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बुधवार, 24 अगस्त 2022

विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत

 बिहार की धरती पर पले-बढ़े विनोद कुमार उर्फ़ विनोद अनुपम ने हिंदी विषय से स्नात्तकोत्तर करने के बाद एफ.टी.आई.आई. पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन में सर्टिफिकेट ग्रहण किया। 1988  में बेस्ट यूथ राइटर का राज्यस्तरीय पुरस्कार पाने वाले विनोद अनुपम ने 2002 में बेस्ट फिल्म क्रिटिक के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड जीता। 65वीं नेशनल फिल्म अवार्ड में जूरी मेम्बर के रूप में अहम भूमिका निभाने के अलावे ये बिहार संगीत नाटक अकादमी के सचिव भी रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये विभन्न फिल्म संस्थान के सदस्य रहे हैं। पटना कलम, राजभवन संवाद, गोरैया, बिहार समाचार एवं उधावना आदि पत्रिका का सम्पादन इन्होंने किया। आपने दूरदर्शन के कुछ धारावाहिक के लिए पटकथा भी लिखी है। लगभग तीन दशक से आप प्रभात खबर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज, कथादेश, पाखी, इंडिया टुडे, सारिका, गंगा, वर्तमान साहित्य, सन्डे इन्डियन, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, आदि पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म समीक्षा, आलेख आदि लिख रहे हैं। प्रस्तुत है विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत के कुछ अंश।

 

Ø आपने सत्यजीत राय की सबसे पहली फिल्म कौन-सी देखी?

 

मैंने कौन-सी फिल्म देखी, महत्वपूर्ण यह नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत में सिनेमा का कोई भी विद्यार्थी सिनेमा पढने, समझने, सीखने की शुरुआत सत्यजीत रे की ही फिल्मों से करता है। हम भी जब सिनेमा समझने के ख्याल से पटना, प्रकाश झा की संस्था “अनुभूति” द्वारा आयोजित ‘फिल्म भाषा और तकनीक’ की कार्यशाला में पहली बार भाग लेने आए, तो सत्यजीत रे ने ही सिनेमा का ककहरा सिखाने को उंगली थामी। फिल्म थी पथेर पंचाली, तब से यह फिल्म न जाने कितनी बार सामने आयी, शायद सौ से भी अधिक बार, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि खत्म होने के पहले हट गए। पथेर पंचाली की यही खासियत है, आपको किसी इमोशनल कविता की तरह बांधे रखती है। ब्लैक एंड व्हाइट उस छोटी सी फिल्म को देखने के बाद वही नहीं रह जाते, जो आप होते हैं। फिल्म आपको बदल देती है, आप थोडे और ज्यादा संवेदनशील, थोडे और विनम्र, थोडे और खूबसूरत इंसान बन जाते हैं। मेरा तो मानना है कि एटनबरो की गांधी की तरह इस फिल्म को भी बार बार दिखाया जाना चाहिए। ताकि हर पीढी इसके इमोशन को महसूस कर सके।

 

 

Ø  सत्यजीत राय की किस फिल्म ने आपको सबसे अधिक और किस रूप में प्रभावित किया?

देखिए, बेस्ट आफ द बेस्ट चुनना काफी मुश्किल होता है। सत्यजीत रे ने सिनेमा को एक सार्थकता दी,एक प्रतिबद्धता दी। उनकी फिल्मों में  प्रस्तुति और तकनीकि विविधता भले ही दिखती है,प्रतिबद्धता से समझौता वे नहीं करते। चाहे बच्चों के लिए ही वे क्यों नहीं फिल्म बना रहे हों? या पारस पत्थर जैसी फंतासी, दर्शकों को तो वही पहुंचता था जो वे पहुंचाना चाहते थे। जाहिर है उनकी हर फिल्म आपको प्रभावित करती है, मैं तो यहां तक कहता हूं कि जब आप सद्गति देखते हैं तो पथेर पंचाली को याद नहीं करते, जब शतरंज के खिलाडी देखते हैं तो जलसाघर को याद नहीं करते। यह सत्यजीत रे की माध्यम, समय और समाज तीनों के प्रति गंभीर समझ के कारण संभव हो पाता है। लेकिन इस सबके बीच पथेर पंचाली जिस तरह कम्युनिकेट करती है, वह उस फिल्म को विल्क्षण बना देती है।छोटे छोटे दृश्यबंध अपने आप में पूरी कथा लेकर आते हैं। इसकी सबसे बडी खासियत इसकी गीतात्मकता या कहें लिरिकल होना भी है। सत्यजीत रे बंगाल के एक समाज के सबसे अंतिम पंक्ति के एक परिवार के दुख को सार्वभौमिक बना देते हैं। यह हालांकि इसी क्रम में बनी तीन फिल्मों की ट्रायलाजी का पहला अंश है, लेकिन दुनिया के दुख के अहसास के लिए मैं इसे के जरुरी फिल्म मानता हूं।

 

 

Ø  वर्तमान सिनेमा पर सत्यजीत राय के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?

 

सत्यजीत रे से किसी ने पूछा था, आप किसके लिए फिल्में बनाते हैं। रे साहब ने बेहिचक कहा था,अपने लिए।उन्होंने आगे कहा था, शब्द अलग हो सकते हैं,बात यही थी कि जब तक आप अपने से ईमानदार नहीं होंगे, दर्शकों से भी ईमानदार नहीं हो सकते। उन्होंने कहा था कि फिल्म मेरे सौंदर्यबोध पर खरी उतरेगी तभी दर्शकों के सौंदर्यबोध को भी संतुष्ट कर सकती है। दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर हम अपने सौंदर्यबोध को कमतर नहीं कर सकते। इस संदर्भ में यदि वर्तमान सिनेमा को देखें तो निराशा होती है। मुख्यधारा की अधिकांश फिल्में दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर बन रही है। अब तो स्थिति यह है कि वह दर्शक भी  आज सिनेमा व्यवसाय से गौण हो गए हैं, तकनीक ने सिनेमा वितरण के तमाम ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे में सिनेमा से जीवन गायब हो गया है, जो सत्यजीत रे की फिल्मों का आधार था। फिल्में अब भी बन रही हैं, क्यों बन रही, किसके लिए बन रही, यह सिनेमा के एजेंडे में है ही नहीं। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि सत्यजीत रे साहब को हमने सम्मान तो काफी दिया, लेकिन उनसे सीखा कुछ भी नहीं। वैसे यह भारतीय समाज की आदत में शुमार है, रामचरित मानस और गीता के साथ भी तो हमने यही किया, रखा,पढा नहीं,पढा तो सीखा नहीं।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने हिन्दी से अधिक बांग्ला में फिल्में बनाई, कम बजट की फिल्में बनाई और सफल रहे। इसे आप किस रूप में देखते हैं?

 

यही तो सत्यजीत रे थे। हिंदी में उन्होंने मात्र दो फिल्म बनायी, एक दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म सद्गति और दूसरी शतरंज के खिलाडी। ये फिल्मे उन्होंने हिंदी में इसलिए नहीं बनायी कि उन्हें एक पैन इंडियन आइडेंटिटी चाहिए थी, हिंदी का बडा बाजार चाहिए। ये फिल्में उन्होंने इसलिए बनाई कि वे प्रेमचंद की कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे,और उन्हें लगता था प्रेमचंद हिंदी में ही बेहतर तरीके से कहे जा सकते हैं। गौरतलब है कि सत्यजीत रे हिंदी में सहज नहीं थे,उन्होंने किसी बातचीत में कहा भी, यदि मैं हिंदी जानता तो शतरंज के खिलाडी और भी बेहतर बन सकती थी। सत्यजीत रे बांग्ला भाषा,बांग्ला समाज,बांग्ला संस्कृति को बेहतर समझते थे, उन्होंने अपनी फिल्में बांग्ला में बनाना तय किया।और उसी समय यह मनवाया कि जो जितना लोकल होगा, वहीं ग्लोबल होगा। ग्लोबल होने के लिए न तो भाषा से दूर होने की जरुरत है, न ही परिवेश से। सबों को पता है आस्कर अवार्ड भी उन्हें कोलकाता उनके घर पर प्रदान किया गया। यह तमाम क्षेत्रीय भाषा के फिल्मकारों के लिए याद रखने की बात है कि सिनेमा के लिए भाषा की सीमा नहीं होती,आप किसी भी भाषा में बेहतर करेंगे तो उसे स्वीकार्यता मिलेगी ही मिलेगी।

 

Ø  बजट की चर्चा छूट गई..

जी, सही याद दिलाया। सत्यजीत रे एक अलग तरह की परिकल्पना के साथ आए थे। लार्जर दैन लाइफ की जगह,जीवन जैसा है,वैसा ही दिखे।जाहिर है कोई भी प्रोड्यूसर उनके लिए जोखिम उठाने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपनी जमा पूंजी से पथेर पंचाली की शुरुआत की। कह सकते हैं पथेर पंचाली के बजट जैसा कुछ था ही नहीं, उन्होंने पूरी फिल्म कागज पर बना ली, ताकि शूटिंग के समय, समय और संसाधन की कम से कम बरबादी हो। पथेर पंचाली की निर्माण प्रक्रिया युवा फिल्मकारों को अवश्य पढनी चाहिए,कि संसाधन कभी फिल्ममेकिंग में बाधा नहीं बनती। कहते हैं एक सीन में टाप ऐंगल शाट लेना था,बजट में क्रेन की सुविधा नहीं थी,रे साहब ने अपने कैमरामैन सुब्रतो मित्रा को पेड पर चढ शाट लेने की सलाह दी। शाट उसी तरह लिया गया, और दर्शक क्रेन का अभाव महसूस तक नहीं कर सके। खास बात यह कि सफलता मिलने के बाद भी रे साहब ने फिल्म के बजट पर अपना यही दृष्टिकोण कायम रखा। पथेर पंचाली के बजट पर एक और दिलचस्प तथ्य है कि बाद में जब पोस्ट प्रोडक्शन के लिए पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने राज्य सरकार को मदद की अर्जी दी। उस समय राज्य सरकार के पास सिनेमा को सहयोग के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी,लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय उनकी मदद भी करना चाहते थे,तो उनके अधिकारियों ने एक रास्ता निकाला फिल्म का नाम चूंकि पथेर पंचाली है,इसीलिए पथ निर्माण विभाग को मदद करने कहा जा सकता है,और वही हुआ,पथ निर्माण विभाग की मदद से फिल्म पूरी हुई।

 

 

Ø  सत्यजीत राय के फिल्म में किसी विचार धारा (राजनीतिक) का प्रभाव दिखता है?

 

देखिए भीमसेन जोशी के गायन में आप कौन सी राजनीतिक विचारधारा ढूंढेगे? बिरजू महाराज के नृत्य में क्या विचारधारा? ये वास्तव में भारत में वामपंथियों का पाखंड फैलाया है कि हर चीज के पीछे राजनीति होती है। देश के बौद्धिक जगत पर उनका इतना लंबा प्रभाव भी रहा कि हम मान कर चलते हैं,सबकुछ राजनीति से तय होती है। ऐसा होता नहीं। सत्यजीत रे की फिल्में हमारे दुख के साथ खडी हैं। आज भी, इसमें क्या राजनीति? एकबार संसद में मनोनीत सदस्य नरगिस ने यह सवाल उठाया कि सत्यजीत रे अपनी फिल्मों में गरीबी प्रदर्शित कर देश की छवि खराब कर रहे हैं। अब देश में गरीब हैं, ब्राह्मण भी गरीब हैं, सत्यजीत रे ने दिखाया तो क्या नेहरु जी की पंचवर्षीय योजनाओं पर पानी फिर गया? भाई, गरीबी में भी हमेशा राजनीति नहीं होती, उनकी संवेदनाएं होती हैं,उनके परिवार होते हैं,उनकी खुशियां होती हैं, इसमें कोई राजनीति नहीं होती।सत्यजीत रे ने हमेशा संवेदनाओं की बात की अपनी फिल्मों में,और संवेदना किसी राजनीति की मोहताज नहीं होती। नक्सलवाद की बात नहीं की उन्होंने अपनी फिल्मों में क्या कुछ कम रहा।कुछ लोग कहते हैं इमरजेंसी के दौर में वे बच्चों की फिल्में बनाने लगे थे,हां बनायी, लेकिन हीरक राजर देश देख लीजिए,समझ जाइएगा हस्तक्षेप हमेशा राजनीति के हथियार से ही नहीं किया जा सकता।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने कभी किसी संस्थान से कोई ट्रेनिंग नहीं ली बाबजूद इसके वे एक सफल फिल्मकार बने। आपके विचार से एक सफल फिल्मकार बनने के लिए  प्रशिक्षण का क्या औचित्य है?

 

यह सही है कि सत्यजीत रे ने किसी संस्थान से सिनेमा नहीं सीखा था,लेकिन उन्होंने जहां से सीखा, वह किसी भी संस्थान से कहीं बडा, बहुत बडा है। सत्यजीत रे को साहित्य के संस्कार अपने पिता से मिले,उनके पिता सुकुमार राय बांग्ला के प्रतिष्ठित लेखक रहे। सत्यजीत रे की रूचि कला में थी, इन्होंने साहित्य के साथ अपने का ग्राफिप डिजाइनर के रुप में विकसित किया।जैसा कि होता है साहित्य हर कलाविधा की बुनियाद को सशक्त बनाने में सहायक होता है।सत्यजीत रे ने कई किताबों के आवरण डिजाइन किए।पथेर पंचाली से उनाका पहला साबका भी तब हुआ थो जब वे विभूति भूषण वंद्योपाध्यय के इस उपन्यास के बाल संस्करण के लिए आवरण और चित्र बनाए। उनकी यही विशेषता ने बाद में उनकी फिल्मों की पटकथा को भी विशिष्ट पहचान दी। जहां तक फिल्ममेकिंग की बात है,कोलकाता में जां रेनआं अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए आए थे, यहीं रे साहब ग्राफिक डिजाइनर के रुप में जुडे।रेनुआं ने दृश्यों को विजुआलाइज करने की उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म बनाने को प्रेरित किया। सीखने का सबसे बेहतर तरीका होता है,जो जहां मिले वहीं से सीख लें।सत्यजीत रे ने यही किया।

फिल्ममेकिंग जैसी विधा के लिए प्रशिक्षण का औचित्य तो है ही। यह कला के साथ विज्ञान भी तो है।सबों के जीवन में सत्यजीत रे जैसे सीखने के अवसर तो नहीं आ सकते, ऐसे में एक बेहतर संस्थान की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। क्या आश्चर्य कि पुणे के बाद दूसरा फिल्म संस्थान सत्यजीत रे के नाम पर ही कोलकाता में खोला गया।

Ø  दादा साहब फाल्के और सत्यजीत राय की परंपरा/ संस्कृति को आगे बढ़ाने की क्षमता किस फिल्मकार में आप देखते हैं?

 

देखिए,ऐसा कुछ होता नहीं है।फिल्में समय से संवाद करती बनती हैं। यह भी गौरतलब है कि वही फिल्म और फिल्मकार कालजयी होते हैं,जिन्होंने अपने समय और समाज को बेहतर तरीके से प्रदर्शित किया हो।आज भी मदर इंडिया यदि हमें उतनी जीवंत लगती है तो उसका कारण उस समय से कनेक्ट करना है। दादा साहब फाल्के ने सिनेमा के आरंभिक दौड में 125 फिल्में बनायी,उनमें से लगभग सभी या तो धार्मिक या ऐतिहासिक कथानक पर थी। यह उस दौर की मांग थी,जरुरत थी।रे साहब ही लगातार बढते रहे, उनकी फिल्म पथेर पंचाली के साथ जलसाघर या चारुलता देखें,एकदम अलहदा फिल्म लगेगी, उनकी बच्चों की फिल्म देखें सोनार केल्ला, एकदम अलग। एक और बात जो उल्लेखनीय है, किसी भी कला पर परंपरा के निर्वहन की जिद नहीं लादनी चाहिए।पटना कलम समय के साथ अप्रासंगिक होकर खत्म हो गई। हरेक फिल्मकार अपनी पहचान के साथ विकसित हो, हमारे लिए खुशी की बात यह होनी चाहिए। हां,सत्यजीत रे और दादा साहब फाल्के से जो सीख सकते हैं,वह है उनकी ईमानदारी, अपने दर्शकों और अपनी विधा के प्रति उनका कनविक्शन।

 

Ø  सत्यजीत रे ने अधिकांश फिल्में साहित्यिक कृति पर बनायी,एक बेहतर सिनेमा के लिए कितना जरुरी मानते हैं आप साहित्यिक आधार?

यह सही है कि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय और सत्यजीत रे के संयोग ने जो चमत्कार दिखाया उसे दुनिया भर का कला जगत नजरअन्दाज नहीं कर सका और सर आंखों पर बिठाया। सत्यजीत रे की फिल्मों को देखते हुए यह तय करना मुश्किल होता है कि यदि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय, रमाशंकर गंगोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे साहित्यकार उन्हें नहीं मिले होते तो सत्यजीत रे सत्यजीत रे होते या नहीं। लेकिन यह भी सच है कि ऋत्विक घटक बगैर किसी विभूति के भी ऋत्विक घटक ही रहे। हिन्दी में कमलेश्वर और सावन कुमार टाॅक का लम्बा सान्निध्य कोई भी उल्लेखनीय फिल्म नहीं दे सका जबकि यही कमलेश्वर गुलजार के साथ आंधीऔर मौसमजैसी महत्वपूर्ण फिल्म दे सके। वास्तव में बेहतर सिनेमा के लिए बेहतर साहित्य की बाध्यता भले ही नहीं हो, लेकिन बेहतर साहित्य को फिल्माने के लिए बेहतर फिल्मकार की बाध्यता अनिवार्य है। सत्यजीत रे कहते थे किसी किताब को पढने के बाद मैं शून्य से शुरु करता हूं। मतलब वह पूरी की पूरी फ़िल्मकार की कृति होती है। किसी बातचीत में गुलजार साहब ने कहा था,किसी भी साहित्यिक कृति पर कोई अच्छी फिल्म नहीं बन सकती, जब तक इसके निर्देशक का मानसिक स्तर बड़ा, सुलझा हुआ, रचनात्मक और समझदारी भरा न हो।

 

Ø  विश्व सिनेमा के पितामह माने जाने वाले महान फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने राय के लिए कहा था,सत्यजीत रे के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज चांद के बिना आसमान...इसे आप किस रुप में देखते हैं।

 

कुरोसावा की फिल्म की यह विशेषता है कि उनकी फिल्म में रोशनी की एक लकीर तक के मायने निकलते हैं। यदि जूते पर धूल हैं तो पटकथा का वह हिस्सा है। इतने सचेत व्यक्ति जब यह राय व्यक्त करते हैं,वह बस प्रशंसा मात्र नहीं कहा जा सकता।रे साहब ने वाकई अपनी फिल्मों से विश्व सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया। रे की फिल्मों को देखते हुए आप सहज ही महसूस कर सकते हैं कि मनुष्य चाहे बंगाल के किसी गांव का हो या अफ्रिका के किसी जंगल का, उनके इमोशन समान हैं। उन्होंने सिनेमा से मनोरंजन की शर्त को खत्म कर दिया था।उनका मानना था कि सिनेमा के लिए इंटरटेनमेंट से अधिक महत्वपूर्ण इमोशन है।

 

Ø  सत्यजीत राय से जुड़ा आपका अपना कोई खास संस्मरण या महत्वपूर्ण प्रसंग?

 

संस्मरण मेरा तो नहीं, लेकिन गिरीश दा(फिल्कार गिरीश रंजन) ने सुनाया था,वह याद है। गिरीश दा ने कहा था,पटना के रुपक सिनेमा में पथेर पंचाली देखी, और मन में तय कर लिया यही काम करना है।सबलोग फिल्म का सपना लेकर मुंबई भागते थे, मैं कोलकातो भाग गया। खोजते खोजते स्टूडियो पहुंचा,सत्यजीत रे साहब शूटिंग में व्यस्त थे।एक व्यक्ति मुझे ले जाकर मिलवाया। दादा,ये पटना से आया है,आपसे मिलने। उन्होंने जैसे ही नजर उठायी, मैं ने बेहिचक कहा मुझे भी फिल्म बनानी है। उन्होंने पूछा,पोछा लगाने आता है, सफाई करने। गिऱीश दा ने कहा,हां,आता तो है। फिर उन्होंने साथ वाले आदमी को कहा, इसे बुला लो कल से स्टूडियो की सफाई करने। गिरीश दा कहते थे,उस दिन तो समझ में नहीं आया, लेकिन जैसे जैसे कर फिल्म से जुडे सारे काम एक एक कर सीखता गया,उनकी दूरदृष्टि समझ में आ गई।वास्तव में वे मेरी लगन परखना चाहते थे।




बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं: हृषिकेश सुलभ

15 फरवरी 1955 को बिहार के सीवान जिले के लहेजी ग्राम में स्वतंत्रता सेनानी रमाशंकर श्रीवास्तव के आंगन में एक बच्चे का जन्म हुआ जो अपनी प्रारंभिक पढाई के साथ –साथ वहां के सांस्कृतिक परिवेश में भी घुलने लगा. 1968 में जब वह बालक बिहार की राजधानी पटना आया तो यहां की उर्वर भूमि ने पढाई के साथ –साथ उसे साहित्य और रंगमंच की दुनियां की ओर भी खींचना शुरू कर दिया. उसने बाल कथा लिखते लिखते 1976 ई० में मुख्यधारा के साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. जो कि  आज न सिर्फ एक लब्ध –प्रतिष्ठित एवं देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार हैं बल्कि उनके साहित्यिक खाते में लगभग आधा दर्जन नाटक, आधा दर्जन कहानी संग्रह और रंगमंच आधारित किताब एवं लेखों के अलावे लगभग आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी हैं. जी हां, हम बात कर रहे हाल के वर्ष में आकाशवाणी पटना से सेवानिवृत हुए साहित्यकार हृषिकेश सुलभ की. आइए पढ़ते हैं सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी बातचीत के एक अंश को .

अपने साहित्यिक सफर के बारे में बताएं.

यूं तो लिखना विद्यालय स्तर पर ही शुरू कर दिया था लेकिन 1976 ई० में श्रीपत राय जी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “कहानियां” और वसंत जी की पत्रिका  “समझ” में प्रकाशित अपनी कहानियों को ही अपनी शुरुआत मानता हुआ. उसके बाद 1977 ई० में सारिका के नव लेखन अंक में छपने के बाद से यह सफर अब तक जारी है. समय के साथ जीवन और साहित्य में परिपक्वता आई, नये नये जीवनानुभव मिले. दृष्टि में विकास एवं बदलाव हुए. कहानी कहने का अंदाज और भाषा पहले की तुलना में काफी बदल गया है.

कभी कहानी, नाटक के अलावे कविता या उपन्यास लिखने की इच्छा हुई?

मैंने अभी तक कविता नहीं लिखी है लेकिन सिर्फ कविता ही साहित्य तो नहीं है. अरुण कमल ने महत्वपूर्ण गद्य भी लिखे हैं. मुक्तिबोध की कहानी या अज्ञेय की शेखर एक जीवनी को भी देखा जा सकता है. मैं मानता हूं कि किसी रचनाकार को किसी खास विधा में बांधकर उसका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए. यह महज सम्प्रेषण में सहजता का मामला है. वैसे नाटकों में गीत लिखें हैं. हो सकता है कि भविष्य में कभी कविता भी लिखूं. वैसे एक उपन्यास पर काम जारी है.

आपकी रचना प्रक्रिया क्या है?

मैं जो कुछ भी अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बोलूँगा वह बिल्कुल झूठ बोलूँगा. मेरे लिखने का कोई खास तौर- तरीका नहीं है. मैंने कोई भी कहानी एक बैठक में पूरी नहीं की है. कहानियां लंबे समय तक चलती रहती हैं. कहानी और पात्र के साथ संघर्ष चलते रहता है. कहानी लेखक के नियंत्रण –अनियन्त्रण के द्वन्द से आगे बढती है. दरअसल में लेखन एक जटिल प्रक्रिया है. लेखक की रचना प्रक्रिया को समझने में लोगों की उम्र निकल जाती है. किसी लेखक ने सच ही कहा है कि लेखक का निजी जीवन फूहर औरत का वार्डरोब होता है इसलिए इसमें कभी हाथ नहीं डालना चाहिए. कब क्या निकल आए और लेखक की बनी छवि टूट जाय, कहना मुश्किल है. रचनाकार का मूल्यांकन सिर्फ उसकी रचना से ही करना उचित है.

आपको किस साहित्यकार ने सर्वाधिक प्रभावित किया?

जिस तरह एक बालक के विकास में उसके माता –पिता, नाते –रिश्तेदार और उसके परिवेश का अहम योगदान होता है उसी प्रकार एक लेखक के निर्माण में भी उसके सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश के साथ –साथ अपने पूर्ववर्ती एवं अन्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है. किसी के प्रभाव को कम या अधिक नहीं बताया जा सकता. लेकिन किसी के प्रभाव में आकर उसी का अनुकरण करते हुए लिखकर कोई बेहतर भी नहीं कर सकता. वैसे यह एक आलोचक की जिम्मेवारी है कि वह पता करे कि किसी रचना पर किसका प्रभाव दिखता है?

लोकप्रिय साहित्य एवं गंभीर साहित्य के बहस को आप किस रूप में देखते हैं?

साहित्य में इस तरह का बंटवारा बहुत पहले से होता रहा है लेकिन अंततः इसका कोई अर्थ नहीं है. जो लोकप्रिय है वह श्रेष्ठ या दीर्घजीवी हो कोई जरूरी नहीं और जो लोकप्रिय हो वह कूड़ा या क्षणभंगुर ही हो यह भी जरूरी नहीं. महत्वपूर्ण उदाहरण हैं भिखारी ठाकुर. वे अपने समय में भी लोकप्रिय थे और आज भी उनकी रचनाओं पर विमर्श चल रहा है, मंचन हो रहा है और उनकी लोकप्रियता बरकरार है. साहित्य का परिवेश सबसे मिलकर बनता है. अभी जो लोकप्रिय साहित्य प्रकाशित होता है उसको लेकर किसी प्रकार से भयभीत या चिंतित होने की जरूरत नहीं है. अगर उस साहित्य में जीवन होगा, हमारे समय का सुख –दुःख और अंतर्द्वंद्व होगा तो वह जीवित रहेगा नहीं तो नष्ट हो जाएगा. बाज़ार को लेकर बहुत भय व्यक्त किया जा रहा है लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि बाज़ार की जो खरीद –बिक्री के आंकड़े हैं वे साहित्य का मूल्य नहीं तय करते हैं और ना ही साहित्य को दीर्घ जीवन दे पाते हैं. अंग्रेजी में साहित्य को प्रचारित –प्रसारित करने की और बाज़ार में बेचने की पद्धति कुछ ऐसी है कि पाठकों तक पुस्तकों के पहुंचने में सुविधा होती है. हिन्दी में यह परम्परा ही नहीं रही है. अब कुछ प्रकाशक अपनी सीमाओं के बीच ही सही, ऐसा प्रयास कर रहे हैं और यह एक अच्छी बात है.

साहित्य के दलित साहित्य, स्त्री साहित्य आदि में वर्गीकृत होने को आप किस तरह से देखते हैं?

ये सारे बंटवारे साहित्य की दुनियां में तात्कालिक प्रभाव भले ही डाल लें लेकिन अंततः बचता वही साहित्य है जो मनुष्य की गरिमा की रक्षा कर सके.

लिखना आपके जीने की एक जरूरी शर्त है. थोड़ा स्पष्ट करें.

मेरे लिए लिखना जीने की शर्त है इन अर्थों में कि वह मेरे जीवन के लिए जरूरी है. अंदर की व्याकुलता, छटपटाहट को अभिव्यक्त करने की जरूरत है, जिसे मैं अपनी कहानियों एवं नाटकों में अभिव्यक्त करता हूं.

एक लेखक के लिए सम्मान और पुरस्कार के क्या मायने हैं?

यदि कोई सम्मान और पुरस्कार दे रहा हो और अगर आपको यह महसूस होता है कि यह सही मायने में सही भाव के साथ दे रहा है तो स्वीकार करना चाहिए नहीं तो छोड़ देना चाहिए. एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं. लेखक को सिर्फ लिखना चाहिए.

भागमभाग वाली डिजिटल एज में लंबी कहानियों के बारे में आप क्या सोचते हैं?

जो पढता है वह लम्बी कहानियों को पढ़ेगा ही. जिसके पास समय नहीं है वह लम्बी क्या छोटी रचना को भी नहीं पढ़ेगा. मोबाइल, ई –पत्रिका आदि नये माध्यम हैं. मैं इसे बुरा नहीं मानता. लेकिन यह कहना निरर्थक है कि भागमभाग वाली डिजिटल एज में लोग चार पंक्ति की ही चीजों को पढ़ना चाहते हैं.

अभी के साहित्य और रंगमंच के बारे में क्या महसूस करते हैं?


समय के साथ चीजें तेजी से बदल रही हैं, माहौल से तालमेल के साथ आगे बढ़ रहीं हैं. एक ही जगह टिके रहने से नष्ट होने का खतरा रहता है. रंगमंच हो या साहित्य हर जगह बदलाव आता है और आते रहना चाहिए. परिवर्तन ही संसार का नियम है.

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है: अवधेश प्रीत

पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है: अवधेश प्रीत


अवधेश प्रीत 

अवधेश प्रीत गंभीर लेखकों में से एक हैं जो अपने समय के जरूरी सवालों में हस्तक्षेप करते हैं और सक्रिय पत्रकारिता करते हुए हस्तक्षेप, नृशंस, हमजमीन, कोहरे में कंदील, और चांद के पार एक चाभी जैसे पांच कहानी संग्रह दिए. इनकी कई कहानियों का उर्दू में अनुवाद ही नहीं हुआ बल्कि कुछ का नाट्य-मंचन भी हुआ है. इनका पहला उपन्यास “अशोक राजपथ” जल्द ही आने वाला है. प्रस्तुत है विभिन्न सम्मानों से सम्मानित कथाकार अवधेश प्रीत से उनकी रचनात्मकता पर सुशील कुमार भारद्वाज की हुई बातचीत का एक अंश:-

-अपने साहित्यिक सफर को किस रूप में देखते हैं?
साहित्य एक अनवरत यात्रा है और मेरे लिए इसे मूल्यांकित करने का अवसर नहीं आया है क्योंकि यह अभी जारी है। हां,  इतना कहूंगा कि अब तक देश दुनिया में बहुत हलचल रही,  बदलाव आये। उसके कार्य कारणों की साहित्य ने पड़ताल की। मैंने भी अपने सामर्थ्य भर इस पड़ताल की कोशिश की। अब तक जो लिखा उसकी नोटिस ली गई। सामान्य पाठक से लेकर विद्वान आलोचकों तक ने मेरी कहानियां पढ़ीं और सराहा। यह मेरे लिखे के प्रति स्वीकार है और यही मेरे श्रम की सार्थकता है। अभी बहुत कुछ लिखना है। बेहतर लिखा जाय यह प्रयास करना है। लिहाजा,  अब तक की यात्रा को मैं सिर्फ प्रस्थान बिन्दु के रूप में देखता हूं।


-आपकी कहानियों में या तो सामाजिक समस्याएं होती हैं या फिर अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत मुख्यपात्र. कोई विशेष कारण?

मेरे लिए लेखन सामाजिक सरोकारों से जुड़ना है। मेरा समाज, उसके यथार्थ , उसके संघर्ष और स्वप्न , मनुष्य की गरिमा और उसकी जटिलताएं , ये सब मेरेलिए , मेरे लेखन की प्रतिबद्धता है। जैसा नामवर सिंह कहते हैं, कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह युग के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोधों के संदर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है। इस अर्थ में देखें तो मैं अपनी कथा सामग्री समाज से चुनता हूं , वह चाहे समस्या हो या मनुष्य । कह सकते हैं मेरी कहानी समाज की है , समाज के लिए है।

-आपकी कई कहानियों को पढ़ते समय मेरे जैसे पाठक अपने आंसुओं को रोक नहीं पाते हैं? अपने शिल्प–कला का कुछ रहस्य बताएं?

मेरी कहानियों में कोई कला- शिल्प नहीं है । न ही कोई रहस्य । आपका आॅब्जर्वेशन कितना गहरा है । कितना करीबी है और कहानी में जो कुछ भी है , वह कितना विश्वसनीय है , इन सबके योग से ही कहानी पठनीय और ग्राह्य बनती है । कोई कहानी जब किसी पाठक को अपनी, अपनो की लगने लगे तो जाहिर है , वह संवेदना को छूती है । मेरी कहानियां भावुक नहीं हैं। लेकिन उनमें जो भावनात्मक लगाव है , वह मेरी संवेदना का हिस्सा है , उससे अगर आप जैसा पाठक तादात्म्य महसूस करता है , तो मैं समझता हूं , यह मेरे लिखे की सार्थकता है । अगर एडुआर्डो गालियानो के शब्दों में कहूं तो जब कोई व्यक्ति लिखता है तो उस चीज की भर्त्सना करने के लिए लिखता है, जो कष्ट देती है और उसे साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है । तो कह सकते हैं , यह रोना और हंसना लेखक और पाठक की साझीदारी है ।

-किस साहित्यकार ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया और लेखन के लिए प्रेरित किया?

यकीनन प्रेमचंद ने ही सबसे ज्यादा प्रभावित किया और कई कारणों ने लिखने के लिए प्रेरित, जैसे विद्रूप, विडंबनाओं के विरुद्ध लड़ने के लिए , प्रतिरोध के लिए मेरे पास लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । मैंने इसी लिए पेशा भी चुना तो पत्रकारिता को चुना । हां , लिखना और अपने लेखन के लिए , प्रेरणा के तत्व भी प्रेमचंद से ही मिले ।

-पत्रकारिता करते हुए लेखन कितना प्रभावित हुआ? कुछ लोगों का मत है कि आपने कम लिखा है?

पत्रकारिता के बारे में एक कहावत का उल्लेख करूं तो जर्नलिज्म इज अ हिस्ट्री इन हरी कहा गया है । इस तरह कह सकते हैं कि पत्रकारिता इतिहास की हलचलों के बीच रहते हुए अपने समय के स्याह- सफेद को करीब से जानने का माध्यम है । व्यवस्था और नागरिक के संबंधों की पड़ताल का अवसर है । इस लिहाज से पत्रकारिता मेरे लेखन में अपने समय की सच्चाइयों को जानने में सहायक रही है । मेरे लेखन को पत्रकारिता ने इस अर्थ में प्रभावित किया है कि मैं ज्यादा आॅब्जेक्टिव तरीके से चीजों को देख पाया । रही बात कम मात्रा में लिखने की तो मेरी कहानियों के पांच संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और मैं नही समझता कि यह कुछ कम है । मात्रा महत्वपूर्ण नहीं है । क्या लिखा, कितना सार्थक लिखा और किस तरह अपने समय के जरूरी सवालों में हस्तक्षेप किया , यह महत्वपूर्ण है । मैंने ये तमाम कहानियां अपनी सक्रिय पत्रकारिता के दौरान ही लिखी हैं और समझता हूं , यह कुछ कम नहीं है ।

-बिहार में “हिंदुस्तान” जैसे एक प्रतिष्ठित अखबार के लिए लगभग 30 वर्षों तक कार्य करते हुए आपने काफी कुछ उतार–चढाव देखे होंगें. एक साहित्यकार होते हुए कैसा अनुभव रहा?

पत्रकारिता में , उसके स्वरूप में, कार्य प्रणाली में इस दौरान काफी मूलभूत बदलाव आये हैं । पत्रकारिता तकनीक की वजह से ज्यादा तेज और त्वरित हुई है । आज रीयल टाइम रिपोर्टिंग का जमाना है । अभी की खबर अभी । पाठकों के प्रति नजरिया बदला है । मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग जो उपभोक्ता है, वही आज पत्रकारिता की चिंता के केंद्र में है । हाशिये के लोग, किसान, मजदूर ये कहीं पीछे छूट गये हैं । मैंने महसूस किया है कि आज पत्रकारिता का मतलब मूल्य नहीं मुनाफा है । पत्रकारिता प्रोडक्ट हो गई है और प्रोडक्ट को बाजार की जरूरत होती है । बाजार में तो बिकाऊ चीजें ही चलती हैं । एक साहित्यकार के रूप में यही कह सकता हूं कि कि इस सबके बावजूद पत्रकारिता ही आज भी आम आदमी की अंतिम उम्मीद है । इस उम्मीद के हवाले से मेरा अनुभव आश्वस्तकारी रहा है ।

-बदलते दौर में हिंदी साहित्य और बाजारवाद को किस रूप में देखते हैं?

हिन्दी साहित्य का मूल स्वर प्रतिरोध का स्वर है । इसके मद्देनजर कहूं तो बाजारवाद की जो बुराइयां हैं , हिन्दी में उसके खिलाफ काफी लिखा जा रहा है । बाजारवाद से आशय अगर हिन्दी लेखन में बाजार की मांग के मुताबिक लिखे जाने की उभरती प्रवृत्ति से है ,तो मैं कहूंगा कि यह बहुत शुभ नहीं है । इसके तात्कालिक लाभ हो सकते हैं । दूरगामी नहीं । हिन्दी का मिजाज बाजारू नहीं है । हिन्दी का पाठक बाजारोन्मुख लेखन को स्वीकार ही नहीं सकता
-आपकी कहानी पाकिस्तान में भी प्रकाशित हुई है?

हां, एक कहानी ' अली मंजिल' पाकिस्तान में छपी है ।

- “चांद के पार एक चाभी” इन दिनों काफी चर्चा में है? आप अपने शब्दों में इस संग्रह के बारे में क्या कहेंगें?

' चांद के पार एक चाभी ' संग्रह को पाठकों द्वारा पसंद किया जा रहा है, यह मेरे लिए संतोष की बात है । इस संग्रह की तमाम कहानियां हमारे समय के जरूरी लेकिन अनदेखी की गई सच्चाइयों को उठाती हैं । कहन के तरीके और पाठकीय अपेक्षाओं के अनुकूल होने की वजह से यह संग्रह लोकप्रिय हो रहा हो , हो सकता है । वैसे अपने संग्रह के बारे में मैं खुद कुछ कहूं , यह नैतिक नहीं है । पाठक ही इसके निर्णायक हैं ।

-आपका पहला उपन्यास “अशोक राजपथ” बाजार में आने से पहले ही लोगों की जुबां पर चढ़ने लगा है. इसके बारे में कुछ बताएं?

हां, मेरा उपन्यास ' अशोक राजपथ ' आनेवाला है । उसके कुछ अंश विभिन्न पत्रिकाओं में छपे हैं । यह उपन्यास पटना की एक मुख्य और प्राचीन सड़क अशोक राजपथ पर केंद्रित है । यह सड़क पुराने पटना और नये पटना को तो जोड़ती ही है, इसी सड़क पर पटना के तमाम शैक्षणिक संस्थान स्थित हैं । इन्हीं संस्थानों से लोग निकलकर सत्ता प्रतिष्ठानो तक पहुंचते हैं । कह सकते हैं , यह उपन्यास शिक्षा और सत्ता की लड़ाई पर केंद्रित है ।


-आने वाली युवा पीढ़ी के साहित्यकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

आनेवाली पीढ़ी के बारे में मैं क्या कह सकता हूं । हां मौजूदा पीढ़ी बेहतर लिख रही है । यह पीढी ज्यादा पढी़ - लिखी और दुनियादार है । ज्यादा सजग और समझदार है । बस, जल्दबाजी में कुछ ज्यादा दिखती है । सबकुछ तुरत फुरत पा लेने को आतुर । लेकिन दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नई पीढ़ी का लेखन बहु आयामी और बहुलतावादी है । मैं तो नई पीढ़ी के लेखन से सीखता हूं और लगता है कि अगर आपको अपडेट रहना है तो इन्हें पढ़ना और इनसे सीखना होगा । नई पीढ़ी का लेखन मुझे उत्साह से भरता है । नई रचनाशीलता संभावनाओं से भरी होती है । और संभावनाएं किसे प्रिय नहीं होंगी ?
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