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गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

अरुण कमल ने कहा कि दुनिया का सारा साहित्य एक ही है भले ही वह अलग-अलग भाषाओं में लिखा जाता है।


पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए बिहार के प्रख्यात साहित्यकार/ कवि अरूण कमल।



पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में गुरूवार को हिंदी कविता के लिए साहित्य अकादमी से सम्मानित बिहार के पहले हिंदी कवि अरुण कमल के काव्य-पाठ के साथ उनसे संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया । 


कार्यक्रम की शुरुआत में विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ. दिलीप राम ने अंग वस्त्रम और पुष्प-गुच्छ देकर अरुण कमल का सम्मान किया और उनकी कविताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी भी की।


हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. तरुण कुमार ने स्वागत संभाषण में अरुण कमल की कविता को साधारणता का उत्सव मनाने वाली कविता बताते हुए उनकी कुछ पसंदीदा कविताओं का पाठ भी किया।


विभाग के विद्यार्थियों में समीर ने अरुण की कमल की 'धार' शीर्षक कविता, नंदिनी ने 'मुक्ति' , पूजा ने 'घोषणा', रूपम ने 'बुढ़ापा' , गौरव ने 'उत्तम', आफ़ताब ने 'उधर के चोर', संतोष ने 'सूचकांक', वसुधा ने 'पूंजी', नेहा ने 'निगेटिव फोटो' का पाठ किया।


अंत में कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए अरुण कमल ने कहा कि दुनिया का सारा साहित्य एक ही है भले ही वह अलग-अलग भाषाओं में लिखा जाता है।


पटना विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे अरुण जी ने कहा कि हिंदी विभाग, पटना विश्वविद्यालय ने मुझे साहित्यिक रूप से पोषित किया। इस क्रम में उन्होंने पंडित रामावतार शर्मा, केसरी कुमार, देवेंद्रनाथ शर्मा, नंदकिशोर नवल, रामवचन राय इत्यादि विद्वानों को याद किया।


उन्होंने एक कवि के तौर पर एक ऐसे समाज की रुपरेखा रखी जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति भी सुरक्षित रह सके। किसी तरह की गैर बराबरी न हो। उन्होंने हिंदी के विद्यार्थियों को खास तौर पर संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी के साहित्य को पढ़ने का सुझाव दिया l

बाद में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि कविता में गुटबंदी जैसी कोई चीज नहीं होती है। कविता में सब अपनी दौड़ दौड़ते हैं। इसमें कोई हार-जीत नहीं होती।


धर्म से संवाद सम्बंधित एक अन्य सवाल सम्बन्ध में उनका कहना था कि असल सवाल मनुष्यता का है, धर्म का नहीं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई धर्म मानता है या नहीं।


उन्होंने स्त्री लेखिकाओं और युवा कवियों की नयी पीढ़ी की तारीफ करते हुए कहा कि इतने सम्भावनाशील पीढ़ी हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य में नयी घटना है।


उन्होंने कार्यक्रम के अंत में अपनी कविता 'घोषणा', 'योगफल', 'मेख', 'कॉलेज का अंतिम दिन' का पाठ किया। कविता पाठ करते-करते वे भावुक भी हो गए।


इस अवसर पर हिंदी विभाग,पटना कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. मार्तण्ड प्रगल्भ, डॉ. कंचन कुमारी, डॉ. राकेश शर्मा, डॉ. जैनेन्द्र कुमार, डॉ. सूर्यनाथ सिंह, डॉ. पीयूष राज, डॉ. सुधांशु सहित विभाग के शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।


कार्यक्रम का संचालन डॉ. सितारे हिन्द ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रेणु चौधरी ने किया l

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

पटना बाढ़ डायरी : सरकार मस्त जनता पस्त

आज फिर शनिवार आ गया। वह दिन भी शनिवार ही था जब पहली बार बीच शहर में पानी जमा था। नहीं पटना शहर का कुछ हिस्सा एक दिन की बारिश में  ही डूब गया था।




साजिश थी या नहीं ये तो कोई नहीं बता सकता क्योंकि बहत्तर घंटा पहले भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई थी और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। नाले की सफाई आदि की बात बहुत घिसीपिटी है। सरकार की नाकामी की बात करना, किसी निर्लज्ज को महत्त्वपूर्ण बनाना है।

महत्त्वपूर्ण महज इतना है कि नुकसान हुआ जनता का और मालामाल हुई सरकार। जो कष्ट जलकैदी बन लोगों ने भोगे उसके बदले में कोई राहत तो संभव ही नहीं। जिन सामानों का नुकसान हुआ उसका मुआवजा सरकार तो देगी नहीं। लेकिन भिखमंगे की तरह राहत कोष में दान के नाम पर पोस्टर-बैनर पहले जारी कर दिये सरकार ने। साथ-ही-साथ केंद्र सरकार से भी माँगने पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि झोली में कुछ न कुछ आनी ही है।

और सबसे बड़ी बात की राहत कार्य आदि का लेखा-जोखा रखने का रिवाज ही नहीं है। जो है सो घर भरने से ही मतलब है। एक बार लेखा-जोखा भी हुआ तो पटना के डीएम बेचारे गौतम गोस्वामी जी असमय ही जेल में रहते हुए ही दूसरी दुनिया को कूच कर गये।

खैर, अंतिम बात यही कि अमूमन सरकार बाढ़-सुखाड़ का इंतजार ही करती है ताकि घर में हरियाली और चमक-धमक बनी रहे।

★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 29 सितंबर 2019

पटना है पानी पानी दुर्गापूजा से पहले ही

दुर्गापूजा का आज हो गया है आगाज। लेकिन एक दिन पहले से ही है #पटना पानी में बेहाल। लक्षण देखकर तो मान लिया था कि इस बार दुर्गा पूजा में घूमना होगा थोड़ा मुश्किल, लेकिन ये ना सोचा था कि लोग शाम में आरती दिखाने के लिए भी जाएंगे तरस? कहाँ ढ़ूढ़ेंगें वे उन आस्था की मूर्तियों को आसपास में? गर जो याद भी आई पत्थर की मूर्तियों से सजे मंदिर की, तो कौन जाएगा इतनी दूर डूब कर छाती भर पानी में? भक्ति दिखाने के लिए मन चंगा तो कठौती में गंगा भी काफी है।








लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर  को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

शंभु पी सिंह की दलित बाभन का लोकार्पण




कॉलेज ऑफ कॉमर्स आर्ट्स एंड साइंस के सभागार में प्रलेस एवं कॉलेज ऑफ कॉमर्स ऑर्ट्स एंड साइंस के संयुक्त तत्वावधान में शंभु पी सिंह के कथा-संग्रह दलित बाभन का लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी आयोजित किया गया।

वरिष्ठ कथाकार श्रीमती मृदुला बिहारी जयपुर से शिरकत करने पधारी थीं।मुख्य अतिथि के रूप में प्रो.डॉ रामवचन राय, विधान पार्षद के साथ शैलेश्वर सती प्रसाद की अध्यक्षता में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।मुख्य वक्ता के रूप में डॉ शिव नारायण, डॉ कासिम खुरशीद, कोलकाता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ अमरनाथ,वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज,वरिष्ठ साहित्यकार श्री राम तिवारी के अतिरिक्त युवा कथाकार सुशील भारद्वाज और युवा कवि राजकिशोर राजन ने भी अपने विचार व्यक्त किया।फतुहा से पधारे लघु कथाकार श्री रामयतन यादव जी ने कहानी के कई पक्षों पर बात की। प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्ष डॉ रानी श्रीवास्तव ने मंच संचालन की जिम्मेदारी संभाली और कॉलेज के प्राचार्य डॉ तपन कुमार शांडिल्य ने अतिथियों का स्वागत के साथ कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी पर अपने विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर शहर के कई गणमान्य साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।जिसमें कवियत्री किरण सिंह, साहित्यकार डॉ मंगला रानी,कवि सिध्देश्वर,लोकगायिका नीतू नवगीत के अतिरिक्त समाजसेवी डॉ पी एस दयाल यति भी शामिल थे।

दलित बाभन अपने देशकाल की भावना पर लिखी गई कहानी है लेकिन लेखक कभी भावना में बहता नहीं। कहानी में न आदर्श है न समाधान। इन कहानियों में जीवन संघर्ष की कड़वी सच्चाई है। मृदुला बिहारी अपना यह वक्तव्य दे रही थीं शंभु पी सिंह के कथा संग्रह दलित बाभन के लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी में।

मौके पर स्वागत करते हुए कॉलेज के प्राचार्य तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि दलित बाभन लिखकर लेखक ने दलितों को जागरूक करने की कोशिश की है। वहीं कासिम खुर्शीद ने कहा कि दलित बाभन में कंटाहा ब्राह्मण की दयनीय स्थिति को रेखांकित की गई है। नायिका कहती है कि दलित को तो कानूनी संरक्षण प्राप्त है लेकिन कंटाहा को वो भी नसीब नहीं।
राजकिशोर राजन ने कहा कि दलित बाभन कथा संग्रह भारतीय समाज में हो रहे आमूल-चूल परिवर्तन को रेखांकित किया गया है। शंभु जी की प्रत्येक कहानी में एक सवाल पाठकों के लिए छोड़ती है।
शिवनारायण ने कहा कि इस संग्रह में कहानियों का संग्रह में जिस शिल्प का प्रयोग किया गया है वह हमें विमलमित्र की याद दिलाती है। संग्रह में समाज के विभिन्न यथार्थ को उकेरने की सफल कोशिश की गई है।
रामवचन राय ने अपनी बात रखते हुए कहा कि शंभु जी की कहानियां बेलौस और संतुलित है। यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कार्यक्रम का संचालन कर रही रानी श्रीवास्तव ने कहा कि इस संग्रह में दहेज और आरक्षण के मुद्दे को भी उठाया गया है।
अपनी लेखकीय बात रखते हुए शंभु पी सिंह ने कहा कि मेरी कहानी किसी को हँसाती है, रूलाती है। यही हमारी सफलता है।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए शैलेश्वर सती प्रसाद ने अपनी बात रखी और राजकिशोर राजन ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

जागरण का बिहार संवादी बिहार साहित्य में एक दीवार खींच गया


जागरण का बिहार संवादी बिहार साहित्य में एक दीवार खींच गया





सुशील कुमार भारद्वाज
गत दिनों पटना में दैनिक जागरण का कार्यक्रम "बिहार संवादी" आयोजित हुआ जो कि शुरू से आज तक चर्चा में बना हुआ है। पक्ष-विपक्ष और वहिष्कार-समर्थन की बातें बहुत हुई। लेकिन अजीब संयोग है कि कार्यक्रम किसी का और झगड़ा किसी से। भावनात्मक रूप से इस द्वंद्व में काफी लोग घायल हुए हैं। इन चोटों को भरने में शायद कुछ वक्त लगे। संभव है कि इसके कुछ दूरगामी परिणाम भी आएं। खैर, बिना किसी मामले में फंसे मैंनें एक निष्पक्ष रपट बनाने की कोशिश की है आपलोगों के लिए. 
पटना के तारामंडल सभागार में दैनिक जागरण के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ‘बिहार संवादी’ अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया. जैसे तीन साल पहले 27-29 अप्रैल 2015 को इसी सभागार में अखिल भारतीय कथा समारोह भूकंप के झटकों के बीच संपन्न हुआ था वैसे ही ‘बिहार संवादी’ भी अनिश्चितताओं और वहिष्कार के हंगामें के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हो गया. कथा–समारोह जहां माँ-बेटी, पति-पत्नी और पत्नी-पति के आरोपों से घिरी रही तो ‘बिहार संवादी’ मैथिली को बोली कहे जाने के आरोपों के बीच. 
जब कार्यक्रम अपने नियत तिथि के करीब थी उसी समय ‘मैथिली’ को बोली कहे जाने से नाराज ‘विभूति आनंद’ ने खुद को कार्यक्रम से अलग होने की घोषणा कर दी. जबकि इन्हीं दिनों दैनिक जागरण के सहयोग से ही आयोजित कार्यक्रम ‘आखर’ में भोजपुरी वालों ने घोषणा कर दी कि- “चुनाव का मौसम है और ऐसी तैयारी करें कि यदि जो भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया तो भोजपुरी समाज वोट नहीं देंगें.” इसी कार्यक्रम में मैथिली संस्कृति, भाषा और सिनेमा की तुलना भोजपुरी से की गई. जबकि पिछले दिनों ही उषाकिरण खान और विभूति आनंद समेत कई दिग्गज मैथिलीप्रेमी साहित्यकारों ने “मैथिली” को राजभाषा का दर्जा दिलाने की मुहिम छेड़ी थी. और कहीं-न-कहीं संकेत मिल गया था कि श्रेष्ठता की लड़ाई कहीं-न-कहीं शुरू हो गई है. क्योंकि कुछ भोजपुरिया लोग अपनी भाषा को चांद और मंगल तक पहुंची भाषा बताने लगे. वे भोजपुरी को बोली के रूप में मानने से भी कतराने लगे.

इसी बीच कठुआ प्रसंग की एक खबर ने अखबार को विवादों में घसीट लिया. जिसकी वजह से विरोधियों को एक बेहतरीन मौका मिल गया. जहां एक ओर मैथिली अस्मिता के नाम पर विरोध शुरू हुआ वहीं कुछ को कठुआ के मामले में अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई. तीसरे किस्म के वे लोग थे जिन्हें मंच पर मौका नहीं मिला और कहने लगे –एक ही चेहरा हर कार्यक्रम में क्यों? दूसरे को मौका क्यों नहीं?
इन्हीं सब अनिश्चिताओं के बीच 20 अप्रैल 2018 को पटना के मौर्या होटल में सभी स्थानीय वक्ताओं को एक कार्यक्रम में बुलाया गया और अधिकांश उसमें शरीक भी हुए और देर रात वहीं जमें भी रहे. और मैथिली के लिए एक नए वक्ता को तलाश भी लिया गया. लेकिन 21 अप्रैल 2018 के सुबह नौ बजे के बाद कुछ वक्ताओं (अधिकांश कवियों) की अंतरात्मा जगने लगी और धीरे-धीरे कठुआ या मैथिली के नाम पर कार्यक्रम से अलग होने की घोषणा फेसबुक आदि से करने लगे. और एक बजे दिन तक में लगभग दस वक्ताओं ने अपने नाम की वापसी की घोषणा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कर दी. जबकि राज की बात है कि मैथिली स्टूडेंट यूनियन के बैनर तले कुछ उग्र युवा तारामंडल के मेनगेट पर साढ़े नौ बजे से ही तैनात हो गए थे और सबको लानत भेज रहे थे. विश्वस्त सूत्र से जानकारी मिली थी कि कार्यक्रम को असफल करने की हर संभव कोशिश वे लोग करेंगें और मैथिली के प्रतिनिधि प्रो० वीरेन्द्र झा को देखते ही पिटाई करते हुए दुर्गत कर देंगें. किसी भी हाल में वे सभागार में न पहुँच सकें.
लेकिन कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया और दैनिक जागरण बेस्टसेलर की चौथी तिमाही सूची की घोषणा की गई. और पहले सत्र, ‘साहित्य का सत्ता विमर्श’, में  रंगकर्मी अनीस अंकुर ने विधान पार्षद प्रो रामबचन राय और रेवती रमण से बातचीत शुरू की. हालांकि अनीस अंकुर ने मंच से ही विरोधी स्वर को हवा दी. दूसरे सत्र में हृदयनारायण दीक्षित और एस एन चौधरी ने ‘नया समाज और राष्ट्रवाद’ पर अपना विचार रखा. तीसरे सत्र में राणा यशवंत ने ‘बिहार: मीडिया की चुनौतियां’ पर खुलकर बोले. चौथे सत्र में ‘नए पुराने के फेर में लेखन’ पर शशिकांत मिश्र, क्षितिज रॉय, प्रवीण कुमार ने अवधेश प्रीत के विभिन्न सवालों के जबाब दिए. जबकि पांचवे सत्र में उदय शंकर से वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने बेहतरीन बातचीत की. छठे सत्र में अनिल विभाकर, रमेश ऋतम्भर और अरुण नारायण ने ‘जाति के जंजाल में साहित्य’ विषय पर अनंत विजय के सवालों पर अपनी राय रखी. जबकि पहले दिन का समापन राजशेखर के मजनूं के टीला से हुआ.

मैथिली समर्थक पहले दिन सुबह से कड़ी धूप में गेट के बाहर बैठे रहे और शाम चार बजे के लगभग पुलिस की पहल पर वहां से हटाए गए. जबकि दूसरे दिन क्रांतिकारी मैथिली समर्थक अपने नए और उग्र तेवर के साथ दरवाजे पर फिर से बैठ गए. जबकि राउंड टेबल टॉक में प्रो० जितेन्द्र वत्स और डॉ विनय चौधरी ‘विश्विद्यालयों में हिंदी’ के बहाने अंदरखाने में भरे सड़ांध पर बेबाक बोल रहे थे. तो ऋषिकेश सुलभ, रामधारी सिंह दिवाकर, शिवदयाल ‘बिहार की कथाभूमि’ पर अपने विचार प्रेम भारद्वाज के सवालों के जबाबों में दे रहे थे. तो माहौल को मोहब्बत के रंग में रंग दिया गीताश्री, रत्नेश्वर,गिरीन्द्रनाथ झा और भावना शेखर ने. तब तीसरे सत्र में अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, अनिल विभाकर, और अनु सिंह चौधरी ने रचनात्मकता का समकाल विषय पर अपनी बात रखी.
चौथे सत्र की शुरूआत होती उससे पहले ही अधिकांश क्रांतिकारी मैथिली समर्थकों ने सभागार में अपनी जगह बना ली. और ज्योंहि अनंत विजय ने ‘बिन बोली भाषा सुन?’ विषय पर बात करने के लिए मंच पर उपस्थित प्रो० वीरेन्द्र झा, अनिरुद्ध सिन्हा, नरेन, निराला तिवारी का परिचय दे कुछ कहना शुरू किया ही कि एक मैथिल ने अपने सीट से उठकर मैथिली के सन्दर्भ में आपत्ति की और अनंतजी कुछ जबाब देते उससे पहले ही सारे मैथिल हंगामा करने लगे. कुर्सियों पर चढ़कर मुर्दाबाद-जिंदाबाद करने लगे. आयोजकों की कोई बात सुने बगैर वे मंच के करीब होते हुए मंच पर चढ़ गए और धक्कामुक्की करने लगे. मंच पर जूते-चप्पल उछलने लगे. इसी बीच कुछ लड़कों ने मिलकर वीरेन्द्र झा के मुंह में स्याही पोत दी. जिसके छींटे अन्य उपस्थित लोगों पर भी पड़े. अंत में कोतवाली थाना के सिपाही आए और हंगामा करनेवालों को दबोचकर ले गए. तब तक सभागार से सामान्य दर्शक/ श्रोता बाहर आ चुके थे.
हंगामे के बाद फिर वहीं से सत्र की शुरूआत की गई. जिसमें हर वक्ता ने तुलनात्मक रूप से मैथिली, मगही, भोजपुरी, और अंगिका को सर्वश्रेठ भाषा माना. किसी ने खुद को बोली के रूप में स्वीकार नहीं किया. और इस तीखी नोकझोंक ने सभागार के माहौल को खुशनुमा बना दिया. दर्शकों ने तालियां पिटी.
पांचवे सत्र में प्रो तरुण कुमार और आशा प्रभात ने ‘सीता के कितने मिथ’ पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए. तो छठे सत्र में महुआ माझी, डॉ सुनीता गुप्ता और सुशील कुमार भारद्वाज ने ‘परिधि से केंद्र की दस्तक (हाशिए का साहित्य)’ विषय पर शहंशाह आलम के सवालों के यथोचित जबाब दिए. सातवें सत्र में ‘धर्म और साहित्य’ विषय पर नरेन्द्र कोहली से एसपी सिंह ने बात की. और अंतिम सत्र में विनोद अनुपम ने पंकज त्रिपाठी से ‘सिनेमा में बिहारी’ विषय पर बात की.
इस तरीके से यह दो-दिवसीय कार्यक्रम समाप्त हो गया. और दो दिन के इन सत्रों में दर्शक सभागार में जिस तरीके से जमे रहे वह पिछले कथा-समारोह में आए लोगों से कतई कम नहीं थे. हां, ये अलग बात है कि दिन की तुलना में शाम में भीड़ अधिक रही. और इस आयोजन ने कई लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ भी दिया. राजनीति के तर्ज पर देखें तो शायद आने वाले दिनों में साहित्य में कुछ नए समीकरण पटना की धरती पर बनते-बिगड़ते नज़र आए.

संपर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com


शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट):सुशील कुमार भारद्वाज


वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट)

सुशील कुमार भारद्वाज


डॉ० चतुर्भुज की स्मृति में आयोजित 9वीं अखिल भारतीय ऐतिहासिक नाट्य महोत्सव 2018 के चौथे दिन 20  फरवरी 2018 को अभियान सांस्कृतिक मंच के दल ने बृजेश द्वारा लिखित और राजू कुमार द्वारा निर्देशित नाटक शम्बूक वध का मंचन किया.


नाटक अपने सारगर्भित कथ्य और कलाकारों के दमदार अभिनय से दर्शकों को लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादे समय तक बांधे रखा. दर्शक न सिर्फ हास्य दृश्य पर हंसते, और दमदार अभिनय एवं संवाद पर ताली पीटते रहे बल्कि कथा को नए दृष्टिकोण के साथ देखते, समझते और विचारते भी रहे.
नाटक ऐतिहासिक व पौराणिक कथा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. सर्वप्रथम नाटक शम्बूक वध के पृष्ठभूमि को चित्रित करने की कोशिश करता है. इसी क्रम में यह स्पष्ट होता है कि जब चौदह वर्षों के वनबास के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं तो सत्ता संचालन के लिए वे क्या-क्या कदम उठाते हैं? सबों की सुख-शांति के लिए किस प्रकार की राज्यव्यवस्था करते हैं? सबों को एक साथ समेटने के लिए किस तरह निषादराज और शबरी की कहानी को प्रचारित किया जाता है? किस प्रकार से चातुर्य वर्णव्यवस्था के कट्टर समर्थक अपनी असहजता के बीच छटपटाते रहते हैं और किस-किस तरह की साजिश रचते रहते हैं?



एक तरफ राज्य में शूद्रों के लिए विद्यालय, जलाशय और कहवाघर खोलने की बातें होती हैं तो दूसरी तरफ छुआछूत का प्रपंच भी बदस्तूर जारी रहता है. राज्य के भद्र लोग, वणिक आदि ही नहीं बल्कि आलाअधिकारी सुशर्मा और गुरू वशिष्ठ की भवें भी इस व्यवस्था से तनी रहती हैं. जबकि गुरू वशिष्ठ की पत्नी देवी अरुंधती भी शूद्र, अन्त्यज रहती है. फिर भी वे वर्ण सामंजस्य और वर्णभेद की महीन रेखा के बीच अर्थ तलाशते नज़र आते हैं.ये लोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिए श्रीराम को भी इस्तेमाल करते रहते हैं. राज्य-प्रशासन के लिए नियम-उपनियम और शास्त्र की बात कर श्रीराम को गुमराह करते रहते हैं. शूद्रों को ही नियंत्रित करने की कोशिश ये लोग नहीं करते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं शासन करने की भी कोशिश करते रहते हैं. गुरू वशिष्ठ पूरे वर्ण व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए व्रत जैसे पात्रों का भी इस्तेमाल करते हैं जो शम्बूक और उनके बीच एक कड़ी के रूप में भी काम करता है. व्रत गुरू वशिष्ठ के परामर्श पर प्रलोभन देकर शम्बूक को अपने पथ से विचलित कर अपने पक्ष में कर राम को सबल करने की असफल कोशिश भी करता है.
नाटक में धोबनें, पुक्कस और सिपाही हैं तो भट्टारक भी हैं.  बढ़ई वृदु कलिंग के राजपुरोहित की बेटी वलया से भागकर अंतरजातीय विवाह करता है तो गोत्रविहीन सत्यकाम जाबाला भी महर्षि गौतम से मिले जनेऊ के धागे के बीच छटपटा रहा है लेकिन मानवीय हानि को देखते हुए शूद्रों के सामूहिक वेदपाठ का विरोध करता है. वह सीधी लड़ाई की बात करता है.
लेकिन विषम परिस्थिति में वशिष्ठ आदि के परामर्श पर श्रीराम शम्बूक का वध कर देते हैं. नाटक में कथा को एक नए दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की गई है. जिस तरह नाटक में श्रीराम अप्रस्तुत होकर भी प्रस्तुत हैं वैसे ही संवादों के माध्यम से बहुत सारे सारगर्भित प्रश्नों व विचारों को प्रक्षेपित करने की भी कोशिश की गई है.
राजू कुमार निर्देशित इस नाटक में गौतम गुलाल (शम्बूक), अनीश अंकुर (सुशर्मा), जय प्रकाश (सत्यकाम), आशुतोष कुमार (वशिष्ठ), सुशील कुमार भारद्वाज (वीरावर्मन), आदर्श रंजन (धनगुप्त), संजय कुमार सिंह (भट्टारक, विरोचन), राजू कुमार (वृदु), अनुप्रिया (वलया), अंजली शर्मा(धोबन, जाबाला), सुशील कुमार देव(पंडित), मयंक कुमार शर्मा (पुण्डरीक), इन्द्रजीत (कन्हाई), अभिषेक (सिपाही), राज कुमार (वसंतक), सुधांशु शांडिल्य (व्रत), सौरभ कुमार, कृष्णा, अभिषेक, लक्ष्मी राजपूत, पिंकी, मुस्कान आदि ने अपनी दमदार अभिनय से नाटक को सफल बनाया. वहीं नवलेश शर्मा की संगीत परिकल्पना से भी नाटक को मजबूती प्रदान की.
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मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब
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आज जब राजेंद्र नगर से लौटते हुए पटना जंक्शन से गुजर रहा था तो थोड़ा अजीब लग रहा था। भीड़ थोड़ी कम लग रही थी। शायद मौसम का असर रहा हो। फिर लगा कि शायद अतिक्रमण हटाया गया हो क्योंकि आज मीठापुर और चिड़ीयांटांड फ्लाईओवर को जोड़नेवाले नए पुल का भी उद्घाटन है। तीसरी बात कि ऑटो वाले को भी वहां से हटाकर बगल वाले मल्टिपार्किंग कम्पलेक्स में शिफ्ट कर दिया गया है।
इन सभी कारणों को सोच ही रहा था कि जंक्शन के ठीक सामने आते ही गोलम्बर में चमकते बुद्ध की मूर्ति पर नजर पड़ी। कभी इस गोलम्बर में एकलौते नेहरूजी की प्रतिमा चमकती नजर आती थी। लेकिन आज उनकी स्थिति देखकर थोड़ा दुख हुआ। बेचारे धूल-गंदगी में नहाए हुए थे जबकि बुद्ध यूँ चमकते हुए मुस्कुरा रहे थे कि लगा उन्हें अभी-अभी ही ग्यान की प्राप्ति हुई हो।खैर, महावीर मंदिर के ठीक सामने पुल पर ही मंच सज कर तैयार था। आगे बढ़ा तो जीपीओ गोलम्बर के पास आते ही लोहिया जी की याद आई। गोलम्बर तो ज्यों का त्यों ही है बस बेचारे लोहिया जी की मूर्ति वहां नहीं थी। कुछ वर्ष पहले ही वहां से हटा दिया गया था। हटाने की वजह क्या थी?- ये बात तो राजनेता ही बेहतर जानें! हम तो बस इतना ही जानते हैं कि एक छोड़ पर नेहरूजी मार्ग दिखा रहे थे तो आर ब्लॉक में चौराहा पर बाबू वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर तलवार लहराते नजर आते थे तो बीच में लोहिया जी ही गरीबों -मजदूरों को पनाह देते थें। वहीं लोग सब्जी, पान, आदि की दुकान सजाए नजर आते थे।
जब आर ब्लॉक पहुंचा तो देखा कि बाबू वीर कुवंर सिंह भी धूल-गर्द में सने हुए थे। फ्लाईओवर बनाने में लगे मजदूर उनकी मूर्ति के चारों ओर इतने गड्ढे बना दिए हैं कि कभी-कभी डर लगने लगता है कि बेचारे का घोड़ा न कहीं लुढ़क जाए।
खैर, पटना बदल रहा है। पटना की आबोहवा बदल रही है। राजनीति बदल रही है फिर नेहरूजी को थोड़ा गंदगी से एलर्जी की बीमारी थोड़े ही न हो जाएगी! रही बात बाबू वीर कुवंर की तो स्वतंत्रता सेनानियों को अब कौन पूछता है? अब तो ये भी नहीं पता चलता साफ-साफ कि उनकी महत्ता किसी दल के लिए मायने भी रखता है?
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सुशील कुमार भारद्वाज

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सुरेन्द्र स्निग्ध और विनय कंठ को प्रलेस द्वारा श्रद्धांजलि एवं काव्य-गोष्ठी




गत दिनों पटना में कवि, उपन्यासकार, संपादक एवं अध्यापक प्रो सुरेन्द्र स्निग्ध की गंभीर बीमारी की वजह से असमय मृत्यु हो गई. शोकसंतप्त साहित्यकार, रंगकर्मी एवं अध्यापक समेत सभी संबद्ध लोग विभिन्न बैनर तले देश के विभिन्न हिस्से में अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के तत्वाधान में आज 25 दिसंबर 2017 को लेखराज परिसर, पटेल नगर में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा तथा काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया. समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज तथा संचालन प्रलेस की सचिव डॉ रानी श्रीवास्तव ने किया. इस अवसर पर जहां रानी श्रीवास्तव ने सुरेन्द्र स्निग्ध की दो कविताओं 'अंतिम एकांत' तथा 'वर्षा' का पाठ किया वहीं वरिष्ठ कवि एवं कथाकार डॉ शिवनारायण ने सुरेन्द्र स्निग्ध के संस्मरण सुनाते हुए उनके प्रारंभिक जीवन से अब तक के संघर्ष एवं उनके व्यक्तित्व पर चर्चा की.



दूसरे सत्र में कवि शिवनारायण, शहंशाह आलम, समीर परिमल, रबिन्द्र के दास, अनिल विभाकर, राजकिशोर राजन, विजय प्रकाश, सुजीत वर्मा, ज्योति स्पर्श, नवनीत कृष्ण, गणेशजी बाग़ी, इति मानवी, राजेश कमल आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया. जबकि सुशील कुमार भारद्वाज ने एक लघुकथा सुनाई.



काव्य-गोष्ठी के बीच ही खबर मिली कि बिहार इप्टा के संरक्षक मंडल के सदस्य व जनपक्षधर शिक्षाविद प्रो विनय कुमार कंठ का भी आज असमय निधन हो गया. जिसके बाद अध्यक्ष से बातचीत के बाद दोनों ही कलाप्रेमी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए एक साथ दो मिनट का मौन रखा गया. सभा का समापन गौरव के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ.


सोमवार, 11 दिसंबर 2017

पटना पुस्तक मेला 2017 का ज्ञान भवन में खुशनुमा अनुभव : सुशील कुमार भारद्वाज

पटना पुस्तक मेला 2017 का ज्ञान भवन में खुशनुमा अनुभव
-सुशील कुमार भारद्वाज



पटना पुस्तक मेला 2017 कई कारणों से इस बार चर्चा में रहा. यह मेला न सिर्फ ऐतिहासिक रूप से पहली बार ज्ञान भवन में आयोजित हुआ बल्कि इसकी सजावट की वजह से इसका कुछ लोगों ने तंज कसते हुए “पटना पुस्तक मॉल” तक का नया नामकरण कर दिया. इसे साहित्य के शिफ्टिंग के रूप में भी देखा गया. कहा गया कि जैसे साहित्य आम जनों से कटकर कुछ खास लोगों तक सिमट गया है ठीक उसी तरीके से मेला को भी शिफ्ट करके हाइजैक किया जा रहा है. यह वातानुकूलित माहौल वालों के लिए ही रह जाएगा. दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाला मेला से तुलना करते हुए कहा गया कि वहां का भी मेला कुछ इसी तरीके का होता है लेकिन है तो वह मैदान ही न? जहां थोड़ा खुलापन भी है. आम जन तो कंक्रीट के इस भव्य भवन को देखकर ही अंदर आने से पहले कई बार सोचेंगें कि जाया जाय या नहीं? लेकिन पटनावासियों ने इन सभी गलत धारणाओं को ध्वस्त करते हुए मेले का तहेदिल से स्वागत किया और मेले में अपनी उपस्थिति से मेले का रौनक बढ़ाया.


सच बात तो ये है कि इस बार का मेला आयोजकों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं था. यह आयोजकों के द्वारा तय किया गया जगह नहीं था बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के आग्रह का सम्मान मात्र था. पटना पुस्तक मेला अपने 32 वर्षों के सफर में गाँधी मैदान से अलग सिर्फ पाटलिपुत्रा के मैदान में ही लगा था जहां का अनुभव भी बहुत ही रोमांचकारी नहीं रहा था. सीआरडी के अध्यक्ष श्री रत्नेश्वर सिंह हमेशा कहते रहे- “हमलोगों के लिए भी यह पहला अनुभव है. हमलोग भी फीडबैक ले रहे हैं और मुख्यमंत्री जी को इससे अवगत कराएंगे. उसके बाद देखा जाएगा कि अगली बार मेले का आयोजन गाँधी मैदान में होगा या कहीं और?”.



लेकिन 24वें पटना पुस्तक मेला 2017 में भी पहले की परम्परा को बरकरार रखते हुए न सिर्फ विभिन्न कला क्षेत्रों में युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कारों की घोषणा की गई बल्कि कविता कार्यशाला का भी आयोजन प्रसिद्ध शायर संजय कुंदन और कवि आलोक धन्वा के नेतृत्व में करवाया गया. एक तरफ ज्वलंत मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक से जागरूकता फ़ैलाने की कोशिश की गई तो हर दिन विभिन्न समसामयिक एवं जरूरी मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा का भी आयोजन किया गया. जिसमें बिहार के स्थानीय साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं विचारकों के अलावे देश के विभिन्न राज्यों से आए लब्धप्रतिष्ठित एवं ख्यातिप्राप्त विद्वतजन भी शरीक हुए. अल्पना मिश्र, प्रेम भारद्वाज, अनंत विजय, उर्मिलेश, केदारनाथ सिंह, लीलाधर मंडलोई, सुधीश पचौरी, शिवमूर्ति, आदि समेत विभिन्न लोग इस मेला के साक्षी बने तो बिहार के पद्मश्री उषाकिरण खान, अरुण कमल, वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर, हृषिकेश सुलभ, कर्मेन्दु शिशिर, अवधेश प्रीत, सत्यनारायण जी, आशा प्रभात, गीताश्री, लन्दन से वर्षों बाद पटना आईं शिखा वार्ष्णेय, संतोष दीक्षित, शिवदयाल, प्रेमकुमार मणि, संजीव चन्दन, भावना शेखर, निवेदिता शकील, नीलिमा सिंह, सुनीता गुप्ता, स्मिता, रामधारी सिंह दिवाकर, विनय कुमार, अरविन्द पासवान, श्रीकांत, व्यासजी, दीवानजी, अनिल विभाकर, अनीस अंकुर, पुष्यमित्र, समेत कई गणमान्य लोग लगभग हर दिन मेला की शोभा बने. आयोजकों ने अपनी परम्परा को बरक़रार रखते हुए मनीषा कुलश्रेष्ठ को पहली बार पटना बुलाया. जो कि इस बार के मेला थीम- “लड़की को सामर्थ्य दो, दुनियां बदल देगी” के भी अनुकूल रहा.




पटना पुस्तक मेला 2017 में यदि लोगों को स्टालों के बीच खाने-पीने की चीजों के लिए तरसना पड़ा. खिली धूप में हरी घास पर बैठकर ठहाके लगाने और मस्ती करने से महरूम रहना पड़ा तो चकमक करती फर्श पर उन्हें कहीं भी धूलकण नहीं मिला. ठंडी–गर्मी के मौसमी एहसास से दूर रहे और सबसे बड़ी बात की शौचालय आदि की आधुनिकता का एहसास कराती सारी सुविधाएं मौजूद थीं. मेला परिसर को साफ़-सुथरा रखने के उद्देश्य से चाट-समोसा आदि का ठेला लगाने वालों को ज्ञान भवन और बापू सभागार के बीच वाले इलाके में जगह दिया गया जिस पर लोगों की निगाह मेले से बाहर निकलते वक्त पड़ती थी. फिर भी काफी लोग गाँधी मैदान के खुलेपन को याद कर रहे थे तो इसे भदेस गंवई और आधुनिकता की सांस्कृतिक लड़ाई मानी जा सकती है. कुछ लोगों का कहना था कि अचानक से आया बदलाव तुरंत रास नहीं आता है. एक-दो साल यहां आयोजन हो जाएगा तो लोग गाँधी मैदान की बात लोग भूल जाएंगें. जबकि कुछ लोगों का स्पष्ट विचार था कि दोनों का अनुभव अपनी –अपनी जगह पर सही है किसी को खराब या बेहतर नहीं कहा जा सकता है.



कुछ प्रकाशकों की शिकायत थी कि किराया जिस हिसाब से आयोजकों ने लिया है उस हिसाब से रैक आदि की सुविधा नहीं दी गई है. जबकि कुछ का कहना था कि प्रवेश शुल्क हटा लिया जाना चाहिए. राजकमल प्रकाशन के अलिंद महेश्वरी कहते हैं- “इन्हें बाहर में भी प्रकाशकों का बोर्ड –बैनर लगाने की सुविधा देनी चाहिए या आयोजक अपने स्तर से ही लगाएं ताकि लोग जान सकें कि कौन-कौन आएं हैं और किस स्टाल पर हैं?” अन्तराष्ट्रीय मेला के आयोजन के संबंध में अलिंद कहते हैं- “इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर में थोड़ी सुधर करने की जरूरत है. शैक्षणिक संस्थान आदि जैसे स्टालों को यदि अलग फ्लोर पर कर दिया जाए तो कुछ संभव है.” वहीं वाणी प्रकाशन की अदिति महेश्वरी का मानना है कि- “अन्तराष्ट्रीय मेला का आयोजन यहां करवा पाना थोड़ी जल्दबाजी कही जा सकती है. ये हिन्दी बेल्ट है. अंग्रजी के प्रकाशक आने के लिए शायद तैयार आसानी से न हों. एक प्रकाशक की बात अलग कर दी जाए तो अंग्रेजी के कितने प्रकाशक और कितनी किताबें हैं? फिर दूतावास से संपर्क आदि प्रक्रिया बिना सरकारी सहयोग के कितना संभव है?” कुछ प्रकाशक उल्टे सवाल पूछ रहे थे कि- “मेला में बिहार सरकार की सहभागिता का क्या मतलब है जब किराया इतना वसूला ही जा रहा है?”



जबकि दूसरी ओर मेले में प्रवेश शुल्क भी पहले ही की तरह दस रूपया रखा गया जिससे कि लोगों को कोई कठिनाई नहीं हुई. हां, इस बार के मेले में गाँधी मैदान में यूं ही मंडराने वाले लोग कम ही दिखे. अधिकांश साहित्यप्रेमी, लेखक या जरूरतमंद ही थे जबकि कुछ युवा यूं ही सेल्फी का मजा ले रहे थे जिनको आयोजक प्रोत्साहित भी कर रहे थे ताकि वे सोशल मीडिया पर चर्चा में बने रहें. यहां तक की मेले के अंत में बेस्ट सेल्फी वालें को पुरस्कृत करने की भी बातें हो रही थी.


कुछ लोगों की शिकायत थी कि ज्ञानपीठ, सामयिक आदि जैसे प्रकाशक नहीं आ पाए हैं जहां से सस्ती और जरूरी किताबें मिल जाती थी. लेकिन गौरतलब है कि प्रतिश्रुति जैसे कई प्रकाशक भी पटना पुस्तक मेला में पहली बार आएं हैं. हां, इस बार मिथिला, राजस्थान, गोंड, बंगाल, आदि से आने वाले हस्तशिल्प कला आदि के स्टालों का पूर्ण अभाव था लेकिन आध्यात्म, ज्योतिष कला से संबंधित किताबों, पत्थरों आदि के स्टाल जरूर नज़र आए. हिन्दी की ही तरह उर्दू भाषा की कुछ आध्यात्मिक-गैर-आध्यात्मिक स्टाल भी नज़र आए तो अकादमिक एवं बच्चों के लिए भी किताबों और स्टेशनरी की भी स्टालें जमी हुईं थीं. सरकार की ओर से आपातकालीन स्थिति से निपटने और मद्यपान निषेध जागरूकता के लिए भी स्टाल लगाए गए थे तो शैक्षणिक संस्थानों के भी.



इस बार भी गत वर्षों की तरह मेले में पाखी परिचर्चा का आयोजन हुआ हुआ जहां आशा प्रभात और अमीश त्रिपाठी की अनुपस्थिति में उनकी किताबों के बहाने राम और सीता के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर जम कर चर्चा हुई. जहां अमीश की किताब को ख़ारिज करते और आशा प्रभात की किताब का समर्थन करते ही अधिकांश वक्ता नज़र आए. आयाम, जनशब्द आदि के बैनर तले कविता पाठ हुए तो शेरो-शायरी का भी दौर चला. साथ-ही-साथ नए-नए युवा कवि-कवित्रियों ने भी अपने जलवे दिखलाए. मेला में सिर्फ स्त्री-पुरूष को ही मंच नहीं मिला बल्कि किन्नरों ने भी कस्तूरबा मंच पर निवेदिता शकील से बात करते हुए अपनी भावनाएँ व्यक्त की अपने हक की बात की.


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मेला के उद्घाटन सत्र में सरयू राय की समय की लेख और रत्नेश्वर सिंह की रेखना मेरी जान के लोकार्पण समारोह में अपने सात-निश्चय और दहेजबंदी और शराबबंदी आदि जैसे  सामाजिक जागरूकता के बहाने राजनीति करने की शुरुआत की तो पूर्व सांसद अली अनवर की किताब का लोकार्पण करते समय रशीदन बीबी मंच से ही शिवानंद तिवारी और पूर्व मुख्यमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी नीतीश कुमार और भाजपा को अपने निशाने पर लिया. लालूजी के भाषण से पहले उनके एक प्रशंसक ने उसी मंच से “भाजपा भगाओं देश बचाओं” के तान पर एक गीत भी सुनाया.


हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मेले में लगभग हर दिन औसतन चार किताब का लोकार्पण किया गया. गीताश्री का पहला उपन्यास  हसीनाबाद, निवेदिता शकील की कविता संग्रह प्रेम में डर, सुजीत वर्मा का पहला अंग्रेजी उपन्यास ‘वाकिंग ओन द ग्रीन ग्रास, भावना शेखर की कविता संग्रह मौन का महाशंख, कथाकार कमलेश का पहला कहानी संग्रह दक्खिन टोला, प्रत्युष चंद्र मिश्र का कविता संग्रह पुनपुन और  अन्य कविताएं, बाढ़ और सरकार, रानी पद्मावती आदि प्रमुख रहीं. जबकि राजकमल प्रकाशन की ओर से रविवार के दिन एक साथ तीन-तीन किताब का लोकार्पण कस्तूरबा मंच पर लीलाधर मंडलोई, और अरुण कमल आदि की उपस्थिति में किया गया. जिसमें अवधेश प्रीत की बहुप्रतीक्षित छात्र-युवा राजनीति पर केंद्रित पहला उपन्यास ‘अशोक राजपथ’ थी. तो पुष्यमित्र की चम्पारण सत्याग्रह पर केंद्रित चम्पारण 1917 और विकास कुमार झा की किताब गया-बोधगया पर केंद्रित ‘गयासुर संधान’ रही. जहां सभी वक्ताओं ने सभी लेखकों को शुभाशीष देते हुए उनकी रचनाओं की चर्चा की वहीं प्रभात खबर में ही चम्पारण पर लेख लिखने वाले एक वक्ता ने पुष्यमित्र की रचना की मंच से ही टांग खिंचाई करनी शुरू कर दी.

इस तरीके से सामरिक रूप में देखा जाय तो सम्राट अशोक कन्वेंशन केंद्र में आयोजित पटना पुस्तक मेला 2017 सबों के लिए एक सफल अनुभव रहा. मेला के कन्वेनर अमित झा के शब्दों में- “इस बार के मेला से मैं बहुत खुश हूँ.” हिन्दी के ख्याति प्राप्त कवि अरुण कमल कहते हैं- “मेला यहाँ हुआ इसलिए मैं लगभग हर दिन यहां आ पा रहा हूँ और इतने लोकार्पण और चर्चाओं को सुन पा रहा हूँ वर्ना गाँधी मैदान के धूल में यह कहां संभव था?” दोनों शनिवार और रविवार को मेले में पैर रखने की भी जगह नहीं थी लेकिन यह भीड़ ग्राहक भी बनी इसकी सही जानकारी तो सिर्फ और सिर्फ प्रकाशक ही दे सकते हैं. 
सम्पर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com
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गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर  

 सुशील कुमार भारद्वाज  

प्रगतिशील लेखक संघ,बिहार के तत्वावधान में आयोजित मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह में जब अधिकांश वक्ता मुक्तिबोध के विभिन्न विचारों एवं रचनाओं को उद्धृत करते हुए समकालीन परिदृश्य में दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार पर निशाना साधते हुए भारत में फासिस्टों के आ जाने और उसके प्रभावों के तांडव को रेखांकित कर रहे थे. बाजारवाद और अस्मिता की चर्चा कर रहे थे. तब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए उठे पटना के वयोवृद्ध आलोचक व प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर एक अलग रूप में दिखे. ससमय अध्यक्षीय वक्ता के रूप आमंत्रित होने की सूचना नहीं मिलने की नाराजगी उन्होंने मंच पर ही जाहिर कर दी. और उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं भी मुक्तिबोध की तरह नेहरू के विचारों से पहले सहमत नहीं था. लेकिन जिस तरह अक्सर नेहरू की खबर रखते हुए अंत समय में मुक्तिबोध कहने लगे थे कि “नेहरू के बाद फासिस्ट आ जाएगा. इसलिए नेहरू का होना जरूरी है”. वैसे ही आज मैं भी मानता हूं कि नेहरू अच्छे थे उनके जाने के बाद फासिस्ट का खतरा है. और यह भी सच है कि आज वे सत्ता में आ गए हैं लेकिन अभी तक फासिज्म आया नहीं है. और इसके लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेवार है. जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है. आगे उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को समझना कठिन है. रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें 'अस्मिता की खोज'वाला कवि कहते हैं. इन दोनों ने ही इनका मूल्यांकन गलत किया है. ‘जिस तरह उनकी कविता ‘अंधेरे में’ को पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है. जितना उनके व्यक्तित्व का बखान किया जा रहा है. उतना वे हैं नहीं. सबसे बड़े कवि के रूप में नागार्जुन हैं. और मुक्तिबोध से कई मायने में बेहतर और जनवादी कवि हैं. मुक्तिबोध की कविता का 'अंधेरा'पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है. लोगों को सामंती फासीवाद दिखता है जबकि पूँजीवादी फासीवाद सबसे खतरनाक है.”  आगे उन्होंने कहा कि “मुक्तिबोध ने किताबों पर जो आलोचना प्रस्तुत की है वह उन्हें कुछ हद तक अलग बनाता है.”


खगेन्द्र ठाकुर की बातों का जबाब दूसरे सत्र में आलोक धन्वा ने देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कोई भी कवि छोटा या बड़ा नहीं होता है. जिसने एक भी कविता की वह कवि है. कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे किसी को छोटा और किसी को बड़ा कहा जा सके. मुक्तिबोध ने भी नागार्जुन की तरह जीवन में कई कष्ट देखे. बहुत संघर्ष किए. कोई भी महान कवि यूं ही नहीं बन जाता है. वह अपने परिवेश और पहले से मिले चीजों से भी बहुत कुछ सीखता है. मैंने तो मुक्तिबोध और नागार्जुन  दोनों से ही सीखा है. जिस जमीन को निराला ने तैयार किया उसी को मुक्तिबोध ने आगे बढ़ाया. यदि निराला नहीं होते तो मुक्तिबोध भी नहीं होते.’


दूसरे सत्र 'मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलताको संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा  ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा "एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा 'मुक्तिबोध'. मुक्तिबोध एक लाइट हाउस की तरह से थे." आलोकधन्वा ने आगे कहा "मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे. यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता. जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता. मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया जो उन्हें विजातीय बनाता है. जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता. मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे." 



मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरलीपक्षी और दीमकका जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा "मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है. ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है. मुक्तिबोध साम्राज्यवादपूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे."
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने कहा " मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत को तलाशने की बात की. उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा. भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के 'रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध होने की परिघटना की गहरी समझ से उन्होंने साठ के दशक में ही उस खतरनाक संभावना को पहचान  लिया था जो  समकालीन परिदृश्य में भयावह  ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है. इससे कैसे लड़ा जाएइसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होनेउस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए."

  पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक  तरुण कुमार ने कहा " मुक्तिबोध की पंक्ति 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'. सरकार पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा. कुछ गढ़मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं. हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है. मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता. " तरुण कुमार ने  प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और मुक्तिबोध के बीच के पत्र सन्दर्भ का उदाहरण देते हुए कहा " प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए.  लेखकों पर  प्रहार ज्यादा  हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर  आक्रमण होना चाहिए था. "  
 प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने'मुक्तिबोध जन्मशताब्दी  समारोह  के प्रथम सत्र मेंसमकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध'  को संबोधित करते हुए कहा कि “मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर जनता के संघर्ष में व्यापक रूप से  शामिल हों. मुक्तिबोध वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों में ही सिर्फ लगे रहे. वे संगठनात्मक कामों में भी भाग लिया करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की. 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था.” बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने  समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया " समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा है. जिसका नृशंस स्वरूप  हिटलर की आतताई  सत्ता में दिखती है. उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया  और उसे पराजित किया. आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना  चाहिए. मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं. " जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा " अभावों के बीच बहुसंख्यक  जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे. धारा के प्रतिकूल किस तरह जिया सकता हैएक सार्थकताएक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध. संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं.” चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार  ने परिवारभाषासमाज  से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा " मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था. मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलता. उनका युगबोध इतना व्यापक थाऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है. सरकारी नौकरी से इनकार,  कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी  देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए. अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे." 
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा "मुक्तिबोध जागने और रोने वाले कवि हैं. समय के,यथार्थ से जलने वाले कवि थे. आत्म भर्त्सना के कवि थे. रूढ़िवादी वादी स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है. बेटे को  नौकरी भी लग जाये,पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता. चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध. कविता लिखने के लिए जलना पड़ता हैगलाना पड़ता है." 
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय  के अनुसार "एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ  संघर्ष है.  मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्षकैसे मार्शल ला लग जाता है. मुक्तिबोध  के अंतःकरण का आयतन  बेहद विस्तृत है. प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान गए थे. वे यांत्रिक नहीं थे.”  दूसरे सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा "रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं. सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई."

प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारीडॉ सुनीता कुमारी  गुप्तासंजीवसीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया. संचालन प्रलेस के  प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया. जबकि दूसरे सत्र को परमाणु कुमार,शशांक शेखर ,  रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया. संचालन  कवयित्री  पूनम सिंह ने किया.