मंगलवार, 27 जून 2017

हिमांशी शेलत की कहानी "चुड़ैल की पीठ"

वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में स्त्री हमेशा से परिस्थितियों की शिकार होती रही है। निर्दोष होकर भी वह अपना बचाव नहीं कर पाती है। नियति और इंतजार के बाद मौत के सिवा बचा ही क्या है उसके पास? खुद को जिंदा रखने की जिद्द और दूसरों के बच्चों के सुख में ही सुखी होने की प्रवृत्ति दूसरों की नजर में खटकती जरूर है। वह डायन, चुड़ैल और पता नहीं क्या -क्या कहलाती है? ऐसी स्त्रियों से लोग अपने बच्चों को दूर रखने में ही भलाई समझते हैं। समाज में गिद्ध की नजर रखने वाले लोग अपनी पैनी निगाह से कपड़े के भीतर जिस्म में सुराख करने से भी बाज नहीं आते हैं। लेकिन जब स्वार्थलोलुप्त अंधविश्वासी समाज में खुली आँखों वाले बिना किसी नशे के ही नशे में हों तो लाल आँखों वाले नशेड़ी से क्या उम्मीद पालना? लेकिन डूबते को तो आखिरी तिनके का भी सहारा नसीब नहीं हो पाता है। आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर टूटती-बिखरती स्त्रियों को न तो ससुराल वालों से राहत मिलती है न मायके वालों से सहयोग। हर स्तर पर विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को जब समाज में सम्मान ही न मिले तो हम खुद को सभ्य -समाज का हिस्सा कैसे मान लें? हिमांशी शेलत की मार्मिक व यथार्थ परक कहानी "चुड़ैल की पीठ" का हिन्दी में अनुवाद डॉ मालिनी गौतम ने किया है। आइये पढ़ते हैं इस कहानी को - सुशील कुमार भारद्वाज

चुड़ैल की पीठ

गुजराती कहानीकार- हिमांशी शेलत 

दरवाज़ा ज्यादा मजबूत नहीं था । बाहर आवाज़ें बढ़ती जा रहीं थीं । पेटी-पिटारा और जो कुछ भी खींचा जा सके वह सब दरवाज़े से सटा कर पसीने में लथपथ, बेबाक भाणकी कमरे के बीचोबीच खड़ी हुई थी। कुछ भी करने की स्थिति नहीं थी अब, सिवाय इसके कि वह झमकू के घर की तरफ खुलने वाली ख़िड़की खोल कर वहाँ से भाग जाये । वहाँ भी इस बात का डर तो था ही कि दिन भर खाँसता रहता भगले का बुढ्ढा कहीं देख न ले। पर बुढ्ढे की नज़र कमज़ोर थी...ज्यादा दिखाई नहीं देता था उसे। अब जो भी हो,....या तो उसे भागना पड़ेगा या फाँसी लगानी पड़ेगी.....
  “ अबे खोल रही है कि तोड़ दें......
तोड़ ही दो...देर किस बात की, अंदर छुपकर बैठी है अपने-आप बाहर आयेगी....साली पूरा गाँव खाने को बैठी है...
ऐय रवला, सामने से तीकम लेकर आ.....
दरवाज़ा थरथरा रहा था । डंडा, लकड़ी, धड़ाधड़ मुट्ठियाँ और अब इन सबसे जोरदार हथियार मँगाया जा रहा था। वहीं एक कोने में रड़की, आकुल-व्याकुल आँखों से बोले जा रही थी।
“.......रोज़ रात को सिकोतरी ( भूतनी) बुलाती थी। मैं कितने ही दिनों से कह रही थी कि भाणकी रात को कुछ करती है, पर किसी ने नहीं माना, लो अब खुद ही देख लो कि क्या हुआ है...
भाणकी की साँस तो जैसे दरवाज़े पर ही लगी हुई थी। कमरे के बीच तो वह मात्र परछाईं बन कर खड़ी थी। ये दरवाज़ा टूटा, ये भीड़ घर में घुसी, सटासट लकड़ियाँ, पीठ पर सोटियाँ, खिंचे हुए कपड़े और बिल्कुल नग्न शरीर, पूरे गाँव में दौड़ती-हाँफती वह अकेली और पीछे पूरा टोला....धधकते दाग, नुकीले पत्थर और खून का रेला.....
यूँ तो पिटारे में रस्सी रखी हुई थी। खोलकर फन्दा तैयार करने में क्या देर लगनी थी ? ये
लटकाया और ये खेल खत्म । पर हाथ जैसे पिटारे तक पहुँचने को तैयार न थे। जीव कहीं फँसा हुआ था...कह नहीं सकते शायद पेमा में ही अटका पड़ा हो ...
गाँव में ऐसी घटना कोई पहली बार तो बनी नहीं थी । न जाने कितनों के बालक चल बसे थे। उन्हीं में से गीगला भी एक था । उस दिन भाणकी के घर के पास खेल रहा था। अकेला भी नहीं था साथ में दाजी और उकड़ के टोपलाभर नंगे-मुंगे थे। टिटिहा-रोह हुआ तो खटिया में पड़े हुए बुढ्ढे-डोकरे और फुर्सत मिलते ही सब के सब उसी दिशा में दौड़े चले आये । लड़के की नसें खिंच गईं थीं और आँखें चढ़ गईं थीं। सवारी तुरंत कैसे मिल जाती...बड़ी मिन्नत-मसाजत करके भीमा कहीं से रिक्शा ले आया था। अस्पताल में बहुत सुईयाँ खोंसीं पर गीगला तो उसकी माँ की आँखों के सामने ही सूखी लकड़ी-सा हो गया।
यह ख़बर जब गाँव में पहुँची तब भाणकी चूल्हे के पास बैठी हुई थी । एक समान आँच पर सिंकती रोटी की काली-बदामी डिज़ाइन को ताकती हुई वह वहाँ से इंच भर भी नहीं हिली। गीगा चल बसा, इसमें उसका कोई दोष नहीं था यह वह जानती थी, फिर भी किसी अनजाने डर की आशंका से उसके पैर काँपते रहते थे। पेमा के शहर जाने के बाद जब कितने ही दिनों तक उसकी कोई ख़बर न आई उस समय किसी को भी अपने घर की तरफ आते देखकर काँपते थे बिल्कुल वैसे ही । पेमा को कितना समझाया था, गाँव छोड़कर जाने को कितना ही मना किया था। पर पेमा तो बड़ा ही झक्की और अड़ियल था। छीबा ने छ्प्पर डलवा लिया...दीवाल भी पक्की करवा ली...शहर में तो मजदूरों की हमेशा ही ज़रूरत रहती है...कुछ ठीक-ठाक मिलेगा तो बचेगा भी....बाकी गाँव में अब क्या रखा है....
यह एक की एक बात घुमा-घुमाकर कहता हुआ पेमा गया सो गया । वह नहीं आया पर उसके बारे में तरह-तरह की बातें आती रहीं—“ दंगा फ़साद में खत्म हो गया,...कहीं हाथ-सफ़ाई करता हुआ पकड़ा गया इसलिए जेल में सड़ रहा है,...बस की चपेट में आ गया है ...तो कोई यह भी कहता कि शहर में तो सबकुछ मिलता है इसलिए सिर्फ औरत के लिए पेमा को गाँव आने की भला क्या ज़रूरत है।
छप्पर अच्छा-खासा गल गया था। मूसलाधार बारिश वाली रात में भाणकी बैठी रहे या सो जाये यह निश्चित नहीं कर पाती और रातभर दीया जलाती और बुझाती रहती ।यही कारण था कि माणेक और रड़की कानाफूसी करने लगीं कि भाणकी रातबिरात कुछ करती है और उसे जरूर भूतनी चिपक गई है। वेलजी ( ओझा) गाँव में यूँ ही चक्कर लगाता रहता था, भूतनी वाली बात सुनने के बाद वह भी गाँव में ही रहने लगा । 
-और उसी समय यह गीगला टप्पदिना से मर गया...
दरवाजा बस अब टूटने ही वाला था। दीवार से चिपक-चिपक कर भाणकी खिडकी तक पहुँची। 
अधिकतर बंद रहने वाली यह खिडकी जकड़बंद हो गयी थी इसलिए धकेलने पर नहीं खुली। दाँत भींचकर उसने पूरा ज़ोर खिड़की पर लगाया। खिडकी ज़रा-सी हिली, पल भर के लिए भाणकी को लगा कि अभी कोई आकर उसे पकड़ लेगा। डर कुछ कम हुआ तो चारो तरफ सुनसान पाया ...सारी चीख-पुकार और धमाधम तो दरवाज़े पर मची हुई थी। बिल्कुल नीची-सी यह खिडकी खुल गयी इसलिए भाणकी भगवान का आभार मानते हुए कूद पड़ी और दौड़ने लगी।
वह दौड़ तो रही थी पर दौड़कर जाना कहाँ था यह उसे नहीं पता था। पैर काँप रहे थे और साँसें 
तेज़ चल रही थी। तभी... भाणकी वो भाग रही है...कैसी भाग रही है....जैसे दहकते शब्द उसके कानों में पड़े। इधर-उधर दौड़कर टोले को उलझाने के सिवाय दूसरी कोई सुध-बुध भाणकी को नही थी। खुद के दौड़ते पैरों की आवाज़ और साँसों की धौंकनी की आवाज़ के सिवाय दूसरी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है यह निश्चित हो जाने पर वह देवालय के पास पीपल के पेड़ की आड़ में ज़रा देर खड़ी रही ।  उसकी बावरी आँखें एक ही दिशा में देख रही थीं। इस तरफ बस्ती कम थी, कुछ तितर-बितर झोंपड़े थे, भीमनाथ के चबूतरे की आसपास ही कहीं दत्तु और बावजी खर्राटे भर रहे होंगे ।
........शायद दोनों पी कर पड़े होंगे…..यह विचार आते ही भाणकी का हाथ तुरंत अपनी पसीने से
लथपथ छाती पर आँचल ढँकने के लिए उठ गया । दत्तु की यही आदत थी। भाणकी चाहे कहीं भी हो...बीच बज़ार में या सुनसान पगडंडी पर, बेशर्मी से बस एक ही जगह ताकता रहता था। 
एक बार जगु की दुकान पर सामान बँधवा कर पैसे निकालने के लिये ज्यों ही ब्लाउज़ में हाथ 
डाला, दत्तु वहीं थोड़ा पीछे खड़ा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता दिखाई दिया। उस दिन से उसने पैसे साड़ी के किनारे बाँधने शुरू कर दिये थे। पर तब भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा था ...दत्तु की नज़र तो जैसे सबकुछ चीरकर आर-पार हो जाती थी। भाणकी को लगता कि उसकी आँखें छाती को छू जाती हैं और वह आकुल-व्याकुल हो उठती। लेकिन आँखें दत्तु की एकदम साफ थीं, पीने के कारण थोड़ी-सी लाल रहती थीं बस । वैसे न तो  वो बोलता-चालता था और न ही कोई छेड़-छाड़ करता था बस चुपचाप देखता रहता था। दिखने में तो बड़ा भला था। उस दिन बड़े अस्पताल से दवा लेकर भाणकी बस पकड़ने के लिये हड़बड़ाती-हड़बड़ाती दौड़ रही थी कि किसी ने बस खड़ी रखवायी। भाणकी को पूरा विश्वास था कि वह दत्तु ही था। बस में दत्तु के सिवाय दूसरा था ही कौन जो भाणकी के लिए बस खड़ी रखवाता। सबेरे-सबेरे भी निठल्ला दत्तु चक्कर लगाता रहता था। भाणकी सबेरे कुछ न कुछ काम निकाल कर चबूतरे पर आती-जाती रहती थी। कारण बस इतना ही था कि सामनेवाले चबूतरे पर रतन अपने हष्ट-पुष्ट जुड़वाँ बच्चों को छाती से चिपकाकर बैठी रहती थी। बच्चे दूध पीकर तृप्त होने पर हाथ-पैर उछाल कर खेलते...भाणकी की प्यास जैसे उन बच्चों में छिपी हुई थी। ऐसे समय पर इधर-उधर भटकता दत्तु उसे भला कैसे दिखाई देता। और इसीलिये बेखबर भाणकी को दत्तु एकटक......
पीपल के नीचे ही पड़ा रहने को मिल जाये तो कितना अच्छा हो....इस कल्पना मात्र से ही भाणकी की आँखें बंद हो गई। किसी के साथ नींद में बात कर रही हो इस तरह उसके होठ थोड़े-थोड़े फड़फड़ा रहे थे.......दत्तु को कह्ती हूँ कि छुपा दे मुझे कहीं....कर दिखा सचमुच...अगर मैं तुझे इतनी ही ज्यादा....बाकी पेमा तो बिल्कुल झूठा है। यूँ कहाँ से मर गया होगा.....ये तो सब भागने के बहाने हैं.....
भाणकी की पलकें भारी हो रहीं थीं तभी हो-हो और धम-धम की आवाज़ें तेज़ी से पीपल की दिशा में आने लगीं और वह फुर्ती से सीधी भीमनाथ के चबूतरे की तरफ़ दौड़ी। हवा में बेफाम पत्थर फेंके जा रहे थे...डांग-कुल्हाड़ियाँ लहरा रही थीं।
वंतरी (भूतनी) को खत्म कर दो आज....छोड़ना मत
कहाँ छुप रही है चुड़ैल, सामने आ...बताते हैं तुझे.....गाँव की जिम्मेदारी हमारी है...समझी..
अईला जोर लगाओ सब....वंतरी भेस बदल कर भाग जायेगी...
भाणकी के बाल जूड़ा खुल जाने से हवा में लहरा रहे थे। लंबी लटें गाल और कपाल पर बिख़र गयीं थीं। आँचल का ठिकाना नहीं था, बल्कि हमेशा ढँका रहने वाला छाती की बाँयी तरफ का बड़ा सा लाखू भी साफ दिखायी दे रहा था। भाणकी को इस रूप में देखकर दत्तु का रहा-सहा नशा भी चला गया। वह कुछ समझ नहीं पाया । हाँफती हुई भाणकी को बस पैर स्थिर करने जितना ही समय मिला। तभी दत्तु पीछे से सुनाई देने वाली चिचियारियों में खिंचने लगा।
अईला दत्तुड़ा...पकड़..साली डाकण को...
दत्तु क्या खाक पकड़ेगा....होश में हो तब न...
दत्तु...मार...
दत्तु भागने मत देना चुड़ैल को...बच्चे-आदमी सबको खा जायेगी कुलटा साली...
भाणकी बहुत कुछ कहना चाहती थी दत्तु से, पर दत्तु मानों घबरा गया हो इस तरह पीछे ख़िसकता चला गया । भाणकी को लगा कि जैसे उसके हाथ कुछ ढूँढ रहे हैं । शायद उसकी डांग,या फिर.....। नज़र के बिल्कुल सामने ढली हुई भाणकी की लगभग उघड़ी हुई छाती दत्तु को दिखना बंद हो गयी थी। वह तिरछी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा।
मार सोंटी खींच के,..देख क्या रहा है...इन आवाज़ों के दबाव में फँसा हुआ दत्तु कुछ करे उसके पहले भाणकी चबूतरा कूद कर हवा में तीर बन गयी। उसके मजबूत पतले पैर ज़मीन पर टिकते न थे।
वंतरी...साली...मर्द भी पीछे रह जायें इतना तेज़ दौड़ रही है...”  
नदी में डूब मरूँगी पर किसी के हाथ नहीं आऊँगी...यह सोचकर भाणकी ने ऊबड़-खाबड़ टेकरियों वाला रास्ता चुना। पैरों में कितना कुछ उलझ रहा था और ऐसी ही किसी चीज़ से ठोकर लगने पर वह नीचे गिर पड़ी। गिरने के साथ ही मानों उसके पैर पूरी तरह टूट गये। वजन उठाने लायक न रहे..टें हो गये और भाणकी लाचार हो गयी। उकड़ू पड़ी हुई वह पसीने में  घुलती गयी।
चिचियारी और धमाधम की आवाज़ें अब बिल्कुल नज़दीक आने लगीं थीं। किसी ने उसे पीछे से खींचा। ज़मीन पर उगी हुयी घास से भाणकी चिपकी रही। कपड़े चीर-चीर हो गये..पीठ खुल्ली हो गयी...और उस पर पड़ने लगे डाँग, पत्थर, लात, गालियाँ ...और फिर सब के सब टूट पड़े पूरी ताकत से।
संपूर्ण होश उसने कब खो दिया यह तो पता नहीं...पर बस होश खोने से पहले मन में विचार आया...
साले भड़वे....कीड़े पड़ें तुमको......दत्तु जैसा सच्चा आदमी इनके बीच में हो ही नहीं सकता...आज पिया हुआ न होता तो बिचारा दत्तु....कैसा सच्चा...मर्द है.....
यूँ तो गाँव वाले सब मानते थे कि चुड़ैल की पीठ में भी आँखें होती हैं । बिल्कुल झूठी बात.....अगर होतीं तो भाणकी को टोले में खड़ा हुआ पहाड़ जैसा दत्तु दिखाई न दिया होता .??

डॉ. मालिनी गौतम


अनुवादक- डॉ. मालिनी गौतम
4/475, मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
जिला- महीसागर्
गुजरात
मो. 09427078711


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