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बुधवार, 26 जुलाई 2023

पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर -सुशील कुमार भारद्वाज

 पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है नरेन्द्र कुमार की नीलामघर

-सुशील कुमार भारद्वाज

 

नरेंद्र कुमार का प्रथम एवं सद्यः प्रकाशित कविता संग्रहनीलामघरवर्तमान समय से रूबरू कराती कविताओं का एक संग्रह है. कवि ने परिवेशगत जीवन में व्याप्त पूंजीवादी व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों को कलमबद्ध करने की कोशिश की है. चाहे बात राजनीतिक सुविधा की हो, चाहे बात सामाजिक और राजनीतिक जीवन में फैले भ्रष्टाचार की हो, चाहे मानवीय संवेदना की, चाहे प्राकृतिक दृष्टिकोण की, चाहे बात धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा की हो, कवि ने अपनी सीमा का भरपूर प्रयोग करने की कोशिश की है. कवि स्वीकार भी करता है कि वर्त्तमान समय की अराजकता के लिए सिर्फ दूसरे ही लोग दोषी नहीं हैं बल्कि इसमें हम सब की भी सामूहिक सहभागिता है. भ्रष्टाचार का जो विद्रूप चेहरा सामने नज़र आ रहा है उसके लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेवार हैं, जितना काली करतूतों में आकंठ डूबा इन्सान.

संग्रह में प्रस्तुत सभी कविताएं गौरतलब हैं. संग्रह की पहली और शीर्षक कवितानीलामघरही मनुष्य की दम तोड़ती मनुष्यता की एहसास कराती है. यह कविता उस नीलामी प्रथा की याद दिलाती है जहाँ इन्सान एक बाजारू वस्तु की तरह बिक रहा है. एक तरफ क्रिकेट की दुनिया है, जहाँ लोग लाखों-करोड़ों रूपये में शौक से बिक कर किसी का गुलाम बनते हैं, वहीं दूसरी ओर चमड़ी से भी दमड़ी निकाल लेने की कीमत पर भूख से बिलबिलाते लोग बिकने को तैयार हैं. दोनों जगह लोग पेट की क्षुधा मिटाने के लिए ही बिक रहे हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि कोई शौक से बिक रहा है और कोई बिकने के लिए मजबूर किया जा रहा है.




ग्लेडिएटरकविता को भी इस कड़ी में जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न एक मनुष्य अपने युद्धोन्मादी सनक में अपने मनोरंजन के लिए दूसरे मनुष्य को बहुत ही बेबाकी और बेफिक्री से मौत के घाट उतरते देख खुश होता है. उसे हार-जीत की चिंता है लेकिन खत्म होते इंसानियत की नहीं. और आश्चर्य भी कम नहीं कि बदहाली में जी रहे परिवार को संभाल लेने के भ्रम में युवा भी चंद रुपयों की खातिर अपनी जवानी को दांव पर लगाने से नहीं चुकते हैं.

संत्रास के विभिन्न स्वरूपों के बीच भी कवि वैसे युवाओं को अपने परिवेश में ढूढ़ ही लेता है जो जिन्दगी की जिम्मेवारियों और दुश्वारियों के बीच अपने लिए पलायन का रास्ता ढूंढ लेता है. क्षणिक सुख के लिए ही सही लेकिन वेडीजे की धुनपर बेफिक्री में इतना नशाग्रस्त हो जाते हैं कि वे अपनी सारी मूलभूत समस्याओं को भूल जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि वे बेरोजगार हैं. फसल बर्बाद हो गया है. पिता के फटे जूते की कौन कहे? माँ की पैबंद लगी साड़ी की भी सुध उसे नहीं रहती है. सरकार ऐसे ही युवाओं को तो तलाशती रहती है जो अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल कर सिर्फ उनके इशारे पर नाचते रहे. होश में आने के बाद यही युवा तो सवाल पूछेंगें. व्यवस्था पर सवाल उठाएंगें. लेकिन तब तक इतना विलंब हो चुका होगा कि इस अराजक माहौल के लिए खुद को दोषी मानते हुए कहेंगें कि इस परिस्थिति मेंमेरा भी हाथतो है. और फिर शांत हो जाएंगी उनकी आवाजें. उनका आवेग और उनका क्रोध. उनके सोचने की दिशा बदल चुकी होगी. तब वे सिर्फ पूछेंगें कितुम्हारा ईश्वरकैसा है जो भ्रष्टाचारियों को भी खुले हाथ से आशीर्वाद देता है? सत्य की कब्र पर पनपते असत्य को भी खाद-पानी देकर पुष्पित-पल्लवित होने देता है. औरआशंकित मनसे पूछेगा कि आखिर भ्रष्टाचारी कैसी तीर्थयात्रा पर जाते हैं? कैसी नदी में डुबकी लगाते हैं कि हर बार वे आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंस कर ख़ुशी से किल्लोल करते रहते हैं? औरये लोगवही लोग हैं, जिन्हें अपने कुकृत्य का ज्ञान है. उन्हें पता है कि अपराध के लिए सामाजिक और क़ानूनी रूप से दंड विधान तय है और उसी दंड से बचने की खातिर एक अपराध के बाद एक और जघन्य अपराध को अंजाम दे देते हैं.

नरेंद्र कुमार अपने परिवेश में व्याप्त राजनीतिक आबोहवा को भी बखूबी पहचानते हैं. यूँ कह लीजिए कि हर जन्मजात इंसान की तरह उनमें भी राजनीतिक कीड़ा कहीं--कहीं कुलबुलाता है, जो उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तंज कसने को मजबूर करता है. यह सर्वविदित है कि आज लोकतंत्र किस विद्रूपता का शिकार हो गया है? इसके प्रतीकों का प्रयोग आज किस प्रकार स्वार्थसिद्धि के लिए किया जा रहा है? राजनेताओं की कथनी और करनी में कितना बड़ा फासला आ गया है? ‘कुछ हिस्सा’, ‘सच-सच बताना’, ‘स्लोगन’, ‘राजनीतिआदि कविताएं राजनीति के भावार्थ को ही विविध रूप में स्पष्ट करती है. ‘क्रांतिजहां प्रभावकारी मीडिया में छूटते सत्य की व्यथा है तोहमारा प्रजातंत्रवैसे आमजन की व्यथा है जो शासकों को सत्ता सौंपकर खुद को ठगा-सा महसूस करते हैं. ‘कुत्ते-एकऔरकुत्ते-दोमें बिम्ब का प्रयोग करते हुए प्रचलित राजनीतिक हथकंडे पर ही तंज कसने की कोशिश की गई है. कवि मीडिया में क्रूर मजाक बनतेवृक्षारोपणका भी बखूबी चित्रांकन करते हैं जहाँ बेचारे पत्ते झुलस रहे हैं और अखबारों में नेताजी के चेहरे चमक रहे हैं. यूं कह लीजिए प्रकृति की कब्र पर नेताओं के चेहरे चमक रहे हैं. ‘बावनदास की वापसीसमाजवाद और पूंजीवाद के जंग पर एक राजनीतिक टिप्पणी ही है. इतना ही नहींजयंतीश्रद्धा से परे राजनीतिक स्वार्थ में क्रियाकलाप करते लोगों का चित्रांकन है, जो यांत्रिक रुप से उसमें शरीक होते हैं और सुविधा के अनुसार सुविधा की राजनीति के लिए कभी किसी की जयंती मनाते हैं, तो कभी भूल जाते हैं. कभी किसी को आमंत्रित कर लेते हैं, किसी को उपेक्षित कर देते हैं. यूं कह लीजिए कि कवि ने मौजूदा राजनीतिक व्यवहार को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है. ‘घेरे के भीतरकविता सवाल है उनके दावों पर कि आखिर देश सशक्त हाथों में कैसे हैं जब नेता को अपनों के बीच रहने के लिए ही सुरक्षा की जुगाड़ करनी पड़ती है?

कवि अपनी कविताओं में मानवीय द्वंद्व को भी जगह देता है. ‘मैं चाहता हूं कि’,‘जिंदगी’,‘याद’,‘लुकाछिपीआदि कविता रिश्तों में खोती गर्माहट को एक ताजगी देने की कोशिश करती है. ‘इंतजारवृद्धाश्रम में पड़े उन इंसानों की अंतहीन व्यथा है जिनके बच्चे पढ़-लिख कर विदेशों में रुपए तो खूब कमा रहे हैं, जिंदगी भी शायद अपने मजे से जी रहे हैं. लेकिन वे पूंजीवाद की मायावी दुनियां में अपने रिश्तों को ही भूल गए हैं. अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए हैं और भूल गए हैं अपने माता-पिता को.

भूख और शोक’, ‘रमुआ की थालीदो जून की रोटी की खातिर तरसते वैसे लोगों की व्यथा है जो दूसरों को अपने गम पर भी हँसने का मौका देते हैं. ‘शान्ति का शोकअभिव्यक्ति है बदलते समय की, जो जीवन की एकरसता से त्रस्त होकर मनुष्य शांति से अशांति की ओर और अशांति से शांति की ओर बारबार आवागमन का जद्दोजहद करता है. ‘शब्द और जीवन’, ‘टायर’, ‘कैलेंडर’, ‘भ्रम’, ‘बीहड़’, ‘तर्पणआदि कविताओं में कवि ने बिंब का बखूबी इस्तेमाल किया है. जीवन के विभिन्न दर्द को पकड़ने के लिए जहां कई बार शब्द भी अपना अर्थ खोजने लगते हैं. ‘अबकी मेले में देखा’, ‘उस पार’, ‘एक रात’, ‘सफर मेंकविता पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुकी जिन्दगी की एक सच्चाई है, जहां दिखावे की छटपटाहट है, खुद से भागने की कोशिश है. यांत्रिक जीवनशैली में मनुष्यता, सामाजिकता और रिश्तों की गर्माहट खो चुकी ठंडापन है तोतू-तू, मैं मैंमें अहम प्रदर्शन करता जीवन का सौन्दर्य है. ‘तुम्हारा शहरऔरअपना शहरमें कवि जीवन की समरसता और सामाजिकता को तलाशने की कोशिश करता है. वह असहजता महसूस करता है खुशहाली की कब्र पर पनप रहे खोखली अजनबीयत और यांत्रिकता पर. क्षुधा शांति के लिए शिकार से शिकारी बनने की प्रक्रिया हैभूख’. ‘उन्मुक्तस्वतंत्रता की अभिलाषा और भय का मिश्रित रूप है. ‘सड़ांधसमाज में फैली अराजकता पर प्रहार है, जहां हर मामले को दबाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी सच जानने की कोशिश नहीं की जाती है.

विकास के रास्तेचलकर प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश में विनाश के किनारे पहुंच चुकी है व्यवस्था. ‘सड़क पर : कुछ दृश्यमें कवि कहना चाहते हैं कि सत्ता सम्पन्न लोग ही नियमों को हर जगह तार-तार करते हैं. दुर्बल में इतनी शक्ति कहां जो वह ऐसी हिमाकत कर सके?

प्रतिदानहमारी व्यवस्था पर चोट करती कविता है, जहां श्रेष्ठ को कमतर की सेवा में प्रस्तुत कर उनकी प्रगति को ही बाधित कर दिया जाता है. ‘नई पहचानव्यवस्था पर ही चोट करती है जहां लाशों पर भी राजनीति की जाती है. मरने वाले को भी पता नहीं होता कि उनकी लाशों की गिनती आतंकियों में होगी या आमजनों में? ‘स्कूल: एक दृश्यभी व्यवस्था पर ही एक तंज है जहां आपस में बातचीत के क्रम में परिश्रम के महत्व को बखाना जा रहा है जबकि वे लोग खुद अपने कर्तव्य से विमुख हैं.

अमरत्वपरजीवी जिस तरह पौधों की वृद्धि-गति को रोक देते हैं, वैसे ही निजी हित के लिए परजीवी इंसान भी अपने स्वार्थ में किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं. ‘सेंसेक्स और मांशीर्षक काफी कुछ कहती है. एक तरफ बाजार है, धन की आवाजाही है तो दूसरी तरफ मां की भावना है. रिश्ता है, लेकिन बाजार के आगे मानवीय रिश्ता दम तोड़ते नजर आता है. ‘दुख की शुरुआततो अलगाव से ही होती है लेकिन मनुष्य सोचता है कि बंटवारे के बाद सुखी रहेंगे. विकास करेंगे. लेकिन वह भूल जाता है कि विभाजन ही दुख की शुरुआत है. ‘हमारा हिस्साखुद से अलगाव, टूटन से छलकते दर्द को बयां करता है. ‘वह मारा गयाचोट है उस व्यवस्था पर जहां क्रांति का बिगुल फूंकने वाले कई बार असमय शिकारियों के शिकार बन जाते हैं और गढ ली जाती है विभिन्न प्रकार की कहानियां विभिन्न स्तरों पर. लिख दी जाती है यश-अपयश की कथाएँ.  ‘विकास का पहियाटिप्पणी है आधुनिकता के रथ पर सवार पूंजीवाद पर, जहां विकास के पथ पर चलते हुए खेलते हैं प्रकृति के नियमों से और भूल जाते हैं मूल्य उन प्रकृति के अनमोल अमूल्य तत्वों को. और जब सबकुछ समाप्त होने लगता है तो उन्हें अनमोल अमूल्य तत्वों के लिए मुंह मांगी कीमत चुकाने के लिए विवश कर दिया जाता है. ‘सिस्टमअस्पताल की बदहाली पर लिखी गई कविता है, जहां लोग आते तो हैं बहुत ही उम्मीद से. अपनों को फिर से जिन्दगी दिला पाने की उम्मीद में, लेकिन वहां मिलती है केवल निराशा. और आंसुओं के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता यही सबसे बड़ा सरकारी व्यवस्था का सच है.

दाग अच्छे हैंएक टीवी विज्ञापन का पंच लाइन है जो कीचड़, धूल को मनुष्यता और जीवन की वास्तविकता के रूप में रेखांकित करता है लेकिन कवि ने इसे तंज के रूप में इंगित करने की कोशिश की है कि किस तरह भ्रष्टाचार के गर्त में धंसे लोग नैतिकता के सारे पैमाने को तोड़कर जश्न मना रहे हैं. दागदार होना जैसे कलंक नहीं, गर्व का विषय हो. ‘जयकाराधर्म की आड़ में हिंसा को विविध रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस कविता में भी बिंब का बखूबी प्रयोग किया गया है, जैसे सफेद कपोत शांति के लिए, तलवार हिंसा के लिए, काले में असत्य/ भ्रष्टाचार के लिए, सूरज सत्य के लिए और पाक साफ के लिए. संग्रह की अंतिम कविता हैकिसान’. इसमें भी कवि ने प्रकृतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है. प्रकृति को रौंदकर विकास की सड़क बनाई जा रही है. किसान बना इंसान मार्केटिंग का गुर सीख गया है. वह लोगों को सपना दिखा-दिखाकर खेतिहर जमीन को बेचना सीख गया है. पूंजीवाद इस कदर हावी है कि सस्ती चीजों के महंगे हो जाने का डर दिखाकर भी किसी तरह खेत से मुक्ति पाना चाहता है.

नीलामघर कविता संग्रह से गुजरने के बाद युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की बातों पर सहमति बनती है किनरेंद्र कुमार की भाषा तनाव की भाषा है. उनकी कविताओं में व्यक्ति द्वारा भोगी गई परिवेशगत यातनाओं का यथार्थ अनुभव है. एक ऐसा अनुभव जो तनाव को जन्म देता है, जिसमें बेचैनी है, आक्रोश है, कुछ-कुछ रीतिगत शिल्प की टूटन है. आदर्श के नजरिए से देखे जाने पर यहाँ मूल्यों की टूटन भी है. उदार लोकतंत्र में पूंजीवादी शक्तियां बहुत कुछ तोड़ रही हैं. कवि टूटन को सजग ढंग से देख रहा है, समझ रहा है और जिस जमीन पर खड़ा है उस जमीन की धसकन से उपजा यथार्थ तनाव को जन्म दे रहा है.”

 

पुस्तक:- नीलामघर

कवि:- नरेन्द्र कुमार

पृष्ठ:- 80

मूल्य:- 120/-

प्रकाशन:- द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश

सम्पर्क:- 8210229414

Email: - sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित -सुशील कुमार भारद्वाज

 

जीवन का जीवंत आख्यान लिखने वाले लेखक हैं संतोष दीक्षित

-सुशील कुमार भारद्वाज

      




बिहार में साहित्य की धरती सदैव उर्वर बनी रही है. अक्सर किसी न किसी आन्दोलन का आगाज होते रहा है. और इसी निरंतरता को बरकरार रखते हुए सदी के अंतिम दशक में अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाले जिन युवा कथाकारों ने बिना किसी शोर–शराबे के राष्ट्रीय फलक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की है, उनमें से संतोष दीक्षित एक महत्वपूर्ण नाम है. संतोष दीक्षित का जन्म बिहार के भागलपुर जिला स्थित लालूचक में 8 दिसम्बर

1958 ई० को हुआ. इनका शिक्षा-दीक्षा भागलपुर, पटना और रांची में हुआ है.

दूसरे शब्दों में कहें तो जब ये होश सँभालने की स्थिति में थे तब देश महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा था जिसे इन्हें करीब से महसूसने का मौका मिला होगा. एक तरफ देश में आपातकाल की स्थिति थी तो दूसरी ओर जेपी के नेतृत्व में छात्र आन्दोलन अपने चरम की ओर थी. और जब ये साहित्य जगत में प्रवेश कर रहे थे उस समय देश-दुनियां की ही आबोहवा बदल रही थी. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली सोवियत संघ अपने बिखराब को करीब से देख रहा था तो अमेरिका विश्व का नेतृत्व करने के लिए एक अलग रूप में ढल रहा था. समाजवाद का नारा कमजोर हो रहा था और पूंजीवाद एक नई सुबह के स्वागत में खड़ी हो रही थी. भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता छाई हुई थी. एक तरफ मंडल-कमंडल का नारा गूंज रहा था तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद के बहाने जय श्रीराम का नारा लग रहा था. इन सबके अलावे भारत में विनिवेश के द्वार खोले जा रहे थे. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया भूमंडलीकरण के दौर में प्रवेश कर रही थी. जिसका सीधा असर हमारे जीवनशैली पर ही नहीं पड़ा बल्कि भारतीय संस्कृति पर भी पड़ा. परिवार बिखरने लगे, रिश्ते बिखरने लगे और सिसकने को मजबूर हो गई इंसानियत. पूंजीवाद का ऐसा खौफनाक स्वरूप रिश्तों के गर्माहट में दरार डालने लगी कि सबकुछ चरमराने लगा. आदर्श और नैतिकता की बात जीवन में प्रवेश करते विवध स्तर की भ्रष्टाचार के सामने नत-मस्तक होने लगी. तो लेखक की सम्वेदना उबाल खाकर उन्हेँ लिखने के लिए प्रेरित करने लगी.

मिलान कुंदेरा, सलमान रूश्दी, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविंद्रनाथ त्यागी का कुछ ऐसा प्रभाव इनके उपर पड़ा कि ये व्यंग्य लिखने लगे. हालांकि व्यंग्य की समझ इन्हें अपने पिता से विरासत में ही मिली. लेकिन कुछ समय बाद इन्हें एहसास हुआ कि व्यंग्य महज एक शैली है, अपनी बातों को सही-सही रखने के लिए कहानी ही वह विधा है जहाँ वे संतुष्टि हासिल कर सकते हैं. फिर एक बदलाव आया और कलम कहानी को तरासने लगी. कहानी के पात्र कुछ इस कदर सिर पर सवार होते कि पूरी कहानी उनसे लिखवा कर ही दम लेते.

संतोष दीक्षित जितनी सहजता से लोगों से हँसते-बोलते हुए मिलते हैं उसी सामान्य प्रक्रिया से साहित्य को भी रचते हैं. बिना किसी रणनीति के. बिना किसी दबाब के बेधड़क निरन्तर लिखते रहते हैं. बिल्कुल ही अलमस्त हो ठीक वैसे ही साहित्य कर्म में रमे रहते हैं जैसे कोई मजदूर मालिकों के दबाब में रोजमर्रा के अपने काम निबटाये चलता है. कभी धूप में पसीना बहाते हुए, कभी पुरवा के झोंकों के साथ मस्ती भरे गीत गाते हुए. तो कभी फुर्सत के लम्हों में बीड़ी-तम्बाकू का लुत्फ़ उठाते हुए. रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी जीते हुए, घर-परिवार की दैनिक जिम्मेवारियों का सहजता से निर्वहन करते हुए, पशुपालन विभाग में लगभग तीन दशक तक एक डॉक्टर की नौकरी करते हुए, जितने लोगों से इनका साबका हुआ. उन सबसे अर्जित अनुभव को इन्होंने कहीं-न-कहीं अपने कथा साहित्य में किसी न किसी रूप में पिरोने की कोशिश की है. 

इनकी कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर संघर्षशील पात्र बहुतेरे बिखरे मिलेंगें. रिश्तों की कतरन में उलझें पात्र सर्वत्र बिखरे मिलेंगें जो आपको स्वयं से सवाल करने को मजबूर कर देंगें. बुलडोजर और दीमक, आखेट (1997), शहर में लछमिनिया (2001), ललस (2004), ईश्वर का जासूस (2008), एवं धूप में सीधी सड़क (2014), में ऐसी कहानियां आपको पढ़ने को मिलेंगी. मुर्गियाचक में ईद, आखेट, घर का सबसे गन्दा आदमी, शहर में लछमिनिया, ललस, चैत के पत्ते, तस्वीर, ईश्वर का जासूस, काल-कथा इत्यादि कुछ प्रमुख कहानियां न सिर्फ काफी चर्चित हुई बल्कि उर्दू, पंजाबी एवं गुजराती भाषा में अनुवादित भी हुई है. कहानी के अलावे केलिडोस्कोप, घर-बदर, बगलगीर, एवं बैल की आँख, उपन्यास काफी चर्चित हैं. 

सेवानिवृति के बाद इनका पढना-लिखना ही अधिक हो रहा है. लिखना इनके लिए खुद को क्रियाशील रखने की एक कोशिश है. इसे इससे ही समझा जा सकता है कि इनका पहला उपन्यास “केलिडोस्कोप” वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ जबकि पिछले तीन वर्षों में घर-बदर (2020), बगलगीर (2022) और नवीनतम उपन्यास “बैल की आँख” आ चुकी है. इनके चारों उपन्यास का विषय अलग-अलग है.

केलिडोस्कोप कथा रस में डूबा हुआ बिहार के एक कस्बानुमा गाँव में पले–बढ़े एक सामान्य से नौजवान सन्तु उर्फ़ सत्येन्द्र दूबे का जिंदगीनामा है. जहाँ प्रवासी लोगों के विस्थापन के दर्द को उकेरने की कोशिश की गई है. इसमें न सिर्फ प्रवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं भावनात्मक संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है बल्कि पूंजीवाद के प्रभाव में विलुप्त होते पुराने भारत को बचाए रखने की कशमकश को भी दिखाने की कोशिश की गई है.

जबकि ‘घर-बदर’ एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति कुन्दू, जो कि रेलवे में साधारण-सी एक नौकरी करता है, के एक घर बना लेने के संघर्ष को रेखांकित करता है. एक घर का सपना देखने के लिए उसे क्या कुछ कीमत चुकानी पड़ सकती है? यह आम आदमी के सदैव आम बने रहने की अभिश्प्त्ता है या यों कहें कि उसके बस रह सकने के निरंतर संघर्ष का जीवंत बयान बन जाती है. इस अभिशप्त संघर्ष के कारणों की पड़ताल ही उपन्यास का मुख्य लक्ष्य है.

तो ‘बगलगीर’ के बहाने उपन्यासकार विद्रूप होते समय और समाज के दारुण यथार्थ को रेखांकित करने की कोशिश की है. एक ही जगह प्रेमभाव से मिलजुल कर रहने वाले किकि और अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जहर घुलते ही सौहार्द की बातों को भूल जाते हैं. लोग अजीब किस्म के तनाव और अविश्वास के साथ जीने को अभिशप्त हो जाते हैं. मौका पाते ही उपन्यासकार जीवन के विविध रूपों में फैलते भ्रष्टाचार, तानाशाह, और अवसरवादी प्रवृति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चुकते हैं.

जबकि नवीनतम उपन्यास ‘बैल की आँख’ पटना के पास एक गाँव की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर रची गई है. ग्रामीण सामाजिक संरचना, सामाजिक मनोवृति और उसी में संतुष्ट रहने तथा उससे प्रतिकार की अवस्था को एक साथ कथा में समाहित किया गया है. जातीय व्यस्था में झूठे अभिमान के साथ जीने की वजह से किस प्रकार मानवीय प्रेम एवं सौहार्द की पौध सूख जाती है. निजी हितलाभ और भविष्य की आकांक्षाएं और बदलती परिस्थितियां समय के साथ खंडित करती चलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो उपन्यासकार ने सम्पूर्ण पारिवेशिक बदलाव को एक ग्रामीण पशु चिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश की है.

बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान से सम्मानित संतोष दीक्षित अपने कहानी –उपन्यास को जिस किस्सागोई शैली में बेहद इत्मिनान से एक लम्बे कालखंड और लम्बी जीवन-कथा को बड़े ही सरस और रोचक अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को भी सहजता से प्रस्तुत करते हैं वह काबिलेगौर है. पात्र एवं परिवेश के अनुकूल जिस भाषा–शैली और शब्दों व कहावतों का उपयुक्त चयन करते हैं वह इनके साहित्य को सहज, रोचक व जीवंत बना देता है.   

सोमवार, 28 नवंबर 2022

ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना - प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना के कथायात्रा पर प्रियदर्शन का यह आलेख गौरतलब है।


 ज़िंदगी को कहानी की तरह लिखते धीरेंद्र अस्थाना

प्रियदर्शन

धीरेंद्र अस्थाना ने 70 के दशक में लिखना शुरू किया। यह वह समय है जब नई कहानी का आंदोलन अपने शिखर पर पहुंच चुका था और उसके कई नायक आधुनिक हिंदी साहित्य में इतिहास पुरुष जैसे हो चुके थे। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की लगभग कुख्यात हो चुकी त्रयी के अलावा निर्मल वर्मा, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती की कहानियां अलग-अलग ढंग से इसी आंदोलन की कड़ियों की तरह हमारे सामने थीं। ज्ञानरंजन, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, मार्कंडेय, रवींद्र कालिया और धीरेंद्र अस्थाना इसी परंपरा का हिस्सा रहे। इनके लगभग समानांतर या तत्काल बाद उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे विलक्षण कथाकार हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उभरे।

धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों को इस परंपरा के हिस्से के तौर पर पढ़ने का एक मकसद और है। नई कहानी का आंदोलन किसी शून्य से पैदा नहीं हुआ था, वह अपने देशकाल, अपनी परिस्थितियों की निहायत उपज था। आज़ादी के बाद का मोहभंग, गांव से कटकर पहली बार शहरों में बस रहे मध्यवर्ग का मुश्किल होता जीवन, युवाओं के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी और हताशा, प्रेम और दांपत्य के नए बनते तनाव- यह सब एक नया यथार्थ बना रहे थे जिसे शायद पुराने शिल्प में देखना और रचना संभव नहीं था। यह एक शुष्क यथार्थ था जिसके हिस्से के पुराने स्वप्न धीरे-धीरे तिरोहित हो रहे थे, जिसके भीतर देश को नए सिरे से गढ़ने और एक बराबरी वाला समाज बनाने की कल्पना लगभग रोज चोट खाती हुई मर रही थी और जिसके भीतर इन सबसे पैदा हुई एक गहरी बेचैनी थी।

अभाव, अनिश्चय, हताशा और बेचैनी के लगभग इसी चौराहे पर हमें धीरेंद्र अस्थाना की कई कहानियां मिलती हैं। लेकिन वे जीवन की छायाप्रति की तरह नहीं मिलतीं। धीरेंद्र अस्थाना इस मायने में अपने समय के कई कथाकारों से भिन्न हैं कि वह किन्ही दी हुई जीवन स्थितियों को, किसी अर्जित अनुभव को जस का तस नहीं रखते, बल्कि उनका लेखकीय हस्तक्षेप उनमें से अपनी कहानी चुनता है। ऐसा लगता है, पूरा जीवन उनके सामने चल रही एक कहानी जैसा है। वे उसमें शामिल भी हैं और उससे विलग भी हैं। ऐसी कहानी लिखना आसान काम नहीं होता। इसमें दो तरह के खतरे बहुत प्रत्यक्ष होते हैं। या तो कहानी बिखर जाती है या फिर वह जीवन की नकली, स्पंदनविहीन प्रति होकर रह जाती है।

लेकिन धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां दोनों खतरों के पार जाती हैं- शायद इसलिए कि उन्हें मालूम है कि अंततः उन्हें कहना या बताना क्या है। कई तरह की जटिल स्थितियां रचते हुए वे अंततः कहानी अर्जित कर लेते हैं जो उन्हें कहनी होती है। उनकी पहली ही कहानी 'लोग हाशिए पर' एक जटिल कहानी है। कहानी कम से कम तीन स्तरों पर चलती है। पहले स्तर पर एक प्रेस है जिसमें काम कर रहे कई लेखक बहुत कम पैसे पर- लगभग- शोषण की स्थिति में नौकरी करने को मजबूर हैं। दूसरा स्तर आर्थिक तौर पर कमज़ोर इन लेखकों के परिवारों का है जिनकी ज़िम्मेदारियां पूरी करते या उनके दबाव से भागते-बचते ये लोग शराब के ठेकों की शरण लेते हैं और एक-दूसरे को किसी फुरसत में अपनी परेशानियां, कुंठाएं, कहानियां-कविताएं सब सुनाते हैं। एक अन्य स्तर पर यह कहानी उन मज़दूरों की है जो एक दिन हड़ताल करते हैं और अपना हक़ हासिल करने की कोशिश करते हैं। लगभग कामयाब दिखती इस हड़ताल के खात्मे के बाद मालिक साज़िश करते हैं और हड़ताल का नायक एक क़त्ल के जुर्म में सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। 

पहली नज़र में यह कुछ अतिरिक्त नाटकीय कहानी लग सकती है- जिसे लेखक ने अपनी कल्पना से बुना ही नहीं है, बल्कि अपने स्व को अलग-अलग चरित्रों में बिखेर दिया है। लेकिन कहानी की सफलता इस बात में है कि कथाकार इन तमाम प्रतिकूलताओं के बीच बनने वाले हालात को बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ता है, किसी नक़ली आशावाद की गिरफ़्त में आने की जगह कहानी को उसके यथार्थ तक जाने देता है और उसमें नाटकीयता मिलाते हुए भी उसके पाठ की प्रामाणिकता बनाए रखता है। दरअसल इस काम में धीरेंद्र अस्थाना की मददगार उनकी बहुत जीवंत भाषा भी है- ऐसी भाषा जो बहुत कम शब्दों में स्थितियों और चरित्रों को रच सकने में सक्षम है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसी भाषा किसी कौशल या अभ्यास का नतीजा नहीं होती, उस जीवन से जुड़ाव से पैदा होती है जिसको लेखक अपनी कथा में रचने की कोशिश कर रहा होता है। यह जुड़ाव इस कहानी में बना रहता है और इसलिए कहानी अपने पाठकों से जुड़ पाती है। 

धीरेंद्र अस्थाना दरअसल जीवन के समानांतर अपनी कहानियों में एक और जीवन रच रहे होते हैं। क़ायदे से लगभग हर लेखक यही काम करता है, लेकिन सबकी अपनी प्रविधि होती है। कुछ लोग बस जो घटित होता है, उसमें कुछ कल्पना का रसायन मिलाकर, अपने-आप को अदृश्य रखते हुए ऐसी यथार्थवादी कहानियां लिखते हैं जिन्हें पढ़ते हुए लेखक का- या कहानी पढ़ने का- ध्यान नहीं आता। 

मगर धीरेंद्र अस्थाना की प्रविधि दूसरी है। वे एक साथ अपनी कहानियों में इतनी सारी चीज़ें ले आते हैं कि उन्हें जोड़ने के लिए कोई लेखक चाहिए। वे पाठक को यह भूलने नहीं देते कि वह कहानी ही पढ़ रहा है, लेकिन कहानी के तमाम सूत्र अंततः उस जीवन की ओर ले जाते हैं जिसमें उल्लास हो या उदासी, वह अपने पूरे गाढ़े रंग में प्रगट होती है। 

ऐसी ही एक कहानी है ‘भूत।‘ लेखक का एक वर्तमान है जिसमें एक स्त्री भी है जिससे वह प्रेम करता है। लेकिन उसे लगता रहता है कि उसका भूत उसके वर्तमान को खा रहा है। वह चाहता है कि वह अपनी प्रेमिका से यह सब साझा कर सके, लेकिन कर नहीं पाता। दूसरी तरफ़ प्रेमिका लगातार महसूस करती है कि वह एक अजनबी शख़्स के साथ है। वह बार-बार उसे कुरेदने की कोशिश करती है, लेकिन वह अपने खोल से बाहर नहीं आता। यह स्थिति उसे दफ़्तर में भी अजनबी और अकेला करती जाती है। जब वह पीछे मुड़कर और पलट कर देखता है तो पाठक के सामने एक सिहरा देने वाला यथार्थ सामने आता है। बरसों पहले वह पिता की मौत के बाद अपनी मां की उम्मीद की तरह घर से निकला था- लेकिन कहां और क्यों रास्ते में छूट गया और इस अधूरी रह गई वापसी ने कैसे उसे वर्तमान का प्रेत बना डाला है, इसकी लगभग स्तब्ध कर देने वाली कहानी हमारे सामने आती है। 

ध्यान से देखें तो धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां जीवन के कई आयामों के बीच आवाजाही करती हैं। एक तरफ़ वह समाज और व्यवस्था है जिससे उनके मध्यवर्गीय चरित्र टकराते रहते हैं- कभी हारते और कभी जीतते भी हैं, लेकिन अंततः उनकी कहानी इस अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था और इसे बदलने की ज़रूरत को कुछ रेखांकित करती हुई किसी अंत तक पहुंचती है। एक आयाम उस परिवार का है जिसमें बेबस पिता हैं, कातर मां हैं, भाई और बहनें हैं। कहीं पिता से टकराता, कहीं उनसे पिटता और कहीं उनको याद करता नायक है, कहीं मां की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की कचोट का मारा कथावाचक हैं, कहीं भाई को तलाश रहा एक स्तब्ध शख़्स है जिसे पता है कि बहुत सारी मजबूरियों को मिलाकर बने यथार्थ ने उसे लगभग पीस डाला है। एक आयाम प्रेम और घर से जुड़ा है जहां रिश्ते दरकते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और फिर एक-दूसरे को नए सिरे से पहचानने की कोशिश करते हैं। 

इन्हीं कहानियों के बीच एक स्तब्ध कर देने वाली कहानी ‘चीख’ है। कथावाचक का मानसिक तौर पर दुर्बल भाई घर से चला गया है, घर उसकी तलाश में जुटा है, पच्चीस दिन बाद अचानक वह लौट आता है। लेकिन वह यह बता पाने में असमर्थ है कि इन पच्चीस दिनों में वह कहां रहा, किनके आसरे रहा। बस एक दिन बता पाता है कि उसे मां की चीख सुनाई पड़ी थी और वह लौट आया था। 

ऐसी ही एक बहुत जटिल कहानी ‘जन्मभूमि’ है। लेखक कहानी के शुरू में ही यह ‘डिस्क्लेमर’ डाल देता है कि यह सुसंगत घटनाक्रमों के बीच बनी कहानी नहीं है- इसे वह ‘ऐंटी स्टोरी’- प्रति कहानी- कहता है। यह कहानी भी बहुत नाटकीय ढंग से शुरू होती है- लेखक का इसरार है कि पाठक किसी मंच की कल्पना करें जिसमें एक दृश्य घटित हो रहा है। इस दृश्य में अरसे बाद बेटे के सामने आया पिता उसे गद्दार कहता है। आने वाले दिनों में पार्टी के कॉमरेड उसे डरपोक कहते हैं क्योंकि वह कहता है कि वह राजनीतिक मोर्चे से ज़्यादा साहित्यिक मोर्चे पर उपयुक्त है। वह शराब के ठेके पर अपने दोस्त के साथ बैठता है, वहां से पिट कर दोस्त के साथ ही किसी अनजान लड़की के घर पहुंचता है। उसे अपनी पत्नी याद आती है और उसका दुख याद आता है कि वह उसे समझने की कोशिश नहीं करता। 

दरअसल यह कई दृश्यों को मिलाकर बुनी गई कहानी है। किसी फिल्म की तरह ये सारे दृश्य साथ चल रहे होते हैं। एक दृश्य पत्नी का है, एक दृश्य कथावाचक की रंगकर्मी दोस्त अनुराधा कुलकर्णी का है और एक दृश्य उसके अकेलेपन का भी है। ये सारे दृश्य मिलकर एक बड़ा दृश्य बनाते हैं- अभाव और संकट की मारी दुनिया में एक संवेदनशील-चरित्र के लगातार पिटने, रोने और पलायनोन्मुख होने का। लेकिन यह इस निरे अर्थ में पलायन नहीं है कि इसमें सोचने का तत्व बाक़ी है, प्रतिरोध और गुस्सा बाक़ी है और यह खयाल और सवाल बाक़ी है कि ‘एक अकेला आदमी बावजूद सकारात्मक सोच और तमन्नाओं के अंततः ग़लत क्यों साबित होता है, होता चला जाता है?’

यहीं यह खयाल आता है कि क्या धीरेंद्र अस्थाना की कहानियां विफल कथानायकों की कहानियां हैं? उनके हिस्से का प्रेम अधूरा रहता है, उनका परिवार उनसे असंतुष्ट रहता है, ज़िंदगी उनसे सधती नहीं, क्रांति उनसे होती नहीं। वे अकेले पड़ जाने को अभिशप्त चरित्र हैं। लेकिन क्या यह विफलता उनके भीतर मौजूद किसी ‘फेटल फ्लॉ’- किसी सांघातिक कमज़ोरी की है- शेक्सपियर के महान चरित्रों की तरह जो एक मोड़ पर जानलेवा साबित होती है? या इसका वास्ता उस दुर्निवार और दुर्विराट होती व्यवस्था से है जिसमें किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए या तो यांत्रिक बन कर जीना संभव है या फिर घुट-घुट कर मरना संभव है? दरअसल यह सवाल धीरेंद्र अस्थाना की कहानियों का मर्म समझने की एक कुंजी दे सकता है। धीरेंद्र अस्थाना की ये कहानियां अच्छी क्यों लगती हैं? क्योंकि वे अपनी अंतर्वेदना में सिर्फ़ निजी छटपटाहट की कहानियां नहीं हैं, वे एक सार्वजनिक विडंबना की भी कहानियां हैं जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया है। 

‘नींद के बाहर’ वह कहानी है जिसमें धीरेंद्र अस्थाना का कथा-वैभव अपने पूरे निखार के साथ दिखाई पड़ता है। एक बड़े कंपनी के बड़े अधिकारी की नौकरी छूटने के बाद उसकी दुनिया बदल जाती है। लेकिन यह नौकरी छूटने के साथ लोगों की नज़र बदल जाने की सपाट कहानी नहीं है। उल्टे उस अधिकारी को लगता है कि वह जब तक नौकरी में था तब तक एक गहरी नींद में था जिसमें दुनिया और उसका सच उसके सामने से ओझल थे। नौकरी छूटने के साथ वह नींद से बाहर आ गया है। बेशक, इसमें बदली हुई निगाहें भी हैं, दोस्तों द्वारा उसका फोन न उठाने की दास्तानें भी हैं, पास-पड़ोस से उसका नया बनता संबंध भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह निजी दुख या पीड़ा की कहानी नहीं है। यह इस नए बनते चमकदार भारत में लगातार असुरक्षित होते जाते लोगों और उनकी ज़िंदगियों में फैलते अंधेरे की भी कहानी है- जो बहुत बारीक़ी से लिखी गई है और जिसके बहुत सारे स्तर हमें बांधे रखते हैं। 

इसी तरह एक और कहानी है- ‘पिता’। यहां पिता और पुत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं और कटे हुए भी- उनमें एक आत्मीय पारस्परिकता है, लेकिन वैसी भावुक निर्भरता नहीं जो पुराने पिताओं-पुत्रों में उनकी संवादहीनता के बावजूद देखी जाती है- एक-दूसरे पर दबाव बनाने या एक दूसरे के दबाव से मुक्त होने की कोशिश तो कतई नहीं। कोई हठी आलोचक पढ़ना चाहे तो इसमें टूटती-बिखरती

पारिवारिकता के सूत्र भी पढ़ सकता है। बेशक, वे सूत्र यहां हैं, लेकिन इन चरित्रों या इस कहानी की वजह से नहीं, बल्कि उस सहज माहौल की वजह से जो वक़्त बदलने के साथ बदल गया है। हां, इस बदले हुए माहौल में, एक निष्ठुर अकेलापन है जो सिर्फ इस वजह से नहीं है कि मां-पिता कहीं दूर हैं और बेटा अकेले है, बल्कि इस वजह से भी है कि अपनी स्वतंत्रता की कामना की, जीवन को अपने ढंग से जीने की ज़िद की, एक क़ीमत यह अकेलापन भी है। इसी अकेलेपन ने राहुल को भी बनाया है और मनचाही शादी और परिवार के बावजूद अंततः अकेला छोड़ दिया और यही अकेलापन विकास को भी बना रहा है।

कहानी का अंत काफी महत्वपूर्ण है। धीरेंद्र अस्थाना चाहते तो इसे आसानी से पिता की मर्जी की कहानी

बना सकते थे। बेटे की छूटी हुई नौकरी दुबारा लग गई है, वह कलाकार के रूप में स्थापित है, अब एक

घर है जहां से वह जुड़ा रहे तो पिता और परिवार से बंधा रहेगा। लेकिन अपने बेटे की उपलब्धि पर खुश

पिता फिर भी उसे यह आश्रय नहीं देता। राहुल दिल्ली की फ्लाइट वापस पकड़ने के लिए निकलने से पहले विकास से पूछता है, वह रहेगा कहां। विकास के जवाब में एक बेफिक्री है और राहुल उसे अपने हिस्से का आसमान या अपने हिस्से की छत बनाने के लिए (बिना यह कहे) छोड़ जाता है। यह एक जटिल अंत है- एक हूक भी पैदा करता है जो देर तक बनी रहती है। लेकिन शायद यही तार्किक है।

विकास को बांधे रखना होता तो राहुल शुरू से बांधे रखता- इस आख़िरी मोड़ पर वह उसे क्यों बांधे।

इस कहानी की कई ख़ासियतें हैं। यह अपने समय से बंधी- उसकी ताल में निबद्ध- कहानी है। यहां

छूटते हुए घर हैं, छूटती हुई नौकरियां हैं, नौजवान बेफ़िक्री है, बहुत हल्के से दीखता, लेकिन बदलता हुआ हिंदुस्तान है- और खालिस इक्कीसवीं सदी का वह द्वंद्व है जो अपने रिश्तों को लेकर हमारे भीतर

मौजूद है।

धीरेंद्र अस्थाना का लेखन संसार बहुत बड़ा और विपुल है। लेकिन उसकी खासियत यह है कि वह अपने बहुत क़रीब लगता है। शायद इसलिए कि वह बहुत दूर तक निजी प्रसंगों और अनुभवों से बनता है। यही वजह है कि उसमें बहुत गहरी तपिश दिखाई पड़ती है, उससे बहुत ऊष्मा मिलती है। उनके उपन्यास ‘गुज़र क्यों नहीं जाता’ में भी ये आत्मकथात्मक प्रसंग मिलते हैं। यह एक निजी कहानी जैसा है, लेकिन इसमें निहित सार्वजनिकता अदृश्य नहीं रहती और न ही इसके दंश अलक्षित रह जाते हैं।

लेकिन इतना राग-विराग-खटराग-अनुराग धीरेंद्र अस्थाना लाते कहां से हैं? उनका निजी वितान इतना बड़ा कैसे होता जाता है कि उसमें सार्वजनिकता भी समाई मिलती है? इसका जवाब उनकी आत्मकथा ‘ज़िंदगी का क्या किया’ देती है। इस किताब से गुज़रते हुए अनायास यह खयाल आता है कि धीरेंद्र जीवन की ऊष्मा को, उसके ताप को, जिस तीव्रता के साथ महसूस करते हैं, उसे अपने लेखन में लगभग ज्यों का त्यों उतार लेते हैं। धीरेंद्र बहुत बेबाकी और धीरज से अपने बचपन का, उस बचपन के संघर्ष का, अपने रिश्तों का, अपनी मां-अपने पिता. अपने चाचा का उल्लेख करते हैं। इस उल्लेख में संवेदनशीलता भी है, ज़रूरी दूरी भी, तटस्थता भी और कभी-कभी बिल्कुल निष्कवच यथार्थ को दिखा देने वाला साहस और स्वीकार भी। धीरेंद्र के कोख में रहते आत्महत्या की कोशिश में अपाहिज हो गई मां, फक्कड़पने के अलग-अलग ध्रुवांतों को जीते और परिवार के लिए किसी मुसीबत की तरह मिलते पिता, परिवार के आर्थिक अभावों को अनदेखा कर अपनी संपन्न जीवनशैली में खोए रिश्तेदार, और छोटे-बड़े अभावों का जैसे अंतहीन सिलसिला- मेरठ, आगरा, मुज़फ़्फरनगर और देहरादून के बीच पले-बढ़े इस जीवन की झलक हमें य़ह भी बताती है कि लेखक कैसे बनते हैं या धीरेंद्र अस्थाना नाम का लेखक कैसे बना। 

जिसे ज़िंदगी इस दुर्धर्ष अनुभव की तरह मिली हो, वह या तो बिल्कुल संवेदनहीन होकर उसे मशीन या पशु की तरह काट देता है, या फिर अतिरिक्त संवेदनशील होकर आत्महत्य़ा के रास्ते की ओर बढ़ चलती है और अगर यह भी नहीं तो लेखक बन जाता है। दरअसल यह लिखना है जिसने धीरेंद्र अस्थाना का जीना संभव किया। यही वजह है कि जीवन भी उनके लिए कहानी जैसा है। इस कहानी में अपनी राहतें भी हैं और इससे निकलती राहें भी। यह उनकी सीमा भी है और उनकी शक्ति भी। और इन सबसे निकलता अंतिम सच यह है कि धीरेंद्र अस्थाना हिंदी के एक मूल्यवान लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने पाठकों को समृद्ध किया है और हिंदी कथा की परंपरा में अपने स्तर पर कुछ जोड़ा भी है।

प्रियदर्शन 




आलेख साभार।

सोमवार, 21 नवंबर 2022

रांगेय राघव की कब तक पुकारूँ

कब तक पुकारूँ प्रसिद्ध साहित्यकार, कहानीकार और उपन्यासकार रांगेय राघव द्वारा लिखा गया उपन्यास है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़ा 'बैर' एक ग्रामीण क्षेत्र है। वहाँ नटों की भी बस्ती है। तत्कालीन जरायम पेशा करनटों की संस्कृति पर आधारित एक सफल आँचलिक उपन्यास है। सुखराम करनट अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न नायक है। नट खेल-तमाशे दिखाते हैं और नटनियाँ तमाशों के साथ-साथ दर्शकों को यौन-संतुष्टि देकर आजीविका में इजाफा करती हैं। करनटों की युवा लड़कियाँ प्रायः ठाकुरों के पास जाया करती थीं। नैतिकता क्या है, इसका ज्ञान उन्हें नहीं था। थोड़े से पैसों की खातिर वे कहीं भी चलने को तैयार हो जाती थीं।

पात्र परिचय

सुखराम इस उपन्यास का बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति है। सामाजिक विसंगतियों के बीच वह जूझता रहता है। निर्बलों के ऊपर होने वाले अत्याचार वह सह नहीं पाता है। कुछ पात्र तो महज कुप्रवृत्तियों में फँसे रहने के लिए ही रचे गए हैं। नारी पात्रों में प्यारी और कजरी प्रमुख हैं। प्यारी स्वच्छंद जीवन जीने वाली युवती है। कई व्यक्तियों के साथ उसके शारीरिक सम्बन्ध हैं जिन्हें वह अन्यथा नहीं मानती। यह तो शरीर की एक भूख है। खाते रहो, फिर लग जाती है। इसी प्रकार कजरी का चरित्र भी ऐसे ही जन-जीवन में ढला हुआ है। वह प्यारी की सौत बनकर सुखराम के साथ रहने लगती है और तरह-तरह के षड्यंत्र रचते हुए सौतिया डाह दिखाती है। अन्य स्त्री पात्र भी ऐसे ही हैं। भाषा-शैली करनटों के बीच व्यवहार की है। सभ्य समाज में जिस शब्दावली का उपयोग नहीं होता, वह भी इस उपन्यास में है। कुल मिलाकर यह बहुत सफल उपन्यास माना गया है।

समाजवादी-यथार्थवादी चित्रण

रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूँ’ उपन्यास में करनट कबिलों के जीवन यथार्थ का अनेक पक्षों में अंकन हुआ है। इसमें उन्होंने समाज में सर्वथा उपेक्षित उस वर्ग का चित्रण अत्यन्त सरल और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है, जिसे सभ्य समाज ‘नट’ या ‘करनट’ कहकर पुकारता है। इन कबिलों की कोई नैतिकता नहीं होती। इनमें मर्द, औरत को वेश्या बनाकर उसके द्वारा धन कमाते हैं। करनटों में यह छूट है। वहाँ कोई बुराई ‘सेक्स’ के आधार पर नहीं मानी जाती। उपन्यासकार इस भाव को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं, "औरत का काम औरत का काम है। उसमें बुरा–भला क्या? कौन नहीं करती? नहीं तो मार–मार कर खाल उड़ा देगा दरोगा और तेरे बाप और खसम दोनों को जेल भेज देगा। फिर कमरा न रहेगा तो क्या करेगी? फिर भी तो पेट भरने को यही करना होगा?" उपन्यास में अभिव्यक्त करनट समाज खानाबदोश, घोर उत्पीड़ित एवं शोषित है। यह उपन्यास संपूर्ण भारतीय ग्रामीण परिवेश को अपने साथ लेकर चलता हुआ प्रतीत होता है। जिसमें करनटों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया गया है।[

कथानक

'कब तक पुकारुं’ में जरायम पेशा समझी जाने वाली नटों की करनट जाति का चित्रण हुआ है। इसमें ऐसे ही एक करनट सुखराम अपनी जीवनगाथा इस उपन्‍यास में कहता है। करनट सुखराम अपने को ठाकुर समझता है। उसका विवाह करनट जाति की प्‍यारी से होता है, जो पहले एक दरोगा द्वारा भ्रष्‍ट की जाती है और फिर एक सिपाही की रखैल बन यौन कुण्ठाओं का शिकार बन जाती है। कजरी भी अपने पति को छोडकर सुखराम के साथ रहती है। कजरी इस संसार को छोड देती है। उस बच्‍ची का वह कोमल कान्‍त रुदन वह रुदन जिसमें इतिहास की विभीषिकाएं खो गई है, वह बच्‍ची जिसके पवित्र नयनों में नया जागरण ऐसे दैदीप्‍यमान हो रहा है, जैसे आदि महान् में जीवन कुलबुलाया था। चन्‍दा अंग्रेज युवती सूसन की कन्‍या होती है, जिसे सुखराम पालता है। वह लड़की चन्‍दा ठाकुर नरेश से प्रेम करती है और वह भी ठकुराइन बनने का स्‍वप्‍न देखती है। अन्‍त में मानसिक आवेग की अवस्‍था में ही चन्‍दा की मृत्‍यु हो जाती है।

वस्‍तु विधान

‘कब तक पुकारुं ’ में सुखराम की कथा मुख्‍यकथा है और प्रासंगिक कथाओं में कजरी और प्‍यारी की कथा है। सुखराम, कजरी और प्‍यारी के चारों ओर उपन्‍यास की कथा घूमती है। अन्‍य कथाओं में चंदा सूसन और लारेंस आदि की कथाएं है। उपन्‍यास को लेखक ने मनोवैज्ञानिक धरातल पर स्‍थापित करते हुए इतिवृत्‍तात्‍मक बना दिया है और वह जासूसी और अय्यारी उपन्‍यासों की तरह किस्‍सागोई से कम नहीं है। लेखक ने कई पीढ़ियों को एक साथ गूंथने का प्रयास किया है, इसलिए इसका वस्‍तु विधान बोझिल हो गया है। जिस प्रकार ‘भूले बिखरे चित्र’ मे ज्‍वालाप्रसाद की चार पीढ़ियों के कथानक को जोड़ने का प्रयत्‍न किया गया है, वही कार्य सुखराम यहाँ करता है किन्‍तु यहाँ बिखराव आ गया है। चन्‍दा की विस्‍तृत कथा को उपन्‍यासकार उपन्‍यास का अंग नहीं बना सका है। अनेकानेक स्‍थलों पर अनावश्‍यक विस्‍तार है। यह अनावश्‍यक विस्‍तार आंचलिक चित्रण की प्रवृत्ति अचल के रीति-रिवाजों, लोकाचारों, वातावरण-चित्रण प्रकृति-चित्रण और नैतिक-सामाजिक मान्‍यताओं की स्‍थापना के फलस्‍वरुप हुआ है। लेखक अधिक कष्‍टों के जीवन चित्रण करना चाहता है, इसलिए अनावश्‍यक प्रसंगों को उपन्‍यास में स्‍थान मिल गया है। अत: समाजशास्‍त्रीय दृष्टिकोण के फलस्‍वरुप उपन्‍यास की वस्‍तु अंविति मे बाधा पहुँची है।

चरित्र वर्णन

सुखराम, कजरी और प्‍यारी इस उपन्‍यास के मूल्‍य पात्र है इसलिए इनके चारों ओर इसकी कथा घूमती है और अन्‍य पात्रों में चन्‍दा, सूसन और लारेंस आदि है किन्‍तु चन्‍दा को छोडकर अन्‍य पात्र गौण है। सुखराम ही उपन्‍यास का केन्‍द्रबिंदु है, इसलिए उसे उपन्‍यास का नायक मानना चाहिये। सुखराम में आभिजात्‍य वर्ग की महत्‍वाकांक्षाएँ है। ‘अधूरा क़िला’ उसकी महत्‍वाकांक्षाओं का प्रतीक है। शोषण के प्रति उसके हदय में विद्रोह है। पुलिस और समाज के शोषण वर्गो के प्रति उसके हदय में विद्रोह की भावना है। उसकी पत्‍नी प्‍यारी रुग्‍तमखा की रखैल बन जाती है, किन्‍तु वह पत्‍नी का ग़ुलाम बनना नहीं चाहता। लेखक की मानवतावादी भावनाओं को सुखराम ही अभिव्‍यक्‍त करता है। वह अभावों, कमियों, बुर्बलताओं और शक्तियों का पुंज है। प्‍यारी अपने वर्ग की नारियों की दुर्बलताओं और अभावों को अभिव्‍यक्‍त करती है। प्‍यारी का चित्रण लेखक ने करनटों के नारी जीवन की दुर्दशाओं और भोग्‍या नारी के चित्रण करने के लिए किया है। प्‍यारी, अपनी परिस्थितियों से पीडित होकर, करनटी के नारी समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन की अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम बन कर रह जाती है, किन्‍तु कजरी परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपने को अभिव्‍यक्‍त करती है। कजरी भी भोग्‍या है किन्‍तु उसमें प्रतिष्‍ठा के साथ-साथ नारी सुलभ ईर्ष्‍या भी है और नारी का ममत्‍व भी। नारी की संवेदनशीलता और करुणा भी उसमें कम नहीं है। प्‍यारी के समान परिस्थितियों से पीड़ित बनकर उपन्‍यास में अभिव्‍यक्‍त होती है। पात्रों के सृजन में लेखक पूर्ण रुप से निर्वैक्तिक नहीं रहा है, क्‍योंकि वह समाजशास्‍त्रीय दृष्टिकोण के पूर्वाग्रह से मुक्‍त नहीं हो सका है। इतना होने पर भी सुखराम, प्‍यारी और कजरी हास्‍य और अश्रु, आशाओं और निराशाओं में झुलते हुए अपना जीवन जीते हैं। सुखराम और कजरी बदलती परिस्थितियों के साथ उठते गिरते आगे बढ़ते हैं किन्तु प्‍यारी में विकास की सम्‍भावनायें नहीं है। नि:स्‍सदेह सुखराम, कजरी और प्‍यारी उपन्यास के प्राणवान पात्र है।

उद्देश्‍य

करनटों के नैतिक जीवन को प्रस्‍तुत करना ही उपन्यासकार का उद्देश्‍य है। लेखक का कथन है, ‘मैंने इनकी नैतिकता को समाज का आदर्श बनाकर प्रस्‍तुत नहीं किया है।’ बल्कि पाठकों को इसमें मैक्‍स की ऐसी जानकारी के रुप में हासिल करना चाहिये कि यह इनमें होता है। यह सारा समाज खानाबदोश है, उत्‍पीडित है, शोषित है। न इनके सामाजिक नियम शाश्वत है। न हमारी नैतिकता के बन्‍धन ही शाश्‍वत है। सुखराम के शब्‍दों में लेखक उपन्‍यास के आशय को स्‍पष्‍ट कर रहा है, ‘यह कमीने, नीच ही आज इन्‍सान है। इनके अतिरिक्‍त सबमें पाप घुस गया है क्‍योंकि इन सबके स्‍थार्थ और अहंकारों ने इनकी आत्मा को दास बना दिया है। ये कमीने और ग़रीब अशिक्षा और अंधकार में छटपटा रहे हैं। जब तक ये शिक्षित नहीं होते, तब तक इन पर अत्‍याचार होता ही रहेगा। जब तक ये शिक्षित नहीं होते, तब तक इनके अज्ञान, फूट और घृणा पर संसार में जघन्‍यता का केन्‍द्र बना रहेगा। तब तक इनके पुत्र धरती की मिट्टी में पैदा होते रहेंगे। शोषण की घुटन सदा नहीं रहेगी। वह मिट जायेगी, सदा के लिए मिट जायेगी।' इस उपन्‍यास में लेखक ने जीवन के प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रस्‍तुत किया है।

यह समाजवादी चेतना का उपन्‍यास है। इस उपन्‍यास में लेखक ने समाजवादी-यथार्थवाद का सफल चित्रांकन किया है। शोषण, सामाजिक अन्‍याय, बुर्जुआ मनोवृत्ति एवं असमानता के विरुद्ध आवाज़ उठाई है। प्रगतिशील चेतना के फलस्‍वरुप इसको समाजवादी चेतना का उपन्‍यास कह सकते है क्‍योंकि करनटी के जीवन का चित्रण कर, शोषित वर्ग पर होने वाले शोषण का चित्र खींचकर जनवादी परम्‍परा में अपना स्‍थान बना दिया है। वर्ग संघर्ष की कहानी होने के कारण समाजवादी उपन्‍यासों की श्रेणी में इस उपन्‍यास को स्‍थान मिलना चाहिये।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

बाढ़ रूपी जल समस्या से पीड़ित पटना

क्या यह मान लिया जाय कि #नीतीश_कुमार का अंत आ गया है? प्रकृति ही उनके अहम को तोड़ेगी उनकी नाकामियों की बदौलत? यह आश्चर्य नहीं कि शुक्रवार की रात शुरू हुई समस्या अभी भी बदस्तूर जारी है। दो दिन से बारिश भी बंद है लेकिन सोमवार की रात बीतने को है और पानी जस की तस है। जलकैदी बने लोग कालापानी को याद कर रहे हैं। वे परिकल्पना कर रहे हैं कि कालापानी की सजा भी कुछ ऐसी ही होती होगी। कोई मदद नहीं। खुद के बूते जिओ जब तक कर सकते हो संघर्ष। बिजली, पानी और भोजन के अभाव में आप जिंदगी की परिकल्पना मात्र कर सकते हैं। सरकारी व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार है वह सरेआम इस मुसीबत में भी है। जो रक्षक हैं वे भी चंद रूपयों की खातिर अपनी मानवता बेच चुके हैं। शायद गलती उनकी नहीं, उनकी मानसिकता की है जो धीरे धीरे कई वर्ष में उन्हें पत्थरदिल स्वार्थी बना गया है। जिंदगी मशीन की तरह हो गई है तो फिर मानवता और इंसानियत की बात भी तो बेईमानी ही लगती है। जैसे डॉक्टर आपकी मजबूरियों को समझने की बजाय आपके शरीर से धीरे धीरे खून निकालते रहता है, वैसा ही तो आज पूरा समाज हो गया है।



ज्यों ज्यों दिन बीतते जा रहा है लोगों के मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सहायता तो दूर सहानुभूति के भी शब्द कहीं से सुनाई नहीं पड़ रहा है। न मुख्यमंत्री न कोई और मंत्री कुछ भी स्पष्ट रूप में बोलने की स्थिति में है। सबको काठ मार गया है। शुक्र है कि अभी चंद सीटों के लिए ही उपचुनाव होना है फिलवक्त। लेकिन इसी समय अगली वर्ष नेता जनता के सामने वोटों की भीख माँग रहे होंगें।
हालांकि सच्चाई तो आनेवाला समय बताएगा कि लोग जाति-धर्म से उठकर कुछ विचार कर पाते हैं या अपनी दकियानूसी विचारों में खोकर ही अपने दर्द को दबा लेंगें? विकल्प है कि नहीं? यह विचार का विषय नहीं है क्योंकि इसी कमजोरी का फायदा सामनेवाला उठाता है। आज जिसे आप विकल्प मानते हैं, वर्षों पहले भी तो वह नहीं था। बदलाव या परिवर्तन ही समाज और देश को जागरूक करता है। लेकिन देखना यह भी होगा कि जनता अपने लिए क्या तय करती है और किससे वह संतुष्ट है? हमारे और आपके विचारों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है।
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सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है