एक बदलाव (पुरानी डायरी के पन्ने)
सुशील कुमार भारद्वाज
मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।
सुशील कुमार भारद्वाज
मैं 1990 में पहली बार पटना आया था और तब से अब तक में काफी परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। उस समय मेरे गांव से हार्डिंग पार्क पटना बस पङाव का किराया महज बीस रूपया था जबकि आज वह 125 रूपया हो गया है। पटना में सुबह 5:45 बजे की बस में बैठता था तो 9:30 बजे तक हर हाल में अपने गांव के लिए निर्धारित पङाव पर उतर जाता था लेकिन अब उसी बस से 2:00-2:30 बजे दोपहर से पहले पहुंचना नामुमकिन है। उसी दिन वापसी की बात तो शायद दु:स्वप्न बन चुका है। खैर, विकास के दौर में कुछ चीजों का आगे-पीछे हो जाना बङी बात नहीं है। लेकिन सबसे ज्यादे दु:ख और आश्चर्य होता है बाईपास या एन एच 30 को देख कर। जीरोमाइल से अनिसाबाद तक में कुछ जगहों को छोङ दिया जाय तो सङक के दोनों ओर पानी ही पानी नजर आता था खासकर सङक के दक्षिणी हिस्से में।हालात ऐसे थे कि जिन थोङे लोगों ने उधर घर बनाया था उन्हें बङे-बडे ट्यूबों का ही सहारा था जिससे वे सडक तक पहुंच पाते थे। सडक के दोनों किनारे पर इतने घने जंगल लगे थे कि दिन में भी डर लगने लगता था। डर सिर्फ़ तेज चलती गाङियों का ही नहीं था बल्कि लूटपाट का भी था। मरे जानवरों के दूर्गंध बीच किसी अपराध का शिकार हो इंसान का पङा होना भी बङी बात नहीं थी। लेकिन आज आप वहां एक पेङ के लिए भी तरस जाएंगे। जबकि एक समय था जब गर्दनीबाग का इलाका पेङों से इस कदर पटा पङा हुआ था कि कुछ हिस्सा आमबगीचा और अमरूदी बगीचा के रूप में जाना जाता था। वैसे तो गर्दनीबाग में सरकारी आवास होने की वजह से भी पेङों को फलने फूलने का मौका मिलता रहा लेकिन इन आवासों में जिस तरीके का अवैध कब्जा है या खुलेआम कहीं गाय बंधी तो कहीं भूसे के ढेर से इन आवासों की दयनीय स्थिति बनी हुई है वहां पेङ - पौधों की क्या बात की जाए? हाल में एक मॉल बनने की बात चली, फिर चुप्पी लद गई। एक बार फिर जजेज कोठी बनने की बात आई है, लेकिन वो भी भविष्य की ही बात लगती है। हां, इस इलाके के प्रसिद्ध दुमहला को नस्तेनाबूत कर दिया गया है जो गर्दनीबाग अस्पताल के पास से शुरू होता था लेकिन यहां अब कचरा डम्पिंग यार्ड बन गया है। विकास के इस दौर में काफी कुछ बदला।यह इलाका पूर्णतः कंक्रीट का जंगल बन चुका है। जबकि इंडियन अॉयल का डिप्पो तैयार होने से पहले बाईपास के दक्षिणी तरफ जिस जमीन को कोई दस हजार रूपये कठ्ठा लेने को तैयार नहीं था आज वहां की जमीन 45 लाख रूपये कट्ठा मिलना मुश्किल है। इन वर्षों में सबसे ज्यादे बाईपास किनारे गाङियों के शो रूम और अस्पताल खुले हैं, शेष चीजों की तो बात ही कुछ और है। विकास और घनी आबादी के बीच बेऊर का इलाका काफी विकसित हुआ है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि 1997 के आस-पास आदर्श कारा बेऊर और मैला -सफाई संयंत्र के आस-पास दूर दूर में एक दो घर नजर आता था बाजार और दुकान की तो बात ही बेमानी है लेकिन आज इस इलाके के विकसित रूप को देखकर विश्वास भी नहीं कर पाएंगे कि किस तरह इन इलाकों में नहर के पानी से चारों ओर बाढ का नजारा दिखता था। हां, अब तो इस इलाके में दैनिक भास्कर जैसे अखबार का दफ्तर भी खुल गया है।

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