अनिरूद्ध सिंहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अनिरूद्ध सिंहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 23 जून 2017

अनिरुद्ध सिंहा की कुछ गजलें

         
    अनिरुद्ध सिंहा की कुछ बेहतरीन गजलें


                 
   अनिरुद्ध सिन्हा

जाँ बदन से जुदा  है रहने दे
ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे

एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ
अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे

छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें
ये  फसाना  सुना  है  रहने दे

अपनी सूरत से मत डरा मुझको
सामने  आईना   है  रहने  दे

छेड़खानी  न  कर  वफ़ाओं से
वो अगर  बेवफ़ा  है  रहने दे

,💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐  

                     

राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते
जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते

नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू
दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते

कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में
देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर  देखते

बेबसी की  बाजुओं में  जाने  कब से क़ैद है
चंद लम्हों के  लिए  बाहर निकलकर देखते

उम्र भर जलते रहे  जो  रंजिशों की आग में
वो मुहब्बत के चिरागों  में भी जलकर देखते


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

लोग  पीछे थे  मेरे  हाथ में पत्थर लेकर
मैं कहाँ  भागता  शीशे का बना घर लेकर

प्यास  सहरा  में  बुझा देंगे ये मेरे  आँसू
मैं तेरे  साथ हूँ  आँखों  में समुंदर  लेकर

ऐसे  हालात  में जज़्बात भी मर जाते  हैं
लोग मिलते  हैं जहाँ  हाथ में खंज़र लेकर

फिर चिरागों को बुझा दे न हवाओं का जनून
घर में  बैठे रहे  सब  रात का ये डर  लेकर

ये मुहब्बत का सफ़र तन्हा सफ़र  रहता  है
कौन चलता है यहाँ साथ  में  लश्कर लेकर


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

रगों  में रेत  भरकर  रोज़ घटता जा रहा है
वो दरिया तो किनारों  से लिपटता जा रहा है

मेरा ये दायरा  जब से सिमटता  जा रहा  है
मेरा किरदार भी अब मुझसे कटता जा रहा है

ये दुनिया तो हमेशा  की तरह रंगी  बहुत  है
न जाने  क्यों हमारा  दिल उचटता जा रहा है

नई तहजीब  अपना  क़द बढ़ाती  जा रही  है
पुराना  जो  है  धीरे-धीरे  हटता  जा रहा  है

वो जाहिल था वो जाहिल है वो जाहिल ही रहेगा
किताबों के  वो बस  पन्ने पलटता जा रहा  है


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

जो आँसू पीके हँसना जानता है
मुहब्बत को  वही  पहचानता है

पड़े हैं पाँव में  जिसके भी छाले
सफ़र की वो हक़ीक़त जानता है

भरम  कल टूट जाएगा तुम्हारा
फ़रिश्ता कौन किसको मानता है

वो किसकी याद लेकर बस्तियों में
गली की ख़ाक हर दिन छानता है

शहर में फिर रहा हूँ अजनबी सा
कोई मुझको  कहाँ पहचानता  है


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


इजहारे-मुहब्बत  की जो हिम्मत नहीं करते
वे  लोग  ज़माने  से  बगावत  नहीं करते

खुशबू से जिन्हें इश्क़ है लुट जाते हैं लेकिन
काँटों से किसी  हाल में  उल्फ़त नहीं करते

हर हाल  में रिश्तों  की  ये सांसें  रहे ज़िंदा
हम जुल्म तो सहते हैं शिकायत  नहीं करते

बेचैन  बहुत  होते  हैं  वो  रातों में अक्सर
जो अपने  उसूलों  की हिफाज़त नहीं  करते

सच-झूठ  का  अंदाज़  लगा लेते हैं हम भी
माना कि  अदालत  में  वकालत नहीं करते

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

दिखाई दे न  जो उसका हिसाब क्या रखता
अँधेरी रात में  सूरज का ख़्वाब क्या रखता

हरेक बार  की  फूलों  से  जिसने गुस्ताखी
मैं उसके हाथ में दिल का गुलाब क्या रखता

वो मेरा दोस्त था हमदम था जाँनिसार भी था
मैं उसके सामने कोई  हिजाब  क्या  रखता

किसी चिराग की लौ में न ख़ुद को पहचाना
सियाह रात में रुख पर नकाब  क्या रखता

हरेक  सिम्त  की  मजबूरियों  के  घेरे में
हवा के रुख पे ग़मों की किताब क्या रखता


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


उलझनों से  तो कभी प्यार से कट जाती है
ज़िंदगी वक़्त की  रफ्तार से  कट  जाती है

मैं   तो   क्या   हूँ   मेरी   परछाई  भी
रोज़  उठती  हुई दीवार  से  कट  जाती है

यूँ तो मुश्किल है बहुत इसको मिटाना साहब
दुश्मनी प्यार  की  तलवार से कट  जाती है

सारी  बेकार  की  खबरें  ही छपा करती  हैं
काम की बात तो अखबार से कट  जाती है

इतना  आसान नहीं प्यारे मुहब्बत   करना
ये वो गुड़िया है जो बाज़ार से कट जाती है

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐



परिचय
                          -------------
नाम –अनिरुद्ध सिन्हा
जन्म -2 मई 1957
शिक्षा –स्नातकोत्तर
प्रकाशित कृतियाँ
--------------------
-(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह )(3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह) (4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)(9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण(12)हिन्दी ग़ज़ल परंपरा और विकास (13)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (आलोचना )
सम्पादन-
साहित्यिक पत्रिका “समय  सुरभि” और ”,जनपथ “ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन
“किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है(अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें)तथा बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार का सम्पादन ।
देश के तमाम स्तरीय पत्र/पत्रिकाओं में निरंतर ग़ज़लों और आलेखों का प्रकाशन
सम्मान  
बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा,विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,आचार्य लक्ष्मीकान्त मिश्र स्मृति सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
सदस्य-बिहार फिल्म विकास एवं वित्त निगम
संप्रति –स्वतंत्र लेखन
संपर्क- गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

             

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें

                     
       
ग़ज़ल
                     अनिरुद्ध सिन्हा

पाले हुए  जो ज़ख्म  जुबां  पर उतर गए
रिश्ते तमाम  कट  गए  जज़्बात मर गए

घर की  तलाश और  मुहब्बत की चाह में
निकले  हुए वे लोग  न जाने  किधर गए

ये और  बात है  कि हमें  कुछ नहीं मिला
जब ज़िन्दगी की खोज में हम चाँद पर गए

साये की  तरह रहते थे जो साथ –साथ वो
रस्ते में अब मिले भी तो बचकर गुज़र गए

खुशबू तुम्हारे जिस्म की ये काम कर  गई
काँटों पे  चल रहे  थे अचानक  ठहर गए

                   💐💐💐💐💐


फूल बनकर जो ख़्वाब आता है
बारहा    लाजवाब   आता  है

जब मुहब्बत से लोग मिलते हैं
तब  वहाँ  इन्क़लाब  आता है

फिर भी रौशन जहां नहीं होता
रोज़  ही  आफताब  आता  है

अब कहाँ प्यार के लिफाफे में
कोई  लेकर  गुलाब  आता है

शायरी  में मज़ा  तभी आता
शेर जब  कामयाब  आता है


💐💐💐💐💐


कोई किसी की तरफ है कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं ज़िन्दगी की तरफ

जरूर  उससे  कोई दिल  का  मामला होगा
हमारी सोच भटकती है क्यों उसी  की तरफ

ग़मों ने  इतनी  मुहब्बत से हमको पाला है
कदम उठे न हमारे  कभी  खुशी की तरफ

वफ़ा  का  साज  उठाए  हुए न जाने क्यों
मैं चल रहा हूँ  अँधेरी तेरी  गली की तरफ

भटक न जाए वो  सहरा में दर बदर होकर
बढ़ाए हाथ  समुंदर  रहा  नदी  की  तरफ


💐💐💐💐💐



वो मेरे दिल तलक आता  मगर दाखिल नहीं होता
महज मिलने मिलाने से ही कुछ हासिल नहीं होता

जो हम  फिरकापरस्ती  को मुहब्बत से मिटा देते
कोई बिस्मिल नहीं  होता कोई क़ातिल नहीं  होता

ये कैसी  बेबसी  के दौर  में  अब जी रहे हैं हम
हमारी फिक्र में  शामिल हमारा  दिल नहीं  होता

अगर सीने में जज़्बों की जो लौ मद्ध्म नहीं होती
किसी  को जीत लेना फिर यहाँ मुश्किल नहीं होता

कभी जो  ठान लेता  है बगावत के लिए कुछ भी
तो लेकर हाथ में खंजर  कभी गाफ़िल नहीं  होता

                       💐💐💐💐💐


जब भी उठा  है  दर्द  तेरा  मुस्कुरा लिए
कुछ इस तरह से आँख के मोती बचा लिए

जितने चमन के फूल थे घर में सजा लिए
यारों  ने  खूब  अपने  मुक़द्दर बना  लिए

ज़ख़्मी  हुए हैं  पाँव इन्हें देखना भी क्या
हमने ही  अपनी  राह में काँटे बिछा लिए

इतने  मिले  हैं ज़ख्म  ज़माने  से दोस्तो
रोने  को जी  किया तो ज़रा गुनगुना लिए

पहचान   अपनी  खूब  छुपाई  है आपने
चेहरे  पे अपने  और भी चेहरे लगा लिए

💐💐💐💐💐

                                                                                                               गुलज़ार  पोखर,मुंगेर(बिहार)811201
 Email-anirudhsinhamunger@gmail.
 Mobile-09430450098        

रविवार, 10 जुलाई 2016

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें


      साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है जो न सिर्फ़ अपने शब्दों के रचाव-कसाव से सबको सम्मोहित करने में सफल होता है बल्कि बहुत ही तेजी से लोगों के जुबां पर भी चढ जाता है। आज आनंद लेते हैं गजलगो अनिरूद्ध सिंहा की पांच गजलों का।
अनिरूद्ध सिंहा


1.

रख रही ज़ख़्मों पे अपनी उँगलियाँ पागल हवा
खोल देगी  दर्द की सब  खिड़कियाँ पागल हवा

ले  गई  है बादलों  तक  गर्म रातों की सनक
अब गिराएगी मकां पर बिजलियाँ  पागल हवा

बस जरा उनके दिलों से  दूर क्या हम हो गए
है  बढ़ाने  पर  अमादा  दूरियाँ  पागल  हवा

आंधियों की बात  तुमसे क्या करें हम  दोस्तो
जब  उड़ाकर ले गई सब तितलियाँ पागल हवा

हर दफ़ा तूफान  में  वो बादलों  की  आड़ में
साहिलों से  दूर करती  कश्तियां  पागल  हवा


2.


 अपना किसी भी और से लहजा नहीं मिला
जीने  का  ढंग  और  सलीका  नहीं मिला

जुगनू  तमाम  रात   चमकते   रहे  वहाँ
लेकिन सफ़र में एक भी साया  नहीं मिला

सहरा में अपनी प्यास  को देता रहा  फ़रेब
पानी भरा हो जिसमें  वो दरिया नहीं मिला

पहले तो  मेरी  बात  पे  आई  हया  उन्हें
फिर मुझको बात करने का मौका नहीं मिला

खुश हैं पड़ोसवाले  भी  इस बात पर  बहुत
मुझको मेरे  नसीब से ज्यादा  नहीं   मिला

3.

हवा में  पाँव  होठों पर हँसी है
ये कैसी हुस्न  की दीवानगी है

नए वादों के  फिर जेवर पहनकर
सियासत मुफ़लिसी में ढल रही है

वहाँ कुछ होंठ भी पत्थर के होंगे
जहां कुछ  बेअदब सी ज़िंदगी है

न इतनी तेज़ चल पुरवाइयों  में
अभी मौसम में थोड़ी सी नमी है

भला क्यों  चाँद के पहलू में तेरे
बदन खामोश कुछ-कुछ बेबसी है  

4.

कदमों के जब निशान  इरादों में ढल गए
हम हौसलों के  साथ  हवा में निकल गए

अब भी  है अपने  नूर पे मगरूर वो बहुत
रस्सी तो जल  गई है कहाँ उसके बल गए

प्यासी ज़मीं के जिस्म पे ऐसी बला की धूप
चेहरे थे जिनके  चांद  सफ़र  में बदल गए

फिर मुझको भूलने  की भी रस्में  अदा हुईं
पहले तमाम  ख़त थे जो यादों के जल गए

रक्खे हैं जब से सर पे किसी ने दुआ के हाथ
मुट्ठी  में  बंद  उनके  मुकद्दर  संभल  गए

5.

गरीबी जब कभी  हालात  से रिश्ता निभाती है
मेरे कच्चे  मकानों  से कोई आवाज़  आती  है

खमोशी छाई  रहती है  सवालों  के उठाने  पर
सियासत गुफ़्तगू  से हर दफा  दामन बचाती है

अदब की  तंग चादर  ओढ़  लेते  ही कोई बेटी
लड़कपन गाँव की गलियों में हँसकर छोड़ जाती है

कलेंडर में  शहीदों  की  जो  सूरत  देखता हूँ तो
गुलामी  की  कोई  तारीख  मेरा  दिल  दुखती है

मुहब्बत की  कलाई  को  हवस  के थाम लेते  ही
शराफ़त  चीख़  उठती  है  वफ़ा  आँसू  बहाती  है

संपर्क:-
अनिरूद्ध सिंहा
-गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार)811201  
मोबाइल-09430450098
Email-anirudhsinhamunger@gmail॰com                          
       -