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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का आयोजन




 पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में   बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

उदघाटन सत्र में   माननीय शिक्षा मंत्री  विजय कुमार चौधरी , सुप्रसिद्ध साहित्यालोचक व लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पटना विश्वविद्यालय  के कुलपति गिरीशचन्द्र चौधरी ,  प्रख्यात कवि आलोकधन्वा,  विधानपार्षद व आलोचक रामवचन राय, पद्मश्री उषाकिरण  खान उपस्थित थे।  विषय प्रवर्तन   राष्टीय संगोष्ठी के परिकल्पक एवं पटना विश्विद्यालय हिंदी विभागध्यक्ष तरुण कुमार ने किया। पहले सत्र का विषय था ' रेणु होने का अर्थ'।

स्वागत भाषण करते हुए पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा ने कहा कि "पटना कॉलेज के छात्रों को अपने अतीत के साथ जुड़ाव रखना चाहिये क्योंकि बिहार में जो श्रेष्ठ उसके निर्माण में पटना कॉलेज की अहम भूमिका रही है।” 

 शिक्षा मंत्री श्री विजय कुमार चौधरी आने वक्तव्य की शुरुआत पटना कॉलेज के अपने छात्र जीवन की स्मृति से की और रेणु होने अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा "  रेणु होने का अर्थ अपनी जमीन से जुड़ाव होना है। वे अपने सामाजिक राजनीतिक अनुभवों को व्यवहार में सीखने के हिमायती थे। रेणु जी का ही कथन है कि जूता पहनकर देखना चाहिए कि जूता काटता कहाँ है। रेणु ने अपने इस कथन की आजमाइश की थी। वे लेखन से लेकर राजनीति तक में स्वयं अनुभव हासिल किया था। हम चले जायेंगे लेकिन रेणु का साहित्य बचा रहेगा। रेणु के साहित्य को बचाना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है। हमारी पीढ़ी को रेणु का साहित्य बचायेगा।” 

विशिष्ट अतिथि के रूप में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष व निवर्तमान विधान पार्षद रामवचन राय ने रेणु होने के अर्थ को समझाते हुए कहा कि "रेणु ऐसे लेखक थे जो बोलते कम, लिखते ज्यादा थे। उनका मानना था कि लेखक के सामने अभिव्यक्ति का संकट कभी नहीं होता, लेखक अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाश लेता है। रेणु के पास कहानी की बड़ी दुनिया थी, इसलिए उन्होंने कहानी कहने के लिए सबसे पहले उपन्यास लिखना चुना। वे लोकतंत्र की तीन-तीन लड़ाइयां लड़ चुके थे।” रेणु होने का अर्थ है जोखिम लेना होता है। 

उषा किरण खान ने कहा कि " हमारी पीढ़ी की कथाभूमि रेणु की कहानी की ही कथाभूमि है। रेणु के लेखन ने परमपरागत बिम्बों और नायिकाओं की अवधारणाएं बदल कर रख दिया।” 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने कहा कि " रेणु जैसा बड़ा लेखक किसी समाज को विरले ही मिलता है। रेणु को हम ऐसे समय में याद कर रहे हैं जिस समय में संवेदनशील आदमी आंसुओं से भरा हुआ है और रो भी नहीं सकता। रेणु संसदीय लोकतंत्र के अग्रणी प्रहरी थे। उनका लेखन संसदीय लोकतंत्र की रक्षा और उनका जीवन लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में रहा है। रेणु का रूप परिवर्तनकारी रहा है।” 

प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा “ रेणु उन लेखकों में से हैं जो जिनकी कहानियां अपने घर लौटने का संदेश देती हैं।  वे जीवन भर लेखक रहते हुए एक्टिविस्ट भी रहे। वे चुनाव में भी हिस्सा लेने वाले लेखक थे और जुलूस में भी। आज रेणु होने का अर्थ है कि समाज और लेखन परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। रेणु महत्वपूर्ण और प्रभावी लेखक इसलिए हैं कि वे बिना किसी हो-हंगामा के संस्कृति का रेखांकन करते चलते हैं।

पटना विश्विद्यालय के कुलपति  गिरीशचन्द्र चौधरी ने कहा “ रेणु के जन्मशती पर एक बड़े आयोजन की जरूरत थी, हिंदी विभाग इसे पूरा किया। रेणु इतने बड़े लेखक थे कि उनकी कहानियों को आज की पीढ़ी भी बहुत चाव से पढ़ती है। 

 इस सत्र का संचालन  प्रोफ़ेसर दिलीप राम   ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन में पटना कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ0 कुमारी विभा ने किया।


उदघाटन सत्र के पश्चात दूसरे स्त्र का विषय था 'लोक-रंग और रेणु का कथाशिल्प '। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो0 जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की। 

 इस सत्र में रांची से आये उपन्यासकार रणेन्द्र ने कहा “ रेणु ने अपने कथा साहित्य में अपने समाज के विविध रूपों को चित्रित किया है। उन्होंने अपनी कथा में भारतीयता की खोज की है। निम्नवर्गीय समाज के जीवन संघर्षों को रचनात्मक रूप में लाया है। उनके समय के अपने ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जो उनसे छूट गये हैं जिसे समेटने की जवाबदेही हमारी है।” 

बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में हिंदी  के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा “ रेणु के कथाशिल्प पर हिंदी के कथाकर प्रेमचंद के प्रभाव के साथ बाँग्ला के रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय का प्रभाव भी देखा जाना चाहिये। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों की तरह सामाजिक और यथार्थवादी हैं। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों से आगे सांस्कृतिक है। रेणु की आंचलिकता का विमर्श बहुत भ्रामक है। इसी तरह उन्हें लोकरंग का कथाकर मान लेना भी भ्रामक है। रेणु के कथाशिल्प में गाँव अन्तरग्रथित है। "

जम्मू से आयी कथाकार  प्रत्यक्षा ने कहा “ रेणु राजनीतिक विषयों पर भी बहुत रोमैंटिक होकर लिखते हैं। जुलूस उनकी बहुत प्रिय किताब है।  इसमें अपने घर तलाशने की कहानी लिखते है।"

 इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया।  इस सत्र का संचालन पटना कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक मार्तण्ड प्रगल्भ ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो इन्द्रनारायण ने किया। 


तीसरे  सत्र विषय था '1950 का राष्ट्रीय परिदृश्य और रेणु के उपन्यास'


तीसरे सत्र के आरंभ में दिल्ली के आशुतोष कुमार ने कहा कि “ रेणु अंचल में बनने वाली कहानी को राष्ट्र की कहानी बनाना चाहते थे। वे अंचल की कहानी को राष्ट्रीय कहानी का विरोधी नहीं बताते बल्कि अंचल में प्रवेश करने वाली राष्ट्रीय कहानी को अंचल की कहानी बनाते हैं। रेणु यथार्थ के जिस रूप को अपनी कहानियों में कहना चाहते थे उस रूप को प्रेमचंद की शैली में नहीं कह सकते थे। 


चर्चित कथाकार गीताश्री ने कहा “ रेणु जिस दौर में लेखन कर रहे थे उसी दौर में महिलाओं को पहचान मिल रही थी। रेणु की रचनाओं में अपनी पहचान के लिए महिलाओं के उस तरह संघर्ष नहीं मिलता जिस तरह आज के स्त्रीवाद लेखन में मिलता है। लेकिन महिलाओं की पहचान को उन्होंने नज़रअंदाज़ नहीं किया है। रेणु की रचनाओं में अधिकांश महिला पात्र यौन शोषण का शिकार हैं पर रेणु इन महिला पात्रों के इन स्थितियों में अनुकूलन के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। "

मुज़्ज़फ़रपुर से आईं चर्चित कथाकार पूनम सिंह ने कहा " 50 का दशक पूर्णिया काला पानी की तरह था। रेणु यथार्थ वादी लेखक थे। मैला आँचल को किसान आंदोलन के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। किसान आंदोलन ने मैला आँचल के वैश्विक रूप के परचम को लहराता है। संथालों को जमीन से बेदखल कर दिए जाने के सवाल को भी रेणु उठाते हैं। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन भी होता है। सरकारें भूमिसुधार की बातें तो करती हैं लेकिन उसे लागू नहीं करती। दीर्घतपा उपन्यास का सवाल आज भी खड़ा है। शेल्टर होम में महिलाओं का शोषण आजभी जारी है। रेणु जुलूस में विस्थापन के प्रश्न को उठाते हैं। आज अपने देश सीएए और एनआरसी के द्वारा लोगों को विस्थापित किया जा रहा है।" 

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चर्चित कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर  ने इस दो दिवसीय आयोजन के लिए  बधाई देते हुए कहा " मैला आंचल पहली बार समता प्रकाशन पटना से छपा था। रेणु मैला आंचल में पोएटिक हो गए हैं। रेणु के उपन्यास में सिर्फ यथार्थ ही नहीं सपने भी हैं। रेणु भारतमाता के आंसू पोछना चाहते हैं लेकिन असमर्थ हैं। रेणु जी नेपाली क्रांति में सशत्र रूप से भाग लिया तथा 1950 में वहां से लौटे। रेणु जी से यह भूल हो गई कि उन्होंने 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास कह डाला। इस बात की स्वीकारोक्ति  लोठार लुतसे से इंटरव्यू में की थी।" 

 इस सत्र का  संचालन  डॉ पीयूष राज ने जबकि  धन्यवाद ज्ञापन मगध विश्विद्यालय हिंदी विभाग की  प्रो अरुणा ने किया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को  रज़ा फाउंडेशन  नई दिल्ली तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का सहयोग प्राप्त हुआ था। 

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में शहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों में शामिल थे  साहित्य अकादमी से समानित कवि अरुण कमल,    बिहार विरासत विकास समिति के विजय कुमार चौधरी, तद्भव के संपादक  अखिलेश,  सुमन केशरी,  पटना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति रासबिहारी सिंह, कथाकारअवधेश प्रीत,  कथाकार सन्तोष दीक्षित,  कथाकार हृषीकेश सुलभ, कवि कुमार मुकुल, डॉ कंचन,   योगेश प्रताप शेखर,  निवेदिता झा,   सुनीता गुप्ता, वीरेंद्र झा,  सुनील सिंह,  राकेश रंजन,  बी.एन विश्वकर्मा, अनीश अंकुर, रँगकर्मी जयप्रकाश, गजेन्द्रकांत शर्मा,  गौतम गुलाल,   वेंकटेश, विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि,  डॉ राकेश शर्मा,   गोपाल शर्मा,  सुनील झा,  कुणाल, अनीश,  संजय कुंदन, डॉ गुरुचरण, रामरतन, अनुज, सुनील, अशोक क्रांति, इंद्रजीत आदि।

बुधवार, 17 मई 2017

उषाकिरण खान का संस्मरण

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान हिन्दी और मैथिली साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम है। कहानी, उपन्यास के साथ -साथ वे अन्य विविध क्षेत्रों में भी ससमय दखल देती रहती हैं। पिछले दिनों उनके फेसबुक वॉल पर एक संस्मरण नजर आया जिसमें उन्होंनें भारतीय संस्कृति में जबरदस्त पैठ बनाये पर्दा -प्रथा का जिक्र किया है। आप भी पढ़कर देखें। पसंद आएगी।


१३मई कावह दिन तूफ़ानी  था सन १९६८ में तुहिन और मेरे भतीजे सोमू का मुण्डन बाबा वैद्यनाथ धाम में होने वाला था । मैंपटना में थी तनु के जन्म की तारीख़ तय थी ऐसे में बाबा का फ़रमान कि तुहिन को लेकर बाबा धाम आ जाओ पर रामचन्द्र खान साहब झींकते हुए अंशु (अनुराधा शंकर) तुहिन को लेकर चल दिये मुझे मेरे छोटे भाई विश्वेश और सहेलियों स्नेहलता तथा लीला सिंह यादव के भरोसे। दरभंगा से आनेवाली गाड़ी बरौनी जंक्शन पर  बदलनी पड़ती । पूरा हुजूम बरौनी मे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ नाश्ता पानी करने में लग गया । मेरे ससुर जी ने छोटी सी अटेची सासुजी को पकड़ाते हुए बोले-सम्हालिए कै राखू टका छै।घुटने तक घूँघट वाली सासु माँ ने रख लिया। कई बार मेरी माँ ने और ससुरजी नेकहा कि घूँघट हटाकर बैठें पर वो नहीं मानी । ट्रेन आते ही सब चल पड़े सासुमां बैठी रह गईं। तब घूँघट सरकाया देखा सारे तो चले गये ,वो रोने लगीं पर बैठी रही ।ससुर जी ने देखा अर्द्धांगिनी छूट गईं ।वो अगले स्टेशन पर उतर गये और स्टेशन मास्टर से कहकर बरौनी मे अनाउन्स करवाया कि स्टेशन पर बैठी गंगा देवी प्रतीक्षा करे उनके पति श्री बहादुर खां शर्मा आ रहे हैं।सासुजी के कान खड़े हुए । एक सिपाही आया और पूछा कि आप ही गंगा देवी हैं? आग्रह किया कि चलकर वेटिंग रूम में बैठें आपके पति आ रहे हैं । पर वो टस से मस न हुईं।ससुरजी के आने पर ही उठीं। दरअसल यह शहर की ओर उनकी दूसरी यात्रा थी।
मुण्डन वग़ैरह हुआ और रामचन्द्र जी रात में ही लौट आये ।दूसरे दिन सुबह ७बजे से कुछ आभास हुआ ।हम महेन्द्रू के पी एन सिन्हा रोड में थे वहाँ से पी एम सी एच निकट ही था। रिक्शेपर मैं गई । वहाँ मेरी क्लासमेट्स इन्टर्नशिप कर रही थीं वो पास आ गईं ।जा नरौने के साथ होंगी सो मुझे खिलाने चाय पिलाने की जुगत में भिड़ गईं । वह दिन बुद्ध पूर्णिमा का था सो स्टाफ़ गंगा नहाने चले गये थे १२ बजे तनु का जन्म हुआ जिसे हमारी सहेलियाँ सुलेखा और माला ने संभाला । साफ कर जब सामने आई तो इसे गोद लेने की होड़ मच गई सफ़ेद गहरे भूरे घने घुंघराले केशवाली ८-३० पौंड की बच्ची।
सन्ध्या ६-३० मे हम रिक्शे में बैठकर घर की ओर चले कि ज़ोरदार आँधी आई । रिक्शावाला और रामचन्द्र जी ने पकड़ कर रखा मेरे कमज़ोर हाथों में तनु दबी पड़ी थी। घर में अंशु और तुहिन उमा नामक मेड और भाई प्रतीक्षा में थे ।तुहिन तथा अंशु ने लैक्टोकेलेमाइन वग़ैरह से मेकअप किया था नये बच्चे को इम्प्रैस करने को ।

सोमवार, 14 मार्च 2016

समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है: मोहन अगाशे

सुशील कुमार भारद्वाज
यूं तो फिल्म और समाज का रिश्ता जगजाहिर है लेकिन जब बात सीधे फिल्म और आपके मन की हो तो बातें खास हो जाती हैं क्योंकि फिल्मों का सीधा असर आपके मन –मस्तिष्क पर पड़ता है. और जब रंगमंच एवं सिनेमा के प्रख्यात अभिनेता एवं मनोचिकित्सक डॉ मोहन अगाशे इस चर्चा में शरीक होते हुए सवाल करते हैं कि तन की सुंदरता के लिए तो जगह जगह जिम खोले जा रहे हैं लेकिन मन की सुंदरता के लिए क्या किया जा रहा है? तो चौंकना लाजिमी है. लेकिन वे आगे कहते हैं कि मन को ठीक रखने के लिए साईंको जिम खोलने की जरूरत है. सायको जिम का यह काम पुराने ज़माने में हमारे संस्कार करते थे, परिवार के बूढ़े बुजुर्ग करते थे, लेकिन आज इन सब की जिम्मेवारियां टेलीविजन, मीडिया और इन्टरनेट के सहारे रह गई हैं, जो कि संतुलित और पौष्टिक भोजन के बजाय वैसे जंक फ़ूड दे रहे हैं जो हमारे तन के साथ साथ मन को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं.
जी हां, डॉ मोहन अगाशे यह बात पटना स्थित पटना म्यूजियम के कर्पूरी ठाकुर सभागार में विजय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित “मनोवेद फिल्म फेस्टिवल” में राजधानी के सम्मानित साहित्यकार, फ़िल्मकार, राजनेता एवं नौकरशाह के अलावे बुद्धिजीवी दर्शकों के बीच में कह रहे थे.
पहली बार आयोजित मनोवेद फिल्म फेस्टिवल के स्वागत भाषण में कार्यक्रम के आयोजक डॉ विनय कुमार ने कहा कि इस नई पहल का उद्देश्य फिल्मों के भीड़ में से सार्थक, सोद्देश्य एवं प्रश्नाकुल करती फिल्मों को आमजन तक पहुँचाना है. वैसी अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय फिल्मों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी जो भौगौलिक एवं भाषाई कारणों से हम तक पहुंच नहीं पातीं हैं और जो खासतौर पर मनुष्य और समाज के स्वास्थ्य / मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को संबोधित करती हो.
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि ऐसी फिल्मो का प्रदर्शन साल में एक बार नहीं बल्कि चार बार हो तथा जनजागरूकता वाले ऐसे कार्यक्रमों की चर्चा भी खूब होनी चाहिए ताकि लोग अपने तन के साथ साथ मन का भी ध्यान रख सकें .
समारोह में प्रदर्शित पहली फिल्म अस्तु थी, जो कि इल्जाइमर्स डिमेंशिया रोग से ग्रसित सेवानिवृत बुजुर्ग चक्रपाणी शास्त्री एवं उनके परिवार की कहानी है. ऐसी स्थिति में पति –पत्नी एवं बड़े होते बच्चों वाले परिवार की क्या स्थिति होती है? साथ ही कहानी बताती है कि जब शास्त्री बाजार में कुछ पल के लिए अकेला होने की स्थिति में गाड़ी से बाहर आ हाथी वाले महावत के साथ पीछे –पीछे चले जाते हैं तो उनका दिन कैसे गुजरता है जबकि दोनों ही एक दूसरे की भाषा समझने में असमर्थ हैं. दिखाई गई दूसरी फिल्म ‘जिंदगी जिंदाबाद’ भारतीय महानगर में एड्स के जटिल यथार्थ एवं जागरूकता पर केंद्रित फिल्म है , जिसमें जीवन के मूलभूत संघर्ष एवं मानवीय रिश्तों के दरारों में पनपे यौन सम्बंध, भटकता बचपन, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि को उकेरने के साथ साथ मन में एड्स के प्रति बैठी विभिन्न भ्रांतियों को भी तोड़ने की कोशिश की गई है.
संवाद सत्र के दौरान फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम के साथ बातचीत में मोहन अगाशे ने कहा कि समाज में बढ़ते विचलन, विखंडन के बीच  सार्थक फिल्मों की बहुत जरूरत है. आगे उन्होंने कहा कि हमलोग तो कहकर नाटक करते हैं लेकिन यहां लोग जीवन में बिना कहे ही दिन रात नाटक करते रहते हैं, सुबह से शाम तक में अपनी भूमिकाएं बदलते रहते हैं. हमलोगों ने अपनी जिंदगी को बहुत सारी जिम्मेवारियों को मोबाइल जैसी तकनीकों के सहारे छोड़ रखा है जिससे बचने की जरूरत है.

मनोवेद फिल्म फेस्टिवल की यह पहल खुशगवार मौसम में न सिर्फ दर्शकों को समेटने में सफल रही बल्कि अपने उद्देश्यपूर्ति में भी आगे रही.

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

अगनहिंडोला शेरशाह सूरी के जीवन पर आधारित उपन्यास है:उषाकिरण खान



   
उषा किरण खान 


बाबा नागार्जुन के मार्गदर्शन में बहुत ही छोटी उम्र से कविता लिखने वाली लड़की, हिंदी और मैथिली में सामान रूप से नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में लिखते हुए, अब साहित्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान के रूप में मशहूर है| साहित्य का एक लम्बा सफर तय करने के बाद भी वह लगातार लिख रही हैं| उनकी नयी किताब ‘अगनहिंडोला’ के बहाने पेश है सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी कुछ बातें:
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आपका नया उपन्यास अगनहिंडोला आया है? अगनहिंडोला का क्या मतलब है|

अगनहिंडोला ब्रजभाषा का एक शब्द है| जो दो शब्दों से बना है- अगन और हिंडोला |जिसमे अगन का अर्थ है आग”, जबकि हिंडोला का मतलब है झूलायानि आग का झूला| दरअसल में अगनहिंडोला शेरशाह सूरी के जीवन पर आधारित उपन्यास है| और सभी जानते हैं कि शेरशाह सूरी युद्ध में मरे नहीं थे, बल्कि आग में जले थे| मतलब आग के झूले में चढ कर चले गये|

‘अगनहिंडोला’ को आपने उपन्यास के शीर्षक के रूप में क्यों पसंद किया?

मैं शीर्षक के रूप में देशी शब्द को रखना पसंद करती हूँ और अगनहिंडोला देशी शब्द के रूप में मुझे सही लगा|  इसीलिए शेरशाह सूरी को ध्यान में रखकर, इसका नाम अगनहिंडोला रखा| ठीक वैसे ही जैसे विद्यापति के लिए सिरजनहार|

शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखने की कोई खास वजह?

शेरशाह सूरी पर लिखने की लालसा लगभग पन्द्रह वर्षों से थी| मैं उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित थी| वे बिहार के थे| बहुत बड़े विद्वान थे| उन्होंने हिंदी में पहला फरमान जारी किया था| घोड़ों का व्यापर करने वाले साधारण से परिवार में जन्म लेकर इस ऊँचाई तक पहुंचना  कोई साधारण बात तो नही है| फिर शेरशाह के ही कार्यों को आगे बढाकर अकबर महान बन गया| ऐसी ही बहुत सी बातें थीं जो मेरे मन को छू रही थी| सिरजनहार लिखने के साथ ही मैंने सोच लिया था कि शेरशाह पर लिखकर ही अपने ऐतिहासिक उपन्यास लेखन का अंत करुँगी|

शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखे कुछ उपन्यास के नाम स्मृति में है?

मुझे शेरशाह सूरी पर लिखी सुधाकर अदीब की उपन्यास –“शानतारीकयाद है| लेकिन मेरे और उनके उपन्यास में एक बहुत बड़ा फर्क है कि उनके लेखन में इतिहास अधिक है जबकि मेरे लेखन में सामाजिकता| इसी चर्चा के सम्बन्ध में इलाहाबाद विस्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एक प्रोफेसर का फोन आया था| जिसमें उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक दृष्टि से कहीं भी चूक नहीं हुई है, लेकिन संवाद पर थोडा भ्रम है| तो मैंने उन्हें कहा – “चतुर्वेदी जी आप उपन्यास पढ़ रहे हैं, ये तो किसी किताब में नहीं लिखा है कि कौन से शहंशाह अपनी किस बेगम से क्या बात करते थे? ये तो हम उपन्यासकार रोचकता को ध्यान में रखते हुए संवाद को लिखते हैं| यह पूरी तरीके से इतिहास बन जाये तो इसे पढ़ेगा कौन?”........ संभव है सूरी के जीवन पर किसी और भाषा में कोई और उपन्यास हो, लेकिन उसकी जानकारी अभी मेरे पास नहीं है|

इस ऐतिहासिक उपन्यास लिखने का अनुभव कैसा रहा?

समाज में रहते हुए अलग – अलग विचार के लोगों से मेल जोल होता है| बहुत सी बातों को  जानने का मौका मिलता है| आसपास के माहौल से प्राप्त अनुभव से सामाजिक विषयों पर आसानी से लिखती हूँ| फिर भी इतिहास से सम्बन्ध होने की वजह से प्रमाणिकता पर ध्यान देती हूँ| लेकिन ऐतिहासिक विषयों पर लेखन से पूर्व काफी तैयारी करनी पड़ती है| प्रमाणिकता के दृष्टिकोण से बहुत सारी चीजों को ध्यान में रखना पड़ता है| कोशिश होती है कि हर संभव उपलब्ध ग्रन्थ, शोध, नाटक, कहानी, लेख आदि सम्बंधित चीजों का गहन अध्ययन कर जाऊँ| मौलिक किताबों की खोज करती हूँ| उसमें भी शेरशाह सूरी मेरे काल के विषय ठीक वैसे हीं नहीं थे, जैसे विद्यापति| लेकिन शेरशाह के बारें में कुछ छूटे नहीं, इसके लिए गुल बदन बेगम आदि तक की रचनाओं को पढ़ी| उसके अनुसार समय और सन्दर्भ को ठीक से समायोजित कर अपने साहित्यिक शैली में प्रस्तुत की जो कि बहुत ही श्रमसाध्य कार्य था|

इस तरह के ऐतिहासिक विषयों पर लिखे उपन्यासों के पाठकों के बारें में आप क्या सोचते हैं?

इतिहास को पढ़ने वाले लोग कुछ खास होते हैं| जबकि सामाजिक विषय पर लिखे उपन्यासों के पाठकों का वर्ग बड़ा है| कोई यह जान ले कि यह किताब विद्यापति या शेरशाह सूरी पर है तो कोई नहीं पढ़ेगा, जबतक कि उसे उनके बारे में जानने की लालसा न हो| लेकिन यदि उसे सामाजिकता के चासनी में एक अच्छी शैली में प्रस्तुत किया जाय तो कोई भी इसे पढ़ सकता है| जैसे कि कुछ लोगों ने अगनहिंडोला को बेमन से उठाया लेकिन एक ही बैठकी में पढकर संतुष्टि के भाव से उठे|

यूँ तो आप काफी छोटी उम्र से कविता का लेखन और पाठ करती रही हैं, लेकिन 1977 से आपने गद्य लेखन शुरू किया| तो 1977 से 2015 तक के सफर को आप किस रूप में देखती हैं?

हाँ, 1977 से 2015 तक का सफर एक लंबा साहित्यिक सफर रहा| उसके पहले कविता लिखती और पढ़ती थी, जो कि अब, सब इधरउधर हो गया है इसलिए अब उसका कोई खास मतलब नहीं रह गया है| कहानी, उपन्यास, नाटक, आदि विभिन्न विधाओं में लिखते हुए थोडा संतुष्ट तो हूँ| लेकिन कभी कभी लगता है मैं न तो पूर्ण रूप से लेखिका हूँ, न ही समाज-सेविका और न ही गृहिणी| इच्छा है कि किसी चीज में पूर्णता हासिल करूँ| मेरे साथ के लेखक लेखिकाओं ने कितना अधिक लिखा है? मेरी भी कोशिश होगी कि अंतअंत तक अधिक से अधिक सार्थक रचना दे सकूँ|

बाबा नागार्जुन का साथ आपको काफी मिला| उन्होंने आपके साहित्यिक जीवन और विचार पर कितना प्रभाव डाला?

बाबा नागार्जुन का प्रभाव हमारे विचारों पर नहीं पड़ा|  वे तो कम्युनिस्ट विचारधारा के थे, लेकिन उनका प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा| वे मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे,  साथ में कविता पाठ करने के लिए ले जाते थे| कभी कभी किसी विवशता में इस तरह के आयोजनों में जाने से कतराती थी तो अक्सर वे प्रोत्साहित करते हुए कहते थे- “अधिक से अधिक लोगों से मिलो, उनके जीवन शैली को करीब से देखो| बहुत कुछ सीखने को मिलेगा|  मेरे घर पर रहते हुए एक घरेलू सदस्य की तरह हमेशा मार्गदर्शन करते रहे| बाद के दिनों में जब पढाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझते चली गयी तो सब छूटने लगा| एक दिन बाबा ने कहा- काफी दिनों से कुछ लिखी नहीं हो, कुछ कुछ लिखते रहना चाहिए|” तब मैंने अपनी रूचि कहानी लिखने में बतायी| तब बाबा ने कहा कहानी के साथ-साथ उपन्यास भी लिखो| साथ ही उन्होंने सलाह दी कि गद्य लेखन से पहले अज्ञेय को पढ़ना चाहिए| भाषा कि रवानी अज्ञेय में है|” और अज्ञेय जी हँसते हुए कहते थे बाबा से बढ़कर कौन है?  खैर, बाबा से मुझे हमेशा मार्गदर्शन मिलता रहा|

बाबा के अलावे और किन साहित्यकारों ने आपको प्रभावित किया?

हमारे यहाँ तो साहित्यकारों का आना जाना काफी अरसे से रहा है| इसलिए बाबा के अलावे कई लोग प्रेरणा के रूप में सामने आये|  लेकिन धर्मवीर भारती जी ने काफी प्रभावित किया| परंतु उनसे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई| होगी भी क्यों? कहीं बाहर जाने का मौका ही नही मिला| खासकर उनकी गुलकी बन्नोमुझे काफी पसंद आयी| गद्य लेखन की ओर तभी से मुड़ने की इच्छा हुई| वैसे तो प्रेरणा के रूप में क्या नही है? कालिदास कम हैं क्या?

विद्यार्थी जीवन में कविता करने वाली छोटी सी किशोरी और पद्मश्री उषाकिरण खान में क्या अंतर है?

जब पद्मश्री मिला तो सोचने लगी कि मैंने क्या किया है? जो यह मुझे मिला है| लेकिन जब स्कूल में थी| या आईएससी में पढते हुए बाबा के साथ कविता पाठ करने जाती थी, तो अजीब खुशी मिलती थी| लगता था कि कुछ खुद से लिखकर पढ़ी| कुछ खास काम किया| अज्ञेय जी, नामवर जी, काशीनाथ जी और धूमिल जी आदि के बीच मंच से कुछ भी प्रस्तुत करने पर लगता था कि बहुत कुछ हासिल हुआ| समय के साथ ज्यों –ज्यों ये लोग जितने प्रसिद्ध होते गए, उनके कहे शब्द हमारे अंदर उतने ही ऊर्जा भरते चले गए| लेकिन अब उस तरह का उल्लास उमंग मन में नहीं भर पाता है|

आलोचना के बीच अपने साहित्यिक जीवन को कैसे बढाती हैं?

जीवन का इतना लंबा अनुभव हो गया है कि अब आलोचनाओं से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता है| और भी बहुत सारी बातें हैं जिंदगी में| अधिकांश समय स्वयं को इससे दूर कर लेती हूँ| और साहित्य का कार्य तो मैं निर्बिघ्न होकर करती हूँ|

इन दिनों नया क्या चल रहा है?


इन दिनों अमीर खुसरो पर एक नाटक लिखने की तैयारी में हूँ| मौका मिलते ही पूरा कर दूँगी|
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