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मंगलवार, 20 जून 2017

संजय कुमार कुंदन की कुछ नई गजलें

शहर के चर्चित शायर संजय कुमार कुन्दन की गजलों में भाषा की जो रवानी है वो आपको अपनी ओर खींचती है तो संप्रेषित भाव आपको काफी कुछ सोचनें को विवश करती है। इनकी 'बेचैनियाँ', 'तुम्हें क्या बेकरारी है' और 'एक लड़का मिलने आता है' जैसे तीन गजल संग्रह पहले ही से राजकमल प्रकाशन से छप कर लोगों के बीच पहुँच चुकी है। अब इनकी चौथी गजल संग्रह "भले तुम और भी नाराज हो जाओ" जल्द ही छपकर आने वाली है। संजय कुमार कुंदन का यह संग्रह निरंकुश सत्ता के विरूद्ध बिगूल फूंक रही है। आइए पढ़ते हैं संग्रह की कुछ बेहतरीन गजलों को।



माफ़ करना मेरे आक़ा

आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ

 आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी

ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे

 ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका

 जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
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अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
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इक तख़्तनशीं आज भी इतराया  हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके  मुसाहिबों की यहाँ  भीड़  लगी  है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते  सकाफ़त  के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं  मगर कहिए अलग हैं
उसकी  नसीहतों का  नशा  छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो  बाहर  कहीं  से  आया  हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया  बस वही  फ़रमाया  हुआ  है
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मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
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सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको  तुम  पुकार लो
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समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
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एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास  मगर  हसरते-परवाज़  तो है
हो  ये चेहरे पे भले चस्पाँ  मगर  राज़  तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम  दबाते रहे उसको  सरो-सामाँ के  तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र  इतना  ही  नहीं  है  के  पिसे  जाते  हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र  है  नाज़ाँ  के  उसे  साज़  तो  है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो  ख़स्ताहाल  है पर  ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे  कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना  है,  उसकी  इनायत  है  बेहयाओं  पर
चलो ये शुक़्र है  'कुन्दन'  से  वो नाराज़ तो  है।
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हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार  .
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कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
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मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ  , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
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सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी

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सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
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ज़िन्दगी,  तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
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मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
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दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे  दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं  रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं  देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं

मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी

गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

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शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
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संपर्क:-  91-9835660910, 8709042189
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शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें
संजय कुमार कुंदन

22 अक्टूबर 2016 को पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान में महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास हर बार की तरह साहित्यिक गोष्ठि "दूसरा शनिवार" का मुक्ताकाश में शाम के चार बजे कार्यक्रम चल रहा था और ख्यात शायर संजय कुमार कुंदन अपनी बेहतरीन नज़्मों एवं गजलों के साथ थे। ' बेचैनियाँ ' "एक लड़का मिलने आता है" और "तुम्हें क्या बेकरारी है" के गजलकार को नजदीक से बैठकर सुनने का जो मजा है वह कहीं और कहाँ? उनकी गजलों के शब्दों एवं भावों में सुनते सुनते खो जाना श्रोताओं के लिए बडी बात नहीं है। आज प्रस्तुत है आपके लिए उनकी कुछ गजलें, जिसका आस्वादन आप भी करें।

ग़ज़ल

आज  फिर  रस्मो-राह  हो   जाए
दिल  ज़रा-सा  तबाह   हो   जाए

ये तो मुमकिन नहीं के उल्फ़त में
जाँ  न दें  और  निबाह  हो  जाए

दिल को आती है जो ये पगडंडी
चल  दे   तू  शाहराह   हो   जाए

आज बदला हुआ मिज़ाज है कुछ
इक करम   की  निगाह  हो  जाए

कौन  हसरत  थी  जो   हुई   पूरी
कैसे   पूरी   ये    चाह  हो   जाए

दिन भी  कट  जाए तो ग़नीमत है
और  बसर  कैसे  माह  हो  जाए

वैसे  'कुन्दन' ने  ये  बताया  नहीं
चाहता   था    तबाह   हो   जाए

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ग़ज़ल

कुछ  बात है ऐसी  जो  कही ही नहीं जाती
छुप  बैठी  है  आँखों में  नमी ही नहीं जाती

ख़ामोश रह, इज़हार न कर अपने ग़मों का
फ़रियाद  ग़रीबों की  सुनी  ही  नहीं  जाती

आने को  तो आते  हैं ख़यालात बहुत   से
कहने  के बाद  तिश्नालबी  ही  नहीं  जाती

संजीदा ज़माने को  यही  हमसे शिकायत
होंठों पे जो ठहरी  है हँसी  ही  नहीं  जाती

हों दोस्त के दुश्मन हैं सभी बर-सरे- पैकार
और जंग कोई  हमसे  लड़ी  ही नहीं जाती

कुछ तल्ख़ तजरबों से नज़र हो गई धुँधली
माज़ी  की  वो  तहरीर  पढ़ी  ही नहीं जाती

वादा कोई करते हुए  डर जाता है 'कुन्दन'
जो  बात  न  पूरी  हो  कही  ही नहीं जाती

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तिश्नालबी- प्यास,बर-सरे- पैकार-लड़ने को उतारू,तल्ख़- कटु, तजरबों- अनुभवों,माज़ी- अतीत,तहरीर- लेखनी.

ग़ज़ल

ये दुनिया है  आनी-जानी  कब  तक हम को  भरमाए
शायद दरिया पार ही बेकल मन को थोड़ा चैन आए

आने-जानेवाला मौसम उजले-काले तन का रोग
सच्चे  जज़्बों  का  एक  लम्हा बादे-फ़ना भी  जी जाए

हम उजड़े लोगों की  कोई बस्ती- गाँव , न शह्र कोई
हमको सलीक़ा बस जाने का कोई भला क्यूँ समझाए

बेहतर है तुम देख के हमको अपनी नज़र को फेर ही लो
हम इसके क़ायल ही नहीं हैं  सर ये कहीं पे झुक जाए

उस पागल को देख के हम भी बचपन में कुछ हँसते थे
आईना अब  हमपे  हँसकर  अक्स उसी  का दिखलाए

गाड़ी,सोफ़ा, दौलत, बँगला, ओहदा, कुर्सी, ताक़त, नाम,
कितना भी कुछ दे दे लेकिन आँख का पानी
ले जाए

दिल तो  पारा-पारा  बाँटा , अब क्या  जाँ भी बाँटोगे
'कुन्दन जी' क्यूँ ठहरे हुए हो?कौन तुम्हारे पास आए

                   ########

ग़ज़ल

तनहा-तनहा   लफ़्ज़   मिलेगा,  पारा-पारा  तहरीरें
कड़ियाँ जब बिखरेंगी इक दिन, टूटेंगी जब ज़ंजीरें

कौन किसी को पूछनेवाला, कौन किसी का है महरम
तनहाई  की नागन आकर  डंस  जाती  सब तक़दीरें

इक कमरा तो भरा हुआ है,इक कमरा वीरान बहुत
इक में ख़्वाबों का कोलाहल, इक से गुम  हैं ताबीरें

कोई समझाएगा हमको जीवन भर का क्या हासिल
चारों जानिब एक ख़ला है, कहाँ  गईं  सब तदबीरें

बंदिश पे तो नाज़ बहुत था नपा-तुला था हर मिसरा
प्रेम के गीत ने तोड़े बंधन  नाच उठीं कितनी हीरें

तेरा दर्पण एक जज़ीरा  जिसमें बस  तेरा ही राज
दर्पण तोड़ो,  मिल  जाएँगी  तुझको  हज़ारों  जागीरें

" 'कुन्दन जी' कब चुप रहते हैं," सब कहते हैं, जाने कौन
उनकी  है  गुफ़्तार में चुप्पी,  ख़ामोशी में तक़रीरें

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पारा-पारा  तहरीरें - टुकड़ा टुकड़ा लेखनी,महरम-अंतरंग, ताबीरें - स्वप्नफल,ख़ला-शून्य मिसरा- पंक्ति, जज़ीरा- टापू,
गुफ़्तार- बोली

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

संजय कुमार कुंदन की गजलें

साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। गजल सुनना जितना अच्छा लगता है लिखना उतना ही श्रमसाध्य। साथ ही गजल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह न सिर्फ सुनने वाले को सम्मोहित कर ले बल्कि अपने संवाद को भी उद्देश्यपूर्ण तरीके से लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा सके। तो आज आनंद लेते हैं ख्यात गजलगो संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलों का।
संजय कुमार कुंदन


ग़ज़ल

गरचे  दुनिया में  हैं  हम जैसे  गुनहगार  कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की  दरकार कहाँ

ज़िन्दगी, तेरे  ही तानों से  तो आजिज़ होकर
ख़ुद  को  हम  बेचने आए  हैं, ख़रीदार  कहाँ

शह्र में  अब तलक  गरचे  है वही  रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ

तेज़  था  शौक़  का  व्योपार,  सुना  तो  आए
बढ़  गईं  सारी दुकाँ, गुम  हुआ  बाज़ार  कहाँ

हमने सोचा था  सुकूँ में  कहेंगे  हम  भी  कुछ
एक   लम्हे  के  लिए  भी  मिला   क़रार  कहाँ

शाम  भी  अब  ज़रा  कतरा के गुज़र जाती  है
दिन को भी  शाम का रहता है  इन्तज़ार  कहाँ

साथ   उजड़े   हुए  लोगों  के  रहा  है   कबसे
हाकिमे-शह्र,  वो    तेरा   है   वफ़ादार    कहाँ

किस  अदा  से  वो  कहे  झूठ के दीवाना करे
कर ले तू  शायरी,  उससे  बड़ा फ़नकार कहाँ

तू भी  आलम  पे  भला  छाएगा  कैसे  'कुन्दन'
तू   तो   सादा  है  तेरी  ज़ात   गिरहदार   कहाँ

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अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको  क़यास से
हर  शै  को  छू  लिया है  इतना  ही पास  से

शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते  हुए  वो   चेहरे   मिले  हैं   उदास   से

हम उसके  इंतज़ार  में  इस  दरजा  मह्व  थे
हम देख  न  पाए  उसे  गुज़रा  वो  पास  से

इक रात  में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें  बहुत  ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से

महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर   उन्हें   जो   देखा   लगे   मह्वे-यास से

                    ########

क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन

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तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना  मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था

तानों में  इलज़ाम   थे  तेरे    मेरी  शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था

टूट  नहीं  पाएगा   रिश्ता  इसपे   यक़ीं  होने  के  बाद
हम दोनों  के बीच  लड़ाई का  थम जाना मुश्किल था

तीरन्दाज़ी  की   यह  तेरी  मश्क़ बहुत  नौख़ेज़  लगी
सख़्त  मेरे  सीने  पे  तेरा  तीर  चलाना  मुश्किल  था

कितना तू बेबस था उस दम  जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन  झूठे  इलज़ाम  पे  मेरा तैश में आना मुश्किल  था

ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं  शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल  था

जिसका दावा था कितनों को  ज़ेरे-अदब ले  आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल  था

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दिल  की  ही बातें   लिखनी थीं   लेकिन  तूफाँ   उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया

नर्म , मुलायम  उन  जज़्बों  का  एक अजब  ये  हाल हुआ
कारगहे- दुनिया  में   उनमें   पत्थर- सा  कुछ   उतर   गया

अपनी  वो  औक़ात  कहाँ  है  फ़ुरसत  के  कुछ लम्हें  हों
इक लम्हा  ख़ाली  जो गुज़रा  ख़ौफ़ सा कोई  उभर  गया

हम   बेढंगे   लोग  से  उसको   दौलत  ने  यूँ   खेंच  लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो  हम जैसे  थे  लेकिन  कितना निखर गया

उसको   ये   ख़ुशफ़हमी  है   के  वो  आज़ाद  परिन्दा  है
वक़्त  बहुत  हुशियारी से  बस   उसका  पर  है कतर  गया

अब तो  जिधर भी  देखते हैं बस  ज़िल्लत  के  ही  सामाँ हैं
अब तो  इन  हालात  के हाथों  सारा  जादू   बिखर   गया

क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद  कुछ  वक़्त  गुज़ारा,  ख़ामोशी  से  गुज़र  गया
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संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०-  9835660910