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शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

डर की दूरी : सुशील कुमार भारद्वाज (कविता)

डर की दूरी

सुशील कुमार भारद्वाज 




कभी जो पास था मन के,

अब उस राह पर धुंध उतर आई है।

मैं तुमसे नहीं,

खुद से दूर भाग आई हूँ कहीं।


कहा मैंने —

“आजकल मैं दूरी बना रही हूँ,

डर लगता है, कहीं गलती न हो जाए...”

पर गलती क्या होती है?

एक क्षण की कमजोरी?

या वह चाहत,

जो शब्दों में नहीं समा पाती?


तुमने कुछ नहीं कहा,

बस देखा, जैसे कोई आईना देखता हो—

जिसमें मैं खुद को झूठा साबित नहीं कर पा रही थी।


सच यह है,

कि मैं जानती हूँ —

गलती तुमसे भी हो सकती है,

मुझसे भी।

क्योंकि गलती कभी शरीर से नहीं होती,

वह आत्मा की थकान से होती है।


यह डर, यह दूरी,

एक दीवार नहीं, एक पुकार है—

“रुको... मैं खुद को समझना चाहती हूँ।”


कभी-कभी प्रेम का सबसे सच्चा रूप

वही होता है,

जब हम उसे अधूरा छोड़ देते हैं।


मैं बस यही चाहती हूँ —

तुम मेरे भीतर बने रहो,

पर मेरे बाहर न आओ।

क्योंकि अगर तुम बाहर आ गए,

तो शायद मैं टूट जाऊँगी,

और फिर कुछ भी शेष नहीं रहेगा—

न गलती, न दूरी,

न मैं, न तुम।


बस एक सन्नाटा...

जहाँ प्रेम, डर बनकर साँस लेता रहेगा।


********************************

रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



सोमवार, 15 मई 2017

बिहार वाली बस : ( सुशील कुमार भारद्वाज)

बिहार वाली बस
सुशील कुमार भारद्वाज



बस में चढा तो भीड़ बहुत थी लेकिन चढ़ना भी मज़बूरी थी. पूरे एक घंटे के इंतज़ार के बाद बस जो आई थी. मालीपुर जैसे छोटे इलाके के लिहाज से स्थिति कोई बुरी नहीं थी. ट्रक, ऑटो और जीप तो सरपट दौड़ ही रहे थे. फर्क बस इतना था कि गाडियां हसनपुर और रोसड़ा की ओर जा रही थीं और मुझे जाना था बेगूसराय.
अब सुबह-सुबह तो सबकी अपनी मज़बूरी होती है ऐसे में बस को आखिर छोड़े तो कौन? उसमें भी आज ठंढी हवा जाते हुए माघ महीने का एहसास कराने के लिए फिर से धमक चुकी है.
बस में तिल रखने भर की भी जगह न सूझती थी, पर कंडक्टर था कि न तो बार-बार गाड़ी रुकवाने से बाज आता था न ही भूसे की तरह आदमी को ठूंसने से. संयोग से बीस मिनट की धक्का –मुक्की के बाद मुझे एक सीट मिल ही गया. ओह! खुशी के क्या कहने? लगा जैसे जग जीत लिया. सारे कष्ट दूर. सच भी था कि बेगूसराय तक तो शायद ही कोई मुझे उठाने की हिमाकत करता. ठाठ से बैठने के बाद खिड़की की ओर मुंह करके हरे भरे बगीचे और खेत को देखने लगा तो देखते ही रह गया. आंखों के साथ-साथ मन को भी अजीब सुकून मिला. खेत से लगे ही आम, जामुन, लीची, बेल, कटहल, चौह, शीशम, पीपल, बरगद, ताड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. पटना में ये नज़ारे अब कहां नसीब होते हैं? जो कुछ पेड़–पौधे सड़क किनारे या यहां–वहां थे, वे भी सड़क चौड़ीकरण, पुल–निर्माण आदि के नाम पर गायब हो गए. एक कसक उठी. क्या इस हरियाली की परिकल्पना अब कंक्रीट के जंगल बने शहरों में की जा सकती है? यहां भी जो हरियाली बची हुई है वह भी कब तक बची रह पाएगी? वर्षों पहले घने बगीचे नज़र आते थे लेकिन अब यहां भी सड़क किनारे खेत तेजी से बाजार बनते जा रहे हैं. जमीन के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं. कभी ये पेड़ –पौधे घरों की शोभा हुआ करते थे. अब गाँवों में भी स्थिति बुरी होती जा रही है. अभाव के दौर में लकड़ी भी इतने महंगे होते जा रहे हैं कि गाँव के लोग भी खिड़की –कवाड़ी के लिए लोहा, स्टील या प्लाई का इस्तेमाल करने लगे हैं. अब तो गरीबों के घर में भी लकड़ी के फर्नीचर दुर्लभ-वस्तु बनते जा रहे हैं. समझ में नहीं आता कि आने वाली पीढ़ी साल, शीशम बरगद और पीपल के पेड़ सचमुच में देख भी पाएगी या फिर शहरीकरण के अंधी दौर में वह सिर्फ तस्वीरों से संतोष करके रह जाएगी? कितना दुर्भाग्यपूर्ण वह दिन होगा जब बच्चे ये पूछने को मजबूर हो जाएगें कि फल-फूल पेड़–पौधों से आते हैं कि फैक्टरी से? हंसी भी आती है खुद की बातों पर. लेकिन डर भी लगता है भविष्य की बातों से.
“मर साला मर” की तेज आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी. सिर घुमाकर देखा तो सामने सांवले रंग के एक युवक अपने तेवर में दिखा. सिर पर काली टोपी, और गले में माला और चैन गडमड थे. तैश में वह साथ की महिला पर चिल्ला रहा था– “ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा.”
एक चुप्पी के बाद, “ये साला बिहार देश नहीं सुधरेगा! देखो, दिल्ली, पंजाब और कलकत्ता में. कैसे लोग कायदे से रहते हैं? दिल्ली की बसों में इतनी भीड़ रहती है क्या? वहां दस–दस मिनट पर गाड़ी हैं, मेट्रो है. और यहां साला दो घंटे में एक मरियल–सी बस चें-पों करते हुए आवेगी और भूसे की तरह आदमी पर आदमी लाद कर ले जावेगी .... साला यहां का आदमी भी मुर्दा है. कभी कुछ नहीं बोलेगा... सिर्फ राजनीति करेगा.... इसको –उसको सबको प्रधानमंत्री बनावेगा बकिर बस सुविधा के लिए कोई नहीं बोलेगा. ट्रेन के लिए कोई नहीं बोलेगा?”
“चुप भी करिये. बस में क्यों तमाशा करते हैं?” – साथ की महिला उसे चुप कराने की गरज से कही. बच्चा बस में चढ़ गया था. आगे वाली सीट के पास ही खड़ा था. कंडक्टर से ही काहे नहीं पूछ लेते हैं कि लड़का वहां है कि नहीं?”
“साली, मैं कंडक्टर से पूछूँगा? तू खुद क्यूँ नहीं आगे जाकर देख आती है?”
“कितने जिद्दी आदमी हैं? मैं महिला होकर, इतने लोगों की कश्मकस भीड़ में अब आगे जाकर देखूं लेकिन मर्द होकर आप नहीं जावेंगें?” – चेहरे का भाव बदलते हुए गुस्से में महिला बोली.
“जादे फटर–फटर मत कर साली! तूझे अपने बेटे की नहीं पड़ी है तो मैं क्यूँ इस भीड़ में मरने जाऊँ?... तेरा बेटा है ..तू जान ...”
“क्यों इतना शोर मचा रहे हो भाई? आपका बच्चा यहीं पर खड़ा है.” कंडक्टर की आवाज आई.
“मरने दे हरामखोर को. इतनी आवाज दे रहा हूं. साला एक जबाब तक नहीं देता है.”
“अब चुप करों भाई. पूरे बस को सिर पर उठा रखा है.” – कंडक्टर ने शांत कराने के गरज से उसे डपटा.
गुस्से से तमतमाकर युवक “साला मैं अपना बच्चा खोज रहा हूं और ये बस वाला कहता है– पूरे बस को सिर पर उठा रखा हूं. हद हो गई. कहां का न्याय है? मेरा बेटा भूला जाएगा तो ये बस वाला मुझे बेटा लाके देगा क्या? ..... अपनी औकात ही भूल जाता है?.... एक मरियल बस का कंडक्टर क्या बन गया, पता नहीं खुद को क्या समझने लगा है.... यही बात दिल्ली में बोलता तो इतनी मार पड़ती कि होश ठिकाने लग जाते.......”
“बस रोको बस” – कंडक्टर अचानक तैश में आते हुए बीच में ही बस रूकवाते हुए बोला – “उतरो जी ... उतरो... दिल्लीवाली बस से ही जाना ... बिहारवाली बस तुम जैसों के लिए नहीं है.”
और एक झटके के साथ बस सड़क पर खड़ी हो गई. अच्छा खासा तमाशा बन गया. गाली-गलौज सब हो गया. सिर्फ हाथ उठना बच गया. कंडक्टर हाथ भी चला बैठता यदि जो लोगों ने बचाव नहीं किया होता. कुछ लोग उसको नीचे उतरवाने पर तुले थे तो कुछ ने मानवता दिखलाते हुए कहा –“अरे भाई, माफ कर दो, कहां बीच जंगल में छोड़ोगे? बीबी –बच्चे साथ में हैं. बेगूसराय पहुंचा दो .... अभी नया नया शहर का हवा लगा है... समय के साथ अपने ठीक हो जाएगा.”
काफी मानमनौवल के बाद बस खुली. दो लोगों ने अपनी सीट भी छोड़ दी जिसमें वह युवक अपने बीबी–बच्चे के साथ बैठ गया. उसके बाद बस में सिर्फ हल्की कानाफूसी होती रही. बस चलती –रूकती बेगूसराय पहुँच गई और बस-स्टैंड में लोग सारी बातों को भूल अपने –अपने रास्ते चले गए.


शुक्रवार, 4 मार्च 2016

पटना फिल्म फेस्टिवल 2016 : एक नई पहल (सुशील कुमार भारद्वाज)

  


जब प्रकृति ऋतुओं के राजा वसंत के स्वागत में खड़ी थी, पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों को छोड़ नए रूप में धरती पर नयनाभिराम हरितिमा की एक अलख जगाने के लिए मचल रही थी, उसी पल बिहार के पावन धरती पर उत्साह –उमंग का एक महोत्सव चल रहा था. नए वर्ष में लिखेंगें नई कहानी के तर्ज पर वसंत ऋतु के गुनगुने धूप-छांव में राजनीतिक एवं गैर- राजनीतिक शोरशराबे से कहीं दूर, जीवन के विविध कलाओं से पूर्ण क्लासिकल फिल्मों का प्रदर्शन पटना में चल रहा था. पटना फिल्म महोत्सव (पटना फिल्म फेस्टिवल) का आयोजन कला संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से पहली बार किया गया. जिसके उद्घाटन सत्र में राज्य के सबसे युवा उप –मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि बिहार के सकारात्मक पहलुओं पर काम किया जाय. नकारात्मक छवि को प्रस्तुत कर राज्य पर बदनुमा दाग देने की बजाय बिहार के कला संस्कृति में निखार लाने की कोशिश की जाय. उन्होंने फिल्मकारों को आश्वासन भी दिया कि बिहार में बिहारी कलाकारों के साथ मिलजुल कर बिहारी सभ्यता संस्कृति पर काम करने वालों को वे अपनी तरफ हर संभव मदद देंगें.  कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री शिवचंद्र राम ने भी अपनी बात रखते हुए सरकार के स्तर पर विविध सुविधा मुहैया कराने की बात कही. जबकि विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में खुशखबरी दी कि फिल्म सिटी के निर्माण के लिए 20 एकड़ जमीन का अधिग्रहण राजगीर में कर लिया गया है. फिल्म नीति भी बनकर तैयार है जिसके एक दो महीने में सार्वजनिक हो जाने की सम्भावना है. गाँधी मैदान स्थित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस उद्घाटन समारोह के साक्षी बने फिल्म निर्देशक नितिन कक्कड़, अभिनेत्री दिव्या दत्ता, कुमुद मिश्र, शेखर सुमन, कला, संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह, विभाग के निदेशक सत्यप्रकाश मिश्र, और केन्द्रीय फिल्म महोत्सव निदेशालय के निदेशक सी सेंथिल राजन एवं अन्य गणमान्य लोग. मोना सिनेमा में उद्घाटन फिल्म राम सिंह चार्ली के प्रदर्शन के पूर्व आगंतुकों ने स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत बिहार गीत एवं बिहार गौरव गीत का आनंद लिया.
ज्ञात हो कि पटना की धरती पर फिल्म समारोह का यह सिलसिला हाल के वर्षों में वर्ष 2006 से चल रहा है. काफी उत्साह–उमंग के साथ शुरू हुए पहले फिल्म महोत्सव में बिहार के फ़िल्मकार प्रकाश झा समेत बॉलीवुड के कई सितारे शरीक हुए थे. जिसकी चर्चा काफी दिनों तक चली थी. 11- 18 फरवरी 2006, फरवरी 2007, और 5-12 अप्रैल 2008 के बाद फिल्म महोत्सव का यह सिलसिला बंद हो गया था. पिछले वर्ष 2015 में एक निजी प्रयास से चार दिवसीय अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. और इस बार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने खुद अपनी रूचि दिखलाई.
लेकिन लंबे अरसे बाद शुरू हुए इस फिल्म समारोह की सबसे अच्छी बात यह रही कि भारतीय पैनोरमा की आठ भाषाओं की स्तरीय (राष्ट्रीय) एवं क्लासिकल फिल्मों को देखने के लिए किसी को न तो रुपए खर्च करने पड़े न ही किसी को पास का इंतज़ार. दर्शक सिर्फ अपने एक पहचान पत्र के सहारे पटना के गाँधी मैदान स्थित मोना एवं एलिफिस्टन सिनेमा में पहुँच, पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर 19  फरवरी से 25 फरवरी तक साठ के दशक से अब तक बनी 28 चुनिन्दा सामाजिक फिल्मों का आनंद सुबह दस बजे से चार शो में लेते रहे. इनमें 14 फ़िल्में हिन्दी, पांच बांग्ला, भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी की दो –दो और संस्कृत, मलयालम एवं कोंकणी की एक –एक थी. समारोह की शुरुआत मोना सिनेमा हॉल में रामसिंह चार्ली से हुई तो समापन बजरंगी भाईजान के प्रदर्शन के साथ. दिखाई गई अन्य फीचर एवं ड्कुमेंटरी फिल्मों में ‘द कौफिन मेकर, दो बीघा जमीन, चाइनीज विस्पर्स, सिनेमावाला, नाचोम-इया- कुम्पसर, पान सिंह तोमर, डैडी ग्रैंड पा एंड माई लेडी, मसान, प्रियमानस, कागज के फूल, आंखों देखी, कामाक्षी, तिनकहों, देवदास, सीक एंड हाइड, उत्ताल, जल, नाटोकेर मोटो, काबुलीवाला, गूंगा पहलवान, अनवर का अजब किस्सा, कत्यार कलजात घुसाली, लिसेन अमाया, मेघे धाकातारा, ऐन, हम बाहुबली, प्रमुख रही. संस्कृत, मराठी, कोंकणी, मलयालम आदि अन्य भाषाओं की फिल्मों के दर्शक अपेक्षाकृत कुछ कम रहे, लेकिन पान सिंह तोमर, दो बीघा जमीन, कागज के फूल, देवदास, बजरंगी भाईजान, आदि फिल्मों को देखने के लिए अपार भीड़ उमर पड़ी. हॉल के अंदर का नज़ारा यह था कि युवा तो युवा लगभग सत्तर की उम्र पार कर चुके दर्शक भी नजर आ रहे थे.
पटना फिल्म फेस्टिवल की सबसे अनोखी बात रही फ्रेजर रोड स्थित बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में रोजाना साढ़े बारह बजे से ढाई बजे तक आयोजित फिल्म प्रदर्शनी एवं कार्यशाला. भारतीय नृत्यकला मंदिर की आर्ट गैलरी में 16 फरवरी को फिल्म अभिलेखागार पुणे की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे 1940 -1980  के बीच की चर्चित फिल्मों औरत, भूमिका, भुवन सोम समेत 74 फिल्मों के पोस्टरों को  शामिल किया गया. दरअसल संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य था फ़िल्मकार, रंगकर्मी एवं अन्य फिल्म प्रेमी सीधे रूप में ख्यातिप्राप्त अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, छायाकार आदि के अनुभवों को न सिर्फ सुने बल्कि फिल्म निर्माण से जुड़ी जानकारी भी ले सकें. साक्षात् रूप में वे उनसे अपने प्रश्न कर सकें. जहां आमंत्रित नितिन कक्कड़, बुद्धदेव दासगुप्ता, इम्तियाज अली, अभय सिन्हा, मोनालिसा, सिद्धार्थ सिवा, महेश अने, अविनाश दास, पंकज त्रिपाठी, पंकज केशरी जैसे फिल्कारों ने अपने फ़िल्मी सफर एवं अनुभवों को बताया वहीं फिल्मों के बारें में भी विविध पहलुओं एवं तकनीकों की भी जानकारी दी. इम्तियाज अली और नितिन कक्कड़ ने विशेष रूप से फिल्म निर्माण से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें भी बताई. इस कार्यक्रम की सफलता को आप इससे भी आंक सकते हैं कि अधिकांश दिन हॉल में पीछे तक लोग जमे रहे. कुछ फिल्म मर्मज्ञों ने भी अपने प्रश्न जड़ बातचीत को एक नया आयाम दिया. साथ ही साथ सिनेमा के क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत करने के इच्छुक कुछ लोग सीधे रूप से निर्माता–निर्देशक से मिल अपनी बातें रखीं और संभावनाओं के रास्ते भी तलाशे. और सबसे खास बात ये रही कि अधिकांश आमंत्रित फ़िल्मकार किसी ना किसी रूप में बिहारी ही थे जो अपनी पहचान राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इस फिल्म समारोह के बहाने न सिर्फ बिहार से जुड़े फिल्मकारों ने अपनी समस्याओं से विभाग को अवगत कराया बल्कि सुविधा मिलने की स्थिति में यहीं फिल्म निर्माण करने की भी बात कही. जहां शेखर सुमन ने उद्घाटन सत्र में ही जेपी (लोकनायक जय प्रकाश नारायण) पर फिल्म बनाने की बात कही वहीं भोजपुरी सिनेमा के निर्माता अभय सिन्हा ने बाबू वीर कुंवर सिंह पर फिल्म बनाने की बात कही. जहां फिल्मकारों ने वर्षों से विभाग में लटकी अपनी मांगों एवं योजनाओं का स्मरण कराया वहीं विभाग की ओर से भी इस क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों से लोगों को अवगत कराया गया. साथ ही बहुत जल्द फिल्म सेंसर बोर्ड की शाखा पटना में भी खुलने की खुशखबरी दी. जिसपर फिल्मकारों ने भी भरपूर सहयोग करने की बात कही.
सिनेमा हॉल में भीड़ तो खूब जुटी लेकिन कुछ लोग यह भी चर्चा करते नज़र आए कि मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय फिल्मों को भी अपने ही जमीन पर थोड़ा सम्मान मिलता तो जुड़े कलाकारों का उत्साह उमंग और बढ़ता. वे अपनी सहभागिता में और योगदान देते. फिर भी विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को लोगों ने काफी सराहा.
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मंगलवार, 1 मार्च 2016

उस रात (लघुकथा) - सुशील कुमार भारद्वाज

                उस रात (लघुकथा)
- सुशील कुमार भारद्वाज



उस रात दिल और दिमाग दोनों में ही भयंकर हलचल मचा हुआ था| नैतिकता और जिम्मेवारी के सवाल अंदर तक धंसे हुए थे| जीवन की यह पहली और शायद आखिरी घटना थी| अचानक बिजली भी गुल हो गई| लेकिन मैं इस अन्धेरें में भी साफ़ – साफ़ देख रहा था कि वह बाजू वाले बिस्तर पर स्त्री – सुलभ स्वभाव के अनुसार स्वयं को ढक कर लेटी थी| मन को विश्वास न था कि आज की रात हमदोनो नींद से सो पाएँगें| एक दूसरे से अनजान न थे तो कई वर्षों से हमदोनो में कोई बात या मुलाकात भी नहीं हुई थी| यह तो अजीब संयोग है कि दोनों होटल के इस कमरे में रहने को मजबूर हो गए थे |
मैं सोचने लगा – “आज वो मेरे साथ सो सकती थी| इस तरह अलग – अलग बिछावन पर सोने की जरुरत नहीं होती| यूँही चुपी लादे सुबह होने का इंतज़ार करने की बजाय रात हंसी – ठिठोली में गुजर सकती थी| मैंने उससे उसका यह हक छीन लिया| उसकी आँखों में आँसू के जो बूंद आये, उसके लिए मैं भी कहीं न कहीं जिम्मेवार था| क्योंकि मैंने उससे शादी करने से इंकार कर दिया था| नहीं – नहीं यह पूर्ण सत्य नहीं है| मैं इंकार या स्वीकार तो तब करता जब बात मुझ तक पहुँचती| मुझे तो बाद में किसी ने बताया कि संजना के शादी का प्रस्ताव आया था| घर वालों ने हँसते हुए यह कह कर लौटा दिया था कि दो परिवारों की वर्षों की दोस्ती को दोस्ती ही रहने दिया जाय| उनका तर्क था कि दोस्ती कि वजह से रिश्ते में करवाहट आ सकती है|
इसके बाद तो उसके प्रति मेरी सोच ही बदल गयी| उससे अधिक दूरी बनाने की हर संभव कोशिश करने लगा| जब कभी सामना हुआ तो धीरगंभीर बना रहा या यूँ गुजर गया जैसे उसपर मेरी नज़र ही न पड़ी हो| चोर की तरह नज़रें चुराता फिरता| उसके व्यवहार से कभी –कभी सोच में पड़ जाता था कि वह इतनी परिपक्व हो गई या सबकुछ से अंजान है जो बिना हिचक के सामने आ जाती है| कभी – कभी इच्छा होती थी कि एक नज़र उसे निहार लूँ| पर डर जाता था कि कहीं मन की कोमल भावनाएं न जग जायें| घर वाले क्या कहते या करते ये तो बाद की बात होती अगल – बगल वाले पहले बदनाम कर देते| एक ही बात दिमाग में होती – “जब मैं उससे शादी ही नहीं कर सकता तो उसे बदनाम क्यों करूँ?”
आज जब यहाँ हमदोनो के सिवा कोई नहीं है तो मन की सारी भावनाएँ कमरे के इस अँधेरे में उफान मार रही है| -“आखिर क्यों नहीं मुझे उससे शादी कर लेनी चाहिए? क्या मैं घर वालों को समझा नहीं सकता? क्या मैं इतना कमजोर हूँ?
तभी कमरे में एक मीठी सी आवाज गूंजी जिसने मेरा ध्यान खींचा| संजना की मोबाइल बजी थी | और फिर संजना –“ हाँ माँ! मैं ठीक से पहुँच गयी हूँ| ......ओह क्या बताऊँ? शहर में कोई होटल खाली नहीं मिल रहा था बड़ी मुश्किल से एक डबल बेड का रूम मिल गया है| .....अकेले रहने के कारण थोडा महंगा तो है लेकिन क्या करूँ एक ही रात की तो बात है | .......”
उसकी बात सुनकर मुस्कुराये बगैर रह न सका| वाकई वह कमरे में अकेली है? थोड़ी देर पहले ही की तो बात है| मैंने थक कर इस होटल में सिंगल बेड न मिलने के कारण इस कमरे को बुक करा लिया था| उसी समय यह भी काउंटर पर आ पहुंची थी| निराश होकर लौटने ही वाली थी कि मैंने अपना वाला कमरा उसे दे देने को होटल वाले से कहा| वह बहुत खुश हुई थी लेकिन तुरंत पूछ बैठी –“फिर आप कहाँ जाइयेगा? ... प्लेटफोर्म पर?” मैं हामी में सिर हिलाता उससे पहले ही –“आप पुरानीं सोच को छोडिये| वैसे भी यह कोई पटना नही है जो कोई परिचित मिल जाएँगे? रात भर की ही तो बात है?” और असमंजस की स्थिति में मजबूरन उसके साथ क्योंकर तो चल पड़ा?
फिर मेरा ध्यान भंग हुआ जब वह मुझसे बोली –“जानते हैं आज की रात मेरे लिए खास है?” मैं पूछ बैठा- कैसे? तो बोली –“अभी माँ बतायी कि लड़के वालों ने शादी के लिए हाँ कर दी है| कल के बाद पता नहीं मैं कभी कोई परीक्षा दे भी पाऊँगी कि नहीं?.......”
संजना अपने लय में बोले ही जा रही थी कि बिजली भी आ गयी| उसके चेहरे पर वर्षों बाद इतनी चमक देखी थी| अजीब–सा महसूस हो रहा था| मेरे पास मुस्कुराने और उसे बधाई देने के सिवा कुछ नहीं बचा था| इच्छा हुई कि वो सिर्फ बोलती ही रहें ताकि इस दरम्यान में उसे जी भर देख सकूँ| भूल गया कि मैं भी कुछ कहना चाहता था? बातों में पूरी रात कब निकल गयी पता ही न चला|
 

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