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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
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चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज

शुक्रवार, 22 जून 2018

अज्ञेय की कहानी मुस्लिम मुस्लिम भाई भाई


मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई/अज्ञेय
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छूत की बीमारियाँ यों कई हैं;पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक,कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? -और मारती है तो स्वयं नहीं,दूसरी बीमारियों के ज़रिये।कह लीजिए कि वह बला नहीं,बलाओं की माँ है...

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है,वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष,और कमीनापन आ घुसते हैं,और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

घृणा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा।छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है;सरदारपुरे में इस छूत को लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक -रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट,दंगे-फ़साद,और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं,और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे - दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे।पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाटों और मुसलमानों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं - ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। केवल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या... फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो भी लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं...

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े।दरवाजों से, खिड़कियों से,जो जैसे घुस सका,भीतर घुसा।जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये,छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये।जाना ही तो है,जैसे भी हुआ,और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो...

गाड़ी चली गयी।कैसे चली और कैसे गयी,यह न जाने,पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!
और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल,जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े,कुछ रोगी,कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली,जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा,“या अल्लाह,क्या जाने क्या होगा।”
अमिना बोली,“सुना है एक ट्रेन आने वाली है - स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी - उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न?उसी में क्यों न बैठे?”

“कब जाएगी?”
“अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..”
जमीला ने कहा,“उसमें हमें बैठने देंगे?अफ़सर होंगे सब...”
“आखिर तो मुसलमान होंगे - बैठने क्यों न देंगे?”
“हाँ,आखिर तो अपने भाई हैं।”

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर।अमिना,जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं।उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी...

तीनों के स्वामी बाहर थे- दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे - उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा!

सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी,उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी।अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे;जमीला का खाविन्द शादी के बाद ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये चार बरस हो गये थे।

अब... तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं,और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक... न जाने कब क्या हो - और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है,अभी उन्होंने देखा ही क्या है?

सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी,सो अब वह भी नहीं,न जाने कब क्या हो...अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही...

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई,और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना,सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था,एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली।जो कुछ गहना-छल्ला था,वह ट्रंक में अँट ही सकता था,और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे।और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, “वह उधर ज़नाना है!” - और तीनों उसी ओर लपकीं।
ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं,दो की गोद में बच्चे थे।एक ने डपटकर कहा, “हटो, यहाँ जगह नहीं है।”

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, “बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे - मुसीबत में हैं...”

“मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ,आगे देखो...”
जमीला ने कहा, “इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।”

“जाना है तो जाओ,थर्ड में जगह देखो।बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!”और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर,उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा।बोली, “इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं...”

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया।उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं,पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे,नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा,“तो बुला लो न गार्ड को।आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।”

“जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न!कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल,ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है,पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि...” एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, “भैया!ओ अमजद भैया!देखो ज़रा,इन लोगों ने परेशान कर रखा है...”

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये।चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले,“क्या है?”

“देखो न,इनने तंग कर रखा है।कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं।कहा कि स्पेशल है,सेकंड है,पर सुनें तब न।और यह अगली तो...”

“क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-”

जमीला ने कहा, “क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के लोग ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं,पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और...”

“और टिकट?”

“और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?”

अमिना ने कहा, “मुसीबत के वक्त मदद न करे,तो कम से कम और तो न सताएँ!हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? -

हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर - या अल्लाह!”

“अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?”

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाकलर चिकटनी खोले,दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें।

जिधर जमीला थी,उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, “खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को...

सकीना ने तड़पकर कहा, “कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया...”

“बड़ी पाक़दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच भागकर जा रही हो, आखिर कैसे?

उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने...”

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, “छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!”

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, “या अल्लाह!”

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, “थूः!” और क्षण-भर बाद फिर, “थूः!”

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, “गयी पाकिस्तान स्पेशल।या परवरदिगार!”
                                    (इलाहाबाद,1947)

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

जनेऊ (कहानी): सुशील कुमार भारद्वाज

जनेऊ  (कहानी)
सुशील कुमार भारद्वाज



रात में लोग सारी चिंताओं को दरकिनार कर सिर्फ गहरी नींद में सोना चाहते हैं. दिनभर की शारीरिक और मानसिक थकान को बिस्तर में ही छोड़ एक नई ऊर्जा के साथ नई सुबह में नई जिंदगी नए तरीके से शुरू करना चाहते हैं. लेकिन यह सुख आज मालिनी के नसीब में नहीं है. आँखों से नींद रूठ गई है. क्योंकि आज जिंदगी उसे धूल भरे अतीत के पन्नों में झाँकने के लिए मजबूर कर गई है. उस अतीत के पन्ने को, जिसे वह छूना नहीं चाहती है. वह तो सिर्फ हर गुजरते हुए दिन के साथ आगे ही बढना चाहती है. लेकिन आज वह बेबस है. उसकी सारी बुद्धि नाकाम हो गई है. वह लोगों पर हँसती थी कि सोने के लिए दवाई खाने की क्या जरूरत है? देह्तोड़ मेहनत तो करो! फिर देखो, नींद कैसे आती है. लेकिन पति से नींद की गोली मांगकर खाने के बाबजूद भी उसे आज नींद नहीं आ रही है. उसे सिर्फ याद आ रही है सुबह की घटना, जब वह सिर्फ असहाय मूरत बनी बैठी रही. गालियाँ सुनती रही. अपमानित होती रही. आज तक किसी ने उससे तेज आवाज में बात करने की हिमाकत नहीं की. हाथ उठाना तो बहुत दूर की बात थी. लेकिन आज प्रेम ने घर में घुसकर वह सबकुछ कर दिया जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की थी. उसकी चोटी खींचकर प्रेम ने कुर्सी में बैठा दिया था और वह कुछ न कर सकी जबकि कॉलेज में विद्यार्थी कौन कहे? किसी प्रोफेसर की भी हिम्मत उससे बात करने की नहीं होती थी. और यह सब होता रहा उसके पति के सामने. वह पति जो रिटायर्ड प्रोफेसर ही नहीं है बल्कि राज्य में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा प्राप्त पदाधिकारी भी है. कई आयोग का मेम्बर भी है. आखिर क्या हो गया पद, पैरवी और पैसा का? लोग तो कहते हैं कि धन और शानोशौकत की हवा में जाति –धर्म का बैरियर टूट जाता है. लेकिन आज वह अपनी जाति की ही वजह से पिटता रहा. दनादन थप्पड़ खाता रहा. क्या वह सिर्फ जाति का ही असर था जिसके भरोसे प्रेम सबकुछ आसानी से कर गया? हां. शायद वह सवर्णवादी मानसिकता ही थी जिसके आगे एक दलित का इज्जत रिरियाता हुआ नज़र आया. मालिनी को नज़र आया वह कच्चा-सुता जिसे ‘जनेऊ’ कहा जाता है. जिसकी सौगंध खाकर वह एक-एक शब्द बोल रहा था. मालिनी की आँखें फटी की फटी रह गई. लग रहा था जैसे उस जनेऊ के एक-एक धागे से असंख्य अदृश्य किरणें निकल रही थीं जिसने उन दोनों दम्पतियों को जकड़ रखा था. बेबस और लाचार कर रखा था. और प्रेम घंटे भर के तमाशे के बाद शांति से बगैर कोई खरोंच लिए–दिए वहां से चला गया.
मालिनी को याद आने लगी 5 जून 1974 का वह दिन– जब चिलचिलाती गर्मी से बेपरवाह लोग राज्य के सुदूर इलाके से पटना आए थे. दोपहर के बाद चार लाख से अधिक लोग गाँधी मैदान में जमा हो गए थे सिर्फ और सिर्फ जेपी को सुनने के लिए. सम्पूर्णक्रांति का साक्षी बनने के लिए. उस क्रांति का साक्षी बनने के लिए जिसका उद्देश्य सिर्फ इंदिरा गाँधी की सरकार को गिराना नहीं था. बल्कि इसी बहाने राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति को सम्पूर्ण क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना था. वर्षों से चली आ रही जड़ हो चुकी परम्पराओं को तोड़ कर एक नया समाज बनाना था. जात-पात, तिलक, दहेज और भेद-भाव छोड़ने का संकल्प लेना था. उस महायज्ञ की साक्षी मालिनी भी बनी थी. खचाखच भरे गाँधी मैदान के पूर्वी छोड़ पर वह अपने प्रोफेसर के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. देख रही थी क्रांति के विस्फोट को. देख रही थी अद्भुत दृश्य को. लाखों की संख्या में लोग अपना जनेऊ तोड़ रहे थे और नारे से गाँधी मैदान गूंज रहा था- 
"जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।
समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो।"

स्वतंत्रता सेनानी जय प्रकाश नारायण अपनी दुनियां में खोए हुए थे भले ही उनके बारे में अफवाहें फैलती रहती थी. कांग्रेस पार्टी तो अक्सर उन्हें अपने निशाने पर ही रखती थी. शायद उन्हें तख्तापलट कर डर उन्हीं से सबसे ज्यादे था. जब विश्विद्यालयों में गिरते शिक्षा स्तर पर चिंता जताते हुए कुछ विद्यार्थियों ने आंदोंलन का नेतृत्व करने का आग्रह जेपी से किया तो उन्होंने भी कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमती दे दी. उन्हें भी अपने ऊपर लगे आरोपों का जबाब देने के लिए एक मंच मिल गया था. लेकिन इस आंदोलन ने जिन किसी की भी जिंदगी बदली उनमें से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी एक थे. वे दोनों अलग–अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के होने के बाबजूद एक होते चले गए. प्रोफेसर साब भी पूरे दिल से मालिनी को अब श्रृंगार रस पढ़ाते-पढ़ाते श्रृंगार रस में डुबोने भी लगे थे. मालिनी को भी इस रस का ऐसा स्वाद लगा कि माता-पिता से जिद्द कर पहले वह होस्टल में रहने लगी फिर बेरोक-टोक सैदपुर में अकेले रह रहे प्रोफेसर के घर भी आने-जाने लगी. बात ऐसी नहीं थी कि प्रोफेसर साब अकेले थे. उनके पीछे उनकी पत्नी, दो बच्चे और माता-पिता गंगा के उस पार उत्तरी बिहार के एक छोटे से गाँव में किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे. लेकिन उन्होंने हमेशा स्वयं को सबके सामने कुँवारा ही बताया. वो तो महज एक संयोग था कि मालिनी ने प्रोफेसर साब को रंगे हाथों पत्र पढ़ते पकड़ लिया तो राज खुला कि पिताजी ने घर बुलाया है -पत्नी की तबीयत बहुत खराब है. भूचाल आ गया था उसदिन. जिसे शांत करने में प्रोफेसर साब को पसीना छूट गया था. और मालिनी ने ऐसी चुप्पी साध ली थी कि प्रोफेसर साब की सारी बुद्धि रिरियाती नज़र आई. अंत में अपनी बात साफ़ –साफ़ कहने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा उनके पास - "अच्छा तुम्हीं बताओं कि इसमें मेरी क्या गलती है? बारह साल कोई शादी की उम्र होती है?.... और शादी के कुछ ही दिनों के बाद तो वह अपने मायके चली गई... मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी, तब जाकर कहीं ससुराल गया... वह भी कुछ ही दिनों के लिए. और बाद में पता चला कि मैं बाप भी बन गया. जिंदगी इतनी जल्दी बदलती चली जाएगी मुझे नहीं पता था. जबकि वो मेरे साथ कभी रही ही नहीं तो फिर मैं क्यों मान लूँ कि वो मेरा ही संतान होगा जबकि वो तो कईयों से हंसी–ठिठोली करती है. ऊपर से शक्ल न सूरत. मुझे तो घिन आती है. न रहने-सहने का सऊर न बोलने-चालने का ढ़ंग. पूरा का पूरा गोबर का चोथ. वो तो घरवालों की बात थी कि उसे घर में लाकर बैठा दिया हूं. और जब कभी घर जाता हूँ तो मजबूरी में उसके साथ सो लेता हूं. वर्ना कहाँ मैं प्रोफेसर और कहाँ वो अनपढ़ गँवार देहाती औरत... कहती है मैं ही उसका देवता हूँ जैसे मैं रखूँगा वैसे ही रहेगी. दोनों बेटे के सहारे ही वह पूरी जिंदगी गुजार लेगी. लेकिन मैं तो नहीं न गुजार सकता? सभा-सोसायटी में कैसे मैं उसे ले जा सकता हूँ? इज्ज़त-प्रतिष्ठा भी कोई चीज होती है कि नहीं?" 
इतना कुछ बोलने के बाबजूद भी मालिनी सिर्फ हूँ-हां करके वहां से चली आई. और कई दिनों तक वह प्रोफेसर साब से मिली तक नहीं. अपने कमरे में ही सिमटी रही. दुनियाभर की चिंताओं से घिरी रही. दुनियादारी और झूठ-फरेब की कहानियां पढ़ती और सुनती रही. सच और झूठ की परिभाषा खोजती रही? अपने जीवन की चिंता में वह गलती रही. जिसके प्रेम में घरवालों से लड़कर अलग हुई वही झूठा निकला तो वह किस पर भरोसा करे? कष्टकारी मानसिक द्वंद्व के बाद वह अपने घर लौटने की बात सोचने लगी. अभी तक घरवालों को कोई विशेष जानकारी इस रिश्ते की नहीं थी. सोचने लगी -पता नहीं बाद में क्या होगा? जब वह माँ से घर लौटने की बात की तो माँ बहुत डर गई. किसी अन्होनी के डर से उसका आवाज थरथराने लगा. उसकी कुशलता जानने के लिए तरह –तरह के सवाल कुरेदती रही लेकिन वह जबाब इतना ही देती रही कि “अब आगे कॉलेज करने की विशेष जरूरत नहीं है. वह सीधे परीक्षा में बैठ सकती है. फिर फिजूल में घर से बाहर क्या रहना?” अंत में माँ बोली- “पापा से बात करती हूं. जल्द ही तुम्हें वापस लिवा लावेंगें”. मालिनी को कुछ तसल्ली मिली. वह अपना सामान समेटने में लग गई. हर गुजरते दिन के साथ उसका दर्द नासूर बनके चुभता था. जिंदगी में सबकुछ उसे बेकार लगने लगा. बरसता हुआ हर बारिश का बूंद उसे पिघलता हुआ घाव नज़र आता था. एक दिन उसके पिता आए और कागजी खानापूर्ति करने के बाद उसे अपने साथ वापस घर ले गए. होस्टल छोड़ने के पहले वह अकेले में खूब रोई. खुद को खुद ही दिलासा देती रही. और सबकुछ भूलकर एक नई जिंदगी जीने का प्रण करती रही. कभी दुबारा प्रोफेसर का नाम नहीं लेने का प्रण करती रही. लेकिन कभी उसके मुँह से प्रोफेसर के लिए बददुआ नहीं निकली. चेहरे के भावों को नियंत्रित करना सीख गई थी लेकिन दिल और दिमाग के अंदर मचे कोहराम कभी उसे चैन से नहीं रहने देते थे. घर में अक्सर अपनी चंचलता से धमाल मचाने वाली मालिनी अब वह नहीं रही. जिंदगी को स्वीकारना सीख गई थी. गिला-शिकवा करना भूल गई थी. कम बोलना सीख गई थी. जिंदगी में सुखी रहने का मंत्र- कम खाना, गम खाना और कम बोलना सीख गई थी. लेकिन एकांत में कभी-कभी खूब रोती थी. कभी-कभी वह प्रोफेसर के साथ बने अपने रिश्ते पर खुद ही हँसती भी थी. कहती- “जिंदगी में एक प्यार भी नसीब नहीं हुआ. मिला भी तो शादीशुदा बाल-बच्चों वाला एक प्रोफेसर!”.
जब कभी घरवाले उससे पूछते -"सबकुछ ठीक तो है न? इतनी शांत क्यों रहती हो? देह गलते जा रहा है. खुद पर ध्यान दिया करो. सिर्फ पढ़ाई–लिखाई से ही सबकुछ नहीं होता है....." तो बीच में ही उनलोगों की बात काटते हुए साफ झूठ बोल जाती- "होस्टल में अकेले रहने की आदत पड़ गई है न! एकांत ही अच्छा लगता है. क्या और क्यों किसी से बेकार में बकबक करूँ?"  घरवाले उसके जबाब पर कंधा उचकाते और मुँह बनाते हुए शांति से आगे बढ़ जाते.
उस दिन जब मालिनी परीक्षा फॉर्म भरने विश्वविद्यालय पहुंची तो प्रोफेसर दरवाजे पर ही दिख गए. मालिनी का चेहरा अचानक अजीब तरीके से खिल उठा. लगा जैसे बहुत बड़ी खुशी मिल गई हो. लेकिन पल भर में ही वह संयत हो गई. नजर दायें-बायें घुमाकर शांत भाव से आगे बढ़ गई. मालिनी के इस व्यवहार से विचलित हो प्रोफेसर चक्कर पर चक्कर लगाने लगा ताकि वह उससे एकांत में बात कर सके. और जब विभाग के अंदर एक बार मौका मिला तो बेचैन हो- "तुम्हारा ये व्यवहार मुझे कुछ समझ नहीं आया? तुम होस्टल छोड़कर भी चली गई बिना कोई सूचना दिए?"
-"मुझे आपसे पूछकर कोई काम करनी चाहिए? कौन होते हैं आप मुझसे सवाल करनेवाले?"  -मालिनी ने सख्त आवाज में जबाब दी.
इस अप्रत्याशित जबाब से पहले तो प्रोफेसर साब बुरी तरह उछल पड़े. चेहरे का भाव बदल गया. फिर खुद को नियंत्रित करते हुए- "आप जो कुछ भी कह रही हैं वह शायद सही ही कह रही हों. लेकिन मुझे लगता है कि आपको एक बार मुझसे बात करनी चाहिए. भावना में बहकर लिया गया कोई भी निर्णय सही नहीं होता है. शांति से एक बार विचार करने में कोई बुराई नहीं है. कोई जोरजबर्दस्ती की बात तो है नहीं." 
- "झूठ-फरेब पर बने रिश्ते की ईमारत ठहरती ही कितनी देर है जो आगे कुछ बात करूँ?"- सख्ती से मालिनी बोली.
शांतभाव से अपनापन दिखलाते हुए प्रोफेसर- "अभी जो कुछ भी तुम बोलोगी मैं सुनने को तैयार हूँ. तुम्हारे सारे गुस्से को झेलने के लिए तैयार हूँ. यदि तुम हाथ भी चला दोगी तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा क्योंकि मैं तुम्हारे अंदर चल रहे दर्द को महसूस कर सकता हूँ. तुम्हारी जगह कोई और भी होती तो शायद वो भी ऐसे ही पेश आती.”
इतना सुनते ही मालिनी का चेहरा रूआंसा हो गया और वह फुट फुट कर रोने लगी. प्रोफेसर ने जेब से रूमाल निकालते हुए मालिनी की ओर बढ़ाया और कंधे पर थपकी देते हुए शांत रहने के लिए कहा -"हिम्मत से काम लो. ऐसे बच्चे की तरह नहीं रोते. मैं तुम्हारे साथ हूँ न! फॉर्म का काम कर लो तो मैं तुम्हारे साथ गंगा किनारे चलता हूँ. वहीं आराम से बातें होगीं. फिर जो उचित लगे वही करना." 
मालिनी फॉर्म भरकर चुपचाप विभाग के आगे खड़ी हो गई. विभाग में तब तक कई और प्राध्यापक भी आ चुके थे. प्रोफेसर साब अपना बैग ले अपने साथियों से कुछ कहकर वहां से निकल पड़े. वे दोनों भीड़भाड़ वाले अशोक राजपथ पर कुछ दूर चलने के बाद दरभंगा हाउस की ओर मुड़ गए.

गंगा के तट पर स्थित दरभंगा हाउस यूं तो अब पटना विश्वविद्यालय का ही हिस्सा है जहां कई विषयों की पढ़ाई होती है लेकिन वर्षों पहले यह दरभंगा महाराज का निवास स्थान हुआ करता था. राज शासन के सिलसिले में अक्सर पटना आने वाले महाराजा रामेश्वर सिंह जितने ख्यातिप्राप्त शासक थे उतने ही बड़े तांत्रिक भी थे और दक्षिणेश्वर काली के उपासक भी. अपनी आदत के अनुसार उन्होंने ईमारत के उत्तरी हिस्से में दक्षिणेश्वर काली की मंदिर भी बनवाई जिसमें पहले तो सिर्फ राजघराने के लोग ही पूजा किया करते थे लेकिन बाद के वर्षों में इस मनोकामना सिद्धि मंदिर को सार्वजनिक कर दिया गया. जहां अक्सर पूजा करनेवालों की भीड़ लगी रहती है. और दरभंगा हाउस में पढ़ाई करने वाले भी जब-तब निर्मल गंगा को निहारने घाट किनारे पहुँच जाते हैं.
लेकिन जब वे दोनों दरभंगा हाउस के राजा और रानी ब्लॉक के बीच से निकले रास्ते से गुजरते हुए गंगा किनारे पहुंचे तो काफी शांति थी. गंगा अपने विशाल पेट में ठंढ़ी हवाओं के साथ बह रही थी. मालिनी गंगा के पानी को देखते हुए प्रोफेसर के साथ घाट किनारे एक पत्थर पर बैठ गई तब प्रोफेसर ने कहना शुरू किया -"मालिनी! बातचीत का कोई न कोई तो सिरा होना ही चाहिए. लेकिन दु:ख इस बात का है कि पता नहीं -मेरी कौन-सी बात तुम्हें सच लगेगी और कौन-सी तुम्हें काँटे की तरह चुभेगी जो तुम्हारे गुस्से को और बढ़ा दे. ...... लेकिन मैं क्या करूँ? सच को कहीं न कहीं तो बयां करना ही होगा." मालिनी का हाथ पकड़ते हुए -"देखो! ये सच है कि मेरी शादी हो चुकी है. मेरे दो बच्चे हैं. लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं है. मेरे लिए वे सिर्फ और सिर्फ बंधन के रिश्ते हैं जिसे मुझे निभाना ही पड़ेगा अब चाहे जैसे भी हो. लेकिन जिनसे मुझे कोई सुख ही नहीं उसका ढ़िंढ़ोरा क्यों पीटूँ और किस-किस के पास पीटूँ?  उससे फायदा ही क्या मिलना है? यदि तुम मेरे इतने पास नहीं होती और मेरे घर नहीं जाती तो क्या तुम मेरे बारे में यह सबकुछ जान पाती? नहीं ना? हर इंसान का अपना दर्द होता है. हर दुखी इंसान अपने टूटे सपनों को दिल में दबाकर अंधेरी रात में रोता है. तकिये को गीला करता है. मेरे भी कुछ सपने हैं. मैं कब तक समझौता करूँ? कब तक मैं खुद को तिल-तिल कर मारता रहूँ? क्या मैं इंसान नहीं हूँ? मुझे अपने तरीके से जीने का हक नहीं है? मैं क्यों माता-पिता से मिले सामाजिक रिश्ते के बंधन की गुलामी करूँ? और ऐसा तो कहीं नहीं लिखा है कि पुरूष दूसरी शादी नहीं कर सकता? मेरी एक पत्नी गाँव में रहे पैतृक सम्पत्ति पर हक जमाए. खाए-पीए और जिए. लेकिन तुम्हें मैं अपने साथ रखने के लिए तो तैयार हूँ. तुम पढ़ी-लिखी हो, मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती हो. तुम्हें सभा-सोसाइटी में ले जाने में मुझे कोई हिचक तो नहीं. बच्चे जन्माना और उसी की परवरिश में जिंदगी गुजार देना ही सबकुछ तो नहीं? पढ़ाई का सदुपयोग करना. जीवन को समृद्ध करना. अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना भी जरूरी है. जन्म लेने वाला हर जानवर भी अपनी मौत तक के सफर को किसी न किसी तरीके से तय कर ही लेता है फिर मनुष्य और जानवर में फर्क ही क्या रह जाता है? यूं भी प्रेम में त्याग का महत्व है स्वार्थ का नहीं. फिर भी मेरे नौकरी के पैसे पर तुम्हारा हक रहेगा. पेंशन-अनुकम्पा आदि की सारी सुविधाएं तुम्हें दे सकता हूँ. अपनी पहुँच के सहारे तुम्हारे उज्जवल भविष्य के लिए जो कुछ भी संभव होगा, करने को तैयार हूं...... और तुम्हीं बताओ कि एक इंसान को किसके साथ रहना चाहिए जिससे प्रेम हो या जिससे सिर्फ सामाजिक बंधन का रिश्ता हो?"
- "सबकुछ मानती हूँ लेकिन झूठ का क्या?
- "मैनें झूठ कब बोला? तुमसे मैंने कब और क्या कहा? तुम मुझसे कभी कुछ पूछी जिसका जबाब मैंने नहीं दिया या आनाकानी की? तुम  इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार होकर भी मूर्खों की तरह बात करती हो? कान देखने की बजाय कौआ को देखती हो? लोग तो बहुत कुछ कहते हैं लेकिन वही तो सच नहीं होता? अब विशेष क्या कहूँ? तुम बच्ची तो हो नहीं? अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो. मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि -जिंदगी में तुम्हारा साथ मिल जाए तो बहुत ही खुशी होगी और मैं चाहूँगा कि तुम भी अपने पैरों पर खड़ा हो अपनी एक पहचान बनाओ..........." 
प्रोफेसर साब अपनी बात पूरी कर पाते उससे पहले ही एक झटका लगा. लगा जैसे किसी ने उन्हें गंगा में धकेलने की कोशिश की हो. मालिनी अचानक हुए हमले को समझ पाती उससे पहले ही उसकी नजर प्रोफेसर की गर्दन पकड़े अपने चचेरे भाई पर गई, जो दरभंगा हाउस में ही पीजी की पढ़ाई कर रहा था. किसी तरह उसकी नज़र इन दोनों पर पड़ी और और वह आक्रामक रूप में अपने साथियों के साथ आ धमका. मालिनी कुछ सोच पाती. कुछ कह पाती उससे पहले ही वे लोग प्रोफेसर चौधरी को पीटते पीटते घाट से सड़क तक ले गए. मालिनी अवाक् होकर सिर्फ सारा तमाशा देखती रह गई. बहुत ही कम समय में पूरा नज़ारा ही बदल गया. प्रोफेसर चौधरी सड़क पर बेल्ट से मार खाता रहा. माँ –बहन की गाली सुनता रहा. हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता रहा. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था अशोक राजपथ पर. एक भीड़ थी जिसके लिए यह सब तमाशा था. कॉलेज के बच्चे थे जिनकी नज़रों में वे चरित्रहीन थे. जो इसी के लायक थे. वो तो शुक्र था कि उधर से थाना की गाड़ी गुजरी और मजमा समाप्त हुआ. प्रोफेसर साब को पीएमसीएच में ईलाज के लिए भर्ती करवाया गया.
उस घटना के बाद से मालिनी का घर से निकलना भी लगभग बंद हो गया. वो सिर्फ भाई के बाईक पर ही बैठकर पटना साईंस कॉलेज में परीक्षा देने आती थी. लेकिन परीक्षा के आखिरी दिन मालिनी का भाई बाहर में इंतजार ही करता रह गया लेकिन मालिनी वापस नहीं आई. वह पूरे कॉलेज में एक-एक कोना ढ़ूंढ आया लेकिन वो नहीं मिली. घर में सब परेशान थे कि आखिर जवान लड़की चली कहाँ गई? घरवालों ने शक के आधार पर प्रोफेसर को ढ़ूढ़ना शुरू किया तो पता चला कि वह तो एक सप्ताह पहले ही छुट्टी लेकर चार वर्षों के लिए अवैतनिक अवकाश पर चला गया है. निराश हो घरवालों ने थाना में सिर्फ गुमशुदगी की एक रपट लिखवा दी, और समाज में अपनी इज्ज़त बचाने के लिए तरह-तरह की कहानियां गढ़ ली.
कोई चार वर्षों के बाद मालिनी फिर पटना में दिखाई दी. तब तक काफी कुछ बदल चुका था. वह प्रोफेसर के साथ शादी के बंधन में बंध चुकी थी तो अपने परिवार से सारे रिश्ते खो चुकी थी. पिता ने शर्म से आत्महत्या कर ली थी तो माँ बिखरते परिवार की चिंता में बिस्तर पकड़ चुकी थी. बीपी के कारण दो बार पैरालाइसिस का अटैक हो चुका था. छोटी बहन की शादी की बात बार-बार बिगड़ जा रही थी. भाई ने धमकी दे रखी थी कि घर में यदि किसी ने मालिनी से कोई संबंध रखा तो वह भी बाबूजी की तरह मौत को गले लगा लेगा. बच ही क्या गया था? भाई अक्सर कहता था – “जमींदार घराने की लड़की होकर भी उसने कोई लाज-लिहाज नहीं की. एक चौधरी के साथ चली गई. जिसका छुआ घर में कोई खाता तक नहीं उस अछूत को अपने हाथों खाना बनाकर खिला रही है. छी: छी:... अपनी राजनीति चमकाने के लिए गांधी मैदान में बूढ़े जेपी ने जनेऊ तोड़ने का नारा दे दिया तो क्या हम अपना संस्कार भूल जाएंगे? नेता का क्या है? वह तो डोम-चमार के घर भी जाकर खा लेता है. तो क्या हम भी वही काम कर लें?.......समानता का मतलब क्या है? अपना संस्कार छोड़ देना? दूसरे को अपनी तरह उन्नत बनाने की बजाय खुद को ही अवनत कर लेना? नैतिकता की तिलांजलि दे अनैतिकता को ग्रहण कर लेना? प्रोफेसर से शादी कर लेना? वह भी शादीशुदा और दो-तीन बच्चों के बाप से? क्या यही संस्कार है? वाह रे जेपी! बहुत खूब कहा तुमने भी.”
हाँ, अनैतिकता के सहारे कितनी नैतिकता की बात की जा सकती है? जैसे सत्ता पाने वाले नेता लूट-खसोट में जुट गए. आरक्षण की आड़ में जातिवाद का नंगा नाच कर गए. वैसे ही कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ाई की जगह चोरी-चमारी को प्रोत्साहित कर गए. तब न शान से बच्चे परीक्षा में चोरी करते थे. और कहते थे- 
"चोरी की सरकार है
चोरी ही अधिकार है."

वैसे भी जेपी को कोई कितना और क्यों दोष दें? चाल तो चालबाज नेताओं ने चली जो एक बुजुर्ग होते स्वतंत्रता सेनानी को अपने नापाक मंसूबों को फलीभूत करने के लिए इस्तेमाल कर लिया.


मालिनी प्रोफेसर के साथ एक नई दुनियां में रहने लगी. लेकिन दुर्दुराने वालों की भी कमी नहीं थी. उसे दुःख तो तब होता था जब अपना काम करवाने के लिए लोग अच्छी –अच्छी बात बोलकर आ जाते थे और काम होते या बिगड़ते ही जाति-सूचक गाली भी देते थे और मुफ्त की सलाह भी. इन सब से परेशान हो उसने लोगों से मिलना छोड़ दिया. सामाजिक आयोजनों से दूर रहने लगी. खुद को कमरे तक सिमटती चली गई. अब वह सिर्फ खुद को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ाई करने लगी. परिवार में पति-पत्नी के अलावे तीसरा कोई था भी तो नहीं. शुरू में मालिनी को बच्चे की इच्छा नहीं थी जिसकी वजह से वह बार-बार गर्भपात करवाती रही और बाद में डॉक्टर ने ही जबाब दे दिया. बाद में तो, वो एक कुत्ता भी पाल ली और उसी के सहारे एकांत में मन बहलाने लगी.
वर्षों बाद जेपी के सिपाही जब राज्य में सत्तारूढ़ हो गए तो राजनीतिक फायदा प्रोफेसर चौधरी को भी मिला. विश्वविद्यालय में वह विभागाध्यक्ष तो बने ही विभिन्न कमेटियों के भी सदस्य बने. और जब राज्य में व्याख्याताओं की बहाली होने लगी तो मालिनी को भी एक नौकरी किसी तरह मिल ही गई.
लेकिन माँ की मृत्यु होने पर लगभग 25 वर्षों के बाद जब मालिनी अपने घर गई तो काफी कुछ बदल चुका था. न घर वैसा था न घरवाले. रिश्तों की गर्माहट में उतार-चढ़ाव इतना अधिक था कि वह समझ नहीं पा रही थी कि वह वहां आकर खुद को सम्मानित महसूस कर रही है या अपमानित. भाई के खस्ताहाल घर में वह बहुत कुछ मदद करना चाह रही थी लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं था. मीठी बातों में फंसा सारी मदद वापस कर दी जा रही थी. बहनों ने शुरू में, एक लम्बें अरसे बाद मिलने पर बहनापा दिखलाया था. लेकिन एक-दो दिन के बाद ही उस व्यवहार में भी कहीं-न-कहीं रूखापन आ गया. रिश्तों की गर्माहट और आत्मीयता क्षीण होती लगी. नकली मुस्कुराहट, जरूरत से ज्यादे मिलता भाव कहीं न कहीं उसके मन को कचोट रहा था. कुछ भी स्वाभाविक नहीं लग रहा था. कभी–कभी तो लगता था कि घर का एक–एक कोना उसे धिक्कार रहा है. पिताजी की कराहें सुनाई पड रही हो. पिताजी की तस्वीरों में उनका निराश चेहरा नज़र आता था. भाई के बच्चे थे तो बहनों की भी छोटी–बड़ी कई संताने थीं. सभी अपनी माँओं को दुलारती, फुसलाती, झगड़ती थी लेकिन मालिनी के आते ही सब शांत हो जाते थे. कोई मालिनी के पास बैठना नहीं चाहता था. कभी वह बच्चों से अपनापन दिखलाने के लिए रुपए देने की कोशिश करती तो न बच्चे लेते न उनकी माँ लेने देतीं. बच्चों में इस नए रिश्ते के प्रति कोई खास दिलचस्पी भी नहीं थी. सिर्फ शिवानी कभी-कभार उससे दो-चार बातें कर लेती थी. शिवानी उसकी सबसे छोटी बहन की बेटी थी. शिवानी अपने माता-पिता के साथ गाँव में ही रहती थी क्योंकि उसकी माँ की शादी सुदूर गाँव में हुई थी. मालिनी के प्रोफेसर से शादी कर लेने के बाद जो सबसे बड़ी समस्या आई थी वह थी शिवानी की माँ की शादी. सारी कोशिश और अधिक दहेज देने के लिए तैयार रहने के बाबजूद उसके रिश्ते को किसी अच्छे परिवार में संस्कार और जाति के नाम पर स्वीकार नहीं किया गया था. भाई रिश्ते की तलाश करते करते थक कर बैठ गया था. वो तो दूर के एक रिश्तेदार ने गाँव में ही किसी बेरोजगार से शादी कर देने का प्रस्ताव दिया, जो कि माँ को जँच गई और घर के सारे सदस्यों के इच्छा के विरूद्ध जाते हुए शादी करवा दी. आस-पास के कई लोगों ने भी माँ को समझाने की बहुत कोशिश की. लेकिन माँ कहती रही- "मेरे मर जाने के बाद इसे कौन देखेगा? भाई-भतीजे के भरोसे कैसे छोड़ दूँ? शादी हो जाएगी तो कम से कम अपने घर में तो रहेगी? कहने को उसे भी तो अपना एक घर-परिवार होगा? दु:ख की घड़ी में मुझे ताना तो नहीं देगी? बेरोजगार है लड़का, गरीब तो नहीं? खेतीबाड़ी से कम-से-कम पेट तो पाल सकता है? बाँकी नसीब को कौन जानता है? पढ़ी-लिखी है. कोई ढ़ंग की नौकरी-चाकरी देख ले. फिर शहर में ही रहे न? कौन उसे मना करता है?  अब किसी की गलती की वजह से दूसरे की जिंदगी बर्बाद तो नहीं की जा सकती न? जो हो गया उसके लिए रोने से क्या मिलेगा? जो संभव है. वश में है. वही क्यों नहीं किया जाए?"
शिवानी मौसी से दस दिन में ही इतनी घुलमिल गई कि मालिनी जब उसे अपने पास कुछ दिन रखने की बात कही तो वह बहुत खुश हो गई. माँ-बाबू जी से मौसी के पास रहने की जिद्द करने लगी. शिवानी के पिता उसके जिद्द के सामने झुक गए और वह मौसी के साथ रहने लगी.
शिवानी को तो खुला राज मिल गया था. दस बजे तक मौसा-मौसी कॉलेज चले जाते थे और वह बंद कमरे के अंदर या तो दिनभर सोती थी या दिनभर टीवी देखती रहती थी. खाने-पीने की भी पूरी छूट थी. शाम में मौसी कुछ -न-कुछ हमेशा लेती ही आती थी. कभी-कभी उसे अकेले में डर भी लगता था लेकिन यहाँ पर उसे मन लग गया था. न भाई से लड़ना न माँ की मार. जब शिवानी अपने पिता के साथ अपने गाँव उत्तर बिहार जाने को तैयार नहीं हुई तो मौसी उसका नाम पास के ही स्कूल में लिखवा दी. अब तो लगभग तीनों एक ही साथ घर से निकलते और शाम में एक ही साथ लौटते थे.
समय कब निकल गया पता ही नहीं चला? शिवानी कॉलेज में पहुंच गई. उसके शरीर ही नहीं मन में भी बहुत बड़ा बदलाव आ गया. बचपन से मिली स्वतंत्रता ने उसके विचारों को भी स्वच्छंद बना दिया. उसे तो अब मौसी की बात भी अच्छी नहीं लगती थी. उसे ब्वॉयफ्रेंड से घंटों बात करने पर रोकटोक करना बिल्कुल पसंद नहीं था. लेकिन मौसी परेशान थी कि लड़की दिनभर ऑरकुट-फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में लगी रहती है. जाने किस-किस जान-अंजान से दिन भर चैट करती रहती है. सिगरेट और शराब की बोतल जिस दिन कॉलेज से लौटने के बाद मौसी डाईनिंग रूम में देखी उस दिन उसके आँखों के आगे अंधेरा छा गया. सदमे से वह एक ही जगह खड़ी की खड़ी रह गई. सिर्फ उसके आंखों से आंसू बहने लगे. लगा जैसे लड़की उसके हाथ से निकल चुकी है. उसके पीठ पीछे अब घर में क्या-क्या होता है? कहना मुश्किल. और शिवानी के मुँह से जब शराब की गंध आ ही रही थी तो विशेष शक-सुबहा की बात ही कहाँ शेष रहती है? कॉलेज जाने के बदले शिवानी कहाँ किसके साथ घूमती रहती है? कौन जानता है? अब वो ये बात किससे कहे? कितनी बदनामी होगी? लोगों को कहते देर न लगेगी कि दूसरे की लड़की को बिगाड़ दी? अपने स्वार्थ में बर्बाद कर दी?  मालिनी को अपने कॉलेज के दिन याद आने लगे. उसका शरीर ऊपर से नीचे तक कांपने लगा कि -क्या यह लड़की मेरी ही तरह घर में बागी बनेगी? घर-परिवार के इज्ज़त को आग में झोंकेगीमेरी ही तरह जिंदगी भर कष्ट भोगेगी?
मालिनी का चेहरा सख्त हो गया - "नहीं, नहीं! मेरे जीते जी तो शिवानी अब दूसरी मालिनी नहीं बन सकती है. मैं अपने ऊपर अब दाग नहीं ले पाऊँगी. मैं इसकी शादी यहीं कहीं करवा दूँगी अपनी बेटी कहकर. क्योंकि अब ये ग्रामीण परिवेश में निर्वाह नहीं कर पाएगी और सारी बातें भी दब जाएंगी. शायद यही मेरा पश्चाताप भी हो. शायद सारे भाई-बहनों का प्यार इसी बहाने वापस पा सकूँ. मैं इतना किसके लिए कमाती हूँ? एक लड़की की ब्याह तक नहीं करवा सकती? इतना भी अपने बहन के लिए नहीं कर पाऊंगी तो भला ऐसी जिंदगी का क्या लाभ?"
और वह तब से एक अच्छे सजातीय लड़के की तलाश में जुट गई. कोई डेढ़ वर्ष की तलाश के बाद एक नौकरीपेशा लड़का मिला जो कम ही पैसे में शादी के लिए भी तैयार हो गया. लड़का के घरवाले उनके सामाजिक और राजनीतिक रसूख से ही प्रभावित हो गए थे. इतना बड़ा घर-परिवार और एकलौती बेटी. आज नहीं तो कल सबकुछ लड़के का ही तो हो जाएगा. और राजनीतिक संपर्क का फायदा भी कहीं न कहीं जीवन में तो मिलेगा ही. लड़का नौकरी कर ही रहा है, लड़की भी कर ही लेगी. फिर दहेज के चक्कर में क्या पड़ना? तब तक शिवानी भी थर्ड ईयर में आ चुकी थी. और मौसी के कुछ दबाब और नियंत्रण में भी. उसे भी लगने लगा कि पता नहीं उसके माता-पिता उसकी शादी किसी नौकरीपेशा वाले से करवाने में सक्षम भी होंगें कि किसी किसान के हाथों ब्याह देंगें? शिवानी को भी भौतिकवादी दृष्टिकोण से फायदा ही फायदा दिखा इसलिए भी वह मौसी के हाँ में हाँ मिलाने लगी और अपने कुछ गतिविधियों पर भी नियंत्रण करने लगी.
तीन महीने की तैयारी के बाद शिवानी की शादी हो गई. लेकिन उसे ससुराल में वह आजादी नहीं मिली जो उसे मौसी के घर मिली हुई थी. मौसी के यहां नौकरानी घर का काम करने व खाना बनाने आती थी लेकिन ससुराल में तो अचानक ही खाना बनाने, बर्तन धोने और कपड़ा धोने की जिम्मेदारी भी आ पड़ी. जिससे उसे काफी परेशानी होने लगी. ऑरकुट-फेसबुक पर लगे रहने, चैट करने या लम्बे समय तक फोन पर बात करने की वजह से भी ससुराल में अक्सर उसे ताने सुनने पड़ते थे. मामला बिगड़ता ही चला गया. और आखिरकार एक दिन शिवानी घर में हंगामा करके अपने मौसी के पास लौट आई. मौसी शिवानी को समझाने की बजाय शिवानी के ससुराल वाले को ही भला-बुरा कहने लगी. घर में नौकर आदि रखने की सलाह देने लगी. कई बार तो वह शिवानी के पति प्रेम को ही दहेज-प्रताड़ना आदि के नाम पर केस करने की भी धमकी दे चुकी थी. प्रेम को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह कहे तो क्या कहे? उसे लगने लगा जैसे उसकी जिंदगी उलझ गई हो. एक क्लर्क एक प्रोफेसर के स्टेटस की बराबरी कैसे कर सकता है? उसे तो ऐसी शादी करनी ही नहीं चाहिए थी. लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था?  जिंदगी में समझौता करने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा था उसके पास. थक-हार कर एक बार फिर से उसने जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की. शिवानी से तो कभी बात होती नहीं थी मौसी को ही उसने समझाने की बहुत कोशिश की. लेकिन मौसी जिस अंदाज में बात करती थी वह प्रेम को अंदर तक तोड़ने के लिए काफी था. और प्रोफेसर साहब! वे तो सिर्फ एक राजनेता की ही तरह घुमाफिरा कर बात करते थे. कुछ भी राफ –साफ बोलने से परहेज करते थे. प्रेम के घरवालों को भी प्रोफेसर साब आनेवाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में व्यस्तता बताकर कुछ इस तरह कन्नी काटते थे कि लगता था जैसे कि उनके लिए पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कहीं अधिक राजनीतिक जीवन ही महत्वपूर्ण हो. इतना कुछ होने के बाद लगा कि प्रेम की जिंदगी ऐसे जगह उलझ गई है जहां से बाहर निकलना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है. अब गुस्सा और विषाद के सिवाय बचा ही क्या था उसके पास? गुस्से में वह बहुत कुछ बोलता था लेकिन फिर यह सोचकर शांत हो जाता कि इसके लिए किसे दोष दूँ? माता-पिता की इच्छा से शादी की है इसलिए उन्हें दोष दे दूँ? लेकिन उन्होंने तो कभी मेरा बुरा नहीं चाहा! और आज भी वे मेरे लिए परेशान हैं. मेरी इस स्थिति के लिए उनके आंखों में भी आंसू हैं. शायद मेरी जिंदगी की नियति ही यही हो? कौन जानता है कि ईश्वर ने मेरे हिस्से में दुःख-ही-दुःख रखा हो?

और आज सुबह प्रेम मालिनी के घर अचानक ही बहुत गुस्से में आ धमका. शिवानी को खोजा तो पता चला वह शहर से कहीं बाहर दोस्तों के संग घूमने गई हुई है. उसका गुस्सा और सातवें आसमान पर पहुँच गया. उसने हाथ में लिए अखबार को मालिनी और प्रोफेसर चौधरी के सामने टेबुल पर पटकते हुए कहा– “तुम्हारी इतनी बड़ी हिम्मत कैसे हुई?... तू मेरे घर में घुसने का साहस कैसे किया था रे हरामी की औलाद?” इस अप्रत्याशित घटना से मालिनी और प्रोफेसर चौधरी की आँखें फटी की फटी रह गईं. प्रोफेसर साब जब तक कुछ समझ और बोल पाते उससे पहले ही प्रेम ने उन्हें दो थप्पड़ रशीद कर दिया. मालिनी ज्योंहि वहां से हिलने की कोशिश की प्रेम ने उनकी चोटी कसकर खींची और कुर्सी में लाकर पटक दिया. कहता रहा- “अरे रंडी! तेरी शादी नहीं हो रही थी जो इस चौधरी के लिए मर रही थी? तेरे बाप की औकात नहीं थी तेरी शादी कराने की जो इस नीच के साथ जाति भ्रष्ट कर ली और मेरी भी कर दी? आज तो तू उससे भी अधिक गुनाहगार लग रही है...” वह उसे दांत पर दांत चढ़ा कर एक से एक भद्दी गालियाँ देता रहा. लगा जैसे कोई शीशे को खौलाकर उसकी कानों में उड़ेल रहा हो. और प्रेम अपनी जनेऊ खींच, दोनों हाथों को जोड़े सौगंध खाता रहा कि वह अब शिवानी को एक पल के लिए भी अपने पास नहीं रखेगा. वह उसे तलाक दे देगा. तलाक शब्द सुनते ही मालिनी की आँखें बंद हो गईं और आंसू उसके आंखों के कोरों से बहने लगी. वह अब क्या बोल रहा था? कुछ भी उसे सुनाई नहीं पड़ रही थी. अंत में प्रेम अपने अंदर का सारा जहर उगलने के बाद शांत पड़ गया. सोफा में धंसकर बैठते हुए, मालिनी को ही आदेश देते हुए बोला – “प्यास लगी है. पानी पिलाओ.” मालिनी धीमी कदमों से उठी और एक प्लेट में मिठाई और एक गिलास में पानी लेकर सामने टेबल पर रख दी. पानी तो पी लिया लेकिन मिठाई की प्लेट को छुआ तक नहीं. और कुटिल मुस्कान के साथ उसने कहा- “आज धोखा नहीं दी होती! तो शायद ऐसा दिन देखने को नहीं मिलता. सोचा था तुम्हें कभी बेटे की कमी महसूस होने नहीं दूँगा. तुम्हें एक बेटे से भी बढकर मानूंगा लेकिन तुमने वह हक खो दिया. कितना आश्चर्य है कि तुमने इस दलित चौधरी को सामंती चौधरी बनाकर मेरे घर में घुसा दिया. तुम्हें रत्तीभर भी शर्म नहीं आई..... खैर, आज से हमलोगों का रिश्ता खत्म. मान लूँगा कि शिवानी मेरे लिए मर गई. यूं भी मेरे घर में अब उसका सामंजस्य संभव नहीं है. जल्द ही मैं तलाक के पेपर भिजवा दूँगा. तुमलोग भी शांति से रहो और मैं भी.”
प्रोफेसर चौधरी से मुखातिब हो– “प्रोफेसर साब! जिंदगी और राजनीति में बहुत बड़ा फर्क होता है. लेकिन स्वार्थी लोगों के दिमाग में ये बात आती कहां हैं? झूठ-फरेब पर खड़ा रिश्ता ज्यादे समय टिकता ही कहां है? आप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन मेरी अंतरात्मा इसे कबूल नहीं करती है. रिश्ते का आखिरी प्रणाम!” कहते हुए उसने हाथ जोड़ दिया और चुपचाप वहां से हमेशा हमेशा के लिए फिर न कभी लौटने के वादे के साथ चला गया. मालिनी और प्रोफेसर चौधरी दरवाजे से उनकों जाते देखते रह गए. लगा जैसे बहुत कुछ समाप्त हो गया. हाथ से कुछ निकलता जा रहा है. रोकने की इच्छा होने के बाबजूद वे रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. तब से मालिनी कुर्सी में जो बैठी, तो दिनभर अखबार के उस खबर को ही देखती रही जिसमें प्रोफेसर चौधरी को पासी जाति के आधार पर विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की बात छपी थी.





मंगलवार, 27 जून 2017

हिमांशी शेलत की कहानी "चुड़ैल की पीठ"

वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में स्त्री हमेशा से परिस्थितियों की शिकार होती रही है। निर्दोष होकर भी वह अपना बचाव नहीं कर पाती है। नियति और इंतजार के बाद मौत के सिवा बचा ही क्या है उसके पास? खुद को जिंदा रखने की जिद्द और दूसरों के बच्चों के सुख में ही सुखी होने की प्रवृत्ति दूसरों की नजर में खटकती जरूर है। वह डायन, चुड़ैल और पता नहीं क्या -क्या कहलाती है? ऐसी स्त्रियों से लोग अपने बच्चों को दूर रखने में ही भलाई समझते हैं। समाज में गिद्ध की नजर रखने वाले लोग अपनी पैनी निगाह से कपड़े के भीतर जिस्म में सुराख करने से भी बाज नहीं आते हैं। लेकिन जब स्वार्थलोलुप्त अंधविश्वासी समाज में खुली आँखों वाले बिना किसी नशे के ही नशे में हों तो लाल आँखों वाले नशेड़ी से क्या उम्मीद पालना? लेकिन डूबते को तो आखिरी तिनके का भी सहारा नसीब नहीं हो पाता है। आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर टूटती-बिखरती स्त्रियों को न तो ससुराल वालों से राहत मिलती है न मायके वालों से सहयोग। हर स्तर पर विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को जब समाज में सम्मान ही न मिले तो हम खुद को सभ्य -समाज का हिस्सा कैसे मान लें? हिमांशी शेलत की मार्मिक व यथार्थ परक कहानी "चुड़ैल की पीठ" का हिन्दी में अनुवाद डॉ मालिनी गौतम ने किया है। आइये पढ़ते हैं इस कहानी को - सुशील कुमार भारद्वाज

चुड़ैल की पीठ

गुजराती कहानीकार- हिमांशी शेलत 

दरवाज़ा ज्यादा मजबूत नहीं था । बाहर आवाज़ें बढ़ती जा रहीं थीं । पेटी-पिटारा और जो कुछ भी खींचा जा सके वह सब दरवाज़े से सटा कर पसीने में लथपथ, बेबाक भाणकी कमरे के बीचोबीच खड़ी हुई थी। कुछ भी करने की स्थिति नहीं थी अब, सिवाय इसके कि वह झमकू के घर की तरफ खुलने वाली ख़िड़की खोल कर वहाँ से भाग जाये । वहाँ भी इस बात का डर तो था ही कि दिन भर खाँसता रहता भगले का बुढ्ढा कहीं देख न ले। पर बुढ्ढे की नज़र कमज़ोर थी...ज्यादा दिखाई नहीं देता था उसे। अब जो भी हो,....या तो उसे भागना पड़ेगा या फाँसी लगानी पड़ेगी.....
  “ अबे खोल रही है कि तोड़ दें......
तोड़ ही दो...देर किस बात की, अंदर छुपकर बैठी है अपने-आप बाहर आयेगी....साली पूरा गाँव खाने को बैठी है...
ऐय रवला, सामने से तीकम लेकर आ.....
दरवाज़ा थरथरा रहा था । डंडा, लकड़ी, धड़ाधड़ मुट्ठियाँ और अब इन सबसे जोरदार हथियार मँगाया जा रहा था। वहीं एक कोने में रड़की, आकुल-व्याकुल आँखों से बोले जा रही थी।
“.......रोज़ रात को सिकोतरी ( भूतनी) बुलाती थी। मैं कितने ही दिनों से कह रही थी कि भाणकी रात को कुछ करती है, पर किसी ने नहीं माना, लो अब खुद ही देख लो कि क्या हुआ है...
भाणकी की साँस तो जैसे दरवाज़े पर ही लगी हुई थी। कमरे के बीच तो वह मात्र परछाईं बन कर खड़ी थी। ये दरवाज़ा टूटा, ये भीड़ घर में घुसी, सटासट लकड़ियाँ, पीठ पर सोटियाँ, खिंचे हुए कपड़े और बिल्कुल नग्न शरीर, पूरे गाँव में दौड़ती-हाँफती वह अकेली और पीछे पूरा टोला....धधकते दाग, नुकीले पत्थर और खून का रेला.....
यूँ तो पिटारे में रस्सी रखी हुई थी। खोलकर फन्दा तैयार करने में क्या देर लगनी थी ? ये
लटकाया और ये खेल खत्म । पर हाथ जैसे पिटारे तक पहुँचने को तैयार न थे। जीव कहीं फँसा हुआ था...कह नहीं सकते शायद पेमा में ही अटका पड़ा हो ...
गाँव में ऐसी घटना कोई पहली बार तो बनी नहीं थी । न जाने कितनों के बालक चल बसे थे। उन्हीं में से गीगला भी एक था । उस दिन भाणकी के घर के पास खेल रहा था। अकेला भी नहीं था साथ में दाजी और उकड़ के टोपलाभर नंगे-मुंगे थे। टिटिहा-रोह हुआ तो खटिया में पड़े हुए बुढ्ढे-डोकरे और फुर्सत मिलते ही सब के सब उसी दिशा में दौड़े चले आये । लड़के की नसें खिंच गईं थीं और आँखें चढ़ गईं थीं। सवारी तुरंत कैसे मिल जाती...बड़ी मिन्नत-मसाजत करके भीमा कहीं से रिक्शा ले आया था। अस्पताल में बहुत सुईयाँ खोंसीं पर गीगला तो उसकी माँ की आँखों के सामने ही सूखी लकड़ी-सा हो गया।
यह ख़बर जब गाँव में पहुँची तब भाणकी चूल्हे के पास बैठी हुई थी । एक समान आँच पर सिंकती रोटी की काली-बदामी डिज़ाइन को ताकती हुई वह वहाँ से इंच भर भी नहीं हिली। गीगा चल बसा, इसमें उसका कोई दोष नहीं था यह वह जानती थी, फिर भी किसी अनजाने डर की आशंका से उसके पैर काँपते रहते थे। पेमा के शहर जाने के बाद जब कितने ही दिनों तक उसकी कोई ख़बर न आई उस समय किसी को भी अपने घर की तरफ आते देखकर काँपते थे बिल्कुल वैसे ही । पेमा को कितना समझाया था, गाँव छोड़कर जाने को कितना ही मना किया था। पर पेमा तो बड़ा ही झक्की और अड़ियल था। छीबा ने छ्प्पर डलवा लिया...दीवाल भी पक्की करवा ली...शहर में तो मजदूरों की हमेशा ही ज़रूरत रहती है...कुछ ठीक-ठाक मिलेगा तो बचेगा भी....बाकी गाँव में अब क्या रखा है....
यह एक की एक बात घुमा-घुमाकर कहता हुआ पेमा गया सो गया । वह नहीं आया पर उसके बारे में तरह-तरह की बातें आती रहीं—“ दंगा फ़साद में खत्म हो गया,...कहीं हाथ-सफ़ाई करता हुआ पकड़ा गया इसलिए जेल में सड़ रहा है,...बस की चपेट में आ गया है ...तो कोई यह भी कहता कि शहर में तो सबकुछ मिलता है इसलिए सिर्फ औरत के लिए पेमा को गाँव आने की भला क्या ज़रूरत है।
छप्पर अच्छा-खासा गल गया था। मूसलाधार बारिश वाली रात में भाणकी बैठी रहे या सो जाये यह निश्चित नहीं कर पाती और रातभर दीया जलाती और बुझाती रहती ।यही कारण था कि माणेक और रड़की कानाफूसी करने लगीं कि भाणकी रातबिरात कुछ करती है और उसे जरूर भूतनी चिपक गई है। वेलजी ( ओझा) गाँव में यूँ ही चक्कर लगाता रहता था, भूतनी वाली बात सुनने के बाद वह भी गाँव में ही रहने लगा । 
-और उसी समय यह गीगला टप्पदिना से मर गया...
दरवाजा बस अब टूटने ही वाला था। दीवार से चिपक-चिपक कर भाणकी खिडकी तक पहुँची। 
अधिकतर बंद रहने वाली यह खिडकी जकड़बंद हो गयी थी इसलिए धकेलने पर नहीं खुली। दाँत भींचकर उसने पूरा ज़ोर खिड़की पर लगाया। खिडकी ज़रा-सी हिली, पल भर के लिए भाणकी को लगा कि अभी कोई आकर उसे पकड़ लेगा। डर कुछ कम हुआ तो चारो तरफ सुनसान पाया ...सारी चीख-पुकार और धमाधम तो दरवाज़े पर मची हुई थी। बिल्कुल नीची-सी यह खिडकी खुल गयी इसलिए भाणकी भगवान का आभार मानते हुए कूद पड़ी और दौड़ने लगी।
वह दौड़ तो रही थी पर दौड़कर जाना कहाँ था यह उसे नहीं पता था। पैर काँप रहे थे और साँसें 
तेज़ चल रही थी। तभी... भाणकी वो भाग रही है...कैसी भाग रही है....जैसे दहकते शब्द उसके कानों में पड़े। इधर-उधर दौड़कर टोले को उलझाने के सिवाय दूसरी कोई सुध-बुध भाणकी को नही थी। खुद के दौड़ते पैरों की आवाज़ और साँसों की धौंकनी की आवाज़ के सिवाय दूसरी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है यह निश्चित हो जाने पर वह देवालय के पास पीपल के पेड़ की आड़ में ज़रा देर खड़ी रही ।  उसकी बावरी आँखें एक ही दिशा में देख रही थीं। इस तरफ बस्ती कम थी, कुछ तितर-बितर झोंपड़े थे, भीमनाथ के चबूतरे की आसपास ही कहीं दत्तु और बावजी खर्राटे भर रहे होंगे ।
........शायद दोनों पी कर पड़े होंगे…..यह विचार आते ही भाणकी का हाथ तुरंत अपनी पसीने से
लथपथ छाती पर आँचल ढँकने के लिए उठ गया । दत्तु की यही आदत थी। भाणकी चाहे कहीं भी हो...बीच बज़ार में या सुनसान पगडंडी पर, बेशर्मी से बस एक ही जगह ताकता रहता था। 
एक बार जगु की दुकान पर सामान बँधवा कर पैसे निकालने के लिये ज्यों ही ब्लाउज़ में हाथ 
डाला, दत्तु वहीं थोड़ा पीछे खड़ा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता दिखाई दिया। उस दिन से उसने पैसे साड़ी के किनारे बाँधने शुरू कर दिये थे। पर तब भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा था ...दत्तु की नज़र तो जैसे सबकुछ चीरकर आर-पार हो जाती थी। भाणकी को लगता कि उसकी आँखें छाती को छू जाती हैं और वह आकुल-व्याकुल हो उठती। लेकिन आँखें दत्तु की एकदम साफ थीं, पीने के कारण थोड़ी-सी लाल रहती थीं बस । वैसे न तो  वो बोलता-चालता था और न ही कोई छेड़-छाड़ करता था बस चुपचाप देखता रहता था। दिखने में तो बड़ा भला था। उस दिन बड़े अस्पताल से दवा लेकर भाणकी बस पकड़ने के लिये हड़बड़ाती-हड़बड़ाती दौड़ रही थी कि किसी ने बस खड़ी रखवायी। भाणकी को पूरा विश्वास था कि वह दत्तु ही था। बस में दत्तु के सिवाय दूसरा था ही कौन जो भाणकी के लिए बस खड़ी रखवाता। सबेरे-सबेरे भी निठल्ला दत्तु चक्कर लगाता रहता था। भाणकी सबेरे कुछ न कुछ काम निकाल कर चबूतरे पर आती-जाती रहती थी। कारण बस इतना ही था कि सामनेवाले चबूतरे पर रतन अपने हष्ट-पुष्ट जुड़वाँ बच्चों को छाती से चिपकाकर बैठी रहती थी। बच्चे दूध पीकर तृप्त होने पर हाथ-पैर उछाल कर खेलते...भाणकी की प्यास जैसे उन बच्चों में छिपी हुई थी। ऐसे समय पर इधर-उधर भटकता दत्तु उसे भला कैसे दिखाई देता। और इसीलिये बेखबर भाणकी को दत्तु एकटक......
पीपल के नीचे ही पड़ा रहने को मिल जाये तो कितना अच्छा हो....इस कल्पना मात्र से ही भाणकी की आँखें बंद हो गई। किसी के साथ नींद में बात कर रही हो इस तरह उसके होठ थोड़े-थोड़े फड़फड़ा रहे थे.......दत्तु को कह्ती हूँ कि छुपा दे मुझे कहीं....कर दिखा सचमुच...अगर मैं तुझे इतनी ही ज्यादा....बाकी पेमा तो बिल्कुल झूठा है। यूँ कहाँ से मर गया होगा.....ये तो सब भागने के बहाने हैं.....
भाणकी की पलकें भारी हो रहीं थीं तभी हो-हो और धम-धम की आवाज़ें तेज़ी से पीपल की दिशा में आने लगीं और वह फुर्ती से सीधी भीमनाथ के चबूतरे की तरफ़ दौड़ी। हवा में बेफाम पत्थर फेंके जा रहे थे...डांग-कुल्हाड़ियाँ लहरा रही थीं।
वंतरी (भूतनी) को खत्म कर दो आज....छोड़ना मत
कहाँ छुप रही है चुड़ैल, सामने आ...बताते हैं तुझे.....गाँव की जिम्मेदारी हमारी है...समझी..
अईला जोर लगाओ सब....वंतरी भेस बदल कर भाग जायेगी...
भाणकी के बाल जूड़ा खुल जाने से हवा में लहरा रहे थे। लंबी लटें गाल और कपाल पर बिख़र गयीं थीं। आँचल का ठिकाना नहीं था, बल्कि हमेशा ढँका रहने वाला छाती की बाँयी तरफ का बड़ा सा लाखू भी साफ दिखायी दे रहा था। भाणकी को इस रूप में देखकर दत्तु का रहा-सहा नशा भी चला गया। वह कुछ समझ नहीं पाया । हाँफती हुई भाणकी को बस पैर स्थिर करने जितना ही समय मिला। तभी दत्तु पीछे से सुनाई देने वाली चिचियारियों में खिंचने लगा।
अईला दत्तुड़ा...पकड़..साली डाकण को...
दत्तु क्या खाक पकड़ेगा....होश में हो तब न...
दत्तु...मार...
दत्तु भागने मत देना चुड़ैल को...बच्चे-आदमी सबको खा जायेगी कुलटा साली...
भाणकी बहुत कुछ कहना चाहती थी दत्तु से, पर दत्तु मानों घबरा गया हो इस तरह पीछे ख़िसकता चला गया । भाणकी को लगा कि जैसे उसके हाथ कुछ ढूँढ रहे हैं । शायद उसकी डांग,या फिर.....। नज़र के बिल्कुल सामने ढली हुई भाणकी की लगभग उघड़ी हुई छाती दत्तु को दिखना बंद हो गयी थी। वह तिरछी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा।
मार सोंटी खींच के,..देख क्या रहा है...इन आवाज़ों के दबाव में फँसा हुआ दत्तु कुछ करे उसके पहले भाणकी चबूतरा कूद कर हवा में तीर बन गयी। उसके मजबूत पतले पैर ज़मीन पर टिकते न थे।
वंतरी...साली...मर्द भी पीछे रह जायें इतना तेज़ दौड़ रही है...”  
नदी में डूब मरूँगी पर किसी के हाथ नहीं आऊँगी...यह सोचकर भाणकी ने ऊबड़-खाबड़ टेकरियों वाला रास्ता चुना। पैरों में कितना कुछ उलझ रहा था और ऐसी ही किसी चीज़ से ठोकर लगने पर वह नीचे गिर पड़ी। गिरने के साथ ही मानों उसके पैर पूरी तरह टूट गये। वजन उठाने लायक न रहे..टें हो गये और भाणकी लाचार हो गयी। उकड़ू पड़ी हुई वह पसीने में  घुलती गयी।
चिचियारी और धमाधम की आवाज़ें अब बिल्कुल नज़दीक आने लगीं थीं। किसी ने उसे पीछे से खींचा। ज़मीन पर उगी हुयी घास से भाणकी चिपकी रही। कपड़े चीर-चीर हो गये..पीठ खुल्ली हो गयी...और उस पर पड़ने लगे डाँग, पत्थर, लात, गालियाँ ...और फिर सब के सब टूट पड़े पूरी ताकत से।
संपूर्ण होश उसने कब खो दिया यह तो पता नहीं...पर बस होश खोने से पहले मन में विचार आया...
साले भड़वे....कीड़े पड़ें तुमको......दत्तु जैसा सच्चा आदमी इनके बीच में हो ही नहीं सकता...आज पिया हुआ न होता तो बिचारा दत्तु....कैसा सच्चा...मर्द है.....
यूँ तो गाँव वाले सब मानते थे कि चुड़ैल की पीठ में भी आँखें होती हैं । बिल्कुल झूठी बात.....अगर होतीं तो भाणकी को टोले में खड़ा हुआ पहाड़ जैसा दत्तु दिखाई न दिया होता .??

डॉ. मालिनी गौतम


अनुवादक- डॉ. मालिनी गौतम
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