मंगलवार, 7 जून 2016

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने) सुशील कुमार भारद्वाज

एक मुलाकात (पुरानी डायरी के पन्ने)

उस दिन जब हमारी नजरें चार हुई थीं तो दिल में कुछ कुछ ही नहीं बहुत कुछ हुआ था। जैसे मेरी चोर निगाहें उस पर टिकी थी वैसे ही वो नजरें घुमा-फिरा कर मुझे ही देख रही थी। शायद नयनों ने अपनी बातें शुरू कर दी थी, शारीरिक भाषा भी बदल रही थी। वह मुझसे अंजान थी, लेकिन कहीं भी अजनबीपन महसूस नहीं हो रहा था। लगा जैसे वर्षों बाद मिली हो, बहुत सारी बातें करनी हो। शायद वो भी इंतजार में थी कि कमरे से सभी लोग निकल जाएं तो दिल की बातें हों। मुझमें ही कहां थी हिम्मत इतनी कि साफ साफ कुछ कह पाता? वहां मौजूद सगे-संबंधियों की वजह से भी असहजता महसूस हो रहा था। वे लोग कितने जालिम थे जो हमलोगों पर जुल्म ढाए जा रहे थे।दो परिंदे को इतने पास लाकर भी कोई तरसाता है क्या? मन बहुत भारी था जब मैं कमरे से निकल रहा था। उससे बातें तो खूब हुई थी लेकिन दिल की प्यास अभी बुझी नहीं थी। बुझती भी कैसे? उसे भी कोई बात करना कहते हैं? हाल-चाल तो सब पूछते हैं, मुझे तो उसके दिल की बात जाननी थी। मुझे पता करना था कि जीवन यात्रा में वह मेरी सहयात्री बनने को तैयार है कि नहीं? पूछ तो लिया ही था। और वो जबाब भी दे दी थी "मम्मी-पापा की पसंद ही मेरी पसंद है।" लेकिन जबाब बनावटी लगा, तोते के रटंत जैसा। मैं तो दिल की बात पूछ रहा था। मैं स्पष्ट शब्दों में जानना चाह रहा था कि मैं तुम्हें पसंद तो हूं? अपनी खुशी से मेरे साथ जीवन बिताने को तैयार तो हो? यह जानते हुए भी कि अब मुझे किसी से कुछ नहीं पूछना है। मैं तो उससे मिलकर ही काफी खुश हूं। हाल ये है कि मैं उसे छोङने को ही तैयार नहीं।शायद पहली नजर का प्यार ऐसा ही होता है। चलते वक्त भी वह दरवाजे पर खङी थी, भीङ में भी मुझे देख रही थी। लेकिन थी थोडी चालाक जो पर्दे के पीछे से झांक रही थी। लेकिन मैं इतनी भीङ में बेशर्म की तरह कैसे उसे ढूंढने की कोशिश करता? मनमसोस कर रह गया क्योंकि मेरे वहां से चलने से पहले ही बिजली चली गई। मोमबत्ती की रोशनी में उसकी सुंदरता को एक झलक देखने का कसक रह ही गया।सीढियों से नीचे उतर जब गाङी में बैठ गया तब उसे दुबारा देखने की तमन्ना दिल ही में रह गई।
सुशील कुमार भारद्वाज

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