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शनिवार, 26 नवंबर 2022

अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, गोवा में बिहार की उपस्थिति पर विनोद अनुपम का विचार

 खुशी की बात है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, गोवा में इस वर्ष बिहार का भी पेवेलियन देखा गया। पेवेलियन का उद्घाटन Pankaj Tripathi ने किया।इस पेवेलियन के साथ बिहार को शोकेस करने पहुंचे अधिकारियों और मंत्री के फिल्मकारों और अभिनेताओं के साथ मुलाकातें बैठकों की तस्वीरें भी दिखी। वास्तव में ऐसी कोशिशें कोई पहली नहीं थी।2015 में भी प्रधान सचिव Vivek Singhके नेतृत्व में कला संस्कृति विभाग के एक दल ने इफ्फी में शिरकत किया था,यह भागीदारी मूलतः पटना फिल्म महोत्सव की तैयारी के सिलसिले में थी ।जब  Ganga Kumar  फिल्म निगम के प्रबंध निदेशक थे,तब भी इफ्फी से पेवेलियन के लिए आमंत्रण आया था, लेकिन सवाल उठा कि लेकर क्या जायें, फिल्म पालिसी ही नहीं बन सकी है। कमाल यह कि पालिसी आज भी नहीं बनी है, फिर इस वर्ष पेवेलियन में हमने क्या बातें रखीं?और जो रखीं, क्या बगैर पालिसी के उसका कोई महत्व है?

बिहार के फिल्म पालिसी की भी अलग ही कथा है।यदि यह कभी लागू हो भी गई तो शायद सबसे लंबे समय में तैयार होने वाली पालिसी के रूप में इसका नाम गिनीज बुक में जा सकता है।इस पालिसी पर फिल्मकारों से राय के लिए तो तीन बार मुंबई में बैठकें हुई।एक बैठक में तो मंत्री शिवचंद्र राम और तत्कालीन विकास आयुक्त Shishir Sinha भी शामिल रहे। 

सवाल है क्या वाकई बिहार सरकार की प्राथमिकता में कहीं सिनेमा है, नहीं तो फिर बेवजह की मशक्कत क्यों।यह इससे भी समझ सकते हैं इस वर्ष इफ्फी के दौरान बिहार पेवेलियन में बैठे किसी मंत्री और अधिकारी ने उस फिल्म को ,और उसके फिल्मकार को याद करने की जहमत भी नहीं उठाई जो इंडियन पनोरमा में मैथिली फ़िल्म #LotusBloom के रुप में बिहार की एकमात्र भागीदारी थी,जबकि कुछ ही कदमों पर उसका प्रदर्शन भी चल रहा था।फिल्म के एक अभिनेता Akhilendra Mishra से रहा नहीं गया,तो बिना बुलाए उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की, लेकिन किसी मंत्री या अधिकारी से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी।कैसे सरकार से हौसले की उम्मीद रखें बिहार के फिल्मकार...





बुधवार, 24 अगस्त 2022

विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत

 बिहार की धरती पर पले-बढ़े विनोद कुमार उर्फ़ विनोद अनुपम ने हिंदी विषय से स्नात्तकोत्तर करने के बाद एफ.टी.आई.आई. पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन में सर्टिफिकेट ग्रहण किया। 1988  में बेस्ट यूथ राइटर का राज्यस्तरीय पुरस्कार पाने वाले विनोद अनुपम ने 2002 में बेस्ट फिल्म क्रिटिक के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड जीता। 65वीं नेशनल फिल्म अवार्ड में जूरी मेम्बर के रूप में अहम भूमिका निभाने के अलावे ये बिहार संगीत नाटक अकादमी के सचिव भी रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये विभन्न फिल्म संस्थान के सदस्य रहे हैं। पटना कलम, राजभवन संवाद, गोरैया, बिहार समाचार एवं उधावना आदि पत्रिका का सम्पादन इन्होंने किया। आपने दूरदर्शन के कुछ धारावाहिक के लिए पटकथा भी लिखी है। लगभग तीन दशक से आप प्रभात खबर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज, कथादेश, पाखी, इंडिया टुडे, सारिका, गंगा, वर्तमान साहित्य, सन्डे इन्डियन, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, आदि पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म समीक्षा, आलेख आदि लिख रहे हैं। प्रस्तुत है विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत के कुछ अंश।

 

Ø आपने सत्यजीत राय की सबसे पहली फिल्म कौन-सी देखी?

 

मैंने कौन-सी फिल्म देखी, महत्वपूर्ण यह नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत में सिनेमा का कोई भी विद्यार्थी सिनेमा पढने, समझने, सीखने की शुरुआत सत्यजीत रे की ही फिल्मों से करता है। हम भी जब सिनेमा समझने के ख्याल से पटना, प्रकाश झा की संस्था “अनुभूति” द्वारा आयोजित ‘फिल्म भाषा और तकनीक’ की कार्यशाला में पहली बार भाग लेने आए, तो सत्यजीत रे ने ही सिनेमा का ककहरा सिखाने को उंगली थामी। फिल्म थी पथेर पंचाली, तब से यह फिल्म न जाने कितनी बार सामने आयी, शायद सौ से भी अधिक बार, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि खत्म होने के पहले हट गए। पथेर पंचाली की यही खासियत है, आपको किसी इमोशनल कविता की तरह बांधे रखती है। ब्लैक एंड व्हाइट उस छोटी सी फिल्म को देखने के बाद वही नहीं रह जाते, जो आप होते हैं। फिल्म आपको बदल देती है, आप थोडे और ज्यादा संवेदनशील, थोडे और विनम्र, थोडे और खूबसूरत इंसान बन जाते हैं। मेरा तो मानना है कि एटनबरो की गांधी की तरह इस फिल्म को भी बार बार दिखाया जाना चाहिए। ताकि हर पीढी इसके इमोशन को महसूस कर सके।

 

 

Ø  सत्यजीत राय की किस फिल्म ने आपको सबसे अधिक और किस रूप में प्रभावित किया?

देखिए, बेस्ट आफ द बेस्ट चुनना काफी मुश्किल होता है। सत्यजीत रे ने सिनेमा को एक सार्थकता दी,एक प्रतिबद्धता दी। उनकी फिल्मों में  प्रस्तुति और तकनीकि विविधता भले ही दिखती है,प्रतिबद्धता से समझौता वे नहीं करते। चाहे बच्चों के लिए ही वे क्यों नहीं फिल्म बना रहे हों? या पारस पत्थर जैसी फंतासी, दर्शकों को तो वही पहुंचता था जो वे पहुंचाना चाहते थे। जाहिर है उनकी हर फिल्म आपको प्रभावित करती है, मैं तो यहां तक कहता हूं कि जब आप सद्गति देखते हैं तो पथेर पंचाली को याद नहीं करते, जब शतरंज के खिलाडी देखते हैं तो जलसाघर को याद नहीं करते। यह सत्यजीत रे की माध्यम, समय और समाज तीनों के प्रति गंभीर समझ के कारण संभव हो पाता है। लेकिन इस सबके बीच पथेर पंचाली जिस तरह कम्युनिकेट करती है, वह उस फिल्म को विल्क्षण बना देती है।छोटे छोटे दृश्यबंध अपने आप में पूरी कथा लेकर आते हैं। इसकी सबसे बडी खासियत इसकी गीतात्मकता या कहें लिरिकल होना भी है। सत्यजीत रे बंगाल के एक समाज के सबसे अंतिम पंक्ति के एक परिवार के दुख को सार्वभौमिक बना देते हैं। यह हालांकि इसी क्रम में बनी तीन फिल्मों की ट्रायलाजी का पहला अंश है, लेकिन दुनिया के दुख के अहसास के लिए मैं इसे के जरुरी फिल्म मानता हूं।

 

 

Ø  वर्तमान सिनेमा पर सत्यजीत राय के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?

 

सत्यजीत रे से किसी ने पूछा था, आप किसके लिए फिल्में बनाते हैं। रे साहब ने बेहिचक कहा था,अपने लिए।उन्होंने आगे कहा था, शब्द अलग हो सकते हैं,बात यही थी कि जब तक आप अपने से ईमानदार नहीं होंगे, दर्शकों से भी ईमानदार नहीं हो सकते। उन्होंने कहा था कि फिल्म मेरे सौंदर्यबोध पर खरी उतरेगी तभी दर्शकों के सौंदर्यबोध को भी संतुष्ट कर सकती है। दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर हम अपने सौंदर्यबोध को कमतर नहीं कर सकते। इस संदर्भ में यदि वर्तमान सिनेमा को देखें तो निराशा होती है। मुख्यधारा की अधिकांश फिल्में दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर बन रही है। अब तो स्थिति यह है कि वह दर्शक भी  आज सिनेमा व्यवसाय से गौण हो गए हैं, तकनीक ने सिनेमा वितरण के तमाम ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे में सिनेमा से जीवन गायब हो गया है, जो सत्यजीत रे की फिल्मों का आधार था। फिल्में अब भी बन रही हैं, क्यों बन रही, किसके लिए बन रही, यह सिनेमा के एजेंडे में है ही नहीं। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि सत्यजीत रे साहब को हमने सम्मान तो काफी दिया, लेकिन उनसे सीखा कुछ भी नहीं। वैसे यह भारतीय समाज की आदत में शुमार है, रामचरित मानस और गीता के साथ भी तो हमने यही किया, रखा,पढा नहीं,पढा तो सीखा नहीं।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने हिन्दी से अधिक बांग्ला में फिल्में बनाई, कम बजट की फिल्में बनाई और सफल रहे। इसे आप किस रूप में देखते हैं?

 

यही तो सत्यजीत रे थे। हिंदी में उन्होंने मात्र दो फिल्म बनायी, एक दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म सद्गति और दूसरी शतरंज के खिलाडी। ये फिल्मे उन्होंने हिंदी में इसलिए नहीं बनायी कि उन्हें एक पैन इंडियन आइडेंटिटी चाहिए थी, हिंदी का बडा बाजार चाहिए। ये फिल्में उन्होंने इसलिए बनाई कि वे प्रेमचंद की कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे,और उन्हें लगता था प्रेमचंद हिंदी में ही बेहतर तरीके से कहे जा सकते हैं। गौरतलब है कि सत्यजीत रे हिंदी में सहज नहीं थे,उन्होंने किसी बातचीत में कहा भी, यदि मैं हिंदी जानता तो शतरंज के खिलाडी और भी बेहतर बन सकती थी। सत्यजीत रे बांग्ला भाषा,बांग्ला समाज,बांग्ला संस्कृति को बेहतर समझते थे, उन्होंने अपनी फिल्में बांग्ला में बनाना तय किया।और उसी समय यह मनवाया कि जो जितना लोकल होगा, वहीं ग्लोबल होगा। ग्लोबल होने के लिए न तो भाषा से दूर होने की जरुरत है, न ही परिवेश से। सबों को पता है आस्कर अवार्ड भी उन्हें कोलकाता उनके घर पर प्रदान किया गया। यह तमाम क्षेत्रीय भाषा के फिल्मकारों के लिए याद रखने की बात है कि सिनेमा के लिए भाषा की सीमा नहीं होती,आप किसी भी भाषा में बेहतर करेंगे तो उसे स्वीकार्यता मिलेगी ही मिलेगी।

 

Ø  बजट की चर्चा छूट गई..

जी, सही याद दिलाया। सत्यजीत रे एक अलग तरह की परिकल्पना के साथ आए थे। लार्जर दैन लाइफ की जगह,जीवन जैसा है,वैसा ही दिखे।जाहिर है कोई भी प्रोड्यूसर उनके लिए जोखिम उठाने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपनी जमा पूंजी से पथेर पंचाली की शुरुआत की। कह सकते हैं पथेर पंचाली के बजट जैसा कुछ था ही नहीं, उन्होंने पूरी फिल्म कागज पर बना ली, ताकि शूटिंग के समय, समय और संसाधन की कम से कम बरबादी हो। पथेर पंचाली की निर्माण प्रक्रिया युवा फिल्मकारों को अवश्य पढनी चाहिए,कि संसाधन कभी फिल्ममेकिंग में बाधा नहीं बनती। कहते हैं एक सीन में टाप ऐंगल शाट लेना था,बजट में क्रेन की सुविधा नहीं थी,रे साहब ने अपने कैमरामैन सुब्रतो मित्रा को पेड पर चढ शाट लेने की सलाह दी। शाट उसी तरह लिया गया, और दर्शक क्रेन का अभाव महसूस तक नहीं कर सके। खास बात यह कि सफलता मिलने के बाद भी रे साहब ने फिल्म के बजट पर अपना यही दृष्टिकोण कायम रखा। पथेर पंचाली के बजट पर एक और दिलचस्प तथ्य है कि बाद में जब पोस्ट प्रोडक्शन के लिए पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने राज्य सरकार को मदद की अर्जी दी। उस समय राज्य सरकार के पास सिनेमा को सहयोग के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी,लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय उनकी मदद भी करना चाहते थे,तो उनके अधिकारियों ने एक रास्ता निकाला फिल्म का नाम चूंकि पथेर पंचाली है,इसीलिए पथ निर्माण विभाग को मदद करने कहा जा सकता है,और वही हुआ,पथ निर्माण विभाग की मदद से फिल्म पूरी हुई।

 

 

Ø  सत्यजीत राय के फिल्म में किसी विचार धारा (राजनीतिक) का प्रभाव दिखता है?

 

देखिए भीमसेन जोशी के गायन में आप कौन सी राजनीतिक विचारधारा ढूंढेगे? बिरजू महाराज के नृत्य में क्या विचारधारा? ये वास्तव में भारत में वामपंथियों का पाखंड फैलाया है कि हर चीज के पीछे राजनीति होती है। देश के बौद्धिक जगत पर उनका इतना लंबा प्रभाव भी रहा कि हम मान कर चलते हैं,सबकुछ राजनीति से तय होती है। ऐसा होता नहीं। सत्यजीत रे की फिल्में हमारे दुख के साथ खडी हैं। आज भी, इसमें क्या राजनीति? एकबार संसद में मनोनीत सदस्य नरगिस ने यह सवाल उठाया कि सत्यजीत रे अपनी फिल्मों में गरीबी प्रदर्शित कर देश की छवि खराब कर रहे हैं। अब देश में गरीब हैं, ब्राह्मण भी गरीब हैं, सत्यजीत रे ने दिखाया तो क्या नेहरु जी की पंचवर्षीय योजनाओं पर पानी फिर गया? भाई, गरीबी में भी हमेशा राजनीति नहीं होती, उनकी संवेदनाएं होती हैं,उनके परिवार होते हैं,उनकी खुशियां होती हैं, इसमें कोई राजनीति नहीं होती।सत्यजीत रे ने हमेशा संवेदनाओं की बात की अपनी फिल्मों में,और संवेदना किसी राजनीति की मोहताज नहीं होती। नक्सलवाद की बात नहीं की उन्होंने अपनी फिल्मों में क्या कुछ कम रहा।कुछ लोग कहते हैं इमरजेंसी के दौर में वे बच्चों की फिल्में बनाने लगे थे,हां बनायी, लेकिन हीरक राजर देश देख लीजिए,समझ जाइएगा हस्तक्षेप हमेशा राजनीति के हथियार से ही नहीं किया जा सकता।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने कभी किसी संस्थान से कोई ट्रेनिंग नहीं ली बाबजूद इसके वे एक सफल फिल्मकार बने। आपके विचार से एक सफल फिल्मकार बनने के लिए  प्रशिक्षण का क्या औचित्य है?

 

यह सही है कि सत्यजीत रे ने किसी संस्थान से सिनेमा नहीं सीखा था,लेकिन उन्होंने जहां से सीखा, वह किसी भी संस्थान से कहीं बडा, बहुत बडा है। सत्यजीत रे को साहित्य के संस्कार अपने पिता से मिले,उनके पिता सुकुमार राय बांग्ला के प्रतिष्ठित लेखक रहे। सत्यजीत रे की रूचि कला में थी, इन्होंने साहित्य के साथ अपने का ग्राफिप डिजाइनर के रुप में विकसित किया।जैसा कि होता है साहित्य हर कलाविधा की बुनियाद को सशक्त बनाने में सहायक होता है।सत्यजीत रे ने कई किताबों के आवरण डिजाइन किए।पथेर पंचाली से उनाका पहला साबका भी तब हुआ थो जब वे विभूति भूषण वंद्योपाध्यय के इस उपन्यास के बाल संस्करण के लिए आवरण और चित्र बनाए। उनकी यही विशेषता ने बाद में उनकी फिल्मों की पटकथा को भी विशिष्ट पहचान दी। जहां तक फिल्ममेकिंग की बात है,कोलकाता में जां रेनआं अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए आए थे, यहीं रे साहब ग्राफिक डिजाइनर के रुप में जुडे।रेनुआं ने दृश्यों को विजुआलाइज करने की उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म बनाने को प्रेरित किया। सीखने का सबसे बेहतर तरीका होता है,जो जहां मिले वहीं से सीख लें।सत्यजीत रे ने यही किया।

फिल्ममेकिंग जैसी विधा के लिए प्रशिक्षण का औचित्य तो है ही। यह कला के साथ विज्ञान भी तो है।सबों के जीवन में सत्यजीत रे जैसे सीखने के अवसर तो नहीं आ सकते, ऐसे में एक बेहतर संस्थान की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। क्या आश्चर्य कि पुणे के बाद दूसरा फिल्म संस्थान सत्यजीत रे के नाम पर ही कोलकाता में खोला गया।

Ø  दादा साहब फाल्के और सत्यजीत राय की परंपरा/ संस्कृति को आगे बढ़ाने की क्षमता किस फिल्मकार में आप देखते हैं?

 

देखिए,ऐसा कुछ होता नहीं है।फिल्में समय से संवाद करती बनती हैं। यह भी गौरतलब है कि वही फिल्म और फिल्मकार कालजयी होते हैं,जिन्होंने अपने समय और समाज को बेहतर तरीके से प्रदर्शित किया हो।आज भी मदर इंडिया यदि हमें उतनी जीवंत लगती है तो उसका कारण उस समय से कनेक्ट करना है। दादा साहब फाल्के ने सिनेमा के आरंभिक दौड में 125 फिल्में बनायी,उनमें से लगभग सभी या तो धार्मिक या ऐतिहासिक कथानक पर थी। यह उस दौर की मांग थी,जरुरत थी।रे साहब ही लगातार बढते रहे, उनकी फिल्म पथेर पंचाली के साथ जलसाघर या चारुलता देखें,एकदम अलहदा फिल्म लगेगी, उनकी बच्चों की फिल्म देखें सोनार केल्ला, एकदम अलग। एक और बात जो उल्लेखनीय है, किसी भी कला पर परंपरा के निर्वहन की जिद नहीं लादनी चाहिए।पटना कलम समय के साथ अप्रासंगिक होकर खत्म हो गई। हरेक फिल्मकार अपनी पहचान के साथ विकसित हो, हमारे लिए खुशी की बात यह होनी चाहिए। हां,सत्यजीत रे और दादा साहब फाल्के से जो सीख सकते हैं,वह है उनकी ईमानदारी, अपने दर्शकों और अपनी विधा के प्रति उनका कनविक्शन।

 

Ø  सत्यजीत रे ने अधिकांश फिल्में साहित्यिक कृति पर बनायी,एक बेहतर सिनेमा के लिए कितना जरुरी मानते हैं आप साहित्यिक आधार?

यह सही है कि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय और सत्यजीत रे के संयोग ने जो चमत्कार दिखाया उसे दुनिया भर का कला जगत नजरअन्दाज नहीं कर सका और सर आंखों पर बिठाया। सत्यजीत रे की फिल्मों को देखते हुए यह तय करना मुश्किल होता है कि यदि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय, रमाशंकर गंगोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे साहित्यकार उन्हें नहीं मिले होते तो सत्यजीत रे सत्यजीत रे होते या नहीं। लेकिन यह भी सच है कि ऋत्विक घटक बगैर किसी विभूति के भी ऋत्विक घटक ही रहे। हिन्दी में कमलेश्वर और सावन कुमार टाॅक का लम्बा सान्निध्य कोई भी उल्लेखनीय फिल्म नहीं दे सका जबकि यही कमलेश्वर गुलजार के साथ आंधीऔर मौसमजैसी महत्वपूर्ण फिल्म दे सके। वास्तव में बेहतर सिनेमा के लिए बेहतर साहित्य की बाध्यता भले ही नहीं हो, लेकिन बेहतर साहित्य को फिल्माने के लिए बेहतर फिल्मकार की बाध्यता अनिवार्य है। सत्यजीत रे कहते थे किसी किताब को पढने के बाद मैं शून्य से शुरु करता हूं। मतलब वह पूरी की पूरी फ़िल्मकार की कृति होती है। किसी बातचीत में गुलजार साहब ने कहा था,किसी भी साहित्यिक कृति पर कोई अच्छी फिल्म नहीं बन सकती, जब तक इसके निर्देशक का मानसिक स्तर बड़ा, सुलझा हुआ, रचनात्मक और समझदारी भरा न हो।

 

Ø  विश्व सिनेमा के पितामह माने जाने वाले महान फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने राय के लिए कहा था,सत्यजीत रे के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज चांद के बिना आसमान...इसे आप किस रुप में देखते हैं।

 

कुरोसावा की फिल्म की यह विशेषता है कि उनकी फिल्म में रोशनी की एक लकीर तक के मायने निकलते हैं। यदि जूते पर धूल हैं तो पटकथा का वह हिस्सा है। इतने सचेत व्यक्ति जब यह राय व्यक्त करते हैं,वह बस प्रशंसा मात्र नहीं कहा जा सकता।रे साहब ने वाकई अपनी फिल्मों से विश्व सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया। रे की फिल्मों को देखते हुए आप सहज ही महसूस कर सकते हैं कि मनुष्य चाहे बंगाल के किसी गांव का हो या अफ्रिका के किसी जंगल का, उनके इमोशन समान हैं। उन्होंने सिनेमा से मनोरंजन की शर्त को खत्म कर दिया था।उनका मानना था कि सिनेमा के लिए इंटरटेनमेंट से अधिक महत्वपूर्ण इमोशन है।

 

Ø  सत्यजीत राय से जुड़ा आपका अपना कोई खास संस्मरण या महत्वपूर्ण प्रसंग?

 

संस्मरण मेरा तो नहीं, लेकिन गिरीश दा(फिल्कार गिरीश रंजन) ने सुनाया था,वह याद है। गिरीश दा ने कहा था,पटना के रुपक सिनेमा में पथेर पंचाली देखी, और मन में तय कर लिया यही काम करना है।सबलोग फिल्म का सपना लेकर मुंबई भागते थे, मैं कोलकातो भाग गया। खोजते खोजते स्टूडियो पहुंचा,सत्यजीत रे साहब शूटिंग में व्यस्त थे।एक व्यक्ति मुझे ले जाकर मिलवाया। दादा,ये पटना से आया है,आपसे मिलने। उन्होंने जैसे ही नजर उठायी, मैं ने बेहिचक कहा मुझे भी फिल्म बनानी है। उन्होंने पूछा,पोछा लगाने आता है, सफाई करने। गिऱीश दा ने कहा,हां,आता तो है। फिर उन्होंने साथ वाले आदमी को कहा, इसे बुला लो कल से स्टूडियो की सफाई करने। गिरीश दा कहते थे,उस दिन तो समझ में नहीं आया, लेकिन जैसे जैसे कर फिल्म से जुडे सारे काम एक एक कर सीखता गया,उनकी दूरदृष्टि समझ में आ गई।वास्तव में वे मेरी लगन परखना चाहते थे।




रविवार, 19 दिसंबर 2021

रेणु के पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते।


 *रेणु ने साधारण आदमी में विराट का चित्रण किया -अखिलेश ( संपादक, तद्भव पत्रिका)* 




( पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का दूसरा दिन  )

पटना, 19 दिसम्बर।  पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' के दूसरे दिन की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में  बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। 


दूसरे दिन की संगोष्ठी का उद्घाटन रेणु के चित्र पर माल्यार्पण करने के साथ हुआ। इस चौथे सत्र का विषय था ‛हिंदी कहानी : परम्परा, प्रयोग और रेणु’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकर और तद्भव पत्रिका के संपादक श्री अखिलेश ने की। इस सत्र की चर्चा की शुरुआत करते हुए दिल्ली से आये चर्चित कथाकार संजय कुंदन ने कहा “ फणीश्वर नाथ रेणु ऐसे कथाकार थे जिन्होंने प्रेमचन्द के ग्रामीण जीवन के सम्पूर्ण वैभव को कथा के संसार में पुनर्स्थापित किया है। वे प्रेमचंद से भिन्न हैं और भिन्न इस मायने में हैं कि उन्होंने कथा लेखन की प्रेमचंदीय शैली को नहीं अपनाया। वे परिवर्तन के हिमायती कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में साधारण आदमी के भीतर विराट का चित्रण किया है। "

पटना के चर्चित कथाकार संतोष दीक्षित के अनुसार  “ रेणु ने अपनी कथा में एक ऐसे इलाके के गाँवों के जन जीवन को उदभासित किया है जो बेहद पिछड़ा है। इस इलाके के सांस्कृतिक जीवन की संपूर्ण धड़कन को रेणु की कथाओं में सुना जा सकता है।” 

मुज़्ज़फ़रपुर से आये चर्चित कवि डॉ0 राकेश रंजन ने इस सत्र को संबोधित करते हुए कहा “ रेणु के पात्रों में अदम्य जिजीविषा देखा जा सकता है। उनके पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते। " 


अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अखिलेश ने कहा “ रेणु देशज आधुनिकता के भाष्यकार थे। वे भी अपनी रचनाओं में अपने समाज की त्रासदी को चित्रित कर रहे थे। लेकिन अपने समकालीनों से भिन्न तरीके से वे इस त्रासदी को चित्रत कर रहे थे। उनकी आधुनिकता में अपने समकालीनों की टूटन और संत्रास की जगह समरसता की भावना थी। समाज के वंचित तबके के प्रति उनका समर्थन था। वे जीवन के उल्लास का जब चित्रित  करते हैं तो उनका मकसद कभी वंचित समूह की समस्याओं को तिरोहित करना नहीं होता। रेणु प्रेमचंद के यथार्थवादी ढाँचे के विरोधी नहीं थे बल्कि उनकी यथार्थवादी परंपरा को वे दुरुस्त करते हैं। " 


इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया। इस सत्र का संचालन पटना वीमेंस कॉलेज के सहाय प्राध्यापक धनंजय कुमार ने किया और कंचन कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।



संगोष्ठी के पाँचवें सत्र के की अध्यक्षता हिंदी के साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने की। इस सत्र के अंतर्गत विभाजित विषय ‛रेणु : विविध रंग’ की शुरुआत करते हुए चर्चित कथाकर अवधेश प्रीत ने कहा “ रेणु समाज के अत्यंत वंचित समूह की लोक संस्कृतियों को अपने रिपोर्ताज का विषय बनाकर राष्ट्रीय फलक पर उभारते हैं। उनके बाढ़ पर की गयी ‛ऋणजल धनजल’ जैसी रिपोर्टिंग की चर्चा खूब होती है। उनके द्वारा बिहार में चले किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग बहुत दिलचस्प है। रेणु को साहित्यिक विधा के रूप में रिपोर्ताज को प्रतिष्ठित करने का श्रेय है।” 


हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा “ रेणु ने लोक नृत्य के वैभव को अपनी कथाओं में बहुत सफलता से समेटा है जबकि लेखक के लिए यह काम बहुत मुश्किल है। उन्होंने कथा लोक को लोक संगीत की संवेदना से भर दिया है। उनका लिखा रिपोर्ताज बहुत सजीव है। वे मूलतः एक्टिविस्ट लेखक हैं।” 


इस सत्र के विभाजित विषय ‛ रेणु और हिंदी सिनेमा’ में फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा “ रेणु की कहानी ‛तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’ पर बनी फ़िल्म ‛तीसरी कसम’ देखने लायक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में रेणु की समस्त रचनात्मक विशेषताओं को शामिल किया गया है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‛मैला आँचल’ पर धारावाहिक भी बनी है।” 


इस सत्र के अध्यक्षीय भाषण में  रेणु के संस्मरण से अपनी बातों की शुरआत करते हुए अरुण कमल ने कहा “  रेणु ने अपने एक रिपोर्ताज में लिखा है कि अरे आलोक तुम ! ये आलोक कवि आलोकधन्वा हैं। हममें रेणु के सबसे करीबी रहे हैं कवि आलोकधन्वा और रामवचन राय। अरुण कमल ने आगे कहा कि रेणु के कथेतर गद्य अयस्क हैं। उनके पास काफी स्मृतियां थीं। उनकी स्मृतियां काल के अहंकार को ध्वस्त करती हैं। रेणु अकेले आँचलिक कथाकर नहीं हैं। दुनिया के समस्त कथाकर, कलाएँ, साहित्य आँचलिक हैं। रेणु की कहानियां जीवन के गहरे रागों से लैश हैं। ये मनुष्य को कभी मरने नहीं देतीं। रेणु इसलिए बड़े लेखक थे कि उनमें धन और सत्ता के प्रति हिकारत की भावना थी। रेणु की कहानियों पर फिल्में नहीं बनायी जा सकतीं क्योंकि ये कहानियां भाषा के लिए रची गयी थीं, फ़िल्म बनाने के लिए नहीं लिखी गयी थीं।” 


सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न भी किया गया। इस सत्र का संचालन शिप्रा प्रभा ने किया। अंत में वाणिज्य महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ0 चंदन कुमार ने किया।




संगोष्ठी के छठे सत्र का का विषय था ‛सुनो कहानी रेणु की।’ इस सत्र में रेणु की तीन कहानियों का अत्यंत रोचक पाठ किया गया। पटना के सुप्रसिद्ध  रंगकर्मी  एवं टीपीएस कॉलेज में  हिंदी के प्रोफ़ेसर डॉ0 जावेद अख्तर खां ने रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‛एक आदिम रात्रि की महक’, रंगकर्मी मोना झा ने ‛संवदिया’ तथा दिल्ली की प्रसिद्ध कथानटी सुमन केशरी ने ‛रसप्रिया’ कहानी का पाठ किया।  सुमन केशरी ने अद्भुत कहानी पाठ किया। कथानटी के कहानी पाठ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज के तीनों सत्रों में भी श्रोताओं की उत्साहवर्द्धक उपस्थिति रही।  इस सत्र का संचालन पटना विश्वविद्यालय हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 तरुण कुमार ने किया। अंत में प्रो0 कुमार ने वक्ताओं, अतिथियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं को इस सार्थक आयोजन को सफल बनाने में अप्रतिम सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और संगोष्ठी के समापन की घोषणा की।

आज के कार्यक्रम में मौजूद लोगों में प्रमुख थे पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा, डॉ0 कुमारी विभा, सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा, प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ0 विनय कुमार, गजेन्द्र कांत शर्मा, जयप्रकाश, राजकुमार शाही, ग़ालिब, सुनील सिंह, डॉ0 बेबी कुमारी, प्रो0 वीरेंद्र झा,गोपाल शर्मा, डॉ0 दिलीप राम, योगेश प्रताप शेखर, संजीश शर्मा, डॉ0 सुलोचना, डॉ0 चुन्नन कुमारी, उज्ज्वल कान्त, सुशांत कुमार, उचित कुमार यादव आदि।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फिल्म निर्माण में बाधा बनती बिहार के सिनेमाघर पर विनोद अनुपम की एक टिप्पणी

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का कॉलम हर हफ्ता दैनिक प्रभात खबर में पढ़ने को मिलता है। इस बार अनुपम जी ने अपने आलेख में बिहार में सिनेमाघर की दयनीय होती स्थिति में बिहारी फिल्म निर्माण की बाधाओं को उकेरने की कोशिश की है जिससे आप भी पढ़ें।

 सिनेमाघर बनाएं,तभी बनेंगे सिनेमा

आज जबकि सलमान और शाहरुख की फिल्मों के लिए दूसरे हफ्ते में प्रवेश करना बडी बात मानी जाती है,’अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्म का कुछ शहरों के कुछ सिनेमाघरों में पांचवे हफ्ते में प्रवेश करना चकित करता है।उल्लेखनीय है कि बिहार की पृष्ठभूमि पर बिहारी सितारों और तकनीशियनों के साथ बनी यह फिल्म बिहार से पहले हफ्ते में ही बाहर हो गई थी। पहले हफ्ते के आंकडों के अनुसार भी मुम्बई में बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने लगभग 44 लाख की कमाई की,जबकि बिहार में कुल जमा 4 लाख। वास्तव में ऐसी बात नहीं कि जो फिल्म जुहू(मुम्बई),गुडगांव और जामनगर में पांचवे हफ्ते में भी देखी जा रही है,वह बिहार ने देखनी नहीं चाही,सच यह है कि सिनेमा देखने के लिए चाहिए सिनेमाघर,और बिहार के कई जिलों में सिनेमाघर हैं ही नहीं।
बिहार में 80 के दशक तक 450 से अधिक सिनेमाघर थे,आज इसकी संख्या घटकर 200 के करीब रह गई है। पटना में कभी समय था जब मोना,एलफिंस्टन, रिजेन्ट, रुपक, चाणक्य, वीणा, अप्सरा, वैशाली, पर्ल जैसे लगभग शहर के सभी कोनों में सिनेमाघर थे। इसके अलावे दानापुर, खगौल और पटना सिटी में कई सिनेमाघर थे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इनकी क्षमता अमूमन 300 से ऊपर की होती थी। आज सिनेमाघर ही नहीं घटे,मोना और रिजेन्ट की तरह जो बचे हैं,उनकी क्षमता आधे से भी कम रह गई है। इन्हीं सिनेमाघरों को ‘दंगल’ का दवाब झेलना पडता है, ‘अनारकली’ के लिए भी गुंजाइश निकालनी पडती है, और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी। ऐसे में किसी फिल्म को वे चाहकर भी लगाए नहीं रह सकते, क्योंकि अगली फिल्म को जगह चाहिए होती है।
सिंगल थिएटर सभी जगह बंद हुए हैं,लेकिन वहां उसकी भरपाई मल्टीप्लेक्स ने कर दी है,जबकि बिहार में सिनेमाघर बंद तो हुए,नए नहीं खुले। जाहिर है व्यवसाय के नाम पर सिनेमा में बिहार की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होती चली गई। ऐसे में बिहार में सिनेमा के विकास के चाहे जितने सपने पाल लें,उन्हें तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हम दर्शक बनाने की व्यवस्था नहीं करें,दर्शक तब बनेंगे जब सिनेमाघर बनेंगे। जाहिर है कोई क्यों ‘अनारकली’,’मिथिला मखान’ या ‘गुटरू गुटरगूं’ परिकल्पित करे,जबकि व्यवसाय के लिए उसे मुम्बई,जामनगर और गुडगांव का ही मुंह जोहना पडे।

सोमवार, 14 मार्च 2016

समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है: मोहन अगाशे

सुशील कुमार भारद्वाज
यूं तो फिल्म और समाज का रिश्ता जगजाहिर है लेकिन जब बात सीधे फिल्म और आपके मन की हो तो बातें खास हो जाती हैं क्योंकि फिल्मों का सीधा असर आपके मन –मस्तिष्क पर पड़ता है. और जब रंगमंच एवं सिनेमा के प्रख्यात अभिनेता एवं मनोचिकित्सक डॉ मोहन अगाशे इस चर्चा में शरीक होते हुए सवाल करते हैं कि तन की सुंदरता के लिए तो जगह जगह जिम खोले जा रहे हैं लेकिन मन की सुंदरता के लिए क्या किया जा रहा है? तो चौंकना लाजिमी है. लेकिन वे आगे कहते हैं कि मन को ठीक रखने के लिए साईंको जिम खोलने की जरूरत है. सायको जिम का यह काम पुराने ज़माने में हमारे संस्कार करते थे, परिवार के बूढ़े बुजुर्ग करते थे, लेकिन आज इन सब की जिम्मेवारियां टेलीविजन, मीडिया और इन्टरनेट के सहारे रह गई हैं, जो कि संतुलित और पौष्टिक भोजन के बजाय वैसे जंक फ़ूड दे रहे हैं जो हमारे तन के साथ साथ मन को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
जी हां, डॉ मोहन अगाशे यह बात पटना स्थित पटना म्यूजियम के कर्पूरी ठाकुर सभागार में विजय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित “मनोवेद फिल्म फेस्टिवल” में राजधानी के सम्मानित साहित्यकार, फ़िल्मकार, राजनेता एवं नौकरशाह के अलावे बुद्धिजीवी दर्शकों के बीच में कह रहे थे.
पहली बार आयोजित मनोवेद फिल्म फेस्टिवल के स्वागत भाषण में कार्यक्रम के आयोजक डॉ विनय कुमार ने कहा कि इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारणों से हम तक पहुंच नहीं पातीं हैं और जो खासतौर पर मनुष्य और समाज के स्वास्थ्य / मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को संबोधित करती हो.
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि ऐसी फिल्मो का प्रदर्शन साल में एक बार नहीं बल्कि चार बार हो तथा जनजागरूकता वाले ऐसे कार्यक्रमों की चर्चा भी खूब होनी चाहिए ताकि लोग अपने तन के साथ साथ मन का भी ध्यान रख सकें .
समारोह में प्रदर्शित पहली फिल्म अस्तु थी, जो कि इल्जाइमर्स डिमेंशिया रोग से ग्रसित सेवानिवृत बुजुर्ग चक्रपाणी शास्त्री एवं उनके परिवार की कहानी है. ऐसी स्थिति में पति –पत्नी एवं बड़े होते बच्चों वाले परिवार की क्या स्थिति होती है? साथ ही कहानी बताती है कि जब शास्त्री बाजार में कुछ पल के लिए अकेला होने की स्थिति में गाड़ी से बाहर आ हाथी वाले महावत के साथ पीछे –पीछे चले जाते हैं तो उनका दिन कैसे गुजरता है जबकि दोनों ही एक दूसरे की भाषा समझने में असमर्थ हैं. दिखाई गई दूसरी फिल्म ‘जिंदगी जिंदाबाद’ भारतीय महानगर में एड्स के जटिल यथार्थ एवं जागरूकता पर केंद्रित फिल्म है , जिसमें जीवन के मूलभूत संघर्ष एवं मानवीय रिश्तों के दरारों में पनपे यौन सम्बंध, भटकता बचपन, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि को उकेरने के साथ साथ मन में एड्स के प्रति बैठी विभिन्न भ्रांतियों को भी तोड़ने की कोशिश की गई है.
संवाद सत्र के दौरान फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम के साथ बातचीत में मोहन अगाशे ने कहा कि समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच  सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है. आगे उन्होंने कहा कि हमलोग तो कहकर नाटक करते हैं लेकिन यहां लोग जीवन में बिना कहे ही दिन रात नाटक करते रहते हैं, सुबह से शाम तक में अपनी भूमिकाएं बदलते रहते हैं. हमलोगों ने अपनी जिंदगी को बहुत सारी जिम्मेवारियों को मोबाइल जैसी तकनीकों के सहारे छोड़ रखा है जिससे बचने की जरूरत है.

मनोवेद फिल्म फेस्टिवल की यह पहल खुशगवार मौसम में न सिर्फ दर्शकों को समेटने में सफल रही बल्कि अपने उद्देश्यपूर्ति में भी आगे रही.