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गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

रश्मि भारद्वाज की कविता आपके मर्म को छूती हैं। यथार्थ को बयां करने के लिए कवयित्री जिन बिम्बों का प्रयोग करती हैं वो सिर्फ शब्दों एवं अर्थों को ही सिर्फ गहरे तक खोलती नहीं हैं बल्कि आपको भावशून्य कर कुछ सोचने को विवश कर देती हैं। इनकी कविता ही इनकी पहचान भविष्य में होगी, इस बात की आश्वस्ति इन कविताओं से मिलती है।





 -विसर्जन-


त्याग दी गयी वस्तुओं से अंटा हुआ है संसार

वे जो ह्रदय से निर्वासित हैं

 घरों में नहीं शेष है उनका स्थान

व्यर्थ ही कितनी जगह घेरे हैं इस पृथ्वी की

उनकी भला अब किसे आवश्यकता है


वृक्षों तले औंधे पड़े हैं असंख्य ईश्वर

 कभी आह्वान किए गए थे

राह रोक लेती हैं याचक आँखें 

भूख से व्याकुल मवेशियों की 

सुनते हैं जिनके लिए रक्त बहाया जा सकता है,

छोड़ दिए गए रातोंरात चाव से ख़रीदे गए श्वान 

 हर वाहन को देखकर सोचते हैं

स्वामी का दिल पसीझा है,

छोड़ तो वे भी दी गयीं अचानक एक दिन

 बड़े ही ताम झाम के साथ

जिन्हें घरों में ला रखा गया था,

ताल -तलैयों में भी उनके लिए शरण नहीं 

देवालयों के बंद हैं कपाट 

वे देवियाँ

 जो मन से विसर्जित कर दी गयी हैं


इस परिपक्व संसार में 

जहाँ वस्तुएँ ही नहीं

बेतरह धड़कते दिल त्याग दिए जाते हैं

अपनी अनुपयोगिता के कारण, 

मैं त्याग देती हूँ अपना अहंकार

त्यागती हूँ अपनी ईर्ष्या 

लेकिन उसका एक चित्र तक नहीं तज पाती 

जिसे कभी भी जीवन में शामिल किया है


मेरा कमरा ही नहीं, मेरा मन भी 

इस साफ़ सुथरी दुनिया के लिए एक कबाड़ घर होगा

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रश्मि भारद्वाज


मैं ऐसे लिख रही हूँ

जैसे मेरे पास एक और जीवन हो

मैं ऐसे प्रेम कर रही हूँ

जैसे मेरे पास कल का दिन नहीं होगा


मैं यह नहीं चाहती 

अंत क्षणों में

अधूरी पंक्तियों के दुःख के साथ

यह कष्ट भी साथ जाए 

मेरे पास देने के लिए कितना कम प्रेम था


#rashmibhardwaj

-इच्छा कपास का फूल है-


वे ही क्षण असाधारण हुए

जो बहुत साधारण बातों से बने थे 


संसार भर का वैभव

भांति भांति के वस्त्र पकवान

भव्य अट्टालिकाएँ

और कितने संतप्त मन

लेकिन रस पाया मैंने उस मोची दम्पत्ति के छप्पर तले

जो दुनिया भर के फटे जूते सिलने के बाद

सुकून से दोपहर की रोटी खा रहे थे


बहुत मामूली चीज़ें मैंने भी जीवन से चाही हैं 

रत्न माणिक 

बहुमूल्य इत्र, परिधान

काम की चौंसठ कलाएँ 

उम्र पार का संग

सुख यहाँ नहीं है

सुख है जब तुम बैठो मेरे सिरहाने

पढो किसी प्रिय कवि की कोई कविता

जो उस क्षण के बाद संसार की 

सबसे सुंदर कविता होगी 


लोग कहते हैं प्रेम से जटिल कुछ नहीं 

यह भी प्रेम में ही सम्भव है

आप इतने सहज हो जाएं

इतने भार हीन

किसी इच्छा से घिरे होकर भी

उतने ही इच्छा मुक्त

जैसे कपास का फूल


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रश्मि भारद्वाज


धिया जनम 


पहली बार कब मरी थी तुम 

आषाढ़ के उस कीच और जल में

जब एक तरफ़ मण्डप सजता था 

दूसरी ओर था उखाड़-पछाड़ पानी

पुरखिन ने गड़वाया था 

जल में काठ का दुल्हा- दुल्हन

टोटका था यह नहीं तो

सब दहा ले जाएगा पानी 

दहा ही ले गया 

सिर्फ़ तुम्हें


पहली बार कब मरी थी तुम

जब परदेस पढ़ के आए दूल्हे ने

कहा था तुम्हें गँवार

बारात लेकर लौट जाना चाहता था

गिटपिट अंग्रेज़ी नहीं बोल सकी तुम तब भी

 ब्रह्मांड- सोसायटी के दो कमरों में सिमटी

 परकटी गौरैया सी छटपटाती रही


पहली बार कब मरी थी तुम 

जब लौटने को बंद थे सब दरवाज़े 

वहीं रहना है हर हाल में

वहीं रहकर 

ढलती गयी किसी और साँचे में इतना

अपनी ही देह में न रही


या पहली बार तब ही मरी थी तुम

जब रोई थी पहली बार 

संसार हुलसा नहीं था 

मृत्यु मुस्कुरा उठी थी


अब जब तुम वाक़ई नहीं हो 

सोचती हूँ

पहली बार कब मरी थी तुम,

स्टोव फटने से मर गयी एक जवान औरत

किसी ने विष चाट लिया

कोई झूलती मिली भरी दुपहरी

किसी की चमकती आत्मा यूँ ही घुन खा गयी,

बीते दिनों सपनों से भरी एक देह 

छत से कूद गयी 

 उस रोज़ तुम कौन-सी बार मरी थी 


(यह कविता नहीं, तुम्हारी आवाज़ नहीं बन सकी, तुमपर कविता कैसे लिख सकूँगी! तुम, मेरी माँ-सी जो मेरी हर किताब पढ़कर कहती थी- कभी मेरी कथा कहना!

मैंने कितनी बार कहा फिर भी अकथ रही तुम्हारी कहानी)


फेसबुक से साभार।

सोमवार, 28 नवंबर 2022

रश्मि भारद्वाज की कविताएं

 


युवा कवि रश्मि भारद्वाज की कविताएं यथार्थ को जितना बयां करती हैं उतना ही आपके मर्म को सहलाते हुए आगे बढ़ती है। जितनी कविता जिन्दगी में घूमती है उतनी ही आपकी आंखों को खोलते चलती है। आइए पढ़ते हैं रश्मि भारद्वाज की कुछ कविताएं:-



1

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कातिक चढ़े पहली बार छिदे थे कान

सुनार ने तांबे की सुई दन्न से आर पार कर दी थी 

 इससे पहले कि चीख निकलती

हाथों में थमा दी थी नानी ने गुड़ की धेली

मीठा मीठा गप्प, सब दर्द छू 

ओस लगा लेना भोर में पत्तों पर पड़ी 

सब घाव भर जाएगा 


बाद में जाना

दुनिया में होना है 

तो कान छिदवाने के दर्द से बार-बार गुज़रना होगा 

बहुत अनावश्यक , बहुत व्यर्थ 

लेकिन कुछ सुंदर की उम्मीद में 

घटती जा रही एक प्रक्रिया

गुड़ की धेली जीभ पर घुलती है

आंखें मींच क़ैद कर दिया जाता है सब पानी 

ओस पर नंगे पाँव चलते हुए

सोचती हूँ 

सब घाव ऐसे ही भरे जा सकते 

तो कितना अच्छा होता 

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रश्मि

2.

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अपने पहाड़ से पृथक हो आए सभी पत्थर

देव नहीं बने

वे जीवन में घुले हुए थे

 किसी अश्रव्य राग की तरह 

उन्होंने चुनी मृत्यु की नीरवता

एक भीड़ के गुज़र जाने के बाद भी

हाथ बांधे, नत रहे

वे मूक साक्षी हैं अपने समक्ष घटित 

 भव्यता और क्षुद्रता के 

मनुष्य की दैन्यता, 

ईश्वर की कातरता के


वे गवाह हैं ऐसे ही किसी बेहद मामूली दिन के भी

जब एक स्त्री और एक पुरूष

जिन्हें दुनिया एकांत खोजते प्रेमियों की तरह देख रही थी

अपने वर्तमान की असंख्य निर्रथक ध्वनियों के मध्य 

भविष्य से उतने ही निर्लिप्त

जितना अतीत से

सूदूर प्रदेश की यात्रा कर

अपना मौन सुन सकने चले आए थे


नवम्बर के मंद पड़ते प्रकाश में

मैं ऐसे ही समाधिस्थ पत्थरों का स्वप्न देखती हूँ

जिनकी तप्त छाती पर सिर टिकाए

एक बार मैं उनके ह्रदय के कोलाहल को सुनना चाहूंगी 

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रश्मि भारद्वाज

3.

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बीती रात, बहुत देर रात

जब उसे अपने नर्म बिछौने में होना चाहिए था

बड़े मीठे कण्ठ से वह गाती जा रही थी

मैंने कल्पना की उसके थपकते पैरों की

एक उष्ण हथेली पकड़े वह झूलती जाती होगी 

उमगती वह

गाती थी रोशनी के किसी देश की बात

शायद चाँद के बारे में

वहाँ से लाए जाने वाले धानी सपनों के बारे में

पिता ही होंगे शायद 

जो घर चलकर सो जाने की हिदायत दे रहे थे


बीती रात, बहुत देर रात

नींद हम दोनों की ही गुम थी 

बस कारण अलग थे

वह जिस झूठ को गुनगुनाती जागती जा रही थी 

मैंने अपना वह सच कहीं खो दिया था 


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रश्मि

4.

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सब अबूझ चीज़ें औचक ही मिलती हैं

मृत्यु, प्रेम और जीवन


एक मृत्यु नींद के बाद मिला है जीवन

एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद मिला है प्रेम 

कल कुछ भी शेष नहीं रहा

तब भी

तुम रहोगी 


जीवन संतुलन साधते रहने का व्यापार नहीं है 

कई बार नहीं हो अंगुल भर आधार

फिर भी छोड़ देना होता है स्वयं को 

एक अज्ञात विश्वास के सहारे 

किसी तरह टिके रहना जीना नहीं है

जीने के लिए उतारने होते हैं

भय और संशय के सारे कवच 

मोह और क्षोभ के अधिकांश केंचुल


बार- बार मरती रहोगी इसी एक जीवन में

तो मृत्यु के लिए क्या शेष छोड़ जाओगी


रश्मि!