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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का आयोजन




 पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में   बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

उदघाटन सत्र में   माननीय शिक्षा मंत्री  विजय कुमार चौधरी , सुप्रसिद्ध साहित्यालोचक व लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पटना विश्वविद्यालय  के कुलपति गिरीशचन्द्र चौधरी ,  प्रख्यात कवि आलोकधन्वा,  विधानपार्षद व आलोचक रामवचन राय, पद्मश्री उषाकिरण  खान उपस्थित थे।  विषय प्रवर्तन   राष्टीय संगोष्ठी के परिकल्पक एवं पटना विश्विद्यालय हिंदी विभागध्यक्ष तरुण कुमार ने किया। पहले सत्र का विषय था ' रेणु होने का अर्थ'।

स्वागत भाषण करते हुए पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा ने कहा कि "पटना कॉलेज के छात्रों को अपने अतीत के साथ जुड़ाव रखना चाहिये क्योंकि बिहार में जो श्रेष्ठ उसके निर्माण में पटना कॉलेज की अहम भूमिका रही है।” 

 शिक्षा मंत्री श्री विजय कुमार चौधरी आने वक्तव्य की शुरुआत पटना कॉलेज के अपने छात्र जीवन की स्मृति से की और रेणु होने अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा "  रेणु होने का अर्थ अपनी जमीन से जुड़ाव होना है। वे अपने सामाजिक राजनीतिक अनुभवों को व्यवहार में सीखने के हिमायती थे। रेणु जी का ही कथन है कि जूता पहनकर देखना चाहिए कि जूता काटता कहाँ है। रेणु ने अपने इस कथन की आजमाइश की थी। वे लेखन से लेकर राजनीति तक में स्वयं अनुभव हासिल किया था। हम चले जायेंगे लेकिन रेणु का साहित्य बचा रहेगा। रेणु के साहित्य को बचाना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है। हमारी पीढ़ी को रेणु का साहित्य बचायेगा।” 

विशिष्ट अतिथि के रूप में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष व निवर्तमान विधान पार्षद रामवचन राय ने रेणु होने के अर्थ को समझाते हुए कहा कि "रेणु ऐसे लेखक थे जो बोलते कम, लिखते ज्यादा थे। उनका मानना था कि लेखक के सामने अभिव्यक्ति का संकट कभी नहीं होता, लेखक अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाश लेता है। रेणु के पास कहानी की बड़ी दुनिया थी, इसलिए उन्होंने कहानी कहने के लिए सबसे पहले उपन्यास लिखना चुना। वे लोकतंत्र की तीन-तीन लड़ाइयां लड़ चुके थे।” रेणु होने का अर्थ है जोखिम लेना होता है। 

उषा किरण खान ने कहा कि " हमारी पीढ़ी की कथाभूमि रेणु की कहानी की ही कथाभूमि है। रेणु के लेखन ने परमपरागत बिम्बों और नायिकाओं की अवधारणाएं बदल कर रख दिया।” 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने कहा कि " रेणु जैसा बड़ा लेखक किसी समाज को विरले ही मिलता है। रेणु को हम ऐसे समय में याद कर रहे हैं जिस समय में संवेदनशील आदमी आंसुओं से भरा हुआ है और रो भी नहीं सकता। रेणु संसदीय लोकतंत्र के अग्रणी प्रहरी थे। उनका लेखन संसदीय लोकतंत्र की रक्षा और उनका जीवन लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में रहा है। रेणु का रूप परिवर्तनकारी रहा है।” 

प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा “ रेणु उन लेखकों में से हैं जो जिनकी कहानियां अपने घर लौटने का संदेश देती हैं।  वे जीवन भर लेखक रहते हुए एक्टिविस्ट भी रहे। वे चुनाव में भी हिस्सा लेने वाले लेखक थे और जुलूस में भी। आज रेणु होने का अर्थ है कि समाज और लेखन परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। रेणु महत्वपूर्ण और प्रभावी लेखक इसलिए हैं कि वे बिना किसी हो-हंगामा के संस्कृति का रेखांकन करते चलते हैं।

पटना विश्विद्यालय के कुलपति  गिरीशचन्द्र चौधरी ने कहा “ रेणु के जन्मशती पर एक बड़े आयोजन की जरूरत थी, हिंदी विभाग इसे पूरा किया। रेणु इतने बड़े लेखक थे कि उनकी कहानियों को आज की पीढ़ी भी बहुत चाव से पढ़ती है। 

 इस सत्र का संचालन  प्रोफ़ेसर दिलीप राम   ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन में पटना कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ0 कुमारी विभा ने किया।


उदघाटन सत्र के पश्चात दूसरे स्त्र का विषय था 'लोक-रंग और रेणु का कथाशिल्प '। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो0 जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की। 

 इस सत्र में रांची से आये उपन्यासकार रणेन्द्र ने कहा “ रेणु ने अपने कथा साहित्य में अपने समाज के विविध रूपों को चित्रित किया है। उन्होंने अपनी कथा में भारतीयता की खोज की है। निम्नवर्गीय समाज के जीवन संघर्षों को रचनात्मक रूप में लाया है। उनके समय के अपने ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जो उनसे छूट गये हैं जिसे समेटने की जवाबदेही हमारी है।” 

बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में हिंदी  के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा “ रेणु के कथाशिल्प पर हिंदी के कथाकर प्रेमचंद के प्रभाव के साथ बाँग्ला के रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय का प्रभाव भी देखा जाना चाहिये। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों की तरह सामाजिक और यथार्थवादी हैं। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों से आगे सांस्कृतिक है। रेणु की आंचलिकता का विमर्श बहुत भ्रामक है। इसी तरह उन्हें लोकरंग का कथाकर मान लेना भी भ्रामक है। रेणु के कथाशिल्प में गाँव अन्तरग्रथित है। "

जम्मू से आयी कथाकार  प्रत्यक्षा ने कहा “ रेणु राजनीतिक विषयों पर भी बहुत रोमैंटिक होकर लिखते हैं। जुलूस उनकी बहुत प्रिय किताब है।  इसमें अपने घर तलाशने की कहानी लिखते है।"

 इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया।  इस सत्र का संचालन पटना कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक मार्तण्ड प्रगल्भ ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो इन्द्रनारायण ने किया। 


तीसरे  सत्र विषय था '1950 का राष्ट्रीय परिदृश्य और रेणु के उपन्यास'


तीसरे सत्र के आरंभ में दिल्ली के आशुतोष कुमार ने कहा कि “ रेणु अंचल में बनने वाली कहानी को राष्ट्र की कहानी बनाना चाहते थे। वे अंचल की कहानी को राष्ट्रीय कहानी का विरोधी नहीं बताते बल्कि अंचल में प्रवेश करने वाली राष्ट्रीय कहानी को अंचल की कहानी बनाते हैं। रेणु यथार्थ के जिस रूप को अपनी कहानियों में कहना चाहते थे उस रूप को प्रेमचंद की शैली में नहीं कह सकते थे। 


चर्चित कथाकार गीताश्री ने कहा “ रेणु जिस दौर में लेखन कर रहे थे उसी दौर में महिलाओं को पहचान मिल रही थी। रेणु की रचनाओं में अपनी पहचान के लिए महिलाओं के उस तरह संघर्ष नहीं मिलता जिस तरह आज के स्त्रीवाद लेखन में मिलता है। लेकिन महिलाओं की पहचान को उन्होंने नज़रअंदाज़ नहीं किया है। रेणु की रचनाओं में अधिकांश महिला पात्र यौन शोषण का शिकार हैं पर रेणु इन महिला पात्रों के इन स्थितियों में अनुकूलन के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। "

मुज़्ज़फ़रपुर से आईं चर्चित कथाकार पूनम सिंह ने कहा " 50 का दशक पूर्णिया काला पानी की तरह था। रेणु यथार्थ वादी लेखक थे। मैला आँचल को किसान आंदोलन के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। किसान आंदोलन ने मैला आँचल के वैश्विक रूप के परचम को लहराता है। संथालों को जमीन से बेदखल कर दिए जाने के सवाल को भी रेणु उठाते हैं। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन भी होता है। सरकारें भूमिसुधार की बातें तो करती हैं लेकिन उसे लागू नहीं करती। दीर्घतपा उपन्यास का सवाल आज भी खड़ा है। शेल्टर होम में महिलाओं का शोषण आजभी जारी है। रेणु जुलूस में विस्थापन के प्रश्न को उठाते हैं। आज अपने देश सीएए और एनआरसी के द्वारा लोगों को विस्थापित किया जा रहा है।" 

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चर्चित कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर  ने इस दो दिवसीय आयोजन के लिए  बधाई देते हुए कहा " मैला आंचल पहली बार समता प्रकाशन पटना से छपा था। रेणु मैला आंचल में पोएटिक हो गए हैं। रेणु के उपन्यास में सिर्फ यथार्थ ही नहीं सपने भी हैं। रेणु भारतमाता के आंसू पोछना चाहते हैं लेकिन असमर्थ हैं। रेणु जी नेपाली क्रांति में सशत्र रूप से भाग लिया तथा 1950 में वहां से लौटे। रेणु जी से यह भूल हो गई कि उन्होंने 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास कह डाला। इस बात की स्वीकारोक्ति  लोठार लुतसे से इंटरव्यू में की थी।" 

 इस सत्र का  संचालन  डॉ पीयूष राज ने जबकि  धन्यवाद ज्ञापन मगध विश्विद्यालय हिंदी विभाग की  प्रो अरुणा ने किया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को  रज़ा फाउंडेशन  नई दिल्ली तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का सहयोग प्राप्त हुआ था। 

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में शहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों में शामिल थे  साहित्य अकादमी से समानित कवि अरुण कमल,    बिहार विरासत विकास समिति के विजय कुमार चौधरी, तद्भव के संपादक  अखिलेश,  सुमन केशरी,  पटना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति रासबिहारी सिंह, कथाकारअवधेश प्रीत,  कथाकार सन्तोष दीक्षित,  कथाकार हृषीकेश सुलभ, कवि कुमार मुकुल, डॉ कंचन,   योगेश प्रताप शेखर,  निवेदिता झा,   सुनीता गुप्ता, वीरेंद्र झा,  सुनील सिंह,  राकेश रंजन,  बी.एन विश्वकर्मा, अनीश अंकुर, रँगकर्मी जयप्रकाश, गजेन्द्रकांत शर्मा,  गौतम गुलाल,   वेंकटेश, विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि,  डॉ राकेश शर्मा,   गोपाल शर्मा,  सुनील झा,  कुणाल, अनीश,  संजय कुंदन, डॉ गुरुचरण, रामरतन, अनुज, सुनील, अशोक क्रांति, इंद्रजीत आदि।

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



गुरुवार, 21 जून 2018

गीताश्री का उपन्यास हसीनाबाद और शहंशाह आलम की टिप्पणी



स्त्री-जीवन के धुएँ और धुँध को हटाकर उम्मीदों वाले रंग का वैविध्य दिखाता कथा-समय
     संदर्भ : गीताश्री का उपन्यास 'हसीनाबाद'
     ● शहंशाह आलम



एक औरत की ज़िंदगी के जो सपने होते हैं, वे सपने अकसर धोखों से, परेशानियों से, बेचैनियों से भरे होते हैं। इनको सीढ़ियाँ भी अकसर चक्करदार ही मिला करती हैं चढ़ने के लिए। इनकी ज़िंदगी में अकसर जो मर्द आते हैं, वे कोई जादूगर नहीं होते, जो इनको सिर से पाँव तक ख़ुशरंग रोशनियों से नहलाएँ। वे अकसर-अकसर डरावने चेहरे और डरावनी आँखों वाले होते हैं। ज़िंदगी की चक्करदार सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते ये बेचारियाँ भी कहाँ रोशनी बिखेरने वाली रह जाती हैं। इनके होंठों पर हँसी भी आती है तो बस आकर रेंगती हुई-सी गुज़र जाती है। इन औरतों की रूहें बस इसी तरह आती और जाती रहती हैं। रूहें, जो गवाह भर होती हैं इनके धोखों से भरे हुए सपनों की। आज की राजनीति भी औरतों के आजू-बाजू कुछ-कुछ डरावने सपने की तरह आवाजाही करती रहती है। मगर 'हसीनाबाद' की गोलमी जो है, वह बिजली वाली लड़की है। यह लड़की डर पैदा करने वाले चेहरों से, उन चेहरों पर टँगी आँखों की ऊपर-नीचे करतीं पुतलियों से घबराती कहाँ है :
          चौदह साल की गोलमी नाच रही थी, जैसे वह हरदम नाचा करती थी, सुधबुध गँवाई के।
          उसके साथ पूरी पृथ्वी नाच रही थी। नाचते-नाचते वह देवलोक और पृथ्वीलोक की दूरियाँ पाट दिया करती थी। सब हतप्रभ होकर देख रहे थे कि ये हुनर इसने सीखा कहाँ से? न नृत्य की तालीम और न सुरों की पहचान! नाचते-नाचते बेसुध-सी जब दोनों हाथ ऊपर उठाती थी तो मानो आकाश थोड़ा और नीचे झुक जाता था और धरती थोड़ी और ऊपर उठ जाती थी ( पृ. 13 )।

     स्त्री-जीवन का क्रम कितना उलट-पुलट है। हैरत तब होती है, जब उसका जीवन उलट-पुलट रहते हुए भी वे अपने समय को कितना सहेजकर, सजाकर, संभालकर रखती हैं। यह सहेजना, सजाना, संभालना एक स्त्री ही तो कर सकती है। गीताश्री ने भी यह काम बख़ूबी किया है। यह उपन्यास लिखने से पहले गीताश्री ने अपनी किरदार गोलमी के जीवन-चक्र ख़ुद के भीतर आत्मसात किया होगा। तब इसे एक पूर्ण उपन्यास के एक पूर्ण पात्र के रूप में स्थापित कर पाई होंगी। तभी एक उपन्यास की बहती हुई नदी जैसी भाषा का ईजाद कर पाई होंगी। 'हसीनाबाद' को पढ़ते हुए इसकी भाषा की रवानी को देखकर आप भी महसूस करेंगे। इसकी भाषा मीठी है और खट्टी भी। जिस तरह गोलमी की पूरी ज़िंदगी मीठी और खट्टी रही है। गोलमी की माँ तक जब गीताश्री पहुँचती हैं गोलमी की ज़िंदगी और दमदार हो जाती है। गोलमी के पाँव में जिस तरह बिजली दौड़ती है और वह नाचते हुए कितनों को हतप्रभ कर जाती है, ख़ुद इसका और इसकी माँ की ज़िंदगी का सारा कुछ किसी नाच की तरह अथवा किसी झूमर गाने की तरह कहाँ था कि ख़ुश होकर दोनों माँ-बेटी ख़ुशी वाली तालियाँ बजा सकें। गोलमी की माँ सुन्दरी का जीवन ठाकुर-परंपरा से उबाऊ हो चला था :
          उस दिन सुन्दरी धम्म से आकाश से गिरी थी ज़मीन पर। लहूलुहान हो गई थी जैसे आत्मा और देह, दोनों। मालती ने आकर बताया कि बस्ती को सड़क-मार्ग से जोड़ा जा रहा था। और हसीनाबाद में स्कूल और डाकघर खुलेंगे। साथ ही चुनाव में वोटर बनेंगे यहाँ के लोग। जनगणना के लिए जल्दी ही लोग आएँगे। मालती ख़ुश थी, बहुत ख़ुश। ऐसा परिवर्तन वह सोच भी नहीं सकती थी। बस्ती थोड़ी बड़ी हो रही थी। बदल रही थी। उसे बदला जा रहा था।
          सुन्दरी को बस्ती के विकास से समस्या नहीं हुई। वह तो चीत्कार कर उठी, जब उसे मालती ने यह भी बताया कि बच्चों के पिता के नाम के आगे ठाकुरों के नहीं, उनके कारिंदों के होंगे ( पृ. 39 )।

     गीताश्री को पढ़ते हुए अकसर सोचता रहा हूँ कि इनके गद्य की पंक्तियाँ ऐसी हैं कि आप इनके लिखे को पढ़ते चले जाते हैं। बिना किसी रुकावट। बहुत सारे कथाकार की तरह इनके यहाँ जड़ शब्द नहीं आते। इनके शब्दों की ताज़गी आपको दूर और देर तक इनके लिक्खे को पढ़ा जाती है। आप गीताश्री को पढ़ते हुए थक नहीं जाते। इनकी कथावस्तु और इनका कथाशिल्प ज़्यादा दाँव-पेच नहीं जानते। 'हसीनाबाद' उपन्यास के पाठ के समय मैंने यही महसूस किया। आप इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं और पढ़ते हुए कहीं ठहरते हैं तो यही सोचकर कि जो पढ़ा है, उस पढ़े हुए का रंग-रोग़न अपने ज़ेहन में बचाकर रख लिया जाए। मन बेचैन हो तो इस रंग-रोग़न से बेचैनी दूर की जा सके। गीताश्री का रंग-रोग़न उम्मीदों से भरा जो है। यही वजह है कि कइयों के मुक़ाबले इनके उपन्यास का कथातत्व मुझे ज़्यादा प्रभावकारी लगा। गीताश्री के कथातत्व से धपाधप की आवाज़ से साबक़ा न पड़कर एक ऐसी महीन आवाज़ से आपका साबक़ा पड़ता है, जो आपकी रूह तक को कई जीवन-चित्र दिखाती है और यह महीन आवाज़ आपके भीतर पैबस्त हो जाती है ताकि गीताश्री के कथा-समय से आप किसी तरह का अजनबीपन महसूस न कर सकें। इसी तरह आपको 'हसीनाबाद' के हर पात्र की हर अदा भी अपने क़ब्ज़े में कर लेती है। चूँकि 'हसीनाबाद' के सारे पात्र ज़िंदा पात्र हैं। सभी पात्र अपना पक्ष जीतने को तत्पर भी दिखाई देते हैं :
          ठाकुर सजावल सिंह के यहाँ आज रौनक़ थी। उनके बेटे रमेश का जन्मदिन था। रमेश को उन्होंने अपने मन से अपना लिया था, नाम दिया था, पहचान दी थी। बदनाम गली से ले आए थे अपनी कोठी पर ही। रमेश का नाम भी लिखवा दिया था स्कूल में। इस साल सब कुछ ठीक रहता तो इण्टर पास कर लेता। मगर रमेश का मन ही नहीं होता था बहुत कुछ करने का! रमेश को हर समय अपनी माँ का ध्यान आता। उसे हर समय लगता कि आख़िर ऐसा हुआ क्या था कि वह उसे छोड़कर चली गई? क्या उसके बाबा ने माँ को परेशान किया था? मगर बाबा की भी तो अपनी एक और बीवी है, जो दिल्ली में है और बाबा के बच्चे भी दिल्ली में पढ़ते हैं। तो वह उनका बेटा कैसे है? हसीनाबाद की गलियों में रहते-रहते वह हसीनाबाद के इतिहास से परिचित हो गया था ( पृ. 86 )।

     'हसीनाबाद' जैसी बदनाम बस्ती दुनिया भर में पहले भी थी। अब भी है। मेरे पैदायशी शहर मुंगेर में तो इस बदनाम बस्ती को मैंने बहुत क़रीब से देखा है। जाना भी है। इसी बदनाम बस्ती में मेरे जानने वाले एक कॉमरेड एक हसीना को दिल से बैठे। बाद में बाज़ाब्ता शादी कर ली। घर बसाया। बच्चों को ईमानदारी से अपना नाम दिया, किरदार दिया, ठिकाना दिया। गीताश्री के 'हसीनाबाद' के पात्र भी ऐसा करते हैं तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नहीं है। आश्चर्य राजनीति के घातकपन से होता है। यह नया दौर है। इस नए दौर में राजनीति का चेहरा-मोहरा, रंग-ढंग, चाल-चलन सब जनता को परेशान करने को तत्पर रहता है। इस तत्परता का पर्दाफ़ाश भी इस उपन्यास में बख़ूबी किया गया है। पिंजरे के परिंदे जैसी हालत आज आज की राजनीति के कारण है। इसमें कोई शक नहीं। मगर गीताश्री इस बुरे अनुभवों के बारे में सबकुछ जानती हैं। समझती भी हैं। लेखिका की सार्थकता इसी में है।
     एक सच्चाई यह भी है कि इसको पढ़ते हुए जो नया समा बंधना चाहिए, नहीं बँधता। ऐसी बदनाम बस्ती पर और ऐसी तथाकथित राजनीति पर हिंदी में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। इस वजह से भी किसी नए तत्व की चाह इस उपन्यास को पढ़कर रह ही जाती है। मगर इसका अर्थ यह क़तई नहीं कि गीताश्री का यह उपन्यास कम दिलचस्प है। क़िस्सागोई का तरीक़ा गीताश्री के पास है। अपने इस उपन्यास के बहाने इसके कथा-समय को छीलने में गीताश्री पूरी तरह सफल दिखाई देती हैं। यह उपन्यास एक गुमनाम और बदनाम बस्ती से होते हुए राजनीति के गलियारे तक जाता है। यही वजह है कि 'हसीनाबाद' हिंदी की उपन्यास-परंपरा के साँचे में पूरी तरह ढला लगता है। यह साँचा रचनात्मक है। यह उपन्यास आपको अपने आसपास बाँधे रखता है। प्रकाशक की तरफ़ से उपन्यास के बारे में दी हुई यह सफ़ाई सही है कि 'हसीबाबाद' के नाम से ये भ्रम हो सकता है कि यह उपन्यास स्त्रियों की दशा-दुर्दशा पर केंद्रित है लेकिन नहीं, 'हसीनाबाद' ख़ालिस राजनीतिक उपन्यास है जिसमें इसकी लेखिका औसत को केंद्र में लाने के उपक्रम में विशिष्ट को व्यापक से संबद्ध करती चलती है।' प्रकाशक का यह कथन सच है, तब भी यह उपन्यास स्त्रियों के बहाने ही अपने लोकजीवन को प्राप्त करता है। गीताश्री के इस 'हसीनाबाद' से गुज़रते हुए हम अपने दाँत निपोरकर रह नहीं जाते बल्कि राजनीति के विरुद्ध हमारा जो लोकस्वर होना चाहिए, वही अंत तक बचा रहता है। हम इस 'हसीनाबाद' को पढ़कर एक अच्छा गद्य लिखने का तरीका सीख सकते हैं।
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हसीनाबाद ( उपन्यास ) / लेखिका : गीताश्री / प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002 / मूल्य : ₹ 250 / मोबाइल संपर्क : 09818246059
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शनिवार, 27 मई 2017

गीताश्री की कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा”

समकालीन साहित्यकारों में गीताश्री का नाम बहुत ही महत्वपूर्ण है. गीताश्री अपनी कहानियों में न सिर्फ शब्दों को करीने से गुंथती हैं बल्कि ज्वलंत समस्याओं एवं मुद्दों को एक नये नज़रिये से भी प्रस्तुत करने की कोशिश करतीं हैं. इनकी कहानियों के पात्र कई बार नियतिवाद के शिकार होते हैं तो कई बार वे नियति को ही चुनौती दे डालते हैं. इनकी कहानियों में शहर के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का सामाजिक, नैतिक और आर्थिक विद्रूपता सामने आता है तो कई बार इनकी कहानियों में सुदूर ग्रामीण इलाके की पारिवारिक जीवन में घुटन भरी जिंदगी का बदसूरत चेहरा भी नज़र आता है.
गीताश्री की प्रस्तुत कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा” भी बिहार की ग्रामीण परिवेश में  बालविवाह की शिकार हुई उस कामिनी की कहानी है जिसने कई निष्पाप सुनहले सपने बुने लेकिन वे सपने यथार्थ की रुखड़ी जमीन पर न सिर्फ एक एक कर टूटते गए बल्कि वह परिस्थितिवश रिश्तों की गर्मी और सुस्ती के संघर्ष में मानसिक रूप से भी टूटती चली गई. यह कहानी गीताश्री की अन्य कहानियों से थोड़ी अलग इस रूप में है कि कहानी में कामनी (मुख्य पात्र) कहीं भी मोर्चा संभालते नहीं दिखती है बल्कि नियति के आगे नतमस्तक दिखती है. वह समस्या का समाधान सलीके से शायद इसलिए नहीं ढूँढ पाती है क्योंकि वह पारिवारिक और नैतिक पहरे के द्वंद्व में फंसी हुई है. जबकि लल्लन के धमाके और कामिनी के गायब हो जाने के बाद घर की सबसे चुप्पी पुतोह वीरपुरवाली के चेहरे के बदले हुए भाव काफी कुछ बयां करते हैं. कामिनी और वीरपुर वाली के बीच के अनकहे रिश्ते अपने –आप बहुत कुछ कहते हैं. शायद वहां कोई रहस्य भी हो. कहानी में लेखिका ने बिम्बों के माध्यम से भी बहुत कुछ कहने की कोशिश की है. खैर, आप भी पढ़े गीताश्री की चर्चित कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा” – सुशील कुमार भारद्वाज  
गीताश्री

धीरे धीरे धूल दबने लगी थी। गाँव में खुसुर फुसुर कम होने लगी थी, पर आँखों ही आँखों में बात चल रही थी। कुछ बातें टूट रही थीं तो कुछ बन रही थीं। कुछ अधूरी थीं तो कुछ ने अभी ही जन्म लिया था। कामिनी माने कपरपूरावाली माने मुख्तार जी की बड़की पुतोह के कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था, पीछे खेत में भी कुछ निशान थे, पैरों के! तो क्या ये कामिनी के पैरों के थे? या उसी जिन्न के पैरों के निशान थे जो उस पर आता था। सरकार जी तो अलग टेसुए बहा रही थी।
"कहाँ गई उनकी कामिनी दुल्हिनियाँ?" जब उस पर जिन्न चढ़ता था तब कितनी बार उसके तलवे और हाथ सहलाती थी!
"कुछ कहा सरकार जी?" किसी ने पूछा।
"कुछ नहीं"।
"सरकार जी, ई कामिनी कहाँ गई है?, जिन्न उठा ले गया क्या?"
"मैं तो उसे बहुत दुलार से रखती थी, न जाने कहाँ चली गई?"
"जी सरकार जी, हमने सबने देखा था, आप उसे बहुत प्यार से रखती थीं।"
उधर बादलों का एक टुकड़ा सरकार जी की बातों की पोल खोलते हुए बरस पड़ा। जैसे वह उनके झूठ की परतें खोल रहा हो।
"अरे... अभी तक तो ये बादल नहीं था, अब कहाँ से आ गया? मुख्तार जी की रोबीली आवाज गूँजी।"
मुख्तार जी का बहुत रुतबा था। हाजीपुर के पास एक छोटे से गाँव में मुख्तार जी और उनकी बीवी सरकार जी का भरापूरा परिवार था।
तीन बेटे, एक कमाऊ था जो असम में नौकरी करता था, बाकी दो बेटों में से एक सबसे छोटा कस्बे के स्कूल में था और मँझला कॉलेज में। अभी तक उन्होंने अपने पूरे कुनबे को जोड़कर रखा हुआ था। संयुक्त परिवार का ठाठ था।
विदाई की बेला के बाद भी वह दो साल मायके रही थी। गौना सरकार साहब ने तय किया था। जब तक वह अट्ठारह बरस की नहीं हो जाती उसका गौना नहीं कराया जाएगा। उन दो बरसों में कामिनी अपने अंदर न जाने कितने किस्से कहानियाँ बसाती रही। रसोई में गोबर लीपने से लेकर कुएँ से पानी भरने तक वह लगी रहती। दिदिया से ठिठोली होती।
"जाओगी जब दोंगे के बाद तब पता चलेगा कि क्या होता है फेरों और बिदाई के बाद" कामिनी की दिदिया उसे चिढ़ाती और उसे न जाने क्यों बहुत अच्छा लगता था। उसके जी में गुदगुदी होने लगती। और वह उस गुदगुदी को कुएँ से पानी निकालते हुए बाल्टी में उड़ेल देती। बाल्टी से लोटे में पानी भरती और मुँह ऊपर करके गटगट पीने लगती।
अपने पति का चेहरा भी नहीं देखा था उसने! बस जब सिंदूर डाला जा रहा था तो उसने जरूर देखा था हल्के से, पर याद नहीं रहा उस अजीब से माहौल में। दिदिया और चाची लोग अजीब से गाने गा रही थीं। और माई? माई तो व्यस्त थीं।
शादी के बाद दो साल माई ने उसे घर के कामों में निपुण कर दिया था। और वह देह के तमाम रहस्यों को खुद में समेटकर अपने आप ही जवाब देती रही, सवाल उठते रहे कहीं से और वह अपना वकील बनकर पैरवी करती रही।
आखिर शादी के दो साल बाद वह दिन आ ही गया जब उसका दोंगा हुआ। घर में शादी तक तो माई ने राजकुमारी की तरह रखा था, पर जो दो साल में उसे ट्रेंड किया था, उसका फायदा उसे अपनी ससुराल में मिला। जैसे ही कामिनी का दोंगा हुआ वैसे ही यहाँ आते ही सास ने रसोई छुआ दिया। खाना बनाने से लेकर बर्तन धोने तक का काम अकेले सिर माथे पे उसके। वैसे तो घर में कई औरतें थी, पर घर की सारी औरतों ने अपने अपने हाथ पैर समेट लिए। अपने दसो हाथों से कामिनी उर्फ कपरपुरा वाली को रसोई में भिड़ जाना पड़ा।
सास के रूप में सरकार जी बहुत कठोर थी, मजाल जो सिर से पल्ला खिसक जाए। सरकार जी उसूलों की एकदम पक्की। सीधे पल्ले की साड़ी पहने हुए सरकार साहब जब लाल सिंदूर की बिंदी अपने गोरे माथे पर लगातीं तो ऐसा लगता जैसे सूरज उग रहा हो। उस उगते सूरज जैसा ही तेज और गर्व उनमें था।
लकड़ी, संठी, भूसा और उपले से चूल्हा फूँकते फूँकते बहुओं की आँखों से आँसू बहने लगें पर मजाल जो घूँघट खिसके या आवाज सुनाई दे किसी भी पुतोह की। मुख्तार साहब के तीन भाइयों का परिवार एक साथ था। ये तो पुतोहुओं के लिए थोडा सुकून था कि चूल्हे अलग अलग थे।
कामिनी अपने ससुर के परिवार में इकलौती पुतोह थी। हालाँकि एक चुप-सी परछाईं जैसी पुतोह दूसरे परिवार की थी पर वह बात न करती। चूल्हे और बासन में जब उसके काम का कोटा पूरा हो जाता तो वह अपने लिए काम चुन लाती थी। या तो चक्की पे बैठ जाती या पूरे घर के कपड़े लेकर कुएँ की मोरी पर बैठकर पटकुन्नी से कूटने लगती।
कभी मूड में होती तो कामिनी को देखकर मुस्करा देती। पर उससे ज्यादा कुछ नहीं करती।
वह भी तो चुप ही थी। पति दोंगे के अगले दिन ही वापस असम चला गया था।
पीछे वह छूट गई, अजनबियों के बीच।
कामिनी के अंदर बादल था, नया बना हुआ बादल था। पर वह बरस नहीं पाया था। उसके बरसने में कई अड़चनें थीं। एक तो उसका ईंट-मिट्टी का बना हुआ चूल्हा ही था, जो उसकी देह के ताप को और सुखा देता, पर उसकी देह का बादल इंतजार करता। वह अपने आंतरिक उमस और घुटन से हलकान हो रही थी। उस रात नींद नहीं आ रही थी। चारो तरफ धुंधलका महसूस हो रहा था। उमस में दम घुट रहा था उसका। न जाने उमस की कितनी अंतर्कथाएँ थीं। वह उन कहानियों में खो गई थी। वह उठी, सिंदूर लगाया, टिकुली लगाई, इत्र लगाया। लाल रंग की साड़ी पहनी और बिस्तर पर लेट गई। उसे अच्छा महसूस हो रहा था। उसे लगा, वह बादलों पर लेटी है।
उस दिन सुबह सुबह पूरे घर में हंगामा मच गया। शोर मच गया.. नईकी दुल्हिन को भूत ने धर लिया। उसके ऊपर भूत आया है। भूत बरजोर है। अजबे भूत है... अइसा तो हम न देखे सुने... ई खानदान में केकरो पर भूत-प्रेत नहीं आया... ई तो अजूबे बात है... कहाँ से लेके आई ई भूत प्रेत रे...
सबकी आँखें फटी हुई थी जैसे आसमान में कई बार बादल फट कर छितरा जाते हैं।
कल रात का बादल था, उमस थी। पर अभी तो धूप थी। धूप एकदम निखर कर आ गई थी। सूरज का ताप बढ़कर उसके चेहरे पर छा गया था। वह सँभाले नहीं सँभल रही किसी से। देह बेकाबू होती जा रही थी। कामिनी कुछ बड़बड़ा कर शांत हो जाती और फिर बाल बिखेर कर कुछ न कुछ कहने लगती।
पूरा खानदान बड़की पुतोह के दरवाजे पर इकट्ठा हो गया। दरवाजा पीटा गया, लेकिन दरवाजा तो खुला था। खुल गया। अंदर पहले सास घुसी, देखा, बिस्तर पर बहू एकदम अस्त व्यस्त कपड़े में पड़ी हुई है। लाल साड़ी, खुली पड़ी है। सिंदूर फैला हुआ है, इत्र की भीनी भीनी खुशबू आ रही। चादर सिमटी हुई है, न जाने कितनी सिलवटें हैं। कामिनी बेड पर चित्त लेटी हुई तड़प रही है। करवट लेना चाह रही पर नहीं ले पा रही। उसके दोनों ही हाथ फैले हुए हैं। पैर रगड़ रही है। मानो किसी ने दबोच रखा हो। सरकार साहब डर गईं, अपनी पतोहू की हालत देखकर चीख पड़ी। फिर मदद के लिए चीखी -
"अरे आओ, देखो, कपरपूरावाली को क्या हो गया" वे चीख रही थीं। देखते देखते ही आँगन घर की औरतों से भर गया। वो अजीब-सी सुबह थी, उमस के साथ धूप आ रही थी नीचे।
उसमें कामिनी की दबी दबी पुकार और हँसी दोनों ही अपना सुर अलाप रही थीं। जैसे कोई सियार मद्धम मद्धम रो रहा हो।
उस आवाज से हर कोई परेशान हो रहा था पर कानाफूसी के लिए ये आवाज बहुत थी। कामिनी के पोर पोर में कुछ हो रहा था। घर की कानाफूसियों को दबाकर औरतों ने मिलकर उसे बिस्तर से उठाया। एक हिचकी आई और वह उठते ही वह उनकी बाँहों में झूल गई...
कानाफूसी और तेज हो गईं। कामिनी की पूरी देह पर देह पर नोंचने खसोटने के निशान, ये निशान किसकी निशानी हैं। लाल लाल लंबी लकीरें, सिंदूर जैसे दहक रहा था पूरे कमरे में।
मँझले देवर को बुलाया। उसकी बलिष्ठ बाँहों को देखा कामिनी ने, आँखें खुलीं, और फिर बंद हो गईं। वह निढाल-सी गिर पड़ी। उसकी बेकाबू देह को उसने आज सँभाला। देह की ऐंठन शांत हो गई। छटपटाती हुई गिलहरी एकदम काबू में आ गई। देर तक देवर उसे सहलाता रहा। बच्चे की तरह बाँहों में लिए हुए। वहाँ से हटा नहीं। सरकार जी आग्नेय नेत्रों से यह सब देखती रहीं। लल्लन बाबू ने भौजी का इतना निष्पाप चेहरा पहली बार करीब से देखा था। उनका मन उनसे जुदा हो गया। उनका मन कविता-कामिनी में रमता था। कविता तो करते ही थे, अब कामिनी सामने थी, भूतबाधा से ग्रस्त।
दिन में फिर सब कुछ सामान्य रहा। कामिनी उसी तरह हँसती-बोलती रही और काम किया। चूल्हे के पास आकर सरकार जी की उसे देखने की हिम्मत नहीं हुई। उधर कड़ाही में सब्जी पकती रही और सरकार जी मनाती रहीं कि कामिनी ठीक रहे।
देगची में दाल पाक रही थी। सरकार साहब और मुख्तार को चूल्हे में पकी हुई दाल का सौंधा सौंधा स्वाद बहुत पसंद है और कामिनी भी अब पूरी तरह पारंगत हो गई है, यह दाल बनाने में। वह दाल बनाते बनाते हँसती है। ऐसा नहीं है कि वह बाकी समय हँस नहीं सकती। अकेले में वह हँस सकती है, क्योंकि बात करने के लिए तो कोई है नहीं।
दाल को उबलते देखकर उसे अजीब-सी खुशी मिलती है। उसे ऐसा लगता जैसे उसके मन के ही बुलबुले इस दाल में हैं। वह उनसे बात करती। जब तक दाल घुट न जाती, वह उसके दानों को देखती रहती। फिर उसे लगता कि ये दाने भी उसके बादल की उमस को बढ़ा रहे हैं। वह फिर बेकाबू हो जाती। उसके मन में कई बार काई जम जाती थी और वह कई बार फिसलती।
वह फिसलना नहीं चाहती थी। वह काई के नीचे के पानी को साफ करना चाहती थी। वह नदी बनकर बहना चाहती थी।
सरकार साहब कल रात से पुतोह को लेकर बहुत डर गई थी। उनकी सारी ठसक, पुतोह से सेवा कराने की जिद, सब कुछ कामिनी की हालत देखकर धरी की धरी ही जैसे रह गई थी। जहाँ वह अभी कुछ दिन पहले बहू को पैर दबाने के लिए गाँव में ही रखने वाली थीं, अब सोच रही थीं कि वह भेज दे असम में। बेटे के पास। आखिर जाना तो है ही।
"ठीक है, छठ पे इस बार भेज देंगे..." कहते हुए उन्होंने करवट बदली। उनके भारी शरीर से उनका पलंग चरमरा उठा। लाल साड़ी तो सरकार साहब को भी बहुत पसंद थी। पर उनकी बात अलग थी। वे सरकार जी थीं। गोरी, अपने जमाने में कइयों का सपना रही थीं। न जाने कितने लोग आते थे बाउजी के पास हाथ माँगने के लिए। पर बाउजी को तो मुख्तार जी ही जमे। कई दिन बाद वे कुबूल कर पाई थीं। पर कामिनी की बात अलग है। उसे भेज देंगे, उसके मरद के पास। पहले तो न जाने कितने कितने दिन अपने आदमी के पास नहीं जाते थी, फिर चाहे कुएँ के पानी के पास बैठे बैठे रात बिता दो, पर मजाल है कि सास के सामने मुख्तार जी से बात कर लें।
कई बार वे भी सिंदूर लगाकर ऐसे ही उठी थीं, जैसे रात में कोई उनके साथ रहा हो।
पर आँख खुलने पर कोई न था। और इतनी बेकाबू कभी नहीं हुईं कि किसी को बुलाना पड़े।
उधर वे अपनी बातों को सोचती थीं, रसोई से बर्तन-बासन समेटने की आवाजें आ रही थीं। बर्तन टकरा भी रहे थे, पर उन्होंने जल्द ही उस तरफ से अपना ध्यान खींच लिया।
रात को उमस से कामिनी फिर परेशान हो गई। सिंदूर लगा लिया, इत्र लगा लिया और खिड़की के पास बैठकर गाने लगी। वह क्या गा रही थी, किसी को नहीं पता था। पर गा रही थी। वह गा रही थी...
"अन्हरिया रात बैरनिया हो राजा..." बहुत दर्द था इस गाने में। न जाने कब उस दर्द को आगोश में भरे हुए वह सो गई।
सुबह फिर हवेली में शोर था। बड़की पुतोह पर भूत आ गया। फिर सिंदूर में लिपटी हुई वह मिली। फिर बेकाबू-सी वह मिली। खूशबू से नहाई हुई, सिंदूर से लिपटी देह को काबू में करने के लिए इस बार देवर को बहुत कोशिश करनी पड़ी। सरकार जी आज डर गईं थीं बहुत। उनके डर ने उनके चेहरे को अपनी पकड़ में ले लिया। उनका गोरा चेहरा फक्क सफेद पड़ गया।
देवर यानी लल्लन बाबू ने अपनी माँ को बहुत समझाने की कोशिश की कि भौजी को डाक्टर से दिखा लाएँगे, शहर भेज दीजिए। हाजीपुर में भुटकुन चचा का डेरा है, वहीं रह कर इलाज करवा लेंगे भौजी का। भौजी को कोई भूत प्रेत नहीं पकड़ा है, कोई बीमारी होगी। शहर जाएँगी तो इलाज से ठीक हो जाएँगी।
सरकार जी कहाँ सुनने वाली।
"बड़ा आया इलाज करवाने वाला... भूत प्रेत का कहीं डाक्टर से इलाज होता है..." लल्लन बाबू को माँ का यह व्यवहार बहुत क्रूर लगा। वे समझ रहे थे कि भूत प्रेत के नाम पर भौजी की बलि चढ़ जाएगी। ये अंधविश्वासी लोग जान लेकर छोड़ेंगे। बड़का भइया पक्के माँ के भक्त हैं, किसी की बात नहीं सुनेंगे। लल्लन बाबू गिड़गिड़ाते रहे माँ के आगे लेकिन सरकार जी ने ओझा की शरण ली।
अपने पिटारे में जिन्नों की कहानी को लेकर आया था ओझा। ठिगने कद के काले, और चेचक के दाग वाले ओझा ने जिन्न की मौजूदगी की कहानियाँ बना डाली थीं। उन कहानियों में जिन्न थे, भूत थे, चुड़ैलें थीं। और थे कई उसके साथी। डरी सहमी कामिनी को ओझा के दरबार में लाया गया। वह तो बासन धो रही थी। उसे तो दिन में साँस लेने की फुर्सत ही नहीं थी, फिर वह आज ऐसे, और वह भी दूसरे मरद के सामने?
"अरे ई ओझा हैं, इनसे डरना कैसा?"
ओझा ने उसके साँवले पड़ते गेंहुए रंग को ध्यान से देखा। उसके शरीर के हर तिल और मस्से को देखा।
उसने गहरी साँस ली। बर्तन धोते हुए उसके हाथों में राख-मिट्टी भर गई थी, उसकी भी गंध उसकी नाक में घुस गई। उसकी गंध ने शायद उसकी गंध की सीमा तय कर दी थी।
ओझा उस दीवार से डर गया था, और डरकर आँखें बंदकर उसके रोग का अध्ययन करने लगा।
"सच सच बता... कौन है तू... क्यों इस औरत को तंग कर रहा है... क्यों... बता... क्या चाहता है...?"
कामिनी काँप रही थी। वह हिलने लगी थी। वह झूमने लगी। मुँह से गोंगियाने की आवाज। सब लोग ये हालत देखकर डर गए। ओझा ने मंत्र पढ़ कर पानी के छींटे उसके मुँह पर मारे। कामिनी को झटका-सा लगा। वह थोड़ी सचेत हुई। खुद को नियंत्रित करना चाहती थी पर रुलाई फूट गई। हिचक हिचक कर रोने लगी।
नखरे मत कर... बता कौन है तू... ऐसे नहीं मानेगा...
उसने कामिनी के बाल पकड़ लिए जोर से। वह चीख पड़ी।
माई गे माई... करुण कराह घर को चीरती हुई दालान तक जा रही थी।
सरकार जी, ये बताइए, क्या दुल्हिन जी कभी पोखरा के किनारे शाम को गई थीं।
साज ऋंगार करके। बाल खुले करके...
सरकार जी अनभिज्ञ थीं... उन्होंने इनकार में सिर हिलाया।
हो नहीं सकता... आप लोग पता करिए... ये एक शाम गईं थी... पूरे गाँव को पता है कि बिसनटोला के पोखरा और वहाँ खजूर के पेड़ के आसपास कोई शाम या रात को नहीं जाता... काहे गई थी दुल्हिन...
कामिनी की चेतना लुप्त हो रही थी। घर के सब लोग हैरान हो रहे थे कि इतने कड़े परदे में रहने वाली नई पुतोह पोखरे तक गई कैसे। कौन ले गया होगा। अकेली कैसे हिम्मत करेगी। माजरा किसी को समझ में नहीं आ रहा था।
चेतना खोते खोते भी कामिनी को लगा, वह पोखरे के जल में अपना चेहरा देख रही है। बाल खोल लिए और ठठा ठठा के हँस रही है... खजूर के पेड़ों के घने साये में दौड़ रही है... दूर दूर तक कोई नहीं।
ओझा ने कहा - "दुल्हिन पर आशिक जिन्न का कब्जा है" और ऐसा कहते हुए उसने फिर से उसके सारे तिल देखने की तमन्ना की।
"आशिक जिन्न है जो रोज रात को उसके साथ हमबिस्तर होता है..." इसका खुलासा होते ही हवेली में हड़कंप मच गया।
"अरे, नइकी दुल्हिन, कपरपूरा वाली पे जिन्न का साया।"
"कैसी भूतैली लरकी दे दी हमें इसके मा बाप ने... रोगियाह बेटी थी तो रखते अपने पास, हमारे गले डाल दिया गे माई..."
सरकार जी विलाप कर उठी। घर की अन्य औरतों ने छाती पीट लिया। उस आँगन की सबसे चुप्पा पुतोह यानी वीरपुर वाली के होठों पर हल्की हँसी आई और विलुप्त हो गई। वह तमाशबीन बनने के बजाय अपने कमरे में घुस गई। इधर ओझा ने उपायों की एक लंबी सूची दे दी सरकार जी को। उपायों की सूची में थी - इनका इत्र लगाना बंद, सजना सँवरना बंद... खासकर शाम को... रूम में इत्र न छिड़के... भूत नही जिन्न है... जिन्न आसानी से पीछा नहीं छोड़ता... वो जान नहीं लेता पर बेदम करके छोड़ता है। और चित्त सोना बंद। उस दिन से उस हवेली के सभी कुँवारी और अकेली औरतों के चित्त सोने पर रोक लग गई।
उधर जिन्न के इस हमले के बाद सरकार जी बहुत ही सचेत हो गई। कामिनी क्या करे। क्या न करे। सब कुछ उनकी निगरानी में था। सोच रही थीं कि पुतोह को उसके नइहर ही भेज दें।
उधर कुछ औरतों ने समझाया कि बेटे को बुला लें, इतना तो जमीन जायदाद है ही। क्या करना है और कमा कर। इधर सरकार जी ने सबको दहाड़कर चुप करा दिया।
"अरे मरद है, बाहर कमाने गया है। यहाँ पे क्या धरा है, और फिर ले ही तो जाएगा कुछ दिन में। छठ पे भेज तो देंगे..."
इस तकरार में उन्हें कुछ कौंधा।
"सरकार जी..." कामिनी ने डरते हुए सरकार जी को पुकारा।
"आप उन्हें बुला लीजिए न..."
आखिरी शब्दों को जैसे गले में ही घोंटते हुए कामिनी ने कहा था...
"क्या कहा? मरद के बिना अच्छा नहीं लगता क्या ससुराल? हम लोग तो आदमी को अपने पल्लू में बाँधकर नहीं रखते थे, जैसे तुम चाहती हो! बहुत हुआ! अभी कुछ दिन यहीं पर रहो, फिर ले जाएगा तुम्हें! अभी चार पैसा कमा ले, फिर ले जाएगा। दोनों भाइयों की पढ़ाई भी तो करानी है।"
कामिनी समझदार है, सास का इशारा समझ गई;
"और सुनो दुल्हिन, लोटा और मरद बाहरे मँजाता है। समझ में आया कुछ, अभी होली और छठ पे आएगा मरद। जब तुम्हारा दोंगा करा के लाया तो रहा था न तुम्हारे संग, ये समझ जाओ, औरतों को इतना ही मरद मरद करना चाहिए। मरद को अँचरा में नहीं बाँधते। अँचरा में तो सिक्का ही बाँधना चाहिए... अब जाओ..."
सरकार जी अपना आँचल निकाल कर कोने में बँधे सिक्के दिखाने लगीं।
समझदार कामिनी सारा इशारा समझ गई। और अपने अंदर की उमस पर लोटे से पानी उलीच लिया। वह चल पड़ी, मिट्टी के चूल्हा से एक मुट्ठी राख लेके। कुआँ पर सादी मिट्टी रखा रहता है... दोनों को मिला कर माँजेगी तो चमक जाएगा। लोटा माँजने... पीतल का लोटा हरिया गया था। लगता है पानी से खंगाल कर सब छोड़ देते हैं। वह अपने हिस्से का लोटा अलग से माँगेगी। तिलक में इतना पितरिया बर्तन सेट के साथ लोटा तो जरूरे आया होगा। एक भी बाहर नही निकाली हैं माता जी। मन करता है कि पूछे कि ऐ माता जी, का करिएगा एतना भारी भारी बर्तन और परात... निकालिए न रसोई, भंसा घर में काम तो आएगा। दो बार आटा सानना पड़ता है, बड़का कठौती में, एके बार में हो जाएगा...
कठकरेज बुझाती हैं... तभी तो उसे कहा कि मुझे माँ जी मत कहना... सरकार जी कहना।
लोटा को माँजते माँजते कपरपुरावाली बड़बड़ाती जा रही थी। लोटा पटकने से टनाटन आवाज आ रही थी। उसे लगा टनाटन की आवाज तेज हो रही है... कैसे... उसके हाथ रुक गए... कभी धीरे कभी तेज आवाज आती... उसने भरी दुपहरिया में चारों तरफ नजर दौड़ाई... बड़ा-सा प्रांगण था जो सिर्फ औरतों के लिए सुरक्षित था... कोई बाहर का मर्द या अजनबी नहीं घुस सकता था। इसी कुएँ पर सारी औरते खुले में स्नान करती... कुएँ के पास केले के कई पेड़, गन्ना और पुदीने के पौधे थे जो पानी बाल्टी से गिरते ये पौधे उन्हीं से सींचते थे... खुराक पाते थे।
कुछ देर वह इधर उधर टोहती रही... कोई नहीं दिखा। आँगन के ठीक पीछे आम का बगीचा था। बहुत घने पेड़ थे। कोई तो करता था देखभाल उसकी। पर वह आज तक दिखाई नहीं दिया था। कभी कभी उसकी टेर सुनाई देती या चिल्ला चिल्ली। चुप्पी पुतोह ने ने कभी देखा नहीं था उसे...
कामिनी को दोंगा कर आए हुए दिन ही कितने हुए थे और उस पर ये आशिक जिन्न?
कामिनी रात को खिड़की खोल देती थी। तो क्या जिन्न उसी से आया? रात को उसे जुगनू देखने बहुत पसंद थे। झींगुर की आवाजें उसे भाती थीं। वह उन्हें सुनती रहती, फिर अपनी पायल की झंकार बजाती। फिर न जाने किस भाव से आलता लगा लेती, मेहँदी लगाने का मन होता, तो मेहँदी के पत्ते ले आती, उन्हें पीसती, सिल को लाल रंग में रँगे हुए देखती। और फिर अपने सिंदूर का लाल रंग देखती। दोनों को मिलाती और फिर न जाने कैसे वह हरसिंगार बन जाती।
रात को कमरे की खिड़की खोलती, जो गाछी की तरफ खुलती थी। अँधेरा पसरा रहता... इसके जेहन में भरता जाता। लगता कोई साया आम के पेड़ो को हिला रहा है। वह देखने की कोशिश करती, पर वह डर जाती। सोचती पति को चिट्ठी ही लिख दे, रात, जिन्न और अपने बारे में बताए। खिड़की बंद करती तो कमरे में घुटन महसूस होती। क्या करे? क्या करे? तो क्या इसीलिए जिन्न आया था? उससे बातें करने के लिए? उसके मन की गाँठ खोलने के लिए?
कई बार साया दिखाई देता उसे। उसे लगता कि कोई साया उसे पर नजर रख रही है। उसके आसपास मँडरा रही है। उसे डर नहीं लगता। खिड़की खोल देती कि वह साया आकर सीधे उससे बात कर ले। वह साया बचता क्यों है, क्या वह सचमुच उस पर फिदा है, यह सोच कर एक पल को शरमाई। लगा कि खुद को आपादमस्तक आईना में देख ले एक बार। पर ठिठक जाती। कान में बचपन की की कुछ आवाजें नेपथ्य से आतीं... आपकी बेटी बहुत सुंदर है रामसुभीता बाबू, किसी आन्हर-कान्हर के हाथ में न दे दीजिएगा। शादी के बाद तो वह भूल ही गई थी वह बहुत सुंदर है और उसके पिया के शरीर पर भालू जैसे काले काले बाल, जो अभिसार के क्षणों में शूल बनकर चुभते रहे हैं उसे। और कोई फिदा नहीं हुआ, भूत प्रेत ही बचा है क्या फिदा होने को... वह खुद से सवाल पूछती और खिड़की के बाहर गाछी के अँधेरे को घूरती रहती।
मन की बात करे किससे। कौन है जो सुने उसकी बात। सरकार जी का खौफ ऐसा कि दोनों देवर बाहर ही बाहर गायब रहते हैं। वह तो उनसे भी बात नहीं कर सकती। एक दिन भर अँग्रेजी किताबों में डूबा रहता है, छोटा वाला अपने ही जीट जाट में। कई बार वह सोचती कि किसी किताब की तरह उसे खोल कर लल्लन पढ़ता क्यों नहीं। जब देखो, अँग्रेजी की कोई किताब लिए घूमता रहता है जैसे सबको अपनी पढ़ाई के रोब में ले लेगा। न वह किताब हो सकी न मुकम्मल इनसान।
उसके लिए तो केवल चूल्हा है, बासन है, देगची में खौलती हुई दाल है। आम का पेड़ है, उसका अँधेरा है...
हवेली अभी जिन्न के हमले से उबरी भी न थी कि एक और हमला उस पर हुआ और उस हमले से हिल उठा हर कोई। मुख्तार जी तो अभी जिन्न को ही सही से पहचान नहीं पाए थे, कि कौवा काँव काँव करता हुआ मेहमान के रूप में तबाही ले आया।
मँझला देवर गायब था। वही जो अपनी बाजुओं से थामकर जिन्न को उसकी देह से नोचकर फेंक देता था वह गायब था। तो क्या जिन्न उसे भी अपने साथ ले गया? या जिन्न ने बदला ले लिया?
सरकार जी सुबह से ही उसे कोस रही थीं। क्यों ब्याह कर लाए, क्यों दोंगा किया? और अगर किया भी तो जिन्न को थामने के लिए मँझले देवर को ही क्यों बुलाया?
पुलिस में खबर लिखवाई, खोजबीन शुरू की। कानाफूसी से पता चला कि लल्लन बाबू आजकल भूत प्रेतों वाली किताबें खोजते थे।
घर में हाहाकार मच गया। रोना पीटना शुरू हो गया। कामिनी को लगा जैसे वह ही इन सबकी जिम्मेदार है। सरकार जी ने उसे ही मारना शुरू कर दिया। सरकार जी ने कितनी बार गरम माँड़ वाली कठौती उसकी तरफ फेंकी होगी, गरम रोटी फेंकी होगी उसकी तरफ, अब तो कामिनी को भी ध्यान न होगा।
सरकार जी की छोटी गोतनी ने तो कई बार दबी जुबान में टोका भी कि क्यों आप सौतन का खीस कठौती पर उतार रही हैं। सरकार जी बौखला जातीं। आँगन में मातम पसर जाता। कामिनी को लगता कि वह खुद भी भूत बनती चली जा रही है। जिंदा भूतों के बीच फँस गई है।
कामिनी का मरद छुट्टी लेकर आया। मुख्तार जी और बड़े बेटे की भागदौड़ से पुलिस ने थोड़ी सक्रियता दिखाई और काफी तहकीकात के बाद इसे अपहरण का नहीं, मर्जी से गायब होने का मामला करार दे दिया। मगर सरकार जी को एकदम यकीन था कि यह काम उसी आशिक जिन्न का है जिसने कामिनी के शरीर पर कब्जा जमाया था। कामिनी सुनती रही।
वह अपने बनाए दायरे में और सिमटती रही। किसी ने कहा दोस्तों ने मारकर उसे रेलवे पर लिटा दिया था। किसी लड़की से कोई चक्कर था। उसके भाइयों ने ऐसा किया।
"अरे किसी ने कुछ नहीं किया है, अगर किया है तो उसी जिन्न ने, कोई नहीं है, इसके पीछे, अगर कोई है तो ई मुँहझौसी कपरपूरावाली!"
"सरकार जी, ये आज के जमाने में कैसी बातें कर रही हैं! भला जिन्न होते हैं क्या?" पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा।
"होते हैं, आप इस ओझा से पूछिए, इसके शरीर पर जिन्न आता था, इसका आशिक है जिन्न! अब इसका मरद साथ नहीं रहता, वह जिन्न रहता है, अरे खा गई, मेरे बेटे को, अब दूसरे को खाएगी! अरे किसी को पकड़ना है तो इसे पकड़ कर ले जाओ, ये ही है अभागन..."
"सरकार जी, अंतिम बार लल्लन बाबू अपने दोस्तो के साथ सरैया चौक पर देखे गए थे। दोस्तों के साथ हँसते बोलते जा रहे थे। पता चला है। अब वे कहाँ गए,, क्या हुआ ये तो तहकीकात के बाद ही पता चल सकता है न!"
दारोगा जी ने समझाने की कोशिश की।
घर में गहरा सन्नाटा छा गया है। एकदम शांत हो गया है घर। उस शांत घर में अँधेरों में कैद कामिनी लल्लन की आखिरी बातों को ध्यान कर रही है।
"भाभी, तुम उबालती रहना इस देगची में दाल, और देखना मैं क्या करूँगा?"
देगची में अभी उबाल नहीं आया था और वह दानों से बातें ही कर रही थी।
"अरे क्या करेंगे?"
"अभी नहीं बता सकता, पर कुछ ऐसा कि एक धमाका होगा! और तुम देखना, वह दिन जल्द आएगा, कहो तो तुम्हें भगा ले जाएँ।"
"हम कहाँ जाएँगे घर दुआर छोड़ कर बउआ जी... अभी तो आपकी सादी-वादी भी करनी है न हमें... आपके पाँव में बेड़ी बाँध देंगे फिर देखते हैं कहाँ भागते हैं आप पगहा तुड़ा कर..."
वह हँस पड़ी। लल्लन को लगा जलतरंग बजा कहीं। कितना सुंदर हँसती हैं भौजी। मन में उदासी छाई। अपनी कविता तो बचा लेगा किसी तरह, कामिनी नही बच पाएगी उसकी।
वह ठुनका - मत भागो, ले जाएँगे किसी दिन उड़ा के... देखना... आएँगे लेने आपको... हमको नहीं रहना ईहाँ... नहीं पिसना घरेलू चक्की में... हम तो बहता पानी हैं भौजी... बहो हमारे साथ... नहीं तो देखना, धमाके में बहा ले जाएँगे...।
"ओह, लल्लन... तुम ये धमाका करने जा रहे थे।" उसके मन में भी मरघट जैसा सन्नाटा छा गया।
संदिग्ध दोस्तों की खोज हुई। केस किया गया। दोस्तों ने कहा कि लल्लन बाबू बहुत उलझे उलझे से थे।
और स्टेशन की तरफ गए थे। वे शहर की तरफ जा रहे थे। कह रहे थे कि जरूरी काम से जा रहे। जल्दी ही कुछ धमाका करने वाले हैं। बताया नहीं कि क्या करने वाले हैं। अक्सर कहा करते कि वे ऐसी जिंदगी नहीं जी सकते।
सरकार जी सन्नाटे में। कैसी जिंदगी चाहता था उनका बेटा।
कामिनी की तरफ से अब सबका ध्यान हट गया था। दुख में डूब गए थे सब। सरकार जी का दिल कह रहा था कि बेटे को किसी बात की कमी नहीं थी, आखिर वह घर से भागेगा... अच्छा खासा बीए कर रहा था। इंगलिश पढ़ रहा था। विदेश जाने के सपने देखा करता था। वो क्यों भागेगा। उसे भगाया गया है, जिन्न ने मारा, या दोस्तों से मरवाया होगा। ऐसे तो कुछ हो नहीं सकता, वह खुद को नहीं कुछ कर सकता था। फिर उसे क्या हुआ? नहीं नहीं!
और कामिनी को लगा कुछ खो गया। जब से जिन्न को उसने काबू किया था तब से उसकी दोस्ती हो गई थी। वह बहुत समझाता रहता। दिन में अक्सर कमरे में आने लगा था। अकेले बात करने लगा था। जितनी देर कमरे में रहता, हँसी बाहर आती रहती।
सबसे छोटा देवर शरमाता था। बहुत ही कम कम मिलता जुलता। पर लल्लन तो बहुत मनलग्गू था। अँग्रेजी की बातें खूब बताता। जिन्न को उसने कैसे काबू में किया, उसे किस्से सुनाता, उसके आम के पेड़ की बातें सुनकर हँसता। लोटपोट हो जाते दोनों ही ये बातें करके। पर वह क्यों चला गया? और ऐसे? क्या उसे यही धमाका करना था? उसे उसकी बातें याद आतीं, उसकी वे बाजुएँ याद आतीं जिनसे वह जिन्न को भगाता था। उसे ऐसा लगा कि मानो फिर से जिन्न उसकी छाती पर बैठ गया हो। और वह घुट रही है, दब रही है।
पर आज उसे बचाने वाला कोई नहीं था। जो था वह न जाने कहाँ चला गया। और पति को इस दुख में उसके पास आने की जरूरत ही क्या थी। उसे उसकी माँ और उसके काम से फुरसत कहाँ थी?
धीरे धीरे इस घटना को चार महीने बीत गए। कामिनी के पति असम चले गए। उनके जाते ही फिर कामिनी को दौरे पड़ने शुरू। वही जिन्न का किस्सा, जिन्न आया, उसके शरीर पर कब्जा किया। झाड़फूँक हुई। आशिक मिजाज जिन्न, पीछा छोड़ ही नहीं रहा था। धीरे धीरे फिर से किस्से गूँजने लगे। उसने उमस का घूँघट ओढ़ लिया था।
वह भी जेठ की रात थी। बहुत तेज गर्मी थी। उस गर्मी में गाँव में अभी भी ठंडक रहती है। उस गर्मी के रात में सब थे। कामिनी भी छत के कोने में ओट लेकर बैठी थी, आँगन की कुछ औरतो के साथ। खुले में सोती नहीं, गरमी में ठंडी हवा लेने छत पर आई। झाड़-फूँक करवाना भी छोड़ दिया था सास ने। रोज सुबह वह उसी तरह तड़पती, चीखती हुई मिलती। अब वह थोड़ी देर में शांत होने लगी थी। वह बहुत उग्र होने लगी थी। कमरे में उठ कर सामान फेंकने लगती... सब उससे दूरी बनाने लगे थे।
सरकार जी उसे मायके भेजने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थीं। बेटा साथ नहीं ले जाना चाहता। वह बोलकर गया था कि इसे यहीं रखो, सँभालो, जरूरत हो तो डाक्टर से दिखा देना... पैसे की दिक्कत न महसूस करना। पैसे भेजता रहूँगा। समय होता तो खुद ही दिखा देता। लेकिन उसके सामने एक बार भी जिन्न नहीं आया उसकी देह पर।
कामिनी अब खोई खोई रहने लगी थी। मुरझा रही थी। वह देख रहा था पर असहाय था। असम में पहले क्वार्टर खोज ले फिर परिवार को ले जाएगा। प्लानिंग साल भर बाद ले जाने की थी। तब तक माँ को पुतोह का सुख मिल जाए। यहाँ तो माँ कुछ और ही प्लान कर रही थी। बहू को मायके वाले के माथे मढ़ने के फिराक में। चिट्ठी भिजवा दी थी कि छठ के बाद आकर ले जाए।
सब कुछ सरकार जी के मन में एकदम साफ था उनके मन की चालों को कुछ हलचलों से विराम मिला। जैसे स्पीड ब्रेकर आ गया हो, जहाँ पहले वे बहू को छठ पर बेटे के पास भेज रही थीं, अब वे मायके भेजने पर तुल गई थी।
वह अमावस की रात थी। स्याह अँधेरी रात। करिया कुचकुच रात। सबके सब गरमी से राहत के लिए छत पर डटे हुए थे। चुप्पी पतोहू यानी रजौली वाली कामिनी को आँगन में अकेले बैठे देख कर कमरे से निकली। लालटेन की हल्की रौशनी में उसका चेहरा दिपदिप जल रहा था।
"चलो छत पर... ईहाँ काहे गरमी में सीझ रही हो..."
"हम इहें ठीक हैं..."
"अगोरिया कर रही हो का..."
वह रहस्यमयी ढंग से मुस्कुरा रही थी। कामिनी ने नोटिस किया कि उसकी आँखें ठंडी और बेजान थी।
छत पर अचानक हलचल होने लगी। शोर उठा। दोनों भाग कर छत की सीढ़ियाँ चढ़ गईं।
गाछी के बगल वाले खेत में छोटी छोटी लाइटस दिखाई दे रही थीं। अनेकों बत्तियाँ जल रही थी। भुक भुक... हिल रही थी हवा में... दूर थीं पर लग रहा था कि घर की तरफ बढ़ती चली आ रही हैं। घर के सारे लोग घबरा गए। हो न हो डाकू आ गए गाँव में। घर डाकू डाकू के शोर से भर उठा।
मुख्तार जी ने कहा - "डाकू बिना सूचना के नहीं आते... वे पत्र लिखते हैं... फिर आते हैं... पता करो, कोई और बात..."
सरकार जी ने कहा - "अन्हरिया रात में बिना बताए भी डकैत आ जाते हैं, आजकल किसी का दीन-ईमान नहीं रहा..."
"जरूरी नहीं कि डाकू हमारे घर ही आ रहे हों, गाँव में और भी तो घर हैं, हमारे यहाँ से ज्यादा कमाने वाले मरद जोगी बाबू के घर में हैं, वहाँ जाते होंगे...", किसी ने कहा।
"कई बार डाकू डकैती करके नदी किनारे से गुजरते हैं... डरिए मत... शांत रहो... चुपचाप... जैसे हम लोग घर पर है ही नहीं..."
यह सबसे छोटे देवर की आवाज थी।
किसी की हिम्मत न हुई, कोई घर से नहीं निकला, सब छत पर पत्थर ईंट के टुकड़े लेकर बैठ गए कि डाकू नीचे आएँगे तो उन पर पत्थर बरसाएँगे... छत पर खूब जमा कर लिया सबने। कामिनी नीचे भागी... कुछ औरतें अपने गहने जहाँ तहाँ छिपाने लगीं। गले से चेन खोला, किसी ने बूँदे.. किसी ने कंगन... सरकार जी के कहने के बावजूद कामिनी ने अपने गहने नहीं खोले। दहशत का माहौल हो गया। कामिनी ने सुना, चुपचाप सीढ़ियाँ उतर गई। बत्तियाँ जलती रही... पास आने का भ्रम होता रहा... सब डाकू के आने का वेट करते रहे... कोई काँप रहा है तो कोई प्रार्थना बुदबुदा रहा है... इस मौसम में डाकुओं का आना, अटपटा लग रहा था। देर हो गई, डाकुओं ने लगता है खेत में डेरा डाल दिया है। थोड़ी देर में देखा... कुछ लोग हाथ में लालटेन लिए चले आ रहे। सब सतर्क हो गए... ईंट पत्थर बरसाने के लिए... छत पर लाइटें कम कर दीं... चोरी की बिजली गायब थी। कभी कभार आ जाती... आज वो भी गायब। छत पर सरगर्मी बढ़ गई...
लोगों के मुँह खुले रह गए... जब नीचे पहुँचे लोग शांति से आकर खड़े हो गए। लालटेन की रोशनी में देखा... कुछ विदेशी महिलाएँ, विदेशी मर्द और उन सबके साथ विचित्र वेशभूषा में लल्लन बाबू। सबके बाल बेतरतीब, लंबे। लगता है कई दिनों से नहाए धोए नहीं। फटी हुई ब्लू पैंट और आँखें जैसे लाल दरिया।
"लल्लनवा..."
"माय, अब हम तुम्हारे बेटा नहीं रहे, ये मेरी दुनिया है, इसी में हम हैं..."
"लल्लनवा... क्यों किया रे ऐसा... क्या जरुरत... हमको बता तो जाता..."
सरकार जी दुख से विलाप कर उठीं। मुख्तार जी को काठ मार गया। उनके मुँह से बोल ही न फूटे।
"पट्टीदारी के लोग सारा माजरा देखकर हैरान थे।
"भइय्या... आप हिप्पी हो गए..."
छोटा भाई चिल्लाया।
"तब तक मुख्तार जी थोड़ा सँभल गए थे।
"अब क्यों आए हो यहाँ दलबल लेकर, मरे हुए लौटा नहीं करते... अशुभ होता है..."
"हम आप लोगों को कुछ बताने आए थे। एक तो ये कि हम जिंदा हैं और अपनी अलग दुनिया चुन ली है..."
वह चुप रहा। उसकी आँखें घरवालो की भीड़ में कुछ खोजने लगीं...
"और..."
मुख्तार जी के गले से ये शब्द मुश्किल से निकले। लल्लन के मुँह से बोल नहीं फूटा...
"जाने दीजिए... विदा, बाय बाय... जिंदा रहा तो फिर मुलाकात होगी..."
सारे विदेशी लल्लन के साथ हो लिए। उनके चेहरे भावहीन थे। उनके लिए यह भाषा और माहौल दोनों अबूझ थे।
सरकार जी "लल्लन लल्लन..." पुकारती रही। मुख्तार जी ने उन्हें पकड़ लिया कि कहीं बेटे के पीछे दौड़ न जाएँ। लल्लन के साथ जाती हुई विदेशियों की जमात कुछ गाती हुई जा रही थी... जिसे थोड़ा बहुत स्कूली बच्चा पकड़ पाया....
"लिविंग दिस वे, विदाउट ज्वाय, विदाउट टार्चर, आई डू रिमेंबर द पास्ट इयर्स... एंड यूअर सिलवरी हैंडस..."
सुर धीरे धीरे अँधेरे में विलीन हो गए।
उस रात पूरे घर पर अमावस्या की गहरी परत चढ़ गई।
उस रात सरकार जी को इतना सुकून आ गया कि उनका बेटा जिंदा है। जिन्न ने मारा नहीं है। कभी न कभी घर लौट आएगा। मुख्तार जी ने कलेजे पर पत्थर रख लिया। उस रात आँगन उसी घर में रहने वाले पट्टीदारी के लोग अलग अलग तरह की बातें सोच रहे थे। तरह तरह की बातें, अफवाहें, अनुमान थे। सरकार जी रोती बिसूरती और कपरपूरा वाली को ठिकाने लगाने के बारे में सोचती जातीं। उन्हें लगने लगा कि इस पतोहू के रहते घर से अपशकुनी छाया कभी न हटेगी। बड़े बेटे को भी इस जिन्न की महबूबा से निजात दिलाना जरूरी नहीं तो उसको भी खा जाएगी। जब भुतहा मकान में नहीं रहा जा सकता तो भुतैली औरत के साथ बेटा कैसे जी सकता है... पर कामिनी का क्या किया जाए? उसे कहाँ भेजें? वह रात सदियों की रात पर भारी थी। सबके लिए। कामिनी अपने कमरे में बेखबर बैठी थी। गाछी की तरफ खुलने वाली खिड़की रात भर खुली थी।
सुबह, मुँह अँधेरे सबसे पहले पिछवाड़े से गुजरते हुए आँगन की किसी औरत ने देखा। कपरपूरा वाली रात में खिड़की खोल कर कभी सोती नहीं। घर सुबह सुबह ही चीख पुकार से भर उठा।
कामिनी गायब थी।
जिन्न उसे उठा ले गया है? ओसारे पर लोटा चमक रहा है... घर वाले चीख रहे हैं... "कामिनी... कामिनी..."
गाछी का रखवाला अकेलापन काटने के लिए कोई अजीब-सा गीत गा रहा है। घर की सबसे चुप्पी पुतोह, रिश्ते में गोतनी वीरपुर वाली अपने कमरे की चौखट से बाहर निकली। कामिनी का चमचमाता लोटा खोज रही है। आँखों में पहली बार इतनी चमक और जान दिखाई दे रही है। लोटा लेकर कुएँ के पास पहुँची और गड़प्प... लोटा कुएँ के तल में चला गया।
वह बिसनटोला के पोखरा की तरफ बढ़ी चली जा रही है। रास्ते में ही बाल खोल लिए... लोल (होंठ) रंग लिए, आँखों में काजल, बड़ी-सी बिंदी और इत्र छिड़कती हुई वह पोखरा के पास जा खड़ी हुई। पानी थिर है। अपना चेहरा वह साफ साफ देख रही है। पानी में जो चेहरा दिखा, उसे देख कर वह दंग रह गई। वह उसका चेहरा तो नहीं था। वो कोई और स्त्री थी, जो उसमें रहा करती थी।
कंकड़ उठाया और चेहरे पर दे मारा, शाम गहरा रही थी। खजूर के पेड़ हौले हौले हिल रहे थे।
वह ठठा कर हँस रही थी।

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