शहर के चर्चित शायर संजय कुमार कुन्दन की गजलों में भाषा की जो रवानी है वो आपको अपनी ओर खींचती है तो संप्रेषित भाव आपको काफी कुछ सोचनें को विवश करती है। इनकी 'बेचैनियाँ', 'तुम्हें क्या बेकरारी है' और 'एक लड़का मिलने आता है' जैसे तीन गजल संग्रह पहले ही से राजकमल प्रकाशन से छप कर लोगों के बीच पहुँच चुकी है। अब इनकी चौथी गजल संग्रह "भले तुम और भी नाराज हो जाओ" जल्द ही छपकर आने वाली है। संजय कुमार कुंदन का यह संग्रह निरंकुश सत्ता के विरूद्ध बिगूल फूंक रही है। आइए पढ़ते हैं संग्रह की कुछ बेहतरीन गजलों को।
माफ़ करना मेरे आक़ा
आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ
आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी
ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे
ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका
जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
##########
अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
इक तख़्तनशीं आज भी इतराया हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके मुसाहिबों की यहाँ भीड़ लगी है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते सकाफ़त के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं मगर कहिए अलग हैं
उसकी नसीहतों का नशा छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो बाहर कहीं से आया हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया बस वही फ़रमाया हुआ है
##########
मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको तुम पुकार लो
###########
समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास मगर हसरते-परवाज़ तो है
हो ये चेहरे पे भले चस्पाँ मगर राज़ तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम दबाते रहे उसको सरो-सामाँ के तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र इतना ही नहीं है के पिसे जाते हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र है नाज़ाँ के उसे साज़ तो है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो ख़स्ताहाल है पर ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना है, उसकी इनायत है बेहयाओं पर
चलो ये शुक़्र है 'कुन्दन' से वो नाराज़ तो है।
########
हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार .
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
#########
मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी
########
सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
ज़िन्दगी, तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
#######
मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर
मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी
गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर
***********************
शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
संपर्क:- 91-9835660910, 8709042189
https://www.facebook.com/sanjaykumar.kundan/about?lst=100009393534904%3A100001695671518%3A1496290097
माफ़ करना मेरे आक़ा
आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ
आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी
ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे
ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका
जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
##########
अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
इक तख़्तनशीं आज भी इतराया हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके मुसाहिबों की यहाँ भीड़ लगी है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते सकाफ़त के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं मगर कहिए अलग हैं
उसकी नसीहतों का नशा छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो बाहर कहीं से आया हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया बस वही फ़रमाया हुआ है
##########
मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको तुम पुकार लो
###########
समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास मगर हसरते-परवाज़ तो है
हो ये चेहरे पे भले चस्पाँ मगर राज़ तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम दबाते रहे उसको सरो-सामाँ के तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र इतना ही नहीं है के पिसे जाते हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र है नाज़ाँ के उसे साज़ तो है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो ख़स्ताहाल है पर ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना है, उसकी इनायत है बेहयाओं पर
चलो ये शुक़्र है 'कुन्दन' से वो नाराज़ तो है।
########
हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार .
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
#########
मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी
########
सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
ज़िन्दगी, तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
#######
मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर
मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी
गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर
***********************
शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
संपर्क:- 91-9835660910, 8709042189
https://www.facebook.com/sanjaykumar.kundan/about?lst=100009393534904%3A100001695671518%3A1496290097


