश्री के कथा-समय से आप किसी तरह का अजनबीपन महसूस न कर सकें। इसी तरह आपको 'हसीनाबाद' के हर पात्र की हर अदा भी अपने क़ब्ज़े में कर लेती है। चूँकि 'हसीनाबाद' के सारे पात्र ज़िंदा पात्र हैं। सभी पात्र अपना पक्ष जीतने को तत्पर भी दिखाई देते हैं :
          ठाकुर सजावल सिंह के यहाँ आज रौनक़ थी। उनके बेटे रमेश का जन्मदिन था। रमेश को उन्होंने अपने मन से अपना लिया था, नाम दिया था, पहचान दी थी। बदनाम गली से ले आए थे अपनी कोठी पर ही। रमेश का नाम भी लिखवा दिया था स्कूल में। इस साल सब कुछ ठीक रहता तो इण्टर पास कर लेता। मगर रमेश का मन ही नहीं होता था बहुत कुछ करने का! रमेश को हर समय अपनी माँ का ध्यान आता। उसे हर समय लगता कि आख़िर ऐसा हुआ क्या था कि वह उसे छोड़कर चली गई? क्या उसके बाबा ने माँ को परेशान किया था? मगर बाबा की भी तो अपनी एक और बीवी है, जो दिल्ली में है और बाबा के बच्चे भी दिल्ली में पढ़ते हैं। तो वह उनका बेटा कैसे है? हसीनाबाद की गलियों में रहते-रहते वह हसीनाबाद के इतिहास से परिचित हो गया था ( पृ. 86 )।

     'हसीनाबाद' जैसी बदनाम बस्ती दुनिया भर में पहले भी थी। अब भी है। मेरे पैदायशी शहर मुंगेर में तो इस बदनाम बस्ती को मैंने बहुत क़रीब से देखा है। जाना भी है। इसी बदनाम बस्ती में मेरे जानने वाले एक कॉमरेड एक हसीना को दिल से बैठे। बाद में बाज़ाब्ता शादी कर ली। घर बसाया। बच्चों को ईमानदारी से अपना नाम दिया, किरदार दिया, ठिकाना दिया। गीताश्री के 'हसीनाबाद' के पात्र भी ऐसा करते हैं तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। आश्चर्य राजनीति के घातकपन से होता है। यह नया दौर है। इस नए दौर में राजनीति का चेहरा-मोहरा, रंग-ढंग, चाल-चलन सब जनता को परेशान करने को तत्पर रहता है। इस तत्परता का पर्दाफ़ाश भी इस उपन्यास में बख़ूबी किया गया है। पिंजरे के परिंदे जैसी हालत आज आज की राजनीति के कारण है। इसमें कोई शक नहीं। मगर गीताश्री इस बुरे अनुभवों के बारे में सबकुछ जानती हैं। समझती भी हैं। लेखिका की सार्थकता इसी में है।
     एक सच्चाई यह भी है कि इसको पढ़ते हुए जो नया समा बंधना चाहिए, नहीं बँधता। ऐसी बदनाम बस्ती पर और ऐसी तथाकथित राजनीति पर हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। इस वजह से भी किसी नए तत्व की चाह इस उपन्यास को पढ़कर रह ही जाती है। मगर इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि गीताश्री का यह उपन्यास कम दिलचस्प है। क़िस्सागोई का तरीक़ा गीताश्री के पास है। अपने इस उपन्यास के बहाने इसके कथा-समय को छीलने में गीताश्री पूरी तरह सफल दिखाई देती हैं। यह उपन्यास एक गुमनाम और बदनाम बस्ती से होते हुए राजनीति के गलियारे तक जाता है। यही वजह है कि 'हसीनाबाद' हिंदी की उपन्यास-परंपरा के साँचे में पूरी तरह ढला लगता है। यह साँचा रचनात्मक है। यह उपन्यास आपको अपने आसपास बाँधे रखता है। प्रकाशक की तरफ़ से उपन्यास के बारे में दी हुई यह सफ़ाई सही है कि 'हसीबाबाद' के नाम से ये भ्रम हो सकता है कि यह उपन्यास स्त्रियों की दशा-दुर्दशा पर केंद्रित है लेकिन नहीं, 'हसीनाबाद' ख़ालिस राजनीतिक उपन्यास है जिसमें इसकी लेखिका औसत को केंद्र में लाने के उपक्रम में विशिष्ट को व्यापक से संबद्ध करती चलती है।' प्रकाशक का यह कथन सच है, तब भी यह उपन्यास स्त्रियों के बहाने ही अपने लोकजीवन को प्राप्त करता है। गीताश्री के इस 'हसीनाबाद' से गुज़रते हुए हम अपने दाँत निपोरकर रह नहीं जाते बल्कि राजनीति के विरुद्ध हमारा जो लोकस्वर होना चाहिए, वही अंत तक बचा रहता है। हम इस 'हसीनाबाद' को पढ़कर एक अच्छा गद्य लिखने का तरीका सीख सकते हैं।
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हसीनाबाद ( उपन्यास ) / लेखिका : गीताश्री / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002 / मूल्य : ₹ 250 / मोबाइल संपर्क : 09818246059
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